Transcription
बहुत दिन हुए कि एक द्वीप [संगीत] पर नसीर शाह की हुकूमत थी। नसीर शाह इंसाफ पसंद और गरीब परवर बादशाह था। बादशाह के तीन बेटे और दो बेटियां थी। लेकिन खुदा की कुदरत के तहत एक बेटी के सिवा सब एक-एक करके बादशाह को [संगीत] जुदाई का दाग दे गए।
यह लड़की बादशाही की नहीं बल्कि राया को भी अजीज थी। क्योंकि वह अकेली [संगीत] ही तख्त की वारिस थी और इसी के दम से शाही खानदान का नाम जिंदा रह सकता था। इसीलिए गरीब अमीर सभी उसकी उम्र के [संगीत] लिए दुआ करते थे।
शहजादी जब 15 साल की उम्र को पहुंची तो अचानक सख्त बीमार पड़ गई और बादशाह ने मुल्क के मशहूर तबीब [संगीत] और तजुर्बाकार हकीम को बुलावा भेजा। पंडितों और वेदों को तलब [संगीत] किया। लेकिन शहजादी किसी के इलाज से सेहतियाब ना हो सकी। और सब ने यह [संगीत] कह दिया कि शहजादी के बचने की कोई उम्मीद नहीं है। इसीलिए दवा [संगीत] के बजाय दुआ की जाए।
बादशाह इस बात को सुनकर सजदे में गिर पड़ा और रो-रो कर खुदा से शहजादी [संगीत] की जिंदगी की भीख मांगने लगा। रोते-रोते उसकी आंखें सुर्ख हो गई। भीख मांगते [संगीत] मांगते आवाज बैठ गई और उसके चेहरे से वहत टपकने लगी। उसने मंजों को हुक्म दिया। मेरे महल की दीवारों को गिरा दो। खजाने को लूट लो और तख्त और ताज को समंदर में डुबो दो। कुदरत मेरे महल [संगीत] को वीरान करना चाहती है। उसे वीरान कर दो।
वजीर और अमीर दम बदम बेखद थे कि वह क्या करें कि एक पागल ज्योतिषी [संगीत] महल के दरवाजे पर पहुंचा और कहने लगा कल सुबह सवेरा जो शख्स सबसे पहले शहर के दरवाजे में दाखिल होगा उसे पकड़ कर महल में ले आओ। शहजादी उसका इलाज करने से तंदुरुस्त हो [संगीत] जाएगी। दारबान ने यह बात बादशाह तक पहुंचा दी और उसने वजीर को हुक्म दिया कि आधी रात से शहर के दरवाजे पर पहरा बिठा दिया जाए और पहले शख्स को इज्जत और इकराम के साथ महल में लाया जाए।
[संगीत] यह ज्योतिषी मुल्क का मशहूर ज्योतिषी था। उसकी भविष्यवाणी कभी झूठी [संगीत] साबित नहीं हुई थी। लेकिन जब से उसकी बीवी और बच्चे मरे वो पागल हो [संगीत] गया था और 24 घंटे सड़कों पर फिरता रहता था। बच्चे छेड़ते वह पत्थर मारता गालियां उबकता उसे ना खाने की फिक्र थी [संगीत] ना पीने का गम और ना कपड़ों का होश इसलिए सब हैरान थे कि ऐसे पागल को शहजादी की बीमारी का इल्म कैसे हुआ जो उसने यह भविष्यवाणी [संगीत] की।
शहर के दरवाजे पर पहरा तो आधी रात से ही बिठा दिया गया था लेकिन बादशाह फज्र की नमाज पढ़कर खुद भी वहां पहुंच [संगीत] गया और आने वाले का बेचैनी से इंतजार करने लगा। वह अपनी प्यारी [संगीत] बेटी की सेहत के लिए सब कुछ करने को तैयार था। वरना वह कब इस तरह पहरेदार के साथ खड़ा हो सकता था।
सूरज मशरिक से उगा और [संगीत] एक फकीर मगरब से आता हुआ दिखा। नंगे पांव, नंगे सर, जिस्म पर एक कंबल लपेटा [संगीत] हुआ, लाल कंबल, गहरा लाल जैसे खून। नसीर शाह को लाल रंग से बहुत नफरत [संगीत] थी। वह कहता था कि लाल रंग इंसान को जालिम और बेरहम बना देता है। लाल रंग आंखों में समाया जाए तो आदमी आदमी का खून करने से भी ना झिझके। इसीलिए [संगीत] इस द्वीप में लाल रंग की कोई भी चीज मौजूद नहीं थी। लाल रंग की सब्जियों, [संगीत] फलों और फूलों को लोग तरसते थे। लेकिन मजबूर थे क्योंकि लाल रंग [संगीत] की कोई चीज रखने वाले को मौत की सजा देने का हुक्म था। इसीलिए वजीर फकीर का लाल कंबल देखकर लोग हैरान रह गए। वह कभी बादशाह की नजरों [संगीत] को देखते कभी फकीर के कंबल को।
फकीर दरवाजे में दाखिल हुआ तो बादशाह [संगीत] ने उससे कहा मुझे इस मुल्क का बादशाह कहते हैं। लेकिन इस वक्त मैं एक भिखारी हूं। अगर [संगीत] तुम मेरे साथ चलकर शहजादी का इलाज कर दो तो मैं तुम्हें मुंह मांगा इनाम दूंगा। फकीर हंसकर बोला मैं एक मामूली साधु हूं। मुझे हिकमत से कोई वास्ता नहीं है। [संगीत] फिर मैं शहजादी साहिबा का इलाज कैसे कर सकता हूं?
बादशाह ने कहा अगर तुम इसका इलाज नहीं कर सकते तो चलकर अपने हाथ से पानी ही पिला दो। अगर कुदरत ने तुम्हारे हाथ में शिफा लिखी है तो वह जरूर [संगीत] ठीक हो जाएगी। फकीर ने कहा, मुझे क्या इंकार हो सकता है? चलिए मैं चलता हूं। फिर बादशाह बोला, मैं तुम्हारी इस मेहरबानी को कभी ना भूलूंगा। लेकिन एक [संगीत] अर्ज और भी है। अगर तुम उसे कबूल कर लो, तो मुझ पर बड़ी इनायत होगी। फकीर ने कहा, बाबा हम इनायत के लिए नहीं बल्कि दूसरों की सेवा के लिए पैदा हुए हैं। कहो क्या चाहते हो?
