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यह ईशावास्य उपनिषद शुक्ल यजुर्वेद संहिता का 40वां अध्याय है। मंत्र भाग का अंश होने से इसका विशेष महत्व है। इसी को सबसे पहला उपनिषद माना जाता है।
शुक्ल यजुर्वेद के प्रथम उन्तालीस अध्यायों में कर्मकांड का निरूपण हुआ है। यह उसे कांड का अंतिम अध्याय है और इसमें भागवत तत्व रूप ज्ञान कांड का निरूपण किया गया है। इसके पहले मंत्र में 'ईशावास्य' वाक्य आने से इसका नाम ईशावास्य माना गया है।
शांति पाठ:
ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
[संगीत]
अखिल ब्रह्मांड में जो कुछ भी जड़ चेतन स्वरूप जगत है, यह समस्त ईश्वर से व्याप्त है। उसे ईश्वर को साथ रखते हुए त्यापूर्वक इसे भोगते रहो, इसमें आसक्त मत हो, क्योंकि धन, भव्य पदार्थ किसका है? अर्थात किसी का भी नहीं।
व्याख्या: अखिल विश्व ब्रह्मांड में जो कुछ भी यह चर-अचरआत्मक जगत तुम्हारे देखने-सुनने में आ रहा है, सबका सब सर्वधर, सर्व नियत, सर्वधिपति, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्व कल्याण गुण स्वरूप परमेश्वर से व्याप्त है। सदा सर्वत्र उन्हें से परिपूर्ण है। इसका कोई भी अंश उनसे रहित नहीं है। ऐसा समझकर उन ईश्वर को निरंतर अपने साथ रखते हुए, सदा सर्वदा उनका स्मरण करते हुए ही तुम इस जगत में त्याग भाव से केवल कर्तव्य पालन के लिए ही विषयों का यथा विधि उपभोग करो। अर्थात विश्व रूप ईश्वर की पूजा के लिए ही कर्मों का चरण करो। विषयों में मन को मत फंसा दो। इसी में तुम्हारा निश्चित कल्याण होना चाहिए। इस जगत में शास्त्र नियत कर्मों को करते हुए ही 100 वर्षों तक जीने की इच्छा करनी चाहिए। इस प्रकार त्याग भाव से परमेश्वर के लिए किए जाने वाले कर्म तुझ मनुष्य में लिप्त नहीं होंगे। इससे भिन्न अन्य कोई प्रकार अर्थात मार्ग नहीं है, जिससे कि मनुष्य कर्म से मुक्त हो सके।
व्याख्या: जगत के एकमात्र कर्ता, धर्ता, धर्ता, सर्वशक्तिमान, सर्वमय परमेश्वर का सतत स्मरण रखते हुए, सब कुछ उन्हें का समझ कर, उन्हें की पूजा के लिए शास्त्र नियत कर्तव्य कर्मों का आचरण करते हुए ही 100 वर्ष तक जीने की इच्छा करो। इस प्रकार अपने पूरे जीवन को परमेश्वर के प्रति समर्पण कर दो। ऐसा समझो कि शास्त्रों का आचरण करते हुए जीवन निर्वाह करना केवल परमेश्वर की पूजा के लिए ही है, अपने लिए नहीं, भोगने के लिए नहीं।
[संगीत]
ऐसा करने से वह कर्म तुम्हें बंधन में नहीं डाल सकेंगे। कर्म करते हुए कर्मों से लिप्त ना होने का यही एकमात्र मार्ग है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई भी मार्ग कर्म बंधन से मुक्त होने का नहीं है। असुरों के जो प्रसिद्ध नाना प्रकार की योनियां एवं नरक रूप हैं, वे सभी अज्ञान तथा दुख क्लेश रूप महानंद कर से आच्छादित हैं, जो कोई भी आत्मा की हत्या करने वाले मनुष्य को बार-बार प्राप्त होते हैं।
