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साथी, सारा को नहीं, अच्छा नहीं। सलाम वालेकुम। तुला बरकात। अल हमदुलिल्लाह रब्बुल आलमीन। ला सलाम अला रसूल करीम। लाही। साबका दर्स में हमने नवाक वजू लिए थे। किन चीजों से वजू टूटता है? तो जल्दी से मेरा ख्याल, हम जरा उनको देख लेते हैं क्या-क्या चीजें हैं? जी हां, कौन बताएगा? आप बताएँगे? हाँ। बू, किन चीजों से वजू टूटता है? साथी, दूर हो जाएँ। वायर से थोड़ा दूर हो जाएँ। हां जी। ऊँची आवाज से। हां जी। यानी कायदा कुल्लिया यह है कि पेशाब, पखा की जगह से कुछ भी निकले, पेशाब, पखा की जगह से कुछ भी निकले तो वह वजू टूट जाता है। समझे ना? कुछ भी हो तो उससे वजू टूट जाता है। अच्छा, उसके अलावा? अच्छा, इससे पहले जिन चीजों से वजू टूटता है, उसकी दलील चाहिए। बगैर दलील के भी? हां, दलील चाहिए। यानी कोई ऐसी चीज नहीं कि जिसको हम अपनी तरफ से कह सकें कि इससे वजू टूटता है। जब तक दलील ना हो। यानी कोई अगर कहे कि फलां चीज से वजू टूटता है, तो हम कहेंगे उसकी दलील दो। समझे ना? इसलिए हमें यहां पर यह चीज जानना चाहिए। अच्छा, नींद से वजू टूटने का क्या हुक्म है? आप बताएँ। गहराई या लेट के हल्की सी जाए। मुश्किल नहीं। अगर आदमी लेट के सोया है? हां। नहीं, टूटेगा नहीं। बैठ के? इस हालत में आदमी बैठा हो कि जिसमें हवा खारिज होने का इमकान ना हो, तो फिर वजू टूटेगा। लेकिन अगर लेटा है, रिलैक्स होकर टेक लगाई है, तो इसमें अगरचे हल्की नींद भी हो, तब भी वजू टूट जाता है। लेकिन अगर बैठा है, तो हल्की-फुल्की नींद होती है, उसमें नहीं टूटता। इसका मतलब कि गहरी नींद से वजू टूट जाता है। अच्छा, कुत्ते के गोश्त खाने से? बशीर भाई, दलील उसकी? माशाअल्लाह। हां जी। क्या दलील है? हां, आपसे पूछा। कुत्ते का गोश्त खा के वजू करे तो आप क्या कहेंगे? हाँ, उसे वजू करो। इसका मतलब कि कुत्ते का गोश्त खाकर वजू करना चाहिए। और हर वह चीज जिससे गुस्ल वाजिब होता है, उससे वजू भी टूट जाता है। दीने इस्लाम से मुर्ताद हो जाने से वजू टूट जाता है। इस्लाह उलमा का। लेकिन यह वजू किया जाए। अगर नाक से नसीर फूटी है, खून आती, मूँह से खून आती, मूँह से खून होती है, उससे वजू टूटता है? इसके बारे में हदीस जफ है। सही हदीस नहीं है। अच्छा, खून निकलने से? खून निकलने से नहीं टूटता। दलील? सहाबा कराम। ताब वो जो हैं, जख्मों में नमाज़ पढ़ा करते थे। जिहाद करते, जिहाद में जख्म लगते और जख्म से खून निकला होता था और नमाज़ पढ़ा करते थे। तो अगर इससे वजू टूटता होता, तो फिर लाज़मी उनको बयान किया जाता, बताया जाता। इसी तरह हमने पढ़ा था कि बाज़ लोगों को अल्लाह ताला, सभी की हिफाज़त करे, बीमारी होती है, मुसलसल वजू टूटने की। उनका वजू बाकी रहता ही नहीं है। सलसल बल है, हवा खारिज होती रहती है। ऐसे लोग कैसे नमाज़ पढ़ेंगे? क्या करेंगे? नमाज़ से पहले वजू करें या ज़्यादा देर पहले नहीं। नमाज़ से फ़ौरन पहले वजू करें। उसके बाद वजू टूटता भी रहे, तो तब भी उसका मुश्किल नहीं है। लेकिन अगर पेशाब, पखा