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बहुत पुराने जमाने की बात है। गुलिस्तान शहर में एक बादशाह राज किया करता था। बादशाह के राज्य में गुलस्तान नगरी में चैन की बंसी बजती थी। हर तरफ खुशहाली, ईमानदारी और इंसाफ का दौड़दौरा था। रियाया अपने बादशाह और राजघराने से बहुत मोहब्बत करती थी। जितना हर दिल अजीज बादशाह था, उतना ही हर दिल अजीज शहजादा भी था। शहजादा अपनी रियाया के लिए [संगीत] पूजा जाता था। अभी उसका राज मुकम्मल नहीं हुआ था। लेकिन लोगों को इत्मीनान था कि कल जब बूढ़े महाराज नहीं रहेंगे तब भी कुलिस्तान नगरी और वहां की रियाया का मुस्तकबिल शहजादे [संगीत] के हाथों महफूज़ रहेगा।
बादशाह को लगातार शहजादे की फिक्र [संगीत] रहती थी। कोई ख्वाब देखते तो नजूमियों को बुलाकर पूछते कि कहीं इस ख्वाब का ताल्लुक शहजादे से तो नहीं है? एक रात बादशाह ने तीन ख्वाब देखे। पहला ख्वाब उन्होंने यह देखा कि एक दरख्त है जिसके पत्ते झुमरुद के हैं। फूल हीरे के हैं और फल याकूद हैं। लेकिन वह पेड़ रो रहा है और उसमें से खून की बूंदे टपक रही हैं। बादशाह की आंख खुल गई। बहुत परेशान हुए। बड़ी मुश्किल से दोबारा नींद आई तो उन्होंने दूसरे ख्वाब में देखा कि बाग में चार आदमी बैठे शतरंज खेल रहे हैं। ना कोई जीतता है ना कोई हारता है। बादशाह की फिर आंख खुल गई। अजीब सा ख्वाब था। बादशाह उलझन में पड़ गए। फिर आंख लगी तो तीसरा ख्वाब देखा कि एक शहर है जहां 52 बादशाह बैठे चक्की पीस रहे हैं। अब आंख खुली तो सुबह होने वाली थी। तीनों ही ख्वाब उन्हें बड़े मनहूस लगे [संगीत] और वह परेशान हो गए।
उस दिन दरबार में उन्होंने फिर नजूमियों और तमाम शहर के ख्वाबों की ताबीरर बताने वालों को बुलाकर अपने तीनों ख्वाब बताए और इन ख्वाबों की ताबीरर पूछी। सब ने बहुत सोच विचार की। लकीरें खींची। लेकिन इन ख्वाबों [संगीत] की ताबीरर कोई ना बता सका। नजूमियों ने हाथ बांधकर अर्ज की। महाराज बहुत से ख्वाब पेट की गिरानी से भी नजर आते हैं जिनकी कोई अहमियत नहीं होती। बादशाह ने कहा या तो इन ख्वाबों की ताबीरर होगी या यह दुनिया में [संगीत] कहीं ना कहीं हकीकत में पाए जाते होंगे। अगर ताबीरर नहीं बता सकते तो आंखों से दिखाओ। ऐसे मौकों पर बीड़ा उठाने का रिवाज था। पान का बीड़ा बनाकर बीच [संगीत] में रख दिया जाता और जो इस काम को करने की हिम्मत दिखाता वह इस बीड़े को उठाकर खा लेता। यहां भी [संगीत] ऐसा ही हुआ। सुबह से शाम हो गई। पूरी गुलस्तान नगरी परेशान थी कि बादशाह की इज्जत का अंजाम क्या होगा। बादशाह की इज्जत बचाने के लिए सब जतन कर रहे थे। वहीं बेटा खुद उन्हीं की जिद की भेंट चढ़ गया। यानी ना चाहते हुए भी वह खुद ही बेटे को इस मुसीबत में धकेल रहे थे। जिसकी पेशीनगोई शहजादे के बचपन में नजूमियों ने की थी और जिससे बचाने की वह आज तक कोशिशें करते चले आए थे।
शहजादे ने बाप को समझाया फिक्र मत कीजिए। अगर मेरी किस्मत में यह लिखा है तो मुझे भुगतना ही पड़ेगा। होने को कौन टाल सकता है? शहजादे ने वादा किया कि वह इन ख्वाबों की हकीकत आंखों से दिखाएगा और मांबाप के आशीर्वाद से कुछ नहीं होने देगा। शहजादे ने शाही लिबास उतार कर आम आदमियों जैसे कपड़े पहने। अशरफियाओं साथ ली। मां-बाप के पांव छुए और अपने चहेते घोड़े पर बैठकर अनजानी मंजिल की तरफ रवाना हो गया। दिन भर सफर करता और रात को किसी बस्ती, बाग या वीराने में सो रहता। हे शाम वह एक बाग में जा पहुंचा। बाग बहुत बड़ा था लेकिन सब झाड़ झंघाड़ पड़ा था। अंधेरा होने लगा था। इसलिए शहजादे ने तय किया कि वह दिन में पूरे बाग का चक्कर लगाएगा। उसने रोटी खाई, कुएं से [संगीत] ठंडा पानी निकाल कर पिया और एक तरफ लेट कर सो गया। आधी रात गुजरी होगी कि बड़ी तेज आंधी आई और इसके साथ किसी बहुत बड़े जानवर के उड़ने की सी आवाज आई। शहजादा एक घने पेड़ के ऊपर छुप कर बैठ गया। तारों की छांव में उसने देखा कि एक बहुत ही लंबा [संगीत] चौड़ा काला जिन बड़े-बड़े कदम रखता हुआ आ रहा है। उसकी आंखें अंधेरे में लाल चिराग की तरह नजर [संगीत] आ रही थी। जब वह काफी दूर निकल गया तो शहजादा भी पेड़ [संगीत] से नीचे उतर आया। डर के मारे पसीनेपसीने हो रहा था। फिर नींद नहीं आई। सुबह के करीब फिर वैसी ही आहटें सुनाई दी। तेज हवा चली [संगीत] और जिन वापस वहां से बाहर चला गया।
अब शहजादा बाग के बीचोंबीच गया तो देखा [संगीत] वहां एक बरादरी है और पलंग पर एक बहुत ही खूबसूरत औरत लेटी थी। लेकिन यह क्या? उसका सर गर्दन से कटा हुआ अलग रखा था। शहजादे [संगीत] ने देखा कि पलंग के पास दो छड़ियां रखी थी और उससे भी अजीब [संगीत] बात यह कि औरत के सराहाने एक पेड़ लगा था जिसमें जुमरूद के पत्ते, हीरे के फूल और याकूद के फल लटक रहे थे। शहजादे ने करीब जाकर देखा। औरत की आंखें खुली हुई थी और उनसे खून के आंसू बह रहे थे। शहजादे को अपने बाप का एक ख्वाब हकीकत के रूप में सामने नजर आ रहा था लेकिन उसकी समझ में नहीं आया कि [संगीत] क्या करें। उसे लगा कि हो ना हो इस जिन का भी इस सब से कुछ ताल्लुक है। उसने तय किया कि इस बाग में दो-चार दिन रुककर हालात का जायजा लेना चाहिए। जल्दबाजी कहीं खेल खराब ना कर दे। दिनभर वह इधर-उधर घूमता रहा। बाघ के कुछ दरख्तों पर फल लग रहे थे। उसने फल तोड़कर पेट भरा और शाम होने के बाद एक कोने में जाकर लेट गया। आधी रात। फिर वैसी ही [संगीत] आंधी आई। वह आहटें सुनाई दी। दो चिराग जैसी आंखें दिखाई दी। मानस गंध मानस गंध आदंबू आदंबू चिल्लाता हुआ जिन बाग में दाखिल हुआ और बारादरी की तरफ चला। जब वह आगे बढ़ गया तो शहजादा दरख्तों में छुपताछुपाता वहां पहुंचा और एक पेड़ पर चढ़कर छुपकर बैठ गया। क्या देखता है कि जिन ने उस मुर्दा औरत के सराहाने के फूलों की छड़ियां पायंती और पायंती की सराहने रखी और वह औरत जिंदा होकर बैठ गई जबकि वह अजीबोगरीब पेड़ गायब हो गया। जिन उसके पास बैठ गया और बोला कि वह उसे पसंद आ गई है और वह उसे अपनी रानी बनाएगा। फिर पूछा कि यहां कोई आदमी तो नहीं आया था क्योंकि यहां से आज किसी इंसान की ब आ रही है। औरत ने जवाब दिया यहां कौन आएगा और इंसान तो मैं भी हूं मेरी ही बू होगी। इसी तरह सुबह होने लगी तो जिन ने पास रखी हुई तलवार से औरत का सर काटा। औरत की गर्दन से खून की बूंदे टपकी। उनसे दरख्त बना, पत्ते लगे, फूल लगे, फल लगे। फिर उसने सराहाने और पायंती की छड़ियों [संगीत] की अदला बदली की और फूंकारता हुआ वापस चला गया।
उसके जाने के बाद शहजादा पेड़ से उतरा और उजाला फैलने का इंतजार करता रहा। जब दिन निकल आया तो उसने बारादरी में जाकर औरत के सराहाने और पायंती की छड़ियां बदले तो वह औरत उठकर बैठ गई। उसने हैरानी से पूछा। तुम कौन हो भाई? और मुझे क्यों जिंदा किया? मैं बरसों बाद दिन की रोशनी देख रही हूं। शहजादे ने जवाब दिया, मैं एक मुसाफिर हूं। रात गुजारने के लिए इधर निकल आया था। रात को जिन को तुम्हें जिंदा करते देखकर छुप गया था। तुम बताओ तुम कौन हो? और इस जिन के चंगुल में कैसे फंस गई? औरत बोली, "मैं मुल्क की शहजादी हूं।" एक रात महल की छत पर खड़ी चांदनी [संगीत] का लुत्फ ले रही थी कि यह जिन वहां से गुजरा। उसने मुझे देखा और मुझे वहां से उठाया और यहां लाकर कैद कर दिया। यह जादू की तलवार है और यह जादू की छड़ियां हैं जिनसे मुझे रोज कत्ल [संगीत] कर दिया जाता है और रात को जिंदा कर दिया जाता है। रात तुम यहां छुपे थे। इसीलिए वह कह रहा था कि उसे आदमी की ब [संगीत] आ रही है। अब तुम शाम होने से पहले यहां से चले जाओ। वरना तुम्हें भी वह पहचान लेगा और कच्चा चबा जाएगा।
शहजादे ने कहा, अब मैं तो तुम्हें उसकी कैद से रिहाई दिलाकर [संगीत] ही जाऊंगा। मैंने जिन को खत्म करने की तरकीब सोच ली है। जिस रास्ते से जिन आता है, उस रास्ते में उसने एक बहुत बड़ा गढ़ा खोदना शुरू किया और शहजादी ने भी उसकी मदद की। शहजादे ने अपने पास से फल और मिठाई उसे खाने को दिए। शाम तक बहुत बड़ा और गहरा गढ़ा तैयार हो गया। फिर शहजादे ने बाहर से सूखी झाड़ियां और पत्ते इकट्ठे किए और गढ़े को ऐसे भर दिया कि ऊपर से जमीन बराबर नजर आने लगी। इस काम से फॉरिक होकर वह नहाया। उसने और औरत ने मिलकर खाना खाया। फिर शहजादे ने जादू की तलवार [संगीत] से औरत का सर काटकर छड़ियाओं बदली। जब दरख्त तैयार हो गया तो वह वापस वहीं आ गया जहां गढ़ा खोदा था। पास ही एक पेड़ पर चढ़कर बैठ गया। आधी रात हुई तो वैसे ही आंधी आई और शोर मचाता मानस गंद मानस गंद चिल्लाता हुआ जिन आया। जैसे ही गढ़े [संगीत] पर उसका पांव पड़ा एक हैबतनाक चीख के साथ वह गढ़े में गिर गया। शहजादे ने फौरन पेड़ के ऊपर से दिया सलाई जलाकर सूखे पत्तों पर फेंकनी शुरू कर दी। देखते ही [संगीत] देखते आग भड़क उठी और जिन की चीखें कमजोर पड़ने लगी। आखिरकार जिन का काम तमाम हो गया। सुबह हुई तो शहजादे ने शहजादी को जिंदा किया। वह उसके कदमों में गिर पड़ी और कहा ए भाई तुम जो चाहो मांग लो। शहजादे ने कहा मुझे कुछ नहीं चाहिए। यह तलवार और यह छड़ियां मैं ले जा रहा हूं। तुम्हें बस यह करना है कि एक बार मेरे बाप के सामने मरकर दिखाना होगा ताकि वह दरख्त बन सके और मेरा बाप उसे देख सके। औरत ने कहा भैया तुम जब बुलाओगे मैं चली आऊंगी। औरत वहां से अपने शहर चली गई और शहजादा अपने रास्ते चला। अपने बाप के एक ख्वाब को आंखों से दिखाने का इंतजाम कर लिया था।
अब अगले मंसूबे पर अमल करने लगा। बहुत दिन इधर-उधर भटकने के बाद एक शाम फिर एक उजाड़ बाग में रात बसर करने के लिए रुका। यह बाग तो पहले से भी ज्यादा वीरान था। सूखे पेड़, सूखी झाड़ियां, जगह-जगह सूखे पत्तों के ढेर, कहीं-कहीं कुछ पुरानी बुरियां बनी हुई थी और एक बड़ा सा चबूतरा साफ सुथरा था। पहले तो शहजादे ने सोचा कि इस चबूतरे पर सो जाए। लेकिन फिर वहां की सफाई देखकर उसे खतरा महसूस हुआ और वह थोड़े फासले पर एक बड़े से बरगद के दरख्त के नीचे जमीन साफ करके बैठ गया। अजनबी जगह और जंगली जानवरों का डर और अनदेखी ताकतों का खौफ। नींद कहां थी? रात 12:00 बजे के करीब यहां भी आंधी सी आती हुई महसूस हुई। पत्ते उड़ने लगे। इतने में क्या देखता है कि चार घुड़सवार हवा में जैसे उड़ते हुए वहां उतरे। उन्होंने अपने घोड़े पेड़ के साथ बांधे और खुद चबूतरे पर जाकर बैठ गए। फिर उन्होंने शतरंज की बिसाते बिछाई और दो-दो लोग शतरंज खेलने लगे। शहजादा छुपा हुआ देख रहा था। सारी रात गुजर गई। उनमें से कोई जीता [संगीत] ना कोई हारा।
शहजादे ने दिल में सोचा, यही वक्त है कि अपने बाप के दूसरे ख्वाब को सच कर दिखाऊं। यह मौका निकल गया तो हो सकता है फिर कभी हाथ ना आए। वह हिम्मत करके बाहर निकला और उनके पास जाकर बोला, "कैसे खिलाड़ी हो जो ना जीत सकते हो [संगीत] और ना हार सकते हो।" एक नौजवान को अपने पास देखकर पहले तो वह हैरान हुए। फिर गस्से में आग बगोला हो गए। तू है कौन? और तुझे हिम्मत कैसे हुई हमसे बात करने की? हम में से हर एक इतना अच्छा खिलाड़ी है कि ना हमें कोई आज तक हरा सका और ना हम एक दूसरे को हरा सके। शहजादे ने कहा अगर मैं एक-एक करके [संगीत] तुम चारों को हरा दूं तो क्या दोगे? वह तैश में आकर बोले, "अगर तूने हमें हरा दिया, तो तेरे गुलाम बन जाएंगे। लेकिन ना हरा सका या हार गया तो तेरे टुकड़े-टुकड़े करके चील गांव को खिला देंगे। शहजादे ने कहा चलो मंजूर [संगीत] है बिसात बिछी। और शहजादे ने एक-एक करके चारों को हरा दिया। वह चारों बोले ऐ जवान बख्त आज से हम तेरे गुलाम हुए लेकिन हम इंसान नहीं जिन हैं। तेरे साथ तो नहीं रह सकते। लेकिन तू हमारे घोड़ों की दुम का एक-एक बाल रख ले। जब भी तू इन बालों को आग दिखाएगा, हम तेरे पास पहुंच जाएंगे। और वह चारों अपनेपने घोड़ों पर सवार होकर चले गए। शहजादा अपने बाप के दूसरे ख्वाब की हकीकत भी पा चुका था। लेकिन जब तक तीसरे ख्वाब की हकीकत ना मालूम हो जाती, वह घर नहीं लौट सकता था।
अगली सुबह शहजादा अपने सफर पर रवाना हुआ। एक लंबी मसाफत के बाद वह एक शहर में पहुंचा। सारा दिन वह शहर में घूमता रहा। जब वहां के बादशाह के महल के पास से गुजरा तो [संगीत] उसने देखा कि महल के दरवाजे के पास एक बहुत बड़ा नककारा रखा है। उसने वहां के लोगों से पूछा कि यह नखारा कैसा है? तो लोगों ने बताया कि यहां कोई बादशाह नहीं बल्कि एक रानी राज करती है। वह बहुत खूबसूरत और अक्लमंद है। अभी उसकी शादी नहीं हुई है। शादी के लिए उसकी कुछ शर्तें हैं जो उससे शादी का ख्वाहिशमंद होता है। आकर इस नखकारे पर चोट मारता है। रानी उसे बुलाकर अपनी शर्तें बताती है और यह भी कि जो उसकी शर्तें पूरी नहीं करेगा उसे रानी का गुलाम बनकर सारी जिंदगी चक्की पीसनी पड़ेगी। आज तक कोई उसकी शर्तें पूरी नहीं कर सका क्योंकि शर्तें बहुत कड़ी होती हैं। बड़े-बड़े राजा महाराजा आए और नाकाम रहे। अब तक बाविन बादशाह शर्त हार कर बैठे चक्की पीस रहे हैं। शहजादे को तो अपनी मुराद मिल गई। लेकिन उसने भी रानी के साथ मुकाबला करने की [संगीत] ठान ली। एक सराय में आकर ठहरा। एक सौदागर के लड़के का भेष बदला और अगले दिन जाकर नक्कारे पर जोर-जोर से कई चोटें मारी। रानी ने सुना तो उसे बहुत गुस्सा आया। यह कौन बदतमीज है जो नक्कारा तोड़े जा रहा है? गुलाम ने आकर बताया, महारानी जी, एक सौदागर का लड़का है। वह आपसे शादी करना चाहता है। रानी गुस्से से लाल पीली होकर बोली, एक सौदागर के छोकरे की यह मजाल। क्या उसे पता [संगीत] नहीं कि मेरे महल में बाबर बादशाह चक्की पीस रहे हैं जो मुझसे शादी [संगीत] करने आए थे। गुलाम ने हाथ जोड़कर कहा महारानी जी उसे सब पता है वह आपकी शर्तें पूरी करने के [संगीत] लिए तैयार है। रानी ने उसे बुलाया और कहा मैं तेरी बेइज्जती नहीं करना चाहती लेकिन यह सुन ले कि बादशाहों से तो मैंने चक्की पिसवाई है लेकिन तुझे तो मैं टुकड़े-टुकड़े करवा दूंगी। शहजादा बोला मंजूर [संगीत] है रानी जी आप शर्तें बताइए। रानी जो पर्दे के पीछे बैठी हुई थी। बोली, पहली शर्त यह है कि [संगीत] लोहे के खंभे को लकड़ी की कुल्हाड़ी से दो टुकड़े करना है। शहजादे ने कहा, "मुझे वहां ले चलो जहां खंभा रखा है।" गुलाम शहजादे को एक आंगन में ले गए जहां एक बहुत ही बड़ा और मोटा लोहे का खंभा रखा था और उसके पास एक छोटी सी लकड़ी [संगीत] की कुल्हाड़ी रखी थी। जो भी रानी की शर्त पूरी करने आता था, वह खंभे और कुल्हाड़ी को देखकर हिम्मत हार देता था। [संगीत] क्योंकि लकड़ी से लोहे को काटना नामुमकिन था। शहजादा थोड़ी देर खड़ा गौर से उस खंभे को देखता रहा। उसे छूने की इजाजत नहीं थी। फिर उसने खुदा को याद करके कुल्हाड़ी उठाई और पूरी ताकत से खंभे पर वार किया। खंभे के दो टुकड़े हो गए। दरअसल वह लोहे का नहीं बल्कि पत्थर का था जो [संगीत] इतनी महारत से बनाया गया लगता था। लेकिन शहजादे की