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एक दफा का जिक्र है कि मुल्क बसंत में एक बादशाह रहता था। यह बादशाह अपने अदलो इंसाफ की वजह से दूर-दूर तक मशहूर था। उसके मुल्क के लोग उससे बहुत खुश थे और छोटे बड़े सब उसकी तारीफ करते थे।
इस बादशाह का एक ही बेटा था जिसका नाम शहजादा अहमद था। शहजादा अहमद में तो अपने बाप की तमाम खूबियां मौजूद थी। मगर उसमें एक ऐसी खामी थी जिससे सबको बहुत तकलीफें होती थी। खामी यह थी कि वह बहुत धोखाबाज था और किसी को भी धोखा देने से नहीं घबराता था।
बादशाह ने उसे कई बार समझाया कि ऐसा ना करो मगर वह नहीं मानता था। कई बार लोगों ने बादशाह के पास उसकी शिकायतें भी की मगर बादशाह अपने बेटे की मोहब्बत में मजबूर होकर शिकायत लाने वालों को उनके नुकसान से ज्यादा ही नवाजिश देकर वापस कर देता। और जब वह शहजादा अहमद को डांटता तो वह वक्त भर खामोश रहता। मगर बाद में फिर लोगों को धोखा देना शुरू कर देता।
बादशाह ने अपने वजीरों और जईद दरबारियों से भी इस मामले में मशवरा लिया। मगर कोई मशवरा भी शहजादा को बाज ना रख सका।
आज भी बादशाह दरबार में बैठा मुल्क के इंतजामात के बारे में वजीरों को हिदायतें दे रहा था। शहजादा अहमद भी उसके साथ ही एक कुर्सी पर खामोश बैठा था कि एक बूढ़ी औरत रोती पीटती दरबार में हाजिर हुई और बादशाह से इंसाफ की फरियाद करने लगी।
"बादशाह सलामत मेरे साथ जुल्म हुआ है। इंसाफ करें।" बूढ़ी औरत ने रोते हुए कहा।
"किसने तुम्हारे साथ जुल्म किया है बूढ़ी मां? हमें बताओ। हम जरूर इंसाफ करेंगे।" बादशाह ने बड़े संजीदा लहजे में कहा।
"हुजूर, शहजादा अहमद ने मेरी बकरी छीन ली है। यह बकरी मेरे घर पैदा हुई थी और मुझे उससे बहुत मोहब्बत थी। उसका दूध बेचकर मैं अपना पेट पालती थी कि शहजादा ने मुझे धोखे से वह बकरी ले ली। इंसाफ करें और मुझे बकरी वापस दिला दें।" बूढ़ी औरत ने रोते हुए कहा।
बादशाह ने गुस्स से भरी नजर से शहजादे की तरफ देखा जो सर झुकाए बैठा था। मगर उसके होठों पर हल्की सी मुस्कुराहट दौड़ रही थी।
"तफसील से बताओ बूढ़ी मां शहजादा ने किस तरह तुमसे बकरी हासिल की? भला शहजादा को एक बकरी को धोखे से हासिल करने की क्या जरूरत थी? उसके एक इशारे पर 100 बकरियां पेश की जा सकती है।" बादशाह ने उसी लहजे में कहा।
"हुजूर, मैं यहां से दूर एक जंगल के किनारे पर अपनी झोपड़ी में रहती हूं। चंद रोज हुए शहजादा अपने साथियों समेत वहां से गुजरा। मेरी बकरी झोपड़ी से बाहर बांधी हुई थी। शहजादा वहां रुक गया। उसने मुझसे कहा कि यह बकरी मुझे दे दो और जितनी रकम चाहो ले लो। मैंने इंकार किया तो शहजादा को बहुत गुस्सा आया। उसने अपने साथियों से कहा कि वो मेरी बकरी खोले। उसके साथियों ने मेरी बकरी खोली और शहजादा ने रुपयों की एक थैली मेरे सामने फेंकते हुए कहा, ले बूढ़ी मां। मैंने इंकार करती रही। मगर शहजादा के साथियों ने मेरी एक ना सुनी और बकरी लेकर जंगल में घोड़े दौड़ाते हुए गायब हो गए।" बूढ़ी औरत ने रोते-रोते तमाम तफसील बताई।
"तो बूढ़ी मां तुम्हें तो खुश होना चाहिए कि शहजादा ने तुम्हें एक बकरी के बदले में 10 बकरियों की कीमत अदा कर दी। कोई अपनी जगह जुर्म है कि किसी से जबरदस्ती कोई चीज हासिल की जाए। मगर यह तो धोखा नहीं है।" बादशाह ने नरम लहजे में बूढ़ी औरत को समझाते हुए कहा।
"हुजूर, मेरी पूरी बात तो सुने। शहजादा और उसके साथियों के जाने के बाद जब मैंने वो थैली खोली, तो उसमें अशरफियों की बजाय तीन के टुकड़े भरे हुए थे।" बूढ़ी औरत ने मजीद बताया।
"क्या तुम सच कह रही हो?" बादशाह ने चौंक कर कहा।
"यह देखें वो थैली। इसमें वह तीन के टुकड़े अभी तक मौजूद हैं।" बूढ़ी औरत ने अपने लिबास के अंदर से थैली निकाल कर दिखाते हुए कहा।
बादशाह ने एक दरबान को थैली लाने का इशारा किया और दरबान ने थैली बूढ़ी औरत के हाथ से लेकर बादशाह के सामने पेश कर दी। बादशाह ने बड़े गौर से वह थैली देखी। थैले पर वाकई शहजादे का महर मौजूद था।
जब बादशाह ने थैले का मुंह खोल कर देखा तो पूरी थैली तीन के गोल टुकड़ों से भरी हुई थी।
"शहजादा उठो और मेरे सामने खड़े हो जाओ और मुझे जवाब दो कि क्या बूढ़ी औरत जो कुछ कह रही है सच है।" बादशाह ने बड़े गुस्से में शहजादे से मुखातिब होकर कहा।
शहजादे बड़े मुंह से अपनी कुर्सी से उठा और फिर बूढ़ी औरत के सामने मौत भरा अंदाज में खड़ा होकर बादशाह से मुखातिब हुआ।
"हुजूर बूढ़ी औरत का आधा बयान सच है। मैं अपने साथियों के साथ जंगल में शिकार खेलने जा रहा था कि बूढ़ी औरत की झोपड़ी के बाहर बांधी हुई बकरी मुझे नजर आ गई। बकरी बहुत सेहतमंद थी। मैंने सोचा कि शिकार के लिए चारे के तौर पर यह बकरी ठीक रहेगी। क्योंकि मैंने बूढ़ी औरत से बकरी का सौदा किया तो बूढ़ी औरत पहले तो बकरी देने पर राजी ना हुई। मगर जब मैंने अशरफियों से भरी हुई थैलियों का लालच दिया तो बूढ़ी औरत राजी हो गई। क्योंकि मैंने अशरफियों से भरी हुई थैली देकर बकरी हासिल कर ली। यह है सच्चाई।" शहजादे ने मौत भरे लहजे में कहा।
"नहीं हजूर शहजादा बिल्कुल झूठ बोल रहा है। जो मैंने कहा है वह दुरुस्त है।" बूढ़ी औरत ने फौरन शहजादे की बात का जवाब देते हुए कहा।
"तो क्या जब तुमने यह थी बूढ़ी औरत को दी थी वो वाकई अशरफियों से भरे हुए थे?" बादशाह ने शहजादे से पूछा।
"थैले में तीन के टुकड़े भरे हुए थे।" शहजादे ने जवाब दिया।
बादशाह हैरान रह गया कि किसकी बात मानू और किसकी ना मानूं। क्योंकि दोनों ही सूरतें मुमकिन हो सकती थी। शहजादा भी झूठ बोल सकता था और बूढ़ी औरत भी। शहजादे के साथियों से पूछने का भी कोई फायदा ना था क्योंकि जाहिर है वे शहजादे की हिमायत करेंगे। वैसे बादशाह को ज्यादा उम्मीद यही थी कि शहजादा ने धोखा दिया होगा। मगर उसका कोई सबूत नजर ना आ रहा था।
आखिर सोचसच कर उसने बूढ़ी औरत से मुखातिब होकर कहा, "बूढ़ी मां, मुझे मालूम नहीं कि तुम सच कह रही हो या शहजादा झूठ बोल रहा है। तुम फरियाद लेकर हमारे पास आई हो। इसलिए हम यह कर सकते हैं कि उसके बदले में तुम्हें अशरफियों की दो थैलियां दे दें ताकि तुम राजी होकर चली जाओ। फिर हम तहकीकात करेंगे और अगर शहजादा झूठ बोल रहा है तो हम उसे सजा देंगे।"
"हुजूर यह आपकी मेहरबानी है कि आप मुझे बूढ़ी औरत कह रहे हैं। मगर हुजूर मैं अपनी बकरी वापस लेना चाहती हूं। मुझे अशरफियों की जरूरत नहीं। मुझे बकरी से बच्चों की तरह प्यार था। कोई मां अपने बच्चे को फरोख्त नहीं करती। चाहे उसके बदले में सात खजानों की दौलत क्यों ना दे दी जाए?" बूढ़ी औरत ने जवाब दिया।
"बकरी कहां है?" बादशाह ने शहजादे से मुखातिब होकर पूछा।
"हुजूर वो बकरी तो शेर की शिकार में काम आ गई। शेरों ने खा लिया।" शहजादे ने मौत भरे लहजे में कहा।
"बूढ़ी मां सुना तुमने तुम्हारी बकरी तो अब इस दुनिया में मौजूद नहीं। तुम अशरफियां ले लो और उनसे और बकरियां खरीद लो।" बादशाह ने बूढ़ी औरत से मुखातिब होकर कहा।
"नहीं हुजूर अगर आप इंसाफ कर सकते हैं तो इंसाफ करिए और मुझे मेरी बकरी वापस दें। वरना मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं अल्लाह ताला के सामने फरियाद करूंगी। वह जरूर इंसाफ करेगा।"