की चीज है, तो उससे बचने के लिए कोई चीज रखना होगी ताकि कपड़े महफ़ूज़ रहें, ताकि कपड़े नापाक ना हों। अच्छा, यह भी हमने पढ़ा था कि बाज़ बीमार आदमी खुद वजू नहीं कर सकता, खुद रुतबा नहीं कर सकता, तो उसे फिर क्या करना चाहिए? दूसरा आदमी उसे वजू करवाए, तहर करवाए। अगर खुद नहीं कर सकता। अगर बिल्कुल पानी समाल नहीं कर सकता, फिर? फिर तम कर ले। समझे ना? लेकिन नमाज़ क्या छोड़ सकता है? हाँ, नमाज़ को टाइम पर पढ़ना है। नमाज़ छोड़ने की गुंजाइश नहीं है, चाहे कुछ भी हो जाए। वजू भी ना कर सका हो, तहर भी ना कर सका हो, तब भी उसे उसी हालत में नमाज़ पढ़ना है। सिवाय के वह नमाज़ जो जमा हो जाती हैं। ज़ुहर, असर, मगरिब, इशा उनको जमा कर सकता है। यानी ज़ुहर के वक्त पानी नहीं मिला, फ़र्ज़ करो पानी इस्तेमाल नहीं कर सका, लेकिन ज़ुहर के बाद असर के टाइम उसके पास आ गया, उसके पास पानी लाने वाला, वजू करवाने वाला, तो फिर ज़ुहर को लेट कर सकता है, हाँ तक कि असर के साथ पढ़ ले। मगरिब को इसी तरह लेट कर सकता है कि इशा के साथ पढ़ ले। लेकिन नमाज़ बिल्कुल ना पढ़ना, यह जायज़ नहीं है। अच्छा, उसके बाद हम आगे चलते हैं। आपके पास आज मसला क्या देख रहे हैं? मौजों, पगड़ी और प्लास्टर पर मसाह के मसाइल। सर्दियों का मौसम है। हम चाहते हैं कि कुछ दीन की आसायिश भी हम मालूम करें। समझे ना? इस्लाम में अल्लाह ताला ने जो हमको आसायिश दी है, तो ताकि हमको उसका भी इल्म हो। और नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है, अल्लाह ताला जिस तरह यह चाहता है कि हम उसके फ़राइज़ को पूरा करें, इसी तरह अल्लाह ताला यह भी पसंद करता है कि अल्लाह ताला ने अगर कोई हमें आसानी दी है, रुक़्सत दी है, उसको भी क़बूल करें। समझे ना? तो रुक़्सत वह चीज़, जिसको कहते हैं छूट। छूट का माना क्या? समझे? गुंजाइश। गुंजाइश का माना यानी असल हुक्म को करने का होता है किसी चीज़ को, लेकिन किसी चीज़ से आपको छूट दी जाती है। ठीक है? यह ना करो, समझे ना? नरमी कर दी जाती है, गुंजाइश दे दी जाती है, तो यह इसको कहते हैं रुक़्सत। अरबी में, हमारे उर्दू में गुंजाइश कह लें, छूट कह लें, जो भी उसका लफ़्ज़ दे लें। तो यह छूट है अल्लाह की तरफ़ से, रुक़्सत है, जिसके जायज़ होने पर उलमाए अहले सुन्ना का इजमा है। और यह आपके इल्म के लिए मौजों या जूराबों पर मसाह जो है, अहले सुन्ना के अकीदा के मसाइल में से है। अकीदा के मसाइल में क्यों? क्योंकि बाज़ बती लोग, दूसरे क़ौम वह इस चीज़ का, इस चीज़ को इज़्ज़त नहीं करते। इसलिए अहले सुन्ना के अहम तारीन जो अकीदा के मसाइल समझा जाते हैं, उसमें यह भी है, मौजों पर मसाह करना, जूराबों पर मसाह करना और मुतवातिर अहादीस से सुन्नत साबित है। मुतवातिर का माना क्या है? लगातार, मुसलसल, बत जदा। मुतवातिर के माने बहुत ज़्यादा अहादीस हैं। हत्ता कि 70 से ज़्यादा सहाबा ने इस हदीस को रिवायत किया। जिन्हें हज़रत रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम फ़रमाते हैं कि मुझसे, मुझसे 70 सहाबा ने मौजों पर मसाह का बयान किया। 