बादशाह ने कहा, मेरे मुल्क में लाल रंग के इस्तेमाल की [संगीत] इजाजत नहीं है। इसलिए अगर इस कंबल को उतार कर फेंक दो तो मैं इससे बेहतर और कीमती कंबल तुम्हें [संगीत] देने के लिए तैयार हूं। फकीर यह सुनकर बोला यह हरगिज़ नहीं हो सकता। यह कंबल मुझे अपनी जान से भी ज्यादा अजीज है। मैं तुम्हारे मुल्क को छोड़ सकता हूं, [संगीत] लेकिन इस कंबल को ना उतार सकता हूं।
बादशाह खामोश हो गया और उसे अपने हमराह [संगीत] सवारी में बिठाकर महल में ले गया। शहजादी के चेहरे पर मौत की छाई [संगीत] हुई थी। आंखें गफलत से बंद थी और जिस्म कमजोरी के बास ठंडी पड़ गई थी। फकीर ने [संगीत] गिलास में पानी भरकर खुदा से दुआ मांगी और चमचा से दो चार कतरे शहजादी के हलक में टपकाए। खुदा की कुदरत के तहत शहजादी ने थोड़ी ही देर में आंखें खोल दी।
फकीर शहजादी के सिराहाने बैठा रहा। दिल ही दिल में अल्लाह को याद करता और कहता ऐ मौला मेरे यहां आने की लाज तेरे [संगीत] हाथ है। तू इस शहजादी को सेहत अता फरमा और उसकी उम्र दराज कर दे। फकीर शाम तक शहजादी को थोड़ी-थोड़ी देर के बाद दो-दो चार-चार कतरे पानी के देता रहा। मगर मगरिब के वक़ शहजादी के लबों पर मुस्कुराहट दौड़ने लगी। तो बादशाह ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए कहा, बेटी तबीयत कैसी है? शहजादी [संगीत] मुस्कुराते हुए बोली, ठीक है हाजूर।
शहजादी की जुबान से यह बात सुनकर बादशाह [संगीत] बहुत खुश हुआ और उसी वक्त बारगाह इलाही में सजदा अदा किया। फिर उसने फकीरों, [संगीत] मुफलिसों और मोहताजों में रोटी, कपड़ा और अशरफियाओं तकसीम की। शहजादी तीन-चार रोज में बिस्तर से उठकर [संगीत] खड़ी हो गई और पहले की तरह होश हवास में नजर आने लगी।
बादशाह ने फकीर के लिए [संगीत] महल के करीब ही एक छोटा सा मकान बनवा दिया और फकीर उसमें रहने लगा। [संगीत] एक रोज वजीर ने कहा आलमपनाह लोगों को शिकायत है कि [संगीत] फकीर कानून के खिलाफ लाल कंबल जिस्म से लपेटे हुए फिरता है लेकिन उसे मौत की सजा नहीं दी जाती।
बादशाह ने कुछ सोचते हुए कहा, शिकायत बजा है। लेकिन उस फकीर ने हम पर एहसान किया है। अगर हम उसे मौत की सजा दें तो दुनिया क्या कहेगी? एक वजीर बोला आलम पनाह इस नाचीज का ख्याल [संगीत] है कि फकीर का कंबल गायब करा देना चाहिए और जब वह शिकायत करे तो उसे बदले में किसी और रंग का एक कीमती कंबल दे दिया जाए।
बादशाह को उसकी यह [संगीत] तजवीज पसंद आई और उसने यह काम उसी वजीर के सुपुर्द कर दिया। इत्तेफाक से वजीर की बीवी ऐसे कामों में बहुत होशियार थी। उसने बीवी को इनाम का लालच देकर राजी कर लिया और वह उसी रात चुपके से फकीर के [संगीत] मकान में दाखिल हो गई और कंबल उठा लाई। लाल ऊन का वह कीमती कंबल [संगीत] देखकर वजीर की बीवी बहुत खुश हुई और रात को उसी कंबल को ओढ़कर सो रही।
सुबह वह वजीर से पहले उठी और कंबल लपेट कर एक तरफ [संगीत] रख दिया। वजीर जब सोकर उठा तो उसने पूछा फकीर ने तुम्हें देखा तो नहीं? बीवी बोली नहीं। मुझे तो ना देखा। मैं तो छिपी-छुपा आई थी। वजीर ने हैरानी से बीवी की तरफ [संगीत] देखा और कहा तुम्हारी जुबान को क्या हुआ? तुतला कर क्यों बोल रही हो? बीवी बोली मैं तुतली तुतली क्या हो गई है?
वजीर समझ गया कि बीवी मजाक [संगीत] में तुतला कर बोल रही है। इसलिए उसने ज्यादा कुछ ना कहा। उसने कंबल खोलकर अच्छी तरह देखा। फिर ओढ़कर कमरे [संगीत] में टहलने लगा। बीवी बोली बहुत गर्म है यह तुम रख लो किसी और को ना देना। वजीर ने झुंझुलाकर कहा चुप रहती हो या बकती [संगीत] ही जाती हो। बीवी बोली तुम हकला हकला कर क्यों बोल रहे हो? वजीर ने कहा मैं क्या हकला हूं। बीवी हंसकर बोली और नहीं तो और क्या?