तेज नजर ने उसे पहचान लिया और यह शर्त जीत ली। जितने लोग वहां मौजूद थे, वह हैरान रह गए। शहजादा बोला, मारो नखारे पर चोट। जब वह पहली शर्त जीत गया, नखारा जोर-जोर से बजने लगा और रानी का बुरा हाल था कि कोई राजा महाराजा जो काम नहीं कर पाया, वह उस सौदागर के छोकरे ने कर दिखाया है। शहजादे को रानी के सामने पेश किया गया। रानी ने कहा, दूसरी शर्त यह है कि मुझे एक रात में चार बार बोलने पर मजबूर कर दो। इस शर्त के लिए तुम रात को आना। मैं अपने तख्त पर पर्दे में बैठूंगी। तुम मुझे मुखातिब भी नहीं करोगे। ना देखने और छूने की हिम्मत करोगे। पर्दे के बाहर बैठकर मुझे बोलने पर मजबूर करना है। शहजादा वापस सराय में चला गया और एक वीरान जगह पर जाकर उसने घुड़सवारों के घोड़ों के बालों को आग दिखाई। कुछ ऐसा करो कि रानी रात में चार बार बोलने पर मजबूर हो जाए। उन्होंने कहा यह क्या मुश्किल है? हम चारों जाकर रानी के आसपास छुप जाएंगे। एक तख्त के पाए में, एक उसके पानदान में, एक उसके तख्त के पर्दे में और एक उसके संदल के हार में। तुम रात को बारी-बारी हमसे बात करना। बाकी हम संभाल लेंगे। चारों जिन गायब हो गए। तो शहजादा वापस सराय में आया और खा पीकर सो गया। शाम को नहा धोकर सौदागर जैसी धोती कुर्ता पहने, माथे पर लंबेलंबे तिलक लगाए और गले में हार डालकर तैयार हो गया। रात को रानी के महल में पहुंचा। रानी अपने कमरे में अपने तख्त पर बैठी थी और चारों तरफ पर्दे लटक रहे थे। पास एक कुर्सी पड़ी थी। शहजादा उस पर बैठ गया। थोड़ी देर चुप रहा। फिर तख्त के पाए से मुखातिब हुआ। भाई पाए तुम ही कुछ बात करोगे कि रात कटे। रानी तो मुंह पर मुर लगाकर बैठी है। कभी सामान इधर फेंकती है कभी उधर पटकती है। हम पांवों का तो बुरा हाल है। अगर तुम सारी शर्तें जीत जाओ तो इसे मजा चखाना। शहजादा बोला नहीं ऐसी बात मत करो जिससे रानी को गुस्सा आए। ऐसी बात करो कि रात कट जाए। पाए में से आवाज आई। ऐसी बात है। तो चलो आज मैं तुम्हें कहानी सुनाता हूं। बहुत पुरानी बात है। किसी शहर में चार दोस्त रहते थे। एक सुनार का लड़का, एक बढ़ई [संगीत] का लड़का, एक दर्जी का लड़का और एक बादशाह का लड़का। बादशाह को अपने बेटे की छोटे लोगों से दोस्ती पसंद नहीं थी। लेकिन उसके बेटे को अपने दोस्तों से इतना [संगीत] प्यार था कि वह मानता ही नहीं था। एक बार बादशाह का बेटा बादशाह से छुपकर अपने तीनों साथियों [संगीत] के साथ शिकार पर निकल गया। जंगल में चारों दोस्त रास्ता भटक गए। रात हो गई तो चारों परेशान हो गए। बादशाह के बेटे को फिक्र यह थी कि राजमहल में उसकी तलाश हो रही होगी। बाकी तीनों को यह फिक्र कि रात को कोई जंगली जानवर आकर उनका सफाया ना कर जाए। आखिर यह तय हुआ कि सारी रात चारों एक-एक करके बारी-बारी पहरा देंगे और तीन दोस्त सोएंगे। इस तरह चारों को नींद भी मिल जाएगी और पहरा भी हो जाएगा। सबसे पहले पहरे की बारी बई के बेटे की थी। उसे नींद आने लगी तो उसने सोचा कि कोई काम करूं ताकि नींद भाग जाए। उसके औजारों का थैला उसके पास था। उसने जंगल में से लकड़ी ली और अपने हुनर से उस लकड़ी की गुड़िया बना दी। उसका पहरा देने का वक्त खत्म हो रहा था तो उसने दर्जी के बेटे को जगा दिया। उठो अब तुम पहरा दो। मैं सोने जा रहा हूं। दर्जी के लड़के ने देखा कि बढ़ई का लड़का तो अपना हुनर दिखा गया। लो अब मैं भी अपना हुनर दिखाऊंगा। उसके झोले में भी सिलाई का सामान पड़ा हुआ था। उसने अपनी कमीज उतारी और उसे काटकर गुड़िया के [संगीत] लिए कपड़े सीए और उसे पहना दिए। इतनी देर में उसका पहरा देने का वक्त खत्म हो गया। उसने सुनार के लड़के को जगाया और खुद सोने चला गया। सुनार के लड़के ने सोचा कि इन दोनों ने तो अपने-अपने हुनर दिखा दिए। अब मुझे अपना हुनर दिखाना चाहिए। उसके थैले में भी जेवर [संगीत] बनाने के औजार थे और उसने गले में सोने की जंजीर पहन रखी थी। उसने झट जंगल से लकड़ियां इकट्ठी करके आग जलाई और अपनी जंजीर पिघलाकर [संगीत] गुड़िया के लिए जेवर बनाए और उसे पहना दिए। फिर उसने बादशाह के लड़के को पहरा [संगीत] देने के लिए उठा दिया। बादशाह के लड़के ने देखा कि उसके तीनों दोस्तों ने अपने हुनर दिखा दिए। मुझे तो कोई हुनर आता ही नहीं। मैं क्या करूं? सुबह वह तीनों दोस्त मेरा मजाक उड़ाएंगे। इससे तो अच्छा है कि मैं [संगीत] अपनी जान ही दे दूं। उसके पास तलवार थी। वह तलवार से अपना गोश्त काटकर सुनार की जलाई हुई आग में डालता जाता और रोता जाता था। इतने में खुदा रसीदा बुजुर्ग इधर से गुजरे। उन्होंने कहा बेटा यह क्या कर रहे हो? खुदकुशी करना तो गुनाह है। बादशाह के लड़के ने कहा बाबा मैं क्या करूं? मेरे तीनों दोस्तों ने अपना हुनर दिखा दिया। मुझे कुछ आता नहीं। सुबह यह मुझ पर हंसेंगे। मेरा मजाक उड़ाएंगे। मैं यह जिल्लत बर्दाश्त नहीं कर सकता। उन फकीर साहब ने अल्लाह से दुआ की और उस गुड़िया में जान पड़ गई। वह जीती जागती बच्ची में बदल गई। तख्त के पाए ने कहानी खत्म करके शहजादे से पूछा क्या कहते हो सबसे अच्छा काम किस लड़के ने किया? शहजादे [संगीत] ने जवाब दिया सबसे अच्छा काम बढ़ाई के लड़के ने किया जिसने गुड़िया बनाई। पाया बोला नहीं सबसे अच्छा काम दर्जी के लड़के [संगीत] ने किया जिसने गुड़िया का तन ढक दिया। दोनों में गरमा गरम बहस होने लगी। आखिर रानी से रहा ना गया और उसने तख्त के पाएं पर छड़ी मारते हुए कहा बेवकूफ इसका नाम कोई नहीं लेगा जिसने गुड़िया में
जान डलवा दी। राजकुमार ने जोर से आवाज़ लगाई, "नगाड़े पर चोट करो!" रानी एक बार बोल पड़ी। रानी बोलने को तो बोल पड़ी लेकिन अब पछता रही थी और गुस्से में बाल नोच रही थी। फिर राजकुमार ने रानी के पानदान को संबोधित किया, "रानी तो हमसे क्यों ही बात करेंगी? तुम ही कोई बात करो जिससे रात कटे।"
पानदान में बैठा हुआ जिन्न बोला, "अरे भाई, क्या बताऊँ? जब से तुम शर्तें जीतने लगे हो, तब से मेरी तो शामत आई हुई है। सबसे ज़्यादा गुस्सा तो रानी मुझ पर ही उतार रही है। कभी उठाकर पटकती है, कभी खोलती है, कभी बंद करती है। मेरा जोड़-जोड़ दर्द कर रहा है। तुम अगर सारी शर्तें जीत जाओ तो इसे अपनी दासी बनाकर रखना।"
राजकुमार ने कहा, "ऐसी बातें मत करो जिससे रानी नाराज़ हो। ऐसी बातें करो जिससे रात कट जाए।" पानदान बोला, "चलो मैं भी एक कहानी सुनाता हूँ। बहुत पुरानी बात है, किसी शहर में एक बादशाह राज करता था। बादशाह की एक ही बेटी थी, बहुत सुंदर, बहुत बुद्धिमान। बादशाह की इच्छा थी कि राजकुमारी की शादी किसी असली राजकुमार से हो, यानी ऐसा राजकुमार जिसके खून में कहीं से कहीं अगर कोई मिलावट न हो।"
असली राजकुमार फूल की तरह नाज़ुक और संवेदनशील होता है, जो ऐसी चीज़ भी महसूस कर लेता है जो आम आदमी महसूस नहीं कर सकता। राजकुमारी के लिए बहुत से राजा-महाराजाओं के रिश्ते आए लेकिन फ़ैसला नहीं हुआ। आखिर में तीन राजकुमार आए। उन्होंने यह दावा किया कि वे असली राजकुमार हैं। उनकी रगों में शुद्ध शाही खून दौड़ रहा है। बादशाह ने उनकी जाँच करने का फ़ैसला किया।
उसने इन तीनों को अलग-अलग महल के तीन अत्यंत सजे-सजाए आरामदायक कमरों में ठहराया था, जहाँ रेशम का बिछौना नरम और गद्देदार बिस्तर थे। हर तरफ शांति और खामोशी थी और हर तरह का आराम था। सुबह जब तीनों राजकुमार दरबार में पहुँचे तो बादशाह ने पूछा, "कहिए राजकुमार, रात को नींद कैसी आई?"