70 सहाबा, यानी इसका माना कि बहुत बड़ी तादाद सहाबा की जिन्होंने मौजों पर मसाह करने की इस हदीस को रिवायत किया है, जिसमें किसी तरह का शक नहीं है। सफ़वान इब्ने उमय्य रज़ियल्लाहु ताला अन्हु रिवायत करते हैं कि जब हम सफ़र में होते, तो रसूलल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम [संगीत] हमें तीन दिन तक मौजे, तीन दिन, दिन-रात मौजे पहने रखने का हुक्म देते। ख़ाली पेशाब, खाने की हाज़त होती या नींद आती, तब जनाब की वजह से मौजे उतारने का हुक्म देते। यह दलील है। तिर्मिज़ी की सही हदीस। फ़रमाते हैं कि अगर हम सफ़र में होते, तो तीन दिन, तीन रातों तक एक बार मसाह कर, एक बार वजू करके पहन लिए, उसके बाद तीन दिन, तीन रातों तक उस पर मसाह करते रहते। और अगर मुकीम हो, तो तब क्या है? एक दिन और एक रात। जिस हम पढ़ेंगे, तो इससे मालूम हुआ कि यह सुन्नत जो है, साबित है नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से और जिसमें किस तरह का शक शबानी होना चाहिए। जहाँ तक मौजों का ताल्लुक है ना, मौजों पर मसाह उसमें तो कोई इख़्तिलाफ़ हमारे अहले सुन्ना के अंदर नहीं है। चारों आमा, सभी फ़ुकाहा, सभी मुत्तफ़िक़ हैं कि मौजों पर मसाह करना सुन्नत है। लेकिन सिर्फ़ जूराब के बारे में कुछ हमारे लोग इख़्तिलाफ़ करते हैं। जूराब यानी सॉक्स। इसमें बाज़ लोग इख़्तिलाफ़ करते हैं कि मौजे चमड़े के होते हैं और जूराबें कपड़े की होती हैं, कपड़े की, ऊन की, समझे? इन पर मसाह के हवाले से लोगों में कुछ इख़्तिलाफ़ है। लेकिन यह भी सही यह है कि इस पर भी मसाह करना सुन्नत है। जूराब पर भी मसाह उसी तरह करना जायज़ है, सुन्नत है जिस तरह मौजों पर है। उसकी, उसके हवाले से आपके सामने अवाइल पेश किए गए हैं। अल्लामा इब्ने बाज़ रज़ियल्लाहु ताला अन्हु, जो सऊदिया के साबका मुफ़्ती आज़म थे, फ़रमाते हैं कि जूराब पर करना नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित है। इब्ने मुजरिह, यह साबका क़दीम उलमा में से है और अमूमन यह जिस मसले पर उलमा का इत्तेफ़ाक़ होता है, उसको नक़ल करते हैं। उनकी किताब है अल इजमा के नाम से। इजमा, इजमा क्या होता है? कि जिस पर उलमा का इत्तेफ़ाक़ हो। तो बकायदा उनकी किताब इस मौजों पर कि जिसमें उन्होंने उन मसाइल को जमा किया है कि जिस पर उलमा उम्मत का, मुसलमान उलमा के इत्तेफ़ाक़ हैं। उनका कहना मुन्ज़र कहते हैं कि नौ सहाबा कराम से जूराब पर मसाह करना साबित है। इब्ने कुदामा यह भी बहुत बड़े आलिम गुज़रे हैं, हमबली मसलक के, फ़रमाते हैं कि सहाबा किराम ने जूराबों पर मसाह किया और उनके ज़माने में किसी ने उनसे मुख़ालफ़त ना की, कि जो इस मसले पर सहाबा के इजमा की दलील है। देखिए इजमा क्या होता है? इजमा होता है कि किसी एक ज़माने में, किसी वक्त में किसी मसले पर उस वक्त के जो उलमा हैं, सभी के सभी मुत्तफ़िक़ हों। उस वक्त के उलमा सभी के सभी उस मसले पर मुत्तफ़िक़ हों, उसको कहते हैं इजमा। तो फ़रमाते हैं इब्ने कुदामा के सहाबा ने, जिन सहाबा ने