वजीर ने कंबल उतार [संगीत] कर एक तरफ फेंक दिया और सोचने लगा कि यह चोरी का कंबल है। शायद इसीलिए बीवी तुतली [संगीत] हो गई है और मैं हक ला गया हूं। थोड़ी देर बाद दूसरा वजीर आया। लेकिन उसने शर्म के मारे [संगीत] बात ना की बल्कि कंबल उठाकर उसे दे दिया। वो उसे छिपाकर बड़े वजीर के पास [संगीत] ले गया। कंबल देखकर बड़ा वजीर बहुत खुश हुआ। फिर सबने बारी-बारी उसे ओढ़ कर देखा और तय करके एक साफ कपड़े में लपेटा और बादशाह के पास ले गए।
बादशाह [संगीत] ने पूछा इसमें क्या है? बड़े वजीर ने अर्ज किया हुजूर इतम तुम बल है। बादशाह ने चौंक कर उसकी तरफ देखा और कहा क्या कह रहे हो? साफ-साफ कहो। वजीर ने कहा थाप थाप तो अर्ध तुतला है। बादशाह ने दूसरे वजीर से कहा तुम कहो यह क्या कहना चाहता है? [संगीत] उसने कहा आलमपनाह यह कहता है कि इसमें कंबल है। तीसरे वजीर ने उसकी कोहनी मारते हुए कहा, ठीक ठीक [संगीत] बोलो।
बादशाह ने गुस्से से कहा, "आप लोगों ने क्या मजाक बना रखा है?" एक तुतला बोलता है तो दूसरा हकला लाता है। क्या तुम्हें मजलिस के आदाब का ख्याल नहीं है? बड़े वजीर ने झुक कर कहा, मजलिस के आदाब का [संगीत] तो ख्याल है लेकिन हम ततलाकर आप सुनते ही नहीं। बादशाह गुस्से से कांप उठा और चिल्लाकर कहा कहने के बावजूद तुतलाकर बात कर रहे हो। निकल जाओ यहां से। मां बदौलत को ऐसे वजीरों की जरूरत नहीं।
वजीर हैरान हो परेशान के। सरख कंबल ओढ़ने से वो तुतली [संगीत] और हकलें क्यों हो गए हैं? लेकिन उनके पास इसका इलाज ना था। वो महल से निकल कर अपने अपनेप घरों को चल दिए और बादशाह ने खादिम को हुक्म दिया [संगीत] इस कंबल को खोलकर महल की छत पर फैला दो ताकि इसे धूप लग जाए और [संगीत] कल सुबह तय करके किसी संदूक में रख दो।
खादम फकीर के कंबल को छत पर [संगीत] ले गए और फैलाकर नीचे चले आए। शहजादी हर रोज सुबह सवेरे महल की छत पर जाती और चारों तरफ फैले हुए सब्जी को देखती। दूर बहते हुए दरिया का नजारा करती और सूरज निकलने के बाद नीचे उतर आती। शहजादी अपनी आदत के मुताबिक आज भी छत पर गई लेकिन सरख [संगीत] कंबल देखकर दरिया और सब्जी को भूल गई। सरख कंबल उसे बहुत [संगीत] ही भला मालूम हुआ और वह खुशी-खुशी उस पर बैठ गई।
शहजादी को बैठे हुए ज्यादा देर ना गुजरी थी [संगीत] कि उसे यूं महसूस हुआ जैसे वह खुद ब खुद उससे इधर-उधर देखा तो सचमुच वो छत से एक गज [संगीत] ऊपर उड़ चुकी थी। शहजादी का दिल धक से रह गया। चेहरा उतर गया। वो कंबल से छलांग मारने के लिए आगे बढ़ी। लेकिन इतनी देर में कंबल उसे उड़ाकर महल से दूर ले गया। कंबल आबादी पर से गुजर रहा था और लोग हैरानी से उसे देख रहे थे। लेकिन किसी की समझ में ना आता था कि यह राज क्या है।
कंबल उड़ते-उड़ते आबादी से दूर [संगीत] चला गया। नीचे पहाड़ थे। जंगल और रेगिस्तान थे। नदियां और दरिया [संगीत] थे। शहजादी ने देख देख कर सहम रही थी। बार-बार उसे ख्याल आता कि अगर वह गिर पड़े तो उसकी खैर नहीं। घबराहट और परेशानी के बाईस [संगीत] शहजादी की यह हालत थी कि वो खुदा से दुआ मांगने के लिए मुंह खोलती तो जुबान से ना [संगीत] निकलते। जिस्म ठंडा पड़ता जा रहा था और सर चकराने लगा था।
कंबल शहजादी को उड़ाकर ले जा रहा था कि शहजादी तेज [संगीत] हवा को बर्दाश्त ना कर सकी और कंबल पर लेट गई। इसके लेटते ही कंबल नीचे उतरने लगा। शहजादी [संगीत] समझ गई कि कंबल पर बैठने से हवा में ऊपर उठता है और लेटने से नीचे उतरने लगते हैं। उसने लेटे नीचे झांक [संगीत] कर देखा। पहाड़ों की ऊंची-ऊंची चोटियां, दूर तक फैला हुआ जंगल और खूंखार दरिंदे नजर आए तो वह घबरा कर बैठ [संगीत] गई और कंबल नीचे जाते-जाते ऊपर उठ गया।
शहजादी दूर-दूर तक निगाह [संगीत] दौड़ा रही थी कि आबादी नजर आए तो वो नीचे उतर जाए और इस मुसीबत से निजात हासिल करें। सूरज गरूब हो रहा था कि शहजादी को एक रंगीन शहर दिखाई दिया। उसकी जान में जान आई [संगीत] और कंबल जैसे ही आबादी के करीब पहुंचा वो लेट गई। कंबल की रफ्तार कम हो गई और वह आहिस्ता-आहिस्ता नीचे उतरने लगा। कंबल जमीन से लगा तो शहजादी करवट बदलती हुई [संगीत] कंबल से फर्श पर आई और उठकर उसे छटाई की तरह लपेटा। फिर एक तरफ रखकर इधर-उधर देखने लगी।
शहजादी थोड़ी देर के बाद सीढ़ियों से उतर कर नीचे [संगीत] एक कमरे में पहुंची। वहां एक खाली अलमारी खड़ी हुई थी। बीच में एक मेज थी और उसके बराबर फर्श पर शीशे का एक संदूक रखा हुआ था। हर चीज गर्द में अटी हुई थी। उसने पर्दे के कपड़े को घसीट कर शीशे के संदूक को साफ [संगीत] किया। संदूक में एक लाश थी। लाश किसी बूढ़े आदमी की थी। गूंजा सिर, पिछे हुए गाल और पतली-पतली सूखी हुई कलाइयां और पिंडलियां।
