📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

18 July 2025

Vedantika 1:09:56

Transcription

पूर्ण शब्द है संस्कृत के आत्मज्ञान में और कर्म बंध में क्या संबंध होता है? अर्थात ज्ञान योग और कर्म योग में क्या संबंध होता है, वो बड़ी सुंदरता से आज के लोक में उभर कर सामने आता है।

"आत्मवंतम न कर्माण निभते धनंजय।" आत्मवंतम न कर्माण, धनंजय। धनंजय भी हटाइए, बस आत्मवंतम। जो आत्मवंत है, आत्मज्ञानी है, आत्मवंतम न कर्माण निभते। आत्मज्ञानी को कर्म बंध नहीं लगता है। आत्मज्ञानी को कर्म बंध नहीं पड़ता। आत्मवंतम नकर्माण निबंधते। कर्म बंध के तीन चार पक्ष होते हैं। उनको समझ लेंगे, बात स्पष्ट होगी। जो सबसे महत्वपूर्ण बात है, वो तो यह कि जो आत्मज्ञानी है, क्योंकि उसका कर्म उसकी सहजता से उद्भूत नहीं होता, इसलिए वह सहज कर्म, बालवत क्रीड़ा या आनंद से वंचित रह जाता है। यह पहली बात है। श्लोक कहता है, जहां आत्म अज्ञान है, वहां कर्म बंध है। जो आत्मवंत नहीं है, वह कर्म बंध में है और जो आत्मवंत है, उसको कर्म नहीं बांधते। "आत्मवंतम न कर्माण निबंधते।"

तो जो आत्मवंत माने आत्मज्ञानी नहीं है, उसके साथ क्या होता है? हमने कहा चार बातें हैं। जो आत्मज्ञानी नहीं है, उसके साथ कर्म से संबंधित चार बातें होती हैं। पहली बात यह कि सहज कर्म का जो आनंद होता है, वह उससे वंचित रह जाता है। मनुष्य जन्म आपका कुछ पाने के लिए नहीं हुआ है, प्राप्ति के लिए नहीं, अभिव्यक्ति के लिए हुआ है। और उस अभिव्यक्ति में बड़ा आनंद है, जब आप कर्मत होते हो, बस यूं ही। कोई पूछे कि यह तुमने क्यों किया? ऐसा तुम क्यों कर रहे हो? और आप कहें, बस यूं ही। कुछ पाने के लिए नहीं। मैं जो हूं, वो मेरे कर्म के माध्यम से बस अभिवंजना पा रहा है, प्रकट हो रहा है, अभिव्यक्त हो रहा है, एक्सप्रेस या मैनिफेस्ट हो रहा है। तो इससे सुंदर बात दूसरी नहीं होती। कुछ पाने के लिए नहीं कर रहा हूं। क्यों? इसलिए कर रहा हूं। पाने की बात नहीं है, होने की बात है। मैं जो हूं, वो फूट-फूट के बिखर रहा है चारों तरफ मेरे कर्म के माध्यम से। जैसे सूरज हो और सूरज का ताप और प्रकाश हो। सूरज को क्या मिल जाएगा प्रकाश विकिरण करके या किसी को तप्त करके? पृथ्वी सूरज को क्या दे लेती है? प्रकाश भी पाती है, ताप पाती है, ऊर्जा पाती है। समस्त जीवन सूर्य की वजह से ही है पृथ्वी पर। इतना बड़ा उपकार करता है सूर्य पृथ्वी पर। एक दृष्टि से समझाने की बात है, बदले में सूर्य पृथ्वी से कुछ चाहता है क्या? पृथ्वी से कुछ प्राप्त करने के लिए वह प्रकाश नहीं देता, क्योंकि वो सूर्य है, इसलिए प्रकाशित होगा। ये बड़ी अनूठी बात होती है। इसी में जीवन का सार है। जिसके पास ये नहीं है, उसके पास जीवन ही नहीं है। इसीलिए हम कहते हैं कि कोई भी काम इस तरह नहीं जांचा जा सकता कि वो अच्छी किताब में वो लिखित है या बुरी किताब से आता है। हमारे पास होती है ना दो किताबें, अच्छे कर्मों की किताब, बुरे कर्मों की किताब, तो हम तो कर्म ऐसे ही देखते हैं कि कहां से आ रहा है। नहीं, कर्म सिर्फ ऐसे परखा जा सकता है कि किस स्रोत से आ रहा है, कर्ता कौन है? अगर मुक्त स्रोत से आ रहा है, तो कैसा कर्म है? क्या है? यह सब पूछने की बात नहीं। स्रोत सही है, तो कर्म सही है। और वही जो स्रोत इतना महान है कि उसके होने से सब कर्म पावन, पवित्र हो जाते हैं। उस स्रोत से आपकी जिंदगी अगर वंचित है, तो हम कह रहे हैं आप जिंदा ही नहीं हो। हो सकता है आप बड़े ऊंचे ऊंचे कर्म कर रहे हो, बहुत ऊंचे कर्म आप कर रहे हो, लेकिन तथाकथित रूप से कोई बहुत घटिया कर्म करने वाला आपसे बहुत श्रेष्ठ है, अगर उसके घटिया दिखने वाले कर्म मुक्त केंद्र से आ रहे हैं, तो समझ में आ रही है बात?

एक आदमी अपनी अमुक्ति में दूसरे को प्रेमपूर्ण वचन बोल रहा है। दूसरा व्यक्ति अपनी मुक्ति में किसी को गाली दे रहा है। मुक्ति के स्रोत से आती गालियां अमृत समान है। अतिशयोक्ति नहीं होगी, अगर हम कहें कि आप उनको शास्त्रों, यह शब्दों जैसा ही मानो। शास्त्र माने क्या? जो मुक्ति से आ रहा है और जो मुक्ति की तरफ ले जाता हो। मुक्ति से उठा हुआ हर वचन शास्त्रीय है। और मुक्ति के केंद्र से नहीं आ रहा, तो बहुत मीठा वचन भी हो सकता है, बड़ी प्यारी बात भी हो सकती है, अच्छी किताब द्वारा अनुमोदित कोई वाक्य हो सकता है, लेकिन फिर भी वो जहरीला होगा। इतनी बड़ी बात होती है सही केंद्र का होना। सही केंद्र से अगर जहर भी आ रहा है, तो अमृत है। सही केंद्र से अगर पत्थर भी आ रहा है, तो फूल है। सही केंद्र से अगर मृत्यु भी आ रही है, तो जीवन है। और गलत केंद्र से बस बात पलट दो। अगर अमृत भी आ रहा है, तो विष है। फूल भी आ रहा है, तो पत्थर है। और जीवन भी आ रहा है, तो मृत्यु है। अमीरी आ रही है, तो गरीबी है। प्रशंसा आ रही है, तो उपहास है। सही केंद्र से किसी ने उपहास किया, घोर निंदा भी कर दी आपकी, तो वह भी प्रशंसा जैसी ही है, प्रेम जैसी ही है। इतनी बड़ी बात होती है जीवन में सही केंद्र का होना। तो जो आत्म अज्ञानी है, श्लोक के अनुसार, जो आत्मवंत नहीं है, उसका पहला और बड़े से बड़ा नुकसान यह होता है कि वह इस अमृत आनंद से वंचित रह जाता है। मुक्ति के केंद्र से खेलना कहते किसको है, उसका कभी पता नहीं चलता। वो यंत्रवत गति कर सकता है, खेल नहीं सकता। वो बताई हुई राह चल सकता है, नाच नहीं सकता। बहुत अभागा होता है। वो कुछ शब्दों को बोल देगा, जैसे कोई मशीन, कोई गुलाम भी बोल सकता है, पर वो गा नहीं सकता। यह हुई पहली बात। पहली बात एक तरह की अपॉर्च्युनिटी कॉस्ट है कि जब आप आत्मवंत नहीं होते, तो क्या खो देते हो? आप वो सबसे बड़ी अनुकंपा, भेंट, उपहार, नियामत खो बैठते हो, जो जन्म को सार्थक बना देती है। हम जैसे पत्थर हो गई हो वो तितली, जो कुछ दिनों के लिए ही सही, हफ्ते, 10 दिन के लिए ही सही, लेकिन बादलों के नीचे और फूलों के ऊपर नाच सकती थी। बताओ, इसने क्या खोया? गिन ही नहीं पाओगे, क्या खोया? वैसा खोया हुआ, वैसा घाटे का हमारा जीवन होता है, जो तितली हो सकता था, वो पत्थर बनकर जीवन बर्बाद कर लेता है। फिर क्यों? क्योंकि अपना पता नहीं। जिसको अपना पता नहीं, वो अपनेपन में जी भी कैसे पाएगा? जिसको तुम जानते नहीं, उसको अपने जीवन का केंद्र कैसे बना पाओगे? जिससे तुम्हें प्रेम नहीं है, उससे निकटता कैसे पाओगे? बड़ा नुकसान हो गया। किस काम के लिए आए थे? क्या कर बैठे? आजाद होने को पैदा हुए थे, 10 बेड़ियां और पहन बैठे। ये पहली बात।

