Transcription
[संगीत]
[प्रशंसा]
[संगीत] माता-पिता मिलेंगे हमारे कर्मों के आधार पर जिस तरह के हमारे संस्कार थे तो कर्म और संस्कार दोनों एक जैसे ही होते हैं। हम जो कर्म करते हैं उसका संस्कार बनता है। संगीत बजाने का कर्म किया तो संगीत के संस्कार बनेंगे। डॉक्टरी का काम किया तो डॉक्टरी के संस्कार बनेंगे। तो उसी तरह के माता-पिता मिलेंगे हमको अगले जन्म में। फिर वो हमको वैसी बात सिखाएंगे। उनके भी ऐसे ही संस्कार है जैसे हमारे हैं वैसे माता-पिता के। तो कर्म और संस्कार मैच करते हैं। इसीलिए ईश्वर उस परिवार में बच्चे को जन्म देता है। तो वो जो माता-पिता सिखाएंगे उनका हम पर प्रभाव पड़ेगा। पिता का भी पड़ेगा। टीचर्स का भी पड़ेगा। पड़ोसी, गली के, मोहल्ले के लोगों का प्रभाव पड़ेगा। अपने क्लास फेलो है, फ्रेंड सर्कल है, उसका प्रभाव पड़ेगा। रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल फोन, प्रेस, मीडिया जो भी है, फिल्म आदि इन सब चीजों का प्रभाव पड़ेगा। तो अब ये फिर सरकार के कानून है, उसका भी प्रभाव पड़ेगा। जो हम सिलेबस पढ़ते हैं, उसका भी प्रभाव पड़ेगा। जिस तरी पढ़ते हैं, कॉलेज सिस्टम में पढ़ते हैं, या गुरुकुल सिस्टम में पढ़ते हैं, उसका भी प्रभाव पड़ेगा। तो यह 10-12 चीज हैं जो हमको प्रभावित करती हैं। फिर उसमें से जो फैक्टर बलवान होगा, उसका प्रभाव अधिक रहेगा। जो फैक्टर कमजोर होगा, उसका प्रभाव कम पड़ेगा।
यदि किसी के पूर्व जन्म के संस्कार बलवान हैं अध्यात्म के, ठीक है, बहुत सारे तो बहुत सारे संस्कार उसको अध्यात्म में ही धक्का मारेंगे। उसको वा नहीं बनाएंगे। उसके संस्कार ही नहीं है। हर व्यक्ति उसी दिशा में चलता है, जिस दिशा के उसके पूर्व संस्कार हो। यह सबसे बड़ा फैक्टर है, सबसे बड़ा पहला नंबर फैक्टर है। उसके पूर्व जन्म के संस्कार उसकी संपत्ति है, पिछले जन्मों की। वो उसको उसी दिशा में ले जाएगी। उसके बाद फिर माता का नंबर है, फिर पिता का नंबर है, फिर बाकी सारी चीजें और टीचर, आचार्य, गुरु वो भी हैं। सब वो चीजें बाद की हैं। पहली अपने ही संस्कार हैं। तो वो उसको हर दिशा में, जिस-जिस तरह के संस्कार होंगे, उस दिशा में उसको आगे बढ़ाती।
जी, वो आपके कर्म का फल है ना। आपके पिछले कर्मों की वजह से ऐसे पिता आपको दिए हुए। यह नाप-तोल कर जानबूझ कर दिए हुए कि आपके कर्म ऐसे, आपको ऐसा फल मिलना चाहिए। और उनके संपर्क से फिर आपको उसी तरह की सपोर्ट भी मिलनी चाहिए। मान लो आप आध्यात्मिक व्यक्ति थे पूर्व जन्म में, तो आपको एक भोगवादी के घर में जन्म दे दिया जाए, तो वो तो आपके संस्कारों के विरुद्ध हो जाएगा। वो तो आपको भवादी बनाएगा। फिर पिताजी आपको अध्यात्म की ओर सपोर्ट नहीं करेगा। तो क्या ऐसा करना ठीक है? आपके अच्छे संस्कार हैं, धार्मिक संस्कार हैं, तो आपको इस जन्म में फिर उसके आगे सपोर्ट मिलना चाहिए ना। तो वो तभी तो मिलेगा, जब ईश्वर ऐसे पिता का चुनाव करे, जो आपको इस काम में सपोर्ट करता हो। इसलिए नाप-तोल कर के माता-पिता का चुनाव ईश्वर करता है और उस परिवार में भेजता है। फिर माता-पिता की सहायता से उसको सपोर्ट मिलता है, वो आगे बढ़ता है।
यह बात बोलिए। भावना है। संस्कार उम अच्छे। विवान नहीं पाते क्या है? ठीक है। आप पूछ रहे हैं कि गुरुम क्या है और असली गुरु कैसे कैसे पहचाने जाएं, यह पूछ रहे हैं। तो अभी थोड़ी देर पहले मैंने बताया था कि सबसे बड़ा है ईश्वर। सर्वज्ञ है, उसको कोई भ्रांति नहीं होती, कभी कोई संशय नहीं होता। उसके ज्ञान में कोई कमी नहीं है, कोई गड़बड़ नहीं है। तो वो जो भी बताएगा, ठीक बताएगा। तो सबसे पहला ईश्वर। ईश्वर ने क्या बताया? चार वेद। यह वेदों में सारा मैसेज ईश्वर की तरफ से। दूसरी बात, ऋषियों ने वेदों को पढ़ा। फिर उन्होंने पढ़ कर के समझा और जनता को समझाने के लिए कुछ पुस्तकें लिख दी। वैसे ही सारी बातें लिखी, जो वेदों में। तो वो प्रामाणिक हो गई। वेद प्रामाणिक हैं, ईश्वर का वचन होने से। ऋषियों की बातें प्रमाणिक हैं, वेदों की बातें होने से। ईश्वर की बातें। क उन्होंने। अब जो गुरुजी हैं, तीसरे नंबर पर, वो सही गुरुजी तो वही होगा, जो इन दोनों को जानता हो। जिसने वेद पढ़ा, जिसने ऋषियों के ग्रंथ पढ़े, वो ठीक गुरुजी है। उसका विचार ठीक होगा, क्योंकि वो उन्हीं की बातें कह रहा है, अपनी नहीं कह रहा। मनुष्य अल्प है, वो गलती कर सकता है। अगर अपनी बात कहेगा तो भूल हो सकती है। पर अपनी ही नहीं, वो ईश्वर की और ऋषियों की बातें कहता है, तो फिर वो सही गुरुजी है।
तो सही गुरु की पहचान यह है, जो वेदों का विद्वान हो, ऋषियों के ग्रंथों को जानता हो। फिर यह तो हो गई शाब्दिक बातें। उसका शाब्दिक ज्ञान इस तरह से होना चाहिए, तो उसकी थ्योरी ठीक हो गई। दूसरा बात, उसका प्रैक्टिकल ठीक होना चाहिए। आचरण, व्यवहार। वो वेदों के अनुसार होना चाहिए। जैसा वेदों में बताया कि ब्रह्मचारी के ये कर्तव्य हैं, यदि वह ब्रह्मचारी है, तो फिर वो काम करे। गृहस्थ के ये कर्तव्य हैं, तो गृहस्थ वाला काम करे। गुरुजी वानप्रस्थ है, तो वानप्रस्थी वाला। सन्यासी है, तो सन्यासी वाला। उसका आचरण वेदों के अनुकूल होना चाहिए। वो जिस आश्रम में है, उस आश्रम के नियमों का पालन करेगा। तीसरी बात, वो व्यवहार में यम-नियम का पालन करेगा। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य। वो इन सब चीजों का पालन करेगा ईमानदारी से। तो वो लोग परीक्षा से, व्यवहार से पहचान लेंगे कि यह ठीक करता है या नहीं करता है। बोलता कुछ और है, करता कुछ और है। अगर उसके बोलने में और करने में फर्क है, बोलता तो है सच बोलो, और व्यवहार में झूठ बोलता है, तो फिर गड़बड़ है। वो लोग समझ जाते हैं। व्यवहार करने से, परीक्षण से पता चल जाता है। बोलता तो है न्याय से व्यवहार करो, और खुद अन्याय करता है, तो पता चल जाएगा। यह गुरुजी का आचरण वेदानुकूल नहीं है।
