Transcription
एक सल्तनत में एक सुल्तान था। उसका एक बेटा था जो बहुत खूबसूरत था। शहजादा की उम्र 14 बरस थी जब उसकी शादी हुई।
सुल्तान बूढ़ा हो गया था। इसलिए उसने शहजादा को सुल्तान बनाने का फैसला किया। शहजादा की पहले ही सात शादियां हो चुकी थी।
सुल्तान बनने के बाद भी शहजादा हर रोज पढ़ाई के लिए मदरसा जाता था। एक दिन जब शहजादा मदरसा जा रहा था तो उसे रास्ते में एक साकिया मिली। साकिया बहुत खूबसूरत थी। उसने शहजादा से पूछा, "ए सुल्तान, आप रोज कहां जाते हैं?"
शहजादा ने कहा, "मैं रोज इल्म हासिल करने अपने उस्ताद के पास जाता हूं।"
साकिया ने कहा, "यह तो अच्छी बात है। लेकिन क्या आपने त्रिया शख्सियत पढ़ी है?"
शहजादा ने कहा कि उसने यह कभी नहीं पढ़ी। तब साकिया ने उससे कहा कि वह त्रिया शख्सियत जरूर पढ़े और अपने उस्ताद से इसके बारे में पूछे। शहजादा ने कहा कि वह आज ही जाकर अपने उस्ताद से पूछेगा।
साकिया की बात सुनकर शहजादा गुस्से में अपने उस्ताद के पास गया। उसकी आंखें लाल थीं। उसने उस्ताद से पूछा, "उस्ताद एग्रामी, आपने मुझे त्रिया शख्सियत क्यों नहीं पढ़ाई? आपने यह बात मुझसे क्यों छुपाई?"
उस्ताद ने कहा, "बेटा, तुम त्रिया शख्सियत नहीं पढ़ सकोगे क्योंकि इसे पढ़ना खतरे से खाली नहीं होता और इसमें तुम्हारी जान भी जा सकती है।"
शहजादा ने कहा, "उस्ताद ए ग्रामी, आप इसकी फिक्र ना करें। मैं खुद इस ममलकत का सुल्तान हूं।"
शहजादा की ज़िद सुनकर उस्ताद मान गए और उसे त्रिया शख्सियत पढ़ाने लगे। शहजादा को त्रिया शख्सियत पढ़ते-पढ़ते एक साल लग गया। एक साल बाद उस्ताद ने कहा, "बेटा, अब तुम्हारी पढ़ाई मुकम्मल हो चुकी है। अब तुम घर जा सकते हो और आज से अपनी ममलकत चला सकते हो। अब तुम्हें यहां आने की कोई जरूरत नहीं है।"
जैसे ही शहजादा जाने वाला था, उस्ताद ने उसे रोक लिया और कहा, "बेटा, मैं तुम्हें एक ऐसा आला देता हूं। जब तुम इसे अपने कानों में लगाओगे तो कोई भी तुम्हें पहचान नहीं पाएगा और तुम उसे पहचान लोगे।"
शहजादा ने वह आला ले लिया। उस्ताद ने कहा, "तुम इस आला को ले जाओ और आज रात 12:00 बजे अपने महल से निकलकर जंगल की तरफ मशरिकी सिमत में जाओ। जब तुम मशरिकी सिमत में जाओ तो यह आला अपने कानों में लगा लेना और वहीं खड़ा हो जाना।"
शहजादा मान गया। शहजादा महल की तरफ चला गया। रात के 12:00 बजे जब उसकी सातों बीवियां सो गईं, तो शहजादा आला लेकर महल से जंगल की तरफ निकल पड़ा। वह जंगल में मशरकी सिमथ की तरफ गया और अपने कानों में आला लगाकर खड़ा हो गया। उसने देखा कि वही साकिया जिसने उससे पहले बात की थी, एक थाली में खाना लेकर जंगल को जा रही थी। थोड़ी दूरी पर एक सूफी अपनी झोपड़ी में रहता था। साकिया उस सूफी के पास खाना लेकर जा रही थी।
शहजादा ने देखा कि यह वही साखियां है जिसने उसे त्रिया शख्सियत पढ़ने को कहा था। लेकिन साकिया शहजादा को नहीं पहचान सकी क्योंकि शहजादा के कानों में आला लगा हुआ था। शहजादा ने सोचा कि चलो उसके पीछे चलते हैं और देखते हैं कि यह आधी रात को भोजन लेकर सूफी की झोपड़ी की तरफ क्यों जा रही है। शहजादा भी उसके पीछे छुप कर चलने लगा।
साकिया उस बाबा की झोपड़ी में पहुंच गई। उस बाबा के पास जादू की पोटली थी और वह जादूगर था। शहजादा छुप कर देख रहा था। बाबा ने साकिया से कहा, "अरे साकिया, पहले मुझे यह बता कि आज आने में इतनी देर कैसे हो गई?"