व्याख्या: मानव शरीर अन्य सभी शरीरों से श्रेष्ठ और परम दुर्लभ है एवं वह जीव को भगवान की विशेष कृपा से जन्म-मृत्यु रूप संसार समुद्र से उतरने के लिए ही मिलता है। ऐसे शरीर को पाकर भी जो मनुष्य अपने कर्म समूह को ईश्वर पूजा के लिए समर्पण नहीं करते और कम उपभोग को ही जीवन का, विषयों की आसक्ति और कामना वश जिस किसी प्रकार से केवल विषयों की प्राप्ति और उनके यथेष्ट उपभोग में ही लगे रहते हैं, वे वस्तुतः आत्मा की हत्या करने वाले ही हैं। क्योंकि इस प्रकार अपना पतन करने वाले वे लोग अपने जीवन को केवल व्यर्थ ही नहीं खो रहे हैं, वर्णन अपने को और भी अधिक कर्म बंधन में जकड़ रहे हैं। इन कम भोग पारायण लोगों को, चाहे वे कोई भी क्यों न हों, उन्हें चाहे संसार में कितने ही विशाल नाम, यश, वैभव या अधिकार प्राप्त हों, मृत्यु के बाद कर्मों के फलस्वरूप बार-बार उनको छूकर किट, पतंग आदि विभिन्न शोक संतप्तपूर्ण आसुरी योनियों में और भयानक नार्कों में भटकना पड़ता है, जो कि ऐसी आसुरी स्वभाव वाले दुष्टों के लिए निश्चित किए हुए हैं और महान अज्ञान रूप अंधकार से आच्छादित हैं। वे परमेश्वर अचल, एक और मन से भी अधिक तीव्र गति युक्त ज्ञान स्वरूप या सबके जानने वाले हैं। इन परमेश्वर को इंद्र देवता भी नहीं पा सके या जान सके हैं। वे परब्रह्म पुरुषोत्तम दूसरे दौड़ने वालों को स्वयं स्थित रहते हुए ही अतिक्रमण कर जाते हैं। उनके होने पर ही, उन्हें की सत्ता शक्ति से वायु आदि देवता जल, वर्षा आदि क्रिया संपादन करने में समर्थ होते हैं।
व्याख्या: वे सर्वांतर्यामी, सर्वशक्तिमान परमेश्वर अचल और एक हैं, तथा मन से भी तीव्र गति वाले हैं। वे उससे भी कहीं विद्यमान हैं, मन तो वहां तक पहुंची नहीं पाता। वे सबके आदि और ज्ञान स्वरूप हैं, अथवा सबके आदि होने के कारण सबको पहले से ही जानते हैं। पर उनको देवता तथा महर्षिगण भी पूर्ण रूप से नहीं जान सकते। जितने भी युक्त बुद्धिमान नरेंद्र अथवा वायु आदि देवता हैं, अपनी शक्ति भर परमेश्वर के अनुसंधान में सदा दौड़ लगाते रहते हैं। पर परमेश्वर नित्य चल रहते हुए ही उन सबको पार करके आगे निकल जाते हैं। वे सब वहां तक पहुंची नहीं पाते। असीम की सीमा का पता सचेत को कैसे लग सकता है? बल्कि वायु आदि देवताओं में जो शक्ति है, जिसके द्वारा वो जल, वर्षा, प्रकाश, प्राणी, प्राण धारण आदि कर्म करने में समर्थ होते हैं, वह इन अचिंत शक्ति परमेश्वर की शक्ति का एक अंश मात्र ही है। उनका सहयोग मिले बिना यह सब कुछ भी नहीं कर सकते।
[संगीत]
वे चलते हैं, वे नहीं चलते। वे दूर से भी दूर हैं, वे अत्यंत समीप हैं। वे इस समस्त जगत के भीतर परिपूर्ण हैं और वह इस समस्त जगत के बाहर भी है।
