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VCD 721

ADHYATMIK VIDYALAYA OR AIVV59:55

Transcription

[संगीत] 1167 का प्रा क्लास है। रिकॉर्ड चला है। हमारे तीरथ रे बच्चों ने गीत सुना और बुद्धि का योग बाप की तरफ [संगीत] गया। बच्चों को अपने तीर्थों का पता पड़ा है। किनारे लगाने वाले स्थान कौन-कौन से हैं? किनारे लगाना माना ठिकाना लगाना है। तो भक्ति मार्ग के भी तीर्थ और यह ज्ञान मार्ग के भी तीर्थ। परंतु तुम्हारा तीर्थ तो बहुत सहज है और तुम एक ही बार यह तीर्थ करते हो। वो तीर्थ तो जन्म जन्मांतर करते चले [प्रशंसा] आए। यहां तुम बुद्धि का योग लगाते हो और यह भी समझते हो कि कौन समझाते हैं। यह है भाग्यशाली रथ। इसमें बेहद का बाप आए बच्चों को पढ़ाते। यह हद का बाप नहीं है। 500, 700 करोड़ जो भी मनुष्य आत्मा है, सब का बाप है, जो आकर के यात्रा सिखलाते हैं। और यह रूहानी यात्रा और कोई भी सिखला नहीं सकता। क्योंकि एक बाप ही रूह है, जो सदरू वानी स्टेज में रहने वाला है। बाकी जो भी आत्माएं हैं, सब दे अभिमान में आने वाली हैं। इसलिए यह रूहानी यात्रा कोई भी नहीं सिखला सकता। [संगीत] और सब आत्माओं को देह अभिमानी से आत्मा अभिमानी बनना पड़ता है। और इनको आत्मा अभिमानी बनना पड़ता नहीं है। यह तो सदैव सदा सेव आत्मिक स्थिति में रहने वाला। यही समझाना पड़ता है। मूल बात यह समझाने की है। [संगीत] कि आत्मा पहले पहले गोल्डन एज में थी, अभी आयरन एज में है। सबसे जस्ती जरूरी बात यह है समझाने की। हर आत्मा पहले सात्विक होती है। बाद में सृष्टि चक्र में से गुजरते गुजरते अंत में तामसी बनती है। आयर एज में आती है। अभी फिर आत्मा को पतित से पावन बनना है। अभी कलयुग है, फिर सतयुग जरूर होगा। परंतु सतयुग में जाने के लिए तो महात्माओं को सच्चा सोना बनना पड़े। पवित्र जरूर बनना पड़े। पवित्र नहीं बनेंगे तो वापस भी नहीं जा सके। आत्मा सब [संगीत] अविनाशी। भल पतित तो बनती है, परंतु है अविनाशी। योर बनने के लिए या तो योग बल और दूसरा रास्ता क्या है? आत्मा योग बल से पवित्र बनती है, अथवा सजाओं से पवित्र बनती है। योग बल से पवित्र बनने वाले ऊंच पद पाते हैं। और सजाएं खा खा कर पवित्र बनते हैं, तो उनका पद बहुत नीचा हो जाता है। योग को तुम ही समझते हो, तो जहां तहां योग का ूरा पीटना [प्रशंसा]। बाकी तो कोई काम की चीज नहीं है। जब तक मनुष्य अपन को आत्मा ना समझे, तब तक उल्टा से उल्टा हो ना सके। मनुष्य कैसे उल्टे हुए पड़े हैं? उल्लू का मिसाल दिया जाता है। म उल्टे उल्लू मिसल लटके पड़े। उल्लू अर्थात जिनकी बुद्धि इस दुनिया की तरफ लगी हुई। बाप आकर के उल्टा बनाते हैं। अर्थात इस पांच तत्वों की दुनिया से, देह और देह के संबंधों की दुनिया से ऊपर उठाए ले जाते हैं। आत्मिक लोक में ले जाते हैं। तो अभी उल्टा बनना है। पवित्र बने बगर कोई वापस जा ही नहीं सके। भूल बात है उल्टे से उल्टा बनने की। कहां भी जाते हो, ये पक्का कर लो। विलायत में जाते हैं, तो बुद्धि का योग इधर उधर बहुत फैलता [संगीत] है। कौन कौन गए विलायत में? कोई नहीं गया ना? तो वहां बुद्धि का योग इधर उधर फैलता है क्या? भारत के मुकाबले ऐसे तो कहते भारत ज्यादा तामसी है। भारत बहुत तमो प्रधान बनता