साकिया ने हाथ जोड़कर कहा, "मुफ्ती साहब, मेरी शादी हो चुकी है और मेरे शौहर मुझे ले जाने के लिए आए हैं। वे हमें कल ले जाएंगे, इसलिए मुझे उन्हें सुलाने में थोड़ी देर लग गई और यहां आने में भी देर हो गई।"
जब सूफी ने यह बात सुनी कि साकिया की शादी हो चुकी है और उसका शौहर उसे लेने आया है, तो सूफी ने कहा, "साकिया, इसका मतलब है कि तुम अपने शौहर के साथ जाना चाहती हो तो हमारे पास क्यों आई हो?"
साकिया ने कहा, "मैं आपके बगैर नहीं रह सकती। मैं आपके बगैर नहीं जी सकती।"
सूफी ने कहा, "साखिया, इसके लिए तुम्हें एक काम करना होगा।" सूफी ने एक बड़ा चाकू निकाला और साखिया से कहा, "साखिया, जाओ और अपने शौहर का सिर काट कर यहां ले आओ। अपने इस शौहर को मार दो जो हमारे और तुम्हारे दरमियान दरार बन रहा है। तब मैं तुम्हें रख लूंगा और तुमसे शादी करूंगा। तुम्हें अपनी बीवी बनाऊंगा।"
बगैर कुछ सोचे संजय साकिया ने वह चाकू ले लिया और दौड़ते हुए अपने घर गई। उसका शौहर सो रहा था। वहां जाकर उसने अपने शौहर का सिर काट दिया और उसका सिर लेकर सूफी के पास आई। शहजादा उसके पीछे-पीछे उसका सारा कारनामा देख रहा था।
जब सूफी ने देखा कि वह अपने शौहर को मारकर उसका सिर यहां ले आई है, तो सूफी को बहुत गुस्सा आया और उसने उसे लात मारी और कहा, "भाग जाओ यहां से! जब तू अपने शौहर की नहीं हो सकी जिसके साथ तूने सात फेरे लिए, तो तू मेरी क्या होगी? जल्दी भाग जाओ यहां से! अगर तुम मेरे पास दोबारा आई तो मैं तुझे जिंदा नहीं छोडूंगा।"
सूफी की यह बात सुनकर उस साकिया को ऐसा लगा जैसे उसके पैरों तले जमीन खिसक गई हो। फिर वह अपने शौहर की कटी हुई गर्दन घर ले आई और उसकी गर्दन जोड़ देती है और वहीं बैठ जाती है। अधर जैसे ही सुबह हुई, वह अपने शौहर के पास बैठकर रोने लगी और चिल्लाने लगी, "देखो, देखो, किसी ने मेरे शौहर की हत्या कर दी!"
