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Pravachan - Pu. Shri Niyam Darshanaji - ( "Gyanganga" - Vadgaon sheri ,Pune )

JIT motiongraphics18:31

Transcription

जीवन की दिव्यता और भव्यता को जानने के लिए आए हुए जिज्ञासु, आज एक छोटा सा सवाल है आपसे। आप प्रवचन सुनते हो, कितने वर्षों से सुन रहे हो? बहुत सालों से, कोई 20 सालों से, कोई 25 सालों से, कोई 50 सालों से, और कोई दो-पांच साल से भी, और अभी यहां पर चार दिन से बराबर आप नियमित प्रवचन सुनते हो। साधु संत उपस्थित हैं तो वहां जाकर सुनते हो, नहीं है तो टीवी या मोबाइल पर आप प्रवचन सुनते हो।

मेरा सवाल यह है, आपको क्या-क्या याद रहा? किसी को कोई दो-चार सूत्र याद रह गए होंगे, किसी को कोई गीत की दो लाइन याद रह गई होंगी, कोई घटना स्टोरी बताई, वो स्टोरी याद रह गई, अथवा तो किसी ने कोई-कोई साधु संतों ने कोई जोक बोला होगा, वो जोक याद रह गया होगा है ना? किसी-किसी को स्थानक के गेट तक याद रहता है, किसी को गेट से बाहर घर पहुंचते हैं, रास्ते तक प्रवचन याद रहता है। आप घर पहुंचते हो और जैसे ही आपने देखा टीवी चालू है, टीवी पर आपकी कोई मनपसंद सीरियल, पिक्चर अथवा तो न्यूज चल रही है, आप देखने के लिए बैठ जाते हो, अथवा तो किसी का मोबाइल आ जाता है या रास्ते में चलते कोई दूसरा बात करने वाला मिल जाता है, तो सारा प्रवचन रफु चक्कर है ना? सारा प्रवचन रफु चक्कर हो जाता है, सब भूल जाते हैं, कुछ भी याद नहीं रहता। बंधुओ, क्या आप प्रवचन याद रखना चाहते हो? हां या ना?

याद रखना चाहते हो? एक छोटी सी ट्रिक बताती हूं आपको। आप लोग स्कूल कॉलेज पढ़े हुए हो। कोई पहली, दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी पढ़े हैं, कोई दसवीं पढ़े हैं, कोई कॉलेज पढ़े हुए हैं, किसी ने ग्रेजुएशन कंप्लीट किया हुआ है। पहली क्लास में जो आपने इतिहास पढ़ा था, वही इतिहास आपको दूसरी, तीसरी, चौथी, पांचवी क्लास तक याद रखने की जरूरत है क्या? नहीं। क्यों? क्योंकि पहली क्लास में मान लो आपने गांधी जी का चरित्र पढ़ा, दूसरी या तीसरी क्लास में आपको नेहरू जी का चरित्र पढ़ने को मिला, आगे की क्लास में आपको विवेकानंद पढ़ने को मिला, पांचवी, सातवी क्लास में आगे आपको महाराणा प्रताप पढ़ने को मिला। यानी हर क्लास में हिस्ट्री बदलती रहती, इसलिए आपको इतिहास याद रखने की जरूरत नहीं है। परंतु गणित के बारे में ऐसा नहीं है। पहली क्लास में जो गणित आपने पढ़ा है, जो फार्मूले गणित के सीखे हुए हैं, वही आपको आगे तक एंड तक याद रखने पड़ते हैं, याद रह जाते। अगर आप याद नहीं रखते हैं, तो आपको आगे का कुछ भी समझ में नहीं आता है। जैसे पहली क्लास में आपने सीखा है 2 * 2 = 4, 12 * 5 = 60 है ना? ब दने च और च दने ये सब आपने पढ़ा हुआ है। ये चीज आपको आगे के क्लास में भी याद रखनी पड़ती है। गणित के फार्मूले सारे याद रखने पड़ते हैं, वरना आपको आगे का कुछ भी समझ में नहीं आता है।

बस यही ट्रिक है। प्रवचन को, जिनवाणी को गणित का स्थान दे दो, इतिहास का स्थान मत दो। इतिहास का स्थान देते हैं तो भूल जाते हैं, गणित का स्थान देते हैं तो भूलते नहीं है। जो भी प्रवचन आपने सुना है, उस प्रवचन का जो भी मॉरल है अथवा तो कोई विशेष चीज जो आपको बहुत अच्छी लगी है, उसको गणित के फार्मूले की तरह याद रख लो, तो वह प्रवचन आपको हमेशा के लिए याद रह जाएगा। होता है, इतने सारे प्रवचन सुनते हैं, लेकिन उसमें कभी किसी समय का कोई एक प्रवचन, कोई एक घटना हमेशा के लिए याद रह जाती है। तो बस कैसे याद रहती है? गणित के स्थान पर हमने उसको ग्रहण किया, इसलिए वह याद रह जाता है। तो जो भी भगवान के सिद्धांत हैं, तत्व हैं, भगवान की जो भी बातें हैं, जिनवाणी में बताई हुई बातों को यदि हम गणित का स्थान देते हैं, तो वह हमें याद रह जाता है और वह ज्ञान का दीपक हमारा जलता ही रहता है, बुझता नहीं।