है। विदेश में इतनी तमो प्रधानता नहीं होती है। और और धर्म न जास्ती तमो प्रधान बनते हैं, न जास्ती सतो प्रधान बनते हैं। तो और धर्म खंडों में जाकर के आत्मा का बुद्धि योग इतना क्यों फैलता है? क्योंकि और धर्म वाले और धर्म खंड थोड़े टाइम में ही सतो प्रधान से तमो प्रधान बन जाते हैं। और भारतखंड 5000 साल लगते हैं सतो प्रधान से तमो प्रधान बनने में। तो और खंडों में बुद्धि का योग ज्यादा फैलना हुआ या भारत का जो खंड है, वो जास्ती बुद्धि योग को भमाने वाला है? बुद्धि तो भ्रम है, लेकिन तीव्र गति विदेशों की जास्ती है। भारत की उतनी तीव्र गति नहीं है। जो अवस्था भारत में रहती है, वो अवस्था बाहर विदेशों में जाकर नहीं रहती। इसका एक और कारण है। भारत में भगवान आए हैं और विदेशों में भगवान नहीं आते हैं। तो हम भगवान से और दूर चले जा, तो अवस्था नीचे आवेगी या ऊंची जावेगी? नीचे आवेगी। संघ का रंग तो लगता ही है। कोटों में कोई विरले हैं, जो विदेश में जाकर भी अपन को आत्मा समझ बाप को याद करते। दुनिया में कितने ढेर मनुष्य, कोई भी अपन को आत्मा नहीं समझते। देह अभिमानी में आए, उल्टे लटक पड़े। तो उल्टा बनाने वाला भी चाहिए। मल्ल युद्ध करते हैं, तो सुलट सुलाते हैं। तुमको भी अभी बाप सीधा रास्ता [संगीत] बताते। पहले पहले तो ये पक्का करो, हम आत्मा है, हम देह नहीं है। उल्टे से सीधा जरूर होना है। अपन को आत्मा समझने बगैर बाप को याद करने का आकल ही नहीं होगा। बाव कहना भी बहुत सहज है। [संगीत] परंतु कहने की बात अलग और उसका अर्थ भी समझे ना। बाप कहते हैं अपन को आत्मा समझ माम कम याद करो। और सब की बुद्धि देह के संबंधों में लटकी हुई है। बाप कहते हैं, यह देह के सब बंधन इनको तोड़ना है। अभी तोड़ने का समय है या जोड़ने का समय है? देह के संबंधों को तोड़ने का समय है। बुद्धि योग से तोड़ना है। तोड़ने के समय अगर कोई नए नए संबंध जोड़ता जाए, तो पुरुषार्थ तीव्र होगा या धीमा हो जाएगा? और ही धीमा हो जाएगा। इन आंखों से जो कुछ देखते हो, उन सब से वैराग आना चाहिए। बाप तुमको ज्ञान का तीसरा नेत्र देते हैं, जो इन आंखों से नहीं दिखाई देता, वो तीसरे नेत्र से देखने में आता है। इन विनाशी आंखों से अविनाशी आत्मा नहीं देखी जा सकती। इसके लिए तीसरा नेत्र बाप आ कर के देते। ये याद आना चाहिए। मंजिल बड़ी भारी है। ऐसे नहीं कि हम शिव बाबा के बन गए, तो नर से नारायण बने ही जावेंगे। नहीं, ऐसा सस्ता चना खाने का नहीं है। इसमें बहुत मेहनत है। एकांत में विचार सागर मंथन करना चाहिए। मैं आत्मा हूं और मुझ आत्मा को जाना है। अब अपने [संगीत] घर। इस दुनिया में जो कुछ भी है, बल विलायत भी है, जानते तो है। ऐसे तो कोई नहीं कहेगा विलायत नहीं है। तो बाप कहते हैं, में जो कुछ आता है, उन सबको छोड़ ना और हमको अब अपने घर वापस जाना है। हम आत्मा सब मूल वतन में थे। सतयुग में हम बहुत थोड़े आए। बाकी सब सूट में रह जाते हैं। वहां सतयुग में बहुत सुख भी था, शांति भी थी। अभी यहां कलयुग में तो देखो, घर घर में अशांति है। अशांति अशांति। इसलिए बाप कहते हैं, यहां तुम जो कुछ देखते हो, इनका त्याग करो। अपन को आत्मा स्वीट होम को याद करो। नई दुनिया में यह तुम्हारे शरीर भी नहीं होंगे। यह शरीर