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एक मुल्क में एक बादशाह राज करता था। उसकी सल्तनत बहुत वसीय थी और उसका खजाना भरा हुआ था। मगर बादशाह हर वक्त गमगीन रहता।
उसकी वजह यह थी कि उसका इकलौता बेटा शहजादा हसन एक दिन शिकार पर गया, मगर वापस ना लौटा। बाप ने शहजादा की तलाश में अपने सिपाहियों को मुल्क के हर हिस्से में फैला दिया। कोई जगह ऐसी ना थी जहाँ सिपाही ना पहुंचे हों। मगर शहजादा कहीं ना मिला। उस दिन से बादशाह और मल्लिका का सुकून तबाह हो गया और वे दोनों गमगीन रहने लगे। मल्लिका तो चारपाई से लग गई, यानी हर वक्त बीमार रहने लगी। उन दोनों के लिए यह हादसा ऐसा था जिसे वे कभी ना भूल सकते थे।
एक दिन मल्लिका अपनी मर्दाना पर लेटी हुई बाहर की तरफ देख रही थी कि अचानक उस खिड़की में एक तोता बैठा। उसके मुँह में एक अंगूठी थी। मल्लिका की नज़र जब अंगूठी पर पड़ी तो वह चौंक पड़ी और उठकर बैठ गई। तोते ने वह अंगूठी मल्लिका के आगे फेंक दी और उड़ गया। मल्लिका बेचैन होती हुई जल्दी से वह अंगूठी उठा ली और खुशी से चिल्लाने लगी। देखते ही देखते कनीज़ें उसके इर्द-गिर्द जमा हो गईं। बादशाह भी दौड़ता हुआ आया। मल्लिका ने वह अंगूठी बादशाह को दिखाई और सारा वाकया सुनाया। बादशाह ने भी शहजादा हसन की अंगूठी पहचान ली।
उसने फौरन दरबार लगाया। तमाम दानाओं और नजूमियों को बुलाया और इस वाकये के मुताल्लिक बताकर उनसे राय ली। एक सड़े हुए बूढ़े ने खड़े होकर कहा, "बादशाह सलामत, शहजादा के गायब होने में ज़रूर किसी जिन्न, परी या जादू का ताल्लुक है। वो तोता ज़रूर कोई जिन्न या परी होगा जिसे शहजादा पर तरस आ गया। वो शहजादा की मदद करने में बेबस होगा। इसीलिए उसने शहजादा की अंगूठी यहाँ तक पहुंचाई कि हम लोग खुद ऐसा कोई जरिया तलाश करें जिससे शहजादा की रिहाई हो।"
इस शख्स की बात सुनकर बादशाह ने कहा, "ऐ दाना शख्स, तो फिर अब तुम ही बताओ हमें क्या करना चाहिए?"
"हुज़ूर, जिस तोते ने शहजादा की अंगूठी यहाँ तक पहुंचाई है, वो ज़रूर फिर आएगा और उसी से शहजादा के बारे में मालूमात हासिल हो सकती है। शायद वो हमारी मदद करे या कोई अच्छा मशवरा दे जिससे शहजादा की बज़याबी में मदद मिल सके।"
उस शख्स ने कहा, "हाँ, तुम्हारी बात दिल को लगती है।" यह कहते हुए बादशाह ने दरबार बर्खास्त किया। अब वो ज़्यादातर मल्लिका के कमरे में रहता और तोते की राह देखता रहता।
उस दाना शख्स की बात सच्ची साबित हुई। एक दिन वो तोता उस खिड़की में आ बैठा। बादशाह और मल्लिका ने उसे देखा तो उनके दिलों की धड़कनें तेज़ हो गईं। आख़िर बादशाह ने हिम्मत करके तोते से कहा, "तुम जो भी हो, ख़ुदा के लिए हमारी मदद करो और बताओ कि हमारा बेटा कहाँ और किस हाल में है।"
बादशाह का इतना कहना था कि तोता कमरे में आ गया और फिर उसने फनीजा में दो-तीन कलाबाज़ियाँ लगाईं और एकदम तोते से एक निहायत खूबसूरत परी के रूप में आ गया। मल्लिका और बादशाह उसे देखकर और भी हैरान हुए। वो परी बोली, "ऐ बादशाह, तुम्हारा बेटा वैसे तो ज़िंदा सलामत है, मगर सर्पराज की क़ैद में है।"
"आख़िर मेरे बेटे ने सर्पों के राजा का क्या बिगाड़ा था जो उसने उसे क़ैद कर लिया?" मल्लिका ने रोते हुए कहा।
"दरअसल बात यह है कि जिस दिन शहजादा हसन शिकार खेलने जंगल में गया, तो वो शिकार की तलाश में मरवाद की वादी में जा निकला। इत्तेफ़ाक़ से वहाँ सर्पराज और पतरंग राज, सांपों की एक नस्ल के राजा हैं। उनमें लड़ाई हो रही थी। पहले तो शहजादा उन दोनों सांपों को फुफकारते हुए एक-दूसरे पर हमला करते देखता रहा। मगर जब उसने देखा कि सर्पराज दूसरे सांप पर हावी हो रहा है, तो उसने तीर कमान पर चढ़ाकर सर्पराज के बेटे को निशाना बनाया। सर्प राज का बेटा शहजादा के तीर से ज़ख्मी होकर वहाँ से भाग निकला। पतरंग राज भी अपने इलाके में चला गया। वो भी खासा ज़ख्मी था। इस बात का पता जब सरपराज को हुआ कि एक इंसान के हाथों उसका बेटा ज़ख्मी हुआ है, तो वो आग बबूला हो गया और अपने सांपों के साथ शहजादा को तलाश कर लिया और फिर उसे घेर कर एक तारीक गार में क़ैद कर दिया।"
"मैं परिस्तान की शहज़ादी हूँ। जिस दिन यह वाकया रनुमा हुआ, इत्तेफ़ाक़ से उसी दिन मैं तिलिस्मी कुएं के साथ बैठी दुनिया का नज़ारा कर रही थी। अचानक सरपराज के बेटे और पतरंग राज की लड़ाई का मंज़र मेरे सामने आ गया और फिर जो कुछ हुआ, मैंने देखा। मुझे शहजादा पर बहुत तरस आया और मैंने इरादा कर लिया कि शहजादा की मदद करूँगी। मगर मैं जानती थी कि सरपराज बहुत ताक़तवर है। वो अपनी ताक़त से मुझे भी जलाकर भस्म कर सकता है। मगर फिर भी मैं उस गार में पहुँची। मैंने देखा सरापराज ने गार पर कोई जादू किया हुआ है जिसकी वजह से शहजादा गार से बाहर निकल नहीं सकता। मैंने शहजादा से कहा कि वो मुझे अपनी निशानी दे ताकि मैं उसके माँ-बाप को उसके बारे में बता सकूँ। इस पर उसने अपनी अंगूठी उतार कर गार से बाहर फेंक दी और बताया कि वो फलां मुल्क का शहजादा है। तो उस अंगूठी को लेकर मैं यहाँ आई और तोते के रूप में वह अंगूठी मल्लिका के आगे डाल दी और वापस चली गई। मैं चाहती थी पहले आप लोग यह जान लें कि आपका बेटा ज़िंदा और सलामत है। अब मैं दोबारा आई हूँ ताकि आपको मशवरा दूँ कि आप लोग क्या करें?"