लेकिन रात में उस साखिया का सारा करनामा शहजादा देख चुका था। अधर सारे कस्बे वाले साकिया के घर जाते हैं और उसके शौहर की लाश को लेकर कस्बे के बाहर जाते हैं, उसका दाह संस्कार करने के लिए। वह साकिया भी पीछे से भागती हुई रोती हुई चली जा रही थी। अधर शहजादा भी जा रहे थे, जो कि अपनी ममलकत के सुल्तान बन चुके थे।
साकिया भागती हुई चिल्लाती हुई पहुंची और कहने लगी, "मैं सती बनूंगी, क्योंकि अगर मेरे शौहर ही नहीं रहे तो ऐसी जिंदगी का क्या फायदा? मैं इन्हीं के साथ सती हो जाऊंगी।"
सुल्तान को इसकी बातें सुनकर हंसी आ जाती है और सुल्तान कहता है, "त्रिया शख्सियत जाने ना कोई और कसम मेरी के हुई सती राज।"
शहजादा की यह बात और कोई तो नहीं समझ पाया, लेकिन वह साखिया समझ जाती है। वह कहती है, "सुल्तान साहब, आप हमारे ऊपर यह बात कह रहे हैं। लेकिन चलिए कोई बात नहीं, मैं सती हो जाऊंगी।"
लेकिन साकिया जाते-जाते कहती है, "मैं तुम्हें एक बात बताती हूं।" शहजादा पूछता है, "क्या बताऊं?" साकिया कहती है, "सुल्तान साहब, आप जब चटाई पर बैठे तो चटाई को झाड़ कर बैठे।"
सुल्तान कहता है, "यह साकिया क्या कह रही है? मैं तो सुल्तान हूं। मुझे चटाई पर बैठने की क्या जरूरत है?"
साकिया कहती है, "नहीं, जब भी तुम्हें कोई जरूरत आए चटाई पर बैठने की, तो तुम चटाई को झाड़ कर बैठे।"
शहजादा कहता है, "चलो ठीक है, अगर तुम कह रही हो तो मैं ऐसा ही करूंगा।" और यह कहने के बाद वह अपने शौहर के साथ सती हो जाती है। शहजादा उनका आखिरी संस्कार करवा कर अपने घर आ जाते हैं।
इसी तरह पूरा दिन बीत गया। अधर जब दूसरी रात आई, तो अपने उस्ताद के कहने के मुताबिक उसने वहीं आला कान में लगाया और मशरिकी सिमत की तरफ उसी जगह पर जाकर खड़ा हो गया जहां पर पिछली रात खड़ा हुआ था।
दूसरी रात को शहजादा ने क्या देखा? अपनी सातों बीवियों को भोजन की थाली अपने हाथों में लेकर उसी सूफी की झोपड़ी की तरफ जा रही थीं। जैसे ही सुल्तान ने अपनी सातों बीवियों को उस सूफी की झोपड़ी की तरफ जाते हुए देखा, तो शहजादा के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह अपने मन में सोचने लगा कि यह क्या चक्कर है?
तब उनमें से एक रानी शहजादा को देख लेती है। लेकिन रानियों ने अपने शौहर शहजादा को नहीं पहचान पाया, क्योंकि शहजादा अपने कानों में आला लगाए हुए था। आला लगाने की वजह से सुल्तान को कोई पहचान नहीं पाता था। उनमें से एक रानी कहती है कि यह लड़का इतनी रात को यहां क्यों खड़ा है? तब रानियों ने उस लड़के को अपनी तरफ बुलाया और कहा, "कृपया आप हमारी मदद करें। इस सामान को उस झोपड़ी तक ले चलो।"
