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SindBad Ke 7 Hairat Angez Safar Ka Waqia || Moral Stories in Urdu & Hindi

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सुल्तान आजम के द्वारे हुकूमत में शहर फिरदौस बगदाद में एक मेहनतकश लकड़हारा रहता था जिसका नाम उबैद था। वो एक रोज लकड़ियों का भारी बोझ उठाए हुए इत्तेफाकन हमजा मल्लाह के शानदार महल के पास से गुजरा। थकन से मजबूर होकर उसने लकड़ियों का बोझ एक तरफ रखा और खुद दीवार के साए में बैठ गया।

उस वक्त हमजा के महल में महफिल जमी हुई थी और अंदर से खुशी और ठहाकों की आवाजें आ रही थी। उबैद की नजर महल की अजीमोशान इमारत पर पड़ी तो वह दुख और हसरत से भर गया। उसने आसमान की तरफ देखा और आहिस्ता से खुद कलामी की।

"ऐ परवरदिगार मेरे नाम उबैद और इस अमीर शख्स के नाम हमजा में कुछ ज्यादा फर्का नहीं। मगर यह कितना दौलतमंद और खुशनसीब है। और मैं कैसा गरीब और खस्ताहाल।"

हमजा जिंदबाद ने उसकी बातें सुन ली। उसने एक गुलाम को इशारा किया कि उस मेहनतकश बूढ़े को बुलाया जाए। उबैद को बहुत ताज्जुब हुआ कि इतना अमीर आदमी उसे क्यों बुला रहा है? लेकिन वो गुलाम के साथ अंदर चला गया।

हमजा ने अच्छी तरह से उबैद को अपने पास बिठाया और पूछा कि तुम बाहर बैठे हुए क्या कह रहे थे? उबैद डर कर लज उठा और कहने लगा, "हुजूर बोझ उठाने से थक कर चूर हो गया हूं। शायद तकलीफ में कुछ अल्फाज़ जुबान से फिसल गए हो।"

हमजा ने कहा, "डरो मत। मैंने तुम्हारी बात सुन ली है और मेरे दिल पर उनका बहुत असर हुआ है। लेकिन तुम यह गलत ना समझना कि यह सारी दौलत मुझे आसानी से मिल गई है। मैंने इसके लिए बड़ी अज़यतें और सख्तियां उठाई हैं।"

फिर हमजा ने एक गुलाम को हुक्म दिया कि उबैद का लकड़ियों का बोझ भी महल के अंदर रखवा लें। फिर हमजा उबैद को मुखातिब करके अपनी जुर्रत, आजमाइश और सख्त खुशी की दास्तान सुनाने लगा।

"मेरे वालिद शहर के बहुत बड़े ताजिर थे। दौलत और जायदाद की कोई कमी ना थी। जब उन्होंने वफात पाई तो यह सब मेरे कब्जे में आ गई। मैं जवानी के जमाने में ऐशो-इशरत में पड़ गया और बेदर्दी से पैसा खर्च करता रहा। आखिरकार दौलत कहां तक साथ देती? जब मेरा सरमाया खत्म होने लगा तो मेरी आंखें खुली। जो बचा कुचा माल था उसे बेचकर मैंने कुछ पैसा जमा किया और अपने जानने वाले ताजिरों से मशवरा करके एक तिजारती जहाज खरीदा और खुदा का नाम लेकर सरदीप हिंदुस्तान की तरफ रवाना हुआ। हमारा जहाज मुख्तलिफ जगहों पर ठहरा। मैं जो सामान साथ लाया था उसे बेचता और नया खरीदता। और इस तरह मैंने बहुत मुनाफा हासिल किया। एक रोज हमारा जहाज एक छोटे से चट्टानी जजीरे के करीब ठहरा और हम लोग सैर करने के लिए नीचे उतर आए। मैं सैरो तफरीह का हमेशा से शौकीन था। इसलिए दूसरे साथियों से ज्यादा दूर निकल गया। अचानक एक जोरदार झटका लगा। उस वक्त जहाज का कप्तान चिल्लाया। जल्दी करो। यह जजीरा नहीं एक दीव हैकल मछली है और हम सब उसकी पीठ पर फिर रहे हैं। यह सुनकर लोग खौफज़दा होकर दौड़े। मगर मैं क्योंकि दूर जा चुका था। जहाज तक ना पहुंच सका। इतने में मछली ने पानी में गोता लगाया और मैं पानी की सतह पर रह गया। मैंने बहुत हाथ-पांव मारे कि किसी तरह जहाज तक पहुंच जाऊं। लेकिन मौजों के जोर से खुदा जाने कहां से कहां निकल गया। आखिरकार लहरों के जोर पर मैं एक हकीकी जजीरे के किनारे जा लगा। मैंने गिरते पड़ते खुकी तक पहुंचकर खुदावंद करीम का शुक्र अदा किया। मैंने जंगल के फल और पत्ते खाकर एक चश्मे से पानी पिया तो कुछ हवास बहाल हुए। फिर मैं उठकर चल दिया कि देखूं जजीरे में कोई आबादी है या नहीं। कुछ दूर चला था कि एक ऊंचे दरख्त से धुआं उठता हुआ नजर आया। मैं वहां पहुंचा तो देखा कि कुछ आदमी दरख्तों के नीचे छुपे बैठे हैं। उन्होंने इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और मेरा हाल पूछा। मैंने सारा वाक्य उन्हें सुनाया तो वह कहने लगे घबराओ नहीं हमारे साथ चलो। उन्होंने बताया कि हम दरियाई घोड़े की नस्ल लेने आए हैं। इसलिए घोड़ी इसी मकसद के लिए लाई गई है कि जब दरियाई घोड़ा उससे मिलने आएगा तो हम शोर करके उसे भगा देंगे। क्योंकि उसका कायदा है कि वह मिलने के बाद मादा को जिंदा नहीं छोड़ता। हम लोग पास छुप कर बैठ गए। थोड़ी देर बाद घोड़ा पानी से निकला और घोड़ी से मिला। जब वो घोड़ी को मारना चाहा तो हमने शोर मचाकर उसे भगा दिया। उसके बाद हम घोड़ी लेकर शहर चले गए। उन लोगों ने मेरा कस्सा बादशाह को सुनाया। उसने मुझ पर बहुत मेहरबानी की और खानेपीने का इंतजाम किया। मैंने सारा इलाका देखा। वहां के रस्म और रवाज मालूम किए। इत्तेफाक से एक रोज मैंने सुना कि कोई जहाज आया है। मैं भी समुंदर के किनारे पर गया। वहां जो माल उतर रहा था। मैंने उस पर अपना नाम लिखा हुआ देखा। मैंने कप्तान से मुलाकात की। लेकिन मेरी सूरत इतनी बदल चुकी थी कि कप्तान मुझे पहचान ना सका। मैंने अपने सामान की तमाम तफसीलात और अपने वहां रह जाने का किस्सा सुनाया तो उसने मुझे पहचान लिया और बड़ी गर्मजशी से मिला। मेरा सारा सामान मुनाफे समेत जो जरिए में फरोख्त हुआ था मुझे दे दिया। मैंने कप्तान को कुछ देना चाहा मगर उसने इंकार कर दिया और कहा खुदा का शुक्र है कि मैं तुम्हें जिंदा देख रहा हूं और तुम्हारी अमानत तुम तक पहुंचा सका हूं। मैं उसकी दयानतदारी देखकर हैरान रह गया। फिर मैंने अपना माल वहां फरोखत किया और अपना पसंदीदा माल खरीद कर जहाज पर सवार हुआ और खुदा का शुक्र अदा करता हुआ घर वापस आया।"