भी तामसी पांच तत्वों के बने हुए हैं। क्योंकि आत्मा ही तामसी बन गई है। है तो आत्मा विनाशी। वहां नई दुनिया में से चोला बदल लेंगे। ये समझ की बात है। मनुष्य तो बिल्कुल बे समझ बन पड़े। अभी तुम एक बार समझदार बनते हो, 21 जन्म के लिए। फिर आधा कल्प के बाद तुम उल्टे से उल्टे लटक पड़े। कितना वंडरफुल खेल है। और वो भी अविनाशी खेल है। इन बातों को कोई समझ नहीं सकते। बल इन बातों को तुम अखबार में डालो, आवाज तो जरूर निकलेगा। परंतु जब आवाज निकलेगा, तब तक टू लेट हो जाएंगे। विवेक कहता है, आवास सब जगह जाना चाहिए। जिके लिए बाबा समझाते हैं। परंतु कोई करे ना। चित्र भी है। चित्र में कितना क्लियर है। त्रिमूर्ति शिव बाबा हमको पढ़ा रहे हैं। फिर हम विषरी के मालिक बन जांग। ब्रह्मा और विष्णु का भी कितना राज समझाया। सभी बच्चों की बुद्धि में यह राज बैठा हुआ है। बच्चों से भी पूछा जाता है, तो सब कहते हैं, हम लक्ष्मी नारायण बनेंगे। इससे कम हम कोई बोल भी नहीं सकते। क्योंकि यह कथा है ही नर से नारायण बनने की। तो फिर ऐसे कैसे कहेंगे कि हम राम सीता बनेंगे? एम ऑब्जेक्ट तुम्हारी नरसिंह नारायण बनने की। 16 कला संपूर्ण कम कला का बनने की बात ही नहीं। 18 6 की वाणी का दूसरा प तो सदैव शुभ बोलना चाहिए। नेगेटिव कभी नहीं बोलना चाए। हम राम सीता कहे क्यों? तो कम कला वाले थे। हम आत्मा तो संपूर्ण 16 कला संपूर्ण बनने वाली है। नामी ग्र में भी सत्यनारायण की कथा है। घर घर में सुनाई जाती है। परंतु व तो झूठी क सुनाते। अभी बाप आकर के नामी ग्रामी सत्यनारायण की कथा सुना रहे हैं। बाकी बच्चे यह तो समझते हैं। सूर्यवंशी चंद्रवंशी राजधानी स्थापन हो रही है। सी राजधानी स्थापन हो रही है। सिर्फ सूर्यवंशी या सिर्फ चंद्रवंशी। चंद्रवंशी राजधानी भी स्थापन हो रही है। और सूर्यवंशी राजधानी भी स्थापन हो रही है। इसमें ऊंच पद पाने की मेहनत करनी चाहिए। चंद्रवंशी राजधानी का उच पद क्या [संगीत] होगा? चंद्रवंशी राजधानी का उच्च पद होगा राधा। और सूर्यवंशी राजधानी का उच्च पद होगा कृष्ण। जोही स्वयंवर के बाद फिर लक्ष्मी नारायण कहे जाते। जो मेहनत नहीं करते हैं, वह खुद भी समझते हैं, हमसे इतनी मेहनत पहुंचती नहीं है। क्योंकि हम चार्ट ही नहीं रख सकते। क्या लिखेंगे? पांच 10 मिनट से क्या पद मिलेगा? फिर भी शुक्र है, जो यहां बैठे तो हैं। कईयों को तो अंदर में आता है, इससे तो हम चली जावे। ग्रस्त व्यवहार में जो रहते हैं, वहां का खानपान वायुमंडल वाइब्रेशन कितना खराब हो जाता है। वहां से यहां आने में बड़ा मजा आता है। परंतु कोई कोई को फिर उस तरफ की कशिश जास्ती हो जाती। बाप भी कहते हैं, गर में तो रहना है। यहां फिर कितनों को बैठेंगे? तुम्हारा तो है ही बेहद का [संगीत] सन्यास। बुद्धि योग का सन्यास है। बुद्धि से पुरानी दुनिया को भूल जाना [प्रशंसा] है। अपन को आत्मा समझ उल्टे हो जाओ और बाप को भी अभी याद करना है। वहा सतयुग में तो याद करने की बात नहीं रहती। तुम सतो प्रधान बन जावेंगे। फिर ड्रामा प्लान अनुसार थोड़ा थोड़ा करके नीचे उतरना होता है। सतो प्रधान से फर सतो रजो तम में तो सबको आना ही है। तो यह चक्र का राज समझना चाहिए। अभी शूटिंग होती जाती है। रिहर्सल का राज भी बुद्धि