बगैर कुछ सोचे संजय शहजादा ने वह थाली अपने हाथों में ले ली और अपनी रानियों के साथ झोपड़ी तक जाने लगा। जब सात रानियां और शहजादा उस सूफी की झोपड़ी में पहुंचते हैं, तो शहजादा कुछ भी नहीं बोल रहा था, क्योंकि शहजादा देखना चाहता था कि उनके प्यार में ऐसी क्या कमी है जो उसकी सातों रानियां उस सूफी के पास आती हैं और उस सूफी के पास ऐसा क्या है जो उसकी सातों रानियां यहां रहती हैं। शहजादा छुपकर यह सब जानना चाहता था।
अधर जब वह सातों रानियां शहजादा को लेकर सूफी के पास पहुंचीं, तो मुफ्ती शहजादा को देखकर कहता है, "यह कौन है?" तो सातों रानियां कहती हैं, "मुफ्ती साहब, यह बालक हमें रास्ते में मिला। इसने हमारी मदद की तो हम इसे अपने साथ ले आए।" रानी कहती है, "एक काम करते हैं। इसे आज रात यहीं रहने देते हैं। कल सुबह होते ही यह चला जाएगा।"
वह सूफी उनकी बातों को मान लेता है। वह सूफी अपने शागिर्द को बुलाता है और उससे कहता है, "आज रात के लिए इस बालक के रुकने की तैयारी कर दो।" वह शागिर्द शहजादा को लेकर एक कमरे में जाता है। उस कमरे में एक चटाई बिछी हुई थी। शागिर्द कहता है, "देख भाई, आज तुझे चटाई पर सोना पड़ेगा।" वह शागिर्द शहजादा को इतना कहकर वहां से चला जाता है।
शहजादा उस कमरे में अकेला पड़ जाता है। वह अपने मन में सोचता है कि आज तो नौबत आ ही गई चटाई पर सोने की। चलो कोई बात नहीं। आज की रात हम चटाई पर ही गुजार लेंगे। शहजादा जैसे ही चटाई पर बैठने ही वाला था, उसे साकिया की बात याद आ गई। वह सोचने लगा कि साखिया ने मुझसे कहा था कि जब भी तुम्हें चटाई पर बैठने की जरूरत आए, तुम चटाई को जरूर झाड़ लेना। चलो आज पहले झाड़ ही लेते हैं। हो सकता है इसका कोई राज हो।
जैसे ही सुल्तान ने चटाई उठाई, तो उसने क्या देखा? उसने देखा कि एक बहुत बड़ा खौफनाक कुआं है। जब उस कुएं को देखा, तो सुल्तान के होश उड़ गए। सुल्तान उस कुएं के अंदर झांक कर देखता है। सुल्तान को अंदर बहुत सारे कैदी दिखाई देते हैं, जिन्हें उस सूफी ने अंदर कैद करके रखा था। उन कैदियों में से एक आदमी ने शहजादा को पहचान लिया। उसने शहजादा से कहा, "शहजादा, आप यहां कैसे आ गए?"
शहजादा कहता है, "धीरे बोलो। नहीं तो सब पोल पार्टी खुल जाएगी।" तब सभी कैदियों ने कहा, "सुल्तान साहब, आप यहां से भाग जाइए। हम तो यहां से निकल नहीं पाए। लेकिन आप यहां से भाग जाइए, तो आपका भी यही हाल हो जाएगा जो कि हमारा हुआ है। आप भी यहां फंस जाएंगे। आपको भी पकड़ कर यह सूफी इसी में डाल देगा। आप जितना जल्दी हो सके यहां से भाग जाइए।"
सुल्तान जब उस कमरे के अंदर गया था, तो उसने अपने कान में से आला निकाल लिया था और जब सुल्तान वहां से भागा, तो अपने कान में आला लगाना भूल ही गया। शहजादा को भागते हुए उन रानियों ने और सूफी ने देख लिया था। रानियों ने जब सुल्तान को भागते हुए देखा, तो रानी कहती है, "यह तो हमारे शौहर हैं। वह मुफ्ती से कहती है, "मुफ्ती साहब, अब तो हमारी सारी पोल पार्टी खुल जाएगी। यह तो हमारे शौहर हैं और वह भागे जा रहे हैं। उन्होंने हमें यहां देख लिया है। अब हमारा क्या होगा?"