बादशाह को बूढ़ी औरत की बात सुनकर बहुत रहम आया। मगर अब वह क्या कर सकता था? बकरी तो हलाक हो चुकी थी। अब वह बकरी कहां से लाता? इधर बूढ़ी औरत बे जा रही थी कि वो वही बकरी लेगी।
अब बादशाह सोच रहा था कि उसका वजीर आजम अपनी जगह से उठा और फिर बादशाह को सलाम करके बूढ़ी औरत से मुखातिब होकर कहने लगा, "बूढ़ी मां, तुम सोचो कि तुम्हारी बकरी तो मर चुकी है। अब वह जिंदा नहीं हो सकती। तुम इसके बदले में जो चाहो तुम्हें मिल सकता है। तुम बादशाह के सामने खड़ी हो जिसके इंसाफ की दूर-दूर तक धूम है। इसलिए मौका है तो मांग लो। दो थैलियांओं की बजाय तीन थैलियां ले लो चार ले लो।"
"हां हां तुम जो मांगो तुम्हें मिल सकता है।" बादशाह ने फिर वजीर एआम की बात की ताईद करते हुए कहा।
"हुजूर अली पहले तो यह फैसला कीजिए कि मेरी बात दुरुस्त है या शहजादे की ताकि असल मुजरिम का पता चल सके।" बूढ़ी औरत अपनी बात पर अड़ी।
बादशाह कुछ लम्हे कुछ सोचता रहा। फिर उसने थैले में से तीन का एक टुकड़ा निकाला और उसे गौर से देखने लगा। टुकड़ा बहुत साफ सुथरा था और उसे बड़ी नफासत से अशरफी के साइज का काटा गया था। उसने दूसरा टुकड़ा निकाल कर देखा। वह भी वैसा ही था।
"शाही सिक्का खाने के इंचार्ज को फौरन हाजिर किया जाए।" बादशाह ने कुछ सोचते हुए वजीर एआम को हुक्म दिया और दरबार को इशारे से जाने का कहा।
शाही सिक्का खाने का इंचार्ज हाजिर हुआ। उसे टुकड़ा पेश किया गया और सारी बात बताई गई। शाही सिक्का खाने के इंचार्ज ने बड़े अदब से वह टुकड़ा लिया और उसे बगौर देखा और फिर बादशाह सलामत को वापस करते हुए कहा, "जी हां हुजूर यह टुकड़ा शाही सिक्का खाने में काटा गया है और यह और इसके साथ के बेहिसब टुकड़े शहजादे अहमद के हुक्म से तैयार किए गए थे।"
इस बात को सुनकर बादशाह सहित तमाम दरबारी चौंक पड़े क्योंकि इंचार्ज के जवाब से शहजादे का जुर्म साबित हो गया था।
"शहजादा अब तुम क्या कहते हो?" बादशाह मुखातिब करके कहा।
शहजादा अब भला क्या जवाब देता? सर झुकाए खड़ा रहा।
"ठीक है बूढ़ी मां तुम हक पर थी। हम शहजादे को उसके धोखे की अब्रतनाक सजा देंगे। पहले तुम अपना हक मांग लो।" बादशाह ने बूढ़ी औरत से मुखातिब होकर कहा।
"हुजूर, शहजादा मेरा मुजरिम है। इस मुल्क की सजा के फैसले का इख्तियार भी मुझे मिलना चाहिए।" बूढ़ी औरत ने बड़े मुजब्बर मजबूत अंदाज में कहा।
"ठीक है तुम जो सजा दो शहजादे को वही सजा दी जाएगी वादा है।" उसने बात की तायद करते हुए कहा क्योंकि वह खुद ही शहजादे की हरकतों से तंग आ गया था और चाहता था कि अब शहजादे को सजा मिले ताकि आने वाले वक्त में वह इन हरकतों से बाज रहे।
"तो हुजूर शहजादा को एक साल के लिए बतौर गुलाम मेरे हवाले कर दे यह एक साल तक मेरा गुलाम बनकर रहेगा इसके इसके अलावा और मैं कुछ नहीं चाहती।" बूढ़ी औरत ने बड़े संजीदा लहजे में कहा।
बूढ़ी औरत की यह गुजारिश सुनकर तमाम दरबारी हैरत से दंग रह गए। शहजादा भी चौंक पड़ा और बादशाह भी क्योंकि किसी के तो शुभ में भी ना था कि बूढ़ी औरत ऐसा मतलूब मांग करेगी कि शहजादा उसका गुलाम बनकर रहे। इस बात का वह तसवुर भी ना कर सकते थे।
बादशाह परेशान हो गया। मगर अब वह क्या कर सकता था? बूढ़ी औरत को जबान दे चुका था और अगर अब वह उसका मतलब ना मानता तो उसके इंसाफ पर हर्ज पड़ता। उसने संजीदा लहजे में कहा, "ठीक है हम शहजादे को एक साल के लिए तुम्हारी गुलामी में देते हैं। और शहजादा तुम समझ लो तुम इस बूढ़ी औरत के गुलाम हो। अगर तुमने उसकी बात ना मानी या उसकी गुलामी से फरार होने की कोशिश की तो तुम्हें मुल्क के कानून के मुताबिक मौत की सजा दी जाएगी। अब तुम बूढ़ी औरत के साथ जाओ और अपनी धोखाबाजी की सजा भुगत।"
बादशाह के इस फैसले पर दरबारियों ने दबेदबे लहजे में इत्तहाज किया। मगर बादशाह ने सबको खामोश कर दिया और अपने फैसले पर कायम रहा। उसने हुक्म दिया कि शहजादे के हाथ में गुलामी की निशानी लोहे का कंडा डाल दिया जाए। क्योंकि कुछ ही लम्हों में बादशाह के हुक्म पर अमल कर दिया गया और शहजादे के हाथ में गुलामी का कंडा डाल दिया गया।
"आओ मेरे साथ।" बूढ़ी औरत ने शहजादे से मुखातिब होकर उनती सख्त लहजे में कहा और फिर बादशाह को सलाम करके वह मुड़कर बाहर जाने लगी। शहजादा भी सर झुकाए उसके पीछे-पीछे जाने लगा क्योंकि अब उसके अलावा और कोई सूरत ना थी। वाकई बूढ़ी औरत ने उसे बड़ी अब्रतनाक सजा दी थी। और आने वाले एक साल तक वह उसका क्या हाल करेगी यही सोचता और दिल ही दिल में पछताता हुआ उसके पीछे-पीछे चलता गया।
बूढ़ी औरत शहजादे को दरबार से पैदल चलाती हुई अपनी झोपड़ी तक ले आई। शहजादे के पांव थक गए। उसने एक बार दबेदबे लहजे में बूढ़ी औरत से इत्तहाज भी किया। मगर बूढ़ी औरत ने उसे डांट कर चुप कर दिया। शहजादा अब आगे क्या करता? खामोश रहा। आखिर खुदा की खैर बूढ़ी औरत की झोपड़ी आई।
बूढ़ी औरत झोपड़ी के सामने आकर बैठ गई। और उससे पहले कि शहजादा भी आराम करने के लिए बैठे। बूढ़ी औरत ने उसे डांट कर कहा, "जाओ और झोपड़ी से घड़ा उठाकर सामने पहाड़ी के ऊपर मौजूद चश्मे से पानी भर कर लाओ। कुछ देर मुझे आराम करने दो।"
"खबरदार अगर मेरे सामने जबान हिलाने की हिम्मत की जाओ और मेरे हुक्म की तबीयत करो। वरना मैं बादशाह से शिकायत कर दूंगी। और नतीजा तुम जानते हो। तुम्हें हर हाल में मरना पड़ेगा। अब तुम्हारी जान बचने की सिर्फ एक ही सूरत है कि खामोशी से मेरे हुक्म की तबीयत करते रहो।" बूढ़ी औरत ने बड़े गुस्से भरे लहजे में उसे डांटते हुए कहा और शहजादे के अंदर चुप्पी छा गई।
उसने वहां से घड़ा उठाया और फिर दूर एक पहाड़ी के ऊपर मौजूद चश्मे से पानी लेने चल पड़ा। थकावट के मारे उसका बुरा हाल था और वह घड़ा उठाए लड़खड़ाता हुआ पहाड़ी पर चढ़ता चला गया। खामी की शरारत के हाथों इस बार वह बुरी तरह फंस गया था। उसका ख्याल तो यही था कि बूढ़ी औरत दरबार में शिकायत करेगी और बादशाह आज भी उसे कुछ इनाम देकर वापस भेज देगा। मगर यह बूढ़ी औरत तो कोई आफत की पेटी निकली थी। इसलिए तो ऐसा चक्कर चलाया कि उसे फंसा कर रख दिया।
अब ना वह जान बचाकर भाग सकता था और ना ही बूढ़ी औरत की बात मानने से इंकार कर सकता था। क्योंकि दोनों ही सूरतों में मुल्की कानून के तहत सजा मौत थी। और उसे यकीन था कि बादशाह सलामत अपने अदल साहिब की लाड रखने के लिए उसे जरूर फौरन सजा सुना देगा। अब तो सिर्फ यही एक सूरत बाकी रह गई थी कि वह बूढ़ी औरत की मदद से किसी तरह उसे राजी करे और अपने गले से यह गुलामी का टोका उतार फेंके।
यही सोचता हुआ वह पहाड़ी के चश्मे तक पहुंच गया। उसने पहले तो चश्मे के पानी से मुंह हाथ धोया और फिर घड़ा उठाकर चश्मे से पानी भरने लगा था कि अचानक चौंक पड़ा क्योंकि चश्मे के पानी में खूबसूरत लड़की की तस्वीर नजर आने लगी। यह लड़की खूबसूरत तख्त पर बैठी हुई थी। मगर उसकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे।