व्याख्या: वे परमेश्वर चलते हैं, एक ही काल में परस्पर विरोधी भाव, गुण तथा क्रिया जिनमें रह सकती है, वे ही तो परमेश्वर हैं। यह उनकी अचिंत शक्ति की महिमा है। दूसरे प्रकार से यह भी कहा जा सकता है कि भगवान जो अपने दिव्य परमधाम में और लीला धाम में अपने प्रिय भक्तों को सुख पहुंचाने के लिए प्रकृति सगुण साकार रूप में प्रकट रहकर लीला किया करते हैं, यह उनका चलना है और निर्गुण रूप से जो सदा सर्वथा अचल स्थित हैं, यह उनका न चलना है। इसी प्रकार वे श्रद्धा, प्रेम से रहित मनुष्यों को कभी दर्शन ही नहीं देते, अतः उनके लिए दूर से दूर है और प्रेम की पुकार सुनते ही प्रेमी जनों के सामने चाहे जहां से उसी क्षण प्रकट हो जाते हैं, उनके लिए वे समीप से समीप हैं। इसके अतिरिक्त वे सदा सर्वत्र परिपूर्ण हैं, इसलिए दूर से दूर भी वही है और समीप से समीप भी वही है, क्योंकि ऐसा कोई स्थान ही नहीं। सबके अंतर्यामी होने के कारण भी वह अत्यंत समीप हैं, पर जो अज्ञानी लोग उन्हें इस रूप में नहीं पहचानते, उनके लिए वे बहुत दूर हैं। वस्तुतः वे इस समस्त जगत के परम आधार हैं और परम कारण वह ही हैं, इसलिए बाहर भीतर, इसलिए बाहर-भीतर सभी जगह वे ही परिपूर्ण हैं। परंतु जो मनुष्य संपूर्ण प्राणियों को परमात्मा में ही निरंतर देखता है और संपूर्ण प्राणियों में परमात्मा को देखता है, उसके पक्ष वह कभी भी किसी से घृणा नहीं करता।
व्याख्या: इस प्रकार जो मनुष्य प्राणी मात्र को सर्वधर परब्रह्म पुरुषोत्तम परमात्मा में देखता है और सर्व अंतर्यामी परम प्रभु परमात्मा को प्राणी मात्र में देखता है, वह कैसे किस घृणा या द्वेष कर सकता है? वह सदा सर्वत्र अपने परम प्रभु के ही दर्शन करता हुआ मन ही मन सबको प्रणाम करता रहता है तथा सबकी सब प्रकार सेवा करना और उन्हें सुख पहुंचाना चाहता है। जिस स्थिति में परब्रह्म परमेश्वर को भली-भांति जानने वाले महापुरुष के अनुभव में संपूर्ण प्राणी एकमात्र परमात्मा स्वरूप ही हो चुके हैं, उसे अवस्था में उसे एकमात्र परमेश्वर का निरंतर साक्षात्कार करने वाले पुरुष के लिए कौन सा मोह रह जाता है और कौन सा शोक? अर्थात वह शोक-मोह से सर्वथा रहित, आनंद परिपूर्ण हो जाता है।
व्याख्या: इस प्रकार जब मनुष्य परमात्मा को भली-भांति पहचान लेता है, जब उसकी सर्वत्र भगवद् दृष्टि हो जाती है, जब वह प्राणी मात्र में एकमात्र तत्व श्री परमात्मा को ही देखता है, तब उसे सदा सर्वत्र परमात्मा के दर्शन होते रहते हैं। उसे समय उसके अंतःकरण में शोक-मोह आदि विकार कैसे रह सकते हैं? वह तो इतना आनंद मग्न हो जाता है कि शोक-महादिकारों की छाया भी कहीं उसके चित्र प्रदेश में नहीं रह जाती। लोगों के देखने में वह सब कुछ करता हुआ भी वस्तुतः अपने प्रभु में ही क्रीड़ा करता रहता है। उसके लिए प्रभु और प्रभु की लीला के अतिरिक्त अन्य कुछ रह ही नहीं जाता। वह महापुरुष उन परम तेजोमय, सूक्ष्म शरीर से रहित, छिद्र रहित या सत रहित, शिराओं से रहित, धूल पंच भौतिक शरीर से रहित, प्रकृति दिव्य सच्चिदानंद स्वरूप, कर्म संपर्क शून्य परमेश्वर को प्राप्त हो जाता है, जो सर्व दृष्टा, सर्वज्ञ एवं ज्ञान स्वरूप, सर्वोपरि विद्यमान एवं सर्व नियंता, स्वेच्छा से प्रकट होने वाले हैं और अनादि काल से सब प्राणियों के कर्मानुसार यथा योग्य संपूर्ण पदार्थ की रचना करते आए हैं।
व्याख्या: परमेश्वर को सर्वत्र जानने वाला महापुरुष उन परब्रह्म पुरुषोत्तम सर्वेश्वर को प्राप्त होता है, जो शुभ-अशुभ कर्म जनित प्रकृति, सूक्ष्म देह तथा पंच भौतिक अस्थिर, मनसा धीमा, षड विकार युक्त स्थूल देह से रहित, छिद्र रहित, दिव्य शुद्ध सच्चिदानंद घन है एवं जो क्रांति दर्शी, सर्वदृष्टा है, सबके ज्ञात, सबको अपने नियंत्रण में रखने वाले, सर्वधिपति हैं और कर्मवश नहीं, वर्णन स्वेच्छा से प्रकट होने वाले हैं, तथा जो सनातन काल से सब प्राणियों के लिए उनके कर्मानुसार समस्त पदार्थ की यथा योग्य रचना और विभाग व्यवस्था करते आए हैं।
[संगीत]
जो मनुष्य अविद्या की उपासना करते हैं, वे अज्ञान स्वरूप घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं।
[संगीत]
अंधकार में प्रवेश करते हैं।
व्याख्या: जो मनुष्य भोगों में आसक्त होकर उनकी प्राप्ति के साधन रूप अविद्या का विविध प्रकार के कर्मों का अनुष्ठान करते हैं, परिपूर्ण विविध योनियों और भोगों को ही प्राप्त होते हैं। वे मनुष्य जन्म के चरण और परम लक्ष्य श्री परमेश्वर को न पाकर निरंतर जन्म-मृत्यु रूप संसार के प्रवाह में पड़े हुए विविध तापों से संतप्त होते रहते हैं। दूसरे, जो मनुष्य न तो अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्तापन के अभिमान से रहित कर्मों का अनुष्ठान करते हैं और न विवेक, वैराग्य, ज्ञान के प्राथमिक साधनों का ही सेवन करते हैं, परंतु केवल शास्त्रों को पढ़ सुनकर अपने में विद्या का ज्ञान का मिथ्या आरोप करके ज्ञान अभिमानी बन बैठे हैं, ऐसे अत्य ज्ञानी मनुष्य अपने को ज्ञानी मानकर 'हमारे लिए कोई कर्तव्य नहीं है' इस प्रकार कहते हुए कर्तव्य कर्मों का त्याग कर देते हैं और इंद्रियों के वश में होकर शास्त्र विधि से विपरीत मनमाना आचरण करने लगते हैं। कर्म करने वाले विषय सत्य मनुष्यों की अपेक्षा भी अधिकतर अंधकार को, यानी पशु-पक्षी, शूकर, कुकर आदि नीचे योनियों को और घोर नार्कों को प्राप्त होते हैं। ज्ञान के यथार्थ अनुष्ठान से दूसरा ही फल मिलते हैं और कर्मों के यथार्थ अनुष्ठान से दूसरा ही फल मिलते हैं। इस प्रकार हमने उन धीर पुरुषों के वचन सुने हैं, जिन्होंने हमें उस विषय की व्याख्या करके भली-भांति समझाया था।