हमजा ने उबैद को एक थैली अशरफी दी और कहा कि कल फिर आना। अपनी बाकी दास्तान मैं तुम्हें कल सुनाऊंगा।

"पहले सफर के बाद मेरा इरादा था कि अब समुंदर का सफर नहीं करूंगा। लेकिन चंद रोज आराम करने के बाद फिर मेरे दिल में सफर का शौक पैदा हो गया। मैंने मालो असबाब ए तजारत खरीदा और एक जहाज पर सवार हो गया जिसमें बहुत से ताज़िर थे। हम सफर करते रहे और जगह-जगह अपना माल फरोख्त करते और नया माल खरीदते रहे। एक रोज कई दिन के सफर के बाद हम एक वीरान और लरजाखेज जजीरे के करीब पहुंचे और फल हासिल करने के लिए वहां ठहरे। मैं उस जजीरे की सैर करता हुआ दूर निकल गया। मैं अपने ख्यालात में ऐसा मशरूफ था कि याद ही ना रहा कि साहिल किधर है। जब मैं घबरा कर लौटा लेकिन तमाम दिन फिरने के बावजूद मुझे किनारा ना मिला जहां हमारा जहाज ठहरा था। वो जहाज तो रवाना हो चुका था। एक रात दिन सफर के बाद मैंने एक अजीम उलजुस्सा सफेद चीज देखी। लेकिन यह मालूम ना कर सका कि यह क्या है। जब मैंने नजर उठाई तो एक दीव हैकल अन का परिंदा सिमुर्ग को उड़ता हुआ देखा। मैं एक तरफ हटकर खड़ा हो गया और वह परिंदा नीचे उतरा और उस सफेद गुंबद पर बैठ गया। मुझे ख्याल आया कि यकीनन वो परिंदा है और वह सफेद रंग का उसका अंडा है। मैंने सोचा कि यहां से निकलने की यह तदबीर है कि जब यह उड़े तो मैं इसके पंजों से लिपट जाऊं। अगले रोज जब वो उड़ा तो मैं उसके पैर से बंधा हुआ था। अनका इतना बुलंद हुआ कि नीचे की कोई चीज नजर नहीं आती थी। बहुत देर के बाद वो नीचे उतरना शुरू हुआ। मैं तैयार था। जो ही एक जमीन करीब आई। मैंने कमर से पगड़ी खोल दी और एक तरफ को खिसक गया। अनका ने उसके बाद एक बड़े हुए जानवर की लाश को पंजे में उठाया और उड़ गया। अब जो मैंने चारों तरफ देखा तो मालूम हुआ कि मैं कहीं पहाड़ों में घिरी हुई एक छोटी वादी में खड़ा हूं और उसमें चारों तरफ कीमती हीरे बिखरे पड़े हैं। मैं बहुत खुश हुआ और बेहतरीन हीरे अपनी कमर में बांध लिए। फिर एक पहाड़ पर चढ़ना शुरू किया। थोड़ी दूर तक गया था कि अजदाहों की फूंकारें आने लगी और रास्ता भी नहीं था। मैं उस वक्त की अपनी घबराहट और परेशानी को बयान नहीं कर सकता। दिल गम से बैठा जा रहा था। बड़ी मुश्किल से मैंने अपना हौसला कायम रखा और घर में एक जगह साफ करके बैठ गया और इस तरह पत्थर चुन लिए कि कोई सांप वगैरह अंदर ना आ सके। रात भर उसी खौफ के आलम में गुजरी। सुबह उठकर चारों तरफ देखने लगा कि शायद यहां से निकलने की कोई सूरत नजर आए। मुझे बाहर निकले ज्यादा देर नहीं हुई थी कि पहाड़ की छोटी से बड़े-बड़े गोश्त के टुकड़े आकर गिरने लगे। थोड़ी देर बाद बड़े-बड़े परिंदे आए और गोश्त के टुकड़े उठाकर उड़ जाते। मैंने सोचा कि जिस तरह यह परिंदा मुझे इस जगह लाया है, उसी तरह मुमकिन है कोई जानवर बाहर निकाल ले जाए। चुनांचे मैंने एक बड़ा सा गोश्त का टुकड़ा पीठ पर बांध लिया और उल्टा होकर खुदा से दुआ करने लगा। थोड़ी देर बाद एक बहुत बड़ा परिंदा मेरे पास आया और गोश्त का टुकड़ा समझकर मुझे उठा लिया और उड़ने लगा। यहां तक कि वो पहाड़ की चोटी पर पहुंच गया। वहां पहुंचकर उसने यूं ही एक लम्हा मुझे जमीन पर रखा। मैं शोर मचाता हुआ खड़ा हो गया और परिंदा डर कर उड़ गया। मैंने गोश्त का टुकड़ा खोलकर फेंक दिया और चारों तरफ देखने लगा कि किधर जाऊं। एक समत मुझे चंद आदमी नजर आए तो मैं उनके पास गया और उनको अपनी दास्ताने मुसीबत सुनाई। उन्होंने मुझसे हमदर्दी जाहिर की और कहा कि हम ताजिर हैं और यहां हीरे जमा करने आए हैं। नीचे तो कोई जा नहीं सकता। इसलिए हम यह तरकीब इस्तेमाल करते हैं कि गोश्त के बड़े-बड़े टुकड़ों को फेंक देते हैं और उन टुकड़ों से कुछ हीरे चिपक जाते हैं। जब परिंदे उन टुकड़ों को अपने पंजों से उठा लेते हैं तो हम उनको डराधमका कर गोश्त छीन लेते हैं और उनसे कुछ हीरे मिल जाते हैं। मैं चंद रोज ताजिरों के साथ पहाड़ पर रहा। फिर उनकी रहनुमाई में हीरे लेकर नीचे आया। कुछ जवाहरात और बहुत सा सामान तिजारत खरीदा और जहाज में बैठकर बंदरगाह एग गौहर बसरा आया और वहां से खुकी के रास्ते शहर फिरदौस पहुंचा और खुदा का शुक्र अदा किया।"