शहजादा लड़की को देखकर हैरत से बुट बन गया। क्योंकि इतनी खूबसूरत लड़की उसने जिंदगी भर ना देखी थी। लड़की ने रोते-रोते अचानक मुंह उठाया और शहजादे को ऐसा महसूस हुआ जैसे लड़की उसे देख रही हो। दूसरे लम्हे लड़की के चेहरे पर खुशियां के आसार भर आए। उसने कुछ कहने के लिए मुंह खोला ही था कि अचानक उसकी तस्वीर गायब हो गई और अब वहां कुछ भी ना था।
शहजादा अहमद तस्वीर गायब होते ही झूम पड़ा। उसने आहिस्ता दारूदार देखा जैसे उसका ख्याल हो कि कोई उसके करीब मौजूद है। मगर वहां किसी को मौजूद ना पाकर उसे बहुत हैरानी हुई। वह सोचने लगा कि आखिर यह सब कैसे हुआ? वह लड़की कौन है जिसकी तस्वीर चश्मे के पानी में नजर आई थी। वह लड़की कहां है और क्यों रो रही है? मगर कोई बात उसकी समझ में ना आई।
काफी देर तक वह चश्मे के किनारे इंतजार में बैठा रहा कि शायद लड़की की तस्वीर दोबारा नजर आ जाए। मगर तस्वीर दोबारा नजर ना आई। आखिर जब काफी देर हो गई तो वह मायूस होकर उठा। उसने आराम से घड़ा भरा और उसे उठाकर वापस झोपड़ी की तरफ चल पड़ा। उसे वक की सारी थकावट दूर हो चुकी थी क्योंकि थकावट खत्म हो गई थी। अब तो उसका ज़हन लगातार लड़की के मौजूदगी पर घूम रहा था।
जब वह झोपड़ी के करीब पहुंचा तो बूढ़ी औरत उसे देखकर गुस्से से लाल पीला हो गई। "इतनी देर क्यों लगा दी? इस तरह काम करोगे तो शहजादा की झल्ली नहीं जलेगी। तुम गुलाम हो इसलिए गुलाम की तरह काम करो।" बूढ़ी औरत ने अति गुस्से भरे लहजे में उसे डांटते हुए कहा।
"मैं जल्दी आता बूढ़ी मां। मगर वहां चश्मे के पानी में मुझे एक अजीब बात नजर आई है। उसमें मुझे एक लड़की की तस्वीर नजर आई है जो एक खूबसूरत तहखत पर बैठी रो रही थी।" शहजादा ने नरम लहजे में जवाब दिया और फिर दूसरे लम्हे शहजादा हैरान रह गया। उसकी बात सुनते ही बूढ़ी औरत का चेहरा एकदम बदल गया। वह खुद भी रो पड़ी और तेजी से उठकर उसने शहजादे के पैरों पर हाथ रखा।
शहजादा एक झटके से पीछे हटा और उसने बड़ी तेजी से बूढ़ी औरत को उठाकर बिठाते हुए कहा, "बूढ़ी मां, क्या बात है? तुम रो क्यों रही हो? और फिर मेरे पांव को हाथ लगाकर मुझे गुनाहगार क्यों कर रही हो? मैं तो एक तुम्हारे बेटों के बराबर हूं। दूसरा तुम्हारा गुलाम हूं।" शहजादा ने हैरत भरे लहजे में कहा।
"नहीं शहजादा मुझे माफ कर दो भला यह कैसे मुमकिन है कि मैं तुम्हें अपना गुलाम बना सकूं यह तो बादशाह का इंसाफ था जिसकी वजह से मैं अपनी कोशिश में कामयाब हो गई।" बूढ़ी औरत ने रोते हुए कहा।
"आखिर कुछ तो पता चले क्या बात है मुझे तफसील से बताओ और यकीन रखो अगर मुझसे कुछ हो सका तो मैं जरूर तुम्हारा काम करूंगा।" शहजादा ने उसे तसल्ली देते हुए कहा।
"शहजादा दरअसल वह लड़की जिसकी तस्वीर तुमने चश्मे के पानी में देखी है। मेरी इकलौती बेटी नाजनीन है। कोई वक्त था कि हम बहुत अमीर खानदान थे। मेरा शौहर और उस लड़की का बाप मशहूर तजरी तजीर ताजिर था। एक दफा वह काफिले के साथ सफर कर रहा था कि डाकुओं ने काफिला लूट लिया और मेरा शौहर डाकुओं से लड़ता हुआ शहीद हो गया। उसका तमाम माल डाकुओं ने ले लिया और इस तरह हम पैसा पैसा के मोहताज हो गए। शहर में हमारे दुश्मन हमें तंग करने लगे तो मैं अपनी लड़की को लेकर यहां जंगल के किनारे आ गई और लड़की जब जवान हुई तो उसका हुस्न देखने के काबिल था। ना जाने कैसे उसके हुस्न की खबरें दूर-दूर तक फैल गई। आज से दो-ती महीने पहले की बात है। एक दिन मैं और मेरी लड़की झोपड़ी के सामने बैठी थी कि कुछ नकाबपश घोड़ों पर सवार होकर आए और जबरदस्ती मेरी लड़की को उठाकर ले गए। मैं रोती पड़ी रही। मगर अकेली होने की वजह से कुछ ना कर सकी। मैं फरियाद लेकर बादशाह के पास भी गई। उन्होंने लड़की का पता लगाने की बहुत कोशिश की मगर उसका कुछ पता ना चल सका। आखिर रोना छोड़ दिया। जिस दिन तुम मेरी बकरी ले गए और मुझे तीन के टुकड़ों से भरी हुई थैली दे गए तो मुझे अपनी हालत पर बहुत रोना आया और मैं उस वक्त को याद करने लगी जब मेरा शौहर जिंदा था और हमको अदनी मालसूमों को अशरफियों की थैलियां देता था। रोते-रोते मुझे नींद आ गई तो ख्वाब में मैंने एक बुजुर्ग को देखा जो मेरे सर पर हाथ रखकर मुझे तसल्ली दे रही थी। उन्होंने बताया कि जान लेने वाला एक जमोर और बदसूरत आदमी है और वह शादी करना चाहता है मगर तुम्हारी लड़की उससे शादी पर तैयार नहीं क्योंकि बादशाह ने उसे एक साल की मोहल्लत दे रखी है। अगर एक साल तक वह राजी ना हुई तो वह उससे जबरदस्ती शादी कर लेगा। एक साल की मोहलत आज भी सिर्फ इसलिए दी है कि उसके शाही नजूमों से बताया है कि अगर एक साल से पहले उसने नाजनी से शादी की तो वह खुद भी हलाक हो जाएगा और उसका मुल्क भी तबाह हो जाएगा। हां, एक साल बाद कोई हरज नहीं। जब मैंने ख्वाब में रोते हुए अपनी लड़की की वापसी की फरियाद की तो उन्होंने मुझे बताया कि एक ऐसा शख्स उस लड़की को रिहा कर सकता है जो शहजादा होने के बावजूद तुम्हारा गुलाम हो। और गुलाम होने के बावजूद अपनी मर्जी से लड़की की रिहाई के लिए कोशिश करें। जब मैंने जवाब में यह कहा कि यह बात तो नामुमकिन है। अव्वल कोई शहजादा मेरा गुलाम कैसे हो सकता है और अगर हो भी जाए तो वह अपनी मर्जी से मेरी लड़की की रिहाई के लिए क्यों जाएगा? वह तो मेरी लड़की को जानता भी ना होगा। तो बुजुर्ग ने मुझे बताया कि अगर तुम कोशिश करो तो ऐसा नामुमकिन नहीं है। बाकी रही बात कि उसे ज्यादा दिन लड़की को नहीं देखा होगा तो उन्होंने वादा किया कि वह लड़की को दिखा देंगे। यहां मेरी आंख खुल गई और मुझे तुम्हारा ख्याल आया क्योंकि एक तो तुम में हर वह खूबियां मौजूद है जो एक बहादुर आदमी में होनी चाहिए। सिवाय एक खामी यानी धोखेबाजी के। क्योंकि मैंने तुम्हारे मुतल्लिक सोचना शुरू कर दिया और सोचते-सचते यही तरीका मेरी समझ में आया कि उसे बकरी और थैली की वजह से मैं तुम्हें अपना गुलाम बना लूं। इस तरह बुजुर्ग की शर्त पूरी हो जाएगी। क्योंकि मैं अपने मकसूद में कामयाब हो गई और बुजुर्ग ने भी अपना वादा पूरा कर दिया कि तुम्हें चश्मे में मेरी लड़की की तस्वीर नजर आ गई। मैं रोई इसलिए लगी थी कि तुमने मुझे बताया कि"
मेरी लड़की तस्वीर में बैठी रो रही थी। चैलेंजेस उसके दुख का ख्याल करके मुझे रोना आया।
बूढ़ी औरत ने शहजादे को तफसील बताते हुए कहा, "बूढ़ी मां, तुम कुछ बेफिक्र रहो। मैं तुम्हारी बेटी को रिहा दिलाने की पूरी कोशिश करूंगा। चाहे उसके लिए मुझे अपनी जान क्यों ना देनी पड़े। वैसे सच्ची बात तो यह है कि अगर मैं तुम्हारी लड़की को देख लेता तो शायद कभी हां ना कहता। मगर अब तो मैंने पक्का फैसला कर लिया है। सिर्फ मेरी एक शर्त है।"
शहजादे ने तकदीस की। "मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है। मुझे मेरी बेटी वापस चाहिए।"
बूढ़ी औरत ने फौरन आंसू भरते हुए कहा, "मेरी शर्त सिर्फ इतनी है कि रिहाई के बाद अगर तुम्हारी बेटी भी राजी हो, तो तुम मुझे हमेशा के लिए अपनी गुलामी में ले लेना।"
शहजादे ने सर झुकाते हुए शर्मीले लहजे में कहा, "यह मेरी खुशकिस्मती होगी शहजादे। भला मैं इस शर्त से कैसे इंकार कर सकती हूं?"
