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[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]
क्लेश, कर्म, कर्म विपाक, वि आशय, आशय अपरा दृष्ट, अपरा दृष्ट पुरुष विशेष ईश्वर ये है ईश्वर। इस पहचान से उसको पहचान लेना। इन लक्षणों से इस ईश्वर को समर्पण करना, दूसरे किसी को नहीं। तो तुम्हारी समाधि शीघ्र लगेगी। किसी और को कर दिया तो भटक जाओगे। मात समर्पण करना चाहिए। व उसका अपना स्तर है, वो अलग लेवल है। उस उम्र में वो भी करना चाहिए। प समर्पण भी करना चाहिए। गुरु समर्पण भी करना चाहिए। हर एक का अपना अपना लाभ, लेकिन अंतिम समर्पण ईश्वर का है। ईश्वर समर्पण करना चाहिए। उसके बिना फिर आगे गाड़ी नहीं चलेगी।
तो ईश्वर समर्पण के लिए ईश्वर की पहचान बताई। सूत्र में पहला शब्द है क्लेश, दूसरा है कर्म, तीसरा है विपाक और चौथा आशय। इनके बाद पांचवा शब्द है अपरा। पराम का अर्थ होता है संबध। क्या अर्थ है? संबद्ध। और अ लगाने से अर्थ उलट जाएगा। अपरा असंबद्ध। इन चार चीजों से जो सर्वदा असंबद्ध है। इन चार चीजों से उसका संबंध कभी नहीं होता। ना कभी हुआ, ना आज है, ना होगा। तीनों कालों में कभी भी उसका इन चार चीजों से संबंध नहीं होता। उसका नाम ईश्वर है। उसको समर्पण करना और किसी को [संगीत] नहीं।
तो ये चार शब्दों में पहला शब्द है क्लेश। योग दर्शन में क्लेश नाम से पांच बातें बताई है। पांच क्लेश। उनके नाम बोलिए। अविद्या, अ अस्मिता, अमि राग, द्वेष, अभिनिवेश। ये पांच क्लेश। तो जो पांच क्लेश से कभी भी संबध नहीं होता, वो ईश्वर है। मृत्यु का भय, मरने से डर लगता है। इसका नाम है अभिनिवेश। तो यह अविद्या, अरा आद जो पांच क्लेश है, यह जीवात्मा के साथ संबध होते हैं। हमारे साथ तो होते हैं। आत्मा अल्प है, अल्प शक्तिमान है। उसको अविद्या दबा लेती है और वो उल्टा सीधा समझने लगता है। दुनिया में ब भ्रांति में पड़ा रहता है। तो आत्मा इन पांच क्लेश के साथ जुड़ता है, संबध होता है। अविद्या से, राग से, द्वेष से, अभिनिवेश से। ईश्वर को कभी अविद्या नहीं दबा सकती। यह सूत्र में लिखा है।
अब इस तरह से ईश्वर की पहचान करें। जिसको अविद्या तीनों कालों कभी नहीं दबा सकती, कभी मूर्ख नहीं बना सकती, वो ईश्वर है। उसको समर्पण करना। वो आपकी समाधि लगवाए और मोक्ष देगा। यह समझा रहे। तो जिसको अविद्या कभी नहीं होती, जिसको राग कभी नहीं सताता, जिसको द्वेष कभी नहीं होता, जिसको मरने से डर नहीं लगता, पांच क्लेश से सर्वथा परे, तीनों कालो में परे, उसका नाम ईश्वर है। उसको पहचानो और उसको समर्पण करो।
जब व्यक्ति मिठाई खाता है, तो मिठाई कहां जाती है? आत्मा में या शरीर में? और वो मानता क्या है? मैं खा रहा हूं। इसका नाम अस्मिता है। मिठाई खा जाती है शरीर में और आत्मा यह मानता है कि मुझ में जा रही है। मैं मिठाई खा रहा हूं। तो गड़बड़ है ना? बस ये अस्मिता क्लेश है। मोटी भाषा में ऐसा समझ लीजिए। तो अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अनिवेश। पाच क्ले। जिसको कभी नहीं सताते, उसका नाम ईश्वर है। यह पहली पहचान।