तो जिस गुरुजी का आचरण वेदानुकूल हो, निय के अनुकूल हो, मोक्ष प्राप्ति जिसका लक्ष्य हो, निष्काम कर्म करता हो, लोभी, लालची, झगड़ालू, कोधी, स्वार्थी ना हो, परोपकारी हो, निष्काम कर्म करता हो। इस तरह के आचरण का उसका जीवन का परीक्षण करना चाहिए। इस कसौटी पर। तो जो इस तरह का हो, वो ठीक गुरुजी है। उसको पहचान लो, फिर उसको फॉलो करो। वो जैसा करता हो, वैसा करो। जैसा बोलता हो, वैसा बोलो। जैसा सोचता हो, वैसा सोचो। तो ये ठीक गुरु की पहचान। और जो इससे उल्टा-पुल्टा बोलता है, वेद का विद्वान नहीं है, दर्शन पढ़ता नहीं, ऋषियों के ग्रंथ पढ़ता नहीं, सिद्धांत का पता नहीं, मनमानी करता है, उल्टे-सीधे काम करता है, उसका आचरण वेद के विरुद्ध है, लोभी, लालची, क्रोधी, लड़ाई-झगड़े करने वाला, ऐसा दुष्ट व्यक्ति है, वो गुरुडम है। उसका नाम है गुरुडम। गुरुडम मतलब नकली गुरु। तो नकली गुरुओं की यह पहचान, उनका सिद्धांत और विचार, आचरण वेदों के विरुद्ध होगा। और जिनका सिद्धांत, आचार, आचरण, व्यवहार वेदों के अनुकूल होगा, वो सही गुरुजी। ये पहचान, इस पहचान से पहचानो और काम करो। ठीक है। हां जी, बोलिए। ल जी पूछ रहे हैं। हां, पीछे-पीछे वाले बोलो। हम्म। हम्म।
[संगीत]
हम्म। मैं वेदों के अनुकूल आचरण करता हूं। वेदों के अनुकूल आचरण करता हूं। यम-नियम का पालन करता हूं। पूरी गहराई से करता हूं। ईश्वर की उपासना करता हूं। मेरे सिद्धांत सारे वेदों, ऋषियों के अनुकूल हैं। और मैं व्यवहार में कितना सुखी हूं, मेरा परीक्षण कर लो। सबको छूट है, सब मेरा परीक्षण कर लो। दो साल, पांच साल, 10 साल मेरा परीक्षण करो। फिर आपको पता चल जाएगा, मैं सुखी हूं कि दुखी हूं। लोभी हूं या त्यागी हूं, वैरागी हूं या रागी हूं। जो जो लोग 15-20 साल से मेरा परीक्षण कर रहे हैं, उनसे पूछ लो। आपको करना हो तो आप मेरा परीक्षण कर लो। पूरी छूट। हां। तो उनकी मशीन वालों को तो फेल मानते। मशीन तो फेल है। इनकी रोज कहते आज बरसात होगी, होती नहीं। वो कहते आज नहीं होगी, उस जरूर होती है। इनकी मशीनें फेल हैं। हम उसको नहीं मानते। मशीन को प्रमाण नहीं मानते। हम मनुष्य को मानते हैं। बुद्धिमान व्यक्ति हमारी परीक्षा कर ले। मशीन क्या बताएगी? मशीन कहती है इसको नहीं। वो कहता है साहब, मुझे हार्ट में तकलीफ है। मुझे घबराहट होती है। वो कहती है मशीन कर, इसको कोई बीमारी नहीं है। उसका कोलेस्ट्रॉल ठीक है, उसका बीपी नहीं है, उसका हार्ट ट्रबल नहीं है, उसका कुछ नहीं। मशीन तो कह रही ठीक है। रोगी कहता है मैं परेशान हूं। रोगी की माने या मशीन की माने? इसका उत्तर दो पहले। रोगी की माने या मशीन की? मशीन कह रही बिल्कुल ठीक है। ओके। रोगी कह रहा है मैं परेशान हूं। तो रोगी की बात प्रामाणिक है या मशीन की? उसकी नहीं। वो रोगी है, परेशान है। सत्यवादी है, झूठ थोड़ी बोल रहा है। मनोचिकित्सक भी कह रहा है, यह ठीक है। उससे भी टेस्ट करा लिया। फिर वो कहता है मुझे घबराहट होती है, मुझे परेशानी है। मैं मुझे ऐसा लगता है, मैं आज मर जाऊंगा। जबकि मशीन कह रही, आप बिल्कुल ठीक हैं। बोलो, मशीन पर भरोसा करें या रोगी पर? ऐसा नहीं है। आपकी मशीनें फेल हैं। इसको मैं प्रमाणित कर चुका हूं कि मशीन कहती आज बरसात होगी, पर होती नहीं। अच्छा, आप बहस मत करो। मैंने शंका का समाधान कर दिया। इतना काफी है। और विचार करें। हां, बोलो।
संकल्प लेकर मजबूती से उसका पालन कर सके, इसकी विधि बताएं। बहुत अच्छा। तो संकल्प लेकर मजबूती से पालन करना हो, तो उस काम के फायदे क्या हैं, उसकी लिस्ट बना ले। मान लो व्यायाम करने का संकल्प लिया आपने, उदाहरण के लिए। मैं रोज व्यायाम करूंगा, 5 बजे उठूंगा सुबह और फ्रेश होकर के रोज अपना करूंगा। फिर आपको नया-नया जोश था, आप एक दिन उठ गए, व्यायाम किया। फिर अगले दिन भी थोड़ा जोश था, दूसरे दिन भी उठ गए। तीन दिन, चार दिन, पांच दिन उठते रहे। छठे दिन आलस आ गया। फिर आपने सोचा, चलो आज छुट्टी मारते हैं। रोज तो करते ही हैं, एक दिन नहीं करेंगे तो क्या फर्क पड़ेगा? ऐसा सोच के आपने आलस कर लिया और फिर आप नहीं उठे और व्यायाम भी नहीं किया। तो आप चाहते हैं कि ऐसा ना हो, आलस्य ना आए और ठीक व्यायाम नियम पूर्वक चलता रहे, नियम संकल्प पूरा बना रहे। तो इसके लिए क्या करना है? व्यायाम करने से लाभ, इस टाइटल पर लिस्ट बना लो कि व्यायाम करने से क्या-क्या लाभ होते हैं। शरीर स्वस्थ होता है, बलवान होता है, आयु बढ़ती है, ताकत बढ़ती है और उत्साह बढ़ता है, हिम्मत बढ़ती है। ऐसे-ऐसे 8-10 पॉइंट लिख ले। और रोगी नहीं रहता, व्यक्ति स्वस्थ रहता है। इस लिस्ट को रोज पढ़े। तीन बार सुबह, दोपहर, शाम। टीडीएस, डॉक्टरों की भाषा में टीडीएस। तीन बार दवाई खाए। यह दवाई आपकी तो रोज तीन बार इस लिस्ट को पढ़े। 100 दिन तक कम से कम। तो 100 दिन तक तीन बार पढ़ेंगे, तो 300 बार आप लिस्ट पढ़ लेंगे। 3 बार पढ़ने के बाद आपके दिमाग में फिट हो जाएगा कि व्यायाम करना बहुत आवश्यक है। एक उपाय। दूसरा, अगर व्यायाम नहीं करेंगे, तो उस दिन दंड लेंगे। दूसरा, दंड के बिना कोई सुधरता नहीं। सुनाता ही रहता हूं। तो दंड लेंगे। क्या दंड लेंगे? उस दिन नाश्ता बंद। जिस दिन व्यायाम नहीं करेंगे, उस दिन नाश्ता नहीं करेंगे। 4 साल पहले हमने यह नियम बनाया था कि जिस दिन व्यायाम नहीं करेंगे, उस दिन नाश्ता नहीं करेंगे। अब बताओ, भूखे कैसे काम चलेगा? नाश्ता तो चाहिए। आदमी उठेगा, दंड के भय से उठेगा, व्यायाम भी करेगा। तो दूसरा उपाय है दंड लेने का कि हम कुछ ना कुछ दंड लेंगे। वो दंड भी अपना फिक्स कर ले कि व्यायाम नहीं किया, तो नाश्ता नहीं करेंगे। ध्यान साधना नहीं की, आप 15 मिनट करें। ध्यान उपासना नहीं की, गायत्री मंत्र पाठ नहीं किया, तो फिर हम एक कमरे में झाड़ू लगाएंगे। यह दंड घर वालों को भी फायदा हो जाए, उनका भी काम हो जाए, आपका दंड भी हो जाए, काम हो जाएगा। फिर शाम को संध्या नहीं की, तो पोचा भी लगाएंगे साथ में। तो इस तरह से दंड व्यवस्था रखें, तो व्यक्ति मजबूत रहेगा, संकल्प को तोड़ेगा नहीं। और दंड नहीं होगा, तो महीने में 10 बार तोड़ेगा। दंड होगा, तो दो बार तोड़ेगा। तो आठ बार तो बच गया ना। तो यह दूसरा उपाय। तीसरा उपाय यह है कि उस काम को ना करने से हानिया। यदि व्यायाम नहीं करेंगे, तो क्या नुकसान होगा? उसकी लिस्ट बनाए। व्यायाम करने से क्या लाभ, वो लिस्ट बनाए। व्यायाम ना करने से नुकसान क्या होगा, उसकी लिस्ट बनाए। वो लिस्ट भी 300 बार पढ़े। तीन बार हर रोज, 100 दिन तक पढ़े। बस। फिर आप मजबूत रहेंगे। आपका संकल्प नहीं टूटेगा। टूटेगा, तो महीने में एक-दो बार टूटेगा, बस। फिर अगले दिन, तीसरे दिन फिर आप मजबूत हो जाएंगे। ये उपाय। हां, बोलिए।