घटना मुझे याद आ रही है। एक बार कहते हैं महात्मा कबीर के वहां पर कोई एक व्यक्ति उनसे मिलने के लिए पहुंचा। दरवाजा नॉक किया। कबीर के बेटे ने दरवाजा खोला। कबीर का बेटा था कमाल, जिसका नाम था। कमाल ने दरवाजा खोला। आगंतुक व्यक्ति से पूछा, बोलिए, आपको कौन चाहिए? तब उस व्यक्ति ने कहा, मैं बहुत दूर से आया हूं और महात्मा कबीर से मिलने के लिए आया हूं। उनके बारे में मैंने बहुत कुछ सुना है, संत प्रकृति के हैं, तो कुछ जरूरी काम है उनसे पूछना है, उनसे उनके, उनकी जो है सलाह लेनी है, इसलिए मैं उनसे मिलने आया हूं। बताइए मुझे महात्मा कबीर कहां मिलेंगे, कब मिलेंगे? तब कमाल ने कहा, पिताजी तो अभी घर पर नहीं है, कहीं बाहर गए हैं। आप थोड़ी देर इंतजार कीजिए, पिताजी लौट आएंगे। तब उस व्यक्ति ने कहा, मुझे थोड़ा अर्जेंट है। आप बता दीजिए वह कहां पर गए हैं, मैं वहां जाकर के उनसे मिल लूंगा। आप एड्रेस बता दीजिए। तब कमाल ने कहा, आज दोपहर में ही एक युवा व्यक्ति की मृत्यु हो गई है। पिताजी श्मशान घाट गए हैं। आप वहां पर जाइए, वह आपको मिल जाएंगे। उस व्यक्ति ने कहा, धन्यवाद है आपने एड्रेस बता दिया। लेकिन यह बता दीजिए, कबीर जी दिखते कैसे हैं? क्योंकि मैं पहली बार ही उनसे मिलने के लिए आया हूं, मैं को जानता नहीं हूं। तब कमाल ने कहा, आप वहां पर जाइए, जिसके सिर पर आपको दिया मिलेगा, समझ लेना यह वह कबीर है। उसने कहा, ठीक है। धन्यवाद।

दिया और वह वहां से सीधा कहां पहुंचा? श्मशान घाट। श्मशान घाट में जाकर के देखता है, चिता का कार्यक्रम चल रहा है, लेकिन सबके सिर पर दिए चल रहे हैं, सबके सिर पर दिए जल रहे हैं। अब इसमें से कौन कबीर है? वह फिर से वहां से तुरंत लौट कर के आया, फिर से कमाल के पास पहुंचा और कमाल से कहा, अरे भाई साहब, आपने बताया कि जिसके सिर पर दिया जलता होगा, वह कबीर है, लेकिन वहां तो सबके सिर पर दिए चल रहे हैं। इतने कबीर थोड़ी हो सकते हैं? तब वह हंसने लगा। उसने कहा, ठीक है। आप इतनी बजे वहां से निकले, यहां पहुंचे। अब वापस आप वहां तक श्मशान घाट तक पहुंचोगे, तब तक चिता का कार्यक्रम संपन्न हो जाएगा। सारे लोग गेट से बाहर आ रहे होंगे। गेट से बाहर आने वालों में, जिसके सिर पर दिया जलता होगा, समझ लेना यह वह कबीर है।