अब इस पहचान से देखो। कोई भी शरीर भारी व्यक्ति आपको ऐसा मिलेगा जिसको पांच क्ले कभी ना सताते हो? ऐसा कोई नहीं मिलेगा। इसका मतलब ईश्वर शरीर धारी कभी नहीं होगा। और जो शरीर धारी से ईश्वर को नहीं होगा, क्योंकि व शरीर धारी सारे पाच क् के चक्कर में। और ईश्वर कभी तीन काल में इन क्लेश के चक्कर में आया नहीं, भी नहीं, आएगा भी नहीं। वो है ईश्वर। इसलिए एक शब्द जोड़ा पुरुष विशेष। सूत्र में अगला शब्द है पुरुष विशेष। पुरुष मतलब जीवात्मा। पुरुष का जीवात्मा भी है, ईश्वर भी है। दोनों है। अलग अलग प्रसंग में अलग अलग अर्थ होते हैं। तो य पुरुष का अर्थ कर लेंगे जीवात्मा और विशेष भिन्न। सब जीवात्मा से भिन्न, सबसे अलग, अलग कैटेगरी का, अलग स्टाइल का, व ईश्वर है। आत्मा जैसा नहीं है। व सबसे अलग टाइप का है। अंग्रेजी में क्या बोलते यूनिक? यून कहते जो वस्तु संसार में अपने ढंग की केवल एक ही हो, उसको बोलते हैं यूनिक आइटम। गड इ यूनिक आइटम। व अपने ढंग का एक ही है बस। उसके बराबर का दूसरा कोई ईश्वर नहीं है। उसके लेवल पर दूसरा कोई भी नहीं है। वो अकेला ही है। वो है पुरुष विशेष। सबसे अलग, अलग स्टाइल का, वो ईश्वर है।
तो पांच क्लेश जिसको कभी नहीं सताते, वो ईश्वर है। अगला शब्द है कर्म। अब इस कर्म को क्लेश के साथ जोड़ना है। वो कर्म जो क्लेश से उत्पन्न होते हैं। क्या कहा? बोलिए। कुछ कर्म ऐसे होते हैं जो क्लेश से उत्पन्न होते हैं। कुछ कर्म ऐसे होते हैं क्ले से उत्पन्न नहीं होते। व तत्व जन से उत्पन्न होते हैं। अविद्या, राग, द्वेष तो क्ले है। तो व्यक्ति अविद्या, राग, द्वेष से प्रेरित होकर कर्म करता है। और जैसे अविद्या है, इसका विरोध विद्या। मिथ्या जन। इसका विरोधी तत्व जन। जैसे अविद्या से व्यक्ति कर्म करता है, मिथ्या ज्ञान से प्रेरित होकर कर्म करता है। ऐसे तत्व ज्ञान से भी प्रेरित होकर कर्म करता है। तो मिथ्या ज्ञान, अविद्या आद क्लेश जीवात्मा को चिपट जाते हैं और इससे वो उल्टे सीधे काम करता है। अच्छे बुरे सकाम कर्म करता है। सांसारिक सुख की प्राप्ति के उद्देश्य से कर्म करता है। इसको सकाम कर्म कहते हैं। तो जीवात्मा पांच क्लेश के चक्कर में आता है और इन क्लेश से प्रेरित होकर सकाम कर्म करता है। पर ईश्वर इन पांच क्लेश के चक्कर में नहीं आता। वो अविद्या से परे है। वो सदा त जनी है, अनंत ज्ञानी है। उसका ज्ञान पूरा शुद्ध है, करेक्ट, कंप्लीट, कंफर्म है। तो व जो तत्व ज्ञान से प्रेरित होकर कर्म करता है, वह कर्म तो ईश्वर भी करता है। यहां कर्म का निषेध कर रहे हैं। इसका अर्थ नहीं ईश्वर कोई भी काम नहीं करता है। बहुत लोगों को य भ्रांति हो जाती है। व समझते देखो कर्म का निषे किया। ईश्वर कोई कर्म करता ही नहीं। ऐसा नहीं है। ईश्वर भी कर्म करता है। वेद में लिखा है विष्ण कर्माणि पत। यह मंत्र सुना है कभी? विष्ण कर्मा पत। विष्णु के कर्मों को देखो। विष्णु कौन है? सर्वव्यापक ईश्वर। ईश्वर के हजारों नाम है। उन एक विष्णु भी है। वेद में लिखा है विष्ण कर्मा पत। जो सर्वव्यापक ईश्वर है, उसके कर्मों को देखो। तो वेद में तो लिखा है ईश्वर कर्म करता है। कर्म करता है? सृष्टि को बनाता है? हां या ना? सृष्टि का पालन करता है? सृष्टि का नाश भी करता है? सब जीवात्मा के कर्मों का फल देता है? चार वेदों का ज्ञान देता है? यह ईश्वर के कर्म है। तो ईश्वर भी तो कर्म करता है। पर वो तत्व ज्ञान से करता है। अविद्या से नहीं। राग द्वेष से नहीं। क्लेश से प्रेरित होकर कोई कर्म नहीं करता। वो तत्व ज्ञान पूर्वक कर्म करता है। शुद्ध कर्म करता है।