में आना चाहिए। रिहर्सल भी वैसी होगी, जैसा ड्रामा होना होगा। ल में भी नीचे उतरते हैं और ड्रामा में भी 5000 वर्ष के ड्रामा में भी नीचे उतरते। तुम्हारी बुद्धि में एक एक सेकंड का सारा चक्र फिरता रहता है। बाबा की बुद्धि में सारा चक्र एक सेकंड में फिर जाता है। वास्तव में सुदर्शन चक्रधारी तो बाबा की आत्मा को कहना चाहिए। जो तुम आत्माओं को सुदर्शन चक्रधारी बनाते हैं। इस समय तुम ब्राह्मण हो। तुम ही सुदर्शन चक्रधारी बनते हो। देवता भी सुद सन चक्रधारी नहीं बनते। देवताओं को तो कहेंगे बुद्धु। और तुमको कहेंगे बुद्धिमान। बाप के बुद्धिमान बच्चे। तुम ब्राह्मण ही बनते हो बुद्धिमान। परंतु यह लंकार जो विष्णु को दिए हुए हैं, वो तुम धारण नहीं कर सकते। तुमको यह सो भेंगे नहीं। क्योंकि तुम्हारी अवस्था ऊपर नीचे होती रहती। यह विष्णु को शोभती, क्योंकि वो है संपूर्ण स्टेज। तुमको सोबती नहीं है। क्योंकि तुम एक रस अवस्था में तो रहते नहीं हो। स्थाई रहे तो यह अलंकार भी देवे। तुम तो घड़ी घड़ी नीचे ऊपर होते रहते हो। बाप कहते हैं, बच्चे लाइट हाउस बन जाओ। लाइट हाउस होता है, सब आने जाने वाले जहाजों को रास्ता बताता है। तुम भी लाइट हाउस बन जाओ। सबको रास्ता बताते रहो। सबको शांति धाम जाना है। तुम्हारी बुद्धि में तो पक्का बैठ गया है। हमें शांति धाम फिर सुख धाम जाना है। सुखदाम में पवित्रता, शांति, संपन्नता सब कुछ होती है। तुम जानते हो, 5000 वर्ष पहले हम आत्मा शांति धाम में थी। अभी हम शांति धाम में नहीं है। अभी सब शांति धाम में है। अभी फिर बाबा आया हुआ हमको ले जाने के लिए आया हुआ है। वह है ही सदा काल का शांति धाम वासी। वहां तो अशांति की बात ही नहीं रहती। शांति धाम में अशांति की बात क्यों नहीं रहती? में वो आत्मा जो है, वो अशांति में क्यों नहीं आती? कभी शरीर नहीं है। शरीर नहीं। शांति धाम में शरीर नहीं है। अर्थात पांच तत्व ही नहीं है। पांच तत्व अर्थात प्रकृति। प्रकृति जड़ और आत्मा चैतन्य होती है। परंतु चैतन्य आत्मा भी जब शरीर में आवे, तो नीचे उतरती। जब तक आत्मा शरीर में ना आवे, तब तक आत्मा नीचे उतर नहीं सकती। शरीर के द्वारा ही संग का रंग लगता है। वहा शांति धाम में शरीर अर्थात पाच स तो होते ही नहीं। संग का संग लगने का सवाल ही। हम सुख धाम में जावेंगे। बाया शांति धाम तो शांति धाम को भी याद करना पड़े। बच्चे जानते हैं, बाबा को र्गस मिले हैं। डिफेक्टेड र्गन मिले हैं या परफेक्ट र्गन मिले? परफेक्ट र्गन मिले। प शरीर में आता हा। मैं पति तन में आता हूं। दुनिया ही पतित है, तो आर्गन भी कैसे होंगे? पतित आर्गन डिफेक्टेड है। बल कोई तमो प्रधान कहते नहीं है उसको। बाप को तो मनुष्य सृष्टि का बाप है ना, तो बच्चे तमो प्रधान कैसे कहेंगे? यह तो इशारे से समझा जाता है। बाप समझाते हैं, मैं बहुत जन्मों के अंत में इनमें प्रवेश करता हूं। अंत में भी नहीं कहेंगे क्या? कहेंगे बहुत जन्मों के अंत के भी अंत में प्रवेश करता हूं। क्या मतलब? अ के अ। बहुत जन्मों के अंत के भी अंत में प्रवेश करता। अंत कब क? कब कहे भी सन कौन सा? 