दूसरी बात, अगर मुक्ति के केंद्र से काम नहीं करोगे, तो कहीं से तो करोगे। पहली बात यह है कि मुक्ति के केंद्र से काम नहीं करते, तो मुक्ति का जो अमृत है, हम उससे वंचित, वंचित रह जाते हो। अब दूसरी बात यह है कि चलो मुक्ति के केंद्र से नहीं कर्म आए आपके, तो कहीं से तो आएंगे। कहां से आएंगे? वो कर्म फिर आते हैं दूसरों से। वो कर्म आते हैं जगत के आदेश से। जिसके कर्म अपनी आत्मा से नहीं आएंगे, जाहिर सी बात है, उसके कर्म फिर शरीर, समाज, संयोग, समय इनसे आएंगे। ये हो गई गुलामी। अब ये लो, एक तो करेला, तुझे नीम चढ़ा। एक तो जो मस्ती मिल सकती थी, उससे हाथ धो बैठे, और दूसरे गुलामी और स्वीकार करनी नहीं पड़ी। इतना ही नहीं हुआ कि चल भाई, तू मस्त नहीं है, तो कोई बात नहीं, जाके कहीं उदास पड़ा रहे। मस्ती से वंचित रह गए और गुलामी को अब ढोना पड़ेगा, क्योंकि या तो तुम अपने अनुसार कर्म कर लेते, अपने अनुसार माने आत्मा के अनुसार, सत्य, मुक्ति के अनुसार, या तो वहां से कर्म कर लेते। वहां से नहीं करा, तो करना तो है ही। कृष्ण कहते हैं ना, प्रत्येक जीव जब तक है, तब तक गतिशील तो रहेगा ही। माने कर्म तो होगा। समय ही कर्म है। परिवर्तन की ही मांग रहती है कि तुम्हें भी परिवर्तित होना पड़ेगा। तुम कुछ ना करो, हिलो डुलो नहीं, बैठे रहो, तो भी कर्म हो रहा है। तो कर्म तो करना पड़ेगा। अब वो कर्म कहां से नहीं आ रहा? आत्मा से नहीं आ रहा। तो कहां से आएगा? अब वो आएगा, पता नहीं कौन-कौन से तुम्हारे मालिकों से। संयोग मालिक बन बैठते हैं। पता भी नहीं मालिक कौन है। संयोग मालिक है। आसपास के लोग मालिक बन बैठते हैं। शरीर मालिक बन बैठता है। ये सब मालिक हो जाते हैं। हम हो गई गुलामी। ये दूसरी बात है।

आत्मज्ञान और कर्म बंध, हम इनके रिश्ते पर जिज्ञासा कर रहे हैं आज, क्योंकि आज के श्लोक का विषय यही है। तीसरी बात, जब मुक्त केंद्र से कर्म आता है, तो उसमें क्या निहित होता है? मुक्त केंद्र से कर्म आता है, तो क्या होता है उसमें? मुक्त होकर सुनो, तो उत्तर सहज आ जाए। जब मुक्त केंद्र से कर्म होता है, तो उसमें क्या होता है? उसमें मौज होती है, उसमें मस्ती होती है, एक सहज उमंग होती है। हम माने बहुत कुछ होता है उसमें, भरपूर होता है, वो रिच होता है। तो जब वही इतना भरा पूरा होता है, तो उससे कुछ नहीं मांगा जाता। अभी यहां पर दो चार बच्चे छोड़ दो, स्वस्थ हो, उनका पेट भरा हो, दो साल, 4 साल, 5 साल वाले, तो देखो अभी वो क्या करते हैं, और फिर बताना। वो जो कर रहे हैं, उससे उनको मिला क्या? 15 मिनट के लिए यहां दो चार बच्चे छोड़ दो, बीमार नहीं होने चाहिए, खाए पिए होने चाहिए, और फिर बताओ 15 मिनट तक उन्होंने क्या करा? क्या करा? बताओ क्या करा है? यहां उठले एक खंभा पकड़ के घूम रहा है, एक जमीन पे लौट गया, एक मेज, स्टेज पे चढ़ गया, एक ने छलांग मार दी, एक ने दूसरे की टांग खींच दी। ये सब चल रहा है। 15 मिनट तक यही चल रहा है। 15 मिनट के बाद का मेरा सवाल है, बताओ उन्हें इससे मिला क्या? क्या मिला? क्या मिला? कुछ नहीं मिला। जब कुछ नहीं मिला, तो बेचारे बड़े निराश होंगे, जैसे ठग लिए गए हों। 15 मिनट तक उन्होंने बड़ी मेहनत करी, उन्हें मिला क्या? और मेहनत करे बिना वो रहेंगे नहीं। तुम यहां चार बच्चे छोड़ दो, गजब मेहनत करके दिखाएंगे वो। एक फ्रिज के अंदर घुस जाएगा। बहुत तरह की मेहनत होगी। यहां ये सोफे पड़े हैं, इन पे गद्दे पड़े हैं, कोई उछाल के फेंक रहा है। मेहनत लगती है भाई, इन सब कामों में। एक क्षण को नहीं रुकेंगे वो। तो तुम मुझे दिखा दो कि कोई एक बैठ गया है। थोड़ी देर को हो ही नहीं सकता। इतनी मेहनत करी। बताओ मिला क्या? क्या मिला? क्या मिला? कुछ नहीं मिला। तो कुछ नहीं मिला, तो फिर रोएंगे 15 मिनट बाद। इतनी मेहनत कर रहे थे, कुछ मिला नहीं। क्यों नहीं रोएंगे? क्यों नहीं रोएंगे? हां? क्योंकि जो मिलना था, वो मिल गया। उसी समय मिल गया। जो कर रहे हो, उसी में मिल गया। मुक्त केंद्र के कर्म की, मुक्त कर्म की, मुक्त कर्म की, मुक्ति से आते कर्म की यह पहचान होती है कि उससे कुछ मांगा नहीं जाता। इसलिए मुक्त कर्म ही निष्काम कर्म होता है। उसमें तो बल्कि धन्यवाद निहित होता है कि कर्म हुआ। मैं और क्या मांगू? मुझे करने को मिला, यही पर्याप्त है। बच्चा इस बात पे उदास नहीं हुआ कि 15 मिनट खेला और खेलने से कुछ नहीं मिला। बच्चा उदास हुआ कि उसे खेलने को नहीं मिला। 15 मिनट तक बच्चा खेला और खेलने के बाद ना रुपया मिल रहा है, ना पैसा मिल रहा है, ना तुम उसकी तारीफें कर रहे हो, ना नए कपड़े दिला रहे हो, ना यह कह रहे हो कि तू 15 मिनट खेलेगा, तब तुझे खाना दूंगा। बच्चा उदास हो रहा है क्या? बच्चा इस बात पर नहीं उदास होगा कि 15 मिनट उसे खेलने के बाद कुछ नहीं मिला। हां, वह इस बात पर जरूर उदास हो जाता है कि उसे 15 मिनट खेलने को नहीं मिला। मुक्त कर्म अपना परिणाम और पुरस्कार आप होता है। उसमें कुछ मांगा नहीं जाता। उसमें इसी बात के लिए अनुग्रह रहता है कि यह कर्म हो पाया, संभव। मैं कर पा रहा हूं। इतना ही पर्याप्त है। पर्याप्त से भी आगे है। मैं खेल रहा हूं। तो मैं किसी और पे उपकार थोड़ी कर रहा हूं। मैं खेल रहा हूं, तो किसी दूसरे पे थोड़ी एहसान कर दिया। मैं खेल रहा हूं। इसमें मेरी अपनी मौज है। यह मुक्त कर्म की निशानी है। वो मौज है। मौज है, तो उसमें तुम किसी से मांगने नहीं जाते कि मैंने करा, तो मुझे अब पैसा दो। बड़ा गजब होगा ऐसा कोई बच्चा, जो 15 मिनट खेले और 15 मिनट खेलने के बाद तुमसे आके कहेगा, पैसा। और एक बोले, नहीं, 15 मिनट नहीं, 15 1/2 मिनट, 30 सेकंड का बोनस चाहिए, ओवरटाइम होगा। ऐसा बल्कि उसको तुम 15 की जगह कहो कि बाकी सब 15, ये वाला 25, तो और किलकारी मारेगा, हु तू तू बोल के, बिल्कुल एकदम छत पे चढ़ जाएगा और बोलो क्या-क्या करना है, कपड़े फाड़ देगा किसी के, डोर तोड़ देगा, कुछ करेगा, दरवाजे पे लात मारेगा। वही थोड़ी कहेगा कि मुझसे ज्यादा क्यों कराया, यह मेरे साथ नाइंसाफी हो रही है, बाकी सब 15 मिनट, मुझसे 25 मिनट, ऐसे नहीं चलेगा। वो तो और मौज में। बहुत सिर्फ एक शर्त पर उसका काम रुकेगा कि वो थकी ही वही, जहां खेल रहा है, बिल्कुल हो सकता है वहीं खेलते-खेलते वहीं पे सो जाए। अब ये ठीक है, इतना खेला, इतना खेला कि थक गया, वहीं गिर के पढ़ के सो गया और फिर उठेगा, तो क्या करेगा? मुआवजा मांगेगा कि तुम्हारी वजह से हम बिस्तर पे भी नहीं सो पाए, यहीं जमीन पर पड़ गए, मुआवजा दो। क्या करेगा? जहां पे जगेगा, वहीं पे फिर खेलना शुरू कर देगा। उसकी शारीरिक जरूरतें पूरी करो बस। अब ये नहीं कि वो सो के उठा है, भूखा है, तुम उसे खाना भी नहीं दे रहे। खाना-वाना उसका होता रहे। समझ में आ रही है बात? तो मुक्त कर्म सदैव निष्काम होता है। वो अपना पूर्ण परिणाम स्वयं होता है। उसका परिणाम भविष्य में, आगत में नहीं होता। उसका परिणाम वर्तमान में कर्म में ही निहित होता है। आगे नहीं मिलेगा। यह मुक्त केंद्र से आते कर्म की पहचान है।