यह किस्सा सुनाकर हमजा ने फिर थैली अशरफी की उबैद को दी और कहा कि कल फिर आना तीसरे सफर की दास्तान कल सुनाऊंगा।

"पहले दो सफर के बाद मेरा इरादा था कि अब समुंदर का सफर नहीं करूंगा। लेकिन चंद रोज आराम करने के बाद फिर मेरे दिल में सफर का शौकड़ पैदा हुआ और मैं जाने को तैयार हो गया। मुख्तलिफ किस्म का सामान ए तजारत इकट्ठा किया और एक तजारती जहाज में सवार हो गया। शुरू में हम बड़ी आसानी से सफर करते रहे और जगह-जगह अपने माल की खरीदो फरोख्त करते रहे। आखिरकार एक रोज कप्तान ने बताया कि हम रास्ता भूल गए हैं। आखिरकार हमें एक जजीरा नजर आया। हम खौफजदा होकर जजीरे के करीब लंगर डाल चुके तो मालूम हुआ कि यह आदमखोरों का जजीरा है। हमने जल्दी लंगर उठाया और जहाज को भगाया लेकिन वो आदमखोर हमें देख चुके थे और अपनी कश्तियां लेकर हमारे जहाज पर हमला और हुए। उन्होंने रस्सा काट डाला। बादबानों को फाड़ डाला। आखिरकार वो हम पर गालिब आ गए और जहाज को जजीरे के किनारे ले आए और सबको गिरफ्तार करके गार में बंद कर दिया जिसमें बेशुमार इंसानी हड्डियां पड़ी थी और बदबू की वजह से वहां ठहरना मुश्किल था। थोड़ी देर में एक जालिम तीव कामत आदमखौर आया। वो काले पत्थर जैसा था और एक ही आंख वाला था। उसने हम में से एक-एक को उठाकर देखा कि तैयार और मोटा कौन है। उसने जहाज के कप्तान को पसंद किया और अपने साथियों से कुछ कहा जिसका मतलब यह मालूम होता था कि वो उसके लिए खाना तैयार करें। जब वो कप्तान को लेकर चला गया तो हम बाकी के तमाम कैदी रोने लगे कि बारी-बारी सबका यही हश्र होगा। वो वैशी लोग बहुत से जंगल के फल हमारे पास डाल गए। लेकिन हमारे सामने मौत खड़ी नजर आ रही थी। कौन खाता? जब हम इस तरह खाने पर आमादा नहीं हुए तो उन्होंने जबरदस्ती फल हमारे मुंह में ठूंसने शुरू कर दिए और मजबूर किया कि खाएं। शाम को वो सरदार फिर आया और एक आदमी को छांट कर ले गया और सब मिलकर उस मजबूर को भी पका कर खा गए। रात को हम लोगों ने मशवरा किया कि मौत से बेहतर है निजात की कोई कोशिश की जाए। यह सबको एक-एक करके भून कर खाएंगे। यह तजवीज मंजूर हो गई। अब हम दिन भर इधर-उधर घूमकर लकड़ियां जमा करते रहे ताकि हम कोई मामूली सी कश्ती तैयार कर लें। रात को हमने तख्ते बांधकर कुछ तरतीब से कश्तियां बना ली और जब वो सब सो गए तो हम उठे और गर्म सलाखें तैयार की और जहां सरदार सो रहा था हम सब मिलकर उसकी आंखों में गर्म सलाखें पवस्त कर दी। वो दर्द से चीखने लगा। हम कश्तियों में बैठ गए। हर तरफ से वह आदमखोर जमा हो गए और पत्थरों की बारिश कर दी। बड़ी मुश्किल से हम बच गए। मैं जिस कश्ती में सवार था, वो मौजों के बहाव से दूसरे जजीरे के किनारे आ लगी। हम उससे उतर कर जजीरे में पहुंचे और दम लेने को एक दरख्त के नीचे लेट गए। थक कर चूर होने की वजह से फौरन आंख लग गई। मेरी आंख खुली और चबाने की आवाज आई। मैंने चांदनी में देखा तो मालूम हुआ कि मेरे साथ एक साथी को एक अजदहा निगल रहा है और चटाक चटाक उसकी हड्डियां टूटने की आवाज आ रही है। यह देखकर मेरा बदन डर से सर्द पड़ गया और मैं सर से लेकर पैर तक कांप उठा। मैंने आहिस्ता से दूसरे साथी को जगाया। हम दोनों भागकर एक दरख्त पर चढ़ गए। लेकिन मेरा साथी अजदहे के हाथ आ गया और वो उसको भी खा गया। मैं जू तू करके कश्ती तक पहुंचा और उसमें पड़ रहा। रात दुआएं करते-करते गुजर गई। सुबह को मैंने कश्ती समुंदर में छोड़ दी और फिर करीब ही मुझे एक जहाज दिखाई दिया। मैंने अपनी चादर हवा में हिलाई। जहाज वालों ने मुझे देख लिया। जहाज मेरे करीब आया और मुझे सवार कराया। इत्तेफाका से जहाज का कप्तान वहीं था जिसके साथ मैंने दूसरा सफर किया था। वो बड़े तपाक से मिला। मेरा हाल पूछा और बड़ी मोहब्बत से सलामती की मुबारक दी।"