शहजादी ने [संगीत] कभी किसी की लाश ना देखी थी। इसलिए वह सहम कर रह गई और उसके कदम पीछे [संगीत] हटने लगे। मेज पर एक किताब रखी हुई थी। उसने पर्दे से उस किताब को भी साफ किया और खोल कर देखा। [संगीत] पहले पन्ने पर लिखा हुआ था इस किताब को उठाने वाले तुझे मेरा सलाम। शहजादी ने बरकत पलटा। लिखा [संगीत] था घबराओ नहीं। तीसरे पन्ने पर लिखा हुआ था।
मेरे मेहरबान इस शहर में प्लास्टिक का एक आदमी [संगीत] लोगों के खून कर रहा है। इस आदमी की शक्लें और सूरतें मंगोल कबीले के सरदार से मिलती जुलती हैं और इसके चार हाथ हैं। इसे मैंने बनाया है। तुम सोच रहेगे कि मैंने ऐसा जालिम आदमी क्यों बनाया? बात यह है कि मैं बूढ़ा और कमजोर आदमी अपने दुश्मनों से मुकाबला [संगीत] करने के काबिल नहीं हूं। इसलिए आदमी बनाकर अपनी रूह, अपना दिल और अपना दिमाग उसे उधार दे दिया है। जिस रोज लोग उसे जला देंगे, मैं उसी दिन जिंदा हो जाऊंगा और फांसी के तख्ते से बचा रहूंगा। उसकी तस्वीर अगले पन्ने पर [संगीत] तुम देख सकते हो। उसके जिस्म पर ईंट, पत्थर, डंडे, पिस्तौल, टोप गढ़ कोई चीज असर नहीं कर सकती। हां, अगर उसके पास आग सलाह दी जाए तो वह हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा [संगीत] और मैं जिंदा हो जाऊंगा। क्या तुम उसे जला दोगी।
शहजादी बहुत रहम दिल थी। इस इबारत को पढ़कर रोने लगी और सोचने लगी कि इस बुजुर्ग आदमी ने [संगीत] अब तक ना जाने कितने बेकस लोगों की जान ली होगी। फिर उसने आद किया कि मैं इस आदमी को जरूर जला दूंगी। मुझे अपनी जान की बाजी ही क्यों ना लगानी पड़े।
शहजादी इस [संगीत] मकान से निकलकर शहर में गई और गलियों, कूचों और बड़े-बड़े बाजारों से गुजर कर उसे मालूम हुआ कि गरीब लोग इस बुजुर्ग आदमी के डर से अपनेपने घरों में बंद पड़े रहते हैं। मजदूर मजदूरी नहीं करते। दुकानदार दुकानें [संगीत] नहीं खोलते। मुलाजिम नौकरी पर नहीं जाते। शहजादी के दिल को इस बात से बहुत दुख हुआ।
वह धीरे-धीरे [संगीत] चलती हुई एक झोपड़ी के पास से गुजर रही थी कि अंदर से बच्चों के रोने की आवाज सुनाई दी। उसके कदम [संगीत] रुक गए। उसने झोपड़ी में जाकर पूछा, क्या हुआ? यह बच्चे क्यों रो रहे हैं? झोपड़ी में रहने वाली औरत ने कहा, "च्चे भूख से मर रहे हैं। घर में एक सूखा [संगीत] टुकड़ा भी नहीं है। शहजादी ने कहा, तुम फिक्र मत करो। मैं उनके लिए खाना लाती हूं।
औरत हैरानी [संगीत] से बोली, क्या तुम्हें इस मंगोल का डर नहीं? शहजादी ने कहा, नहीं, मुझे खुदा के सिवा किसी [संगीत] का डर नहीं। और वह झोपड़ी से निकलकर एक बड़ी इमारत में दाखिल हुई। यह एक अमीर [संगीत] आदमी का मकान था। शहजादी ने अमीर की बेटी को झोपड़ी वालों का हाल सुनाया [संगीत] और उसे खाना मांगा। अमीरजादी दिल की सुकून थी। फौरन खाने का खवान लगाकर उसके हवाले किया [संगीत] और वह तेज-तेज़ कदम उठाती झोपड़ी में पहुंची। बच्चों को और उनकी मां को खाना खिलाया। खुद भी दो-चार लुकमे लिए और बर्तन लेकर वापस [संगीत] अमीरजादी के पास गई और उससे बुजुर्ग आदमी के बारे में बात की।
अमीरजादी ने कहा, बहन, इस शहर के लोगों ने ना जाने कौन सा गुनाह किया था जो बैठते-बैठते यह मुसीबत नाजिल [संगीत] हुई है। सिपाही, फौज, गढ़ हर ताकत ने इसका मुकाबला किया। [संगीत] लेकिन वह बिना किसी के काबू में ना आई। शहजादी बोली, क्या किसी को यह भी मालूम है कि यह मुसीबत कहां रहती है? उसने कहा, यह तो किसी को भी नहीं मालूम। वह तो जब चाहे बाहर निकल आती है।
शहजादी [संगीत] ने कहा, "मुझे एक डंडे के सिरे पर मिट्टी के तेल में भीगा हुआ कपड़ा बांधकर दे दो। और एक दिया, सिलाई की डिब्बी। खुदा ने चाहा तो मैं इसे हमेशा के [संगीत] लिए खत्म कर दूंगी। अमीरजादी ने हैरानी से कहा, बहन, क्या बातें कर रही हो? कल ही की बात है कि कसाई मांस बेच रहा था कि [संगीत] वह चार हाथों वाला आदमी उसके पास गया और कहने लगा दो साल हुए तूने मुझे आधा शेर मांस में तीन छोटी हड्डियां क्यों दी थी? कसाई ने कहा मैंने तो 2 साल पहले तुझसे देखा भी नहीं था। वह कहने लगा तूने 2 साल पहले ना देखा तो आज देख ले। और यह कहकर उसकी गर्दन पकड़ [संगीत] ली। कसाई के एक हाथ में छुरी थी। उसने इस मुसीबत पर कई वार [संगीत] किए। लेकिन उसकी एक मामूली सी चोट भी ना आई और देखते ही देखते उसने [संगीत] कसाई की गर्दन मरोड़ कर सड़क पर फेंक दी।