सबसे बड़ी उम्र वाले राजकुमार ने कहा, "मैं रात भर बदबू के कारण नहीं सो सका। सारी रात सिर के दर्द से तड़पता रहा। आपने जो रेशम का बिछौना बिछाया था न, वह बदबू में बसा हुआ था।" बादशाह हैरान रह गया। उसने नौकरों से कहा कि वे रेशम की चादर उठाकर लाएँ जिस पर राजकुमार सोया था। चादर लाई गई। सारे दरबारियों ने सूँघा लेकिन इसमें से इत्र की खुशबू आ रही थी। किसी को कोई बदबू नहीं आई।
उस दुकानदार को बुलाकर पूछा कि रेशम उसने कहाँ से ली? उसने बुनकर का पता बताया। उस बुनकर को बुलाया गया तो उसने रेशम इकट्ठा करने वाले का पता बताया। रेशम वाले ने उस जगह का पता बताया जहाँ के वृक्षों से उसने रेशम इकट्ठा किया था। वहाँ आदमी भेजे गए तो पता चला कि उन पेड़ों से 200 कोस के फ़ासले पर गंदे पानी का एक नाला बहता था, जिसकी वजह से शायद उस रेशम में कहीं बदबू आ गई हो, जो इतने हाथों और चरणों से गुज़रने के बाद भी राजकुमार को इतनी तेज़ लगी कि उसके सिर में दर्द हो गया और वह रात भर नहीं सो सका।
दरबारी बोल उठे, "वाकई यह सच्चा राजकुमार है।" फिर बादशाह ने दूसरे राजकुमार से पूछा कि उसे कैसी नींद आई? राजकुमार ने कहा, "मैं रात भर नहीं सो सका। आपके महल में इतना शोर था कि सारी रात जागता रहा और बुखार हो गया।"
बादशाह ने महल के दारोगा से पूछा कि राजकुमार के कमरे के पास कैसा शोर था। सब सिर जोड़कर बैठे क्योंकि रात को तो हर तरफ ऐसी खामोशी थी कि पत्ता तक नहीं हिलता था। बड़ी जाँच-पड़ताल के बाद पता चला कि महल के बाहर दूर एक बाग में रात को फव्वारा चलता रह गया था। उसके पानी के गिरने की आवाज़ के शोर से राजकुमार को बुखार हो गया। दरबारी फिर चिल्ला उठे, "यही असली राजकुमार है।"
फिर बादशाह ने तीसरे और सबसे छोटे राजकुमार से पूछा कि उसे रात कैसी नींद आई? राजकुमार ने कहा, "आपके बिस्तर में एक काँटा था जिसकी चुभन से मैं रात भर करवटें बदलता रहा। जो हिस्सा काँटे पर टिकता वही घाव बन जाता।" राजकुमार ने अपनी पीठ खोलकर दिखाई जिस पर जगह-जगह किसी बारीक नुकीली चीज़ के निशान घाव की शक्ल में बने हुए थे।
बादशाह तुरंत लोगों को लेकर राजकुमार के शयनकक्ष में पहुँचा। वहाँ लोगों ने चादर हटाकर देखा। चादर के नीचे बहुत ही नरम रुई के 20 गद्दे बिछे थे। लोग हर गद्दा हटाकर उस पर हाथ फेरकर देखते रहे। कहीं कुछ नहीं मिला। आखिर 19वें गद्दे के नीचे एक बारीक सा बाल चिपका हुआ था। बिल्कुल वैसा ही जैसा राजकुमार की पीठ पर घाव का निशान था। लोग चिल्ला उठे कि यही असली राजकुमार है।
पानदान ने इतनी कहानी सुनने के बाद राजकुमार से पूछा, "अच्छा बताओ। तुम्हारे विचार से बादशाह ने तीनों में से किसको असली राजकुमार मानकर उससे अपनी बेटी की शादी की?" सौदागर बने राजकुमार ने कहा, "जिसको रेशम में से बदबू आई थी, वही असली राजकुमार था।" पानदान बोला, "नहीं, मेरे विचार से तो वह असली राजकुमार था जिसे मील भर दूर से आई फव्वारे की हल्की सी आवाज़ के शोर से बुखार चढ़ा था।"
दोनों में गरमागरम बहस होने लगी। रानी भूल गई कि उसे खामोश रहना था। चिल्लाकर पानदान को पटका और बोली, "कमबख्त, तुझे भी आज ही बोलना था। इसका नाम कोई नहीं ले रहा जिसकी पीठ पर 19 गद्दों के नीचे दबे हुए बाल से घाव पड़ गए। इन दोनों की शिकायत तो सुनी-सुनाई बातों के आधार पर भी हो सकती थी। लेकिन छोटे राजकुमार के घाव तो सारे दरबार ने देखे।"
रानी बोली और राजकुमार ने खुशी से चिल्लाते हुए आवाज़ लगाई, "नगाड़े पर चोट करो!" रानी दूसरी बार भी बोल पड़ी। रानी अपनी जल्दबाज़ी पर बड़ी शर्मिंदा हुई। लेकिन अब क्या हो सकता था? थोड़ी देर चुप रहने के बाद राजकुमार ने रानी के सिंहासन के परदे को संबोधित किया, "भाई, तुम ही कुछ बात करो जिससे रात कटे।"
परदे में से आवाज़ आई, "अरे भाई, क्या बात करूँ? मेरी तो आज शामत आ रही है। जैसे-जैसे रानी हारती जा रही है, अपना गुस्सा हमारे ऊपर ही निकाल रही है। तुम जीत जाओ तो इसकी चोटी काट देना।" राजकुमार ने कहा, "नहीं नहीं, ऐसी बात मत करो जिससे रानी का दिल दुखे। ऐसी बात करो जिससे रात कट जाए।" पर्दा बोला, "चलो, तुम कहते हो तो ठीक है, मैं भी तुम्हें कहानी सुनाता हूँ। किसी शहर में एक बढ़ई रहता था। उसका एक ही लड़का था। हर बाप की तरह उसकी भी इच्छा थी कि उसका बेटा उसके काम में हाथ बटाए, उसका काम संभाले। लेकिन लड़का एक नंबर का आलसी और निकम्मा था। दिन भर पड़ा पलंग तोड़ता रहता या शहर में आवारागर्दी करने निकल जाता।"
बाप ज़्यादा कहता-सुनता तो कई-कई दिन घर न आता। माँ-बाप दोनों परेशान थे। बुढ़ापे में बाप काम करता है और जवान बेटा पड़ा सोता रहता है। मोहल्ले वालों ने बढ़ई को सलाह दी कि लड़के की शादी कर दो। ज़िम्मेदारी का बोझ पड़ेगा तो अपने आप सुधर जाएगा। इसलिए बढ़ई ने बेटे की शादी कर दी। बहू घर में आ गई। एक खाने वाला और बढ़ गया। लेकिन लड़के पर कोई असर नहीं हुआ। अब तो उसने घर से निकलना भी बंद कर दिया था। दिन भर बीवी के पल्लू से बँधा पड़ा रहता था। बीवी भी उसे समझाकर थक गई और फिर उसने एक दिन कहा, "मुझे मेरे मायके छोड़ आओ। सारी दुनिया निकम्मे की बीवी होने का ताना देती है। मुझसे नहीं सुना जाता।"
तीर निशाने पर बैठा था। अगले दिन बीवी ने खाना पोटली में बाँधकर साथ दिया और निकम्मा बैलगाड़ी लेकर जंगल की तरफ लकड़ियाँ काटने निकल गया। जंगल में पहले तो इधर से उधर घूमता रहा। दोपहर हो गई तो खाना खाया। झरने का ठंडा पानी पिया और एक पेड़ की छाँव में लेटकर सो गया। शाम को उठा तो देखा कि जितने भी लकड़हारे लकड़ी काटने आए थे, गाड़ियाँ भर-भरकर लौट रहे हैं और उसका मज़ाक उड़ा रहे हैं। वह खुद एक पेड़ के पास जाकर पूछता फिर रहा था, "हे पेड़, तुझे काट लूँ? काटूँ?" शाम हो गई और जंगल में अकेला रह गया।
आखिर रात के वक़्त एक पेड़ से आवाज़ आई, "हाँ, मुझे काट। और मेरी लकड़ी का पलंग बनाकर सोने के सवा लाख सिक्के का बेचना। इससे कम पर मत बेचना।" लड़के ने पेड़ काटना शुरू किया और आधी रात को लकड़ी लेकर घर पहुँचा। उसके माँ-बाप और बीवी परेशान थे। बाप जिससे भी पूछने गया, उसने जवाब दिया कि तुम्हारा लड़का तो एक-एक पेड़ से पूछता फिर रहा है कि उसे काटे या न काटे। बाप ने सिर पकड़ लिया। "यह लड़का कुछ नहीं कर सकता।"
आधी रात को जब वह घर पहुँचा तो सब सो चुके थे। सिर्फ बीवी जाग रही थी। वह उसी वक़्त औज़ार लेकर पलंग बनाने बैठ गया। बीवी ने कहा सुबह बना लेना लेकिन उसने एक नहीं सुनी। सुबह तक पलंग तैयार हो गया तो जल्दी से उसकी कारीगरी की। शनिवार को बादशाह के महल के नीचे बाज़ार लगा करता था और खुशकिस्मती से वह शनिवार का ही दिन था, जिसमें दूर-दूर से लोग अपना सामान बेचने आते थे। शाम तक जिसका सामान नहीं बिकता था तो बादशाह के आदेश के अनुसार महल के दारोगा उसे खरीद लेते थे।
बढ़ई का लड़का भी इस बाज़ार में अपना पलंग लेकर बैठा। जो खरीदार आता और पलंग की कीमत पूछता था, जवाब मिलता, "सोने के सवा लाख सिक्के।" लोग कहते, "पागल है। एक मामूली से पलंग की कीमत सोने के सिक्कों में माँग रहा है।" जो इसे जानते थे, उसका मज़ाक उड़ाते कि "बुद्धू पहली बार कुछ बनाकर लाया है। वह क्या जाने क्या चीज़ कितने में बिकती है।" शाम हो गई। सारे दुकानदार अपना-अपना सामान बेचकर घर चले गए। बादशाह ने झरोखे से झाँककर देखा तो एक आदमी पलंग लिए बैठा नज़र आया। बादशाह ने दारोगा को बुलाकर पूछा, "नीचे जो आदमी बैठा है उसका पलंग अब तक क्यों नहीं खरीदा गया?"