36 में तो अंत हुआ। लेकिन अंत हुआ और वहां प्रत्यक्ष नहीं हुआ। बाप प्रत्यक्ष नहीं हुआ। गुप्त का गुप्त ही रहा। ओ बाप। बच्चे तो बाद में पहचानते हैं। पहले कौन पहचानता है? मां पहचानती है। तो सं 36 में बाप आया, तो जो मां का पार्ट है, सहन शक्ति वाला, उस सहन शक्ति के पार्ट धारी ने क्या बाप को पहचाना? उसने भी उसने भी नहीं पहचाना। तो आया ना आया बराबर हो गया। इसलिए कहते हैं, मैं बहुत जन्मों के अंत के भी अंत में प्रवेश करता हूं। आया तो प्रजापिता में ही आया। परंतु प्रजापिता ब्रह्मा का भी अंत का चोला होना चाहिए। प्रवेश करता हूं, तो एवरेज जज कितनी होती है? 60 साल। वो अंत कहेंगे। परंतु अंत का भी अंत नहीं कहेंगे। वो कब है? अंत का भी अंत है। 7 स 100 साल ब्रह्मा की आयु गाई हुई है। जो भी धर्म पिता आते हैं, वो 100 साल के अंदर ही पूरा करते हैं। ये बाप भी बहुत जन्मों के अंत के भी अंत में आते हैं। जबक इनकी वाण प्रस्त अवस्था होती है, तब आते हैं। फिर दूसरी वान प्रस्त अवस्था तो आवेगी नहीं। ये सिद्ध करके बताते हैं। मनुष्य तो मुझ से हैं। इने ब्रह्मा को क्यों रखा है? अरे भल ब्रह्मा को रखा है, परंतु हम ब्रह्मा को भगवान तो नहीं कहते। दुनिया में भी ब्रह्मा को भगवान समझ कर के मंदिर बनाकर मूर्ति बनाकर पूजा की जाती है। क्या दुनिया में भी भगवान ब्रह्मा को नहीं कहा जाता? उनकी पूजा भी नहीं होती? मंदिर भी नहीं बनते? तो तुम समझा सकते हो, ब्रह्मा को भगवान नहीं कहा जाता। ब्रह्मा भी सो विष्णु देवता कैसे बनते हैं? वोह समझाया जा रहा है। ब्राह्मण ही मनुष्य देवता बनते हैं। नर से नारायण बनते हैं। तो जरूर पतित है। फिर पावन देवता बनते हैं। पुरुषार्थ से। भगवान वाच है, मैं बहुत जन्मों के अंत में साधारण भू तन में प्रवेश करता हूं। साधारण क्यों कहा? बहुत जन्मों के अंत में। और सिर्फ बूढ़े तन में नहीं बताया? क्या बोला? साधार। साधारण बूढ़े तन में। ना बहुत बूढ़ा और ना कम उम्र का। तो जिसमें प्रवेश करता हूं, उनका भी नाम होगा ना? दो हो जाते हैं। कौन कौन दो हो जाते हैं? एक राम नहीं। वो दो नहीं हो जाते हैं। एक प्रवेश करने वाला और दूसरा जिस में पाप के रूप में प्रवेश होता है। दो हो जाते हैं। तुम लिखते भी हो, शिव बाबा केयर ऑफ ब्रह्मा। बाप कहते हैं, मैं इनमें प्रवेश करके फिर इनका नाम बदलता हूं। पहले प्रवेश करता हूं। ऐसे नहीं साक्षात्कार हो जाए सन में और तुरंत ही ब्रह्मा नाम पड़ जाए। नहीं, पहले प्रवेश करता हूं। प्रवेश करने के बाद जब वाणी चलती है, तब समझ में आता है। यह ब्रह्मा का पाट। फिर इनका नाम बदल देता हूं। माना सन 47 से पहले कोई को पता नहीं था क्या? कि दादा लेखराज का नाम ब्रह्म। जब मुरली चलाना शुरू किया, तो यह नाम प्रत्यक्ष हुआ। ब्रह्म माउंट आबू में आए, तो ब्रह्मा कुमारी ईश्वरी विश्वविद्यालय उनके नाम पर खोला गया। परंतु यह तो एक ही हुआ। इन में प्रवेश करता हूं, माना दो होने चाहिए। ब्रह्मा कुमारी विद्यालय यह रंग हो जाता है। कोई अपन को ब्रह्मा कुमार कुमारी लिखे, यह रंग हो जाता है। तो क्या होना चाहिए? प्रजापिता भी चाहिए। तो इनका नाम बदलता हूं। चाहे दादा लेखराज हो और चाहे प्रजापिता हो, वो नाम बदला हुआ है। ब्रह्मा भी नाम बदला हुआ है और प्रजापिता नाम भी। प्रजापिता ब्रह्मा नाम भी बदला हुआ है। बहुतों के नाम बदले। क्योंकि यह वेद का सन्यास होता