शहजादी ने कहा बात ताज्जुब की है लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि मैं भी इसका मुकाबला ना कर सकती हूं। अमीरजादी बोली अगर तुम्हें यकीन है कि तुम इसे मार सकती हो तो मैं तुम्हारा कहा करूंगी। शहजादी ने कहा आप मुझे डंडा और मिट्टी के तेल में भीगा हुआ कपड़ा दे दीजिए। अमीरजादी ने खादिमा को हुक्म देकर फौरन [संगीत] सामान मंगवा दिया।
अमीर को जब यह बात मालूम हुई तो उसने खूबसूरत शहजादी को समझाया और कहा बेटी फौज भी इसका मुकाबला ना कर सकी। [संगीत] उसने गोलियां बरसाई और वह खड़ा हुआ हंसता रहा तो वह तुम्हारे [संगीत] काबू में कैसे आ सकता है? शहजादी बोली जब तक वह मेरे सामने [संगीत] ना आए मैं कुछ ना कह सकती हूं। आखिरकार अमीर और उसकी बेटी ने हजारों दुआओं के साथ [संगीत] शहजादी को रुखसत किया और वह अमीर के मकान से निकलकर विभिन्न सड़कों और बाजारों में घूमने लगी। शहर के कोतवाल को जब शहजादी का इरादा मालूम हुआ तो उसने उसे शाबाश दी और इसके साथ-साथ खुद भी चार हाथों वाले आदमी को तलाश करने लगे।
इधर बादशाह को जब यह मालूम हुआ कि शहजादी [संगीत] छत पर गई थी। लेकिन उसके बाद ना आई और छत से कंबल भी गायब हो गया है तो वह बहुत [संगीत] परेशान हुआ और उसने शहर के कोतवाल को तलब किया। बादशाह ने अभी शहजादी और कंबल के गायब [संगीत] होने का जिक्र भी ना किया था कि कोतवाल ने अर्ज की आलम पनाह आज सुबह से यह बात सुनने में [संगीत] आ रही है कि शहर के हजारों आदमी ने एक सरक कंबल हवा में उड़ता हुआ देखा है। जिस पर एक खूबसूरत [संगीत] लड़की बैठी हुई नजर आ रही थी।
बादशाह उसी वक्त तख्त से उठ खड़ा हुआ और परेशानी के [संगीत] बायस उसके चेहरे पर मौत ना छा गई। बादशाह ने कुछ सोचते हुए कहा, "मेरे ख्याल में यह फकीर [संगीत] कोई बहुत बड़ा जादूगर है। उसने शहजादी को गायब किया है। फिर उसने कोतवाल को हुक्म दिया कि वह फकीर को फौरन दरबार में हाजिर करें। [संगीत] कोतवाल उसी वक्त फकीर को बुलाकर ले आया।
बादशाह ने कहा, तुम्हारा सरक कंबल कहां है? फकीर बोला हुजूर वह मेरे मकान से चोरी हो गया है। मैं उस कंबल के बिना बहुत परेशान हूं। बादशाह ने कहा हमारे वजीर ने वह कंबल हमें लेकर दिया था। हमने उसे धूप में रखवाया था। आज शहजादी ऊपर गई तो वापस ना आई और अब मालूम हुआ है कि लोगों ने सुबह एक सरक कंबल उड़ता हुआ देखा है। लिहाजा तुम बताओ कि यह क्या राज है?
फकीर का चेहरा सरक हो गया और गुस्से से उसकी आंखें उभर आई। [संगीत] उसने कहा वह कंबल मेरा था। मेरे सिवा कोई दूसरा उसे इस्तेमाल ना कर सकता था। फिर वह मेरे मकान से क्यों [संगीत] चुराया गया? बादशाह ने कहा, वह इसलिए चुराया गया था कि हमारे मुल्क में सरक रंग इस्तेमाल करने [संगीत] की इजाजत नहीं है।
फकीर बोला, "मेरे पीर ने वह कंबल मुझे बख्शा था। और यह कहा था कि अगर किसी शख्स ने यह कंबल चुराया लिया या तुम्हारी मर्जी के बिना ले लिया तो वह हमेशा [संगीत] मुसीबतें उठाता रहेगा। लेकिन जो शख्स तुझसे धोखा देकर इस कंबल को हासिल करेगा वह फायदा उठाएगा। आलम पनाह आज तक सैकड़ों [संगीत] आदमी ने मुझे धोखा देकर कंबल
लेने की कोशिश की। लेकिन खुदा के कर्म से वह नाकाम रहे।
अब यह कंबल चुराया गया है तो जरूर नुकसान उठाना पड़ेगा। बादशाह ने कहा, "तुम्हारा बयान दुरुस्त हो सकता है, लेकिन हमारा हुक्म है कि शहजादी को खैरियत के साथ वापस बुला लिया जाए।"
फकीर ने कहा, "यह मेरी ताकत से बाहर है।"
बादशाह ने झुंझलाते हुए कहा, "कंबल तुम्हारा है, इसलिए तुम्हें यह काम करना होगा।"
फकीर ने कहा, "मुझे आपके हुक्म से कोई वास्ता नहीं। आपने मेरा कंबल मुझसे छीन लिया है। उसे वापस कीजिए, वरना हर नुकसान और मुसीबत के आप खुद जिम्मेदार हैं।"
बादशाह ने जब देखा कि फकीर किसी सूरत से कंबल और शहजादी को वापस बुलाने पर राजी नहीं है, तो उसने कोतवाल को हुक्म दिया कि इस फकीर को ले जाओ और कैद खाने में बंद कर दो। खाने को कच्ची दाल और पीने को खारा पानी दिया जाए और जिस तरह भी हो सके, उससे शहजादी को वापस बुलवाया जाए।
कोतवाल ने सिपाहियों को इशारा किया और वे फकीर के हाथ बांधकर ले गए। कोतवाल के आदमी फकीर को रोज किसी ना किसी से मारते और कहते कि शहजादी को वापस बुलाओ। लेकिन वह कहता, "मैं कुछ नहीं कर सकता। चोरी की सजा भुगतनी पड़ती है।"