कुछ ने मसाह किया और बाकियों ने नहीं किया, लेकिन जिन्होंने नहीं भी किया, उन्होंने भी किसी ने तराज़ नहीं किया। इसका माना क्या हुआ? कि मसाह करना सभी सहाबा के नज़दीक जायज़ है। जूराबों पर, मौजों पर, जूराब पर, सॉक्स पर मसाह करना सभी सहाबा के नज़दीक जायज़ है। क्योंकि सहाबा कराम अक्सर बेहतर क्या होता कि अगर कोई एक सहाबी ऐसा अमल करता कि जो दूसरे सहाबा समझते कि सही नहीं है, तो फिर क्या करते? उसके ख़िलाफ़ बात करते कि तुमने यह सही नहीं किया। लेकिन अगर कोई एक सहाबी चीज़ कर रहा है और बाकी सभी सहाबा जानते हैं कि उसने यह चीज़ की है और सभी उस पर ख़ामोश हैं, इसका माना क्या है? कि सभी उस पर मुत्तफ़िक़ हैं। सभी उस पर मुत्तफ़िक़ हैं। तो इब्ने कुदामा फ़रमाते हैं कि सभी सहाबा इस पर उनका इजमा है। इजमा सुकूती, जिसको कहते हैं मज़ीद यह के अक़ली लिहाज़ से भी देखा जाए। नज़र के माने, अक़ल के माने। अक़ल के लिहाज़ से भी देखा जाए, तो वह मौजों पर मसाह करने की इजाज़त क्यों दी गई? महोदय, जो चमड़े के होते हैं, इस पर सभी का इत्तेफ़ाक़ है। उस पर मसाह की इजाज़त क्यों दी गई है? ज़रूरत के लिए। कि आदमी फ़र्ज़ करो सफ़र में है, घर में है, सर्दी का वक्त है, कोई, कोई भी ऐसी कैफ़ियत है, उसको आसानी के लिए। अब यह आसानी अगर मौजों के लिहाज़ से है, तो जाहिरि बात है, जूराब और सॉक्स के हवाले से भी होनी चाहिए। समझे ना? अच्छा, मौजों पर मसाह, ख़ाली पाव पर मसाह कर सकते हैं? बाज़ लोग करते हैं। ख़ाली पाव पर मसाह करते हैं। बाज़ लोग नहीं करते। पता करते हैं भी, आपने नहीं देखे होंगे? हां जी। किसी इमाम बाड़े में जाकर देखिए, पता चलेगा आपको। हां जी। उनके यहां ख़ाली पाव पर मसाह करते हैं। तो ख़ाली पाव पर मसाह नहीं होता। मसाह जो है, या जूराब पर है, या मौजों पर है। चमड़े के मौजे हों या जूराबें हों, तो मौजों पर मसाह इसलिए करने का हुक्म दिया गया, उसकी इजाज़त दी गई है, ताकि लोगों के लिए आसानी हो। अब अगर आसानी का मक़सद है, तो फिर जूराब पर भी होनी चाहिए। लेकिन होता क्या था? होता यह था कि नबी करीम के ज़माने में जूराब इस तरह की चीज़ बहुत कम इस्तेमाल होती थी। इस्तेमाल इनका बहुत कम था। बाज़ औक़ात जूराब ना होती, तो क्या करते लोग? कपड़ा पाव पर, वैसे कपड़ा लपेट लेते, सर्दी की वजह से। जिस सर्दी का मौसम है, किसी के पास जूराब, मौजे नहीं हैं, तो क्या करते? वैसे ही पाव के ऊपर कपड़ा लपेट लेते। आप सारे ने ऐसे-ऐसे कपड़े लपेटे हुए, पर मसाह करने की इजाज़त दी है। समझे ना? तो अल्लाह कुल्लु हाल मक़सद जो है, वह आसानी है। अगर आसानी का मक़सद है, फिर जिस तरह मौजों पर है, ऐसे जूराबों पर भी होनी चाहिए। अल्लाह कुल्लु हाल जूराब पर मसाह करना जायज़ है, इसमें कुछ शक नहीं होना चाहिए। और यह नबी की बदा, सहाबा कराम की सुन्नत है। अच्छा, जनाब मोटी हो या बारीक हो, कैसे भी हो? बाज़ उलमा फ़र्क़ करते हैं इसमें कि अगर मोटी जूराबें हैं, तो मसाह करें, बारीक हैं तो नहीं करें। और बाज़ कहते हैं कि नहीं, जैसे भी जूराबें