"हाँ, ऐ नेक दिल परी, जल्दी से बताओ हमें क्या करना चाहिए?" बादशाह ने बेताब होकर कहा।
"ऐ बादशाह, जैसा कि मैंने बताया था कि शहजादा ने पतरंग राज की मदद की थी। अब अगर आप लोग चाहते हैं कि सरपराज की क़ैद से शहजादा को आज़ाद करवाए, तो उसके लिए पतरंग सांप के पास जाना होगा। इस काम के लिए कोई बहुत ही बहादुर नौजवान की ज़रूरत है। वो पतरंग राज सांप के पास जाए जो यहां से शुमाल की जानिब सैकड़ों कोस के फासले पर अपनी वादी में रहता है। पतरंगराज को जब यह पता चलेगा कि उसका मोहसिन सरपराज की क़ैद में है, तो वो ज़रूर उसकी मदद करेगा।"
"ऐ बादशाह, मैं जाती हूँ। ख़ुदा करे तुम लोग शहजादा को उस ज़ालिम सांप की क़ैद से आज़ाद करवा सको।" यह कहते हुए परी गायब हो गई।
बादशाह ने तमाम मुल्क में ऐलान करवा दिया कि जो नौजवान शहजादा की मदद को जाना चाहे, वो चांद की पहली तारीख को महल के बाहर जमा हो जाए। भला ऐसा कौन नौजवान था जो शहजादा की मदद को तैयार ना होता। वो अपने शहजादा के लिए जान दे सकते थे। और फिर चांद की पहली तारीख को बादशाह के महल के बाहर हज़ारों नौजवान जमा हो गए। अब बादशाह को उनमें से किसी एक का इंतख़ाब करना था। उसने उसी दाना शख्स को मुकर्रर किया। अब नौजवान बारी-बारी बादशाह और उस शख्स के सामने से गुज़रने लगे। मगर उस दाना शख्स को उनमें से कोई एक नौजवान भी ऐसा ना लगा जो इस काम के लिए भेजा जाए।
जब सब नौजवान चले गए, तो बादशाह ने हैरान होकर उस दाना शख्स से कहा, "ऐ बूढ़े, क्या तुम्हें इन नौजवानों में से एक भी इस क़ाबिल दिखाई ना दिया जो शहजादा की मदद को जा सके? हालांकि इनमें से कई नौजवान निहायत ताक़तवर और बड़े कद-काठी के थे।"
"बादशाह सलामत, सिर्फ ताक़तवर होना कोई मानी नहीं रखता। इस मुहिम में वही कामयाब हो सकता है जो ताक़तवर भी हो, बहादुर भी हो और उसके साथ निहायत ज़हीन भी हो।"
"तो फिर अब क्या किया जाए?" बादशाह ने कहा।
"हुज़ूर, परेशान होने की ज़रूरत नहीं। मेरा एक बेटा है जो अल्लाह के नेक बंदों की सोहबत में रहता है और हर वक्त ख़ल्क़े ख़ुदा के कामों के लिए खुद को कमर बस्ता रखता है। मुझे उम्मीद है वो इस काम को बखूबी अंजाम दे सकता है।"
"वो शख्स बोला, जब तुमने ऐलान किया था, तो वो नौजवानों में शामिल क्यों ना हुआ?" बादशाह ने पूछा।
"हुज़ूर, पिछले दिनों मेरे गांव की एक औरत के बच्चे को एक देव उठाकर ले जा रहा था कि मेरे बेटे की नज़र उस पर पड़ गई। मेरे बेटे ने उसे ललकारा, जिस पर वो रुक गया। मेरे बेटे ने उससे कहा कि वो लड़के को छोड़ दे। उस देव ने कहा, अगर वो कुश्ती लड़कर उसे हरा दे, तो लड़के को आज़ाद कर ले। मेरा लड़का तैयार हो गया। फिर उन दोनों में लड़ाई शुरू हो गई जो कई घंटों तक होती रही। वो दोनों बुरी तरह ज़ख्मी हो गए। आख़िर मेरे बेटे ने, जो निहायत ज़हीन भी है, उस देव को हलाक कर दिया। मगर वो खुद भी इतना ज़ख्मी हो चुका था कि उसके ज़ख्म अभी तक भरे नहीं। यही वजह थी कि वो उन नौजवानों में शरीक ना हुआ। बस और चंद दिन की बात है। जब वो सेहतयाब हो जाएगा, तो मैं उसे इस मुहिम पर रवाना कर दूँगा।"
उस दाना शख्स की बात सुनकर बादशाह बहुत मुतासिर हुआ और उसे उम्मीद हुई कि वाकई ऐसा बहादुर नौजवान ही मेरे बेटे को आज़ादी दिलवा सकता है। और फिर जब वो नौजवान सेहतयाब हो गया, तो वो शख्स उसे लेकर बादशाह के दरबार में आया। बादशाह ने देखा, वो निहायत वसीह-ओ-उज-जान नौजवान था। बिल्कुल शहजादा दिखाई देता। निहायत मज़बूत कद-काठी के साथ उसके चेहरे से जान टपकती थी।
"ऐ नौजवान, हम तुम्हारे बाप की ज़ुबानी तुम्हारी तारीफ़ तो सुन चुके थे, मगर तुम्हें देखकर अंदाज़ा हुआ कि तुम्हारे बाप ने तुम्हारी कुछ कम ही तारीफ़ की थी। मेरा ख़्याल है उस दाना बूढ़े ने तुम्हें सारी सूरते हाल बता दी होगी। अब मैं तुमसे पूछता हूँ कि क्या तुम दिल से इस मुहिम पर जाने के लिए तैयार हो? कहीं अपने बाप की वजह से तो राज़ी ना हुए?" बादशाह ने पूछा।
"नहीं हुज़ूर, यह बात नहीं। इस मुल्क के दूसरे नौजवानों की तरह मेरे दिल में भी यह तड़प थी कि मैं शहजादा की तलाश में निकलूँ। मगर मैं ज़ख्मों से निढाल था। अब जबकि मैं बिल्कुल सेहतयाब हो चुका हूँ, तो मुझे इस मुहिम पर रवाना होते हुए निहायत ख़ुशी महसूस हो रही है। अब तो मैं आपसे इजाज़त और दुआएं लेने के लिए हाज़िर हुआ हूँ।" उस नौजवान ने कहा।
"शाबाश, हमें तुम्हारा जवाब सुनकर मसरूर हुए। मगर नौजवान, अभी तक हम तुम्हारे नाम से वाकिफ़ ना हुए। क्या नाम है तुम्हारा?" बादशाह ने पूछा।
"हुज़ूर, मुझे अकबर कहते हैं।" नौजवान ने कहा।
"अच्छा, तो अकबर, तुम हमारे अस्तबल से जिस घोड़े को पसंद करो, वो ले सकते हो। इसके अलावा हमने ख़ज़ंची से कह दिया है कि तुम्हें जिस चीज़ की ज़रूरत हो, वो तुम्हें मुहैया करे। अब तुम जा सकते हो। हमें उम्मीद है कि तुम हमारे लिए ख़ुशियां लेकर लौटो।"
और फिर दाना शख्स का वो नेक और रहमदिल बेटा एक निहायत तेज़ रफ़्तार घोड़े पर सवार होकर सबसे पहले अपने बूढ़े की ख़िदमत में हाज़िर हुआ, जिनसे वो इल्मी और रूहानी फ़ैज़ हासिल करता रहा था। उस बूढ़े ने जब अकबर को देखा, तो मुस्कुराए और बोले, "बेटे अकबर, हमें ख़ुशी है कि तुम हर वक्त ख़ल्क़े ख़ुदा की ख़िदमत के लिए कमर बस्ता रहते हो। मगर क्या तुम जानते हो, जिस मुहिम पर तुम जा रहे हो, वो निहायत ख़तरनाक है?"