पूरा हो गया। जी, जी। आपका प्रश्न है स्वभाव या संस्कार को बदला जा सकता है या नहीं? उत्तर है जी हां, बदल सकते हैं। जिसको हम मोटी भाषा में स्वभाव कह देते हैं, वो वास्तव में स्वभाव नहीं है। ये तो हम मोटी भाषा में बोल देते हैं। दर्शन की भाषा में स्वभाव शब्द का अर्थ अलग है और लोक व्यवहार की भाषा में स्वभाव शब्द का अर्थ अलग है। दर्शन की भाषा में तो ये है कि स्वभाव नहीं बदल सकता। स्व-भाव, जो किसी पदार्थ का अपना गुण हो। भाव माने गुण, स्व माने अपना। किसी पदार्थ का जो अपना ओरिजिनल गुण है, उसको स्वभाव कहते हैं। जैसे गर्मी है, यह अग्नि का अपना गुण है। हां या ना? क्या गर्मी अग्नि ने कहीं से उधार ले रखी? वो तो अपनी है ना उसकी। लेकिन चूल्हे पर पानी को रख दे और पानी गर्म हो जाएगा अग्नि के संपर्क से। अब जो गर्म पानी है, उसमें जो गर्मी है, वो पानी का अपना गुण है या अग्नि से उधार ले रखा है? तो जो उधार ले रखा है, उसको नैमित्तिक गुण कहते हैं। क्या बोलेंगे? नैमित्तिक मतलब कारण, किसी कारण से वो प्राप्त हुआ गुण है, उसका अपना नहीं है। बाहर से ले रखा है। उसका नाम है नैमित्तिक गुण। और जो उसका अपना गुण है, किसी पदार्थ का, वह है स्वभाव। तो गर्मी जो है, वो अग्नि का तो स्वभाव है, उसका तो अपना ही है गर्मी अग्नि का। लेकिन पानी में जो गर्मी आई है, वो अग्नि के संपर्क से आई। वो स्वभाव नहीं है पानी का। आप चूल्हे से पानी नीचे उतार दो, दो घंटे में ठंडा हो जाएगा, वापस वैसा ही जैसा पहले था। ठीक है। तो स्वभाव का अर्थ है, जो कभी बदल नहीं सकता। ये तो दार्शनिक परिभाषा है।
अब लोक व्यवहार में, जो हम हिंदी भाषा बोलते हैं और भाषाएं बोलते हैं, उसमें हम स्वभाव शब्द का जो प्रयोग करते हैं, वो इस अर्थ में नहीं है। जैसे कोई व्यक्ति क्रोध करता है, रोज क्रोध करता है, दिन में छह बार गुस्सा करता है। बार-बार गुस्सा करता है, जो आदमी आ उसी गुस्सा करता है, तो लोग क्या कहते हैं? यह बड़ा क्रोध स्वभाव का। उसको स्वभाव कह देते हैं। स्वभाव नहीं है वास्तव में। उसने एक आदत बना ली है। जो स्वभाव है, वो आदत है। और आदत कैसे होती है? जब किसी काम को हम बार-बार रिपीट करते हैं, दोहराते हैं, तो धीरे-धीरे धीरे उसकी इतनी स्थिति बन जाती है, उसको हम आदत (हैबिट) के नाम से बोलते हैं। उसी का नाम स्वभाव है। यह बड़ा क्रोधी स्वभाव का है। यह लोभी आदमी है, यह लोभी स्वभाव का है। यह अभिमानी स्वभाव का है। अभिमान कोई स्वभाव नहीं है। वो हट सकता है। हट सकता है। लोभ हट सकता है। कंजूसी हट सकती है। ये स्वभाव नहीं है। इन सब का कारण है। वो कारण है [संगीत] अविद्या। क्या कारण? अविद्या। अविद्या के कारण व्यक्ति में लोभ आता है, क्रोध आता है, अभिमान आता है। सारे दोष आते हैं। सारे दोषों का मूल कारण अंत में अविद्या मिलेगी। तो यदि हम अविद्या को हटा दें, तो क्रोध भी हट जाएगा, लोभ भी हट जाएगा, स्वार्थ भी हट जाएगा और वो भी हट जाएगा, अभिमान भी हट जाएगा। ये सारे नैमित्तिक दोष हैं। ये स्वाभाविक नहीं हैं। इसलिए इनको बदला जा सकता है। अविद्या के कारण ये सारे दोष पैदा हुए।
अब इसको हटाने के लिए इससे उल्टा काम करना पड़ेगा। अगर ठंडी लगती हो, ठंडी को दूर करना हो, तो क्या करेंगे? आग जलाएंगे, गर्म कपड़े पहनेंगे, कुछ गर्मी का इस्तेमाल करेंगे, ठंडी दूर हो जाएगी। और मई-जून में गर्मी बहुत बढ़ गई, तो तो उसको दूर करने के लिए फिर पंखा चलाएंगे, कूलर चलाएंगे, एसी चलाएंगे, स्नान करेंगे, तो ठंडक का इस्तेमाल करेंगे, गर्मी दूर हो जाएगी। गर्मी का इस्तेमाल करेंगे, ठंडक दूर हो जाएगी। इससे पता चलता है कि दो आपस में विरोधी तत्व एक दूसरे के नाशक होते हैं। गर्मी और ठंडी एक दूसरे के विरोधी हैं और दोनों एक दूसरे के नाशक हैं। अब अविद्या हमारे सब दोषों का मूल कारण है। लोभ का, क्रोध का, ईर्ष्या का, अभिमान का, स्वार्थ का। इन सारे दोषों का मूल कारण अविद्या है। अब अविद्या का नाश करना, उसका उपाय आठवें नियम में लिखा है महर्षि दयानंद जी ने। अरे समाज का आठवां नियम बोलिए। अविद्या का नाश। बस। यह समाधान है। विद्या अविद्या का शत्रु है। तो जैसे-जैसे विद्या बढ़ेगी, अविद्या कम होती जाएगी। अविद्या कम होती जाएगी, क्रोध कम होता जाएगा, लोभ कम होता जाएगा, अभिमान कम होता जाएगा। ये सारे दोष ऑटोमेटिक कम होते जाएंगे। इसलिए संस्कारों को बदला जा सकता है। और इसी को मोटी भाषा में स्वभाव कहते हैं। यह वास्तव में स्वभाव नहीं है। लोक व्यवहार की भाषा में ये स्वभाव है, इसको बदल सकते हैं। विद्या, तपस्या, ये साधन हैं। विद्या प्राप्त करो, तपस्या करो, ये सब ठीक हो जाएगा। ठीक है।
माता-पिता से भी मिलते हैं, पड़ोसी से भी मिलते हैं, क्लास वालों से मिलते हैं, सरकार से मिलते हैं, समाज से मिलते हैं, हमारी पुस्तक से मिलते हैं, हमारे टीचर से मिलते हैं, हमारे पूर्व जन्म के भी संस्कार होते हैं। ये 10-11 कारण बताए थे। इन कारणों से हमारा उन्नति भी हो सकती है, विनाश भी हो सकता है। दोनों काम हो सकते हैं। उसमें ये 10-11 कारण हैं। और इसमें सबसे बड़ा कारण हमारे पूर्व जन्म के संस्कार, सबसे बलवान कारण। एक वो और दूसरा हमारा वर्तमान का पुरुषार्थ। दो सबसे बड़े कारण हैं। और ये दोनों हमारे आधीन। इसलिए कहा जाता है, जब तक मैं नहीं चाहूंगा, तुम मेरा कुछ नहीं कर सकते। अगर मैंने यह ठान लिया है कि मुझे बिगड़ना नहीं है, तो आप मुझे सुधार नहीं सकते। और अगर मैंने यह ठान लिया, मुझे सुधारना है, आप मुझे बिगाड़ नहीं सकते। कितना भी जोर लगाओ, वो सब कुछ मेरे अधिकार में है। इसीलिए कहा जाता है, व्यक्ति कर्म करने में स्वतंत्र है। मैं आपको नहीं सुधार सकता तब तक, जब तक आप सुधरना नहीं चाहते। हां, दोरा क्या बोला? जब तक आप सुधरना नहीं चाहते, कोई दुनिया में नहीं सुधार सकता आपको। मैं भी नहीं, कोई दूसरा भी नहीं। और यदि आप सुधरना चाहते हैं, तो फिर बस। दूसरे तो थोड़ा इशारा करेंगे, थोड़ा सा गाइडेंस देंगे, ऐसे कर लो। आप फटाफट कर लेंगे, क्योंकि आप सुधरना चाहते हैं। इसलिए सुधार हो जाएगा। आप नहीं चाहते, तो कुछ नहीं होगा। कोई कितने भाषण मारे, कितनी किताबें लिखे, कितने पढ़ते रहो, कुछ नहीं होने वाला। रावण को देखो, कितनी किताबें पढ़ी, कितना मेहनत की, उसने राजा बन गया, सब कुछ तपस्या की। फिर भी बेचारा नहीं सुधरा, क्योंकि उसने कसम खा रखी थी, मैं नहीं सुधरूंगा। तुम कर लो क्या करोगे? दुर्योधन को भी बहुत समझाया श्री कृष्ण जी ने भी समझाया, बहुत लोगों ने समझाया। उसकी समझ में आई नहीं। आई तो ये उदाहरण ठीक।