है। सन्यासी बनते हैं, उनका भी नाम बदलते हैं। यहां तो फिर बेद का सन्यास है। ब्राह्मणों के बाप का नाम भी जरूर ब्रह्मा ही होगा। और तो कोई हो नहीं सकता। ब्राह्मण शब्द बनता ही तब है, जब ब्रह्मा की औलाद बने। जैसे शिव की औलाद सैव, विष्णु की औलाद वैष्णव, जिन की औलाद जैन कहे जाते हैं। तो ब्राह्मण नाम भी तभी पड़ता है, जब ब्रह्मा की औलाद बने। यह खेल कितना अट पटिया है। कल्प कल्प यह चक्र रिपीट होता है। आधा कल्प तुम्हारी जीत और आधा कल्प तुम हराते हो। हार और जीत का खेल बराबर बराबर है। हरा देंगे भी बराबर। माया भी कोई कम नहीं है। ढर हराते हैं सीढ़ को, तो तुम समझ गए हो, कैसे हम नीचे उतरते हैं। 84 जन्म लेते हैं। टाइम पास हो जाता है। टिकटिक होती जाती है। इस टिकटिक से ही ड्रामा फिरता है। यह तो नहीं बता देंगे कि इतने सेकंड में हमारी 84 जन्म पूरी हुई। कितने सेकंड पास हुए होंगे? डेट बदलते गए, मास संवत बदलता गया। कितने वर्ष, कितने विक्रम संवत, कितने दिन, कितने घंटे पास किए, वो भी हिसाब है। बाबा तो टोटल कह देते हैं, अभी तुम्हारी पिछाड़ी है। सब की बान प्रस्त अवस्था है। तुमने 84 जन्म लिए। यह टिक टिक चलते चलते पा वर्ष आ कर के पूरे हुए। अभी बाप ने आकर कितनी अच्छी युक्ति बताई है। याद की यात्रा से तुम तमो प्रधान से सतो प्रधान बन जागे। इसके लिए पूरा पुरुषार्थ करना है। इस बात [प्रशंसा] का बात का पूरा पुरुषार्थ करना है। बाप को याद करने का पूरा पुरुषार्थ करना है। माया घड़ी घड़ी बुलावे गी। करेंगे तो फिर भी ड्रामा प्लान अनुसार। ऐसे कोई नहीं समझे कि पाच घंटा के बदले तीन घंटा में हम पुरुषार्थ पूरा कर लेंगे। पु साथ की गति ड्रामा अनुसार ही पास होगी। ऐसे नहीं कि पा घंटे की गाड़ी तीन घंटे में चलाई लेंगे। ड्रामा प्लेन अनुसार सबकी गाड़ी चलती रहती। 18 सरस्वती वाणी का तीसरा सब बातें अच्छी रीति समझने की है। बाप सुनाते ही धारणा करने के लिए। स्कूल में पढ़ते पढ़ते जब बड़ी परीक्षा पास कर लेते हैं, तो फर पहली बातें भूलती जाती है। नई नई बातें बुद्धि में बैठती जाती है। पास्ट हो गया ना, जो पास हुआ सु खत्म। अभी तुम समझते हो, जो पास हुआ, फिर पा चार वर्ष के बाद रिपीट होगा। ड्रामा की समझ तुम बच्चों को अभी मिली। इस ड्रामा के अंदर हम 84 जन्म लेते हैं। हमारे सिवाय और कोई का पार्ट नहीं है। 84 जन्म लेने और कोई माने कौन? और और धर्म में जो कन्वर्ट होने वाले हैं, उनका पार्ट 84 जन्म लेने का नहीं है। और दूसरे किस्म के मनुष्य, कोई भी इन बातों को नहीं जानते। और यह बातें तुम यहां ही आकर के सुनते हो, समझते हो। और तो कहीं से समझ नहीं सकते। 84 जन्म अनुसार भक्ति करते आए क्या? ज्यादा भक्ति कौन से ज कितने जन्म लेने वालों ने की होगी? जिन्होने 84 जन्म लिए होंगे, उन्होंने सबसे जास्ती भक्ति की। जिन्होंने कम जन्म लिए होंगे, उन्होंने भक्ति भी कम की होगी। 