"हाँ बाबा, मुझे कुछ-कुछ अंदाज़ा है। इसीलिए मैं आपकी ख़िदमत में हाज़िर हुआ हूँ कि आप मेरी रहनुमाई फ़रमाएं।" अकबर ने निहायत अदब से गुज़ारिश की।
"बेटे, सांप अज़ल से इंसान का दुश्मन रहा है। बाबा आदम से लेकर अब तक यह दुश्मनी चली आ रही है। तुम जिस सांप के पास जा रहे हो, वो भी सांप ही है। और उससे किसी नेकी की उम्मीद ना रखना। अलबत्ता उसके मक्कारों और फ़रेब से बचना। अब तक तुम्हें बहुत से वज़ाइफ़ दिए गए हैं जिनकी बरकतों और क़ुवतों से तुम आगाह हो। एक वज़ीफ़ा और याद कर लो। और ख़ुदा ने चाहा तो तुम इंसान के इस अज़ली दुश्मन से महफ़ूज़ रहोगे।" और फिर उस बूढ़े ने अकबर को एक वज़ीफ़ा याद कराया और दुआओं के साथ रुख़सत किया।
अकबर शहर से निकल कर शुमाल की जानिब चल पड़ा। उसने शाही अस्तबल से निहायत मुजर्रब घोड़ा लिया था, जो उसके एड़ लगाते ही हवा से बातें करने लगा। सारा दिन के मुसलसल सफ़र के बाद अकबर पहाड़ी इलाके में दाख़िल हो चुका था। उसके घोड़े के टाप से तमाम पहाड़ियां गूंजने लगीं। सूरज गुरूब हो चुका था और अंधेरा तेज़ी से अपना राज़ जमाने लगा था। अकबर ने सोचा, यहाँ रुक कर रात किसी गार में बसर करनी चाहिए और फिर उसने घोड़े की लगाम खींच ली। घोड़ा भी दौड़ते-दौड़ते पसीने में नहा गया था। हालांकि यह इलाका पहाड़ी था और यहाँ गर्मी का नामोनिशान ना था। अकबर ने घोड़े की लगाम एक दरख़्त के तने के साथ बांध दी और चारों तरफ़ निगाह दौड़ाई ताकि कोई गार नज़र आ जाए और फिर उसे एक गार नज़र आ गई, जो कुछ बुलंदी पर थी। अकबर उस गार तक पहुँचने के लिए पहाड़ पर चढ़ने लगा।
गार के क़रीब पहुँचा तो उसने देखा, गार अंदर से काफ़ी तारीक था। एक नज़र उसने आसमान पर डाली, जहाँ काली घटाओं के बादल उमड़ चले आ रहे थे और किसी वक्त भी बारिश हो सकती थी। वैसे भी अंधेरा ख़ासा गहरा हो गया था। वो चंद क़दम आगे बढ़ा कि अचानक एक ज़बरदस्त कड़क का हुआ और चारों तरफ़ रोशनी फैलती चली गई। पहले तो अकबर ने समझा यह बिजली की कड़क और रोशनी है। मगर जब उसने गौर किया तो कुछ ख़ौफ़ज़दा हो गया, क्योंकि आसमान पर से जैसे आग के गोले गुज़र रहे थे। धमाकों पर धमाके हो रहे थे। उसके साथ ही पहाड़ जैसे लरज उठे और उनके बड़े-बड़े पत्थर लुढ़कने लगे। अकबर गार के एक कोने में दबक कर बैठ गया। उसमें घबराहट तो थी, मगर ख़ौफ़ ना था, क्योंकि वो सिर्फ़ ख़ुदा से डरने वालों में से था। घबराहट भी अपने घोड़े की वजह से थी कि ना जाने उस पर क्या बीत रही होगी।
अभी चंद लम्हे गुज़रे थे कि अकबर को एक गड़गड़ाहट भरी आवाज़ सुनाई दी। अकबर ने पलट कर देखा तो उसके सामने आग का राक्षस था। उसका तमाम जिस्म आग का था। उसके जिस्म से शोले लपक-लपक कर पहाड़ों के दरख़्तों को ख़ाक सतर कर रहे थे। उसका क़द इतना ऊंचा था कि एक पांव एक पहाड़ी के इस तरफ़ था, तो दूसरा पहाड़ी की दूसरी तरफ़। "ऐ आदमी, तूने मेरे इलाके में आने की जुर्रत कैसे की? तूने बहज़ाद देव को हलाक कर दिया था। ज़रा मेरी तरफ़ तो आ। अगर जलाकर ख़ाक ना कर दिया, तो आग का राक्षस ना कहना।"
अब अकबर को अंदाज़ा हुआ कि आग का राक्षस सामने खड़ा है। हालांकि अब राक्षस फ़रलांग भर के फ़ासले पर था, मगर उसके जिस्म के शोले की तपिश से अकबर का जिस्म पसीने में नहा गया। अब वो राक्षस के सामने तन कर खड़ा हो गया और बोला, "ऐ राक्षस, तुझको जहन्नुम की आग ही जलाएगी। दुनिया की आग तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती। अलबत्ता पानी तुझे ठंडा कर सकता है।" यह कहते ही अकबर एक वज़ीफ़ा पढ़ने लगा। उसकी बात सुनकर राक्षस गुस्से से पागल हुआ और आगे बढ़ा ताकि उसे अपनी लपट में लेकर भस्म कर दे। उसके साथ ही अकबर को यूं लगा जैसे आग ने उसे अपनी लपट में ले लिया हो। इससे पहले कि वो और उसका लिबास जलकर राख हो जाए, एक बहुत बड़ा सब्ज़ हाथ नुमूदार हुआ, जिसके क़रीब आते ही उसे आग की तपिश ख़त्म होने और ठंडक का एहसास हुआ। अकबर उछल कर उस हाथ पर चढ़ गया। उस हाथ ने उसे दूर एक पहाड़ी की चोटी पर उतार दिया, जहाँ से उसे आग का राक्षस तो नज़र आ रहा था, मगर वहाँ तक उसके जिस्म की तपिश ना पहुँचती थी।
और फिर अकबर ने देखा, उसके वज़ीफ़े की बरकत से आसमान पर छाई हुई काली-काली घटाएं बरसने लगीं। पानी की बौछार जैसे-जैसे उस राक्षस पर पड़ रही थी, उसके मुँह से ख़ौफ़नाक चीख़ें बुलंद होने लगीं। इर्द-गिर्द के तमाम पहाड़ गूंज और लरज उठे। ज्यों-ज्यों बारिश तेज़ हो रही थी, त्यों-त्यों उस राक्षस का जिस्म आग की बजाय धुएं में बदलता जा रहा था। और फिर अकबर ने देखा, वो धुआं भी कम होते-होते बिल्कुल ख़त्म हो गया। उसके साथ रोशनी की जगह तारीकी ने ले ली। अकबर जिस पहाड़ पर खड़ा था, वहाँ अभी तक बारिश शुरू ना हुई थी, मगर बादलों के आसार ऐसे थे कि बरसते-बरसते वो तमाम इलाके को अपनी लपट में ले लेंगे। अकबर ने उस पहाड़ पर से उतर कर एक गार में पनाह ले ली और तमाम रात उसी गार में गुज़ारी। सुबह होने से पहले न सिर्फ़ बारिश रुक गई थी, बल्कि बादल भी छंटने लगे थे और फिर फ़ज्र की नमाज़ उसने उसी गार में पढ़ी और ख़ुदा का नाम लेकर वो गार से बाहर निकल आया। उस वक़्त मशरिक़ से सफ़ेदी नुमूदार होने लगी थी।