तो उसको सावधान रहना चाहिए कि मुझे 15 दिन तक मैंने गुस्सा नहीं किया, तो आज सवा दिन है, तो आज गुस्से वाली घटना आई है, तो मुझे आग बबूला नहीं होना है। मुझे कंट्रोल रखना है। और फिर भी वो कंट्रोल नहीं कर पाया, तो थोड़ा गुस्सा करें। पूरा गुस्से में नहीं आ जाए। ढीला ना छोड़ दे अपने आप को। अगर आप मन को ढीला छोड़ देंगे, बस आज तो जो होगा, होने दो। फ तो गए। फिर कंट्रोल नहीं कर सकते। उस समय गुस्सा करते-करते भी अपने आप को कंट्रोल करें। मुझे गुस्सा ज्यादा नहीं करना है, थोड़ा ही करना है, बस। ये मुसीबत निपटा नहीं है। एक मामला निपटाना है, जैसे-तैसे। इससे पीछा छुड़ाना। ऐसा सोचकर आप अंदर से अपने आप को कंट्रोल करते रहेंगे, तो आप बहुत गुस्सा नहीं करेंगे, थोड़ा ही करेंगे। जिसको गुस्सा छोड़ना हो, उसकी यही पद्धति है। उसको यही करना पड़ेगा। गुस्सा करते समय भी कंट्रोल करो। और करने के बाद फिर संकल्प करो कि आज गलती हुई, अब नहीं करेंगे। फिर उसका दंड लो। ऐसे होती तपस्या। जो ऐसे करता है, वो जीत जाएगा। वो गुस्सा ठीक कर लेगा। और जो इस तरह मेहनत नहीं करेगा, वो 10 जन्म में भी नहीं कर पाएगा। ऐसे ढीला-ढीला चलता रहेगा, गुस्सा करता रहेगा, उसका सुधार नहीं हो सकता। बोलिए, कोई ऑनलाइन वाले प्रश्न आए क्या? देखिए। हां, आप बोलिए।
बहुत सारे पैराग्राफ। 20 साल लग जाएंगे। कोई बात नहीं। एक बच्चे को, 5 साल के बच्चे को पूछते हैं। हां बेटा, तुम क्या बनोगे? वो कहता है, मुझे तो पता नहीं। फिर माता-पिता उसको सिखाते हैं, रटवाते हैं। बोलो, मैं डॉक्टर बनूंगा। 5 साल का बच्चा रट लेता है।
है वाक्य। मैं डॉक्टर बनूंगा। अब तीन दिन में बन जाएगा? कितना टाइम लगेगा? 25 साल लगेंगे? 30 साल लगेंगे? तब जाकर डॉक्टर बनेगा। अगर वो यह मान ले कि तो मैं डॉक्टर तो कब बनूंगा? 30 साल लग जाएंगे। फिर वो डिप्रेशन में चला जाएगा। उसको ऐसे नहीं सोचना। उसको यह सोचना, ठीक है। मेरे पिताजी ने मुझे सिखाया है कि मुझे डॉक्टर बनना है। मैं डॉक्टर बनूंगा। तो जैसे-जैसे बताएंगे, मैं वैसे-वैसे करूंगा। जैसे माता-पिता बताएंगे, जैसे टीचर्स बताएंगे, जो किताब बताएंगे, वो पढ़ूंगा। तो धीरे-धीरे, धीरे-धीरे 30 वर्ष में मैं डॉक्टर बन जाऊंगा। इतना उसको कॉन्फिडेंस होगा और वह माता-पिता के निर्देश पर चलेगा तो गारंटी से वो डॉक्टर बन जाएगा। और जो पहले ही सोच ले, साहब, मैं तो नहीं बन सकता। मेरे बस का तो नहीं है। इस 30 साल तक कौन मेहनत करेगा? फिर नहीं बन पाएगा। आपके लिए भी वही उत्तर है। आप ये मत सोचो कि मैं तो कब बनूंगा? 20-3 साल लगेंगे। 20 साल तो मान ही लो कम से कम। आपको ये जो किताब पढ़ी है ना, जो किताब लिखी है सत्य की खोज, इस पुस्तक को कम से कम, कम से कम 20 बार पढ़ना पड़ेगा। और ज्यादा कहूं तो फिर 50 बार पढ़ना पड़ेगा। इसको 20, 30, 50 बार पढ़े तो आपको समझ में आएगा कि हम कहां-कहां गलतियां करते हैं। सोचने में कहां गलती करते हैं, बोलने में कहां गलती करते हैं। तो गलतियां समझ में आएंगी। फिर उन गलतियों को दूर करने के लिए आप मेहनत करेंगे। उसमें 20 साल लग जाएंगे, 30 साल लग जाएंगे। तब जाकर आप कुछ ठीक-ठाक बोल पाएंगे, ठीक-ठाक सोच पाएंगे और ठीक-ठाक काम कर पाएंगे। और अगर इतना सीख लिया तो आप गारंटी देता हूं, मेरी लाइन में आ जाएंगे। भी बता देता हूं, जो न्याय पढ़ लेगा, न्याय विद्या को समझ लेगा, वह सन्यासी बनेगा, मोक्ष में जाएगा। क्यों? यह न्याय विद मोक्ष के लिए है। और इसके दोनों फायदे। लौकिक व्यवहार में भी फायदा है, मोक्ष में भी। दोनों में फायदा है। अब मेरी बात सुन। यह मत डर जाना कि हम तो सन्यासी बनना पड़ेगा, घर छोड़कर भागना। ना बाबा, हम नहीं पढ़ते ऐसी किताब। ऐसा मत समझना। यह तो आपके ऊपर है। एक व्यक्ति ने लक्ष्य बनाया, मैं एमटेक पढूंगा। एमटेक तक की पढ़ाई करूंगा। फिर उसको स्कूल भेजना शुरू कर दिया। प्राइमरी स्कूल में पढ़ता गया, पढ़ता गया, पढ़ता गया। 12वीं तक पढ़ के वो थक गया। बोला जी, अब मेरे से नहीं पढ़ा जाता। बस। तो उसकी मर्जी, आगे पढ़े ना पढ़े। रास्ता तो वही है ना एमटेक तक पहुंचने का। पहली, दूसरी, तीसरी, 12वीं तक तो जाना ही पड़ेगा। उसके बाद हो तो आगे पढ़े, ना हो तो ना पढ़े। तो यह मोक्ष का मार्ग है। जो न्याय विद्या हमको मोक्ष तक पहुंचाती है। पहले ही सूत्र में लिखा है, 16 पदार्थों के तत्व ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। तो यह मोक्ष तक का रास्ता है। फिर आपकी इच्छा है, आप मोक्ष तक जाओ, चाहे आधे रास्ते में जाओ, चाहे कितना भी जाओ। वो आपकी मर्जी है। मैं तो यह कह रहा हूं कि इस विद्या को पढ़ने से आपको पहले तो संसार में जीना आ जाएगा। जीने की कला है ये। संसार में जो न्याय विद्या नहीं जानता, उसको जीना नहीं आता। उसको सोचना नहीं आता। उसको बोलना नहीं आता। वो 80 साल का बूढ़ा होकर भी गलतियां करेगा। सोचने में भी गलती करेगा, बोलने में भी गलती करेगा। समझ में भी नहीं आएगी उसको। समझ में तब आएगी जब इन चीजों को पढ़ेगा। जो मैथ्स की विद्या पढ़ेगा, उसी को ही तो पता लगेगा मैंने हिसाब में कहां गलती की। जो मैथ्स पढ़ेगा ही नहीं, तो उसको गलती क्या समझ में आएगी? नहीं आएगी। तो यह वो गलतियां हैं 54, जो महर्षि गौतम जी ने बताई। मैंने तो आपकी भाषा में, हिंदी भाषा में उसको आपको पढ़ा दी, सुना दी, प्रस्तुत कर दी। बस मैं तो प्रस्तुता मात्र हूं। मैंने अपनी ओर से कुछ नहीं लिखा। जो भी लिखा, ऋषियों की बात लिखी। आपके फायदे के लिए। जो पढ़ेगा, सीखेगा, लाभ उठाएगा, उसको मजा करेगा। और नहीं करेगा तो नहीं करेगा। दुखी। ठीक है। तो हिम्मत बनाओ कि मैं सीखूंगा, पढूंगा, समझूंगा और अपनी गलतियों को दूर करूंगा। हां जी, बोलिए। पीछे जी, ऐसा ही है। आपको आपको धंधा करना है। दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। जैसे आपको व्यापार में लाभ कमाना है, प्रॉफिट कमाना है। ठीक है। तो व्यापार में प्रॉफिट कैसे कमाएंगे? पहले इन्वेस्टमेंट करेंगे। अगर इन्वेस्टमेंट नहीं करेंगे तो प्रॉफिट नहीं मिलेगा। और