84 जन्म लेने वालों ने सतो प्रधान भक्ति भी की होगी। कम जन्म लेने वालों ने सतो प्रधान भक्ति नहीं की होगी। जिन्होंने सतो प्रधान भक्ति नहीं की होगी, व सतो प्रधान ज्ञान भी नहीं उठा। वो आदि नहीं होंगे। एक से सुनने के अनेकों से सुनने लग पड़ेंगे। उन्हें मजा ही नहीं आवेगा, जब तक अनेकों से डिस्कस ना करे। ज्ञान भी फिर उसी अनुसार लेंगे। इस अनुसार, जिस अनुसार भक्ति की होगी, उसी अनुसार ज्ञान भी उठा। आगे पीछे तो नहीं उठा। जिन्होंने शिव बाबा की भक्ति शुरू की है, अ विचारी वही आकर के पहले ज्ञान लेंगे। यह भी हिसाब है। जिन्होंने द्वापर के याद में शिव बाबा की विचारी भक्ति नहीं की है, बाद में आए हैं, व अचारी ज्ञान कैसे उठावे? हिसाब बहुत महीन है। परंतु फिर डिटेल में भी जास्ती नहीं जाना। बाप कहते हैं, अभी टाइम वेस्ट मत करो। जास्ती इन बातों में ख्याल भी ना करो। मूल बात है तमो प्रधान से सतो प्रधान बनना। मैं हुआ हूं। सतो प्रधान बनाने के लिए तो तुम्हारी रेस है। याद की यात्रा की चच जीवन बनाना है। याद की यात्रा से ही चच जीवन बनेगा। गर गस्त में रहते पवित्र बनना, यह कितनी डिफिकल्ट बात है। कहते हैं, हमारा कुटुंब बहुत बड़ा है। बड़े कुटुंब में खानपान की बहुत खिट पिट रहती है। बाबा कहते हैं, यह तो सब होगा ही। सब कलयुगी लोक लाज कुल की मर्यादा है। व कलयुगी लोकला कुल की मर्यादा छोड़नी पड़े, तोड़नी पड़े। अभी तो सबको पवित्र बनने के लिए कहा जाता है। मीरा भक्तिन थी, परंतु उनको कहा थोड़ी गया कि तुम पवित्र बनो, तो पवित्र दुनिया की तो मालिक बनेगी। व पवित्र रहना अच्छा समझती थी। उनको तो कृष्ण का साक्षात्कार होता था। व मीरा भी भक्ति माल में गाई हुई है। ज्ञान माल भी आधा कल्प का है। तुम्हारी है ज्ञान की माला। एक ही स्कूल है, एक ही जगह तुम पढ़ते हो। कितने बेंचे निकलते जाते। नाम ही रख देते हैं, सच्ची गीता पाठशाला। जब सच्ची गीता पाठशाला नाम रखा है, तो झूठी गीता पाठशाला कौन सी है? झूठी गीता भी होगी, तो झूठी गीता पाठशाला भी होगी। सच्ची गीता किसे कहा है? सच्ची गीता कब कही जाती है? बा झूठी गीता कब कही जाती है? कष्ण का नाम डालने से झूठी गीता। जिनके दिल पर कृष्ण की छाप है, कृष्ण उर्फ दादा लेखरा गीता का भगवान है। जिनके दिल पर यह छाप पड़ी हुई है, कृष्ण उर्फ दादा लेखराज ही गीता का साकार में भगवान है। उनकी है झूठी गीता पाठशाला। झूठी गीता पाठशाला और झूठी गीता। और तुम्हारी है सच्ची गीता पाठशाला। सच्ची गीता पाठशाला में जो पढ़ने वाले हैं, उनके दिल पर छाप किसकी होगी? निराकार परमपिता परमात्मा शिव शंकर भोलेनाथ की छाप होगी। और कोई भी देदारी की छाप हो नहीं सकती। जो भी शूद्रों की पाठशाला है, वो सब झूठी है। तुम ब्राह्मणों की है सच्ची सच्ची पाठशाला। कहा शूद्र पैरों में और कहां तुम ब्राह्मण चोटी। दुनिया सब है शूद्रों की पाठशाला। साधु संत सब शूद्र हैं। बाबा ने समझाया है, सन्यासी हठ योगियों को गीता भी पढ़ने का हक नहीं है। गीता में तो सहज राज योग सखा। सहज राज योग सहज बनाने वाला कौन है? मुश्किल को सहज करने वाला कौन गाया हुआ है? एक ही परमपिता परमात्मा है, जो सब मुश्किला तों को आकर के पांडवों के लिए सहज कर देता है। उन सन्यासियों की हथियों गीता पाठशाला होनी चाहिए। उनका हठयोग है, व सहज राजयोग सिखा नहीं सकते। घर ग्रस्त में रहते तुमको पवित्र बना नहीं सकते। क्यों क्यों? वो तो खुद ही ग्रस्त को छोड़ कर के भागते हैं। नारी को सर्पण बनाए देते हैं। बाप कहते हैं, नारी तो स्वर्ग का द्वार खोलने वाली। जो छोड़ कर के भागते हैं, जो खुद ही