और सूफी कहता है, "तुम यहां क्या देख रही हो? जल्दी जाओ और अपने शौहर को पकड़ कर लाना।" तो रानियां शहजादा को पकड़ने के लिए दौड़ी-दौड़ी जाती हैं। लेकिन वह शहजादा, जो सुल्तान था, इतना तेज था कि वह अपने महल जा पहुंचा। घबराई रानियों के तो होश उड़ गए। फिर वह वापस उसी बाबा के पास आती हैं और बाबा से कहती हैं, "मोहतरम, अब तो हमारे शौहर हमें जिंदा नहीं छोड़ेंगे। हम जैसे ही घर जाएंगे, वह हमारी जान ले लेंगे। मुफ्ती, आप हमें बचा लीजिए। इसका कोई इलाज कीजिए।"
तब जाकर वह सूफी रानियों को एक जादुई कील देता है और कहता है कि जब तुम जाओ तो अपने शौहर को बहला फुसला कर उसके माथे में यह जादुई कील घुसा देना। यह तुम्हारे शौहर को ढेर बना देगा और साथ मिलकर उसे मार देना। बस कहानी खत्म हो जाएगी।
वह सातों रानियां सूफी की बात मान लेती हैं और जादुई कील लेकर महल आती हैं। वह सात रानियां आपस में मशवरा करती हैं कि सुल्तान सबसे ज्यादा मोहब्बत सबसे छोटी वाली रानी को करते हैं। तो वह रानियां मिलकर जादू वाली कील छोटी रानी को दे देती हैं और कहती हैं, "यह लो, तुम्हारा काम है। तुम किसी भी तरह शहजादा के सिर में यह कील गाड़ देना।" तो छोटी वाली रानी कहती है, "ठीक है।" और छोटी वाली रानी कील ले लेती है।
जब सुल्तान ने उन सातों रानियों को आते हुए देखा, तो गजब में कहा, "पहले तुम यहीं रुको, पहले मुझे यह बताओ कि हमारी ममलकत में और मुझ में ऐसी क्या कमी है कि तुम आधी रात को उस सूफी के पास जाती हो? इसका क्या सबब है?"
सातों रानियां हाथ जोड़कर कहती हैं, "महारब, हमें माफ कर दीजिए। हमें लगता है कि उस सूफी बाबा ने हम पर कोई जादू टोना कर दिया था, इसीलिए हमसे ऐसी गलती हो गई। हगे से ऐसी गलती हमसे कभी नहीं होगी।"
छोटी रानी की ऐसी बातें सुनकर सुल्तान उनकी बातों को मान लेता है, क्योंकि वह सुल्तान छोटी रानी से बहुत मोहब्बत करता था। सुल्तान भी सोचने लगता है कि शायद उस बाबा ने ही इन पर कोई जादू टोना किया होगा और अपनी सातों बीवियों को माफ कर देता है और कहता है, "ठीक है, तुम अपने कमरे में चली जाओ।"
सबसे छोटी रानी, जिसे शहजादा बहुत मोहब्बत करता था, वह शहजादा को खाना खिलाती है और शहजादा को सुला देती है। जब वह सुल्तान सो गया, तो वह रानियां भी वहीं आ जाती हैं। सबसे छोटी रानी, जो थी, वह जादुई कील निकालती है और सुल्तान के माथे में घुसा देती है। सुल्तान पूरी तीव्र से उठा, लेकिन इतना वक्त में वह ढेर बन चुका था। अब उस सुल्तान में इतनी ताकत नहीं थी कि उन सातों रानियों से मुकाबला कर सके। वह सात रानियां उस सुल्तान को पकड़ने लगीं।
सुल्तान फिर भी हिम्मत ना हारी और अपने महल की खिड़की से कूद कर सुल्तान भागते-भागते अपने उस्ताद के पास पहुंच गया और कहने लगा, "उस्ताद जी, मुझे माफी दीजिए। मेरी जान बचाइए, नहीं तो मैं मर जाऊंगा।"
उस्ताद कहते हैं, "बेटा, मैंने तुमसे कहा था कि तुम त्रिया शख्सियत मत सीखो। इसमें जान भी जा सकती है। देखा इसका नतीजा।"