जीवात्मा तो फल की इच्छा से कर्म करता है। वो जब भी कर्म करता है तो पहले सोचता है मुझे फल क्या मिलेगा? कुछ ना कुछ फल मिलना चाहिए। अगर फल नहीं मिलेगा तो मैं काम भी नहीं करूंगा। परंतु ईश्वर फल की कामना नहीं करता है। फल की इच्छा नहीं करता है। वो बिना फल की इच्छा से कर्म करता है। सिर्फ परोपकार के लिए करता है। उसको अपने स्वार्थ की कोई इच्छा नहीं है। कभी-कभी लोग कहते गीता में लिखा है कर्म कि जा फल की इच्छा मत कर रे इंसान। जैसे कर्म करेगा वैसे फल देगा भगवान। यह है गीता का जन। ऐसा कोई गीत बना रखा है? है कोई पुराना गीत था? ऐसे कभी सुना थाने भी? तो गीता के नाम पर लोग कहते हैं कर्म वाधिकारस्ते मा फले कदाचन। कर्म में तुम्हारा अधिकार है, फल में अधिकार नहीं है। फल की इच्छा मत करो। यह झूठ है। गीता में जो लिखा है इसका अर्थ ये नहीं है। लोग झूठ बोलते हैं, गलत बताते हैं। उनको गीता पढ़ने नहीं आती। व्यक्ति कर्म करे और फल की इच्छा ना करे, असंभव है। इंपॉसिबल है। स्वार्थ जीवात्मा में इनबिल्ट है, बाय डिफॉल्ट है। वो तो स्वाभाविक है। स्वार्थ के बिना तो आदमी आंख भी नहीं खोले। आप सु आंख खोलते हैं, आपका स्वार्थ है तब आंख खोलते हैं। क्या हुआ? दिन हो गया। चलो भाई उठेंगे। क्यों उठेंगे? जाएंगे, जाएंगे, ऑफिस जाएंगे, पैसे कमाएंगे, घर चलाएंगे। आपको स्वार्थ ना हो तो आप बिस्तर से उठेंगे ही नहीं। क्यों उठेंगे? तो व्यक्ति कोई भी काम करता है, पहले सोचता है मुझे इससे क्या फायदा है? अगर कुछ भी फायदा नहीं है, तो वह काम नहीं करेगा। इसलिए कहना गलत है कि व्यक्ति कर्म तो करे और फल की इच्छा ना करे, असंभव है।
ईश्वर ऐसा कर सकता है। ईश्वर के लिए असंभव नहीं है। आत्मा के लिए असंभव है। क्यों? क्योंकि आत्मा में स्वभाव से कमियां है। बोलिए क्या कहा है? या नहीं? आत्मा को बहुत चीजें चाहिए। रोटी, कपड़ा, मकान, विद्या, पेटा, परिवार, संपत्ति, मोक्ष। ये सब चीजें चाहिए। इसके बिना उसका गुजारा नहीं चलता। तो आत्मा में बहुत सारी कमियां है। वो अपनी कमियों को पूरा करना चाहता है। इसलिए वो अपने कमी को पूरा करने के लिए पहले सोचता है। मैं जो काम करू, मुझे क्या मिलेगा? या तो धन मिले, समान मिले, कोई संपत्ति मिले, कोई प्रतिष्ठा मिले, कोई पद मिले, कुछ खाना पीना मिले, कुछ भाड़ा किराया मिले, कुछ कुछ तो मिलना चाहिए। और यह भी नहीं मिले तो कम से कम मोक्ष तो दो। अब आप मोक्ष भी ना दो और पैसा भी ना दो, तो मैं क्यों काम करूंगा भाई? फल थोड़ी बैठा हूं? मेरा जीवन कैसे चलेगा? मुझे कुछ तो चाहिए ना? तो जीवात्मा में बहुत सारी कमियां है। उन कमियों को पूरा करने के लिए वो कर्म करता है। जब वो सांसारिक सुख, संपत्ति प्राप्त करने की इच्छा से कर्म करता है, तो उसको उसको सकाम कर्म कहते हैं। क्या कहते हैं? तो सकाम कर्म कहेंगे। सांसारिक सुख प्राप्ति या संपत्ति प्राप्ति के उद्देश्य से जब