अकबर उस सिम बढ़ा जहाँ उसने घोड़े को बांधा था। वहाँ पहुँचा तो उसकी हैरत की इंतेहा ना रही कि उस तमाम इलाके के दरख़्त और झाड़ियां तो जलकर राख में तब्दील हो चुकी थीं, मगर न सिर्फ़ उसका घोड़ा, बल्कि जिस दरख़्त के साथ उसे बांध कर गया था, वो भी महफ़ूज़ था। अकबर ने ख़ुदा का शुक्र अदा किया और घोड़े पर सवार होकर आगे चल दिया। यहाँ वीरान और पथरीली ज़मीन होने के बावजूद उसका घोड़ा निहायत तेज़ रफ़्तार से दौड़ता रहा। यहाँ तक कि उसके सामने निहायत बुलंद-ओ-बाला पहाड़ नुमूदार हो गए। मगर अकबर ने देखा, उनके दरमियान एक दर्रा था और फिर वो उस क़ुदरती रास्ते पर हो लिया। बुलंद-ओ-बाला पहाड़ों के दरमियान यह रास्ता चंद घंटों की मसाफ़त का था। जब अपने घोड़े पर सवार उस दर्रे की दूसरी तरफ़ पहुँचा, तो आगे बुलंद-ओ-बाला पहाड़ों की बजाय खुला अंबार और सरसब्ज़ इलाक़ा था। दूर तक हरियाली ही हरियाली थी। फूलों के लदे बाग़ थे। पानी के चश्मे थे। फिर उसने सोचा, यहाँ कुछ देर आराम कर लिया जाए ताकि उसका घोड़ा, जिसने 24 घंटों से न कुछ खाया था, न पानी पिया था, यहाँ सरसब्ज़ घास खा ले और पानी भी पी ले। उसे ख़ुद भी बहुत भूख लगी थी और फिर उसने घोड़े को खुला छोड़ दिया, जो तेज़ी के साथ घास चराने लगा। अकबर ने भी एक दरख़्त से कुछ फल तोड़कर खाए और एक चश्मे से पानी पिया और सोने के लिए एक दरख़्त की छांव में लेट गया। उसके साथ ही उसकी आंख लग गई।
वो कोई घंटा भर ही सोया होगा कि शायद मक्खियों की भन-भन की वजह से उसकी आंख खुल गई। आसमान पर इन मक्खियों के झुंड उड़ रहे थे। कुछ देर के लिए सूरज भी छुप गया। जब मक्खियां वहाँ से गुज़र गईं, तो अकबर उठा और घोड़े की तरफ़ बढ़ा, जो कुछ फ़ासले पर अभी घास चर रहा था और फिर वो सवार होकर आगे बढ़ा।
कई मंज़िलें तय करने के बाद वो एक ऐसे इलाके में पहुँचा जहाँ छोटी-छोटी पहाड़ियां थीं। जिस बात ने उसे हैरान किया, वो यह थी कि यूं महसूस होता था जैसे इन पहाड़ियों को इंसान ने तराश-खराश कर अजीबोगरीब किस्म की इमारतों और मूर्तियों में ढाल दिया हो। उसने घोड़े की रफ़्तार कम कर दी ताकि उन मंज़रों से लुत्फ़ंदोज़ हो सके और फिर अचानक एक हादसा पेश आ गया। उसका घोड़ा ऊंधे मुंह गिर पड़ा, तो अकबर संभल गया, वरना वो भी कलाबाज़ी खाता हुआ गिर पड़ता। एक तरफ़ खड़े होकर घोड़े को देखने लगा। घोड़ा ज़मीन पर पड़ा लंबे-लंबे सांस लेने लगा और उसके मुँह से नीली-नीली झाग के साथ ख़ून भी बहने लगा। अकबर समझ गया कि घोड़े को ज़रूर किसी ज़हरीले कीड़े ने काट लिया है।
अब जब उसने इधर-उधर निगाह दौड़ाई, तो चंद गज़ के फ़ासले पर उसे एक स्याह सांप अपना ख़ौफ़नाक फ़न उठाए खड़ा नज़र आया। अकबर को बहुत गुस्सा आया। उसने मियान से तलवार निकाली और आगे बढ़कर चाहता ही था कि उसकी गर्दन उड़ा दे, कि फिर वो रुक गया कि कहीं यह पतरंग सांप या उसकी नस्ल का कोई और सांप ना हो। वो तो पतरंग सांप की ही तलाश में इधर आया था। सांप ने जो उसे हमला करते देखा, तो वो उछल कर चंद फुट दूर जाकर गिरा। मगर यूं लगता था जैसे निहायत गुस्से की हालत में हो। मगर अकबर ने उसकी इस हालत की परवाह ना की और बोला, "क्या तुम पतरंग सांप राजा हो?" इस नाम को सुनकर सांप का गुस्सा जाता रहा। उसने अपना फ़न ज़रा ढीला छोड़ दिया, जिससे ज़ाहिर होता था कि इस नाम को सुनकर वो नरम पड़ गया है और फिर वो एक सिम रेंगने लगा। मगर जब उसने देखा कि वो शख्स वहीं खड़ा उसे देखे जा रहा है, तो वो फिर रुक गया। मगर अकबर वहीं खड़ा रहा। अब वो सांप दोबारा वापस आकर उसी जगह रुक गया और सर से उसे चलने का इशारा किया।
मगर अकबर इशारा समझने के बावजूद वहीं खड़ा रहा और बोला, "ऐ सांप, तूने मेरे साथी को डसकर बहुत बुरा किया। मगर मेरे पास तो कोई दूसरी सवारी भी नहीं।" उसका इतना कहना था कि सांप रेंगता हुआ उस घोड़े के क़रीब आया, जो ज़हर से मर चुका था और फिर उसने ज़ख़्म वाली जगह पर अपना मुँह टिका दिया। अभी उसने मुँह हटाया भी ना था कि घोड़े के जिस्म में हलचल पड़ गई और देखते-ही-देखते वो ठीक हो गया और दोबारा उठकर खड़ा भी हो गया। यह देखकर अकबर को बड़ी हैरत हुई और वो अपने घोड़े की लगाम पकड़े उस सांप के पीछे चल पड़ा। उसे एहसास हो चुका था कि मंज़िल पर पहुँच गया है। चलते-चलते अकबर उतराई में भी निगाह दौड़ाता रहा और हैरान होता रहा और फिर एक मक़ाम पर पहुंचकर सांप रुक गया। उसके बाद वो पहाड़ी पर चढ़ने लगा। अकबर ने भी उसके पीछे चलना चाहा कि वो सांप रुक गया और उसने ज़ोर से फुंकार मारी। उसका मतलब यह था कि अकबर वहीं रुक जाए और वो रुक गया। सांप रेंगता हुआ ऊपर चढ़ने लगा और फिर मंदिर नुमा एक इमारत के दरवाज़े में दाख़िल हो गया।