प्रॉफिट मिलेगा तो उसको इन्वेस्ट करेंगे। तो यह क्या? इसको क्या बोलेंगे? पैराडॉक्स बोलेंगे या एक दूसरे के पूरक हैं? यह आपके पास कुछ मूल जमा पूंजी होनी चाहिए। कुछ तो कैपिटल। कैपिटल कहीं से तो शुरू करेंगे ना? तो कुछ कैपिटल आपके पास होनी चाहिए, जिसको आप बिजनेस में इन्वेस्ट करेंगे। फिर इन्वेस्टमेंट करेंगे, मेहनत करेंगे तो ऊपर से प्रॉफिट कमाएंगे। जो प्रॉफिट मिलेगा, उसको रीइन्वेस्ट करेंगे। रीइन्वेस्टमेंट के बाद और प्रॉफिट कमाएंगे। तो जैसे व्यापार में चलता है, ऐसे यहां भी चलता है। कुछ आपके पास संस्कार होने चाहिए। पिछले कुछ संस्कार होने चाहिए। उन संस्कारों से आप कर्म करेंगे। फिर जो-जो कर्म करते जाएंगे, उनसे वैसे ही संस्कार बनते जाएंगे। और यह चक्र भी ऐसे ही चलेगा। कर्म से संस्कार, संस्कार से कर्म। तो इसमें कोई दोष नहीं है। एक दूसरे के पूरक हैं। सपोर्टर, सपोर्ट करने वाले। जी हां जी, बोलिए। हम ठीक है, ठीक है, ठीक है। हम ठीक है। मेहनत की। ठीक है, ठीक है। आपका प्रश्न यह है कि 50 साल तो मेहनत की इंजीनियरिंग में पढ़ाई की। 20 साल, 30 साल इंजीनियरिंग जॉब किया। तो 50 साल तो इस लगाए। फिर अध्यात्म में आ गए। 20 साल उसमें मेहनत की। तो अब आपका प्रश्न है कि अगले जन्म में कौन सा संस्कार बलवान होगा? यही प्रश्न है ना? तो उत्तर यह है कि दोनों संस्कार आपके साथ चलेंगे। जिसमें आपने ज्यादा मेहनत की, ज्यादा रुचि रखी। टाइम की बात नहीं है। टाइम कम अधिक हो सकता है। आपकी जो तीव्रता थी, वह किसमें अधिक थी? यह इंपॉर्टेंट है। अगर इंजीनियरिंग में तीव्रता अधिक थी, तो उसके संस्कार बलवान होंगे। अगर अध्यात्म में तीव्रता अधिक थी, तो उसके संस्कार बलवान होंगे। पर होंगे तो दोनों ही। तो यह दोनों साथ चलेंगे। अगले जन्म में। फिर अगले जन्म में बचपन से आपको माता-पिता कहेंगे, भाई, इसको पढ़ना लिखना है, विद्वान बनना है, कुछ पैसे भी कमाने, घर भी चलाना है। तो इसको स्कूल की पढ़ाई तो पढ़नी पड़ेगी। इसके बिना तो भूखा मरेगा। तो आपको स्कूल की पढ़ाई के लिए भी प्रेरित करेंगे। फिर थोड़े-थोड़े आपके अध्यात्म के भी संस्कार हैं। आपकी वो भी रुचि। आप उस तरफ भी चलेंगे। वह संस्कार आपको उस दिशा में ले जाएंगे। तब पेरेंट्स देखेंगे, इसके पढ़ाई के तो हैं ही रुचि के पढ़ाई में तो रुचि है ही, थोड़ी-थोड़ी अध्यात्म में भी है। तो देखेंगे कि अब इसको अध्यात्म के लिए भी सपोर्ट करें या ना करें। वो फिर पेरेंट्स के ऊपर डिपेंड करता है। यदि आपके कर्म बहुत अच्छे रहे हैं, तो ईश्वर आपको ऐसे ही पेरेंट्स देगा, जो आपको अध्यात्म में भी सपोर्ट करेंगे। तो आपके दोनों संस्कार चलेंगे। दोनों तरफ रुचि होगी। दोनों तरफ आप मेहनत करेंगे। आपके पेरेंट्स भी अगले जन्म में दोनों तरफ आपको सपोर्ट करेंगे। फिर अगली बात आपके हाथ में। फिर आपकी मेहनत है। आप किस दिशा में ज्यादा मेहनत करते हैं। थोड़ा बहुत संसारी व्यवहार के लिए आपने स्कूल, कॉलेज की पढ़ाई भी कर ली, ताकि दो रोटी कमाने लायक हो जाए। व्यवहार भी ठीक हो जाए, बुद्धि भी विकास हो जाए। इतना तो लौकिक व्यवहार आपने कर लिया, सीख लिया। और फिर ज्यादा जोर लगाया अध्यात्म में, तो पेरेंट्स आपको फिर उस दिशा में सपोर्ट करेंगे। ठीक है, भाई। अब तुम इधर करो। रोटी कमाने लायक तो हो ही गए। वो भी तो जरूरी है। उसके बिना तो काम नहीं चलता। तो वो भी हो गया। और साथ में अध्यात्म की और चीजें हैं। तो उस और भी वो सपोर्ट करेंगे। आगे फिर आपकी इच्छा है। आप किस तरफ ज्यादा मेहनत करते हैं। वो आप पर डिपेंड करता है। ठीक हो गया। बोलो। आय प्रश्न। बोलिए। मन में उठने वाले गलत विचारों को कैसे रोका जाए? तो इसका उत्तर है, दंड को याद रखें। अभी बताया था, दंड के बिना कोई सुधरता नहीं। तो मन में जो गलत विचार उठते हैं, उसके बारे में यह सोचे कि ये विचार मैं उठाऊंगा तो मुझे दंड मिलेगा। गलत विचार उठाऊंगा, गलत योजना बनाऊंगा। गलत योजना बनाऊंगा तो गलत आचरण करूंगा। गलत आचरण करूंगा तो ईश्वर मुझे छोड़ेगा नहीं। और समाज भी देख लेगा। अगर समाज की पकड़ में आ गए, तो समाज भी दंड देगा। सरकार भी दंड दे सकती है। और समाज, सरकार की पकड़ में नहीं भी आया, तो ईश्वर तो छोड़ेगा नहीं। वो तो पकड़ता ही है। वो कर्म करते समय भी पकड़ता है, योजना बनाते समय भी पकड़ता है। उससे तो बच नहीं पाऊंगा। और वो फिर मुझे दंड देगा। सूअर बनाएगा, सांप बनाएगा, बिच्छू बनाएगा, भेड़िया बनाएगा, शेर बनाएगा, वेल मछली बना देगा। कुछ ऐसे खतरनाक दंड देगा। वृक्ष बना देगा। तो मैं ऐसा बनना नहीं चाहता। इसलिए मैं गलत काम नहीं करूंगा। गलत भाषा नहीं बोलूंगा। गलत आचरण नहीं करूंगा। और गलत विचार भी नहीं उठाऊंगा। ऐसा व्यक्ति को करना पड़ेगा। दंड को याद रख के वो गलतियों से और गलत विचार उठाने से बच सकता है। और यह भी दिमाग रखे कि विचार आते नहीं हैं। मैं ही उठाता हूं। विचारों को उठाना मेरे अधिकार में है। मैं चाहूंगा, वो तो अच्छे विचार उठाऊंगा। मैं चाहूंगा तो गलत उठाऊंगा। मेरी मर्जी। मैं स्वतंत्र हूं। मन जड़ वस्तु है। मेरे आधीन है। मैं चेतन आत्मा हूं। मैं स्वतंत्र हूं। वो मेरे अधीन है। बुद्धि मेरे अधीन है। वो भी जड़। हाथ, पैर, इंद्रिया, शरीर सब कुछ जड़ है। यह सब मेरी इच्छा से चलते हैं। तो मैं गलत काम नहीं करूंगा। गलत नहीं सोचूंगा। इस तरह से संकल्प करेंगे, विचार करेंगे, अपना सिद्धांत ठीक कर लेंगे, तो धीरे-धीरे आप सफल हो जाएंगे। आप गलत विचार उठाएंगे ही नहीं। अगर आपको सामने पुलिस वाला डंडा लेकर खड़ा तैयार दिखता हो, फिर आप गलत काम करेंगे? नहीं करेंगे ना? तो बस दंड सामने दिख रहा है, तो आप गलती नहीं करेंगे। ईश्वर का दंड सामने रखें। उसको ऐसा समझे। चारों तरफ 24 घंटे आपके बैठा हुआ है। वो जैसे वो सीसीटीवी कैमरा लगा रहता है, 24 घंटे आपके ऊपर नजर रहती है कैमरे की। वो तो चलो एक आध घंटे के लिए होती है। आप निकल जाते हैं बिल्डिंग से, तो फिर कैमरा आपको नहीं पकड़ता। लेकिन ईश्वर का कैमरा तो 24 घंटे पकड़ता है। उससे तो कैसे बचेंगे? तो कैमरा लगा हुआ है 24 घंटे। हमारी रिकॉर्डिंग चालू है। जो भी कर्म करते हैं, वो सब रिकॉर्ड होता है। ईश्वर पूरा न्याय कारी है। माफ करेगा नहीं। तो मैं गलत काम नहीं करूंगा। गलत विचार नहीं उठाऊंगा। ऐसा सोचो। तो आप रोक सकते