यहां भी हमजा ने 100 अशरफी की थैली उबैद को दी और अगले रोज आने को कहा ताकि चौथे सफर की दास्तान सुनाई जा सके।

"तीसरे सफर के बाद मेरा पक्का इरादा था कि अब सफर नहीं करूंगा लेकिन मैं अपनी तबीयत से मजबूर था। कुछ रोज आराम से गुजरे थे कि मेरे सर पर फिर सफर की धुन सवार हुई। चुनांचे मैंने तजारती माल खरीदा और एक अच्छे जहाज में रवाना हो गया। हमने बहुत से नए जजीरे देखे। माल की खरीद व फरोख्त की और माखुल मुनाफा कमाते आगे बढ़ते चले गए। शायद हमें सफर करते हुए एक महीना गुजरा था कि एक रोज हम तूफान में घर गए। कप्तान ने बहुत कोशिश की कि किसी तरह जहाज को बचाए लेकिन ना बचा सका और हमारा जहाज किसी चट्टान से टकराकर पाशपाश हो गया। हम लोग समुंदर में गिर गए और अपने बचाव के लिए जंग करने लगे। आखिर जिन लोगों को टूटते हुए जहाज के तख्ते दस्तियाब हो गए, वह तो तैर गए। बाकी का हाल खुदा जाने क्या हुआ। बहरहाल मैं और मेरे कुछ साथी तख्तों के सहारे दो दिन तक तैरते रहे। हम भूख प्यास से बेदम हो रहे थे कि सामने हमें जजीरा दिखाई दिया। बड़ी मुश्किल से खुकी तक पहुंचे। कुछ जंगली पत्ते और दीगर चीजें खाकर पानी पिया तो महसूस हुआ कि वाकई हम जिंदा हैं। कुछ देर दम लेने को लेट गए। फिर आबादी की तलाश में आगे बढ़े। सामने फासले पर कुछ अजीब और गरीब किस्म की झोपड़ियां थी। हम वहां पहुंचे। अभी कुछ समझ ना पाए थे कि वैशी लोगों ने हमें चारों तरफ से घेर लिया और एक मकान में ले गए जिसमें उनका सरदार बैठा था। उसने हमें एक तरफ बैठने का हुक्म दिया। फिर हमारे सामने निहायत लजीज किस्म के खाने चले गए। मैंने हरचंद अपने साथियों को इशारा किया कि खाना ना खाओ। लेकिन वो मेरी बात ना माने और पेट भर कर खाया। मैंने एक लुकमा चखा। उसके बाद हमें नारियल का पानी और शराब पिलाई गई। मेरे साथी शराब पीते ही फौरन मदहोश हो गए और सो गए। मैं समझ रहा था और देख भी रहा था लेकिन कुछ कर नहीं सकता था। थोड़ी देर में शराब और खाने के असर से जो जादू का था। मेरे साथियों के हवास खत्म होने लगे और जालिम वैशी उनको मार-मार कर खाने लगे। मैंने क्योंकि वहां कुछ नहीं खाया था। इसलिए मौका पाकर मैं वहां से फरार हुआ। गो बदन में ताकत नहीं थी लेकिन जान बड़ी अजीज होती है। मैं बराबर भागता रहा। आखिर रात के वक एक घने दरख्त पर रात बसर की। उसके पत्ते खाकर पेट की आग बुझाई। सुबह को फिर आगे बढ़ा। सातवें दिन एक तरफ कुछ आदमी नजर आए जो काली मिर्च तोड़ रहे थे। उनको देखकर मेरी जान में जान आई। उनके पास जाकर मैं गिर गया। उन लोगों ने मेरे ऊपर रहम किया और मेरा हाल पूछा। मैंने अपनी दास्ताने मुसीबत सुनाई। उन लोगों ने मुझे खाना दिया। जब मेरी हालत ठीक हो गई तो मैंने भी उनके साथ मिर्चें तोड़नी शुरू कर दी। कई रोज के बाद मैं जहाज पर सवार होकर एक मुल्क में पहुंचा। वहां जाकर मैंने देखा लोग जीन बनाना नहीं जानते और घोड़े की नंगी पीठ पर सवारी करते हैं। मैंने जीन तैयार की और उनके बादशाह के