शाम के वक्त जब सूरज गरूब होने में कुछ पल बाकी थे, सड़क पर एक शोर हुआ और कोतवाल ने कहा, "ए लड़की, वह बला आ गई।" शहजादी कोतवाल के साथ-साथ दौड़ती सड़क पर पहुंची। उसने देखा कि शहर का सबसे बड़ा हकीम भागता हुआ चला आ रहा था और उसके पीछे-पीछे चार हाथों वाला वही मंगोल था। वह जोर-जोर से चिल्ला रहा था, "हकीम, मैं तुझे जरूर मार डालूंगा।" और हकीम कह रहा था, "मुझे बचाओ, इस बला से बचाओ।"
लड़की ने जल्दी से कपड़े में आग लगा दी और डंडे को मजबूती से पकड़ कर आगे बढ़ी। जब मंगोल करीब आया, तो लड़की ने चिल्लाकर कहा, "तुम इस हकीम को क्यों मारना चाहते हो?" उसने दौड़ते हुए कहा, "मेरे पास पैसे ना थे। इस हकीम ने बिना पैसे लिए मेरे बच्चे का इलाज करने से इंकार किया था। मेरा बच्चा मर गया और यह हंसता रहा। आज मैं इसे मारूंगा।" और फिर उसने फुर्ती से दौड़ते हुए हकीम को पकड़ लिया। शहजादी को भागने-दौड़ने की आदत ना थी, इसलिए वह हकीम को ना बचा सकी।
इतनी देर में वह करीब पहुंची, तो वह हकीम को मौत की नींद सुला चुका था। शहजादी ने जलता हुआ कपड़ा उसकी कमर पर लगा दिया और वह मंगोल चार हाथों वाला आदमी भड़क उठा और देखते ही देखते राख होकर जमीन पर ढेर हो गया। चारों तरफ तालियां बजने लग गईं और "शाबाश, शाबाश, मरहबा, मरहबा" के नारों की आवाजें बुलंद हो गईं।
शहर के कोतवाल ने शहजादी से कहा, "आपने इस शहर के लोगों पर बहुत बड़ा एहसान किया है। इसलिए मेरी दरख्वास्त है कि आप हमारे साथ बादशाह के पास चलें।" लोगों ने फिर तालियां बजाईं और सब मिलकर शहजादी को बादशाह के पास ले गए।
कोतवाल ने सारा वाकया बयान किया, जिसे सुनकर बादशाह बहुत खुश हुआ। उसने झर और जवाहर के ख्वान मंगवाकर शहजादी के सामने रख दिए और कहा, "तुम्हारे एहसान से हमारी गर्दन झुक गई है। यह खाकसार तोहफा हम तुम्हें अपनी बेटी समझ कर दे रहे हैं। इसे कबूल कर लो।"
शहजादी ने कहा, "मेरे पास किसी चीज की कमी नहीं है। मैं नसीर बादशाह की बेटी हूं। इत्तेफाक से यहां चली आई थी। अपने भाई और बहनों को मुसीबत में फंसा देखकर मुझसे रहा ना गया और मैंने इस बला को ठिकाने लगा दिया।" गढ़ ऐसी ही बातें करके उसने तोहफा लेने से इंकार कर दिया। फिर बादशाह ने उसे अपने यहां मेहमान कर लिया और उसकी कई रोज तक खूब खातिर-तवज्जो की। अपने मुल्क की सैर कराई और अजीब-अजीब जगहों पर ले गया।
एक रोज शहजादी के जी में आया कि चलकर उस लाश को भी देखना चाहिए कि उसमें जान पड़ी या नहीं। उसने बादशाह से बहाना किया और अकेले उस मकान में जा पहुंची। बरामदे में देखा, वही बूढ़ा आदमी बैठा हुआ था, जिसकी लाश शहजादी ने देखी थी। वह उसे पहचान गई। झुक कर सलाम किया। बूढ़े ने कहा, "तुम कौन हो? और क्या चाहती हो?"
शहजादी ने कहा, "मैंने किताब में लिखी हुई हिदायत के मुताबिक उस चार हाथों वाले मंगोली को जला दिया, इसलिए देखने चली आई कि संदूक में पड़ी हुई लाश उठ खड़ी हुई या नहीं।"
बूढ़े ने उठकर शहजादी के हाथों को बोसा दिया और अपने पास बिठाकर कहने लगा, "बेटी, मैं एक जादूगर हूं और मेरे पास बेशुमार दौलत है, लेकिन मुझे अफसोस है कि मेरी औलाद में से कोई बच्चा भी जिंदा नहीं है। इसलिए अगर तुम मेरी बेटी बनकर यहां रहना पसंद करो, तो मैं अपनी सारी जायदाद, रुपया तुम्हारे नाम लिखने को तैयार हूं।"
शहजादी ने कहा, "मुझे कोई इंकार नहीं है।" जादूगर खुशी से उछल पड़ा और उसने शहजादी की सेवा के लिए फौरन ही कई मुलाजिमात मंजूर कर दिए और सब कुछ उसके नाम कर दिया।
शहजादी हर रोज शहर के विभिन्न इलाकों में जाती, गरीब औरतों से उनका हाल दरियाफ्त करती और बच्चों से बातें करती। इस तरह थोड़े ही दिनों में उसे मालूम हो गया कि शहर में सैकड़ों ऐसे बच्चे हैं जिन्हें पेट भर खाना भी ना मिलता। बहुत सी विधवा औरतें हैं जिनका कोई सहारा नहीं है और वे कमजोरी के बावजूद मेहनत-मजदूरी करती हैं। कई ऐसे बाप हैं जो कम आमदनी की वजह से अपनी जवान लड़कियों की शादी नहीं कर सकते और बेहिसाब लोग मफलसी के बाईस अपना इलाज नहीं करवा सकते और मर रहे हैं।
शहजादी जी खोलकर उन लोगों को रुपया देने लगी और इस तरह पूरे शहर में उसकी धूम मच गई। जादूगर को यह बात मालूम हुई तो वह बहुत नाराज हुआ और उसे बुरा-भला कहा, लेकिन शहजादी ने उसकी बातों का असर ना लिया और बराबर गरीबों की मदद करती रही। जादूगर ने उससे कहा, "अगर तुम मेरा कहा ना मानोगी, तो मैं अपना रुपया वापस छीन लूंगा।"
शहजादी हंसकर कहने लगी, "एक बार जो चीज मेरे पास आ जाए, मैं उसे वापस ना देती।"