हैं। और प्रभाव क्या पड़ेगा? जो आप सोचेंगे, जैसी योजना बनाएंगे, जैसा काम करेंगे, वैसा प्रभाव पड़ेगा। गलत योजना बनाएंगे, गलत आचरण करेंगे, तो गलत प्रभाव पड़ेगा। अच्छी योजना बनाएंगे, अच्छा काम करेंगे, तो अच्छा प्रभाव पड़ेगा। काम करने से पहले पांच क्षेत्रों में प्रभाव को चेक करना चाहिए। हां जी, कितने? पांच क्षेत्रों में उस प्रभाव को चेक करना चाहिए। उसके बाद काम करना चाहिए। हमारे गुरु जी ने सिखाया, स्वामी सत्यप्रेमी करूंगा, तो मेरी आदत खराब होगी। मैं दुष्ट व्यक्ति बनूंगा। क्या मैं दुष्ट व्यक्ति बनना चाहता हूं? यदि नहीं चाहता, तो वही ब्रेक लग जाएगी। मुझे चोरी नहीं करनी, झूठ नहीं बोलना, छल कपट नहीं करना, चालाकी नहीं करनी। मैं खुद भ्रष्ट हो जाऊंगा। ठीक है। दूसरा, जब मेरी बातें समाज के लोग पहचानेंगे, मेरी नियत को पहचान लेंगे, मेरे चाल-चलन को पहचान लेंगे, तो मेरे जो परिवार के लोग हैं, वो मेरे बारे में कैसे सोचेंगे? यह तो बेईमान है, छली-कपटी है, धोखेबाज है, झूठ बोलता है, छल-कपट करता है, चोरी करता है। तो मेरे परिवार के ही लोग मुझे खराब मानेंगे। तो मेरा परिवार का उस पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यह सोचे। तीसरा, मेरे समाज के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? समाज, सोसाइटी वाले, गली-मोहल्ले वाले और भी जो हमारे संपर्क में लोग आते हैं, वो मेरे बारे में क्या सोचेंगे? कैसा बेकार आदमी है, इतना खराब आदमी, ऐसा गलत सोचता है, ऐसे गलत काम करता है। तो समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यह तीसरा क्षेत्र हुआ। हां जी, पहला कौन सा? अपने ऊपर क्या प्रभाव पड़ेगा? दूसरा, परिवार के लोगों पर क्या प्रभाव पड़ेगा? तीसरा, समाज के लोगों पर। और चौथा, देश भर के लोगों पर। आजकल तो फटाफट WhatsApp में सूचना निकलती है, पूरे देश में वायरल हो जाती है फटाफट। और फिर कहीं न्यूज़ में आ जाए, तो पूरी दुनिया में चली जाती है। तो देश भर के लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? अगर मेरी गलती, बेईमानी पकड़ी गई तो? तो देश के लोगों पर गलत असर होगा। वो चौथा क्षेत्र। और पांचवा, सारी दुनिया वाले मेरे बारे में क्या सोचेंगे? कि भारत के लोग ऐसे ही होते हैं, झूठ बोलते हैं, चोरी करते हैं, छल-कपट करते हैं। देश भी बदनाम होगा। और दुनिया वाले हमको बेकार समझेंगे। पांच क्षेत्रों में पहले व्यक्ति को प्रभाव देखना चाहिए। और एक छठा और बताया गुरु जी ने। मैं जो गलतियां करूंगा, उसका ईश्वर पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यह छठा। ईश्वर मुझे कैसा व्यक्ति मानेगा? इतना बेकार आदमी है, इतना दुष्ट आदमी है, छल-कपट, बेईमानी करता है, धोखा देता है। इसको छोडूंगा नहीं। इसको छड़ा नहीं। इसको सांप बनाऊंगा। इसको बिच्छू बनाऊंगा। इसको बकरी बनाऊंगा। तो ईश्वर भी तो मुझे खराब समझेगा ना? अच्छा, दुनिया वाले कभी-कभी भ्रांति में भी आ जाते हैं। वो बात को ठीक नहीं समझते। उनको भ्रांति हो जाती है। अथवा कुछ लोग भड़का देते हैं जानबूझ के हमारे विरुद्ध। भड़का देते हैं ना? संजय भाई होता है ना ऐसा? तो कुछ दुनिया वाले हमारे विरुद्ध किसी को भड़का देते हैं। भाई, यह खराब आदमी है। आप इसके ऊपर मत जाना। इस पर ध्यान मत देना। ऐसा भी कह देते हैं। तो हो सकता है संसार वालों को हमारे प्रति भ्रांति हो जाए। हो सकता है। और हो सकता है हम उनकी भ्रांति दूर कर पाए। हो सकता है ना भी कर पाए। तो वो इतना इंपॉर्टेंट नहीं है। मतलब उसका भी है। फिर भी यदि दुनिया वाले लोग प्रति कुछ भ्रांति में है, तो कोई बात नहीं। वो चल सकता है। लेकिन ईश्वर तो भ्रांति में रहता नहीं कभी भी। उसको तो भ्रांति का सवाल ही नहीं। वो तो हमें हर चीज जानता है। सा 24 घंटे साथ रहता है। और वो किसी की फालतू बात सुनता भी नहीं है। मनुष्य एक दूसरे को भड़का सकते हैं। कोई मनुष्य ईश्वर को थोड़ी भड़का सकता है कि इसको खराब आदमी है, तुम अच्छा मत समझना। ईश्वर को तो कोई भड़का भी नहीं सकता। तो दुनिया हमको भ्रांति वर्ष खराब माने, तो कोई ज्यादा च की बात नहीं। लेकिन अगर ईश्वर हमको खराब समझता है, यह दुष्ट आदमी, यह बेईमान, यह धोखेबाज है, यह छली-कपटी है। अगर ईश्वर हमारे बारे में ऐसा सोचता है, वो तो ज्यादा खतरे वाली बात है ना? उसमें तो बहुत नुकसान वाली बात। तो ईश्वर हमको खराब ना समझे। इस बात को प्राथमिकता देनी चाहिए। और वो तभी होगी, जब हम ईमानदारी से काम करेंगे। क्योंकि ईश्वर से तो बच नहीं सकते। तो यह उपाय है, जिससे कि हम बुरे विचारों को रोक सकते हैं। बुराइयों को रोक सकते हैं। बुरे आचरण से बच सकते हैं। अच्छे काम कर सकते हैं। दुनिया में सारे लोग मूर्ख नहीं होते। कुछ समझदार भी होते हैं। वो हमारी असलियत को पहचान लेंगे। दो चार, पांच, 25 लोग हमारी असलियत को पहचान लेंगे, जो लंबे समय तक हमारा परीक्षण करेंगे, वो पहचान लेंगे। और कुछ लोग भ्रांति में रहेंगे, वो रहने दो। कुछ लोग जानबूझ के आरोप लगाएंगे। स्वार्थी, मूर्ख, दुष्ट लोग हैं। उनको लगाने दो। कोई परवाह नहीं। समाज के कुछ चार आदमी आपके पक्ष में रहेंगे, जो आपको पहचानते हैं कि यह सही आदमी। बस उनसे अपनी दोस्ती रखो। खराब लोगों से दूर रहो। झगड़ा नहीं करना। दुष्टों से, मूर्खों से झगड़ा नहीं करना। उनसे दूर रहना। उनसे बच के रहो। बस इतनी करना चाहिए। तो आपका जीवन ठीक-ठाक चलेगा। हां, और क्या प्रश्न है? संसार के भोगों में राग रखने वाले व्यक्ति को सन्यास लेना चाहिए या नहीं? तो राग की स्थिति में उसको सन्यास नहीं लेना चाहिए। पहले राग को दूर करना चाहिए। राग को दूर करो, वैराग्य उत्पन्न करो। जब वैराग्य ऊँचा हो जाए, पूरा योग दर्शन के हिसाब से दृष्टा शक विषय विष्ण वकार संज वैराग्य। यह सूत्र लिखा है योग दर्शन में। तो इस सूत्र के अनुसार जब वैराग्य हो जाए, तब सन्यास लेना चाहिए। उससे पहले नहीं। उससे पहले लेगा, राग की स्थिति में लेगा, तो वो फिर गलतियां करेगा। गलतियां करेगा, तो सन्यास को भी बदनाम करेगा। और उसका जीवन भी खराब होगा। लोग और गाली देंगे। और पकड़ के जेल में भी डाल देंगे। कई तो बैठे हैं जेल में। वो इसलिए गए जेल में, क्योंकि उनको वैराग्य नहीं था। और बिना वैराग्य के सन्यास ले लिया। और फिर उल्टे-सीधे काम