लेकिन जो कर्म तुम करते हो गुलामी के कारण, हमने कहा था नंबर एक तो यह बात है कि मुक्त कर्म से वंचित रह जाते हो। नंबर दो वाली बात हमने क्या कही थी कि वो काम तुम्हारे अपने हृदय से नहीं आता, तो बाहर के मालिकों से आता है और जो काम बाहर के मालिकों से आएगा, उसके साथ यह जुड़ा रहेगा कि तुम उसमें से परिणाम की आशा रखोगे। मुक्त कर्म से कोई परिणाम नहीं मांगा जाता, वह निष्काम होता है। लेकिन मालिक द्वारा जब भी काम दिया जाएगा, तुम उसमें कहोगे, हैं, हे कर तो दूंगा, दोगे कितना? और हमेशा गणना यह रहेगी कि कम से कम करके ज्यादा से ज्यादा मिल जाए। दुनिया का हर कर्मचारी इसी हिसाब को लेकर चलता है। करूं कम, पाऊं ज्यादा। और ठीक जैसे हमने कहा था, इससे बड़ा सौभाग्य नहीं हो सकता कि तुम करते जा रहे हो, करते जा रहे हो और गिन नहीं रहे कि इससे मिला क्या। इससे बड़ा दुर्भाग्य नहीं हो सकता, अगर तुम करते जा रहे हो और मन इसी गिनती में लगा हुआ है कि जो कर रहा हूं, इससे मिलेगा क्या? स्वतंत्र चित्त, अमुक्त चित्त होता है, जो बंधन के केंद्र से, माने सामाजिक और सामयिक मालिकों के प्रभाव से संचालित होता है। वो निश्चित रूप से सकामी हो जाता है। वो भविष्य उन्मुखी हो जाता है। वो परिणाम केंद्रित हो जाता है। और यह वही कोढ़ में खाज वाली बात है। एक तो किसी की गुलामी कर रहे हो, दूसरे जो कर रहे हो, उसमें कोई आनंद भी नहीं है, तो इसीलिए सोच रहे हो, आनंद कब मिलेगा? आगे, जब क्या मिलेगा? परिणाम, जब मुआवजा मिलेगा। अभी जो कर रहे हो, उसमें तो पहली बात गुलामी है और दूसरी बात, चलो यह भी चल जाता कि किसी ने डंडा मार के ही सही, पर तुमसे कुछ ऐसा करा दिया, जिसमें तुम्हें मौज आ गई। नहीं, पहले तो डंडा खाया, जो करा, उसमें मौज भी नहीं आई और क्योंकि उसमें मौज नहीं आई, इसीलिए भविष्य के लिए आशा रखी। एक दिन ऐसा आएगा, जब सपने साकार होंगे। एक दिन ऐसा आएगा, जब 30 दिन काम करके एक दिन तनख्वाह मिलेगी। एक दिन ऐसा आएगा, जब 20 साल लड़के पर पैसा लगाया है, फिर वह पैसा लौटाएगा। खटखट करके नौकरी कर रहा हूं, अपने मकान के लिए जमा कर रहा हूं। एक दिन ऐसा आएगा, जब किराए का मकान छोड़कर अपने मकान में जाऊंगा। एक दिन ऐसा आएगा। समझ में आ रही है बात? ये तीसरी बात हो गई। पहली बात क्या थी? मौत से वंचित, जो मुक्त केंद्र से काम नहीं करता। मुक्त केंद्र माने आत्मज्ञान का केंद्र। जो आत्मवंत नहीं है, वो मौज से वंचित रह जाता है। आत्मज्ञानी का कर्म स्वतः स्फूर्त होता है। उससे भी तुम पूछोगे कि तू यह क्यों कर रहा है? उसके पास क्यों का कोई उत्तर नहीं होगा, क्योंकि क्यों का आशय होता है परिणाम। उसको परिणाम चाहिए ही नहीं। तो उसके पास कोई क्यों जैसी चीज है नहीं। उसके पास तो नृत्य है। जैसे कोई मूर्ख हवाओं से पूछे, तुम बह क्यों रही हो? फूल से पूछे, तुम खिल क्यों रहे हो? यह कोई सवाल हुआ? सूर्य से पूछे, तुम तप क्यों रहे हो? सागर से पूछे, लहरा क्यों रहे हो? कोई सवाल हुआ? ये क्योंकि बात ही मूर्खता की है। क्यों की बात लालच की है। क्यों का सवाल हमारे मन में इसलिए बैठा है, क्योंकि हम लालची लोग हैं। तो कोई कुछ भी कर रहा होता, तो हम पूछते, क्यों कर रहा है? जरूर उसका कोई मकसद होगा, जरूर कोई लालच होगा। जो आत्मज्ञानी है, जो मुक्ति के केंद्र से संचालित है, उसके पास क्यों होता ही नहीं है। बात समझ में आ रही है? क्यों नहीं होता? बस है। बस है। सत्य क्यों है? अरे, वो है। ठीक उसी तरह सत्य से मेरा कर्म आ रहा है, वो भी बस आ रहा है। किसी लालसा से थोड़ी आ रहा है? कुछ चाहिए होता, तो मैं बता-बता देता कि क्यों कर रहा हूं, जो कर रहा हूं। कुछ चाह के नहीं कर रहा हूं। बस मैं ऐसा हूं, तो यह करूंगा। एक तरह से मेरी विवशता है, मेरी अस्तित्वगत अनिवार्यता है कि मुझे यह करना ही पड़ेगा, जो मैं कर रहा हूं। मैं इसलिए नहीं कर रहा कि यह जो कर रहा हूं, इससे कुछ मिलेगा और मैं प्रसन्न हो जाऊंगा। मैं इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि यह करने में ही मैं प्रसन्न से भी ज्यादा हूं। मैं उत्कंठित हूं। मैं उल्लासित हूं। क्यों का प्रश्न खोटे दिल वालों का है? क्यों का प्रश्न शूद्र मन वालों का है। क्या मिलेगा? ये सवाल व्यापारियों का है, प्रेमियों का नहीं। समझ में आ रही है बातें? तो यह पहली चीज थी कि जब आप अमुक्ति के केंद्र से संचालित होते हो, तो मुक्ति से जो सहज आनंद मिलता, बेपरवाह, बेमकसद नाचने में जो मौज मिलती, चूक जाते उससे हम। कभी देखा है कितना हल्कापन होता है, जब पता होता है कुछ मिल नहीं रहा होता और बेवकूफ बन रहे हो। हम उसको कहते हैं कि हम बेवकूफ बनने वाला काम कर रहे हैं, क्योंकि हमारी दृष्टि में चतुराई तभी है, जब कुछ मिल रहा हो। हमारी जिंदगी में कभी गाहे-बगाहे कुछ ऐसा हो भी जाता है, जिसमें हमें कुछ नहीं मिल रहा होता, जिसमें बस यूं ही नसीब से, किसी के अनुग्रह से हमें निष्कामता के कुछ पल उपलब्ध हो गए होते हैं, तो हम क्या बोलते हैं? अरे यार, ऐसी बेवकूफी कर रहे थे। कहीं पर जाकर यूं ही दो घंटे बिता दिए। और यूं ही का मतलब मैं बेहोशी की बात नहीं कर रहा हूं, मैं ऊंचाई की बात कर रहा हूं। अपने लिए कुछ नहीं चाहा, किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं हो रही थी, पर कहीं दो घंटे लगा दिए, तो खुद को ही थोड़ा अटपटा सा लगता है। वो कहते हैं, ऐसी कुछ नहीं। क्या कर रहे हैं? वो सब चार लोग हैं, वो यूं ही बिना बात के हंसी-ठट्ठा कर रहे हैं। हम एक बार हुआ था, वहां बैठी हुई थी, एक बुढ़िया बिल्कुल जाने उसके सब बच्चे उसको छोड़छाड़ के चले गए होंगे। ऐसी जो ठठरी नहीं हो जाती है बुढ़िया, 70 साल वाली, ऐसी 30 किलो की, वो बैठी हुई है और वो एक उसने तौलिया सा बिछा रखा है, गमछा और गमछे पर उसके पांच आलू रखे हुए हैं, चार तुरई रख के बैठी हुई है, पैठो उसके प्याज रखे हैं और इस तरह रख के बैठी हुई है। अब वो बैठ भी ऐसी जगह पे गई है, जाने उसको दिखाई नहीं देता, जहां कोई खरीदने ना आए उसका। और माल भी जो लेकर बैठी हुई है, इतना कम है। ऐसी छोटी दुकान देखो, तो रुकने का किसका मन करेगा? हम चार जने थे, तो वहां उसको देखा। पहले तो ऐसे आगे निकल गए थे, बोले चल, माइक मोड़, वापस मोड़। वापस गए, बोले करते हैं। और वहां खड़े हो गए हैं। एक ने हाथ में दो आलू उठा लिए हैं, एक ने लौकी उठा ली है, एक ने तुरई उठा ली है। हम और वहां पर खड़े होकर के लोग कह रहे हैं, ले लो, ले लो, ले लो, हंस रहे हैं आपस में। इंजीनियरिंग के छात्र हैं। अभी यह काम करेंगे, सड़क किनारे, वो भी एक अटपटी सी जगह है, तो हंसी आ रही है। एक कोई आलू लेने ना आए और बुढ़िया भी शुरू में तो वो नाराज ही हो गई, उसको लगा कि ऐसे ये लड़के आए हैं, ये मेरा सामान लूटने आए हैं, उसने गाली-वाली भी दी, वो सोच रही है कि इसका सामान लूट लेंगे। हम भी खड़े हो गए, तो भी कोई मदद ना कर पाए, क्योंकि वह इतनी कम सब्जियां थी और वह ऐसी बेकार जगह पर बैठ गई थी। वहां पे ऐसा मोटर साइकिल, जो मैकेनिक-वकेनिक होते हैं ना, उनकी दुकानें थी और उधर पीछे से एक नाला बह रहा है, ऐसे एक नाला बह रहा है। नाला मतलब जिस पे पटियां रखी होती हैं, तो पटियां भी कुछ हटी हुई थी, तो नाला है, उसके पीछे चार-पांच लाइन से दुकानें थी, ये जो मोटरसाइकिल रिपेयर वालों की होती हैं। अब वहां पे ये अपना आलू लेके बैठ गई थी। वहां कौन खरीदेगा? तो हम भी खड़े हो गए, तो कोई खरीदने वाला नहीं। पहले एक था, उसने कहा, अब इसका बिकवा ही देते हैं। मैंने कहा, बिकवाना है, तो पैसे दे दे। इसको बोलो, नहीं, इसका बिकवाएंगे। क्या करेगा? उसने नाचना शुरू कर दिया। वो आते-जाते वो कर रहा है, ले लो, ले लो, ले लो। तो जब देखा एक नाच रहा है, तो हम चारों ही लोग नाचने लगे। एकदम फूहड़, बेवकूफी का काम। आलू, प्याज, टमाटर हाथ में लेकर चार नाच रहे हैं। एकदम मूर्खता का काम और जानते हो, तब भी कोई नहीं आया लेने। 15-20 मिनट नाचे, तब भी कोई नहीं आया लेने। लेकिन एक काम हुआ। पीछे ये जो मैकेनिक थे, जिनकी दुकानें थी, उन्हीं में से एक-दो आ गए। हम, उन्होंने उनको जितना लगा कि इसका होगा, उतना पैसा बुढ़िया को दे दिया। तो कुछ हो गया। वो नहीं हुआ, जो हमें लगा था कि होना चाहिए। पर फिर भी कुछ हो गया। अब उस वक्त तो बड़ा मजा आया। शुरू में नाचते हुए थोड़ा सा अटपटा लगे, सकुचाएं, जिसको कहते हैं एंबरेसमेंट। आप पढ़े लिखे लोग हो और ये आप क्या कर रहे हो? वो भी मतलब आईआईटी के स्टूडेंट्स। ये क्या कर रहे हो? 15वें मिनट तक आते-आते हमें मजा ही आने लग गया था। उसने ले जा के ₹50 बुढ़िया को दे भी दिए। हम तो भी दो-चार मिनट और नाचते रहे। बोले, यह बढ़िया है। आलू हाथ में लेकर नाचना, यह तो कभी कैंपस में करने को ही नहीं मिलता। समझ में आ रही है बात? लेकिन आज भी जब आपस में बात करते हैं, तो ऐसे बोलते हैं कि यार, वो क्या बेवकूफी करी थी। हंसते खूब हैं, लेकिन उसको याद ऐसी करते हैं कि क्या बेवकूफी करी थी? क्या मूर्खता करी थी? क्योंकि हिसाब लालच का है ना। वो चीज ऐसी थी, जिसमें ना कुछ मिला, ना कुछ मिल सकता था। कुछ हो नहीं सकता था। आ रही बात? लेकिन वही वो पल होते हैं, जो फिर तुम्हें याद भी रह जाते हैं। उनमें कुछ ऐसा खास होता है। हम भले ही आज यह कह देते हो कि बेवकूफी करी थी, लेकिन बात उसी घटना की करते हैं। भले ही यह बोलकर याद करते हैं कि यार, क्या था वो, पर याद करते हैं। समझ में आ रही है बात? जो भी बोलकर याद करते हैं, लेकिन याद तो करते हैं। आप इससे वंचित रह जाते हो। आपको लगता है आप बहुत होशियार हो। आपने यह गिन लिया, आपने वो गिन लिया। ऐसे नहीं होता। आंतरिक जगत में यह हिसाबी बुद्धि बहुत, बहुत नुकसान देती है। एक जगह पर न्यू टेस्टामेंट में जीसस की बात आती है। वो कहते हैं कि किसी को भी सत्य में प्रवेश मिल सकता है, लेकिन अमीरों को नहीं मिलेगा। अमीरों को नहीं मिलेगा। भले यहां तक हो सकता है कि वो जो सुई होती है, उसमें जो छेद होता है, भले यहां तक हो सकता है कि उसमें से हाथी निकल जाए, लेकिन जिन्होंने दौलत इकट्ठा