वह वहां से फिर से चला गया। श्मशान घाट में पहुंचा और वहां जाकर के देखता है, बिल्कुल जैसा कमाल ने बताया, वैसा ही था। चिता का कार्यक्रम पूर्ण हो चुका था, लोग सारे बाहर आ चुके थे, सबके सिर पर दिए थे, लेकिन एक ही व्यक्ति के सिर पर जो दिया था, वह जल रहा था, उसकी ज्योति जल रही थी। बाकी के सिर पर के दिए की ज्योति बुझ चुकी थी। उसने समझ लिया, यही वह महात्मा कबीर है। वह उनके पास गया और जो कुछ जरूरी बात करनी थी, पूछना था, वह सारी बात उन्होंने कबीर से की और वहां से पुनः लौट रहा है। लौटते-लौटते उसको यह रहस्य समझ में नहीं आया। वह फिर से कमाल के पास गया। कमाल से कहा, भाई साहब, आपने जो बात बताई, बिल्कुल सही है। श्मशान घाट से जब बाहर लौट रहे थे, तो सबके दिए बुझ चुके थे, मात्र कबीर जी का दिया जल रहा था। इसके पीछे क्या रहस्य है? मैं समझ नहीं पाया, मैं समझना चाहता हूं। मैं समझना चाहता हूं, क्या रहस्य है इसके पीछे? तब कमाल ने कहा, देखो बंधुवर, श्मशान में जो भी व्यक्ति जाता है ना, आंखों के सामने जब जीवन की नश्वरता का सच देखता है, तो उसको भी वैराग्य आ जाता है। उसको भी वैराग्य आ जाता है कि जीवन इतना नश्वर है, जीवन का कोई भरोसा नहीं है। अरे, वो युवक जिसकी यात्रा में यह लोग गए थे, सुबह घर से निकला, तब उसने सोचा भी नहीं था कि मैं घर पर शाम को वापस नहीं लौटूंगा, मेरी लाश आएगी, मेरी डेड बॉडी ही आएगी। यह उसने सोचा भी नहीं था। एक्सीडेंट हुआ और ऑन द स्पॉट वह गया। इतना नश्वर यह जीवन है। जीवन की नश्वरता को जब व्यक्ति आंखों के सामने सत्य रूप में देखता है, तो उसको वैराग्य आ जाता है।

आप लोगों ने भी देखा है, अभी यह डेढ़-दो साल का कोरोना काल गया, उसमें कितने इस सच को आपने आंखों से देखा है, है ना? देखा है ना? किसकी-किसकी कैसी हालत? अरे, सोचा भी नहीं कि अभी दो दिन पहले अच्छे थे और दो दिन डॉक्टर ने कहा कि ओके है, शाम को आप डिस्चार्ज होगा और आप घर पर लेकर के जाइए, दूसरे दिन सुबह आप लेकर के जाइए और रात को तो राम नाम सत्य हो जाता है। ये सब चीजें आपने आंखों से देखी है। इसीलिए तो भगवान महावीर कहते हैं, श्री उत्तराध्ययन सूत्र के अंदर, बड़ी प्रिय, बहुत सुंदर बोध व्रत गाथा है। कुशाग्र पर आए हुए ओ बिंदु की तरह यह जीवन क्षणिक है, इतना क्षणिक है। घास के अग्र भाग पर जो ओस बिंदु, दव बिंदु गिरता है, दिखने में बड़ा सुंदर दिखता है और जब सूरज की किरण उस पर है, तो वह मोती के जैसा चमकता है, बड़ा सुंदर दिखता है। लेकिन उसका अस्तित्व कितना? हवा का झोंका नहीं आता, तब तक बस। जैसे ही हवा का झोंका आया, वह बिंदु मिट्टी में गिरकर मिट्टी बन जाती है। बस ऐसा ही जीवन है, हे गौतम। यह जीवन इतना क्षणिक है, इतना नश्वर है, इसका कोई भरोसा नहीं है। इसलिए जो करना है, वह कार्य कर लो। इस जीवन का कोई भरोसा नहीं। इस जगत में कोई सार नहीं है।

तो फिर सार किसमें है? जगत में कोई सार नहीं है, तो फिर सार किसमें है? कबीर जी कहते हैं, राम भजन जग सार, मनवा प्रभु भजन जग सार, मनवा हरि भजन जग सारी। बड़े-बड़े पृथ्वी के बड़े-बड़े राजा, बड़े-बड़े पृथ्वी के बड़े-बड़े राजा छोड़ गए दरबार, मनवा छोड़ गए दरबार, मनवा हरि भजन जग सार। राम भजन जग सार। कितने इस धरती पर कितने बड़े-बड़े शौर्यवान वीर ऐसे पुरुष होकर के गए, लेकिन किसका अस्तित्व रहा है इस धरती पर? किसी का भी अस्तित्व नहीं रहा।