दारोगा ने जवाब दिया, "हुज़ूर, कोई पागल आदमी है। एक मामूली पलंग की कीमत सोने के सवा लाख सिक्के माँग रहा है।" बादशाह ने कहा, "इसे हमारे सामने हाज़िर करो।" बढ़ई के लड़के को बुलाया गया। बादशाह ने पूछा, "क्या तुम जानते नहीं कि एक मामूली पलंग की कीमत क्या होती है?" बढ़ई ने कहा, "मेरा पलंग मामूली नहीं है, बादशाह सलामत। अब रात को इस पर सोकर देखिए। अगर आपको पलंग मामूली लगे तो मैं इसकी कीमत लौटा दूँगा।" बादशाह ने सवा लाख सिक्के अदा कर दिए और कहा कि आज रात बादशाह इसी पलंग पर सोएँगे।
बढ़ई का बेटा अशरफ़ियाँ चादर में बाँधकर देर रात जब घर पहुँचा, उसकी अम्मा समझी, बेटा अनाज लाया है। उसने बहू को आवाज़ दी, "ले बहू, आज तो हमारा कमाऊ पूत अनाज लेकर आया है। जा चक्की पर आटा पीसकर रोटी बना ले।" बहू ने आकर पोटली उठाई तो बड़ी भारी लगी। उसने खोलकर देखा तो सोने की चमक से आँखें चौंधिया गईं। वह खुशी-खुशी सास के पास ले गई, "हाँ, इसमें अनाज नहीं कुछ और है।" बुढ़िया ने आकर देखा तो आँखें खुली की खुली रह गईं। फिर तो माँ-बाप ने बेटे की वह बलाएँ लीं और तारीफ़ की कि कुछ कहने को नहीं। उनके तो दिन ही फिर गए थे।
इधर बादशाह पलंग पर सोने को लेटे तो नींद नहीं आई। देखें अब क्या होता है, इस इंतज़ार में चुपचाप लेटे रहे। रात 12:00 बजे के बाद पलंग का एक पाया बाकी पाए से बोला, "सुनते हो भाई तीनों यारों, बादशाह को संभाले रखना। मैं ज़रा हवाखोरी करके बाहर से आता हूँ।" बादशाह साँस रोके बातें सुनता रहा। पलंग में से एक पाया निकला और उड़ता हुआ एक तरफ़ को चला गया। अभी ज़रा ही देर गुज़री थी कि वह वापस आ गया। दूसरे पाए ने पूछा, "बड़ी जल्दी वापस आ गए?" वह बोला, "मैं बाहर निकला, तो देखा कि बादशाह के जूते में काला नाग बैठा है। मैंने सोचा, यह हमारे मालिक हैं। इनकी जान बचाना फ़र्ज़ है। सुबह यह जूता पहनेंगे, तो साँप काट लेगा और ये मर जाएँगे। तो, मैं साँप को मारकर आ गया हूँ।"
दूसरे ने कहा, "दोस्तों, अब तुम तीनों बादशाह को संभालो। मैं भी हवाखोरी करके आता हूँ।" फिर खाट से आवाज़ आई और दूसरा पाया उड़ता हुआ दरवाज़े से निकल गया। थोड़ी देर में वह भी वापस आ गया। तीसरे पाए ने पूछा, "क्या बात है, तुम भी जल्दी से वापस आ गए?" वह बोला, "मैं बाहर निकला तो देखा दो चोरों ने बादशाह के ख़ज़ाने में सेंध लगा रखी है और ख़ज़ाना लूटकर ले जा रहे हैं। मैं उन दोनों चोरों को मार आया हूँ।"
तीसरा पाया बोला, "दोस्तों, अब तुम बादशाह को संभालो। मैं ज़रा सैर करके आता हूँ।" थोड़ी देर बाद वह भी वापस आया और बोला, "दोस्तों, मैं एक बाग देखकर आया हूँ, लेकिन अकेले देखने में मज़ा नहीं। तुम तीनों को भी साथ लेने आया हूँ।" पहले पाए ने कहा, "लेकिन चारों चले जाएँगे तो बादशाह को कौन संभालेगा?" तीसरा पाया बोला, "बादशाह तो बेख़बर सो रहे हैं। चलो बादशाह को भी ले चलते हैं।"
अचानक पलंग ज़मीन से ऊँचा उठा और उड़ता हुआ महल से बाहर निकल गया। बादशाह बेचारे डर के मारे बुरे हाल में थे। वह पलंग पर साँस रोके लेटा हुआ था और इस सारी कार्रवाई को सुन रहा था। लेकिन साँस रोके पड़ा रहा। दूर किसी जंगल में जाकर पलंग एक पेड़ पर लटक गया। बादशाह ने ज़रा सी आँख खोलकर देखा तो उस जंगल में एक आलीशान और बेहद खूबसूरत बाग लगा हुआ था। सोने-चाँदी की कुर्सियों पर लोग बैठे थे। सोने-चाँदी के बर्तनों में खाना परोसा जा रहा था। किसी ने कहा, "देखो, वह पलंग पर एक आदमी सो रहा है। उसे भी खाना दे आओ।" लोगों ने सोने-चाँदी के प्लेटों में पुलाव, ज़र्दा लाकर बादशाह के पास रख दिया। फिर नाच-गाने की महफ़िल जमी। हसीन और जमील परियों ने ऐसा नाच दिखाया कि सब वाह-वाह कर उठे।
सुबह के करीब जश्न खत्म हुआ। पर यहाँ उनका राजा और मेहमान सब चले गए तो नौकरों ने बाग उजाड़ना शुरू किया। तीसरा पाया बोला, "दोस्तों, यही वक़्त है बादशाह से वफ़ादारी निभाने का। चलो इस बाग को बादशाह के लिए बचाओ।" पाए अपनी जगह से निकले और तड़ाप-तड़ाप उन लोगों के सिरों पर पड़ने लगे। वे लोग घबरा गए और सारा बाग और साज़ो-सामान छोड़कर भाग खड़े हुए। इसके बाद बादशाह का पलंग उड़ता हुआ वापस उनके शयनकक्ष में पहुँच गया।
बादशाह की जान में जान आई। सुबह हो गई। बादशाह ने नौकरों से जूता माँगा तो सेवक ने आकर बताया कि बादशाह सलामत के जूते में काला साँप मरा हुआ पड़ा है। बादशाह को यक़ीन हो गया कि रात उन्होंने कोई सपना नहीं देखा था। जो हुआ वह हक़ीक़त थी। इसी वक़्त ख़ज़ाने का ख़ज़ांची दौड़ता हुआ आया। उसने बताया कि रात ख़ज़ाने के पहरेदार सो गए थे। दो चोरों ने सेंध लगाकर ख़ज़ाना लूटने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उन्हें मार दिया है। बादशाह जानता था कि चोरों को किसने मारा है। उसने पहले उन पहरेदारों को सज़ा देने का आदेश दिया। इसके बाद ख़ास नौकरों को बुलाकर कहा कि शहर के बाहर जो जंगल है, वहाँ जाओ और वहाँ की ख़बर लो।
थोड़ी देर में वे लोग वापस आए और बेहद हैरत के साथ सूचना दी कि जंगल का तो नक़्शा ही बदला हुआ है। वहाँ पर बड़ा खूबसूरत बाग लगा है। सोने-चाँदी की कुर्सियाँ और दूसरा सजावट का सामान है और सोने-चाँदी के ढेरों बर्तन रखे हैं। यहाँ इतना सोना और चाँदी था जितना बादशाह के पूरे ख़ज़ाने में भी नहीं था। बादशाह ने बढ़ई के लड़के को बुलाकर इनाम और सम्मान दिया और सारा सोना-चाँदी अपने ख़ज़ाने में जमा करवा लिया।
कहानी खत्म करके राजकुमार और परदे में छुपे हुए जिन्न में बहस छिड़ गई। राजकुमार कह रहा था वह पाया अच्छा था जिसने साँप को मारकर बादशाह की जान बचाई। और पर्दा कह रहा था कि वह पाया अच्छा था जिसने चोरों को मार-मारकर बादशाह का ख़ज़ाना बचाया। बहस जब हद से बढ़ी तो रानी बेकाबू होकर बोल उठी, "बेवकूफ़ो, इसका नाम कोई नहीं ले रहा जिसने बाग लगाया और मन भर सोना-चाँदी बादशाह को दिलवा दिया?" राजकुमार ने आवाज़ लगाई, "नगाड़े पर चोट करो!" रानी तीसरी बार भी बोल पड़ी। रानी के गुस्से और सोच में आँखों से आँसू निकल आए लेकिन उसने तय कर लिया कि वह अब नहीं बोलेगी। रात का आखिरी पहर था। राजकुमार ने रानी के चंदनहार को संबोधित किया, "रानी के चंदन की लकड़ी के हार, रानी हमसे क्यों बोलेंगी? तुम ही कोई बात करो जिससे रात कटे।"
चंदनहार बोला, "भाई, मेरी तो शामत आई हुई है। रानी कभी गुस्से में करवट बदलती है, कभी वह करवट बदलती है। मुझे उठा-उठाकर पटक रही है। भैया, तुम जीत जाओ तो इससे गिन-गिनकर बदले लेना।" राजकुमार बोला, "तुम लोग रानी को नाराज़ करने वाली बातें मत किया करो। कोई बात करो जिससे रात कट जाए।" चंदनहार कहने लगा, "चलो तुम्हारी मर्ज़ी, जैसा तुम कहो, मैं तुम्हें कहानी सुनाता हूँ। बहुत साल पहले किसी शहर में एक लकड़हारा रहता था, बड़ा मेहनती और ईमानदार। सारा दिन जंगल से लकड़ियाँ काटता और शाम को बाज़ार में जाकर बेच देता। जो पैसे मिलते उससे अपना और अपने बाल-बच्चों का पेट भरता था।"