करने में जिंदगी बिताई है, वो उस दरवाजे से नहीं निकल सकते। सत्य का जो द्वार है, उसको बोलते हैं द प्लेस ऑफ माय फादर। जिसने पूरी जिंदगी बस इसी में लगा दी कि मैं जो करूं, उससे कुछ प्राप्त करूं, उसको कुछ नहीं मिल सकता। और संतों के अनगिनत दोहे हैं। और गीता का पूरा निष्काम कर्म योग ही यही है कि तुम कामना से जो करते हो, वो तुम्हारे किसी काम आने वाला है नहीं। काम माने कामना। तुम्हारे काम माने कार्य नहीं आएगी। समझ में आ रही है बात? ये तो कितनी बातें हमने बोली, कितने बिंदु अभी तक बोले? तीन। ठीक है? पहला, चूक जाओगे। दूसरा, गुलामी करनी पड़ेगी। तीसरा, गुलामी जब करते रहोगे, तो भी भविष्य की ओर ऐसे मुंह और आंख फाड़ के खड़े रहोगे कि आगे मिलेगा क्या? अब चौथी बात, कि तुम लगातार परिणाम की लालसा में रहोगे कि आगे मुझे इससे मिलने वाला क्या है? और वो जो परिणाम आएगा, वो कभी तुम्हारी लालसा पूरी करेगा नहीं। लालसा सिर्फ किससे पूरी हो सकती थी? नंबर एक से। लालसा पूरी हो सकती थी, अगर तुम सही केंद्र पर आ जाते, तो लालसा पूरी हो जाती। पर तुम गलत केंद्र पर बैठे-बैठे ये उम्मीद करोगे कि लालसा पूरी हो जाए। लालसा पूरी होगी नहीं। तो तुम क्या करोगे? फिर जब लालसा पूरी नहीं होगी, तुम गलत केंद्र से ही और ज्यादा गलत कर्म करोगे। पहला बिंदु यह था कि तुम सही केंद्र से चूक जाओगे। और आखिरी माने चौथा बिंदु यह है कि तुम गलत केंद्र पर ही और ज्यादा, और ज्यादा स्थापित होते जाओगे, धंसते जाओगे, जैसे कोई दलदल में धंसता है। समझ में आ रही है बात? ये जो चाहोगे, तुम्हारे कामों से, वो तुम्हें मिल नहीं सकता, क्योंकि बात ये है ही नहीं कि काम से कुछ मिलेगा। कर्म से नहीं मिलता, जो मिलता है, कर्म के बाप से मिलता है, कर्म के केंद्र से मिलता है। कर्म से कुछ मिल ही नहीं सकता। कर्म का केंद्र गलत, कर्म का केंद्र तो कर लिया गलत। अब कह रहे हो, जो मिले मुझे, किससे मिले? कर्म से मिले। और कर्म से मिल, तो फिर तुम उसी कर्म को बार-बार निचोड़ोगे। गन्ने की पिरोई देखिए, क्या होता है उसमें? गन्ना डाला जाता है मशीन में। दो रोलर होते हैं, उनके बीच में से निकलता है। पहली बार जो निकला, पूरा नहीं पड़ा। दूसरी बार डाल रहा हो, तीसरी बार डाल रहा हो, चौथी बार डाल रहा है। कितना भी डालते रहो, क्या निकलेगा? जो पहली बार निकला, उससे भी कम निकलेगा। और और ज्यादा डालोगे, तो उससे भी कम निकलेगा। और जितना कम निकलता जाएगा, डालने की हवस उतनी बढ़ती जाएगी। अभी और करो, अभी और करो, अभी और करो। व्यर्थ जा रहा है सब। क्या निकलेगा? वही उदाहरण पुराना कबीर साहब वाला कि कुत्ते हैं और वही पुरानी सूखी हड्डी। पहले तो उसी के पीछे लड़ रहे हैं, और किसी को मिल गई, एक लड़ने के बाद और है क्या? लड़ने के बाद जो चीज मिली, वो बस सूखा हाड़ और उसको चबा रहे हैं। उसमें तो कुछ मिल ही नहीं रहा। चबाते-चबाते, चबाते उनके दांत ही कट गए, दांत टूट गए, मसूड़े छिल गए, मसूड़े छिल गए, तो मसूड़े से खून आ गया। और वो क्या खुश हो रहे हैं अब? अभी हड्डी में इतना चबाया, तो हड्डी से खून आया। हड्डी से नहीं आया। हड्डी में कुछ ना था, ना होगा। समझ में आ रही है बात? इतनी जल्दी आपको कैसे समझ में आ जाएगी? जिनको जल्दी समझ में आ रही है, उन्हें कुछ नहीं समझ में आ रहा। हम आपसे यह कह रहे हैं कि एक बार आपने अमुक्ति चुन ली, उसके बाद तुम्हारे सारे कर्म पहली बात तुम्हें यंत्रणा देंगे, दुख देंगे और दूसरी बात, क्योंकि वो दुख देंगे, इसीलिए तुम उन्हीं कर्मों को बार-बार दोहराओगे। कितनी अजीब बात है। क्योंकि वो कर्म दुख देगा, इसीलिए तुम उसी कर्म को बार-बार दोहराओगे। लोग पूछते हैं कि कर्म दोहराए क्यों जाते हैं? क्योंकि वो दुख देते हैं। कर्म तुमने करा था सुख के लिए, सुख मिला नहीं, इसलिए दोहरा रहे हो। कितनी अजीब बात है। जो कर्म दुख दे रहा है, तुम उसको दोहरा रहे हो। माने दुख को ही तुम बार-बार दोहरा रहे हो। यही इंसान का जीवन है। हम अपने दुखों को दोहराते हैं। इसी में जिंदगी बिताते हैं। क्या किया जीवन भर? अपने दुखों को दोहराया। ये थी जिंदगी। कोई नया दुख मिला है कभी आपको? कोई नया दुख मिला है? नया सुख भी नहीं मिला? दोहराव ही दुख है। ना नया दुख मिलता है, ना नया सुख मिलता है। जो मिलता है, वो पहले से ही अपेक्षित होता है। तभी तो डरे रहते हो। दुख भी कौन सा मिल सकता है, इसकी पहले ही छवि बना रखी है ना, तभी तो डरे हुए हो। नया दुख मिल रहा होता, तो पहले से डरे नहीं होते। अगर दुख नया होता, तो दुख को लेके पहले से नहीं डर सकते थे, क्योंकि पहले से उसका कोई अनुमान नहीं होता। कोई छवि नहीं होती। पर दुख भी क्या मिलेगा, वो पहले ही पता है। बस कब मिलेगा, यह नहीं पता है। तो डरे बैठे हो पहले से। मौत को लेकर हर आदमी डरा हुआ है। कोई नई चीज है क्या? बहुत पुरानी चीज है। जिंदगी क्या है? मौत का दोहराव। डरे हुए हो उससे। एक छवि है ना मौत की। एकदम ही नई चीज होती मौत, तो उससे डर कैसे सकते थे? जिसको जानते ही नहीं, उससे कैसे डर लोगे? जो बिल्कुल नया है, जिसको जानते ही नहीं, उससे डरना संभव ही नहीं है। डरा तो सिर्फ ज्ञात से ही जा सकता है, जिसको लेके तुम्हारे पास पहले ही कुछ ज्ञान है, ज्ञान है माने मान्यता है, छवि है, तुम उससे ही डर सकते हो। हम जीवन भर डरे रहते हैं। माने हमारे पास दुख भी नया नहीं आता। माने हमारे पास दुख भी जो आता है, वो ज्ञात दुख है। बात समझ रहे हो? मुक्त केंद्र में जो होता है, वो अपूर्व होता है और अमुक्ति के केंद्र से जो होता है, वो सब पूर्व निर्धारित होता है। इतनी विचित्र बात, तब पहले से तय होता है। पहले से तय दुख, तो दुख है ही। बोलो बेटा। पहले से तय सुख भी दुख ही है। सुख अगर वास्तव में सुख है, तो वह अपूर्व होगा। अपूर्व माने उसमें कोई पूर्वता नहीं होगी। वह अकाल होगा, पहले से निश्चित नहीं होगा, उसकी कोई छवि नहीं होगी। और जब सुख अकाल और अपूर्व होता है, तो उसको ही बोलते हैं आनंद। हम और अकाल और अपूर्व जब होता है मामला, तो दुख भी फिर दुख जैसा नहीं होता। दुख में भी आनंद होता है। दुख में भी आनंद होता है। बड़े रोचक प्रयोग हुए हैं। बच्चे मां-बाप के साथ घूम रहे होते हैं। मां-बाप उंगली पकड़ के उनको कहीं ले जा रहे हैं। हां। चलो चढा अंकल से मिलने चलेंगे। हम अब छोटे नुनू को चढा अंकल, एकदम वाहियात लगते हैं। उनकी मुंह नहीं देखना चाहता। पर चड्ढा अंकल पिताजी के बॉस हैं, तो छोटू को भी जाना पड़ेगा। उसको ले जा रहे हैं। वो रास्ते में गिर पड़ा। वो बहुत रोएगा। उनका रोना देखा है? जिसमें आवाज आनी बंद हो जाती है, ऐसे जीभ तन जाती है और आवाज आनी ही बंद हो जाती है। वो हक्का-फाड़ के रोना बोलते हैं उसे। और दूसरी ओर सीसीटीवी लगाओ। पांच बच्चे खेल रहे हैं। वो आपस में गिरते-पड़ते रहेंगे, नहीं रोते। गिर जाएगा, उठेगा, फिर खेलने लगेगा। वो रोएगा कब मालूम है? जब वो घर आएगा, मां देखेगी कि घुटना छिला हुआ है, पटाख से चांटा देगी, कहां से टूट के आया है, तो फिर वो रोएगा। कितनी विचित्र बात है। वो खेल रहा था, खेलते-खेलते गिर गया, गिर गया, उसके खून भी आ गया, वो नहीं रोया है। वो मौज में था। वो घर आता है, मां देखती है घुटना टूटा हुआ है, मां चाटा मार देती है। अब वो रोएगा। कई बार तो वो पहले ही जान जाता है कि अब देखता है घर जाते हो, अरे तो खून आ रहा है, तो पहले ही जान जाता है कि आज पिटूंगा, तो रोता हुआ ही पहुंचता है घर। बड़ा दर्द हो रहा है, बड़ा दर्द हो रहा है, कहता है मां को थोड़ा पसीज देते हैं, अब नहीं मारेगी। मौज में दुख भी आनंद होता है। मौज में गिर जाओ और घुटना भी तुड़वा लो, तो भी आनंद है। समझ में आ रही है बात? और जबरदस्ती चड्ढे के यहां ले जाओगे, वो थोड़ा सा भी गिरेंगे, खरोच भी आ जाएगी, तो कैसे रोएंगे? ये रोना नहीं है, ये एक तरह का प्रतिशोध है, क्यों मेरे साथ तुम जबरदस्ती कर रहे हो? समझ में आ रही है बात? आत्मवंत कर्मों में बद्ध नहीं होता। कर्म बंधन क्या है? समझ गए हो ना? कर्म बंध तीन तलों पर चलता है, जो आज के दूसरे, चौथे, तीसरे और चौथे बिंदुओं में है। कर्म बंध की शुरुआत किससे होती है? आत्म अज्ञान से। तुम क्योंकि स्वयं को नहीं जानते, तो तुम स्वयं के आदेशों पर भी चल नहीं सकते। जिसे अपना पता ही नहीं, वो अपनी बात पर चलेगा भी कैसे? चल सकते हो। जिसे अपना पता ही नहीं, वो अपनी बात पर चलेगा भी नहीं। तो किसकी बात पर चलेगा? वो दूसरों की बात पर चलेगा। यह कर्म बंध की शुरुआत है। अच्छे से समझ लीजिए। कर्म बंध वो सब नहीं होता, जो आप टीवी वगैरह पर देखते हो। यह कार्मिक अकाउंट और कार्मिक बैलेंस, वो सब बिल्कुल भूल जाओ। श्री कृष्ण कह रहे हैं, कर्म बंध का संबंध आत्म अज्ञान से है। और जो आत्मवंत है, उस पर कर्मबंध लागू नहीं होता। आत्मवंत माने आत्मज्ञानी। जो आत्मवंत है, उस पर कर्मबंध लागू नहीं होता। तो कर्मबंध की शुरुआत ही किससे होती है? आत्मज्ञान से। तो मुझे अपना पता नहीं। तो फिर मैं इनका आदेश मानूंगा। तो गुलामी यहां से शुरू हो गई। अभी कुछ भी करवाएंगे। इन्हें क्या लेना देना? मेरी भलाई से। इन्हें अपनी भलाई नहीं पता, तो मेरी भलाई क्या करेंगे? हो सकता है, यह ऊपर से चाहे भी कि मेरी भलाई हो जाए, पर इनके चाहने से भी कुछ नहीं होगा। यह कुछ ना कुछ तो मेरा खोपड़ा तोड़ेंगे ही। अपना भी तोड़ रखा है, मेरा भी तोड़ेंगे। यह पहली बात हो गई। कर्म बंध में पहला, दूसरों की गुलामी। दूसरी बात, मौत से परिणाम से आसक्ति। क्योंकि इनके कहने पर मैं जो कर रहा हूं, उसमें कोई मौज नहीं है। इनके कहने पर जो मैं कर रहा हूं, उसमें कोई मौज नहीं है। तो मौज मैं कहां तलाशूंगा? आगे। जो मैं कर रहा हूं, उसमें कोई रस नहीं है, कोई सार नहीं है। तो फिर मैं लगातार आगे को तकता रहता हूं। अब क्या मिल जाए? क्या हो जाए? या फिर मैं सोचता हूं, मालिक बदल दूं। मालिक, इस मालिक से तो कुछ आगे का लाभ हो नहीं रहा। तो मालिक बदल देता हूं। मालिक बदलने को तैयार रहता हूं। गुलामी बदलने को तैयार नहीं रहता। ये गजब लोग हैं हम। हम ऐसे गुलाम हैं, जो कहते