अकबर फिर उस पहाड़ी पर बनी हुई इमारतों को देखने लगा। हर मीनारत की खिड़की और दरवाज़े पर सांप मौजूद थे। सब अकबर की तरफ़ देख रहे थे। अकबर उन्हें देखकर ख़ौफ़ज़दा ना हुआ। फिर अचानक जहाँ वो सांप गया था, एक निहायत खूबसूरत औरत और एक ख़ूबसूरत मर्द नुमूदार हुए। दोनों के लिबास राजा और रानी जैसे थे। मर्द के सर पर सोने का ताज था, जिसमें निहायत नायाब हीरे और लाल जगमगा रहे थे। औरत ने भी बहुमूल्य जवाहरात जड़े जेवर पहने हुए थे। उसके सर पर भी ताज था। इन दोनों को देखकर अकबर अपने बादशाह और मल्लिका की शान भूल गया। उनके लिबास और ज़ेवारात उनके मुक़ाबले में कुछ भी ना थे।
और फिर अकबर ने देखा, वो दोनों आ रहे थे। "ऐ नौजवान, मुझे अंदाज़ा है कि तुम कोई मामूली इंसान ना हो, क्योंकि किसी इंसान का यहाँ तक पहुँचना तक़रीबन नामुमकिन है। मैं यह जानना चाहूँगा कि तुम यहाँ किस काम से आए हो?"
"मुझे यहाँ उस सांप राजा की तलाश ले आई है, जिसको बचाने की पादाश में हमारे मुल्क का शहजादा हसन सरपराज की क़ैद में है।"
"ऐ नौजवान, वो सांप राजा मैं ही हूँ। मुझे इस बात का इल्म ना था कि मेरा वो मोहसिन सरपराज क़ैद करेगा, वरना मैं उसे आज़ाद कराने के लिए ज़रूर कुछ करता। अब तुम ही बताओ, तुम क्या चाहते हो?" सांप राजा ने पूछा।
"मैं अपने शहजादा को हर क़ीमत पर सरपराज की क़ैद से आज़ाद कराना चाहता हूँ। मुझे अगर उस इलाके का पता होता, तो मैं यहाँ ना आता, सीधा वहीं जाता और अपनी जान पर खेलकर शहजादा को छुड़ा लाता।" अकबर कहता चला गया।
"आफ़रीन है ऐ शख्स, तुम पर। मैं तुम्हारी मदद ज़रूर करूँगा, मगर तुम्हें एक काम करना होगा।" सांप राजा ने कहा।
"मैं हर काम करने के लिए तैयार हूँ।"
"आज रात तुम यहीं मेरे महल में आराम करो। कल सुबह तुम्हें वो काम भी बता दिया जाएगा। इस वक़्त तुम थके हुए हो। तुम्हें आराम और खुराक की ज़रूरत है।" यह कहते हुए सांप राजा ने अकबर को अपने पीछे आने का इशारा किया। आगे-आगे सांप रानी थी और उसके पीछे सांप राजा। अकबर ने घोड़े को वहीं छोड़ दिया और सांप राजा के पीछे हो लिया।
सांप राजाओं के महल में दाख़िल हो गया। अकबर ने महल को अंदर से देखा, तो उसकी आंखें छलक उठीं। महल की दीवारों और छतों पर हीरे ही हीरे जड़े थे और दीवारों पर निहायत ख़ूबसूरत तस्वीरें आवेज़ थीं। एक और बात जिसने अकबर को हैरान कर दिया, सांप राजा और रानी की ख़िदमत में इंसानों ही के रूप में सांपने थीं। अकबर ने उन्हें इस तरह पहचाना कि उनकी भी आंखें ना झपकती थीं।
"लो नौजवान, तुम खाओ-पियो और उस महल में आराम करो। तुम्हारी ख़िदमत के लिए हमारी दासियां, यानी कनीज़ें मौजूद हैं। जिस चीज़ की ज़रूरत हो, बिला तकल्लुफ़ मांग लेना।" यह कहते हुए सांप राजा अपनी रानी के साथ वहाँ से चला गया।
सांप राजा की दासियों ने अकबर के सामने तरह-तरह के ख़ाने, फल और मशरूबात ला रखे, मगर अकबर ने किसी ख़ाने को हाथ ना लगाया। अलबत्ता फल ख़ूब पेट भरकर खाए और फिर एक निहायत आरामदेह मर्दाना जिस पर निहायत आला बिस्तर बिछा था, लेट गया और लेते ही उसकी आंख लग गई।
कोई आधी रात का वक़्त होगा। अचानक अकबर की आंख खुल गई। उसने देखा कि एक स्याह सांप उसके सीने पर अपना फ़न उठाए बैठा है। अकबर घबरा कर तेज़ी से उठा, तो वो सांप मर्दाना से नीचे गिर पड़ा। मगर उसके साथ ही वो इंसानी रूप में आ गया। अब जब अकबर ने देखा, तो पहचान गया, यह सांप रानी थी, जिसे शाम को उसने सांप राजा के साथ देखा था। सांप के चेहरे पर मुस्कुराहट थी। "ऐ बहादुर इंसान, मेरे शौहर तुझे एक ऐसी जगह भेज रहे हैं जहाँ से तेरा ज़िंदा बचना नामुमकिन है। तू फ़ौरन यहाँ से भाग जा। और एक बार तुझे शायद मालूम ना हो, सरपराज के बेटे और मेरे शौहर में सुलह हो गई है। अब वो एक-दूसरे के दुश्मन नहीं, दोस्त हैं। इसीलिए मेरा शौहर तुझे ऐसे मुक़ाम पर भेज रहा है, ताकि तेरा ख़ात्मा हो जाए। वो तो तुझे ख़ुद भी हलाक करना चाहता था, मगर उसका कोई मंत्र तुझ पर कारगार साबित ना हुआ और उसे पता चल गया कि तू जो भी हो, कोई ऐसी ताक़त रखता है जिसकी वजह से उसके मंत्र से बच रहा है।"
सांप रानी कहती चली गई। "ऐरत है तू? सांप राजा की बीवी होने के बावजूद मेरी मदद कर रही है।"