उसके चार बेटे थे। चारों बहुत ही होनहार और समझदार थे। उन्हें एहसास था कि उनके माँ-बाप उनके लिए कितनी मेहनत करते हैं। खुद भूखे सो रहते हैं, लेकिन उन्हें अच्छा खाना खिलाते हैं। खुद पैबंद लगाकर गुज़ारा कर लेते हैं, लेकिन उन्हें अच्छे कपड़े पहनाते हैं। एक दिन लकड़हारे को जंगल में एक चमकदार पत्थर पड़ा नज़र आया। वह उसे उठा लाया और अपने घर के ताक में डाल दिया कि बच्चे खेलेंगे। रात को उसकी बीवी झोपड़ी में दीपक जलाने आई तो उसने देखा कि ताक में तो बड़ा रोशन दीपक जल रहा है जिसमें से किरणें फूट रही हैं। उसने लकड़हारे को बुलाकर दिखाया। लकड़हारा तुरंत समझ गया कि यह कोई बहुत ही कीमती हीरा है जो हमारे बच्चों के भाग्य से मिला है ताकि उनकी अच्छी परवरिश हो सके।
उसने वह पत्थर जौहरी को दिखाया। जौहरी ने देखते ही पहचान लिया कि वह हीरा था जिसकी कीमत का अंदाज़ा करना ही मुश्किल था। फिर भी जौहरी ने लकड़हारे को इस पत्थर की अच्छी कीमत दी। लकड़हारा इसी में खुश हो गया। इन पैसों से उसने लकड़ी की टाल खोल ली। छोटा-मोटा मकान बना लिया। उसका कारोबार अच्छा चला। दोनों मियाँ-बीवी ने अपनी सारी ज़िंदगी अपने चारों बेटों को अच्छे से अच्छे तरीके पर परवरिश करने, पढ़ाने-लिखाने में लगा दी थी।
तीनों बेटों की शादी कर दी और अपना कारोबार बेचकर सारा पैसा चारों बेटों में बराबर बाँट दिया। इन पैसों से बेटों ने अलग-अलग कारोबार शुरू किया। क्योंकि उनकी परवरिश में माँ-बाप का प्यार और नैतिकता शामिल थी, इसलिए उन्होंने सोचा कि उन्हें माँ-बाप के लिए कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे माँ-बाप का कुछ क़र्ज़ उतार सकें। बड़े बेटे ने अपने माँ-बाप के लिए शानदार और खूबसूरत मकान बनवा दिया, जिसमें आराम की हर चीज़ मौजूद थी। दूसरे बेटे ने घर के सामने ज़मीन लेकर एक खूबसूरत बाग लगाया और एक तालाब खुदवाया। इसमें नाव डलवाई ताकि उसके माँ-बाप मनोरंजन कर सकें।
तीसरा बेटा माँ-बाप को तीर्थ यात्रा, दर्शन पर ले गया और पवित्र नदियों में स्नान करवाया। फिर तीनों बेटे अपने-अपने बीवी-बच्चों के साथ अलग-अलग मकान में रहने लगे। इस अवधि में लकड़हारा और उसकी बीवी बुढ़ापे की सीमाएँ पार कर चुके थे और तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त थे। लकड़हारे की दृष्टि जाती रही और उसकी बीवी घुटनों के दर्द की वजह से चलने-फिरने से मजबूर हो गई थी। इतने बड़े घर और बाग में दोनों बूढ़ा और बुढ़िया अकेले थे।
उनके चौथे और सबसे छोटे बेटे ने उनके लिए कोई बड़ा काम तो नहीं किया लेकिन अपनी सारी ज़िंदगी माँ-बाप की सेवा के लिए समर्पित कर दी। उसने शादी भी नहीं की कि कहीं बीवी-बच्चे उसे उसके कर्तव्य से विमुख न कर दें। उसने अपना कारोबार भी अपने मुंशी को सौंप दिया। जब तक वह ज़िंदा रहे, छोटा बेटा बाप की आँखें और माँ की लाठी बनकर रहा।
चंदन की लकड़ी के बने हार ने कहानी खत्म करके कहा, "मेरे विचार में सबसे ज़्यादा पुण्य का काम बड़े बेटे ने किया, जिसने माँ-बाप के लिए शानदार घर बनवाया।" राजकुमार बोला, "नहीं, सबसे ज़्यादा तारीफ़ का काम तो तीसरे बेटे ने किया जिसने माँ-बाप को दर्शन करवाए।" दोनों में जमकर बहस हुई।
रानी से रहा नहीं गया। वह बोल पड़ी। उसने चंदन की लकड़ी के बने हुए हार उतारकर फेंकते हुए कहा, "कमबख्तों, इसका नाम कोई नहीं ले रहा जिसने अपनी सारी ज़िंदगी बूढ़े, अंधे और मजबूर माँ-बाप की सेवा में लगा दी।" रानी बोली और राजकुमार उठकर खड़ा हो गया। ऊँचे से चिल्लाते हुए उसने आवाज़ लगाई, "नगाड़े पर चोट करो!" रानी एक रात में चार बार बोल पड़ी। "मैं जीत गया।"
रानी दिल में बहुत उदास और नाराज़ हुई। लेकिन सख्ती से उसने कहा, "ज़्यादा खुश होने की ज़रूरत नहीं। मेरी अभी एक शर्त बाकी है।" राजकुमार ने कहा, "वह भी बता दो।" रानी ने जवाब दिया, "मेरी आखिरी शर्त एक पहेली है। अगर इसका सही जवाब नहीं दे सके, तो सारी कामयाबी हवा हो जाएगी। पहेली यह है कि जना ब्याही माँ ने बेटे पर सवारी ली।" राजकुमार दिल ही दिल में हँस पड़ा। वह घटना तो खुद उसी के राज से संबंधित थी। उसने पहेली बूझते हुए कहा, "यह गुलिस्ता नगरी की बात है। गुलिस्तान के बादशाह"
ने अब से बहुत ही अलग नस्ल के घोड़े मंगवाए। वह चाहते थे कि इन घोड़ों की नस्ल को अपने मुल्क में बढ़ाए। उन्होंने इन अरबी घोड़ों को देसी घोड़ियों के साथ बंधवाया। घोड़ हामिला हो गई। लेकिन जब पैदाइश का वक्त आया तो वह देसी घोड़ अरबी घोड़ों के बच्चों को जन्म नहीं दे सकी। बादशाह के हुक्म से घोड़ियों के पेट काटकर बच्चे निकाले गए और उन घोड़ियों की खालों से घोड़ों की पीठ पर डाली जाने वाली जैन बनाई गई। जब वह बच्चे बड़े हुए तो उनकी पीठों पर उनकी मांओं की खाल की जैन डाली गई। इस तरह जने और ब्याहे बगैर मां ने बेटों पर सवारी की।
पहेली का जवाब देकर सौदागर बना शहजादा चला गया। रानी दुख से रो पड़ी। मेरी भी क्या किस्मत थी। राजा महाराजा मेरी किस्मत में नहीं थे। एक सौदागर का छोकरा था और वह भी छोड़कर चला गया। रोते-रोते आंसू पोंछने के लिए उसने अपना आंचल उठाया जो तख्त के नीचे लटक गया था। उसने देखा कि आंचल पर कुछ लिखा हुआ था। उसने फौरन आंखें साफ की और पढ़ा। लिखा था मैं बादशाह गुलिस्ता का तुझे फरेब देने आया था। जब तेरा बेटा अगर मुझे फरेब [संगीत] देगा तब तुझे लेकर जाऊंगा। रानी रोते-रोते हंस पड़ी। दिल को सुकून हुआ कि चलो किसी सौदागर से नहीं हारी। मुझे हराने वाला तो मुझसे भी बड़ा बादशाह है।
इधर शहजादे ने उन बामन [संगीत] बादशाहों को आजाद कर दिया। उन्हें यह कहकर साथ लेकर चला और उनसे बोला, पहले आप लोगों को मेरे पिताजी के सामने चक्की पीस कर दिखाना है। फिर आप लोग अपनेपने राज्य जा सकते हैं। वह सब शहजादे के एहसानमंद हो गए। गुलिस्ता पहुंचकर शहजादे ने अपने बाप को उसके तीनों ख्वाब सच करके दिखाए। बादशाह बेटे की जुदाई [संगीत] में परेशान थे। उन्होंने राजपाट बेटे को सौंपा और खुद इबादत में लग गए।
इधर रानी भी हार मानने वाली नहीं थी। उसने नाचने गाने वाली खूबसूरत और कम उम्र लड़कियों की एक टोली [संगीत] तैयार की और गुलिस्तान जा पहुंची। सारे गुलिस्तान में टोली की धूम मच गई जिसे देखो खींचा चला आ रहा है। नौजवान बादशाह को भी शौकर [संगीत] हुआ। उसने टोली वालों से कहलवाया कि राजमल आकर नाच रंग जमाए बहुत इनाम मिलेगा। लेकिन मंडली की मालकिन ने इंकार [संगीत] कर दिया है। उसने कहा है कि राजा हो या रंक जिसे नाच देखना है और गाना सुनना है वह यहीं [संगीत] आए। बादशाह का इश्तियाक बढ़ा। एक दिन बादशाह की सवारी भी नाटक मंडली देखने जा पहुंची। लड़कियों ने नाच रंग दिखाए। बादशाह ने खूब इनाम दिया। फिर उनकी मालकिन से मिलने की ख्वाहिश की। लड़कियों ने कहा, हमारी मालकिन किसी से नहीं मिलती। बादशाह ने कहा, उनसे कहो गुलिस्तान का बादशाह उनके घर पर आया है। क्या इसका एतराम नहीं किया जाएगा? बादशाह को अंदर बुला लिया गया। चौकी पर जो लड़की [संगीत] बैठी थी, उसके सामने तो 14वीं रात का चांद भी फीका था। बादशाह तो पलक झपकना भी भूल गए। जब लड़की ने उठकर उन्हें सलाम किया तो वह होश में आए। लड़की ने बताया कि वह कोहिस्ताव राज से आई है और शरीफ मांबाप की बेटी है। क्योंकि उसका कोई भाई नहीं है इसलिए बीमार मांबाप के इलाज के लिए पैसा जमा [संगीत] करने निकली है। बादशाह तो रोज आने लगे। उन्होंने उसे अपने हरम में दाखिल करने की बात की तो उसने कहा मैं शरीफजादी हूं। आपको कोई ताल्लुक बनाना है तो शादी [संगीत] कीजिए। बादशाह उसके इश्क में इतने पागल हो रहे थे कि शादी पर भी राजी हो गए। कुछ माह बाद जब उसने अपने देश जाने की बात कही तो बादशाह [संगीत] ने बड़ी कोशिश की कि वह यहीं रह जाए। अपने मां-बाप को भी बुला ले। लेकिन रानी किसी तरह नहीं मानी। बादशाह मजबूर हो गए। रानी ने चलते वक्त बादशाह से निशानी के रूप में उनकी तलवार और अंगूठी ले ली। ताकि कभी जिंदगी में आपसे मिलना हो और आप भूल जाए तो आपको याद दिला सकूं। याद रानी वापस अपने शहर चली आई। वह मां बनने वाली थी। उसने एक चांद से बेटे को जन्म दिया जो हूबहू बादशाह की शक्ल का था। रानी ने अपने बेटे की बेहतरीन तालीम ओ तरबियत की। उसे किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी। लेकिन बच्चा अक्सर पूछता मां मेरे पिताजी कहां है? सब बच्चों के बाप हैं। बस मेरे ही बाप नहीं है। रानी उसे बहला देती कि तुम्हारे बाप परदेश गए हैं। जब तुम 12 साल के हो जाओगे तब आएंगे।