व्याख्या: सर्वोत्तम फल प्राप्त करने वाले ज्ञान का यथार्थ स्वरूप है नित्य-नित्य वस्तु का विवेक, क्षणभंगुर विनाश शील अनीता, अलौकिक भोग सामग्रियों और उनके साधनों से पूर्ण विरक्ति, संयमपूर्ण पवित्र जीवन और एकमात्र सच्चिदानंद घन पूर्ण ब्रह्म के चिंतन में अखंड संलग्नता। इस यथार्थ ज्ञान के अनुष्ठान से प्राप्त होता है। परब्रह्म पुरुषोत्तम यथार्थ ज्ञान का यह सर्वोत्तम फल ज्ञान अभिमानी में रथ स्वेच्छाचारी मनुष्यों को जो दुर्गति रूप फल मिलता है, उससे सर्वथा भिन्न और विलक्षण है। इसी प्रकार सर्वोत्तम फल प्राप्त करने वाले कर्म का स्वरूप है कर्म में कर्तापन के अभिमान का अभाव, राग-द्वेष और फल कामना का अभाव, एवं अपने वर्णाश्रम तथा परिस्थिति के अनुरूप केवल भागवत सेवा के भाव से श्रद्धा पूर्वक शास्त्र कर्मों का यथा योग्य सेवन। इसके अनुष्ठान से समस्त दुर्गुण और दुराचार का अशेष रूप से नाश हो जाता है और हरवा का आदि समस्त विकारों से रहित होकर साधक मनुष्यमय संसार सागर से तर जाता है। इस प्रकार हमने उन परम ज्ञानी महापुरुषों से सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक पृथक रूप से व्याख्या करके भली-भांति समझाया था। जो मनुष्य उन दोनों को, अर्थात ज्ञान के तत्व को और कर्म के तत्व को भी साथ साथ जान लेता है, वह कर्मों के अनुष्ठान से मृत्यु को पार करके ज्ञान के अनुष्ठान से अमृत को भोक्ता है, अर्थात अविनाशी आनंदमय परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है।
व्याख्या: कर्म और कर्म का वास्तविक रहस्य समझने में बड़े-बड़े विद्वान पुरुष भी भूल कर बैठते हैं। इसी कारण कर्म रहस्य से अनभिज्ञ ज्ञान अभिमानी मनुष्य कर्म को ब्रह्म ज्ञान में बाधक समझ लेते हैं और अपने वर्णाश्रम उचित आवश्यक कर्तव्य कर्मों का त्याग कर देते हैं। परंतु इस प्रकार के त्याग से उन्हें त्याग का यथार्थ फल, कर्म बंधन से छुटकारा नहीं मिलता। इसी प्रकार ज्ञान-अकर्म अवस्था, यानी निष्कर्ष का तत्व न समझने के कारण मनुष्य अपने को ज्ञानी तथा संसार से ऊपर उठे हुए मान लेते हैं। अतः वे या तो अपने को पुण्य-पाप से अलिप्त मानकर मनमाने कर्म आचरण में प्रवृत्त हो जाते हैं, या कर्मों को भार रूप समझकर उन्हें छोड़ देते हैं और आलसी, निद्रा तथा प्रमाद में अपने दुर्लभ मानव जीवन के अमूल्य समय को नष्ट कर देते हैं। इन दोनों प्रकार के अनर्थों से बचने का एकमात्र उपाय कर्म और ज्ञान के रहस्य को साथ साथ समझकर उनका यथा योग्य अनुष्ठान करना ही है। जो मनुष्य इन दोनों के तत्व को एक ही साथ भली-भांति समझ लेता है, वह अपने वर्णाश्रम और परिस्थिति के अनुरूप शास्त्र