"हाँ, उसकी भी एक वजह है, वरना कोई बीवी अपने शौहर के ख़िलाफ़ नहीं जा सकती। दरअसल, सरपराज का बेटा मुझसे शादी करना चाहता है, जो कभी ना हो सकती। मेरे शौहर को भी वैसे ही हलाक करना चाहता था, ताकि मुझ पर क़ब्ज़ा कर सके। मेरे शौहर के ज़ख्मी होने के बाद सरपराज के बेटे के इरादे का पता चला, तो वो अपनी मर्ज़ी से ही मुझे छोड़ने पर तैयार हो गया और उसने सरपराज को पैग़ाम भी भेजा कि वो मुझे छोड़ने के लिए तैयार है, अगर मेरे बदले वो उसे अपनी एक ख़ास दासी, यानी कनीज़ दे दे। जिस पर सरपराज का बेटा राज़ी हो गया और इस तरह उनमें दोस्ती हो गई। अब सांप पचमी के तहव्वुर पर मेरा शौहर मुझे उसके हवाले कर देगा और मेरे बदले उस दासी को लाकर अपनी रानी बना लेगा। अब तुझे यह बात समझ में आ गई कि मैं तुझे मदद क्यों करना चाहती हूँ।"
सांप रानी ने कहा, "पहली बात तो यह कि मैं सांप राजा से वादा कर चुका हूँ कि जो काम मुझे कहेगा, मैं उसे ज़रूर अंजाम दूँगा। मैं मल्ला मुसलमान हूँ और वादे से नहीं पीछे हट सकता। दूसरा, तुम्हें मेरी फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं। मुझे अपने ख़ुदा से उम्मीद है कि वो मुझे हर मुसीबत से बचाएगा और जब मैं कामयाब लौटूंगा, तो तेरे शौहर को इस बात का पाबंद करूँगा कि वो तुम्हें ना छोड़े और सरपराज के बेटे की दासी का ख़्याल दिल से निकाल दे। अगर उसने मेरी बात ना मानी, तो देख लेना। मैं उसे ऐसी सज़ा दूँगा कि वो उस दासी को अपनी रानी बनाने के क़ाबिल ना रहेगा।"
अकबर कहता चला गया, "काश ऐसा हो।"
"ख़ुदा ने चाहा तो ऐसा ही होगा। अब तो जाओ और मेरी बात का यक़ीन रखो।" सांप रानी ने कहा।
सांप रानी चली गई और अकबर दोबारा सो गया। सुबह वो जल्दी उठता था और फ़ज्र की नमाज़ वक़्त पर अदा करता। इसी तरह वो सुबह उठा और नमाज़ से फ़ारग़ हुआ ही था कि सांप राजा और रानी आ गए।
"हाँ तो नौजवान, उम्मीद है तुम ख़ूब मजे से सोए होंगे। क्या अब तुम इस मुहिम पर जाने के लिए तैयार हो?"
"हाँ, बताओ, मैं वादे के मुताबिक़ तैयार हूँ।" अकबर ने कहा।
"तुम्हें बौनों की बस्ती में जाना होगा और उनसे अबकल जानवर की हड्डी लानी होगी। अगर तुम वो हड्डी ले आओ, तो मैं न सिर्फ़ तुम्हें सरपराज के इलाके के बारे में बता दूँगा, बल्कि तुम्हारी मदद भी करूँगा। मेरे दो सिपाही सांप तुम्हें बौनों की सरहद के क़रीब तक ले जाएंगे। आगे तुम्हें अकेले जाना होगा, क्योंकि बौने निहायत ज़ालिम और ऐसी क़ुवतों के मालिक हैं कि न तो पाताल और पाताल के नीचे कोई उनका मुक़ाबला कर सकता है।" यह कहकर सांप राजा ने ताली बजाई, तो दो हरे रंग के सांप आन मौजूद हुए। सांप राजा ने उन्हें सीटी नुमा ज़बान में कुछ कहा, तो वे दोनों अकबर के आगे चल पड़े।
पहाड़ी से नीचे उतर कर अकबर अपने घोड़े पर सवार हो गया, जो वहीं मौजूद था। अब आगे-आगे सांप थे और इनके पीछे अकबर का घोड़ा निहायत तेज़ी से दौड़ रहा था। एक जगह पहुंचकर दोनों सांप रुक गए। अकबर ने भी अपने घोड़े की लगाम खींच ली। इनमें से एक सांप ज़मीन पर लोटपोट हुआ और इंसानी रूप में आ गया। अकबर इसे हैरत से देखने लगा कि इसके रुकने और इंसानी रूप में आने का क्या मक़सद है।
"ऐ नौजवान, रानी ने मुझे पैग़ाम दिया है कि बौनों से तो आप अबकल जानवर की हड्डी ना मांगना, वो हड्डी इनके लिए निहायत मुक़द्दस है। बौने तुझे हलाक कर देंगे। अब तू आगे ख़ुद चल जा। इससे आगे जाना हमारे लिए ख़तरनाक होगा।" यह कहते हुए वो सांप दोबारा सांप के रूप में आ गया और वो दोनों सांप वापस चले गए।
अब अकबर आगे बढ़ा। वो ज्यों-ज्यों आगे बढ़ रहा था, जंगल ज़्यादा घना होता जा रहा था। घोड़े समेत आगे जाना मुश्किल होने लगा। मजबूरन उसे घोड़े को वहीं छोड़ना पड़ा। इसने तलवार से मन को काटते हुए आगे बढ़ने लगा। आगे जाकर झाड़ियों और सरकंडों में कमी आ गई, तो इसने तलवार दोबारा म्यान में रख ली। वो भी कुछ दूर ही गया होगा कि इसे एक शोर सा सुनाई दिया। मगर शोर ऐसा जैसे मक्खियां भिनभिना रही हों। वो कुछ और आगे बढ़ा, तो क्या देखता है कि एक बौना दलदल में फंसा हुआ है और बाकी बौने रस्सी की मदद से इसे खींच कर बाहर निकालने की कोशिश कर रहे हैं, मगर नाकामयाब।
यह देखते हुए अकबर, जिसमें देव से ज़्यादा ताक़त थी, आगे बढ़ा और इसने बौनों से रस्सी ले ली और ख़ुदा का नाम लेकर खींचने लगा। इसके ज़ोर लगाने से दलदल में फंसा हुआ बौना एक झटके के साथ दलदल से निकल आया और काफ़ी दूर जा गिरा। मगर अकबर जिस मुक़ाम पर खड़ा था, इसके ज़ोर लगाने से वहाँ की ज़मीन भी बैठने लगी। ज़मीन में जब झलझलाहट महसूस हुआ, तो बौने अपने इस बौने को उठाकर वहाँ से भागे। मगर अकबर दलदल में धंसने लगा। वो ज्यों-ज्यों ज़ोर लगाकर बाहर निकलने की कोशिश करता, और भी धंसने लगता। अब तो वो बहुत घबरा गया और दिल ही दिल में ख़ुदा को याद करने लगा। इसके दोनों हाथ बुलंद थे और वो गर्दन से ऊपर तक धंस चुका था। सिर्फ़ एक आधी इंच और धंस तो इसका मुँह और नाक दलदल में आ जाते और इसका दम घुट जाता।