बूढ़ी औरत ने मुस्कुराते हुए कहा, "ठीक है। फिर आज से मैं तुम्हें गवाह बनाकर वादा करता हूं कि अब से किसी के साथ धोखा ना करूंगा। उसके अलावा मुझे मेरी धोखेबाजी की सजा भी मिल चुकी है।"
शहजादे ने कहा, "अगर ऐसा हो जाए तो शहजादे तुम जैसा आदमी जमीन पर ना मिलेगा। तुम बहादुर हो, खूबसूरत जवान हो, अल्लाह के हबीब हो, रहम दिल हो और गरीबों पर तरस खाने वाले हो। उनके अलावा एक शहजादे में और कौन सी खूबियां हो सकती हैं?"
बूढ़ी औरत ने खुश होते हुए कहा और फिर वापस झोपड़ी के अंदर गई और वहां से चाकू ले आई और उसने खुद अपने हाथों से शहजादे की कलाई से गुलामी का कड़ा तोड़कर उतार फेंका। "बहादुर अब तुम आजाद हो शहजादे।"
"आजाद कहां हो बूढ़ी मां? मैं पहले तो एक साल के लिए तुम्हारा गुलाम बना था और अब तो तमाम उम्र के लिए बन चुका हूं।" शहजादे ने हंसते हुए कहा।
"मेरा बेटा, मेरा शहजादा बेटा।" बूढ़ी औरत ने खुश होकर उसे गले से लगा लिया। "अम्मा, तुमने मुझे अपना बेटा बना लिया है। अब इस रिश्ते की लाज रखो और मेरे साथ शाही महल में चलो। एक तो तुम वहां जाकर अब्बा जान को खुद बताना कि तुमने अपनी मर्जी से यह कड़ा उतार फेंका है और फिर तमाम तफसील भी बता देना। फिर उनकी इजाजत लेकर मैं तुम्हारी लड़की की वापसी की माहिम पर चल दूंगा।"
"हर बूढ़ी मां गई।" शहजादे ने कहा।
बूढ़ी औरत ने झोपड़ी का दरवाजा बंद किया और फिर वह दोनों चलते हुए शहर पहुंच गई। शहजादे ने एक सिपाही से घोड़ा लिया और फिर बूढ़ी औरत को अपने पीछे बिठाकर वह शाही महल में पहुंच गया।
जब बादशाह को अपने बेटे की आमद की खबर मिली तो वह बेकरार बाहर निकल आया क्योंकि जब से शहजादा गुलाम बनकर गया था। बादशाह तन्हाई में मुसलसल रोता रहता था। उसे मालूम था कि गुलाम का क्या हाल होता है और उसका बेटा तो बड़े नाज नखरों में पलाया था। वह अपने दिल की हाथों मजबूर होकर रोता रहता। वजीरा मिल्की कानून और अदालत साहिब की वजह से खामोश रहते।
जब शहजादा और बूढ़ी औरत ने बादशाह को तमाम तफसील बताई तो बादशाह बहुत खुश हुआ और उसने शहजादे को इस माहिम पर जाने की इजाजत दे दी और बूढ़ी औरत को अपना मेहमान बना लिया।
"वादा ने शहजादे को माहिम पर जाने की इजाजत देते हुए कहा, "बेटे अगर मुल्क खुरासान कोई करीबी मुल्क होता तो मैं जरूर अपनी फौज को उस पर चढ़ा देता और जंग करके भी नाजनी को वापस ले आता। मगर यह मुल्क यहां से इतना दूर है कि वहां तक फौजी नहीं जा सकते। इसलिए मजबूरन तुम्हें खुद ही जाना पड़ेगा। हां, अपनी मदद के लिए तुम जितने आदमी चाहो ले जा सकते हो।"
"नहीं अब्बा जान मुझे आदमियों की जरूरत नहीं। मुझे अल्लाह के बाद अपने आप पर पूरा भरोसा है कि मैं जरूर नाजरीन को इस जमर बादशाह के पंजे से छुड़वा लूंगा। मैं अपने साथ सिर्फ अपने दोस्त वज़र ए आलम सालेह को ले जाऊंगा। वह कलमंद होने के साथ-साथ बहादुर भी है और मेरा इतना अच्छा दोस्त है कि वह जरूर मेरे साथ चलने पर राजी हो जाएगा।" शहजादे ने जवाब दिया और फिर बादशाह से इजाजत लेकर और बूढ़ी औरत से दुआएं लेकर वहां से अपने दोस्त वजीर ए आलम सालेह से मिलने चल दिया।
वज़र ए आलम सालेह ने तमाम बात सुनी तो वह फौरन शहजादे का साथ देने के लिए राजी हो गया और उसके वालिद ने भी इजाजत दे दी। क्योंकि दूसरे दिन सुबह उन्होंने माहिम पर चलने का फैसला कर लिया।
शहजादा और वजीर ए आलम सालह मंजिल पर मंजिल मारते हुए और सफर करते-करते आखिर एक महीने के बाद मुल्क खुरासान की सरहद में दाखिल हो गए। वह दोनों ताजिरों के रूप में दिखाई दिए क्योंकि मुल्क खुरासान का बादशाह बहुत जमर था। इसलिए उन्होंने देखा कि वहां के लोग बहुत घबराए हुए और डरे डरे रहते हैं। बादशाह के सिपाही हर तरफ घूमते फिरते हैं। जिसे चाहे मार देते जिसे चाहे बेकार ले लेते। कोई शख्स अगर उन्हें सलाम ना करता तो उसे मार मार कर आदमी बना देते। जुल्म ही जुल्म था। इसलिए लोग भी गरीब और बदहाल है।
वह दोनों घोड़ों पर सवार हुए बड़े सुकून से शहर की सड़कों से होते हुए आगे बढ़ते चल रहे थे कि अचानक शहजादा अहमद ने घोड़ा रोक लिया। एक बूढ़े को कोड़े मारते देख लिया। बूढ़ा बेचारा चीख रहा था। रहम की फरियादें कर रहा था। मगर दोनों सिपाही उसे मुसलसल कोड़े मारते चले जा रहे थे। बूढ़े के जिस्म से खून बह रहा था। वह तकलीफ के मारे बरी तरह तड़प रहा था। मगर इन दोनों सिपाहियों को उस पर रहम ना आ रहा था। आसपास मौजूद लोग कान दबाते खामोशी से अपनेपने काम में लगे हुए थे।
शहजादा कुछ लम्हे रुक कर देखता रहा। फिर उसने वजीर आलम सालेह से मुखातिब होकर कहा, "सालेह, यह लोग इस बूढ़े पर जुल्म कर रहे हैं। हमें इस बूढ़े की मदद करनी चाहिए।"
"नहीं शहजादा हुजूर मैं आपको इसका मशवरा ना दूंगा क्योंकि हम यहां अजनबी हैं। हमें यहां के रस्म व रिवाज का इल्म नहीं है। ऐसा ना हो कि हम किसी मुसीबत में फंस जाए और अपना असल मकसूद हासिल ना कर सकें।" वजीर एआलम सालेह ने उसे समझाते हुए कहा।
"नहीं सालेह चाहे कुछ भी हो जाए हम बूढ़े आदमी पर जुल्म बर्दाश्त नहीं कर सकते।" तक पहुंच गया। और वजीर एआलम सालेह को भी मजबूरन उसके पीछे जाना पड़ा।
शहजादा ने उनके करीब जाकर घोड़ा रोका और सख्त लहजे में सिपाहियों से मुखातिब होकर कहने लगा, "रुक जाओ, मत मारो इस बूढ़े को। यह मर जाएगा। इसे छोड़ दो।"
सिपाहियों ने जो उनकी तरफ देखा और फिर रुके गुस्से भरे लहजे में जवाब देते हुए कहा, "तुम कौन हो और तुमने हमें रोकने की जुर्रत कैसे की? तुम नहीं जानते हम बादशाह के सिपाही हैं।"
"तुम चाहे कोई भी हो, मगर मैं यह जुल्म बर्दाश्त नहीं कर सकता। अब अगर तुमने इस बूढ़े पर हाथ उठाया तो मैं तुम्हारे हाथ काट देने पर मजबूर हो जाऊंगा।" शहजादा ने जोड़कर कहा।
सिपाहियों का गुस्से के मारे बुरा हाल हो गया। वो बूढ़े को छोड़कर हथौड़ा उठाकर शहजादा की तरफ ललकारने लगे। शहजादा ने फौरन तलवार निकाल ली और फिर जैसे ही सिपाही ने कोड़ा लहराया शहजादा का हाथ बिजली की तरह तेजी से हरकत में आया और दूसरे लम्हे सिपाही की गर्दन उसके जिस्म से कट कर दूर जा गिरी। दूसरे सिपाही का सर वजीर एआम सालेह ने अपनी तलवार से काट दिया।
सिपाहियों के मरते ही तमाम बाजार में शोर मच गया। लोग दुकानें बंद करके भागने लगे। हर तरफ हलचल मच गई। शहजादा ने सबसे बेनियाज होकर बूढ़े को बाजू से पकड़ा और दूसरे लम्हे इसे खींच कर अपने आगे घोड़े पर बिठा लिया।