शहजादा कहता है, "उस्ताद ए ग्रामी, मुझे माफ कर दो और जल्दी मेरी जान बचाओ, नहीं तो मैं मारा जाऊंगा। मेरी बीवी ने मेरे सिर में जादुई कील ठोकी है, जिसकी वजह से मैं ढेर बन चुका हूं।"
उस्ताद ने जब गौर से देखा, तो कहा कि यह वही कील है जो सूफी ने दिया है। "मैं तुम्हें अब नहीं बचा सकता।"
शहजादा कहता है, "नहीं, उस्ताद गिरामी, ऐसा मत कहिए। मैं आपका शागिर्द हूं। आपका फर्ज है मेरी जान बचाना।"
तो उस्ताद कहते हैं, "बेटा, मैं तुम्हें बचा तो नहीं सकता, लेकिन एक इलाज है।" शहजादा पूछता है, "क्या इलाज है?" तब अपने शागिर्द की ऐसी बात सुनकर उस्ताद कहते हैं कि "हम तुम्हें तोता बना देंगे और जब हम तुम्हें तोता बना देंगे, तो तुम जन्नत फिरदौस जाकर रहना, क्योंकि जन्नत फिरदौस पर जादू नहीं चलता और तुम्हें जब बहुत मोहब्बत करने वाली औरत मिलेगी, तो तुम फिर से शहजादा बन जाओगे।"
शहजादा कहता है, "ठीक है, उस्ताद गरामी, आप हमें तोता बना दीजिए।" तो वह उस्तादगरामी उसे तोता बना देते हैं और वह तोता बनने के बाद वहां से उड़ा और जन्नत फिरदौस, जहां तोते रहते थे, वहीं जाकर रहने लगा।
सातों रानियां उस शहजादा को ढूंढ रही थीं। जब शहजादा ना मिला, तो फिर उस बाबा के पास जाती हैं और कहती हैं, "बाबा जी, वह रात को सुल्तान भाग चुका है। आप अपनी पोटली निकालिए और देखिए कि वह कहां है।" तो वह मुफ्ती अपनी पोटली खोलता है और देखने लगता है कि वह शहजादा अभी तक तोता बनकर सुल्तान के घर में रह रहा है।
वह सूफी यह बात रानियों को बताता है, तो रानियां कहती हैं, "सवाई, अब क्या करें?" वह सूफी कहता है कि "अब तुम अपने राजमहल में जाओ और जाकर ऐलान कर दो कि जो भी तोता पकड़ कर लाएगा, हम उसे पांच सोने के सिक्के देंगे।"
इस ममलकत के जितने भी बाजबाज थे, वह तोता पकड़ने के लिए चारों तरफ घूमने लगे और जो भी तोता पकड़ते, वह रानी के पास जाते और पांच सोने के सिक्के ले लेते और वहां से चले जाते और वह सात रानियां उस तोते को मार देती थीं। ऐसे ही धीरे-धीरे बहुत वक्त निकल गया और वह शहजादा, जो तोता बनकर जहां गया था, वहां सारे तोतों को बहुत अच्छी-अच्छी बातें करता था। उन्हें बहुत इल्म की बातें बताता था। तो सारे तोतों को लगा कि यह तोता तो बहुत समझदार है। यह तोता तो बहुत अच्छी-अच्छी बातें करता है। इसे हम अपना सुल्तान बना लें। और सभी तोते मिलकर उसे सुल्तान बना लेते हैं। शहजादा सभी तोतों का सुल्तान बन जाता है और वहीं छुप कर रहने लगता है।
एक बाजबाज तोता पकड़ते-पकड़ते जन्नत ए फिरदौस के उस दरख्त के पास पहुंच जाता है, जहां पर वह शहजादा तोता बनकर छुप कर रहता था। जब उस बाजबाज ने इतने सारे तोते देखे, तो अपने मन में सोचा कि अगर हम इतने सारे तोते पकड़ कर रानी के पास ले जाएंगे, तो हमें बहुत सारी सोने के सिक्के मिल जाएंगे। लेकिन वह बाजबाज सोचता है कि मैं इतने सारे तोते पकड़ कर कैसे ले जाऊं।