व्यक्ति कर्म करता है, तो वो सकाम कर्म है। और जब मोक्ष प्राप्ति के उद्देश्य से कर्म करता है, वो निष्काम कर्म। तो आत्मा दोनों तरह के कर्म करता है। सकाम भी करता है, निष्काम भी करता है। निष्काम का मतलब यह नहीं कि सारी कामना छोड़ दी। निष्काम का अर्थ य गलत। निष्काम का अर्थ है जब वह सांसारिक सुख की कामना छोड़ दे। हां बोलिए क्या कहा? जब सांसारिक सुख की कामना छोड़ दे, पर मोक्ष की कामना तो रखे। उस कामना से किया गया कर्म निष्काम होता है। निष्काम का अर्थ कामनाओं की पूर्ण निवृति, बिल्कुल नहीं है। गलत अर्थ है। ठीक है। सकाम, निष्काम का अर्थ समझ में आ गया।
तो आत्मा सकाम कर्म भी करता है, निष्काम भी करता है। दोनों तरह से करता है। व सांसारिक सुख भी चाहता है और मोक्ष का सुख भी चाहता है। दोनों चाहता है। इसलिए दोनों तरह के कर्म करता है। पर ईश्वर सांसारिक सुख को नहीं चाहता। वो पहले ही मस्त है। अवेद में लिखा रसेन तपत लिखा है ना? हमारे गुरुजी मंत्र बोलते थे रसेन तपत। नत। ईश्वर आनंद से तृप्त है। उसमें कोई कमी नहीं है। ना न माने कमी। ना न। उसम कोई कमी नहीं। 100% मस्त, आनंदित है। इसलिए ईश्वर में जब कमी नहीं, तो व किस स्वार्थ की पूर्ति के लिए काम करेगा? स्वार्थ है ही नहीं। इसलिए वो स्वार्थ के लिए काम नहीं करता। वो परोपकार के लिए करता है।
एक बार किसी ने पूछा ईश्वर में इच्छा है या नहीं है? आपका क्या उत्तर है? ईश्वर में इच्छा है या [संगीत] नहीं? अब देखा कन्फ्यूज है भी कंफ्यूजन। श्वर इच्छा है कि नहीं है? जो कहता है ईश्वर है, आप में से जो मानता है ईश्वर में इच्छा, व हाथ ऊचा करें। जोय मानते ईश्वर में इच्छा है। अच्छा। जो यह मानते ईश्वर में कोई इच्छा नहीं, वो हाथ ऊंचा करेंगे। ईश्वर में कोई इच्छा नहीं। ठीक है। और जिनको डाउट है, व हाथ ऊंचा करें। समझ में नहीं आया। हा डाउट वाले [संगीत] भी। तो सही उत्तर य है। ईश्वर में इच्छा है। यह उत्तर ठीक है। इच्छाएं दो प्र की होती है। कितने प्रकार की? दो प्रकार की। एक अपनी कमी को पूरा करने की इच्छा। बोलिए। एक दूसरे के भले की इच्छा। यह दो तरह की इच्छा होती है। जब अपनी कमी को पूरा करना हो, तो स्वार्थ की इच्छा बोलते हैं इसको। कौन सी इच्छा बोलते हैं? स्वार्थ की इच्छा। जब व्यक्ति अपने लाभ के लिए काम करता है। जब दूसरे के लाभ के लिए कर, तो परोपकार की इच्छा। ईश्वर में स्वार्थ वाली इच्छा नहीं है। ईश्वर में स्वार्थ वाली इच्छा नहीं। पर परोपकार की इच्छा तो है ना? है ना? अगर वो ना होती, तो ईश्वर सृष्टि बनाता ही क्यों? उसको हमारा कल्याण करने की इच्छा ना होती, तो सृष्टि कैसे बनाएगा? बिना इच्छा के तो कर्म हो ही नहीं सकता। असंभव है। कर्म ने का सिस्टम यही है। पहले इच्छा होती है, तो कर्म करता है व्यक्ति। ईश्वर का भी यही निय। वो भी चेतन है, हम भी चेतन है। हम भी इच्छा से कर कर्म करते हैं, वो भी इच्छा से करता है। बस अंतर इतना है कि हम फल की इच्छा भी रखते हैं, वो फल की इच्छा नहीं रखता। इतना अंतर है। तो ईश्वर में परोपकार की इच्छा है। उसी परोपकार की इच्छा से ईश्वर ने संसार बनाया। व हमारा सब कर्मल देता है। नय से सब हमारा ध्यान रखता है। पालन