हों, मसाह कर सकते हैं। एहतियात का तकाज़ा यही है कि जूराब मोटी हो तो मसाह किया जाए। इतनी जूराब बारीक हो कि जिससे पाव नज़र आता हो। बाज़ औक़ात आजकल जूराबें आ रही हैं बिल्कुल-बिल्कुल बारीक किस्म की होती हैं कि बस में से पूरा नज़र आता है। हयात यह है कि ऐसी जूराब पर मसाह ना किया जाए। अच्छा, उनमें जूराब पर मसाह करने की चार शर्तें हैं। मौजों, जूराब पर मसाह करने की चार शर्तें हैं, सभी को मालूम होना चाहिए। पहली शर्त यह है कि बा-वजू पहने हों। आपने वजू की हालत में उनको पहना हो। जब आपने पहना है, आप वजू की हालत में थे। चाहे वजू करने के फ़ौरन बाद पहन लें, बाद में पहन लें, लेकिन वजू की हालत में थे। अगर बगैर वजू के पहने, तो उस पर मसाह नहीं होगा। दूसरी शर्त यह है कि पाव टखनों तक ढके हों। पाव जो है आप देख रहे हैं यह टखना आपके सामने। पाव जो है, टखनों तक ढके हों। यानी इसके ऊपर तक जूराब हो। बाज़ आजकल शॉर्ट आ रही हैं जो इसके नीचे हो जाती हैं, उस पर मसाह नहीं होगा। यानी अगर शॉर्ट जो है टखने के, टखने के दरमियान या टखने से नीचे ख़त्म हो रही है, तो उस पर मसाह नहीं होगा। लाज़मी है कि टखने के ऊपर तक हो। तीसरी शर्त यह है कि मसाह मुक़र्रर मुद्दत में हो। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने टाइम दी है। अगर आदमी घर में है, शहर में है, मुसाफ़िर नहीं है, मुकीम है, उसके लिए एक दिन और एक रात। एक दिन और एक रात। और अगर मुसाफ़िर है, सफ़र में है, तो तीन दिन, तीन दिन और तीन रातें। तो इसी मुद्दत के अंदर मसाह हो। मुद्दत ख़त्म हो गई। फ़र्ज़ करो कि आपने फ़जर के टाइम वजू किया, पाव धोए और जूराब पहन ली, मौजे पहन लिए। पहला मसाह किया आपने ज़ुहर की नमाज़ के वजू करते हुए। आजकल ज़ुहर की अज़ान हो रही है तक़रीबन 11:35 या 11:30। आपने वजू किया और पहला मसाह आपने कर लिया। अब यहां से आपका टाइम शुरू हुआ। यहां से आपका टाइम शुरू हुआ। अगर आप घर में मुकीम हैं, शहर में हैं, तो आपके लिए 24 घंटे हैं। अगर आप मुसाफ़िर हैं, तो आपके लिए 72 घंटे हैं। 72 घंटे। समझे ना? तो पहले मसाह से आपका टाइम शुरू होगा। तो अगर आप मुकीम हैं, तो अगले दिन 24 घंटे ख़त्म होने से पहले तक आप उस पर मसाह कर सकते हो। 24 घंटे मुकम्मल हो गए। अब उस पर मसाह नहीं करेंगे। फिर क्या करेंगे? फिर मुकम्मल वजू करें। पाव धोएँ। पाव धो के दोबारा पहन लें। फिर आपका टाइम दोबारा शुरू हो गया। समझे ना? आप पाव धो के दोबारा पहन लें जूराबें या मौजे और फिर से आपका टाइम दोबारा फिर शुरू हो गया। समझे ना? तो यह है। तो इस टाइम लिमिट के अंदर हो। टाइम ख़त्म हो गया, तो फिर आपको लाज़मी मुकम्मल वजू करना होगा, पाव धोने होंगे आपको। अभी आता है मसला। इसलिए मसले को थोड़ा इशारा इंतज़ार करें। किताब सामने रखा करें। चौथा मसला, मौजे, जूराब पाक हों। जिस तरह बाकी कपड़े पाक होना चाहिए। तो यह भी जाहिरि बात, जिस्म पर पहने हुए हैं, इनको भी पाक होना चाहिए। अगर नापाक है, तो फिर उस पर मसाह नहीं करेंगे। दलील क्या है? आपके सामने हज़रत