वक्त गुजरता रहा। जिस दिन शहजादे की 12वीं सालगिरह थी, वह रानी के पीछे पड़ गया। अब तो मैं 12 साल का हो गया। पिताजी नहीं आए। बताइए वह कहां है? मैं उन्हें ढूंढ कर लाऊंगा। आखिर मजबूर होकर रानी ने सारी कहानी बेटे को सुनाई। वह दुपट्टा दिखाया, अंगूठी और तलवार दिखाई। शहजादा उसी वक्त गुलिस्तान जाने की जिद कर बैठा। रानी ने बहुत समझाया लेकिन वह नहीं माना। मां अब तो पिताजी को छल फरेब करके [संगीत] ही वापस आऊंगा और उन्हें आपके सामने ला खड़ा करूंगा। रानी का दिल तो नहीं चाहता था कि अपने फूल से बेटे को खतरे में डाले। लेकिन उसकी रगों में भी जिद्दी मांबाप का खून दौड़ रहा था। उसने बादशाह की निशानानियां और जरूरत के लिए अशरफियां दी।
दो-चार दिन उसने गुलिस्तान नगरी की सैर की। फिर शरारतें शुरू कर दी। तरह-तरह के भेष बदलता रहता और लोगों को परेशान करता। कहीं औरतें घड़ों [संगीत] में पानी भर के ले जा रही हैं तो गुलेल से उनके मटके फोड़ दिए। लोग घाट पर घुस करने पानी में उतरते तो उनके कपड़े गायब कर दिए। हलवाई [संगीत] का मिठाई से भरा थाल उलट दिया। नानबाई की रोटियां ले उड़ा। किसी शादी के मंडप में दूल्हा का साफा और सेहरा नोच दिया। सबसे ज्यादा शामत मोटे सेठों की आई हुई थी। उनकी पीठ पर लगातार गुलेल से निशाना लिया करता। गर्द शहर में हायहा का शोर मच गया। बादशाह के गानों तक भी खबर पहुंची। बादशाह ने थानेदार को बुलाकर डांटा। यह शहर में क्या हो रहा है? तुम्हारे सिपाही एक चोर को नहीं पकड़ सकते। कोतवाल ने सिपाहियों को बुलाकर डांटा। सिपाहियों ने पहरा दोगुना कर दिया। लेकिन खुद उनकी शामत आ गई। लड़का ना जाने किधर से आता और उनके सर आपस में [संगीत] टकरा देता। वह एक दूसरे को बुरा भला कहते थे। कभी सिपाहियों के सर से टोपियां गिरा देता। कभी उनका खाना लेकर भाग जाता। हवा की तरह होता और मनमानी कर जाता। दरअसल वह उनके आसपास ही घूमता था। लेकिन किसी को शक भी [संगीत] नहीं होता था कि यह भोला भाला खूबसूरत सा लड़का यह हरकतें कर रहा है।
शहर में वारदातें बढ़ने लगी और सिपाहियों से कुछ नहीं हुआ तो कोतवाल ने खुद चोर पकड़ने का फैसला किया। छानबीन की तो पता चला कि वह बाहर से आता है और लूटपाट कर शहर पनाह के दरवाजे के बाहर भाग जाता है। थानेदार ने सोचा चोर रात को शहर से बाहर नहीं रह सकता। अगर मैं शहर के दरवाजे के बाहर खड़ा हो जाऊं तो रात को जब वह वापस आएगा मैं उसे पकड़ लूंगा। रात को शहर का दरवाजा बंद हो जाया करता था। कोतवाल के पास लकड़ी का एक शिकंजा पीड़ा था जिस पर पांव पड़ जाता तो पांव इसमें बंद हो जाता और बगैर चाबी के नहीं [संगीत] खुलता था। थानेदार ने शहर का दरवाजा बंद कर दिया। सिर्फ एक आदमी के निकलने [संगीत] भर की जगह छोड़कर वहां वह पीड़ा रख दिया और एक तरफ खड़ा हो गया। शाम हो रही थी। इतने में क्या देखता है कि ढोबी घाट की तरफ से एक जवान और बेहद खूबसूरत लड़की पांव में पायल पहने बनी ठनी छमम छमम करती चली आ रही है। कोतवाल साहब तो हैरान हो गए। जैसे ही औरत दरवाजे के करीब पहुंची, कोतवाल दौड़ कर आए और बोले, अरे भाई जी, कहीं इस पीड़ा पर पांव ना रख देना। तुम्हारा फूल सा पांव घायल हो जाएगा। लड़की नखरा दिखाते हुए बोली, "यह भला क्या है? और कौन है यहां? क्यों बैठे हैं? कोतवाल बोला, मैं इस शहर का कोतवाल हूं। आपने सुना होगा कि आजकल एक चोर [संगीत] ने लोगों को परेशान कर रखा है। मैं इस चोर को पकड़ने के लिए बैठा हूं। लड़की बोली, भला इस लकड़ी के पीड़ा से आप चोर को कैसे पकड़ेंगे? कोतवाल साहब बोले यह लकड़ी का तख्ता नहीं भाई जी यह चोर पकड़ने की मशीन है। इस पर पांव पड़ जाए तो पांव बंद हो जाता है। लड़की बोली अच्छा जरा मेरा पांव तो बंद करके दिखाइए। उसने अपना गोरागरा [संगीत] पांव आगे बढ़ाया। कोतवाल साहब पिघल गए। अरे नहीं भाई जी आपका पांव क्यों? मैं अपना पांव बंद करके दिखाता हूं। कोतवाल साहब जैसे ही पीड़ा पर खड़े हुए उनके दोनों पांव बंद हो गए। लड़की ने पूछा, अब यह खुलेगा कैसे? कोतवाल ने जेब [संगीत] से चाबी निकाल कर दी। यह लो मुझे खोल दो। लड़की तो चाबी लेकर यह जा वह जा साथ ही कोतवाल साहब की टोपी भी ले उड़ी। अंधेरा फैल चुका था। उसने एक तरफ जाकर कपड़े बदले। कोतवाल की टोपी पहनी। बादशाह का बेटा था। कद काठ अच्छे थे। अंधेरे में पूरा मर्द लगता था। शहर के दरवाजे से अंदर घुसा और आवाज बदलकर सिपाहियों से बोला, दरवाजा बंद कर दो। हमने चोर पकड़ने की मशीन [संगीत] रख दी है। चोर खुद ही बंद हो जाएगा। हम घर जा रहे हैं। सिपाहियों ने दरवाजा बंद कर दिया। बाहर कोतवाल चिल्लाता रहा। अरे दरवाजा खोलो। मैं कोतवाल हूं। लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला और ऊपर से उस पर कंकर [संगीत] पत्थर फेंकते रहे और हंसी उड़ाते रहे कि देखो चोर अपने आप को कोतवाल कह रहा है। रात भर कोतवाल बेचारा शिकंजे में बंद खड़ा रहा। सुबह हुई और शहर का दरवाजा खुला तो सिपाहियों ने देखा कि वह वाकई कोतवाल था। और चोर कोतवाल बनकर उन्हें फरेब दे गया।
दो दिन कोतवाल शर्म के मारे घर से नहीं निकला। तीसरे दिन आकर उन्होंने बादशाह के सामने अपनी माजूरी जाहिर कर दी। उस वक्त दरबार में बादशाह के सब रिश्तेदार मौजूद थे जो चौधरी उमरा कहलाते थे। उन्होंने बादशाह से कहा महाराज आपके सिपाही और कोतवाल सब निकम्मे हैं। एक जरा से चोर को नहीं पकड़ सके। [संगीत] आप हमें इजाजत दें। हम उसे पकड़ कर लाएंगे। बादशाह ने कहा इजाजत है। सारे चौधरी दरबार से निकले तो उन्होंने आपस में कहा आओ जरा बाग में बैठकर मशवरा करते हैं कि काम की शुरुआत कैसे की जाए। यह लोग बाग में ही बैठे थे कि [संगीत] एक 12 14 साल का लड़का एक टोकरी में तेल की बोतलें सजाए तेल मालिश मालिश करता हुआ निकला और लगा उनकी खुशामद करने। सरकार तेल मालिश कराइए बड़ा आराम मिलेगा। दिमाग भी चकाचक हो जाएगा। चौधियों ने कहा, "चल भाग, हम बड़े भारी [संगीत] काम पर निकले हैं। हमें चोर पकड़ने की तरकीब सोचने दे। लड़का बोला, एक मालिश करवा कर देखिए मालिक। ऐसा दिमाग खुलेगा कि चोर पकड़ने की तरकीब अपने आप समझ में आ जाएगी। चौधरी हंसने लगे। चलो क्या हर्ज है? थोड़ी मालिश करवा लेते हैं। अब वह लड़का एक ऐसा तेल लेकर निकला था जिसे बदन पर लगाकर अगर पानी लग जाए तो [संगीत] बदन बेतहाशा सूझ जाता है। लड़के के कहने पर सब ने कपड़े उतार कर लंगोटियां बांध ली। लड़के ने सबकी