पोषण करता है। सब काम करता है। तो ईश्वर में परोपकार करने की इच्छा है। उस इच्छा से वह कर्म करता है। तो ईश्वर के कर्म पांच कर्म बताए। वह तत्व ज्ञान पूर्वक है। इसलिए ईश्वर कर्म करता है। और इस सूत्र में जो मना किया जा रहा है क्लेश कर्म। यह सकाम कर्मों की बात है। ईश्वर सकाम कर्म नहीं करता। सकाम कर्म क्यों नहीं करता है? क्योंकि उसम अविद्या नहीं है। वो राग द्वेष नहीं है। वो क्लेश नहीं है। इसलिए ईश्वर ना तो क्लेश के चक्कर में फसता, ना वो सकाम कर्मों के चक्कर में फसता। इन दोनों के चक्कर में कभी नहीं आता। वो ईश्वर है। अब शरीर धारी जितने भी है, वो सारे क्लेश के चक्कर में भी आते हैं और सकाम कर्म भी करते हैं। बाद में तत्व ज्ञान हो जाता है, फिर सकाम कर्म छोड़ देते हैं। बाद में फिर निष्काम कर्म करते हैं। लेकिन कभी ना कभी तो करते हैं। कभी ना कभी तो क्लेश के चक्कर में आते ही है। इसलिए किसी भी शरीर धारी को ईश्वर नहीं मानना। यह समझा रहे महर्षि पतंजली।
ठीक है। तीसरा शब्द देखिए। सूत्र में क्लेश, कर्म, विपाक। विपाक का मतलब है कर्मों का फल। अब कर्मों का फल है जाति, आयु, भग। जाति मनुष्य, पशु, पक्षी। यह जाती है। आयु 20 साल, 30 साल, 50 साल, 80 साल, 100 साल। जितना जीने का समय मिला, उसको आयु कहते हैं। भोग का मतलब खाने पीने साधन। रोटी, कपड़ा, मकान, मोटर, गाड़ी, बंगला। यह सब जितने जीने के साधन है, इसका नाम है भोग। तोय जाति, आयु, भोग। य क्या है? य कर्मों का फल। ईश्वर इन कर्मों का फल भी नहीं भोगता। जीवात्मा भोगता है। जीवात्मा पांच क्लेश के साथ संबध होता है। फिर उन क्लेश से प्रेरित होकर सकाम कर्म करता है। फिर सकाम कर्मों का फल जाति, आयु, भोग। य भोगता है। और इस जाति से क्या मिलता है? सुख और दुख। अंतिम फल तो सुख और दुख। मनुष्य की जाति मिली, मनुष्य का भोग मिला। खाना पीना, मिठाई, दाल, रोटी, सब्जी, खीर, पूरी, हलवा। इससे सुख मिलता है। और गाय की जाति मिली, गधे की मिली। जाओ घास चारा खाओ। खे घस में क्या मिलता है? उसको तो फिर भी मिलता होगा थोड़ा बहुत। आपको तो नहीं मिलेगा। तो जैसी जाति, वैसा भोग, आयु। यह सब कर्मों से मिलता है। पर ईश्वर इन भोग के चक्कर में, सुख दुख के चक्कर में नहीं आता। वो सांसारिक सुख दुख नहीं भोगता। इसलिए आश अपम। य था विपाक से परे।
और चौथा है आशय। आशय का अर्थ है संस्कार। क्या अर्थ है? संस्कार। जब व्यक्ति सुख भोगता है। आपने खीर पूरी हलवा मिठाई खाई। अच्छा अच्छा भोजन। अ अ अच्छे कपड़े। धुले हुए बढ़िया बिस्तर। एयर कंडीशन रूम। बढ़िया कार। फर्स्ट क्लास सुख होगा, तो आप पर उसका संस्कार बनेगा। और जब चिलचिलाती धूप में 45 डिग्री तापमान में चलना पड़े पैदल धूप में एक किलोमीटर, तब दुख होगा। होगा। तब दुख मिलेगा। खाना अच्छा नहीं मिला। दाल में नमक ज्यादा हो गया। सब्जी में नमक है ही नहीं। फिर मजा नहीं आएगा खाने में। मिर्ची ज्यादा हो गई। फिर परेशान होंगे। तो इस प्रकार से जब दुख मिलता है, तो दुख भोगने पर उसके संस्कार बनते हैं। तो जीवात्मा सुख भी भोगता है, दुख भी भोगता है। उस पर दोनों तरह के संस्कार पड़ते हैं। इन संस्कारों का नाम है आशय। आशय। ये चौथा