हुजूर पेश की और उसका तरीका इस्तेमाल बताया। बादशाह बहुत खुश हुआ और मुझे बहुत इनाम दिया और उसने एक अमीर की लड़की से मेरी शादी कर दी। मैं अपनी बीवी के साथ अच्छी जिंदगी बसर करने लगा। मेरे पड़ोस में एक शरीफ आदमी रहता था। मैं उससे बहुत मानूस था। इत्तेफाका से उसकी बीवी बीमार हो गई और मर गई। मैंने उसको तसल्ली दी तो वह कहने लगा भाई अब मैं भी कुछ दिन का मेहमान हूं। मुझे बहुत ताज्जुब हुआ और मैंने कहा कि तुम तो खुदा के फजल करम से तंदुरुस्त हो। क्यों इतने मायूस हो? वो बोला तुम नए आदमी हो और यहां के मुतालिक नहीं जानते। हमारी कौम में दस्तूर है कि अगर शौहर मर जाए तो बीवी को और अगर बीवी मर जाए तो शौहर को उस मुर्दा के साथ ही दफन कर देते हैं। यह बात सुनते ही मेरे होश उड़ गए कि अच्छा निकाह किया। अगर मेरी बीवी पहले मर गई तो सचमुच जिंदा दरघोर होना पड़ेगा। दिल पर तय कर लिया कि इस मुल्क से भाग जाऊंगा। मैं इस फिक्र में था कि फिर मेरी बीवी बीमार पड़ गई और दूसरे ही रोज मर गई। मेरा तो बुरा हाल था। बहरहाल जनाजा तैयार हो गया। पहली मयत गार में डाली गई और उसके बाद मुझे भी बीवी के पीछे धकेल दिया गया। मैं इस कदर घबरा रहा था कि मेरा दम घुटने लगा। पहले तो बैठकर बहुत रोया और जब जी हल्का हुआ तो एक तरफ से थोड़ी सी जगह साफ की और वहीं पड़ गया और खुदा-ए रहीम से दुआ करने लगा कि मुझे इस मुसीबत से निजात दिला दे। मैंने अपने खाने पीने की बहुत हिफाजत की। तीसरे रोज इत्तेफाकन कोई और मर गया। चानांचा गार का मुंह खुला और एक मुर्दा और उसके बाद एक औरत खाना पानी गार में रखकर वापस चले गए। जब गार का मुंह बंद करके लोग चले गए तो मैंने अंधेरे में औरत का हाथ पकड़ लिया और उसे समझाया कि खानेपीने की चीजें थोड़ा-थोड़ा इस्तेमाल करो। दूसरे रोज हम तीनों उसी फिक्र में बैठे थे कि ऐसी आवाज आई जैसे कोई जानवर ही छिपा रहा है। मैंने सोचा कि जिस रास्ते से यह जानवर आया है, अब उसी रास्ते से हमें निकलने की कोशिश करनी चाहिए। मैंने जानवर को डराया तो वह भागा। मैं भी उसके पीछे-पीछे भागा। कुछ दूर जाकर रोशनी मालूम हुई तो करीब जाकर देखा दरिया के किनारे उस कार में सुराख है और उसमें से एक आदमी आसानी से गुजर सकता है। मैं बाहर निकला और सजदे ए शुक्र बजा लाया। फिर वापस घर में जाकर अपना खाना और दोनों औरतों को बाहर लाया और फिर हम एक तरफ छुप गए। कई रोज के बाद एक जहाज नजर आया। मैंने कपड़ा हिलाकर पहले जहाज को मुतवजे किया। जहाज किनारे की तरफ आया और एक कश्ती हमें लेने किनारे आई। मैंने अपना माल जो मुझे गार में से मिला था हीरे और जेवरात उठाया। एक जजीरे में पहुंचकर उसको फरोख्त किया और वहां से और बहुत सामान ए तजारत खरीदा और मुख्तलिफ मुल्कों में कारोबार करते हुए बंदरगाह एगोहर आ गया और वहां से खुशकी के रास्ते शहर फिरदौस पहुंचा।"

उसके बाद हमजा ने एक थैली अशरफी की उबैद को दी और अगले रोज आने का कह दिया ताकि पांचवें सफर का हाल सुनाया जा सके।