हैं कि मैं मालिक को तो छोड़ सकता हूं, पर गुलामी को नहीं छोड़ सकता। एक मालिक को छोड़ के हम दूसरे मालिक के दरवाजे चले जाते हैं, कुत्ते की तरह लौटने। जैसे कुत्ता एक जगह रोटी नहीं मिली, तो दूसरे दरवाजे पर जाकर के वो चाट रहा है। लेकिन हम यह नहीं कहते कि मुझे गुलाम ही नहीं रहना। कुत्ता थोड़ी हूं? कुत्ता थोड़ी हूं? मनुष्य हूं। तो यह दूसरी बात। पहली बात, गुलामी करनी पड़ती है। दूसरी बात, गुलामी में कोई रस नहीं होता, तो गुलामी भविष्य पराश्रित बना देती है। तीसरी बात, जिस भविष्य पर आश्रित बनाती है, उसमें भी कोई रस नहीं निकलता। मालिक से भी कुछ नहीं मिला और भविष्य से भी कुछ नहीं मिला। तो जब कुछ मिलता नहीं, तो फिर हम क्या करते हैं? हम और गुलामी करते हैं, और तीव्रता से गुलामी करते हैं। नए-नए मारे कोई गुलामी करते हैं। ये तीन बातें मिलकर कहलाती हैं कर्म बंध। कर्म बंध का कारण क्या है? आत्म अज्ञान। कर्म बंध का कारण क्या है? आत्मज्ञान। और कर्म बंध क्या होता है? कभी भूलिएगा नहीं। कर्म बंध को लेके अनाप-शनाप बातें मत करिए। कर्म बंध का मतलब होता है, पहला, मेरा कर्म दूसरों द्वारा संचालित है। यह पहली बात। दूसरी बात, मेरे कर्म का परिणाम मुझे लगता है, भविष्य में मिलेगा। यह दूसरी बात। और तीसरी बात, परिणाम क्योंकि भविष्य में कभी मिलता नहीं, अपेक्षा अनुसार, आशानुसार, तो फिर मैं वही पुराने कर्म को, उसी पुराने केंद्र से और ज्यादा तीव्रता से करता हूं। दोहरा-दोहरा के, बदल-बदल के करता हूं, नए-नए तरीके से करता हूं, पर करता पुराने केंद्र से ही हूं। ये तीन बातें मिलकर कर्म बंद हो गई। कर्म बंध माने यह नहीं कि पिछले जन्म का कर्म आकर के अब आपको लंगड़ा बना गया, या कि आप पिछले जन्म में गलत आदमी थे, ऋषि का श्राप मिला था, इसलिए आप इस जन्म में अमुक जाति में पैदा हुए हो, या कि त्यौहार के दिन, अरे तू क्या कर रही है धनिया? आज तो पति की लंबी आयु का त्यौहार है, आज तूने पानी पी लिया, अब तू अगले जन्म में छिपकली बनेगी। यह सब कर्म बंद नहीं होता। इन चक्करों में मत रहिएगा। हम कि कोई ऐसे भ्रष्टाचारी किसी अफसर के घर में पैदा हुआ है लड़का, और बाप ने घूसी-घूस से घर भर रखा है, तो कहो यह पुण्यत्मा है, पिछले जन्म का, तभी तो इसने ऐसे घर में जन्म लिया, जहां बाप के पास घस का अथाह पैसा है और उस पैसे से यह झुनू का नुन्नू मौज मना रहा है। ये सब ये नहीं होता। थ्योरी ऑफ कर्म। कर्म इसको नहीं बोलते। कर्म बंध के तीन बिंदुओं फिर से दोहराएं। पहली बात, शुरुआत कहां से होती है कर्म बंध की? आत्मज्ञान से शुरुआत होती है। और कर्म बंध में क्या निहित होता है? पहली बात, आत्मा से नहीं, अनात्मा से काम करोगे। आत्मा से नहीं, अनात्मा से काम करोगे। माने दूसरों से। दूसरों में हम क्या-क्या डाल देते हैं? शरीर, समाज, समय, संयोग। यह सब तुमसे काम कराएंगे। तुम्हें अपना कुछ नहीं पता होगा। और यह सब जो तुमसे काम कराते हैं, उसको क्या बोलते हैं? आज के काव्यात्मक अर्थ में हमने लिखा है कर्तव्य। यह सब उठा के तुमको क्या दे देते हैं? कर्तव्य। यह तुम्हारा कर्तव्य है। जो अपने केंद्र से काम करता है, उसके लिए कोई कर्तव्य नहीं होता। उसके लिए बस क्रीड़ा होती है। आज की जो पूरी बात है, इसके लिए एक उपयुक्त शीर्षक हो सकता है। कर्तव्य नहीं, क्रीड़ा। क्या हो सकता है? कर्तव्य नहीं, क्रीड़ा। हां, बस ये अलग बात है कि इस नाम से अगर आरती ने इसको पब्लिश कर दिया, तो क्लिक थ्रू रेट आएगा 0.02%। तो इसीलिए जब यह प्रकाशित हो रहा होगा, तो इसका शीर्षक कुछ ऐसा दिया जाएगा। अगर तुम मुझसे प्यार करती हो, तो मेरी बात सुनो। यह वीडियो आप देखेंगे, तो सच्चे आशिक कहलाएंगे। सारी कामनाएं पूरी हो जाएंगी। आओ, आओ, देखो, देखो। ये दुनिया है भाई। जो चाहेगा, वो मिलेगा। जल्दी से आओ। और केवल इसमें पांच थंबनेल बनाएगा। एक में बहुत सारा पैसा दिखाएगा, एक में खूबसूरत लड़कियां दिखाएगा, एक में कुछ और दिखाएगा। वो सब अलग बात है। लेकिन इसका जो सही शीर्षक है, वो यही है। कर्तव्य नहीं, क्रीड़ा। समझ में आ रही है बात? एक चीज और कर लेते हैं। हां। ऊपर कहा है कि योग के द्वारा कर्म सन्यास को प्राप्त है। हां। योग क्या है और कर्म सन्यास क्या है? और यह भी कहा है कि ज्ञान के द्वारा जिसके संशय छिन्न हो गए हैं। तो ये तीन चीजें और हैं। इनको संक्षेप में कर लेते हैं। योग से आशय है, कर्ता का आत्मा में स्थापित हो जाना, युक्त हो जाना। योग से आशय है, अहम आत्मा में स्थापित हो गया। अहम अपने आप को क्या मानता है? मैं ही असली हूं। योग माने क्या है? हां। अहम अपने आप को क्या बोलता है? मैं ही आत्मा हूं। मैं ही असली चीज हूं ना। तो जब वह यह दावा छोड़ देता है कि मैं यह असली हूं, आत्मज्ञान का मतलब है देख लेना कि मैं तो पूरा नकली हूं। तो जब वह देख लेता है कि मैं नकली हूं, तो सच्चाई को वो आत्मा में निहित रहने देता है। कहता है, मैं नहीं असली हूं, आत्मा असली है। यह है योग। अहम ने असलियत का दावा त्याग दिया। अहम जान गया कि असली वो नहीं है, आत्मा है। मैं असली नहीं हूं। बस इतना जानना। मैं असली नहीं हूं। हूं। यह जानना ही योग है। मैं असली हूं, बाकी नकली है। जिसको आत्मा ऋषियों ने या ज्ञानियों ने कह दिया, वो नकली है। यह वियोग है। तो अहम जो सत्य से, आत्मा से दूरी बनाकर चलता है, अपना अलग ही वह एक कारवां ले चलता है। कहता है, मैं ही मालिक हूं, मेरे पीछे पीछे चलो। वो अपने आप को एक अलग स्वाधीन, स्वतंत्र केंद्र बनाने की कोशिश में रहता है। उस कोशिश का समाप्त हो जाना योग है। योग माने समर्पण। मैं आज तक अपने आप को असली बोलता आया। मैं असली हूं नहीं। आप ही असली हो। मैं आपके आगे नत हुआ। यह योग है। कर्म सन्यास क्या है? वो सारे कर्म जो मैं दूसरों के प्रभाव में करता था। वो सारे कर्म जिनको मैंने अपना कर्तव्य समझ लिया था। उन कर्तव्यों को मैं विसर्जित करता हूं। यह कर्म सन्यास है। समाज व शरीर प्रदत्त कर्तव्यों का विसर्जन ही कर्म सन्यास है। कर्म सन्यास माने वो कर्म अब मैं नहीं करूंगा। मैं सन्यस्त हुआ। अब मैं वो कर्म नहीं करूंगा जो पहले करा करता था अपना कर्तव्य समझ के, क्योंकि वो कर्तव थे ही नहीं। झूठे-खोटे कर्तव्य थे। खोटे कर्तव्यों को इतिश्री दे देना, खोटे कर्तव्यों को ठुकरा देना ही कर्म सन्यास है। ठीक है। दो बातें हो गई। क्या योग, कर्म सन्यास और ज्ञान संक्षिन्न संशयम। यह ज्ञान का काम है। संशय माने क्या? 50 केंद्रों का होना ही संशय होता है। एक ही हो, तो कभी संशय हो सकता है। आपसे कहा जाए, इस कमरे में जाइए। यहां अनमोल मिलेगा। बाहर कोई था, उसको कहा, यहां जाना, भीतर, भीतर अनमोल मिलेगा। और भीतर आए, तो भीतर यही बैठे हुए थे। गोल-गोल अनमोल। कोई संशय हो सकता है, क्योंकि कितने थे, तो कोई संशय नहीं होगा। पर बाहर किसी को बोला, भीतर जाओ, अनमोल मिलेगा। वहां 18 बैठे हैं, तो अब संशय हो जाएगा। समझ में आ रही है बात? तो संशय का अर्थ है, आधिक्य। समाज से जब तुम चलते हो, तो कोई बोलता है, ये। कोई बोलता है, वो। 18 बातें बोल दी जाती हैं, ये संशय है। तुम कौन हो, इसको लेके 18 पहचाने दे दी जाती हैं। यह संशय है। समझ में आ रही है बात? दफ्तर में हो, तो अधिकारी हो। घर में हो, तो तरकारी हो। अब तुम अधिकारी हो कि तरकारी हो? कुछ पता नहीं। समझ में आ रही है बात? कहीं पर हो, तो तुम विद्वान हो। कहीं पर हो, तो पहलवान हो। विद्वान हो कि पहलवान हो? कुछ पता नहीं। एक तरफ यार हैं, एक तरफ रिश्तेदार हैं। किसका दिल रखें? कुछ पता नहीं। ये संशय है। क्योंकि मुझे पता नहीं कि मैं क्या हूं, इसीलिए मेरी 18 पहचाने खड़ी हो जाती हैं। 18 तरीके की ताकतें आकर मुझ पर अपना दावा ठोकती हैं। यह संशय है। आत्मसंशय, आत्मसंशय। हम तो बात कर चुके हैं कि कैसे आत्मसंशय ही आगे चलकर बन जाता है। संशय आत्मा बन जाता है। फिर यही सब जो घपला है, इसी घपले को कुल मिलाकर के हम क्या नाम दे देते हैं? यही मेरी सच्चाई है। इसको ही बोलते हैं, यही मेरी आत्मा है। यही तो सच है। तो आत्मसंशय से शुरुआत होती है। आत्मसंशय, आत्मअज्ञान से आता है, आत्मसंशय और आत्मसंशय ही बन जाता है। फिर संशय आत्मा बन जाता है। वो तो पिछली बार ही बात हुई थी। ठीक है? तो आत्मज्ञान का काम होता है, आत्मसंशय को काटना। कैसे काटता है आत्मसंशय को? जितनी पहचाने होती हैं, वो सबको भगा देता है। सबको भगा देता है। मतलब सब नकली हैं। कोई ठीक नहीं, तुम में से कोई भी ठीक नहीं। निकलो, तो बड़ा सुंदर शब्द, छिन्न कर देना। छिन्न माने विदर्ण, टुकड़े-टुकड़े, फाड़ देना। ज्ञान का काम है, संशय को छिन्न-भिन्न कर देना। समझ में आ रही है बात? तो योग, कर्म सन्यास और संशय मुक्त। कैसे साथ चलते हैं? कल लिखिएगा। तभी से मिल गई आपको एक्टिविटी। कर्तव्य जीवन का बोझ है। लेकिन कर्तव्यों की अपेक्षा क्रीड़ा, बस उसका अधिकार है जो आत्मज्ञानी है। जो आत्मज्ञानी नहीं है और अपने कर्तव्य त्याग रहा है, वह वास्तव में कर्तव्यों में बस फेरबदल कर रहा है। वो एक तरह का कर्तव्य छोड़ के दूसरे तरह का कर्तव्य पकड़ रहा है। उदाहरण देता हूं। इनको मैंने बोला, कुछ काम कर लो। इन्हें खुद तो वो करना नहीं था। तो बाहर से कोई मालिक बन के इनको बता रहा है, कुछ काम कर लो। मैं जो बता रहा हूं, वो क्या हुआ? इनका कर्तव्य हुआ। एक मालिक ने कुछ बता दिया, वो करो। जो मालिक है, बाहर का है। भीतर वाला नहीं मालिक है। बाहर के मालिक ने एक कर्तव्य दे दिया। इतने में इन्होंने कहा, कुछ खा-पी के थोड़ा सो जाया जाए। और यह जो मैंने काम दिया था, उसको त्याग करके बढ़िया खा-पी के मस्त सो गए। तो क्या यह कर्तव्य विमुख हुए हैं? क्या इन्होंने कर्तव्य छोड़ दिया? नहीं। इन्होंने बस यह करा है कि सामाजिक मालिक के कर्तव्य को छोड़कर शारीरिक मालिक का कर्तव्य स्वीकार कर लिया। सिर्फ आत्मज्ञानी ही कर्तव्य का त्याग कर सकता है। बाकी लोग अगर चाहे भी कि मैं कोई कर्तव्य नहीं मानता, तो भी उन्हें कर्तव्य मानना पड़ेगा। वो बस इतना करते हैं कि एक मालिक का कहा कर्तव्य छोड़कर दूसरे।