शब्द है सूत्र का। आशय। आशय का अर्थ है संस्कार। तो जीवात्मा क्लेश के चक्कर में आता है, सकाम कर्म करता है, जाति में फसता है, सुख दुख भोगता है, फिर उस पर संस्कार भी पढ़ते हैं। तो ये चार चीजों से जो संबंध होता है, व है आत्मा। और अपरा। इन चार से कभी भी संबंध नहीं होता। तीनों काल में कभी भी नहीं होता। ना भूतकाल में कभी शरीर के चक्कर में आया ईश्वर, ना आज आया है, ना आगे आएगा। वो कभी शरीर धारण नहीं करता। कभी अवतार नहीं लेता। य खामखा भ्रांति फला रखी है। भगवान के 24 अव अ ऐसे ऐसे अवतार बता रखे हैं। सूअर के शरीर में बताओ। भगवान ने अवतार लि सूर से और कोई अच्छा शरीर नहीं मिला? बिठ था तो किसी अच्छे शरीर में बिठाते। मछली में अवतार, सर में अवतार। ऐसे ऐसे भगवान को बिठा रखा है। खराब अवतारों में। तो ये सब भ्रांति है। ईश्वर ऐसा कभी अवतार नहीं लेता। जीवात्मा लेता है। वो अपने कर्म भी करता है, फल भी भोगता है, सुखी दुखी भी होता है।
तो सूत्र में कहा चार चीजों से अपरा कभी इनके संपर्क में नहीं आया। कभी भी दुख से दुखी नहीं हुआ। भूतकाल में भी नहीं। ईश्वर कभी दुखी ना आज दुखी है, ना कभी होगा। वो सब जीवात्मा से भिन्न प्रकार का, विशेष प्रकार का जो तत्व है, उसका नाम ईश्वर है। ये है ईश्वर। इसको समर्पण करना। यह गुरु जी समझाया महर्षि पतंजलि जी ने। ठीक है। समझ में आ गया। आगे चले।
तो महर्षि पतंजलि जी ने कहा कि ईश्वर का स्वरूप और भी सुनो। उसकी और भी बहुत विशेषताए है। थोड़ी सी और बता देता हूं। 25 सूत्र देखिए। तत्र बोलिए। तत्र। रति सयम। सर्वज्ञ बजम। तत्र। उसम। और विशेषता बता रहे। तत्र। उस ईश्वर में। रति शयम। सबसे अधिक। अतिशय का अर्थ होता है अधिक। जैसे आप बोलते हैं यह तो अतिशयोक्ति है। अतिशयोक्ति सुना ना? अतिशयोक्ति मतलब ऊंची बात कह दी आपने, बढ़ा चढ़ा कर कह दी। उसको अतिशयोक्ति कहते। तो मूल रूप से अतिशय का अर्थ है अधिक। और यहां शब्द निति शयम। जिससे और अधिक ना हो। बोलिए। अर्थात सबसे [संगीत] अधिक। सबसे अधिक। भारत में एक सेठ है पहले नंबर का। एक सेठ के पास दो लाख रुपए। उससे बड़े सेठ के पास न लाख रुपए। उससे अधिक है ना? तो जिसके पास पैसे अधिक है, वो बड़ा सेठ। फ किसी पा करोड़ है, किसी के पास 100 करोड़ है, किसी के पास 2 स करोड़ है। तो बढ़ते जा रहे हैं पैसे। और जिसके पास सबसे अधिक पैसे होंगे, उसको कहेंगे नितिश। क्या कहेंगे? निर अतिशय। यह सबसे अधिक बड़ा सेट है। इसके पास पैसे सबसे अधिक। जैसे सबसे बड़ा सेट होने का कारण है सबसे अधिक धन। ठीक। धन के कारण तो सेठ बोलते है ना? और बल के कारण बलवान कहते हैं। धन के कारण धनवान कहते हैं। यह सबसे बड़ा धनवान है, क्योंकि इसके पास धन सबसे अधिक है। यह सबसे बड़ा बलवान है, क्योंकि इसके पास बल सबसे अधिक है। और जो सबसे बड़ा विद्वान हो, उसके पास क्या होगी? सबसे अधिक विद्या। अधिक होगी। तो सर्वज्ञ बीजम का अर्थ है बीज का अर्थ है कारण। सर्वज्ञ का कारण। सर्वज्ञ का कारण है ज्ञान। तो सर्वज्ञ बीजम का अर्थ क्या बना? ज्ञान। निरम। सबसे अधिक। तत्र। उसम। ईश्वर में। सबसे अधिक ज्ञान है।