इधर दूसरे बाजार में मौजूद सिपाहियों को जब अपने साथियों के कत्ल की खबर मिली तो वो शोर मचाते और तलवारें लहराते इधर भाग निकले।
"चलो हम घर भाग जाए।" वजीर आजम सालेह ने शहजादा से मुखातिब होकर कहा और शहजादा ने घोड़े को ईंट लगा दी। मगर अभी वो बाजार से बाहर ना निकले थे कि 2530 सिपाहियों ने उन्हें घेर लिया और फिर वहां जबरदस्त लड़ाई छिड़ गई।
शहजादा और वजीर आजम सालेह की तलवारें बिजली की तरह तेजी से हरकत कर रही थी और सिपाही ढेर-ढेर कत्ल होते जा रहे थे। मगर जितने सिपाही मरते उससे कुछ ज्यादा वहां आ जाते। आखिर जब सिपाहियों ने देखा कि इस तरह अजनबी काबू में नहीं आ रहे तो उन्होंने दूर से खंडे फेंक कर इन दोनों को काबू किया और घोड़ों से नीचे घसीट लिया और फिर बेशुमार सिपाही उन पर लग गए क्योंकि दोनों बेबस होकर रह गए। वो जख्मी बूढ़ा लड़ाई के दौरान ही कहीं खोसा गया। सिपाहियों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया क्योंकि उन्होंने कई सिपाहियों को कत्ल कर दिया था। इसलिए सिपाहियों ने फैसला किया कि इन दोनों को बादशाह के सामने पेश किया जाए। वही उन्हें उभरतनाक सरसा देगा। क्योंकि वो उन्हें लेकर बादशाह के दरबार की तरफ चल पड़े।
बाजार के लोग उनकी किस्मत पर अफसोस कर रहे थे क्योंकि उन्हें यकीन था कि जालिम बादशाह उन्हें उभरतनाक सजा देकर मरवा डालेगा। मगर शहजादा और वजीर आजम साले दोनों मुतमई थे। क्योंकि उन्होंने मजलूम की हिमायत में जालिम पर हाथ उठाया था। वो हक पर थे और उन्हें यकीन था कि अल्लाह ताला उनकी जरूर मदद करेगा।
थोड़ी देर बाद इन दोनों को बादशाह के सामने पेश कर दिया गया। बदसूरत शख्स था। उसके चेहरे पर ही लानत बरस रही थी। वो एक आंख से गाना भी था और एक टांग से लंगड़ा भी। जब सिपाहियों ने बादशाह को वाकिजे की तफसील बताई तो बादशाह गुस्से से कांप उठा।
"कौन हो तुम? और तुमने मेरे सिपाहियों पर हाथ उठाने की जुर्रत कैसे की?" बादशाह ने गुस्से से भरे लहजे में कहा।
"हम मल्क बसनत के रहने वाले ताजिर हैं और पहली बार यहां आए हैं। हमने सिपाहियों को बूढ़े को जुल्म करते देखकर बर्दाश्त ना किया क्योंकि हमने सिपाहियों को रोका मगर सिपाहियों ने हम पर हमला कर दिया क्योंकि अपने बचाव के लिए हमें तलवारें निकालनी पड़ी और नतीजा आपके सामने है।" वजीर एआम सालेह ने बड़े नर्म लहजे में तफसील बताते हुए कहा।
"बकवास मत करो तुम नहीं जानते कि हमारी हुकूमत कितनी सख्त है। तुमने हमारे सिपाहियों को कत्ल करके इतना बड़ा और खौफनाक जुर्म किया है कि इसे किसी सूरत में भी माफ ना किया जा सकता।" बादशाह ने भड़कते हुए लहजे में कहा।
"तो हमने कब कहा है कि हमें माफ कर दे। माफी तो हम तब मांगे जब हमने कोई जुर्म किया हो। हमने सिर्फ मजलूम की मदद की है और जालिम को सजा दी है।"
फिर उसने सिपाहियों को हुकुम दिया, "इनको कैदखाने में डाल दो और इनकी सख्त निगरानी करो। कल सुबह बड़े मैदान में इनका एक-एक उज्जू और इनके जिस्म का एक-एक रेशा अलग कर दिया जाए। यह मेरा हुक्म है।" बादशाह ने गररा कर कहा और सिपाही उन दोनों को पकड़ कर दरबार से बाहर ले आए। और फिर उन्होंने उन दोनों को एक कैदखाने में डाल दिया।
कैदखाने में वह दोनों दीवार से टेक लगाए अपनीपनी सोचों में गुम बैठे थे। शहजादा के तो ख्वाबों में नाजनीन ताजीराना की शक्ल घूम रही थी। वो इस शहर में मौजूद थी और शहजादा का दिल चाह रहा था कि किसी तरह उड़कर उस तक पहुंच जाए और एक दफा उससे दो बातें कर ले। फिर चाहे कुछ भी हो जाए। उसे परवाना रहेगा मगर ऐसा वह सिर्फ सोच ही सकता था। अमली तौर पर ऐसा नामुमकिन था।
एक लम्हे के लिए उसने कैदखाने से फरार होने के मुतल्लिक सोचा। मगर दूसरे लम्हे उसने यह ख्याल जहान से निकाल दिया। क्योंकि जिस रास्ते से अंदर आए थे, उससे वाज़ था कि इस कैदखाने से फरार नामुमकिन है। यह कैदखाना पहाड़ी के अंदर था और बाहर के दरवाजे से लेकर इस खाने की खिड़की तक मुसल्लाह सिपाहियों की एक फौज मौजूद थी। जाहिर है वह कैसे निकल सकते थे।
रात जब आधी से ज्यादा गुजर गई तो शहजादा ने वजीर आजम सालेह से मुखातिब होकर कहा, "दोस्त मुझे माफ कर देना मेरी वजह से तुम भी इस मुसीबत में फंस गए हो मुझे बहुत ही शर्मिंदागी है।"
"अरे नहीं शहजादा हजरत आप ऐसा ख्याल भी दिल में ना लाएं दोस्त दोस्त के लिए कुर्बानियां देते चले आते हैं अलबत्ता मुझे तो इस बात की शर्मिंदागी है कि मैं आपको बचाने के लिए कुछ ना कर सका वरना यकीन रखें अगर किसी तरह मुझे मुझे यकीन हो जाए कि आप यहां से बचकर निकल सकते हैं और बदले में मेरी जान जाए तो मैं अपनी जान की परवाह भी ना करूंगा। मगर क्या करूं? बेबस हूं। कैदखाने से बचने की कोई सूरत ही नजर ना आ रही।" वजीर आजम सालेह ने जवाब दिया और शहजादा अहमद उसकी दोस्ती पर खुशी से खिल उठा। हकतन दोस्त ऐसे होते हैं।
अभी वह सोच ही रहा था कि अचानक एक दीवार में हल्का सा खटका हुआ जैसे किसी ने दूसरी तरफ से दीवार को हल्के से धक्का दिया हो। शहजादा दीवार की तरफ कान लगाकर सुनने लगा। जैसे ही वजीर एआम सालेह ने चौंक कर कुछ कहना चाहा मगर शहजादा ने होठों पर उंगली रखकर उसे खामोश कर दिया। वो चंद लम्हे कुछ सोचता रहा। फिर उसने किसी ख्याल के तहत उंगली से दीवार को खटखटाया। फौरन ही दूसरी तरफ से जवाब मिला और शहजादा के चेहरे पर खुशी के आसार उभर आए। उसे क्या मालूम हुआ कि दीवार बीच से खोखली है और इधर मौजूद कोई आदमी जरूर इस दीवार को किसी तरह धकेल कर उन्हें रिहा कर देगा। मगर ऐसा कौन होगा जिसे उनसे हमदर्दी हो। यह बात उसकी समझ से बाहर थी।
"हो सकता है शहजादा दूसरी तरफ एक और कोठरी हो और हमारी तरह वहां भी कोई कैदी मौजूद हो।" वजीर आजम सालेह ने शहजादा के कान में सरगोशी करते हुए कहा और उसकी बात सुनकर शहजादा का चमकता हुआ चेहरा बुझ गया। हकीकतन इस पहलू पर तो उसने सोचा ही ना था।
मगर दूसरे लम्हे दोनों हैरान रह गए जब उन्होंने दीवार के बीच के हिस्से को अलमारी के तख्ते की तरह दीवार में गुम होते देखा। चंद लम्हों बाद वहां एक दरवाजा बन चुका था। फिर उस दरवाजे में से एक शख्स ने अंदर झांका और वह दोनों एक बार फिर हैरत से चौंक पड़े क्योंकि यह वही बूढ़ा था जिसे सिपाहियों से बचाने के चक्कर में वो कैदखाने में पहुंचे थे।
बूढ़े ने होठों पर उंगली रखकर उन्हें खामोश रहने का इशारा किया और फिर उन्हें हाथ के इशारे से अपने पीछे आने का इशारा करते हुए दरवाजे से बाहर चला गया। उसके इशारे के मुताबिक शहजादा और वजीर आजम सालेह दोनों बूढ़े से चलते हुए दरवाजा पार कर गए। दरवाजे की दूसरी तरफ एक खाली जगह थी। उन दोनों के इधर आने पर बूढ़े ने फर्श पर मौजूद एक उभरी हुई जगह को जोर से दबाया और दूसरे लम्हे दीवार दोबारा बराबर हो गई।
