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भगवान विष्णु का चरित्र ही सत्यनारायण की कथा है। इसलिए इन पांच अध्यायों के अंतर्गत तीन दिनों में हम लोग जो पांच अध्यायों की श्री सत्यनारायण भगवान की वत कथा को सुनेंगे, बहुत गंभीरता पूर्वक सुनेंगे। आती भी हो फिर भी सुनना। हनुमान जी का स्वभाव है, उन्हें प्रत्येक कथा आती है फिर भी वो वैसे ही सुनते हैं जैसे कुछ जानते ना। दीन भाव में वही आंखों से आंसू बहाते हुए आती भी हो तब भी सुना। बहुत धरता पूर्वक सुनना। जो मन में मनोकामना हो पहले भगवान विष्णु का जो चित्र लगा है ध्यान कर लो। पीछे चित्र लगा भगवान श्री हरि का इनको प्रणाम कर लो। वंदन करो अपने गुरुदेव भगवान को भी ध्यान करो।
देखो सत्यनारायण भगवान के लिए भागवत में वर्णन आया, सत्यव्रतम सत्य परमं सत्यं सत्ययोनिं तमं। सत्यं सत्यं सत्यं ममृतं सत्यनेत्रं। [संगीत] सत्यात्मतीर्था है। भगवान ही सत्य है और सत्य ही भगवान है। इनके अलावा सब कुछ मिथ्या है। ब्रह्म ही सत्य जगन्मिथ्या। जगत मिथ्या है, ब्रह्म सत्य है। ऐसे भगवान श्री नारायण जिनके नाम पर बद्रीनाथ भगवान हैं। ऐसे भगवान श्री महाविष्णु के इस पावन धाम में हम लोग सत्यनारायण की कथा को श्रवण कर रहे हैं, करवा रहे हैं। आप लोग और श्रवण भी कर रहे हैं। आप लोग य हम सब का सौभाग्य है।
भगवान श्री हरि को तुम व माता तुम वो बंधु सखा तुम तुम वो विद्याम तुमे तुमे सर्वं देव देव तुमे सर्वं मम देव देव तुव सर्वं मम देव देव। ॐ विष्णवे नमः। ॐ विष्णवे नमः। ॐ विष्णवे नमः।
शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं। विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभं। लक्ष्मीकांतं कमल नयनं योगिवृंद ध्यानं। वंदे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकनाथं। भगवान नारायण को प्रणाम कर लीजिए। हम सबने यह भगवान को स्मरण किया, ध्यान किया है। उनको बुलाइए अपनी मन की मनोरथ पूर्ति के लिए। जो आप मनोकामना को पूर्ण करना चाहते हैं, उसको आप मन ही मन में बोलिए। बैठे बैठे आप बिना ताली बजा गाएंगे। श्रीमन नारायण नारायण नारायण। श्रीमन नारायण नारायण नारायण। वैसे तो यज्ञ चल रही है तो पूजन विधि आवश्यकता नहीं पर नाम संकीर्तन से सभी पूर्ति हो जाती है। इसलिए गाओ।
लक्ष्मी नारायण नारायण नारायण। लक्षमी नारायण नारायण नारायण। जो नारायण नाम लेत है नारायण नाम लेत है। पाप होते सब रायण हा पाप होते सब छ नारायण। नारायण नारायण। लक्ष्मी नारायण नारायण नारायण। सूर्य नारायण नारायण नारायण। सूर्य नारायण नारायण नारायण। चंद्र नारायण नारायण। [संगीत] नारायण। श्रीमन रायण नारायण नारायण। श्रीमन नारायण नारायण नारायण। [संगीत]
लक्ष्मी नारायण भगवान की जय हो। श्री सत्यनारायण भगवान की जय हो।
अत प्रथम अध्याय। एक दने सारण िया सोन कादया। एक समय हम सब हिंदी में चर्चा करेंगे ताकि आपको समझ में आवे। एक समय नैमिषारण्य के पावन तीर्थ में सनकादिक 88 ऋषि मुनि विराजमान थे। सभी मुनि महात्मा पुराण और शास्त्रों के वेत्ता थे। उसी समय उन मुनियों ने ऋषियों ने श्री सूत जी महाराज से पूछा, हे महामुनि! हे भगवन! हे प्रभु! किस व्रत के करने से, किस तपस्या के करने से मनोवांछित फल प्राप्त कलयुग में मिल सकता है? क्योंकि कलयुग जुग सम आन नहीं। जो नरक विश्वास कलयुग बड़ा विचित्र युग होगा। इसमें ना व्यक्ति के पास समय होगा, ना पूजा के लिए समय होगा, ना धर्म के लिए समय होगा, ना ठीक से यह सत्कर्म कर पाएगा। कलयुग के लोग बड़े आलसी प्रमाद होंगे। कलिकाल के लोग बड़े ही स्वार्थी होंगे। पर हे भगवन! उन मनुष्यों का कल्याण भी कैसे हो? इसके लिए कोई सूक्ष्म छोटा सा व्रत, छोटा सा उपाय बताइए। हम सब उस उपाय को, व्रत को सुनना चाहते हैं। कृपा करके आप कहिए।