मगर अचानक आसमान पर एक परी नुमूदार हुई। यह वही परी थी जिसने बादशाह और मल्लिका को शहजादे के बारे में बताया था कि वो सरपराज की क़ैद में है। इस परी ने अकबर के हाथ पकड़ लिए और उड़ते हुए निहायत ज़ोर लगाकर अकबर को ऊपर खींचने लगी और बहुत कोशिशों से इसे दलदल से निकालने में कामयाब हुई।
अकबर ने परी का शुक्रिया अदा किया और बोला, "ऐ परी, तू कितनी रहम दिल और नेक है, जो हम इंसानों की मदद करती रहती है।"
"तुम भी तो यही काम करती हो, जिनसे मैं बहुत मुतासिर हूँ। इस वक़्त रूए ज़मीन पर जिन्नों, परियों और इंसानों में तुम जैसी कोई नज़र ना आई। आज तुम्हारी मदद करते हुए मुझे बहुत ख़ुशी हुई है। अब मैं जा रही हूँ। ख़ुदा तेरी मदद करे।" यह कहते हुए परी वहाँ से चली गई।
अब अकबर आगे बढ़ा। कुछ फ़ासले पर एक चश्मा था। अकबर कपड़ों समेत चश्मे में उतर गया और ख़ूब मल-मल कर नहाने लगा, जिससे दलदल की मिट्टी इसके जिस्म और कपड़ों से साफ़ हो गई। दिन का तीसरा पहर था और तेज़ हवा चल रही थी। पानी से बाहर निकल कर इसने कपड़े सुखाए। इतने में क्या देखता है? सैकड़ों बौने झाड़ियों को हटाते हुए इसकी तरफ़ बढ़े चले आ रहे हैं। और फिर एक बौना इसके क़रीब आया और इसने अकबर का शुक्रिया अदा किया और बोला, "ऐ नेक इंसान, आज तुमने हमारे शहजादे की जान बचाकर हम पर बहुत बड़ा एहसान किया है। अब हमारे साथ चलो। हमारा बादशाह तुझे याद करता है। कुछ दिन हमारे पास रह, ताकि हम तेरी मेहमान नवाज़ी कर सकें।"
अकबर इन बौनों के साथ चल पड़ा। चलते-चलते शाम हो गई और फिर खुला मैदान आ गया। मैदान के बाहर छोटे-छोटे बहुत से मकान थे। इनमें एक निहायत ख़ूबसूरत इमारत थी, जिसकी दीवारें न जाने किस चीज़ की बनी हुई थीं कि फ़ानूस की तरह रोशन थीं। इस इमारत के बाहर हज़ारों बौने एक दायरे की शक्ल में बैठे हुए थे। वहाँ एक तख़्त बिछा हुआ था, जिस पर बौना बादशाह विराजमान था। अकबर को देखते ही बादशाह उठकर खड़ा हो गया और इसने अकबर का शुक्रिया अदा किया और फिर इसके सामने एक दस्तरख़्वान बिछा दिया गया, जिस पर तरह-तरह के लज़ीज़ ख़ाने मौजूद थे। कई दिनों बाद आज इसे निहायत लज़ीज़ खाना नसीब हुआ और इसने ख़ूब पेट भरकर खाया और ख़ुदा का शुक्र अदा किया और फिर इसके लिए खुले मैदान में बिस्तर बिछा दिया गया। मगर वो सोया ना, क्योंकि बौने तमाम रात नाच और ख़ुशियां मनाते रहे। वो भी उन्हें इस हालत में देखकर महफ़ूज़ होता रहा और फिर रात गई तक यह शोर-शराबा रहा। फिर कहीं जाकर बौने अपने-अपने घरों को लौटे और अकबर भी अपने बिस्तर पर लेट गया और फिर लेटते ही उसकी आंख लग गई।
वो ख़्वाब में क्या देखता है कि इसका शहजादा निहायत मुसीबत में है। तिलिस्मकार में इस पर बहुत ज़ुल्म हो रहा है। इसे सांप डसते हैं और जब वो मरने लगता है, तो इसका ज़हर चूस लेती है। यह अमल इस पर मुसलसल हो रहा है। यह देखते ही वो घबरा कर उठ बैठा। वो समझ गया कि इसका ख़्वाब सच्चा है। ज़रूर शहजादे के साथ ऐसा ही हो रहा है, जो इसने ख़्वाब में देखा है। इसने फ़ैसला किया कि दिन चढ़े ही वो यहाँ से लौट जाएगा। वो हैरान था कि सांप राजा और सांप रानी ने तो इन बौनों के मुताल्लिक इसे ख़ूब डराया था, मगर ये तो इतने कमज़ोर हैं कि अपने शहजादे को दलदल से बाहर ना निकाल सकें।
जब दिन चढ़ा, तो इसके सामने नाश्ता रखा गया और फिर इसे बादशाह के हुज़ूर ले जाया गया। यही बात इसने बौनों के बादशाह से भी कही। इस पर बौनों का बादशाह मुस्कुराया और अकबर को लेकर महल से बाहर आया और एक बुलंद मक़ाम पर खड़े होकर इसने कहा, "ऐ नौजवान, वो देख, सामने कितना बुलंद पहाड़ मौजूद है। अब इसे गौर से देख।" यह कहते हुए बादशाह ने कोई मंत्र पढ़कर इस पहाड़ की तरफ़ उंगली का एक इशारा ही किया कि पहाड़ एक ज़बरदस्त धमाके से फट गया और इसके पत्थर सैकड़ों मील दूर तक फैल गए। मगर क्या मजाल थी, कोई एक पत्थर भी इस तरफ़ इन पर आ गिरता। "अब तुझे अंदाज़ा हो गया होगा कि सांप, राजा और रानी ने ग़लत कहा। बात दरअसल यह है, हमारे किसी जादू या इल्म का दलदल पर असर नहीं होता। यही वजह थी कि हमारा बेटा इस दलदल में फंसा और मेरे आदमी कुछ भी ना कर सके। वो तो इसकी क़िस्मत अच्छी थी कि तू आ गया और इसकी जान बच गई। मैं तेरी यह एहसान उम्र भर ना भूलूंगा। अब तू बता, तू इस तरफ़ किस काम से आया है?" बनो के बादशाह ने पूछा।
"मुझे अबकल जानवर की हड्डी चाहिए।" अकबर ने कहा।