फिर अगली सुबह सारे तोते दाना चुगने के लिए उड़ जाते हैं। तब वह बाजबाज उस दरख्त के पास जाकर उसकी डालों पर चाकू से कट लगा देता है, जिस वजह से उस दरख्त की गूद निकलती है और उसी गोंद की वजह से तोते उस दरख्त पर चिपक जाने वाले थे। बाजबाज वहीं छुप कर बैठकर यह नजारा देखने के लिए इंतजार करता है।
और जब शाम हुई, सारे तोते उड़कर वापस उसी दरख्त पर जा बैठे, तब उन सबके पर और पांव उस गोंद में फंस गए और वह सभी दरख्त की शाखाओं पर चिपक गए, क्योंकि दरख्त पर हर जगह गोंद ही गोंद थी। अब सारे तोते उस गोंद में पूरी तरह से चिपक गए थे। उनके साथ शहजादा तोता भी शामिल था। तब वह सभी अपने उस्तादरामी शहजादा तोते से अपनी-अपनी जान बचाने के लिए मशवरा मांगने लगे और एक तोता कहता है, "ऐ सुल्तान, आप कुछ भी करो, लेकिन हमें आजाद करो, नहीं तो सुबह बाजबाज आएगा और हमें पकड़ कर ले जाएगा और मार डालेगा।"
तब शहजादा उन सबको खामोश करके कहता है, "मेरी बात को गौर से सुनो। जब सुबह बाजबाज आएगा, तब तुम सब मरने का नाटक करो, जिस वजह से वह बाजबाज तुम्हें निकाल कर जमीन पर रख देगा। इसे ऐसा लगना करना चाहिए कि सारे तोते मर चुके हैं। वक्त रहते तुम सब उड़कर दूसरी मुहफ्फूज जगह पर जाना। बाकी मैं सब कुछ संभाल लूंगा।"
फिर वह सभी अपनी मंसूबाबंदी के मुताबिक दरख्त पर लटक गए, मानो जैसे सभी मर चुके थे। फिर दूसरी सुबह जब बाजबाज वहां आता है, तो वह देखता है कि सारे तोते मर चुके हैं और उसे इस बात का दुख हो रहा था कि सारे तोते मर चुके हैं। इसलिए वह उन सबको दरख्त से निकालकर जमीन पर रख देता है। तब सही मौका देखकर सारे तोते झट से उड़ गए।
वहीं दूसरी तरफ उसने देखा कि जो शहजादा था, जो तोता बना हुआ था, वह वहीं पर रह गया और नीचे जितने भी तोते थे, वह सभी उड़कर भाग गए। बाज बाज ने सोचा, "अरे यह क्या हुआ? इस दरख्त पर सिर्फ एक ही तोता है, जो कि मरा लटका हुआ है और जितने तोते मैंने छुड़ाकर नीचे फेंके, वह सभी उड़कर भाग गए।" बाजबाज ने सोचा, "इसका मतलब है कि इन सारे तोतों ने मिलकर मेरे साथ धोखा किया है।"
अब शहजादा, जो तोता बना हुआ था, वही सिर्फ दरख्त पर लटका हुआ था। वह बाजबाज कहता है कि "यह सब तुम्हारी चाल है। चलो, अब मैं तुझे ले जाऊंगा और रानी के हाथ बेच दूंगा और मुझे पांच सोने के सिक्के मिल जाएंगे।"
और अधर वह बाजाबाज उस तोते को बेचने के लिए रानी के पास जाने लगता है। रास्ते में वह तोता कहता है, "तुम मुझे कहां ले जा रहे हो?" तो वह बाजबाज कहता है, "मैं तुझे बेचने के लिए रानी के पास ले जा रहा हूं। अगर मैं तुझे वहां बेच दूंगा, तो मुझे पांच सोने के सिक्के मिलेंगे।"
शहजादा कहता है, "कि मैं अगर तुम्हें 500 सोने के सिक्के दिला दूं, तो क्या तुम मुझे नहीं बेचोगे?"
बाजबाज कहता है, "तुम मुझे 500 सोने के सिक्के कैसे दिलाओगे?"
तोता कहता है कि "सुल्तान के जन्नत फिरदौस बाजार में ही बेचो। मूल्य में मैं खुद बताऊंगा।"
बाजबाज उस तोते की बात मान लेता है और रानी के पास बेचने की जगह सुल्तान की ममलकत के मेले में तोते को बेचने चला जाता है और सुल्तान की ममलकत में यह कायदा था कि अगर किसी शख्स का सामान शाम तक ना बिके, तो वह सुल्तान खुद आकर उसे...