"मेरे पीछे चले आओ।" बूढ़े ने कहा और फिर उसने आगे बढ़कर एक चट्टान के कोने को जोर से एक तरफ ढकिया जहां की तरफ से रास्ता निकल गया। अब वहां एक तंग रास्ता नजर आने लगा। वो दोनों बूढ़े के पीछे चलते हुए उस रास्ते में दाखिल हो गए और बूढ़े ने चट्टान दोबारा बराबर कर दी और फिर वो तीनों तेजी से रास्ते में चलने लगे।
करीब आधे घंटे तक चलने के बाद बूढ़ा रुक गया और उसके पीछे वो दोनों भी रुक गए। बूढ़े ने दीवार के करीब एक जगह हाथ मारा और दीवार बीच से हट चली गई। अब दूसरी तरफ आसमान नजर आने लगा। वो तीनों बाहर निकल गए और बूढ़े ने एक चट्टान के कोने को जोर से दूसरी तरफ खींचा और दरवाजा बंद हो गया। अब वहां ठोस चट्टान थी। यह पहाड़ की दूसरी तरफ थी। इधर दूर-दूर तक वीरान मैदान था।
बूढ़ा उन दोनों को लेकर तेजी से मैदान में चलता गया और फिर जैसे ही वीराने पर पहुंचे तो उन्हें शहर की इमारतें नजर आने लगी। बूढ़ा उन्हें मुतनाहा जगहों से गुजरता हुआ एक मकान के दरवाजे पर ले आया। दरवाजे को ताला लगा हुआ था। बूढ़े ने जेब से चाबी निकालकर ताला खोला और फिर उन्हें लेकर अंदर चला गया। उन्हें कमरे में बैठने का इशारा करके बूढ़ा बाहर निकल गया और थोड़ी देर बाद उनके लिए चाय बनाकर लाया।
"आपकी बहुत-बहुत मेहरबानी। बूढ़े बाबा। आपने हमें मौत के मुंह से निकाला है।" शहजादा ने बूढ़े का शुक्रिया अदा करते हुए कहा।
"नहीं नौजवान मैंने तो अपना फर्ज अदा किया है। तुम दोनों ने अपनी जान को दांव पर लगाकर मेरी जान बचाई है। अब अगर तुम मेरी वजह से फांसी चढ़ जाते, तो मैं तमाम उम्र अपने आप को माफ ना करता।" बूढ़े ने जवाब दिया।
"मगर आपको इन रास्तों का कैसे पता चला?" वजीर आजम सालेह ने पूछा।
"दरअसल बात यह है कि मैं एक माहिर मामार हूं। मौजूदा बादशाह के बाप ने यह रास्ते बनवाए थे। तहखाना मेरी निगरानी में तैयार हुआ। बादशाह के बाप ने यह खुफिया रास्ते बनवाए। मगर एक दिन उसका अचानक इंतकाल हो गया और मौजूदा बादशाह ने उसकी जगह संभाली। इस बादशाह को इन खुफिया रास्तों का इल्म नहीं है। और मेरे अलावा बाकी तमाम मामा मर चुके हैं।" बूढ़े ने जवाब दिया।
"इसका मतलब है कि हम यहां महफूज हैं। बादशाह या उसके सिपाहियों को हमारे फरार के रास्ते का इल्म ना हो सकेगा।" शहजादा ने खुश होते हुए कहा।
"हां, जब तक तुम यहां से बाहर ना निकलो, किसी को तुम्हारी यहां मौजूदगी का इल्म ना हो सकेगा। मगर मैं ज्यादा देर तुम लोगों को यहां ना रख सकूंगा। क्योंकि मैं गरीब आदमी हूं। मैं तुम्हें खिलाऊं पिलाऊं ना कर सकता। अलबत्ता तुम अपना मुंह तो खोलो। मुझे तफसील से बताओ। शायद मैं तुम्हारी किसी काम आ सकूं।" बूढ़े ने कहा।
वजीर एआम सालेह तो उसे तफसील बताने से हिचकिचाया। मगर शहजादा काफी देर तक सोचता रहा। फिर उसने बूढ़े से मुखातिब होकर कहा, "शहजादा हजरत बेहतर तो यह है कि आप इसे राज से बाहर रखें क्योंकि बादशाह बहुत जालिम है और उसके महल के अंदर सख्त पहरा भी है। इस लड़की को वहां से ले आने की बात तो एक तरफ रखें। आप किसी कीमत पर भी इस महल के अंदर दाखिल ना हो सकते। जो कुछ भी हो मैंने इस लड़की को यहां से जरूर रिहा दिलाना है। अगर तुम कोई तरीका ना बता सकते तो फिर हमें इजाजत दो। हम खुद कोशिश करेंगे। तुम्हारा बहुत शुक्रिया।" शहजादा ने उड़ते हुए कहा।
"बैठो बैठो। आप तो नाराज हो गए। अब मुझे मालूम हो गया है कि आप मुश्किल मिजाज आदमी हैं। और मुश्किल मिजाज और बहादुर आदमी कभी नामुमकिन नहीं होता।" बूढ़े ने मुस्कुराते हुए कहा और शहजादा दोबारा बैठ गया।
"आपके ज़हन में कोई मंसूबा है?" बूढ़े ने पूछा।
"हां, एक दफा मैं किसी तरह महल में दाखिल हो जाऊं, फिर मैं हर कीमत पर इस लड़की को ले आऊंगा।" शहजादा ने कहा।
"तो तुम्हारे ज़हन में एक तस्वीर आई है। मेरे रिश्तेदार शाही महल में मुलाजिम का काम करते हैं। आप अगर अपना हुलिया तब्दील कर लें, तो मैं आपको उसकी जगह अंदर भिजवा दूंगा। उसके बाद आपकी किस्मत।" बूढ़े ने कहा।
"मैं भी साथ जाऊंगा। आप भी जा सकते हैं क्योंकि कभी कभार उसका भाई भी शाही महल में जाता रहता है।" बूढ़े ने जवाब दिया।
"फिर ठीक है हम तैयार हैं। तुम्हारी बहुत-बहुत मेहरबानी।" शहजादा और वजीर आजम सालेह ने कहा।
"ठीक है, आप आराम करें। मैं उस मुलाजिम और उसके भाई को बुलाकर यहां ले आता हूं।" बूढ़े ने कहा, और वो उठकर कमरे से बाहर निकल गया।
शहजादा और वजीरआम सालेह दोनों दुआएं करते रहे। खुदा करे मुलाजिम और उसका भाई बूढ़े की बात मान जाए। वो दिल ही दिल में दुआएं करते रहे और बूढ़े का इंतजार करते रहे।
करीब तीन-4 घंटे के बाद बूढ़ा वापस आया। मुलाजिम और उसका भाई उसके हमराह था। बूढ़े ने उन्हें खुशखबरी सुनाई क्योंकि बादशाह से सब लोग बहुत नफरत करते हैं। बूढ़ा हुलिया बदलने का सामान भी बाजार से खरीद कर साथ ले आया। क्योंकि दोनों ने हुलिया बदला और फिर मुलाजिम ने शाही महल की तमाम तफसील पूछ ली और फिर वह शाही महल जाने के लिए तैयार हो गए। बूढ़े से इजाजत लेकर वह मकान से बाहर निकल आए और शाही महल की तरफ रवाना हो गए।
शहजादा और वजीर आजम सालेह मुलाजिम और उसके भाई के रूप में बड़े सुकून से शाही महल में दाखिल हो गए और बड़े वजह से बाग में अपने काम में मुश्तबल हो गए। तमाम दिन वो मुसलसल अपने काम में मशगूल रहे। शाम को जब उनकी छुट्टी का वक्त आया तो शहजादा ने वजीर आजम सालेह को आगे से इशारा किया और फिर गैर महसूस तौर पर आहिस्ता-आहिस्ता शाही महल के उस हिस्से की तरफ बढ़ते चले गए जिसे जबानखाना कहा जाता था। वो जनानाखाने के करीब पहुंचकर झाड़ियों के पीछे छिप कर बैठ गए। शाही महल का यही हिस्सा दूसरी मंजिल पर बना हुआ था और उसके अर्धगिर्द मुसल्लह सिपाही बड़े जोगी अंदाज में बैठे पहरा दे रहे थे। वह दोनों झाड़ियों के पीछे छिपे हुए मौके की तलाश में टकट के बैठे थे।
कुछ देर बाद उनकी तरफ की खिड़की खुली और उसमें से नाजनीन निकल आई। वो अपनी तस्वीर से भी ज्यादा खूबसूरत थी। अब तो शहजादा की शिद्दत एक ख्वाहिश बर्दाश्त खत्म हो गई। उसने एक लम्हे के लिए इधर-उधर देखा और फिर किसी को उसकी तरफ जाते ना पाकर वापस झुक गई। महल की खिड़की करीब थी। नाजनीन ने एक नजर उस पर डाली और फिर दूसरी तरफ देखने लगी क्योंकि शहजादा मुलाजिम के रूप में था।