आगे कबीर जी कहते हैं, बहुत सुंदर बात कहते हैं। मात्र तीन लाइन का भजन है, लेकिन बहुत बोधप्रद यह भजन है। कंचन जैसी सुंदर काया, कंचन जैसी सुंदर काया, पल में होवत छार, मनवा पल में होवत छार। छार यानी राख। जिसकाया को हम जिंदगी भर संभालते हैं, जिस काया के पीछे इतना पाप कमाते हैं, उस काया का अंतिम परिणाम क्या है? मात्र पल भर में राख की ढेरी बन जाती है। आईने में रोज देखते हो, बस एक बार देख के इसका अंतिम स्वरूप देख लो। इतना इस काया को मैंने संभाला है, लेकिन इसका अंतिम परिणाम क्या है? मुट्ठी भर राख है और कुछ नहीं है। यही कबीर जी कहते हैं, कंचन जैसी सुंदर काया, कंचन जैसी सुंदर काया, पल में होवत छार, मनवा पल में होवत छार। मनवा हरि भजने जग सार, मनवा प्रभु भजन जग सार। कहते कबीरा, कबीरा कहते कबीरा, सुनो भाई साधु, उतरो भव जल पारी, मन भा उतरो भव जल पार, मनवा प्रभु भजन जग सार, मनवा हरि भजन जग सार, मनवा वीर भजन जग सार।

श्मशान में जाते हैं, सबका दिया जल जाता है, वैराग्य का दिया जल जाता है, लेकिन जैसे ही श्मशान से बाहर आते हैं, सबके दिए बुझ जाते हैं। स्थानक में तो वैराग्य घरे पु गया, रागी है ना? स्थानक में तो सब वैरागी बन जाते हैं। जब यह जिनवाणी के तत्वों को सुनते हैं, समझते हैं, तो स्वीकार करते हैं कि हां, वास्तव में यह सत्य है। भगवान ने जो मार्ग बताया, उस मार्ग पर चलने जैसा है। आत्मा का कल्याण करना है। यह मनुष्य जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है। भविष्य में वापस कब मिलेगा, नहीं मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है। इसलिए अभी जो कुछ करना है, हर समय को हम कीमती समय का सोना बना लें और इस समय का सदुपयोग करके अपनी आत्मा का कल्याण कर लें, कर्मों की निर्जरा कर लें। ये सारी बातें सुनते हैं और वैराग्य आ जाता है, लेकिन यहां से जैसे ही गेट से बाहर गए, सब कुछ याद आ जाता है। अरे, यह काम है, वो काम है, इससे मिलना है, उससे फोन करना है, सब कुछ की क्या है, है ना? स्थानक में वैराग्य घरे गया, गटरा बारे रागी। तो वैराग्य आता है। वैराग्य की ज्योति को प्रज्वलित रखना है। इस वैराग्य की ज्योति को प्रज्वलित रखना है, तो बस गणित का स्थान दो, इतिहास का स्थान मत दो। इतिहास का स्थान देते हैं तो भूल जाते हैं, गणित का स्थान देते हैं तो हमेशा याद रहता है।

जैसे कबीर को याद रहा, श्मशान से बाहर निकले तब भी वही ज्योति जागृत थी, वही जीवन की नश्वरता का बोध था और वही वैराग्य भाव, वही अनासक्त जीवन। वैराग्य आता है। मैं ये कहते, वैराग्य आने के बाद सबको दीक्षा ही लेनी नहीं। भी दीक्षा लो, तो कम से कम जीवन में विचारों में, व्यवहार में परिवर्तन आता है, निश्चित आता है। इसीलिए तो चातुर्मास आते हैं, है ना? इसीलिए तो चातुर्मास आते हैं। यह चातुर्मास आपके लिए इसीलिए उपस्थित हुआ है और एक नहीं, नौ-नौ महा साध्वी जी यहां पर पधारे हैं। तो बस, जो भी चार महीने आप सुनोगे, समझोगे, उसको किसका स्थान दोगे? बोलो, गणित का स्थान दोगे। इतिहास का स्थान मत देना। गणित का स्थान देकर के हर सिद्धांत को, हर फार्मूले को, हर सूत्रों को, चाहे वह गीत की दो लाइन क्यों न हो, उसको जीवन में ऐसे उतार लो, ऐसे ग्रहण कर लो कि आपका जीवन परिवर्तन हो जाए। जो आसक्ति है, वह आसक्ति घट। यत्र आसक्ति, तत्र उत्पत्ति। जहां आसक्ति होती है, वहां उत्पत्ति होती है। इसलिए हमें और कुछ नहीं, हमारी आसक्ति घटे। हमारी शरीर की, संपत्ति, सत्ता, पदार्थ, परिवार, इन सब की जो आसक्ति है, यह आसक्ति भी हमारी कम हो, तो यह चातुर्मास मनाना हमारा सफल, सार्थक हो सकता है। तो बस, जो भी सुना है, समझा है, उसको हम गणित का स्थान देकर के हमेशा के लिए उसको याद रखें। हमारे भीतर में ज्ञान का, वैराग्य का द्वीप हमेशा प्रज्वलित रहे और परिवर्तन निश्चित रूप से हमारे जीवन में घटित हो। इसी मंगल भाव के साथ बोलिए, भगवान महावीर स्वा...