"इतना सुनना था कि बनो के बादशाह का चेहरा गुस्से के मारे सिरख़ट हो गया। मगर फिर वो नरम पड़ गया और बोला, 'ऐ नौजवान, तूने मुझ पर ऐसा एहसान किया है, जिसे मैं सारी ज़िंदगी नहीं भूल सकता। तुझे मालूम ना, वो हड्डी हमारे लिए निहायत मुक़द्दस है। वो एक ऐसे जानवर की हाथ की हड्डी है जिसने किसी बूढ़े को एक शैतानी दरिंदे से बचाया था और मुक़ाबले में इसका हाथ टूट गया था। इस बूढ़े ने इसे दुआ दी थी कि तेरे साथ वो क़ुव्वत आ जाए कि दुनिया की तमाम शैतानी क़ुव्वतें इसके आगे बेबस हो जाएं। और फिर वो जानवर जब मर गया, इसका तमाम जिस्म मिट्टी हो गया, तो हमारे एक बूढ़े को ख़्वाब में कहा गया कि फलां जगह एक मुक़द्दस हड्डी है। इसे अपने पास ले आओ। और हमारा वो बूढ़ा ख़्वाब में इशारा पाकर वो हड्डी ले आया, जिसकी बरकतों से हमारे यहाँ के हर शख़्स में ऐसी क़ुव्वत आ गई है कि वो जो चाहे कर लेता है। तू मेरी एक अदनी क़ुव्वत का मज़्हर तो देख ही चुका है। अगर तेरा मुझ पर एहसान ना होता, तो मैं तुझे यहीं ज़मीन में दफ़न कर देता। मैं जानता हूँ, ज़रूर तुझे सांप राजा ने ऐसा करने को कहा होगा। ख़ैर, मैं वो हड्डी तुझे दे देता हूँ। तू ले जा, मगर किसी शैतान के हवाले ना करना। सांप भी शैतान ही का दूसरा रूप है। अगर सांप राजा मांगे, तो इसे ना देना और इससे डरना नहीं। इस हड्डी के होते हुए दुनिया का कोई सांप, वो शीश सांप ही क्यों ना हो, तेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकता। हाँ, अलबत्ता तू चाहे तो सबको जलाकर भस्म कर सकता है।' और फिर बौनों का बादशाह अकबर को लेकर अपने महल में वापस आया। और इसने सोने के संदूक से वो हड्डी निकाली, जो एक छड़ी की मिसाल थी और अकबर के हवाले कर दी।
अब अकबर बौनों के बादशाह का शुक्रिया अदा करके वहाँ से रुख़सत होने लगा, तो बनो के बादशाह ने बहुत से बौने इसके साथ कर दिए ताकि इसे सरहद पार करें। बनो के साथ जब अकबर इस मुक़ाम पर पहुँचा, जहाँ घोड़े को छोड़कर गया था, तो इंसानों का यह वफ़ादार जानवर वहाँ मौजूद था और फिर वो घोड़े पर सवार हुआ और इसने घोड़े को ऐंठ लगाई। बनो ने हाथ हिला-हिलाकर इसे रुख़सत किया। वो निहायत तेज़ी से वापस हुआ, क्योंकि वो जल्द से जल्द अपने शहजादे को सर्प राज की क़ैद से आज़ाद कराना चाहता था।
जब वो सांप राजा के महल में पहुँचा, तो सांप राजा और दूसरे सांपों पर लज़्ज़त तारी हो गई। सांप राजा हाथ जोड़ते हुए अकबर के सामने आया और बड़ी मकारी से बोला, "शाबाश है नौजवान, तू वाक़ई बहुत बहादुर है। मुझे तो पहले ही अंदाज़ा हो गया था कि तू आसानी के साथ हड्डी ले आएगा। अब यह मुझे दे दो। मैं तुझे सरपराज के इलाके तक पहुंचा देता हूँ।"
"तूने मुझे हड्डी लाने को कहा था, यह ना कहा था कि हड्डी लाकर मैं तुझे दे दूँ। मैं तेरी मकारी को अच्छी तरह जानता हूँ। तू क्या समझता था? मुझे बौनों की बस्ती में भेजकर हलाक कर देगा। मगर ख़ुदा जिसे रखे, उसे कोई छुए। तू तो निहायत कमीना ख़स कीड़ा है। अज़ल से इंसान के दुश्मन रहे हो। अब जल्दी से सरपराज के इलाके का पता बता दो। और एक और बात का मुँह से वादा करो कि तू अपनी सांप रानी को राज़ के बेटे के सुपुर्द ना करेगा और इसकी कनीज़ को अपनी रानी ना बनाएगा, वरना तू इस हड्डी की क़ुव्वत से वाकिफ़ ही है। तुझे यह वादा इस हड्डी के सामने करना होगा।"
अकबर का इतना कहना था कि सांप राजा ख़ौफ़ से थरथर कांपने लगा। अब इसका आधा धड़ सांप का रह गया, तो आधा इंसानों जैसा। यह सब इसके ख़ौफ़ की वजह से हुआ था और फिर इसने वादा किया और सरपराज का पता भी बता दिया, बल्कि अपना एक सांप इसके साथ कर दिया। अकबर एक बार फिर अपने घोड़े पर सवार हुआ और इस सांप की रहनुमाई में सरपराज के इलाके की तरफ़ चला।
अध सरपराज को भी किसी तरह इल्म हो गया, क्योंकि अकबर इस हड्डी को लिए जूझू इस इलाके की तरफ़ बढ़ रहा था। सरपराज पर लज़्ज़त तारी होने लगी थी। इस हड्डी के सामने इसकी तमाम क़ुव्वत कुछ हिदायत ना रखती थी। इसे यह भी मालूम हो गया कि यह सब कुछ इस शहजादे की वजह से है, जिसे इसने तिलिस्मी गार में क़ैद करके रखा है। इसने फ़ौरन शहजादे को इस गार से आज़ाद कर दिया। इससे पहले कि अकबर और आगे बढ़ता, इसे शहजादा रास्ते ही में मिल गया, जिसे देखकर वो बहुत ख़ुश हुआ। शहजादे का रंग ज़र्द पड़ गया था और वो ख़ुद हड्डियों का पिंजर नज़र आ रहा था।
और फिर अकबर शहजादे को अपने घोड़े पर बिठाकर वापस हुआ। जब वो इसे लेकर शहर में दाख़िल हुआ, तो बादशाह को पहले ही ख़बर हो चुकी थी। वो और इनके इस्तकबाल को महल के दरवाज़े पर आए और अपने बेटे को मिलकर बहुत ख़ुश हुए। इस वक़्त अकबर का बाप, यानी दाना शख्स भी बादशाह के साथ था। बादशाह ने इसका भी बहुत-बहुत शुक्रिया अदा किया। इस तरह अकबर को भी दरबार में रख लिया गया और वो हुकूमत के कामों में बादशाह का हाथ बंटाने लगा।
कुछ अरसे बाद नेक परी बादशाह की ख़िदमत में हाज़िर हुई, तो बादशाह इसे देखकर बहुत ख़ुश हुआ और इसका भी शुक्रिया अदा किया। इस पर परी बोली, "ऐ बादशाह, मैं इस नौजवान से शादी करना चाहती हूँ और यह काम तुम्हारे हाथों अंजाम को पहुँचे, तो मुझे बहुत ख़ुशी होगी।" बादशाह यह सुनकर और भी ख़ुश हुआ और फिर इसने इसे अपनी बेटी की तरह अकबर से ब्याह दिया और सब हंसी-ख़ुशी रहने लगे। हम्म।