किए। आज दंड भोग रहे हैं वो। उससे सन्यास भी बदनाम होता है। वेद भी बदनाम होते हैं। और शुद्ध परंपराएं भी बिगड़ती है। इसलिए राग की स्थिति में सन्यास नहीं लेना चाहिए। पूरी योग्यता करके, तैयारी पूरी करके, फिर लेना चाहिए। महर्षि दयानंद जी ने लिखा है, जो अयोग्य व्यक्ति सन्यास लेवे का, पांचवे समस में सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है, जो अयोग्य व्यक्ति सन्यास लेगा, तो आप भी डूबेगा, दूसरों को भी डोगा। ऐसा लिखा है। हां, और प्रश्न, निदिद्यासन क्या है? तो सत्यार्थ प्रकाश के न समस में चार चीजें लिखी हैं। बोलिए, श्रवण, मनन, निदिद्यासन, साक्षात्कार। ये चार चीजें। इसमें तीसरा है निदिद्यासन। इसको समझने के लिए मैं चारों बताऊंगा, फिर आपको सारी बात क्लियर हो जाएगी। श्रवण का अर्थ होता है, किसी विद्या को पूरे ध्यान से, आंख, कान खोलकर गुरु जी की बातों को सुनना। उस विद्या को अच्छी तरह सुनना, समझना। कक्षा में बैठकर सुनना। पुस्तक साथ में हो, तो पुस्तक पढ़ा रहे, अगर तो पुस्तक भी साथ में रखकर पढ़ना। और गुरु जी की बात को पूरे ध्यान से सुनना। एक भी अक्षर, शब्द मिस नहीं होना चाहिए। क्योंकि एक शब्द भी छूट गया, तो प्रसंग टूट जाएगा। फिर बात समझ में नहीं आएगी। छूट जाए, तो दोबारा पूछो। गुरु जी, यह बात छूट गई, फिर से बताइए। वो फिर बता देंगे। तो पूरे ध्यान से किसी विद्या को सुनना, यह है श्रवण। पहला काम। अब पढ़ कर के कक्षा पूरी हो गई। अपने घर चले गए। अपने कमरे में चले गए। आप जाकर उसको दोहराना। क्या पढ़ा? क्या वाक्य थे? क्या शब्द थे? क्या समझ में आया? क्या नहीं आया? उसको चिंतन, मनन करना। विचार करना। रिवाइज करना। रिपीट करना। यह है मनन। और यह देखना कि यह ठीक है या गलत है? क्या बताया इसमें? कितनी बात बताई इसमें? कितनी बात ठीक है? कितनी बात गलत? यह सारा उहा विचार करना। इसका नाम है मनन। इस मनन को करते-करते अंत में एक निर्णय होगा। एक कंक्लूजन आएगा। सार निकलेगा कि यह बात ठीक है। यह बात गलत। गुरु जी ने कहा कि क्रोध मत करो। कक्षा में बैठकर सुन लिया, यह श्रवण है। फिर बैठ के अपने कमरे में चिंतन किया कि क्रोध करना ठीक है या ना करना ठीक है? लोग तो कहते हैं, क्रोध के बिना तो घर नहीं चलता। गुस्सा नहीं करेंगे, तो बच्चे बिगड़ जाएंगे, परिवार बिगड़ जाएगा, देश बिगड़ जाएगा। दंड तो देना ही पड़ता है। तो क्रोध तो करना चाहिए। ऐसे तर्क उठेगा। फिर उसका उत्तर आपको ढूंढना पड़ेगा कि गुस्सा करेंगे, तो फिर आदत खराब होगी। फिर बीपी बढ़ेगा और एसिडिटी होगी, पागलपन आएगा, चिड़चिड़ापन आएगा। तो क्रोध में तो बहुत नुकसान है। इसलिए क्रोध नहीं करना चाहिए। तो दो पक्ष बनेंगे। क्रोध करना चाहिए। दूसरा होगा, नहीं करना चाहिए। इन दोनों में टक्कर बजेगी। अपने मन में खूब टक्कर बजेगी। करना चाहिए कि नहीं करना चाहिए? इसका नाम मनन है। यह सारा मनन करते-करते अंत में एक सार निकलेगा। क्या निकलेगा? या तो क्रोध करना चाहिए, या तो नहीं करना चाहिए। दो में से एक ना एक कंक्लूजन तो होगा। तो जो दो में से एक कंक्लूजन आएगा, वो कंक्लूजन वही आना चाहिए, जो श्रवण में सुना था। गुरु जी ने क्या पढ़ाया था? क्रोध करना चाहिए या नहीं? नहीं करना चाहिए। तो आप कितना भी तर्क-वितर्क उठाओ, अंत में निर्णय यह होना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए। गुरु जी ने ठीक पढ़ाया। और जो दुनिया वाले बात करते हैं, वो बेकार। वो कुतर फालतू की बातें। जो कहते हैं करना चाहिए, वो गलत। जो शास्त्र की बात है, वो सही है। इस तरह का मन में निश्चय करना। उस मनन के बाद यह निर्णय करना कि जो शास्त्र में लिखा है, वही ठीक है। यह जो मन में आपने निश्चय किया कि क्रोध नहीं करना चाहिए, इस निश्चय का नाम है निदिद्यासन। [संगीत] बोलिए, समझ में आया? तो अंत में निर्णय वही होना चाहिए। उल्टे वाला निर्णय मत कर लेना कि हां, हां, करो, तो करना चाहिए। सब मामला जाएगा। तो निर्णय आपका वही होना चाहिए, जो शब्द प्रमाण कह रहा है कि क्रोध नहीं करना चाहिए। लोभ नहीं करना चाहिए। छल-कपट नहीं करना चाहिए। धोखा नहीं देना चाहिए। यही निर्णय आना चाहिए। इस निर्णय का नाम निदिद्यासन है। अब जो आपने निर्णय कर लिया कि क्रोध नहीं करना, छल-कपट नहीं करना, इस बात को प्रैक्टिकल करो। आचरण में लाओ। व्यवहार में लाओ। कि जब अवसर आए, तब गुस्सा नहीं करना। अवसर आए, तो लोभ नहीं करना। अवसर आए, तो छल-कपट नहीं करना। ईमानदारी से करना। न्याय से व्यवहार करना। यह जो प्रैक्टिकल आचरण है, इसका नाम है साक्षात्कार। यह चौथी चीज। तो जो व्यक्ति ये चार काम पूरे करता है, उसको विद्या ठीक से समझ में आती है। और वह उस विद्या का पूरा लाभ लेता है। यह ऋषियों ने बताया। बोलिए, दिनेश जी, ठीक है। पहला, अपने ऊपर सोचना चाहिए कि मैं यदि यह काम करूंगा, तो मुझ पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? माय सेल्फ। दूसरा, मेरे परिवार के लोग क्या सोचेंगे? उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? तीसरा, हमारे सोसाइटी, समाज, गली-मोहल्ले वाले क्या सोचेंगे? उन पर क्या प्रभाव पड़ेगा? यह तीसरा। चौथा, देश भर के लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मुझे अच्छा मानेंगे या खराब मानेंगे? यह चौथा। देश के लोगों पर प्रभाव। और छठा, दुनिया भर के जो बाकी विदेशी लोग हैं, वो क्या सोचेंगे हमारे बारे में? यह पांच क्षेत्र। और छठा, ईश्वर। ईश्वर क्या सोचेगा? मुझे कैसा मानेगा? यह छह बातें सोचकर, जब ऐसा लगे कि हां, ये सब लोग ठीक सोचेंगे, अच्छा सोचेंगे, या इनमें से अधिकांश लोग ठीक सोचेंगे। ईश्वर का सबसे पहला है। उसको तो बहुत पूरा ध्यान देना। ईश्वर अगर मुझे अच्छा मानेगा, फिर तो ठीक है। मैं कर लूंगा। दुनिया माने ना माने, परवाह नहीं है। पर ईश्वर मुझे खराब ना माने। बस इस बात को हमेशा ध्यान में रखें। आप कभी गलती नहीं करेंगे। पहला कर दो। एक सबसे पहला। ईश्वर प्रायोरिटी की दृष्टि से सबसे अधिक महत्व ईश्वर का है। दुनिया वाले तो फिर क्या समझेंगे? वो कोई हमारी बहुत हमारे हाथ की बात नहीं है। समझेंगे तो अच्छी बात है। ना समझे तो कोई चिंता भी नहीं। ईश्वर हमको अच्छा माने। बस इस बात की प्रायोरिटी है। जी, बोलिए। स्थित प्रज कैसे रहा जाए? हां, वेदों