अली रज़ियल्लाहु ताला अन्हु उनके रिवायत दी गई है कि रसूल करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने तीन दिन, तीन, तीन दिन रात मुसाफ़िर के लिए और एक दिन रात मुकीम के लिए मौजों की मसाह की मुद्दत मुकर्रर फ़रमाई। मौजों के मसाह की मुद्दत जो है, वह तीन दिन, तीन रातें मुसाफ़िर के और एक दिन और एक रात मुकीम के लिए। आपने यह मसाह की मुद्दत जो है, मुकर्रर फ़रमाई। इससे पता चल गया कि मसाह की कितनी शर्तें हैं? चार शर्तें हैं। पहली शर्त क्या है? कि मौजे बा-वजू हालत में पहने हों। जूराब बा-वजू हालत में पहने हों। दूसरी शर्त यह है कि टखनों के ऊपर तक हो। तीसरी शर्त यह है कि टाइम के अंदर हो, जो टाइम लिमिट दी गई है। और चौथी शर्त यह है कि पाक हो, नापाक ना हो। समझे ना? अच्छा, 92 में मसाह की मुद्दत पहली बार मसाह करने से शुरू होती है। जैसा अभी बताया कर दिया है। जब आप पहली बार मसाह करेंगे, तो वहाँ से आपका टाइम शुरू हो गया। उस वक्त से लेकर देखें, अगर मुकीम है तो 24 घंटे, मुसाफ़िर है तो 72 घंटे उस पर मसाह कर सकते हैं। 93 में मौजों पर मसाह पाव के ऊपर से करना मसनून है। मसाह कैसे करेंगे? पाव के ऊपर से। हाथ गीले किए हुए, आपने दोनों हाथों को दोनों पाव पर रखें और ऐसे ऊपर से आप देख रहे हैं। समझे ना? इस तरह से मसाह करेंगे। पाव के ऊपर से। पाव के नीचे से क्यों नहीं होगा? मिट्टी तो नीचे लगती है ना, भी मिट्टी वा तो पाव के नीचे लगती है। हाँ। तो यही अल्लाह के नबी की सुन्नत है। हज़रत अली फ़रमाते हैं कि अगर दीन जो है, वह सिर्फ़ अपनी अकल से, राय से होता ना, तो फिर पाव का, जूराबों का मसाह नीचे होना चाहिए था। लेकिन मैं आप को, आप ऊपर से मसाह करते थे। तो इसलिए मसाह जो है, पाव के ऊपर से, नीचे से नहीं है। नीचे से नहीं है। और वैसे भी ऊपर से मसाह करना ही अक़ल के लिहाज़ से भी सही है। क्यों भाई? नीचे से मसाह करेंगे, गीले हो जाएँगी और ज़्यादा मिट्टी लगेगी। समझे ना? इसलिए ऊपर से मसाह करना सुन्नत है। 94 में जिसने दौरान इक़ामत मौजों पर मसाह शुरू किया, फिर सफ़र शुरू कर दिया, तो सफ़र की मुद्दत, यानी तीन दिन मसाह कर सकता है। आप बहरीन में थे और आपने वजू किया, जूराब पहन ली नमाज़ पढ़ने के लिए। अगली जमात का वक्त आया, मसाह कर लिया आपने और फिर आप सफ़र पर चले गए। अब आप कितनी देर मसाह करेंगे? तीन दिन, तीन रातों तक। समझे ना? आप क्योंकि आपके सफ़र शुरू हो चुके, आप मुसाफ़िर हो चुके हैं। सवाल आख़िर में रखिए इंशाअल्लाह। और अगर आप मुसाफ़िर थे, सफ़र में थे और आपने मसाह शुरू किया और घर पहुँच गए, तो घर पहुँच कर क्या करेंगे? अब आप मुकीम हो गए हो, तो अब आप मुकीम के हिसाब से ही उस पर मसाह करोगे, एक दिन और एक रात। माना क्या हुआ? कि अगर आप मुकीम थे और सफ़र शुरू कर दिया, तो आपके लिए सफ़र के मसाह की जा, तीन दिन, तीन रातों तक। और अगर सफ़र में थे और घर पहुँच गए, मुकीम हो गए, तो फिर आप मुकीम के लिहाज़ से उस पर मसाह करेंगे, एक दिन और एक रात। समझे ना? अच्छा, टाइम हमारे पास