मालिक के कर्तव्य को मानने लगते हैं। बॉस का कर्तव्य छोड़ के किस मालिक का कर्तव्य मान लिया? शरीर का। शरीर मालिक बन बैठा है। शरीर ने बोला चल सो मैं सो गया। और फिर हो सकता है कोई तीसरा मालिक आ जाए। वो बोले चल उठ। तो उठ भी जाएंगे।

कर्तव्य माने दासता गुलामी। जो आत्मज्ञानी नहीं है वो स्वामी नहीं है। जो आत्मज्ञानी नहीं है वो निरंतर दास रहेगा। फर्क बस इसमें पड़ सकता है। लगातार अंतर इसमें आ सकता है कि किसका दास है। हमने कहा हम अपने मालिक बदलते रहते हैं। हम अपनी गुलामी कभी नहीं बदलते। तो जब कोई कहता भी है ना कि साहब हम कोई कर्तव्य नहीं मानते। रिस्पांसिबिलिटी वगैरह हमारे लिए नहीं है। हम किसी की ड्यूटी नहीं बजाते। लोग ऐसे बोलते भी हैं ना वो झूठ बोल रहे हैं। वो अधिक से अधिक यह कर रहे होंगे कि वो उसकी ड्यूटी नहीं बजा रहे जिसकी ड्यूटी सब बजा रहे हैं। वो किसी और की ड्यूटी पे होंगे। पर ड्यूटी पर तो होना पड़ेगा।