कर्मों का स्वरूप त्याग नहीं करता, बल्कि उनमें कर्तापन के अभिमान से तथा राग-द्वेष और फल कामना से रहित होकर उनका यथा योग्य चरण करता है। इससे उसकी जीवन यात्रा भी सुख पूर्वक चलती है और इस भाव से कर्म अनुष्ठान करने के फलस्वरूप उसका अंतःकरण समस्त दुर्गुणों एवं विकारों से रहित होकर अत्यंत निर्मल हो जाता है और भागवत कृपा से वह मृत्यु मे संसार से सहज ही तार जाता है। जो मनुष्य विनाश शील देव, पितृ, मनुष्य आदि की उपासना करते हैं, वे अज्ञान रूप घोर अंधकार में प्रवेश करते हैं और जो अविनाशी परमेश्वर में रथ हैं, अर्थात उनकी उपासना के मिथ्याभिमान में मग्न हैं, वे उनसे भी मानो अधिकतर अंधकार में प्रवेश करते हैं।
व्याख्या: जो मनुष्य विनाशशील स्त्री, पुत्र, धन, मान, कीर्ति, अधिकार आदि इस लोक और परलोक की भोग सामग्रियों में आसक्त होकर उन्हें को सुख कहे तो समझते अर्जन सेवन में सदा संलग्न रहते हैं, एवं इन भोग सामग्रियों की प्राप्ति, संरक्षण तथा वृद्धि के लिए उन विभिन्न देवता, पिता और मनुष्य आदि की उपासना करते हैं, जो स्वयं जन्म-मरण के चक्र में पड़े हुए होने के कारण शरीर की दृष्टि से विनाशशील हैं, ऐसे वे भोग आसक्त मनुष्य अपनी उपासना के फल स्वरूप विभिन्न देवताओं के लोकों को और विभिन्न भोग योनियों को प्राप्त होते हैं। यही उनका अज्ञान रूप घोर अंधकार में प्रवेश करना है। दूसरी ओर, जो मनुष्य शास्त्र के तात्पर्य को तथा भगवान के दिव्य गुण, प्रभाव, तत्व और रहस्य को न समझने के कारण न तो भगवान का भजन-ध्यान ही करते हैं और न विवेक, श्रद्धा का अभाव तथा भोगों में आसक्ति होने के कारण लोक सेवा और शास्त्र विहित देवों का अर्चन में ही प्रवृत्त होते हैं, ऐसे वे विषय आसक्त मनुष्य झूठ-मूठ ही अपने को ईश्वर उपासक बतलाकर सरल हृदय जनता से अपनी पूजा करने लगते हैं। यह लोग मिथ्याभिमान के कारण देवताओं को तुच्छ समझते हैं और शास्त्र अनुसार अवश्य कर्तव्य देव पूजा तथा गुरुजनों का सम्मान-सत्कार करना भी छोड़ देते हैं। इतना ही नहीं, दूसरों को भी अपने वाग जाल में फंसा कर उनके मन में भी देव अर्चन आदि के प्रति अश्रद्धा उत्पन्न कर देते हैं। यह लोग अपने को ही ईश्वर के समकक्ष मानते, मानमती हुए मनमाने दुराचरण में प्रवृत्त हो जाते हैं। ऐसे दंभी मनुष्यों को अपने दुष्कर्म का कुफल भोगने के लिए बाध्य होकर कुकर, शूकर आदि नीचे योनियों में और नार्कों में जाकर भीष्म यंत्रणाएं भोगनी पड़ती हैं। यही उनका विनाशशील देवताओं की उपासना करने वालों की अपेक्षा भी अधिकतम घोर अंधकार में प्रवेश करना है। अविनाशी ब्रह्म की उपासना से दूसरा ही फल मिलते हैं और विनाशशील देव, पितृ, मनुष्य आदि की उपासना से दूसरा ही फल मिलते हैं। इस प्रकार हमने उन धीर पुरुषों के वचन सुने हैं, जिन्होंने हमें उस विषय को व्याख्या करके भली-भांति समझाया था।