"नाजनीन ताज़िरजादी मेरी तरफ देखो। मैं मल्क बसनत का शहजादा अहमद हूं।" शहजादा ने सरगोशी के अंदाज में कहा।
शहजादा ने जब यह बात सुनी तो वो चौंक पड़ी। उसने
गौर से शहजादा की तरफ देखा और शहजादा की वजाहत देखकर उसे शहजादा की बात का यकीन हो गया। उसकी आंखों में चमक भर आई।
"तुमने जो कुछ कहा है मेरे मल्क के मगर तुम यहां कैसे?" नाजनीन ने मसरत से भरे लहजे में कहा।
"मैं तुम्हें रिहा करने आया हूं और शाही महल में दाखिले के मुलाजिम का रूप धारने के पीछे मेरा साथी वजीर आजम सालेह भी मौजूद है।" शहजादा ने उसे बताया।
"यहां से नामुमकिन है शहजादा। यहां पहरेदार हैं। तुम्हारी जान भी चली जाएगी। तुम यहां से बचकर निकल जाओ और मुझे मेरी किस्मत पर छोड़ दो।" नाजरीन ने बड़े मायूस लहजे में कहा।
"शहजादा पहरेदार आ रहे हैं।"
अचानक वजीर आजम सालेह ने उसका बाजू पकड़ कर नीचे खींचते हुए कहा और शहजादा दोबारा झाड़ी के पीछे छिप गया। नाजनीन ने भी खिड़की बंद कर ली। पहरेदार उनके सामने से गुजरते चले गए।
"शहजादा नाजनीन को कहो कि वो यहीं खिड़की से नीचे उतर आए। महल के अंदर जाकर फिर बाहर निकलना बहुत मुश्किल हो जाएगा।" वजीर आजम सालेह ने शहजादा को एक तजवीज बताते हुए कहा।
"मगर नाजनीन को यहां से निकाल कर ले जाना बड़ा मुश्किल होगा।" शहजादा ने हिचकिचाते हुए कहा।
"वो बाद में देखा जाएगा फियल हाल उसे बाहर निकालो।" वजीर आजम सालेह ने कहा।
क्योंकि शहजादा इधर-उधर देखते हुए उठा और फिर तेजी से झाड़ियों को छोड़कर खिड़की के करीब दीवार के नीचे मौजूद झाड़ियों के साथ लगकर बैठ गया। उसी लम्हे नाजनीन ने दोबारा खिड़की खोली।
"नाजनीन फौरन छलांग लगा दो। मैं तुम्हें पकड़ लूंगा।" शहजादा ने सरगोशी के अंदाज में कहा।
"नहीं नहीं हम सब कत्ल हो जाएंगे।" नाजनीन ना पहुंच जाती हुई कहा।
"जल्दी करो जो मैं कह रहा हूं वही करो।" शहजादा ने इस बार कद्दे लहजे में कहा।
ना जाने उसके लहजे में क्या बात थी कि नाजनीन की हिचकिचाहट खत्म हो गई और उसने इधर-उधर देखते हुए खिड़की से छलांग लगा दी। शहजादा ने उसे बाजू में ही संभालकर नीचे झाड़ियों के पीछे छिपा लिया। नाजनीन ताजिरजादी का जिस्म बुरी तरह कांप रहा था। शहजादा ने उसे तस्लीह दी और फिर वो दोनों रतनते हुए आहिस्ता-आहिस्ता वजीर आजम सालेह के करीब पहुंच गए।
"अब कैसे बाहर निकलें?" शहजादा ने वजीर-ए-आज़म सालेह से मुखातिब होकर कहा।
"नाजनीन, तुम मुंह पर मिट्टी मार लो। अपने बाल बिखेर लो और हो सके तो कपड़ों पर भी मिट्टी मिला लो ताकि पहली नजर में तुम्हें कोई पहचान ना सके।" वजीर आजम सालेह ने कहा और फिर नाजनीन ने वैसा ही किया।
"करीब में एक दरख्त देखा है। अगर हम उस पर चढ़ जाए तो अंधेरे में आसानी से दूसरी तरफ उतर सकते हैं।" इस बात पर शहजादा ने सिर हिला दिया। फिर वो तीनों बड़ी हल्के हाथ से दरख्त की तरफ बढ़ते चले गए। सब बड़ी आसानी से होता चला जा रहा था। शायद अभी तक नाजनीन की गुमशुदगी का किसी को पता ना चला था। इसलिए वह चाहते थे कि उससे पहले कि किसी को पता चले और उसकी तलाश शुरू हो जाए। वो शाही महल से बाहर निकल जाए।
आहिस्ता-आहिस्ता वो उस दीवार तक पहुंच गए और किसी पहरेदार की नजर उन पर ना पड़ी। दरख्त के करीब पहुंचकर वो चंद लम्हे छिपे बैठे रहे। वैसे भी उस तरफ का हिस्सा वीरान था। फिर वजीर एआम सालेह ने शहजादा को इशारा किया और शहजादा खामोशी से उठा और फिर बंदर जैसी फौरती से दरख्त पर चढ़ता चला गया। ऊपर घनी शाखाओं में जब वो छिप कर बैठ गया तो वजीर आजम सालेह ने नाजनीन को ऊपर जाने का इशारा किया।
"नाजनीन ने कहा कि वो इस दरख्त पर ना चढ़ सकेगी।"
"अच्छा तुम मेरी कमर से लिपट जाओ।" वजीर एआम सालेह ने कहा और नाजनीन ताजिरजादी ने उसकी गर्दन में हाथ डालकर उसकी कमर पर लग गई। वजीर आजम सालेह ने इधर-उधर देखा और फिर किसी को उस तरफ जाते ना पाकर वो तेजी से उठा और फिर बड़ी फर्ती से दरख्त पर चढ़ता चला गया। थोड़ी देर बाद वो शहजादा के करीब पहुंच गया और फिर नाजनीन ताजिरजादी भी उसकी कमर से उतर गई।
दीवार काफी बुलंदी की थी और दूसरी तरफ गहरी ढलान थी। अभी वह दूसरी तरफ उतरने के मुतल्लिक सोच ही रहे थे कि अचानक पहरेदारों में हलचल मच गई। कोई दूर से चीख-चीख कर कुछ कह रहा था तो महल में शोर मच गया और पहरेदार भागने लगे। फिर मुतनानहा मशालें जलने लगी और हर तरफ रोशनी ही रोशनी हो गई।
"और शायद उन्हें नाजनीन के फरार का इल्म हो गया है।" शहजादा ने कहा।
"हां मालूम तो ऐसा ही होता है।" वजीर आजम सालेह ने जवाब दिया।
और नाजनीन ताजीरजादी तो बेचारी सहन करेगी। उसे अपनी मौत करीब महसूस होने लगी।
"बेफिक्र हो हम इस वक्त महफूज हैं।" वजीर एआम सालेह ने कहा।
मगर दूसरे लम्हे वो चौंक पड़े क्योंकि दूर से कुत्तों के भौकने की आवाज आने लगी और मारे गए पहरेदार शायद हमें तलाश करने के लिए कुत्ते इस्तेमाल कर रहे हैं और कुत्ते जरूर नाजनीन की ब से नीचे आ जाएंगे। हमें फौरन यहां से निकलना चाहिए।
वहां आधे अब कुत्तों की आवाज करीब आ गई थी। कारी बाती महसूस हो रही थी। शायद कुत्ते इधर जा रहे थे। वजीर आजम सालेह ने कुछ सोचा। फिर उसने फौरन अपनी कमीज उतारी और कमर में बंधा हुआ पटका भी उसने बड़ी फरती से कमीज और पटके को पतलियों की सूरत में फाड़ दिया और फिर उनके बीच गिरें बांधने लगा। इस तरह काफी लंबी रस्सी तैयार हो गई तो उसने उसका एक सिरा दरख्त की शाखा से बांधा और फिर शहजादा को रस्सी के जरिए दीवार की दूसरी तरफ उतरने का इशारा किया।
शहजादा एक लम्हे के लिए हिचकिचाया। मगर कुत्तों की आवाज बहुत करीब आ गई थी। इसलिए उसने रस्सी को झटका देकर उसकी मजबूती का अंदाजा किया और फिर उसका सिरा पकड़ कर नीचे लटक गया। रस्सी के जरिए चंद ही लम्हों में वो नीचे फिसलता चला गया। आधी दीवार के बाद रस्सी खत्म हो गई तो उसने पंजों के बल लगा दी और फिर हल्के से धमाके से वो जमीन पर खड़ा हो गया और दीवार के साथ लिपट कर खड़ा हो गया।
फिर वजीर आजम सालेह ताजिरजादी से कहा और नाजनीन ताज़िरजादी ने भी हिम्मत करके रस्सी पकड़ी और फिर वह लट्टी हुई फिसलती चली गई। जब रस्सी खत्म हुई तो नीचे खड़े शहजादा ने उसे रास्ते में ही बाजू में संभालकर बड़े नरमी से नीचे खड़ा कर दिया। उसके फौरन बाद वजीर एआम सालेह भी नीचे उतर आया।