थोड़ा। इब्राहिम भाई, इशारा कर दिया। हम चाहते हैं कि इस मसले को मुकम्मल कर लें। अच्छा, उसके बाद अगला मसला भाई ने भी पूछा है। अगर वजू की हालत में आपने जूराब या मौजे उतार दिए, वजू की हालत में, तो क्या वजू टूट जाएगा? कहते हैं टूट जाएगा। लेकिन नहीं टूटता। सही है कि वजू नहीं टूटता। अगर वजू की हालत में, वजू की हालत में है आप जनाब, मौजे उतार दिए, किसी वजह से। आपका वजू बाकी है। किस तरह बाकी है? आप कहेंगे जिस पर मसाह किया, वह तो उतार दिया। आपने वजू किया, सर पर मसाह किया और सर, सर के बाल मुंडवा दिए। वजू टूटेगा? जिन बालों पर मसाह, वह तो उतर गया। भाई, क्या ख़्याल है? तो जिस तरह, जिस तरह सर के बाल मुंडवाने से आपका वजू ख़त्म होगा, ऐसे ही जूराब, मौजे उतारने से आपका वजू नहीं टूटेगा, ख़त्म नहीं होगा। लेकिन यह है, आप दोबारा उन पर मसाह नहीं करेंगे। अब आपको लाज़मी यह को दोबारा फिर पहन लें, फिर मसाह शुरू कर दें। नहीं, फिर आप, आपको लाज़मी पाव धोना होंगे, फिर पहनने के, फिर आपके लिए दोबारा टाइम शुरू होगा। बात समझ आ गई? अगर आप बा-वजू हालत में हैं, आपने जनाब मौजे उतार दिए, तो आपको वजू तो बाकी है, नमाज़ पढ़ सकते हैं, लेकिन उन पर दोबारा मसाह करने के लिए आपको पाव धोना पड़ेंगे या पूरा वजू करना पड़ेगा। फिर आप उस पर मसाह करेंगे। ऐसे नहीं करेंगे। अच्छा, इसी तरह यह भी कि जूराबों या मौजों पर मसाह जो है, उस वक्त है जब आप वजू कर रहे हो, वजू की हालत में। लेकिन अगर गुस्ल की हालत है, तो गुस्ल में पूरे जिस्म को धोना होता है। उसमें जनाब मौजे उतारना होंगे। उस पर मसाह नहीं होगा। समझे ना? इसलिए आपको हदीस हमने पढ़ी है पहले कि फ़रमाते हैं कि जब हम, यानी क़दा हाज़त से आते, सोकर उठते, उस वक्त मसाह करते जूराब पर। लेकिन अगर जनाबात होती या उससे ज़रूरत होती, तो फिर हमें मौजे उतारना होते, फिर उस पर मसाह नहीं होता। और इसी तरह आगे दो-तीन मसले रह गए हैं। सर पर पगड़ी बाँधी हो, तो उस पर भी मसाह किया जा सकता है। पगड़ी जानते हैं ना, को है? पगड़ी वाला यहाँ पर कोई भी नहीं है। हां, आपकी है। लेकिन इस पर मसाह होगा या नहीं होगा? पगड़ी आमतौर पर टाइट करके बाँधी होती है। समझे ना? तो पगड़ी आमतौर पर टाइट करके बाँधी जाती है और उसको बाँधने, उतारने में थोड़ा इंसान को मुश्किल होती है। तो पगड़ी पर मसाह करना सुन्नत है, नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से साबित है। जिस तरह कि सही बुख़ारी की हदीस है कि साहब फ़रमाता है कि मैं आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम को देखा कि आप पगड़ी पर मसाह किया करते थे। तो पगड़ी पर मसाह किया जा सकता है। अगर किसी ख़ातून ने दुपट्टा टाइट करके बाँधा हुआ है, दुपट्टा सर पे लिया हुआ है, लेकिन टाइट करके बाँधा हुआ है। अभी आप दिखाइए। आगे चलिए। हां, हां जी। यह पगड़ी आ गई। देख रहे हैं। आगे चलिए। हां जी। यह देखिए। तो दुपट्टा यहाँ पर टाइट करके बाँधा हुआ है। यह नहीं कि सिर्फ़ ऊपर, सर के ऊपर ऐसे रखा हुआ है। ऐसे अगर रखा हुआ, तो