तो संसार के लोगों को चेक करते जाओ। कोई तीन क्लास पढ़ा है, कोई पांच क्लास पढ़ा है, कोई 10 क्लास पढ़ा है, कोई 15 क्लास पढ़ा है। उसका ज्ञान अधिक, अधिक, अधिक होता जा रहा है। तो ढूंढते जाओ। जिस ढूंढते ढूंढते जिसमें सबसे अधिक ज्ञान मिले, समझ लेना वही ईश्वर है। जिसमें ज्ञान सबसे अधिक, वो ईश्वर है। उसको समर्पण करना। अब बताओ। सबसे अधिक ज्ञान किसी मनुष्य में है? नहीं। कोई एक विद्या जानता है, कोई दो जानता है, कोई चार जानता है। सारी विद्या तो कोई नहीं जानता। पर ईश्वर सारी विद्या जानता है। और पूरी जानता है। मनुष्य तो इतनी सी जानता है। कल पूछा था मैंने लालचंद जी से। आप सारे कपड़े जानते हैं? बोले नहीं जानता। कपड़े की पूरी जानकारी नहीं है। वैज्ञानिक को पूरा विज्ञान नहीं। मैंने वर्मा जी से पूछा था। साइंटिस्ट वर्मा जी से। मैंने कहा पूरी फिजिक्स जानते हैं? बोले नहीं। मैं तो बीच की थोड़ी सी जानता हूं। इधर की नहीं जानता। आगे की नहीं जानता। बीच में थोड़ी सी जानता हूं बस। इससे आगे मुझे नहीं पता। तो एक मनुष्य एक विद्या को भी पूरी तरह से नहीं जानता। मैथ्स वाला भी थोड़ा ही जानता है। कोई कंप्यूटर मास्टर हो, तो व भी थोड़ा ही जानता है। सारे कंप्यूटर की विद्या भी नहीं जानता। पर ईश्वर तो सारी जानता है। सब विद्याओं को जानता है। और पूरी पूरी जानता है। इसलिए उसका ज्ञान सबसे अधिक है।
तो महर्षि पतंजलि कह रहे हैं जिसमें सबसे अधिक ज्ञान हो, वो ईश्वर है। उसको समर्पण करना। एक सूत्र और पढ़ेंगे। इसी प्रसंग में 26। जिसमें ईश्वर के गुण बताए जा रहे हैं। बोलिए। स पूर्वे शम अप पूम। गुरु गुरु कालेन अनवत। स। वह। श। यह जिस ईश्वर की बात कर रहे हैं, उस ईश्वर के बारे में और सुनिए। वह। यह ईश्वर जिसकी हम बात कर रहे हैं। पूर्व शमा गुरु। सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक जितने भी गुरु हुए इस धरती पर, चाहे फिजिक्स वाले थे, केमिस्ट्री वाले थे, संगीत वाले थे, मैथ्स वाले थे, के विद्वान थे, वेद के विद्वान थे, किसी भी फील्ड के कोई भी विद्वान हुए, जितने भी आज तक गुरु हुए, ईश्वर उन सबका गुरु है। सब गुरुओं का गुरु है। सब विद्याओं में, हर विद्या जो जो व्यक्ति विवान हु, गुरु बना, शरीर धारी होकर, उस शरीर धारी गुरु का ईश्वर गुरु है। क्योंकि ईश्वर के चार वेद दिए। बिना कोई व्यक्ति विद्वान हो सकता? तो पहले सृष्टि के आरंभ में ईश्वर ने चार वेदों का ज्ञान दिया। उसम सारी विद्या दे दी। वो सबसे बड़ा गुरु हो गया। उन चार ऋषियों का वो गुरु था। फिर चार ऋषियों को बोला, तुम आगे बढ़ाओ। उन्होंने फिर आगे बढ़ाना शुरू किया। वो गुरु बन गए। फिर जिनको पढ़ाया, फिर उन्होंने और आगे बढ़ाया। तो वो गुरु बन गए। तोन सारे गुरुओं का ईश्वर गुरु है। वेदों के माध्यम से भी गुरु है। और तत्काल जब व्यक्ति पढ़ता है, विचार करता है, सीखता है, सोचता है, समझता है, तो तत्काल भी ईश्वर उसको विद्या देता है। इसलिए सब गुरुओं का वर्तमान में भी वो तात्कालिक गुरु भी है। मनुष्य गुरु से तो सीखा, ईश्वर से भी सीखा। आपके अंदर भी बहुत सारी बातें उभरती रहती है। बहुत सारी उभरती है। हां या ना? व कहां से आती है? बहुत सारी ईश्वर से आती है। आपकी समस्याओं को ईश्वर बहुत सारा समाधान करता