"चौथे सफर के बाद जो मैंने अहद किया था कि आइंदा शहर फिरदौस से बाहर कदम नहीं रखूंगा। लेकिन चंद रोज के ऐशो राहत ने फिर सफर करने का शौक पैदा कर दिया और मैं असबाब ए तजारत लेकर दूसरे मुल्कों की तरफ रवाना हुआ। मैंने जहाज का इंतजाम किया कि तूफान का मुकाबला आसानी से हो सके और हर किस्म की राहत उसमें फराहम की। जहाज तैयार हो गया तो हम सफर पर रवाना हुए। मुख्तलिफ मकामात से होते हुए एक जजीरे में पहुंचे जहां मैंने अंका परिंदा का एक अंडा देखा और अपने साथियों को भी दिखलाया। मेरे साथियों ने मना करने के बावजूद उस अंडे को तोड़ कर खा लिया। मैंने कहा कि इसका नतीजा खतरनाक होगा। हम जल्द सवार"

होकर वहां से रवाना हुए। लेकिन ज्यादा दूर नहीं गए होंगे कि अंका का जोड़ा आ गया और अपने अंडे को टूटा हुआ देखकर गुस्से और गजब के आलम में जहाज पर हमला आवर हुआ। उन्होंने बड़े-बड़े पत्थर उठाकर जहाज पर गिराने शुरू कर दिए। आखिर उस परिंदे ने इतने पत्थर बरसाए कि जहाज तबाह हो गया और बहुत से साथी हलाक हो गए। हम तख्तों के सहारे तैरने लगे। मुझे मालूम नहीं मेरे साथियों का क्या हश्र हुआ।

बहरहाल मुझे मौजें लिए फिरती रही। तमाम दिन की मुसीबत के बाद एक जोरदार मौज ने मुझे एक वीरान और छोटे से जजीरे पर ला डाला। मैंने जू तू करके उठा और रात गुजारने का इंतजाम किया। खाने की जजीरे में कोई कमी ना थी। हर तरफ जंगली अंगूरों की बेलें फैली थी। रात मैंने आराम से गुजारी। सुबह उठकर चला के देखूं। यहां से निकलने का क्या रास्ता है? आखिर हफ्ते एक चश्मे के किनारे पहुंचा जहां मैंने एक अजीब उलखलकत बूढ़े जिन को देखा जो अपना आधा जिस्म पतों से छुपाए बैठा था। जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो मुस्कुरा कर इशारे से मुझे अपने पास बुलाया और कहा मुझे चश्मे के किनारे पहुंचा दे। उसके पैरों में हड्डी बिल्कुल नहीं थी। मैंने हमदर्दी के तौर पर उसको कंधे पर उठाया और उसकी टांगे मेरे गर्द लिपट गई। मैं उसको लेकर चश्मे के किनारे आया। उतरना चाहा तो उसने अपनी टांगे कस ली। अब मैं परेशान हुआ कि इस मुसीबत से कैसे निजात हासिल करूं। थोड़ी देर के बाद वो किसी तरह चलने को इशारा करता और अगर मैं जरा भी रुकता तो अपनी टांगे इस तरह मारता जैसे घोड़े को चाबुक मारते हैं। कई रोज इसी तरह गुजर गए कि मैं सोने के लिए लेटता तब भी वह अपनी टांगे मेरी गर्दन से अलग नहीं करता था। मैं हर वक्त उसकी तकलीफ से थक जाता।

चानांचा मैंने कुछ अंगूरों का रस निकाल कर रखा और धूप में रख दिया। दो चार रोज में शराब तैयार हो गई। एक रोज उस मलऊ बूढ़े ने भी उसे पीने की ख्वाहिश जाहिर की। मुझे ख्याल आया कि इसको खूब शराब पिलाकर बेहोश कर दूं। तब शायद निजात मिलेगी। चानांचा मैंने उसको खूब शराब पिलाई। यहां तक कि बूढ़ा बेहोश हो गया। उस वक्त उसके पैरों की गिरफ्त ढीली पड़ी। मैंने बासानी उसको अपने कंधे से अलग किया और एक पत्थर उसके नापाक सर पर जोर से मारा के भेजा। बाहर निकल आया। और इस तरह वो बूढ़ा खत्म हो गया। इस मुसीबत से छुटकारा पाकर मैंने खुदा का शुक्र अदा किया और एक जहाज के मिलने की उम्मीद पर किनारे की तरफ रवाना हुआ।

कई रोज के इंतजार के बाद किसी जहाज का उधर से गुजर हुआ। जहाज वालों ने मुझसे हाल पूछा और अजीब ओ गरीब बूढ़े से निजात पाने पर मुबारकबाद दी। फिर हम नारियल के दरख्तों के जजीरे में पहुंचे। मैं जजीरे की सैर को अंदरूनी हिस्से में चला गया और मुझे वापसी में काफी देर हो गई। जब साहिल पर आया तो मालूम हुआ कि जहाज चला गया है। साहिल पर कुछ लोग मौजूद थे। वो लोग दिन को जंगल में काम पर जाते और शाम को नारियलों के छिलकों की कश्तियों में सो जाते थे। उनमें से एक शख्स ने मेरा हाल सुनकर मुझे अपनी कश्ती में जगह दी और कहा कि सुबह को तुम भी इनके साथ चले जाना। यह नारियल इकट्ठे करते हैं। मैंने भी यही काम शुरू किया और शाम तक बहुत से नारियल जमा हो गए। जब काफी जखीरा हो गया तो एक तजारती जहाज आया और सब के तमाम नारियल खरीद लिए। मैं उसी जहाज में सवार होकर वहां से रवाना हुआ।