व्याख्या: अविनाशी ब्रह्म की उपासना यथार्थ स्वरूप है परब्रह्म पुरुषोत्तम भगवान को सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वधर, सर्वमय, संपूर्ण संसार के कर्ता-धर्ता, नित्य अविनाशी समझना और भक्ति, श्रद्धा तथा प्रेम पारित हृदय से नित्य निरंतर उनके दिव्य मधुर नाम, रूप, लीला श्रवण, कीर्तन, स्मरण आदि करते रहना। इस प्रकार की सच्ची उपासना से उपासक को शीघ्र ही अविनाशी परब्रह्म पुरुषोत्तम की प्राप्ति हो जाती है। इसी प्रकार विनाशशील देव, पितृ, मनुष्य आदि की उपासना का यथार्थ स्वरूप है, शास्त्रों एवं श्री भगवान के आज्ञानुसार देवता, पिता, ब्राह्मण, माता-पिता, आचार्य और ज्ञानी महापुरुषों की सेवा-पूजा आदि आवश्यक कर्तव्य समझकर करना और उसको भगवान की आज्ञा का पालन एवं उनकी परम सेवा समझना। इस प्रकार निष्काम भाव से देव-पितृ, मनुष्य आदि की पूजा-सेवा करने वालों के अंतःकरण की शुद्धि होती है। इस प्रकार हमने उन धीर तत्व ज्ञानी महापुरुषों से सुना है, जिन्होंने हमें यह विषय पृथक पृथक रूप से व्याख्या करके भली-भांति समझाया था। जो मनुष्य उन दोनों को, अर्थात अविनाशी परमेश्वर को और विनाशशील देवड़ी को भी साथ साथ यथार्थ जान लेता है, वह विनाशशील देवड़ी की उपासना से मृत्यु को पार करके अविनाशी परमेश्वर की उपासना से अमृत को भोक्ता है, अर्थात अविनाशी आनंदमय परब्रह्म पुरुषोत्तम को प्रत्यक्ष प्राप्त कर लेता है।
व्याख्या: जो मनुष्य यह समझ लेता है कि परब्रह्म पुरुषोत्तम नित्य अविनाशी, सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान, सर्वदा सर्वधिपति, सर्वात्मा और सर्वश्रेष्ठ हैं, वे परमेश्वर नित्य निर्गुण, प्राकृतिक गुणों से सर्वथा रहित और नित्य सगुण स्वरूप भूत दिव्य कल्याण गुणगान विभूषित हैं, और इसी के साथ जो ये भी समझ लेता है कि देवता, पितृ, मनुष्य चलते रहने के लिए इनकी यथास्थान, यथा योग्य सेवा-पूजा सोने की शास्त्रों ने आज्ञा दी है और शास्त्र भगवान की ही वाणी है, वह मनुष्य अलौकिक तथा लौकिक देव, पितृ आदि लोकों के भोगों में आसक्त न होकर कामना, ममता आदि को हृदय से निकालकर इनकी यथा योग्य शास्त्र करता है। इससे उसकी जीवन यात्रा सुख पूर्वक चलती है और उसके आप ध्यान, तर्क विकारों का नाश होकर अंतःकरण शुद्ध हो जाता है एवं भागवत कृपा से वो सहज ही मृत्यु मे संसार सागर से तार जाता है।
[संगीत]
हे सबका भरण पोषण करने वाले परमेश्वर, सत्य स्वरूप, आप सर्वेश्वर का श्रीमुख ज्योतिर्मय सूर्य मंडल रूप पत्र से ढका हुआ सत्य धर्म का अनुष्ठान करने वाले मुझको अपने दर्शन करने के लिए, उसे आवरण को आप हटा लीजिए।
[संगीत]