के हिसाब से स्थित प्रज कैसे रहा जाए? बुद्धि को कैसे स्थिर रखा जाए? यही सारे उपाय हैं, जो अभी बताए। यह जो पांच, छह प्रभाव बताए ना, छह क्षेत्रों में प्रभाव देखें कि मैं जो काम करूंगा, तो छह क्षेत्रों में उसका क्या प्रभाव पड़ेगा? इसको हमेशा दिमाग में रखिए। तो स्थित प्रज बने रहेंगे। आपकी बुद्धि बिगड़ेगी नहीं। और आप ठीक निर्णय लेंगे, ठीक काम करेंगे। अगर यह विचार आपने सोचना छोड़ दिया, तो फिर कोई गारंटी नहीं। आप फल जाएंगे इधर-उधर। हां जी, बोलो। अद्वैतवाद का सिद्धांत क्या है? समय का भी ध्यान रखना। कब तक चलाना है? मुझे बता देना, तब तक मैं चलाऊंगा। जब तक आपके प्रश्न चल रहे हैं, मैं चालू रखूंगा। फिर मुझे नहीं कहना, समय बढ़ा दिया। हां, तो आप बताओ, कब तक चलाना है? दो-चार, पांच मिनट में। पांच मिनट में पूरा करते हैं। ठीक है। अद्वैतवाद का मतलब है, अ-द्वैत। दो पदार्थ नहीं मानने। एक ही मानना। उसको अद्वैतवाद कहते हैं। वाद माने सिद्धांत। ऐसा सिद्धांत, जिसमें एक ही वस्तु की सत्ता स्वीकार की जाती है, दूसरी नहीं। उसको अद्वैतवाद कहते हैं। एक ही वस्तु ईश्वर। बस केवल ब्रह्म है। और कुछ नहीं। ना कोई जीव है, ना कोई प्रकृति है। केवल एक वस्तु ब्रह्म ही है, ऐसा मानना अद्वैतवाद कहलाता है। ठीक है। बोलिए। वो ये कहते हैं, प्रू तो होगा नहीं। झूठ है ये। सत्य थोड़ी है। आप सत्य को झूठ कैसे बना देंगे? वो प्रमाणित कुछ नहीं करते। फालतू बोलते हैं। वो कहते हैं, केवल एक ब्रह्म है और कुछ नहीं। जो आपको जगत दिख रहा है, आपको भ्रांति है, ऐसा वो कहते हैं। भ्रांति हमको नहीं है। भ्रांति उनको है। और हमको क आपको भ्रांति? खुद भ्रांति में और हमको भ्रांति बता रहे? यह लोहा, लकड़ी, रोटी, खाना, पीना, यह ब्रह्म है क्या? ब्रह्म का लक्षण बताओ। ब्रह्म जड़, चेतन। यह रोटी, कपड़ा, मकान, स्कूटर, कार, यह चेतन? तो फिर उनकी बात कट गई। झूठ बोलते वो। सारा ब्रह्म है? ब्रह्म कहां है? यह जड़ पदार्थ है। यह ब्रह्म से अलग है। ब्रह्म चेतन है। यह जड़ है। इसलिए वेद के अनुसार तीन पदार्थ, त्वाद। वो ठीक है। यह प्रकृति है, जो जड़ है। यह अलग चीज है। ब्रह्म अलग चीज है। वो सर्वज्ञ है, सर्वशक्तिमान है, शुद्ध स्वरूप है। वो झूठ, छल, कपट, चोरी, बेईमानी, घोटाला कभी नहीं करता। दूसरा प्रश्न क्या? संसार में ये चोर, डाकू, लुटेरे, हत्यारे, आतंकवादी, अपहरणकर्ता हैं या नहीं? क्या ये सारे ब्रह्म? ऐसे काम करता है क्या? तो सिद्ध हुआ, नाय झूठ बोल रहा है। अगर केवल ब्रह्म है, तो ये चोर, डाकू, लुटेरे, सारे के सारे ब्रह्म मानने पड़ेंगे आपको। यह तो ऋषियों के वेदों के विरुद्ध है। बुद्धि से भी विरुद्ध है। ब्रह्म ऐसे चोरी, ती करता हो? इसलिए इनकी बात झूठ है। प्रमाण कुछ नहीं है। सिर्फ मूर्खता की कल्पना है। और खुद भटके हुए, दूसरे को भटका रहे। सत्य है वेदों की बात। उसने कहा, तीन वस्तु। आद। ईश्वर अलग है। वो सर्वथा शुद्ध है। आत्मा उससे अलग है। वो आप और हम हैं। हम कभी अच्छे काम करते हैं, कभी गलत करते हैं। हम भ्रांति में पड़ जाते हैं, संशय में पड़ जाते हैं। और अच्छे-बुरे कर्म करते रहते हैं। अपना कर्म का फल भोगते हैं। हम सब आत्माएं हैं। हम ब्रह्म से अलग वस्तु है। और तीसरा, यह प्रकृति, जड़ पदार्थ है, जो खाने-पीने के काम आती है। स्कूटर, कार, यात्रा में काम आती है। कपड़ा पहनने के काम आता है। यह जड़ पदार्थ है। ऐसे तीन पदार्थ हैं। अनादि। इसको हितवाद कहते हैं। वेदों का यही सिद्धांत है। यही सत्य है। हां जी, बोलिए। लालचंद जी, ठीक है, ठीक है, ठीक है। हम ठीक है। समझिए। ठीक बात है। हम मैंने अभी बताया तो था। आप किसी को सुधार नहीं सकते। आपके हाथ में नहीं है। उसका आपको दुखी नहीं होना है। आपको अपने ऊपर संयम रखना है। अपना संयम नहीं खोना है। मन, बुद्धि को कंट्रोल में रखना है। और रास्ता ढूंढना है कि इसका क्या समाधान? तो इसका समाधान है, एजुकेशन से। सिस्टम और एजुकेशन मिनिस्ट्री, जो शिक्षा मंत्रालय है, उसको जाकर समझाओ। वो जो पढ़ा रहे हैं, प्रिंसिपल विद्यार्थियों को स्कूलों में, सिलेबस में वही पढ़ाया जा रहा है। तो उसका जो जड़ है, मूल जड़, वहां जाकर आपको ठीक करना पड़ेगा। जब सिलेबस में यह बात आएगी कि आर्य लोग भारत के निवासी हैं, मूल निवासी भारत के आर्य लोग हैं, बाहर से नहीं आए, ईरान से नहीं आए, मध्य एशिया से नहीं आए, वो यहीं के मूल निवासी हैं। यह बात आपको शिक्षा मंत्रालय में जाकर उन विद्वानों को समझानी पड़ेगी। जब उनके समझ में आ जाएगी, वो किताब में ऐसा ठीक कर देंगे। जब किताब में ठीक हो जाएगा, तो फिर सबको वही पढ़ाना पड़ेगा। यह समाधान। तो उत्तेजना में नहीं आना। गुस्सा नहीं करना। झगड़ा नहीं करना। दुखी नहीं होना। परेशान नहीं होना। यह दुनिया पहले भी ऐसी ही थी, बिगड़ी हुई। आज भी बिगड़ी हुई है। आगे भी बिगड़ी रहेगी। यह सुधरने वाली नहीं है। उसकी ज्यादा टेंशन ना करें। हमने भी 40 साल खूब मेहनत की, बहुत सुधार के देख लिया। हमको यह समझ में आया, यह दुनिया तो सुधरेगी नहीं। अपना सुधार कर लो, वही बहुत ठीक है। आखरी सवाल। किस विषय में स्थित वज? वेदों में बहुत कुछ लिखा है। आपको वेद पढ़ना आता है? उपनिषद में तो छंद में लिखा है सब। उप में यही लिखा है। ये जितने भी एटिकेट्स हैं, सब की बात। यह सब स्थित प्रज के लक्षण हैं। योग दर्शन में यम, नियम लिखा है। ये स्थित प्रज के लक्षण हैं। अहिंसा का पालन करो, सत्य का पालन करो। जितने भी अच्छी बातें हैं, नैतिकता की बातें, वो सारे स्थित प्रज के लक्षण। तो खूब भरे पड़े दर्शनों में, उपनिषदों में, वेदों में, खूब जगह लिख। ठीक है। हां जी, क नीरज भाई, तो समय समाप्त होता है। आज की कक्षा को विराम देंगे। और कोई सूचना है, तो श्री लालचंद जी बता ओ। एक बार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ पू स्वामी जी महाराज का बहुत-बहुत धन्यवाद है। हमारे बीच पूज्य स्वामी जी, ऐसी, यह समझ लो कि ईश्वर की देन है कि लगभग जिस विषय पर हम इनसे चर्चा करना चाहते हैं, हमने विषय बदल-बदल कर पूज्य स्वामी जी महाराज के कार्यक्रम करे। और सभी कार्यक्रमों की फल श्रुति यह रही है कि लगभग जो यूं समझ लो कि 100 में से 99 सा मार्ग दे सके, ऐसी कक्षाएं होती हैं। यह अलग बात है कि हम कितना समझ सकते।