फिर हम एक ऐसे जजीरे में आए जहां मोती निकाले जाते थे। मेरे पास काफी अशरफी थी। मैंने भी किस्मत आजमाई की और बेहतरीन किस्म के मोती निकले। मैं उनको लेकर उसी जहाज में बंदरगाह एक गोहर आया और वहां से खुश्की के रास्ते शहर फिरदौस आ गया। उसके बाद हमजा ने एक और थैली अशरफी की उबेद को दी और अगले दिन आने की दावत दी ताकि छठे सफर का हाल सुनाया जा सके। जब तक सफर की थकान दूर ना हुई और उन आफात की याद ताजा रही जो पांचवें सफर में मुझे पेश आई। मैं अपने अहद पर कायम रहा। लेकिन ऐश ओ इशरत और जिंदगी की अक्सानी से तबीयत फिर उकता गई तो मैंने फिर सफर की ठान ली। मैंने माल तिजारत लिया और रवाना हो गया। एक जमात जो कि कारोबारी सिलसिले में बाहर जा रही थी। मैं भी उनके साथ हो लिया। एक रोज हमारा जहाज एक चट्टान से टकरा कर टुकड़े-टुकड़े हो गया। मैं और मेरे साथी तख्तों के सहारे तैरने लगे। आखिर मैं भी एक टूटे हुए तख्ते पर बहता हुआ एक पहाड़ के किनारे जा लगा। मैंने वहां देखा कि बेशुमार इंसानी ढांचे पड़े हुए हैं। जिनसे यह जाहिर होता है कि शायद हमसे पहले बहुत से जहाज उस मुकाम में फंसकर तबाह हो चुके हैं। मरने वालों का बहुत सा जवाहर भी वहां पड़ा था। मैंने कुछ तख्ते इकट्ठे करके एक छोटी सी कश्ती तैयार की और कश्ती को समंदर में डाल दिया। अल्लाहू अकबर कहकर उसमें बैठ गया और चल दिया।

सफर की थकान और भूख की शिद्दत से कौते बर्दाश्त जवाब दे गई और मैं कश्ती में बेहोश हो गया। जब मेरी आंख खुली तो मैंने देखा मेरी कश्ती साहिल पर बांधी गई है और आसमान पर सूरज चमक रहा है। मैंने इधर-उधर देखा कि मेरी कश्ती के किनारे पर चंद आदमी बैठे हैं। उन लोगों ने मुझे खाने को दिया। फिर मैं साहिल पर आ गया। चंद रोज इसी तरह उनके साथ बसर किए कि जिस चीज की मुझे जरूरत होती इशारे से मांग लेता। खुशकिस्मती से एक दिन एक शख्स आया जो उनकी जुबान भी जानता था और अरबी भी। उसके जरिए मैंने अपना हाल उनको बताया। वो लोग मुझे अपने बादशाह के पास ले गए और उसी तर्जुमान के जरिए मेरी उनसे बात हुई। बादशाह को जब मालूम हुआ कि मैं शहर फिरदौस का रहने वाला हूं तो बहुत खुश हुआ और कहने लगा मैं सुल्तान आजम का दोस्त हूं। मैं चंद रोज उस शहर में रहा और जब सफर की थकावट दूर हो गई तो मैंने बादशाह को खबर दी कि मैं अपने वतन वापस जा रहा हूं। बादशाह ने सुल्तान एआम की खिदमत में पेश करने के लिए बहुत से तोहफे दिए और एक जहाज में जो बंदरगाह गोहर जा रहा था मुझे सवार कराया। वहां से मैं खुकी के रास्ते शहर फिरदौस आ गया।

छठे सफर का हाल बयान करने के बाद हमजा ने उबेद को अशरफी की थैली देकर कहा कि कल फिर आना। मैं तुम्हें सातवें और आखिरी सफर की दास्तान सुनाऊंगा। मुझे सफर से आए हुए ज्यादा मुद्दत नहीं गुजरी थी कि मेरी तबीयत शहर फिरदौस से फिर उकता गई और मैं सफर के लिए तैयार हो गया। मेरी रवानी की खबर हुई तो सुल्तान आजम ने मुझे अपने दरबार में तलब किया और फरमाया कि पिछले सफर पर से वापसी पर जो खत और तोहफे लाए थे अब हम उसका जवाब देना चाहते हैं। चानांचा उन्होंने एक खत और बहुत से तोहफे मुझे दिए। मैं सब सामान लेकर बंदरगाह गौहर पहुंचा और वहां से जहाज में सवार होकर एक लंबे सफर के बाद उस जजीरे में पहुंचा जहां के बादशाह को खत ले जाने थे। बादशाह ने मुझे बहुत इज्जत और इनाम इकराम दिया। उसके बाद मैं मुल्क मशरिक चीन के सफर पर रवाना हो गया।