उस पर मसाह नहीं होगा। लेकिन अगर दुपट्टा टाइट करके बाँधा हुआ है कि जिसको उतारना, खोलना फिर दोबारा बाँधना मुश्किल है, तो फिर उस पर भी मसाह किया जा सकता है। जिस पर, जिस पगड़ी पर होता है। और देखिए, सारी हमारे दीन की आसानी है। ख़ासतौर पर सर्दी के वक्त में। अभी कल परसों मेरे पास यह मसला आया कि इस तरह के सर्दी का मौसम है, तो फिर क्या करें? क्या सर का मसाह करना लाज़मी है? सर को खोलना इस तर की चीज़? तो हाँ, ठीक है। सर्दी का मौसम है। सर को आपने टाइट करके बाँधा हुआ दुपट्टा, तो उस पर मसाह कर सकते हैं। अच्छा, जख्म या टूटी हड्डी पर बाँधी जाने वाली पट्टी, प्लास्टर वग़ैरह पर मसाह करना जायज़ है? आगे चलिए। आपको कोई हड्डी टूट जाती है, फ़्रैक्चर हो जाता है, उस पर प्लास्टर लगा है या बैंडेज लगा है। समझे ना? तो उस प्लास्टर के ऊपर, बैंडेज के ऊपर भी मसाह करना जायज़ है, कर सकते हैं। चाहे प्लास्टर बगैर वजू के पहना हो? हां। प्लास्टर लगाते हुए वजू किया है किसी ने? हां। इसके लिए वजू की शर्त नहीं है। प्लास्टर के ऊपर मसाह के लिए, बैंडेज के ऊपर मसाह के लिए वह शर्तें नहीं हैं जो जूराब, मौजों पर थीं। जरा गौर कीजिए ताकि किसी को कंफ़्यूज़ ना हो कि लाज़मी यहाँ पर भी वजू करके पहना हो और तीन दिन के, एक दिन के अंदर करेंगे। फिर ऐसा नहीं है। जब तक आपका प्लास्टर लगा हुआ है, महीनों तक लगा है, उस, उस पर मसाह करते रहिए। समझे ना? बैंडेज है आपके जिस्म पर कहीं पर भी, तो जहाँ पर बैंडेज लगा है, उसके ऊपर मसाह कर सकते हैं। वजू की हालत हो या गुस्ल की हालत हो। वजू में हो या गुस्ल में हो, कोई भी आपकी कैफ़ियत है, तो उस बैंडेज के ऊपर, प्लास्टर के ऊपर मसाह कर सकते हैं जब तक वह लगा है। लेकिन प्लास्टर इतना होना चाहिए, इतनी ज़रूरत है। तो हड्डी अगर यहाँ से टूटी है, तो सिर्फ़ इतना हो। वह आमतौर पर ज़्यादा होता है और डॉक्टर को पता है कि आपको कितनी ज़रूरत है। बात होता है कि ज़रूरत से ज़्यादा लगा दिया जाता है। कोशिश यह हो कि जितनी ज़रूरत, उसके मुताबिक़ प्लास्टर लगा हो, बैंडेज हो, उसके ऊपर मसाह कर सकते हैं। ना तो इसके लिए बा-वजू होने की शर्त है और ना इसके लिए कोई टाइम लिमिट है। समझे? जब तक लगा है, उस वक्त तक आप उस पर मसाह कर सकते हैं। लेकिन अगर किसी के मसलन हाथ या पाव अबद होता है, किसी की टांग कट गई, उसको आर्टिफ़िशियल टांग लगाई गई, तो अब मौजों पर, जूराब पर मसाह करते, पाव धोते, उसको धोना है? क्या ख़्याल है? उस पर मसाह करेंगे? वह आपकी टांग है ही नहीं। समझे ना? वह आपकी टांग नहीं है, वह प्लास्टिक की है या जो भी है। समझे ना? या फ़ाइबर की है। इसलिए आप अपनी टांगों पर, अपने जिस्म पर मसाह करेंगे और चीज़ों पर नहीं करेंगे। समझे ना? बात मसाह करना है, धोने का तो। अगर आर्टिफ़िशियल कोई चीज़ लगी, किसी का हाथ टूटा, उस पर फ़ि हाथ लगा दिया गया या टांग, पाव लगा दिया गया, तो उसको ना धोने की ज़रूरत है और ना उस पर मसाह करने की ज़रूरत है। बारकल्लाहू फ़ीकुम। जज़ाकल्लाहु ख़ैर। हां जी, क्या चीज़?