रहता है। आपके अंदर, आपको अंदर अंदर बता देता है। बेटा ऐसा करो, ऐसा मत करो। ऐसा करोगे तो बच जाओगे, नहीं तो पिट जाओगे। ईश्वर हमको बहुत जन देता है। इसलिए हमारा सबका गुरु है। तो भूतकाल में जितने गुरु आज तक हुए, उन सबका गुरु ईश्वर है। वर्तमान में लाखों टीचर देश में और दुनिया में। यह जितने गुरु बने बैठे आज, ईश्वर सब गुरुओ का गुरु है। इन सबको भी जन देता है। और भविष्य में जब तक दुनिया चलेगी, तब तक जितने गुरु बनेंगे, ईश्वर उन सबका भी गुरु होगा। तीनों कालों में जितने गुरु, ईश्वर उन सबका गुरु है। क्यों है? क्योंकि सूत्र में आगे लिखा है कालेन अन छेदा। क्योंकि काल से व मरता नहीं है। अवद कहते हैं मृत्यु। मार डालना। अनद मृत्यु नहीं होना। तो काल उसको मार नहीं सकता। शरीर धारी गुरुओ को तो काल मार देगा। वो तो समय आएगा। 70, 80 साल, 100 साल के बाद मर जाएंगे। कोई 100 साल जी लेगा, कोई 200 साल भी, को 400 तक भी जी लेगा। मनुष्य वेद में अधिकतम आयु 400 वर्ष लिखी है। मनुष्य की अधिकतम आयु। मैक्सिमम 400 साल तक जी सकता है। आजकल नहीं। पहले कभी जीते थे। 1 स, 200 की तो आयु सुनते द्रोणाचार्य की और भीष्म पिता की। महाभारत के समय भी 50 प साल की उम्र में लड़ रहे थे। आज तो बिस्तर से नहीं उठ सकता आदमी 80 साल के बाद। 75, 90 के बाद उठना भी मुश्किल होता है। और वो तो युद्ध लड़ रहे थे। अर्जुन की उम्र बताते हैं 110 साल थी। और वो खतरनाक युद्ध लड़ रहा था 110 की उम्र में। श्री कृष्ण जी की उम्र उससे भी ज्यादा थी। वो भी भयंकर युद्ध लड़ते थे। तो खैर, कोई जमाना था जब 200 साल, 400 साल लोग जीते होंगे। अब तो वो नहीं रहा। कोई बात नहीं। फिर भी, फिर भी मनुष्य अधिकतम 400 वर्ष जी सकता है। और जब वह शरीर छूट जाएगा, तब काल उसको मार देगा। फिर व किसी का गुरु नहीं बन पाएगा। जब शरीर छूट गया, तो जब तक शरीर जीवित है, तब तक व पढ़ा सकता है, गुरु बन सकता है। पर ईश्वर तो कभी मरता ही नहीं। उसको काल मार ही नहीं सकता। उसने कभी शरीर धारण किया ही नहीं। इसलिए सब गुरुओ का गुरु है। इस सृष्टि के आरंभ से लेकर आज तक जितने गुरु हुए, और जितने वर्तमान काल में इस समय गुरु जीवित है, और इस सृष्टि के अंतिम समय तक आगे कर गुरु बनेंगे। ईश्वर इन सब गुरुओं का गुरु। और पीछे जाइए। इससे पिछली सृष्टि में भी बहुत सारे गुरु थे। ईश्वर उनका भी गुरु था। पिछली सृष्टि में जितने गुरु हुए, उन सबका गुरु था। भविष्य में अनंत काल तक जितने गुरु बनेंगे, उन सबका भी गुरु रहेगा। इसलिए ईश्वर सब गुरुओं का गुरु है। सबसे बड़ा गुरु है। य खाम मर्ख भ्रांति फैलाते रहते हैं। गुरु गो क्या बुद्धि खराब है इनकी? ईश्वर के सामने तो मच्छर भी नहीं। जैसे पहाड़ के सामने मच्छर भी नहीं है, तो ईश्वर के सामने तो कुछ भी नहीं है। गुरु ईश्वर की कृपा से हीय लोग गुरु बनते हैं, जो भी बनते, जितने भी बनते। तो जो सब गुरुओ का गुरु है, वो ईश्वर है। उसको सम करना। यह तीन सूत्र बताए महर्षि पतंजलि जी ने ईश्वर की पहचान के लिए। ठीक है जी।
पाठ को य विराम देंगे। थोड़ा समय शंका समाधान। जिनको प्रश्न पूछने हो, बोलिए। [संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]