व्याख्या: भक्त इस प्रकार प्रार्थना करें कि हे भगवान, आप अखिल ब्रह्मांड के पोषक हैं, आपसे ही सबको पुष्टि प्राप्त होती है। आपकी भक्ति ही सत्य धर्म है और मैं उसमें लगा हुआ हूं, अतः मेरी पुष्टि, मेरे मनोरथ की पूर्ति तो आप अवश्य ही करेंगे। मैं आपका निवारण प्रत्यक्ष दर्शन करना चाहता हूं, अतः आपके पास पहुंचकर आपका निरावरण दर्शन करने में बाधा देने वाले जितने भी जो भी आवरण प्रबंधक हों, उन सबको मेरे लिए आप हटा दीजिए। अपने सच्चिदानंद स्वरूप को प्रत्यक्ष प्रकट कीजिए। हे भक्तों का पोषण करने वाले, हे मुख्य ज्ञान स्वरूप, हे सबके नियंता, हे भक्तों या ज्ञानियों के परम लक्ष्य रूप, हे प्रजापति के प्रिय, इन रश्मियों को एकत्र कीजिए या हटा लीजिए। इस तेज को समेट लीजिए या अपने तेज में मिला लीजिए।
[संगीत]
जो आपका अतिशय कल्याण, दिव्य स्वरूप है, उसे आपके दिव्य स्वरूप को मैं आपकी कृपा से ध्यान के द्वारा देख रहा हूं। जो वह सूर्य का आत्मा है, वह परम पुरुष आपका ही स्वरूप है। मैं भी वही हूं। अब ये प्राण और इंद्रिय अविनाशी समष्टि वायु तत्व में प्रवेश हो जाएं। यह स्थूल शरीर अग्नि में जलकर भस्म रूप हो जाए। हे सच्चिदानंद घन, यज्ञमय भगवान, आप मुझमें भक्त को स्मरण करें, मेरे द्वारा किए हुए कर्मों का स्मरण करें, मेरे कर्मों को स्मरण करें।
व्याख्या: परमधाम का यात्री वह साधक अपने प्राण, इंद्रिय और शरीर को अपने से सर्वथा भिन्न समझकर उन सबको उनके अपने अपने उपादान तत्व में सदा के लिए विलीन करना एवं सूक्ष्म और स्थूल शरीर का सर्वथा विघटन करना चाहता है। इसलिए कहता है कि प्राणादि समष्टि वायु आदि में प्रविष्ट हो जाएं और स्थूल शरीर जलकर भस्म हो जाए। फिर वह अपने आराध्य देव परब्रह्म पुरुषोत्तम श्री भगवान से प्रार्थना करता है कि हे यज्ञ में विष्णु, सच्चिदानंद विज्ञान स्वरूप परमेश्वर, आप अपने निजजन मुझको और मेरे कर्मों को स्मरण कीजिए। आप स्वभाव से ही मेरा और मेरे द्वारा बने हुए भक्ति रूप कार्यों का स्मरण करेंगे, क्योंकि आपने कहा है, 'मैं अपने भक्त का स्मरण करता हूं और उसे परम गति में पहुंचा देता हूं, अपनी सेवा में कार्य कर लेता हूं, क्योंकि यही सर्वश्रेष्ठ गति है।' इसी अभिप्राय से भक्त यहां दूसरी बार पुनः कहता है कि हे भगवान, आप मेरा और मेरे कर्मों का स्मरण कीजिए। अंतकाल में मैं आपकी स्मृति में आ गया तो फिर निश्चय ही आपकी सेवा में शीघ्र पहुंच जाऊंगा। हे अग्नि के अधिष्ठाता देवता, हमें परम धन रूप परमेश्वर की सेवा में पहुंचने के लिए सुंदर शुभ उत्तरायण मार्ग से आप ले चलिए। हे देव, आप हमारे संपूर्ण कर्मों को जानने वाले हैं, अतः हमारे इस मार्ग के प्रबंधक जो पाप हों, उन सब को आप दूर कर दीजिए। आपको बार-बार नमस्कार के वचन हम कहते हैं, बार-बार नमस्कार करते हैं।