जादूगर बहुत परेशान हुआ और तन्हाई में बैठकर सोचने लगा कि उसे क्या करना चाहिए? बहुत देर तक जब कोई बात समझ में ना आई, तो वह सो गया और सब उठते ही फिर सोचने लगा। वह सोचता रहा, आखिर उसने शहजादी पर पाबंदी लगा दी कि वह घर से बाहर कदम ना निकाले।
शहजादी को यह बात बहुत नागवार गुजरी, लेकिन वह खून के घूंट पीकर खामोश हो गई। एक रोज मौका पाकर उसने तमाम रुपया और कीमती सामान ले जाकर छत पर रख दिया और दूसरे दिन सुबह सवेरे ऊपर जाकर कंबल को फर्श पर फैला दिया। उस पर तमाम सामान रखा। फिर कंबल का वह रुख जो सामने था, दूसरी तरफ मोड़ दिया और उस पर बैठ गई। कंबल धीरे-धीरे ऊपर उठने लगा और हवा में उड़ने लगा।
इस जादूगर ने बरामदे में से कंबल को देखा और शहजादी को पहचान कर शोर मचाने लगा, "मेरी बेटी, तू कहां जा रही है? वापस आ, वापस आ।" शहजादी ने हाथ के इशारे से उसे सलाम किया और उसकी नजरों से उजाला हो गया। गरीबों और मफलों के मकानों और झोपड़ियों से गुजरते हुए शहजादी ने सारा रुपया और सामान नीचे फेंक दिया। लोगों ने खुशी-खुशी लूट लिया और उसे हजारों दुआएं दीं।
कंबल शहजादी को उड़ाकर जब उसके मुल्क में वापस पहुंच गया, तो शहजादी खुशी से फूली ना समाई। महल की छत पर पहुंचते ही वह कंबल पर लेट गई और कंबल नीचे उतर गया। शहजादी उसे छोड़कर दौड़ती हुई महल में गई। बादशाह उसकी जुदाई के गम में बीमार पड़ चुका था। उसे देखते ही उठ खड़ा हुआ और उसे सीने से लगाकर पहचान लिया और बोसा दिया। फिर शहजादी ने उसके गले में बाह डालकर सारा किस्सा सुनाया।
बादशाह ने कहा, "ताज्जुब की बात है। यह तो अजीबोगरीब कमाल मालूम होता है कि इस पर जादू किया हुआ है।" बादशाह ने थोड़ी देर चुप रहने के बाद कहा, "हम समझते थे कि फकीर ने जादू के जोर से तुमको गायब कर दिया है, इसीलिए हमने उसे कैद कर दिया था।"
शहजादी बोली, "नहीं अब्बा हजूर, उसे फौरन रिहा कर दिया जाए।" बादशाह ने फौरन ही नए मंत्री को हुक्म दिया और फकीर को कैदखाने से निकालने का हुक्म दिया और उसे अपने पास बुलाकर कहा, "बाबा, हमें माफ करना, हमने तुम्हें कैद में डाल दिया था, वरना तुम्हारा कोई कसूर नहीं था।" और उसे कंबल वापस देकर बहुत सा इनाम और इकराम भी दिया और इज्जत के साथ रुखसत किया।
फकीर महल से निकलकर बादशाह के दिए हुए मकान में नहीं गया, बल्कि शहर के बाहर जाकर एक कुटिया बना ली और उसमें रहने लगा। सुबह होते ही शहर में आता और पेट पूजा का सामान खरीद कर वापस चला जाता।
एक रोज कोतवाल ने बादशाह से फिर शिकायत की कि रियाया इस बात से बहुत नाराज है कि कानून के खिलाफ इस मुल्क में एक फकीर सरक कंबल ओढ़े हुए फिरता है। बादशाह ने कहा, "अगर इस फकीर का कंबल चुराया गया, तो फिर हम लोग किसी ना किसी मुसीबत में फंस जाएंगे। इसलिए बेहतर है कि किसी ठग को इनाम का लालच देकर मुकर्रर कर दिया जाए।"
कोतवाल बादशाह का हुक्म सुनकर रुखसत हुआ। एक रोज शहजादी को बैठे-बैठे ख्याल आया कि वह बादशाह से बहाना करके जादूगर के पास गई थी, लेकिन बाद में जाकर ना उससे मुलाकात की और ना उसे वापसी की जानकारी दी। इस ख्याल के आने पर उसने बादशाह से खत लिखवाया और उसमें तमाम वाक्यात का जिक्र कर दिया।
15 दिन बाद खत का जवाब एक एलची लेकर आया और साथ में कीमती और नायाब हीरे-जवाहरात तोहफे में लाया। बादशाह ने एलची की खूब आओ भगत की। फिर खत पढ़ा। उसमें बादशाह ने भी लिखा था कि "मैं बहुत खुश हूं कि यह लड़की, जिसने मेरी रियाया को एक मुसीबत से निजात दिलाई है, आपकी साहिबजादी बेहतर पेश करता हूं।" फिर एलची ने अर्ज की, "जहां पनाह, हमारा शहजादा इफ्तखार तख्त का वारिस है। बहुत ही झिन और अकलमंद है। बादशाह सलामत ने पैगाम दिया है कि अगर आप शहजादी साहिबा और बानू की शादी शहजादा से फरमाएं, तो दोनों मुल्क एक दूसरे से करीब हो जाएंगे।"
बादशाह ने इस रिश्ता को कबूल कर लिया और एलची को बहुत से तोहफे देकर रुखसत किया।
दो महीने के बाद कोतवाल ने बादशाह की खिदमत में हाजिर होकर अर्ज की, "मुल्क के बड़े-बड़े ठग फकीर को धोखा देने में नाकाम हो चुके हैं। अब ऐसा कोई आदमी नहीं है जो उससे कंबल हासिल कर सके।" एक मंत्री ने कहा, "मैंने सुना है कि मुल्क हिंदुस्तान के शहर दिल्ली में ऐसे-ऐसे ठग मौजूद हैं जो बड़े-बड़े चालाक लोगों को भी आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं। अगर वहां से एक ठग को बुला लिया जाए, तो यह काम आसानी से हो सकता है।"