कर्तव्य सजा है नासमझी की। पुराना एक प्रकरण है। YouTube पर मिल भी जाएगा। जिसके पास समझदारी नहीं है उसे कर्तव्यों का पालन करना पड़ेगा। कर्तव्य माने गुलामी। आमतौर पे हमने इसको तो ऐसे देखा नहीं। हम कह देते हैं अरे बड़ा कर्तव्यशील बालक है। हम सोचते हैं तारीफ कर दी। वो अपने सब कर्तव्यों का निर्वाह करता है। हम सोचते हैं कि हमने किसी को ऊंचा बता दिया। नहीं जो कर्तव्यों का निर्वाह कर रहा है वह गुलाम है।

श्री कृष्ण की दुनिया में कोई कर्तव्य नहीं होता। वहां मुक्ति होती है बस। क्रीड़ा हो सकती है। कर्तव्य नहीं हो सकता। प्रेम हो सकता है। जिम्मेदारी नहीं हो सकती। गंदा शब्द है जिम्मेदारी। घटिया शब्द है जिम्मेदारी। प्रेम प्यारा शब्द है। जिम्मेदार लोगों के लिए गीता है ही नहीं। गीता उनके लिए है जो सब जिम्मेदारियों से आजाद होना चाहते हो और सब जिम्मेदारियों से आजाद होने का मतलब यह नहीं है कि दुनिया की गुलामी छोड़ के शरीर की और वृत्तियों की और वासनाओं की गुलामी शुरू कर दी जिसको किसी की गुलामी नहीं करनी ना समाज की ना शरीर की गीता उनके लिए है जो अभी गुलामी में ही पारिश्रमिक पा रहे हैं परिणाम पा रहे हैं सुरक्षा पा रहे हैं। उनके लिए गीता है ही नहीं। गीता उनके लिए है जिन्हें बेइंतहा प्यार है आजादी से। समझ में आ रही है बात?