छोड़ कर के भागते हैं, वह स्वर्ग का द्वार कैसे खले खुलवाए? यह राजयोग और कोई भी सिखला नहीं सकते। वह ब्रह्म को तत्व को मानने वाले, तत्व ज्ञानी, वो इन बातों को मानेंगे ही नहीं। किनको मानते हैं? ब्रह्म को भगवान मानते हैं। ब्रह्म कहो, ब्रह्मा कहो, वह तो जंगल में रहते हैं। व कोई घर ग्रस्त में नहीं रहते हैं। आजकल तो तमो प्रधान बने हैं। व उनमें ताकत ही नहीं है, जो उन्हो को जंगल आदि में कोई खाना आदि पहुंचा वे। नीचे उतरने से उनकी ताकत ही खत्म हो गई। सपन से तमो प्रधान बन पड़े हैं। जो पहले पहले आते हैं, उनमें ही ताकत रहती। पहले पहले आने वाले हैं देवी देवता। इसलिए नाम होता है। तमो प्रधान का नामा आचार नहीं होता है। सतो प्रधानता का नामा आचार होता है। ऊपर से कोई नई आत्मा आती है, तो भी उनका नामा आचार हो जाता है। सतो प्रधान होती है ना? अभी सबसे जास्ती मान है शंकराचार्य का। साब आ कर के उनको माथा टेकते। जरूर वह बाद में आने वाली आत्मा होगी या वाली आत्मा? ई जो भी शंकराचार्य है, जिनकी भी इतनी पूजा होती है, इतनी दुनिया में मान्यता होती है, इतना मान मर्तबा होता है, या पोप है, तो कम जन्म लेने वाली आत्मा है या 84 जन्म लेने वाली आत्मा है? जरूर ऊपर से आने वाली सतो प्रधान आत्मा है, जो शरीर में आकर के इतना मान मत ब ले भगती है। जरूर कोई शुद्ध आत्मा ने उनमें प्रवेश किया है। गुरु आनक नानक ने। गुरु नानक में भी शुद्ध आत्मा ने प्रवेश किया, तो कितना उनका मान हो गया। वो लोग सिर्फ नानक नहीं कहेंगे। वास्तव में गुरु तो है नहीं। नानक नहीं कहते क्या? कहते हैं गुरु नक। गुरु नानक। गुरु होते, तो सब सिख समुदाय की सर गति करके जाते। किसकी सद्गति तो कर नहीं सके। कहते भी है सदगुरु अकाल मूर्त। क्या सदगुरु कौन है? जिसको कोई काल खा नहीं सकता। गुरु नानक को तो काल खा गया। जो भी धर्म पिता हुए, सबको काल खा गया। शिवो हम कहने वाले, जो शंकराचार्य है, जो भी हुए, उन सबको काल खा गया। अपने मुख से उनकी महिमा भी करते हैं। सदगुरु की। फिर अपनी पूजा बैठ कर आते। अरे अकाल मूर्त तो वह है, जिसकी महिमा गाते हैं। एक ओंकार सदगुरु अकाल। सच्चा सदगुरु। बाकी तो ढेर है। कितने उनके फॉलोवर्स परतु गुरु तो नहीं। परंतु नाम पढ़ता है, तो उनको घमंड आ जाता है। गाते भी है, मनुष्य को देवता की करतन लागी बार। सदगुरु अकाल मूर्त। वह है, जो एक सेकंड में मनुष्य को देवता बना देता है। ब्रह्मा को एक सेकंड में विष्णु बना देता है। वह बाप ही आकर के तुमको कहते हैं, बच्चे। यह बच्चे। और भी कोई दूसरा कह नहीं सकता। वह तो अपने शिष्य बनाते हैं। आत्मा तो अकाल मूत है। ये तुम्हारा अकाल तक्त। सभी मनुष्य मात्र को अकाल मूर्त आत्मा का तत। आत्मा बोलती है, आत्मा चलती है। और व अकाल मूर्त है। अभी तुम तम प्रधान बन पड़े। बाप कहते हैं, माम कम याद करो, तो तुम्हारे पाप कर्म सब भस्म हो जा। आत्मा सतो प्रधान बन जावेगी। तुम्हारी एब्जेक्ट है चतु प्रधान बनने की। हम ये लक्ष्मी नारायण बनते हैं। अभी हम सब संगम युग पर अभ ड्रामा पूरा होता है। हमको वापस जाना है। यह भी याद करना पड़े, तब तो भी कर्म विनाश हो। कितना समझाते हैं। अच्छा मीठी मीठी रवानी बच्चों प्रति नहीं, बाप दादा का याद प्यार। गुड म