लेकिन अभी जहाज लंगर अंदाज होने नहीं पाया था कि कप्तान सर पीटने लगा। कप्तान बोला हम इस वक्त बदकिस्मती से ऐसी जगह पर आ गए हैं जहां मदो जंजर है और जहाज साहिल की तरफ बढ़ने के बजाय खुद ब खुद गहरे समुंदर की तरफ लौट रहा है। हमारा जहाज पीछे हट गया। थोड़ी देर में तूफान सा महसूस हुआ और जब गौर से देखा तो मालूम हुआ कि एक बड़ी मछली हमें निगलने जा रही है। करीब आकर मछली ने जहाज को टक्कर मारी और जहाज पाशपाश हो गया। मैं टूटे तख्तों का एक हिस्सा पकड़ कर समुंदर में बहता रहा। मैं अपनी बदकिस्मती पर रो रहा था कि मैंने यह सफर क्यों किया। आखिर एक दिन तूफान की हलाकतखेज लहरों से बचकर किसी जजीरे के किनारे जा लगा। जब तबीयत को सुकून हुआ तो मैं उठकर घूमने लगा। सामने एक बहुत बड़ी नहर आई। मैं उसके किनारे बैठकर एक कश्ती बनाई और नहर में सफर शुरू कर दिया। तीन-चार रोज मैं उस नहर में सफर करता रहा। एक रोज मैंने दूर से देखा कि नहर एक पहाड़ी सुरंग के नीचे से होकर गुजरती है। यह देखकर मेरे होश हवास जाते रहे। पानी का बहाव इतना तेज था कि कोई तदबीर कारगर साबित ना हुई। मजबूरन आंखें बंद करके कश्ती में लेट गया और दिल में खुदा से सलामती की दुआएं मांगने लगा। कश्ती अपनी र में उलटती पलटती पहाड़ के नीचे से सलामती के साथ गुजर गई। मैंने सजदा शुक्र अदा किया।

सामने साहिल पर कुछ आदमी खड़े थे। मैंने इशारे से उनसे मदद मांगी। भूख की शिद्दत से मेरी जान लबों पर आई थी। उन लोगों ने मुझे खाना दिया। फिर अपने साथ शहर में ले गए और तीन रोज तक मेरी खातिर मदारत की। चौथे रोज मुझे साहिल पर ले आए और कहने लगे यह तुम्हारा माल है। अगर तुम चाहो तो इसे अच्छे मुनाफे पर फरोख्त किया जा सकता है। मैंने हैरान होकर कहा मेरे पास तो कोई माल असबाब नहीं है। वो हंसकर कहने लगे कि यह लकड़ी जिससे तुमने कश्ती बनाई है बेहद कीमती है जो इस वक्त बाजार का भाव गिरा हुआ है। लेकिन फिर भी कम ओबेश 1100 अशरफी में फरोखत हो सकती है। मेरे साथ एक बूढ़ा शख्स रहा करता था। जब मैं वहां रहने लगा तो एक रोज बूढ़े ने कहा कि मेरा आखिरी वक्त आ चुका है। अगर तुम मेरी बेटी को अपने जजियत में कबूल कर लो तो मेहरबानी होगी। मैंने उस लड़की से शादी कर ली और हंसीखुशी रहने लगा। चंद रोज बाद बूढ़े का इंतकाल हो गया और उसकी तमाम जायदाद के वारिस मैं और मेरी बीवी बन गए।

एक हफ्ता के बाद मैंने महसूस किया कि यह अजीब लोग हैं क्योंकि हर महीना बाद इनके पर निकल आते हैं और यह उड़कर कहीं जाते हैं। एक दफा एक शख्स की खुशामद करके मैं उसके पैरों में लिपट गया और वो मुझे उड़ाकर एक पहाड़ पर ले गया। वहां पहुंचकर मैंने देखा कि उस कबीले के और बहुत से परों वाले आदमी हैं और फरिश्तों की तस्बीहो दहलील की आवाजें वहां से आ रही हैं। बेख्तियार मेरे मुंह से सुभान अल्लाह निकल गया। यह सुनते ही गौसे से भरे वह मुझ पर लपके और मुझे धक्के देकर वापस कर दिया। मैं हैरान था कि एक मुसीबत से निकलता हूं और दूसरी आ मौजूद होती है। इसी असना में एक बहुत खूबसूरत नौजवान औरत मेरे करीब आई और सलाम करके मुझे तसल्ली दी और सोने की छड़ी देकर कहने लगी अब नीचे उतरो। मैं पहाड़ से नीचे उतरने की कोशिश कर रहा था कि एक आदमी भागता हुआ आया जिसके पांव में एक अजदहा था। मैंने उस आदमी को मुश्किल से बचाया। वो मेरा बहुत शुक्रिया अदा किया और हम दोनों आगे चले। फिर वही आदमी आया जो मुझे पैरों पर बिठाकर पहाड़ तक लाया था। करीब आकर उसने मेरी बड़ी खुशामद की और मुझे दोबारा घर छोड़कर आया। मेरी बीवी ने सलामती पर शुक्र अदा किया और कहने लगी ये लोगों से बिल्कुल मेलजोल ना रखो। यह लोग आफात और शयातीन है। मैंने कहा फिर इस मुल्क में रहने का क्या फायदा? वो कहने लगी बिस्मिल्लाह अपने वतन चलो। चुनांचा मैंने कुल जायदाद फरोख्त करके अपना सामान ए तजारत खरीदा और जहाज में सवार होकर बखैरियत बंदरगाह एगोहरा गया और वहां से खरीदो फरोख्त करता हुआ शहर फरदौस आया और हमेशा के लिए सफर से तौबा कर ली। अब ऐशो अशरत की जिंदगी बसर करता हूं।

हमजा ने सातों सफर की मुकम्मल दास्तान सुनाकर एक और थैली अशरफी की उबेद को दी और कहा कि आइंदा मेरे पास रहो और कारोबार करो। चनांचा उबेद अपने अहलो अयाल के साथ हमजा के घर आ गया और दोनों भाइयों की तरह हंसीखुशी रहने लगे।