मालिक बदलने का खेल नहीं है ये। कि पहले इसको शतशत नमन करते थे। अब इसको शतशत नमन कर लिया। अरे बांट तो दिया करो कम से कम। शत माने 100 या शतशत बोल रहे हो तो चलो 200 हो गया। तो जब एक जगह कर आते हो तो उसको बोला करो शत नमन और दूसरे को बोलो शत नमन। इतना ही था तुम्हारे पास 200 तो 200 उसको इसको कैसे दे आए? हम बस यही करते हैं। इधर भी मालिक और उधर भी मालिक। और तुम्हारा मालिक बनकर खुश वही होगा जो खुद गुलाम होगा। जो खुद आजाद होगा उसे बड़ी कोफ्त होगी जब तुम उसे अपना मालिक बनाओगे। वो तुम्हारा मालिक नहीं बनना चाहता। वो चाहता है तुम स्वयं अपने मालिक रहो।

कर्म बंध समझ रहे हो ना? आत्म अज्ञान का सीधा परिणाम है कर्म बंध। जहां आत्मज्ञान होगा वहां कर्म बंध होगा। कर्म बंध का ही दूसरा नाम बताओ जल्दी से। कर्तव्य। कर्म बंध का ही दूसरा नाम है कर्तव्य।

कर्म सन्यास क्या है? यह प्रण कि दासता के केंद्र से जो कर्म करते थे अब नहीं करूंगा। यह कर्म सन्यास है। आने वाले किसी सत्र में हम कर्म योग और कर्म सन्यास की तुलना करेंगे। बड़ा अच्छा रहता है। बात और स्पष्ट होती है।

वास्तविक सन्यास क्या है? कोई पूछे क्या तुम सन्यासी हो? एकदम ऐसे छाती ठोक के कहो हां मैं सन्यासी हूं। और सन्यास का क्या मतलब है? कर्म सन्यास कर्म सन्यास माने जितने झूठे कर्तव्य थे उनसे मैंने अब मुंह मोड़ लिया एक कर्तव्य है मेरा किसकी ओर है वो कृष्ण की ओर है एक कर्तव्य है एक मालिक है कौन है मालिक और कृष्ण माने जो भीतर सच्चा केंद्र है उसको हृदय बोल लो सत्य बोल लो बाकी दुनिया भर की हम बातें अब सुनते ही नहीं यही कर्म सन्यास है कर्तव्य व्य का विसर्जन ही कर्म सन्यास है। और जब तुम दुनिया के कर्तव्यों को बोलते हो गुड बाय अलविदा सिर्फ तब तुम इस लायक हो पाते हो कि अपने कृष्ण कर्तव्य का पालन कर सको। यह दोनों काम एक साथ नहीं हो सकते। कबीर साहब कहते हैं रवि रजनी एक साथ नहीं चल सकते। गाइएगा अभी कि ठीक वैसे जैसे सूरज और अंधेरा एक साथ नहीं चल सकते। रवि और रजनी एक साथ नहीं चल सकते। वैसे ही तुम एक साथ दोनों को मालिक नहीं स्वीकार कर सकते। अगर कृष्ण तुम्हारे मालिक हैं तो सामाजिक कर्तव्य छोड़ने पड़ेंगे। और अगर समाज का ही तुम्हें हुक्म बजाना है तो काहे के लिए कृष्ण कृष्ण गीता गीता कर रहे हो झूठे हम्म।