"जल्दी कीजिए। हमें फौरन यहां से निकल जाना चाहिए। जैसे ही उनकी नजर रस्सी पर पड़ी, उन्होंने महल से बाहर हमारी तलाश शुरू कर दी है।" फिर वह तेजी से महल की दीवार के साथ-साथ दौड़ने लगे। अभी वह थोड़ी ही दूर गए होंगे कि नाजनीन ताज़िरजादी ठोकर खाकर गिर पड़ी। शहजादा एक लम्हे के लिए रुक गया। फिर उसने आगे बढ़कर ताज़ीरजादी को उठाकर कंधे पर लाद लिया और एक बार फिर वो तेजी से भागने लगा।
जल्द ही वह महल से दूर निकल आए। अब क्योंकि वह शहर के करीब आ गए थे इसलिए शहजादा ने नाजनीन को नीचे उतारा और फिर वह आराम से गलियों से होते हुए जल्द ही बूढ़े के मकान के करीब पहुंच गए। मगर अभी मकान कुछ ही दूर था कि वजीर एआम सालेह ने उन्हें रोकते हुए कहा, "आप यहां ठहरे। मैं बूढ़े के घर से शादी के लिए दूसरे कपड़े ले आऊं। अगर ताज़िरजादी इन कपड़ों में बूढ़े के घर गई, तो कुत्ते यहां तक पहुंच जाएंगे।"
दिल ही दिल में दुआ करने लगा। वजीर आजम सालेह उन्हें रोक कर खुद तेजी से आगे बढ़ गया।
"नाजरीन दरअसल बात यह है कि मैंने कोई ऐसा ना किया। मैं दिल की हाथों मजबूर होकर यह सब कुछ कर रहा हूं।" शहजादा ने कहा और फिर शहजादा ने तमाम तफसील उसे बताते हुए कहा कि अब यह उसकी मर्जी है कि वो हां कर दे या ना करें। नाजरीन उसका इशारा समझ गई। पहले तो वो शर्माई। फिर उसने सिर झुकाते हुए कहा "शहजादा मैं तमाम उम्र तुम्हारी काम निगार बनकर रहूंगी।" और शहजादा खुशी से मुस्कुरा दिया।
अति देर में वजीर एआम सालेह बूढ़े को लेकर वहां पहुंच गया। बूढ़े ने मर्दाना कपड़ों का एक मंडल हाथ में पकड़ा हुआ था।
"जल्दी करो एक तरफ जाकर यह कपड़े पहन लो।" वजीर एआम सालेह ने नाजनीन से मुखातिब होकर कहा और नाजनीन कपड़े लेकर एक तरफ चली गई। थोड़ी देर बाद वो कपड़े तब्दील करके आई और फिर उन्हें बूढ़े को देते हुए कहा "इन्हें ठिकाने लगा दो।" बूढ़ा कपड़े लेकर एक तरफ चला गया और वजीर आजम सालेह उन सबको लेकर बूढ़े के मकान की तरफ चल पड़ा।
अब वो अपराध तौर पर महफूज़ तो हो चुके थे। मगर उन्हें मालूम था कि नाजनीन के महल से गुमशुदगी की खबर मिलते ही बादशाह गुस्से से भड़क उठेगा और फिर उसके सिपाही पूरे शहर के छपेछपे पर फैल जाएंगे और वह अजनबी हैं। इसलिए उनका बचकर निकल जाना बहुत मुश्किल हो जाएगा और उन्हें यह भी मालूम ना था कि एक दफा अगर वह बादशाह के सिपाहियों के हाथ लग गए तो फिर उन्हें फरी तौर पर कत्ल कर दिया जाएगा।
वो काफी देर तक बैठे यही सोच रहे थे कि अचानक उन्हें दूर लोगों का शोर सुनाई दिया और फिर आहिस्ताआहिस्ता शोर बढ़ता चला गया। ऐसा मालूम हो रहा था जैसे तमाम शहर के लोग घरों से निकल आए हो और नारे लगा रहे हो। मगर कोई वाज़ बात तो सुनाई ना दे रही थी। वो और भी ज्यादा घबरा गए। क्योंकि उनके जेहन में जो पहला ख्याल आया वो यही था कि बादशाह के हुकुम पर सिपाहियों के साथ-साथ रैया भी उन्हें ढूंढने के लिए निकल खड़ी हुई है। इस सूरत में उनके बच निकलने की उनकी तमाम कोशिश जाया हो जाती।
"आप यहां ठहरे मैं बाहर जाकर सूरते हाल मालूम करता हूं।" वजीर आजम सालह ने कहा।
"नहीं तुम भी यहीं रुको। मैं तुम्हें अकेले ना जाने दूंगा।" शहजादा ने कहा।
मगर वजीर आजम सालेह इशरार करता रहा। उससे पहले कि कोई फैसला होता अचानक दरवाजा खुला और बूढ़ा भागता हुआ अंदर आया।
"जिंदाबाद शहजादा जिंदाबाद! एक बहुत बड़ी खुशखबरी सुनो जालिम बादशाह को कत्ल कर दिया गया है और उसकी जगह वजीर आजम ने तख्त संभाल लिया है। वजीर आजम बहुत रहम दिल और इंसाफ पसंद है। तमाम लोग उसकी हिमायत में नारे लगा रहे हैं।" बूढ़े ने बताया।
"मगर यह अचानक कैसे हुआ?" शहजादा ने हैरत से पूछा।
"दरअसल बात यह हुई कि बादशाह ने कैदखाने से तुम्हारे फरार पर गुस्से में आकर तमाम पहरेदारों के कत्ल का हुकुम दे दिया। मगर उससे पहले कि उसकी तामील होती नाजनीन के गायब होने की खबर मिली और बादशाह गुस्से में पागल हो गया। उसने पूरे महल के पहरेदारों के कत्ल का भी हुकुम दे दिया। नतीजा यह हुआ कि पहरेदारों ने बगावत कर दी और उन्होंने मिलकर बादशाह को कत्ल कर दिया और वजीर आजम को बादशाह तस्लीम कर लिया। उसकी खबर जब शहर के लोगों को मिली तो तमाम शहर खुशी से नचलने लगा।" बूढ़े ने तफसील बताई।
"यह तो अच्छा हुआ। कम अज कम लोगों को इस जालिम से निजात मिल गई।" वजीर आजम सालेह ने कहा।
"दूसरी बात यह है कि इस वक्त इस शहर में अफरातफरी मची हुई है। मैं तुम्हारे लिए दो घोड़े और सफर में खाने का इंतजाम करके लाया हूं। तो तुम इस वक्त आसानी से यहां से निकल सकते हो। बाद में न जाने कैसे हालात पेश आए।" बूढ़े ने कहा और वो तीनों खुशी से उछल पड़े और बूढ़े का शुक्रिया अदा करने लगे।
बूढ़ा उन्हें लेकर मकान से बाहर आया और फिर थोड़ी दूर एक वीराने में बंधे हुए दो घोड़ों के पास लेकर खड़ा कर दिया। शहजादा वजीर आजम साले और नाजनीन तीनों ने बूढ़े का एक बार फिर शुक्रिया अदा किया और फिर वह घोड़ों पर सवार हो गए। नाजनीन मर्दाना लिबास में थी। वो शहजादा के पीछे बैठ गई। उन्होंने घोड़ों भगाए। शहर में अफरातफरी मची हुई थी। लोग खुशी से नचते फिरते रहे। किसी ने भी उनकी तरफ तवज्जो ना की और सुबह होने के करीब वो शहर की सरहद से बाहर निकल गए।
अब वो महफूज़ थे। शहजादा अपने मकसद में कामयाब हो गया था। आखिर मंजिल पर मंजिल मारते और सफर करते हुए वह एक महीने बाद दोबारा अपने मल्क पहुंच गए। जब बादशाह को उनकी आमद की खबर मिली तो बादशाह बेकरार शाही महल से बाहर निकल आया। बूढ़ी मां भी उसके साथ थी। बादशाह ने शहजादा और वजीर आजम सालेह को गले से लगा लिया। बूढ़ी मां ने नाजनीन को गले लगा लिया था।
फिर बादशाह ने शहजादा के कहने पर नाजनीन की मां से शहजादा और नाजनीन की शादी की बात की तो नाजनीन की मां ने शादी की इजाजत दे दी और बादशाह ने उन दोनों की शादी का ऐलान कर दिया। उससे पहले शहजादा ने तमाम लोगों के सामने धोखाबाजी से तौबा कर ली। उसने आखिर में जब यह कहा कि "लोगों को मैंने धोखे से तौबा कर ली है। मगर देखो मैंने आखिरकार एक खूबसूरत बीवी धोखे से ले ली है।" तो तमाम लोग बेख्तियार हंस पड़े। पूरे मुल्क में उनकी शादी और शहजादा की तौबा पर तीन रोज तक जश्न मनाया जाता रहा।
फिर बादशाह ने तख्त शहजादा के हवाले कर दिया और खुद इबादतगाह में मशगूल हो गया। शहजादा ने उस शानो शौकत से हुकूमत की कि तमाम लोग उसके गुण गाने लगे और मल्क पहले से ज्यादा खुशहाल हो गया। इधर नाजनीन ताजिरजादी बहुत खुश थी क्योंकि अब वह मल्लिका बन गई थी और बादशाह अहमद उससे बेपनाह मोहब्बत भी करता था क्योंकि वह खुशखुर्म जिंदगी गुजारने लगे।