खूब तबीयत से मालिश की। सबको बड़ा मजा आया। लड़का बोला, सरकार अब आप जरा इस तालाब के पानी में एक डुबकी लगाइए। देखिए तबीयत हरी हो जाएगी। मालिश करवाकर नहाना तो था ही। वह सब के सब तालाब में उतर गए। इधर लड़का इन सबके कपड़े लेकर भाग गया। जब वह तालाब से बाहर निकले तो फूल-फूल कर कुप्पा हो रहे थे। शक्लें पहचानी नहीं जा रही थी। ऊपर से कपड़े भी गायब। बादशाह के रिश्तेदार थे। कुछ इज्जत थी। ऐसी हालत में दिन [संगीत] दहाड़े घर भी नहीं जा सकते थे। वहीं बाग में छुप कर बैठ गए। गीले बदन में हवा लगी तो सूजन और बढ़ गई। अपनी किस्मत को [संगीत] कोस रहे थे। दूसरी तरफ वह लड़का सारे चौधियों के घर गया और उनकी बीवियों से कहा [संगीत] कि चौधरी साहब ने कहलवाया है कि वह आज रात घर नहीं आएंगे। बादशाह ने उन्हें चोर पकड़ने का काम सौंपा है। रात को हो सकता है चोर उनके घर आए। आप लोग [संगीत] दरवाजा मत खोलना। अपनी-अपनी छत पर पिसी हुई लाल मिर्च और मिट्टी कूड़ा लेकर बैठ जाना। वह दरवाजा खटखटाए तो [संगीत] ऊपर से उस पर कूड़ा फेंक देना। बीवियों ने ऐसा ही किया। जब रात गहरी हो गई तो चौधरी बाग से निकले और छुपते-छुपाते अपने घरों को पहुंचे। उन्होंने दरवाजा खटखटाया तो उनकी बीवियों ने ऊपर से कूड़ा करकट, मिट्टी और मिर्च डाली और चिल्लाते रहे। अरे हम तुम्हारे शौहर हैं। बीवियां बोली, क्या हम अपने शौहर को नहीं पहचानती? हमारे शौहर तुम्हारी तरह इस तरह मोटे भैंसे नहीं हैं। गरज रात भर यही तमाशा रहा। सुबह हुई तो बीवियों ने देखा कि वह वाकई उनके शौहर हैं। एक तो सूजे हुए बदन, ऊपर से मिट्टी, कूड़ा और मिर्च सबका बुरा हाल था। चोर को उनकी बीवियों ने खूब बुरा भला कहा जिसने उन्हें भी धोखा दे दिया। चौधियों ने बादशाह से कहलवाया कि वह चोर पकड़ने में नाकाम रहे।
बादशाह ने ऐलान करवा दिया कि जो भी चोर को पकड़ेगा, उसे 100 अशरफिया इनाम [संगीत] दी जाएंगी। इनाम की बात शहर की तवाइफों ने भी सुनी। उन्होंने सोचा [संगीत] यह इनाम तो उन्हीं को मिलना चाहिए। भला उनके नाज नखरों के सामने चोर कैसे टिक सकता है? उनमें से कुछ जहां दीदा औरतें बादशाह के पास गई और चोर पकड़ने की इजाजत चाही बादशाह तो तंग आ चुका था। इजाजत दे दी। सारी औरतें शाम को सज संवर [संगीत] कर चौक पर जा बैठी कि कोई तरकीब सोचे। इतने में एक चाट बेचने वाला वहां पहुंच गया जो तरह-तरह की छटपटी चाटें बेच रहा था और लगा औरतों [संगीत] की खुशामद करने। बाई छक कर देखो क्या बढ़िया चाट बनाई है। औरतों के मुंह में पानी भर आया। सबने मजे लेकर खूब चाट खाई। इस चाट में लड़के ने बेहोशी की दवा मिला रखी थी। चाट खाते ही सब लंबी-लंबी लेट गई। रात गहरी हो चुकी [संगीत] थी और चौक भी सुनसान हो गया था। लड़के ने सारी औरतों की चोटियां एक दूसरे के साथ कसकर बांधी और आखिरी औरत की छोटी पेड़ की सबसे ऊंची शाख से बांधकर 9 2 11 हो गया। सुबह लोगों ने देखा कि शहर की सारी मशहूर हसीनाएं पेड़ों पर लटक रही हैं। खुद उन्हें जब होश आया तो उन्होंने खूब शोर मचाया और चोर को सैकड़ों गालियां दी।
बादशाह ने सुना तो उन्हें हंसी भी आई और [संगीत] ताज्जुब भी हुआ कि ऐसा चालाक आदमी है जो किसी के हाथ ही नहीं लगता। बादशाह ने ऐलान किया कि आज रात को हम खुद चोर पकड़ेंगे। बादशाह को बताया गया कि चोर दिन के वक्त शहर पनाह के बाहर ही घूमता है और शाम के करीब शहर में घुसता है। चुनांचे बादशाह अपने लाओ लश्कर के साथ वहां तक आए। उन सबको शहर के अंदर [संगीत] ही छोड़ा और खुद तैरते हुए धोबी घाट की तरफ निकल गए। शाम का अंधेरा फैलने लगा तो सारे धोबी [संगीत] अपने गधों के साथ शहर में चले गए। बस एक लड़का किनारे पर बैठा कपड़े धोए जा रहा था। अंधेरा फैल चुका था। बादशाह ने लड़के के पास जाकर पूछा। सब लोग चले गए। तुम अभी तक क्यों नहीं गए? लड़के ने कहा हुजूर एक आदमी मुझे अपने कपड़े धोने को देकर गया है। उसने कहा था कि दिन को उसे नहाने का वक्त नहीं मिला। वह जब तक नहा कर ना आ जाए मैं यहीं उसके कपड़े लेकर बैठा रहूं। देखिए उसने मुझे कुछ रुपए भी दिए हैं। बादशाह समझ गया कि जरूर यही चोर है जो रात के अंधेरे का [संगीत] फायदा उठाकर घुस करने आया है। बादशाह ने पूछा वह आदमी कहां है? लड़के ने नदी में उभरते हुए सर की तरफ इशारा किया। वह देखिए वह नहा रहा है। बादशाह ने देखा पानी में एक आदमी तैर रहा था जिसका सिर्फ सर नजर आ रहा था। बादशाह ने सोचा बचकर कहां जाएगा? [संगीत] आज तो पकड़ा जाएगा। बादशाह ने लड़के से कहा, "हम तुम्हें पांच अशरफियां और इनाम देंगे। तुम थोड़ी देर के लिए अपनी [संगीत] यह धोती, कुर्ता और पगड़ी हमें दे दो। और हमारे कपड़े पहनकर इधर शहर के दरवाजे के करीब [संगीत] खड़े हो जाओ। वह जो आदमी नहा रहा है, वह बहुत बड़ा चोर है। जैसे वह निकलेगा, हम इसे पकड़ लेंगे। लड़का राजी हो गया। बादशाह ने उसका धोती कुर्ता पहन लिया और घाट पर बैठकर चोर का इंतजार करने लगे। इधर वह लड़का बादशाह के लिबास में शहर पनाह में दाखिल हुआ और फौजियों से बोला हम महल वापस जा रहे हैं। आज चोर हाथ नहीं आया कल पकड़ेंगे। बादशाह से मुशाबहत और शाही लिबास की वजह से मध्यम रोशनी में लोगों ने इसे बादशाह समझा। वह हाथी पर बैठकर महल में आ गया और बादशाह की ख्वाबगाह में जाकर सो गया। शहर पनाह का दरवाजा बंद कर दिया गया।
बादशाह को बैठे-बैठे जब काफी देर हो गई तो उसने आवाज दी, ओ भाई अब बाहर निकल आ। मुझे घर जाना है। बहुत देर हो गई है। लेकिन उधर से कोई जवाब नहीं आया। वह तैरते हुए किनारे के करीब पहुंचे तो बादशाह ने कंकड़ी मारी। कंकरी खट [संगीत] से बोली। बादशाह चौंके। पानी में उतर कर सर को पकड़ा तो लकड़ी का बना हुआ सर और चेहरा था। बादशाह अपनी बेवकूफी पर हाथ मल कर रह गए। कमबख्त मुझे भी फरेब दे गया। दरवाजे पर आए तो दरवाजा बंद पाया। सिपाहियों ने कहा, बादशाह का हुक्म है रात को दरवाजा किसी के लिए नहीं खुल सकता। बादशाह कोतवाल का हाल सुन चुके थे। सोचा अपनी बेइज्जती करवाने से क्या फायदा? दरवाजे के पास बैठकर रात गुजार दी। सुबह दरवाजा खुला तो बादशाह पगड़ी से मुंह छुपाकर शहर में दाखिल हुए और सीधे महल में पहुंचे। महल के चौकीदार हैरान रह गए कि बादशाह तो रात को आकर सो गए थे। फिर यह कौन है? पूछने की [संगीत] हिम्मत किसी को ना हुई। बादशाह सीधे अपनी ख्वाबगाह में पहुंचे तो देखा कि उनके बिस्तर पर उनकी चादर ओढ़े कोई सो रहा है। बादशाह ने चादर पकड़ कर खींची तो लड़का फौरन उठकर बैठ गया। बादशाह को लगा उनके जमाने की तस्वीर सामने है। चंद मिनट तो मददूद से रह गए। फिर पूछा भाई तू कौन है और क्यों मेरे पीछे पड़ा है? लड़के ने झट उनके पांव छुए और अपने झोले में से अपनी मां का दुपट्टा बादशाह की अंगूठी और कटार निकाल कर सामने रख दी। बादशाह सब समझ गए। उन्हें पता चल गया कि उनका अपना बेटा है जिसने उन्हें फरेब दिया है। क्योंकि उन्होंने रानी से कहा [संगीत] था कि जब तेरा बेटा अगर मुझे फरेब देगा तब मैं तुझे आकर ले जाऊंगा। फौरन बेटे [संगीत] को गले लगाकर बोले तूने वाकई मुझे फरेब दे दिया। अब चल तेरी मां को लेकर आते हैं। बादशाह पूरी फौज के साथ रानी के शहर पहुंचे और पूरी इज्जत और एहतराम के साथ उसे [संगीत] लेकर गुलिस्तान आ गए और फिर उनके दिन हंसीखुशी गुजरने लगे।