बादशाह को यह तजवीज बहुत पसंद आई और उसने फौरन ही बड़े मंत्री से कहकर हिंदुस्तान के बादशाह को खत लिखवाया। हिंदुस्तान के बादशाह ने जब इसका खत पढ़ा, तो बहुत हंसा और कहा, "हम तो अपनी रियाया की खुशहाली के लिए चोरों, डाकुओं, ठगों को सजाएं दे रहे हैं और यह एक ठग की फरमाइश कर रहा है।" आखिर उसने एक मशहूर ठग को गिरफ्तार करवा कर रवाना कर दिया।
बादशाह ने उससे कहा, "फकीर का कंबल अगर तुमने उसे धोखा देकर हासिल कर लिया, तो हम तुम्हें मालामाल कर देंगे। लेकिन यह याद रखना कि इस कंबल को उसकी खुशी से लेने या चुराया लाने से नुकसान के सिवा कुछ नहीं मिलेगा।"
ठग ने हंसकर कहा, "जहां अपना, अगर वह फकीर आज ही बाजार में मिल गया, तो मैं उसे बेवकूफ बनाकर आज ही कंबल हासिल कर लूंगा।"
कोतवाल ठग को अपने साथ बाजार ले गया और दूर से फकीर की तरफ इशारा करते हुए कहा, "वह फकीर है। तुम जाओ और मैं यहां तुम्हारा इंतजार करता हूं।"
ठग दुकानों को देखता हुआ फकीर के पास पहुंचा और कहने लगा, "बाबा, मैं एक लड़की से शादी करना चाहता था, लेकिन लड़की के वालिदन और खुद मेरे खानदान के लोग इस रिश्ते के खिलाफ थे। इसलिए मैंने मन्नत मानी थी कि अगर मेरी शादी इस लड़की से हो गई, तो मैं एक फकीर को पेट भरकर मिठाई खिलाऊंगा। खुदा का शुक्र है कि कल मेरी शादी इस लड़की से हो गई है। लिहाजा, मैं सुबह से किसी फकीर की तलाश में फिर रहा हूं, लेकिन कोई फकीर नजर ही नहीं आया और जो आता है, वह पेट भरकर मिलता है।"
फकीर बोला, "सखी दादा, मैं तो एक गरीब आदमी हूं। जब दो रोटियां मिल जाती हैं, तो मैं यहां से चला जाता हूं।"
ठग ने कहा, "बाबा, कंबल तो इतना कीमती लगता है, फिर गरीब कैसे हो सकते हो?" फकीर ने हंसकर कहा, "कंबल पर ना जाओ। मैं इसे जान से ज्यादा अजीज रखता हूं।"
ठग बोला, "बाबा, इसे संभाल कर रखना। आजकल लोग भेष बदलकर ऐसी चीजों की तलाश में फिरते रहते हैं।" फकीर ने कहा, "हम गरीबों की चीजें कौन चुराता है?"
ठग बोला, "खैर छोड़ो इन बातों को। आओ मेरे साथ चलो, ताकि मैं अपनी मन्नत पूरी करूं।" और वह उसे अपने साथ एक हलवाई की दुकान में ले गया और हलवाई से बोला, "बाबा, जो मांगे, उसे दे दो और जब तक बाबा का पेट अच्छे से ना भर जाए, उसे मिठाई खिलाओ।"
फकीर कुर्सी पर आलट-पालट मारकर बैठ गया और हलवाई ने उसके सामने एक सर मिठाई रख दी। फकीर को इतनी मिठाई कब नसीब होती है? उसने जल्दी-जल्दी सारी मिठाई खा ली। फिर नमक पानी मांगा और मुंह का स्वाद बदलने के लिए खाने लगा।
फिर ठग ने कहा, "बाबा, पानी पियोगे या कोई शरबत लाऊं?" फकीर बोला, "शरबत बेहतर रहेगा।" ठग अपनी जगह से उठा और हलवाई से कहकर बाहर चला गया कि "बाबा को मिठाई और दो। इतनी में मैं शरबत लेकर आता हूं।"
ठग के जाते ही फकीर ने आधा सर मिठाई और खाई। अब उसका दिल भर गया और वह पेट पर हाथ फेरने लगा। बैठे-बैठे काफी देर हो गई, लेकिन ठग वापस ना आया। आखिर फकीर ने हलवाई से कहा, "भाई, जरूर कोई हादसा पेश आ गया है, जो अब तक वह लौट कर नहीं आया। मैं जाकर उसे तलाश करता हूं।"
हलवाई ने कहा, "बाबा, मिठाई के पैसे कौन देगा?" फकीर ने कहा, "वही आदमी देगा। उसने मन्नत मानी थी, वह पूरी हो गई।" हलवाई ने कहा, "अपनी कोई चीज गारंटी के तौर पर यहां छोड़ जाओ। जब मुझे पैसे मिल जाएंगे, तो मैं वापस कर दूंगा।"
फकीर ने कहा, "अच्छा, तो यह कंबल रख लो।" और फकीर अपना कंबल उसकी दुकान पर छोड़कर ठग की तलाश में चल पड़ा।
कुछ देर के बाद ही ठग हलवाई की दुकान पर पहुंचा और कहने लगा, "रास्ते में एक दोस्त मिल गया था। बातों-बातों में देर हो गई। खैर, मिठाई के पैसे कितने हुए, बताओ?" तो हलवाई ने कहा, "रुपए दो आने हुए।"
ठग ने रुपए दो आने देते हुए कहा, "बाबा कहां गया?" हलवाई ने कहा, "वह आपकी तलाश में निकला है।" ठग ने उसका कंबल उठाया और तेजी से बाहर निकल गया।
उसके जाते ही फकीर वापस आया, तो हलवाई ने कहा, "बाबा, वह आदमी आया था, मिठाई के पैसे देकर आपका कंबल ले गया है।" इतना सुनते ही फकीर के मुंह से निकला, "आज मैं धोखा खा गया।" और उसी वक्त उसके दिल की धड़कन बंद हो गई और वह जमीन पर गिर पड़ा।
ठग कोतवाल को साथ लेकर बादशाह की सेवा में हाजिर हुआ और फकीर का कंबल उसके कदमों में रख दिया। बादशाह ने इनाम में उसे जागीर अता की और 1000 अशरफियों की थैली दी।
इसी महीने में शहजादा की शादी शहजादी और बानो से हुई। इस मौके पर बादशाह नसीर शाह ने फकीर का कंबल तमाम मेहमानों को दिखाते हुए कहा, "यह वह कंबल है, जिसकी बदौलत यह खुशी का मौका हम लोगों को नसीब हुआ है।" फिर उसने इस कंबल को हिफ्ज और अमानत से एक संदूक में रखवा दिया।