इतना सुनते ही श्री सूत वाचा। श्री सूत जी बोले, नारद न संपट भगवान कमलापति। एक बार यही प्रश्न देव ऋषि नारद जी ने भगवान विष्णु से भी पूछा था। हे मुनियों! तुम धन्य हो जो तुमने कलयुग के मनुष्यों के कल्याण के लिए हमसे प्रश्न किया है। यही प्रश्न नारद जी ने भगवान विष्णु से भी किया था कि कलिकाल के लोगों का कल्याण कैसे होगा? वह कम समय में, क्योंकि तपस्या के लिए समय नहीं मिलेगा, जब के लिए समय नहीं मिलेगा, तब के लिए समय नहीं मिलेगा। यज्ञ बैठने में समय नहीं निकाल पाएगा। इससे अल्प समय में वह कैसे पुण्य को प्राप्त करें, कैसे फल को प्राप्त करें? कृपा करके हमको बतलाइए।
जब योगीराज श्री नारद जी ने संसार के नाना योनियों में जन्मे हुए मनुष्यों के कल्याण के लिए भगवान श्री हरि से प्रार्थना की और कहा, हे भगवन! नाना योनियों में जन्मे हुए मनुष्य नाना प्रकार के दुखों से क्लेश से युक्त रहेंगे। नाना प्रकार के भोग भोगेंगे, कष्ट पाएंगे। इनके दुखों का निवारण सुनिश्चित रूप से कैसे नाश हो सकता है? ऐसा हमारे मन में विचार है। हमको कहिए। भगवान श्री नारद जी उनके पास पहुंचकर भगवान श्री विष्णु का ध्यान करते हैं, स्वरूप का ध्यान करते हैं, प्रार्थना करते हैं। चार भुजाओं वाले भगवान नारायण हैं। इनके एक हाथ में शंख है, एक हाथ में चक्र है, एक हाथ में वज्र है, एक हाथ में पद्म है। वन की माला भगवान श्री हरि पहने हैं। विष्णु भगवान के गले में वन की माला है। भगवान विष्णु का शुक्ल वर्ण है। कैसा वर्ण है? वर्ण का मतलब स्वरूप कैसा है? शुक्ल वर्ण है। नील जैसा स्वरूप है भगवान का। शुक्ल वर्ण के श्री हरि भगवान विष्णु नारायण हैं। भगवान श्री हरि के स्वरूप को देखकर देव ऋषि नारद जी देव स्तुति करने लगे, कहने लगे, हे भगवान! आप वाणी व मन से परे हैं, अनंत स्वरूप वाले हैं, अनंत शक्ति संपन्न हैं। आपका ना आदि है, ना मध्य है, ना अंत है। आप से रहित हैं, आप निर्गुण हैं, गुनातीत हैं। भगवान निर्गुण है, निराकार भी है। भगवान निराकार ही है, पर भक्तों के लिए वह साकार बनकर प्रकट हो जाते हैं। जैसे हवा का कोई आकार नहीं है, पर गुब्बारे में डालने से गुब्बारे की हवा हो जाती है, ह् बारे का हवा का गुब्बारा हो जाता है। वैसे ही भगवान निराकार हैं, परंतु भक्तों के कल्याण के लिए भगवान साकार बन करके प्रकट होते हैं। इसी स्तुति को देव ऋषि नारद जी भगवान से कर रहे हैं। आप अनंत शक्ति संपन्न हैं, आपका ना आदि है, ना मध्य है, ना अंत है। आप निर्गुण हैं, निराकार हैं। हे हरि! आप सकल कल्याण मय हैं, गुण गणों से संपन्न हैं। भगवान में सभी गुण व्याप्त हैं। भगवान वही है, छह गुणों से तो व्याप्त ठाकुर जी है ही है।
भगवान श्री हरि को दंडवत प्रणाम करते हुए श्री नारद जी कहने लगे, आप स्थावर जगम निखिल सृष्टि प्रपंच के कारण भूत तथा भक्तों की पीड़ा को नष्ट करने वाले हैं। भगवान का स्वभाव है, जो इनकी शरण में आता है, उसका अवगुण नहीं भगवान देखते। एक गुण पर ही भगवान रीझ जाते। न जाने कौन से गुण पर दया निधि रीझ जाते हैं। यही सब ग्रंथ कहते हैं, यही सब वेद गाते। भगवान किस गुण पर रीझ जाए, उनका कोई ठिकाना। श्री बिंदु जी कहते, कृपा की ना होती जो आदत तुम्हारी, तो सुनी ही रहती अदालत तुम्हारी। ना हम होते मुजरिम, ना तुम होते हाकिम। ना घर घर में होती इबादत तुम्हारी। तुम्हारी ही उल्फत के दृग बिंदु हैं ये। तुम्हें सौंपते हैं अमानत तुम्हारी। कृपा की ना होती जो आदत तुम्हारी, तो सुनी ही रहती अदालत तुम्हारी।
तो नारद जी प्रार्थना करते, हे प्रभु! आप भक्तों की पीड़ा को नष्ट करने वाले परमात्मा हो, आपको नमस्कार है। स्तुति सुनते ही भगवान प्रसन्न हो गए। भगवान श्री हरि नारद जी से बोले, हे महा! आप कहां से आए हो? अभी अभी और किस प्रयोजन से आए हो? नारद जी हाथ जोड़कर मुस्कुरा करर बोले, भगवान! अभी हम मृत्यु लोक से आए हैं। मृत्यु लोक यह मृत्यु लोक कौन है? जहां हम लोग रहते हैं, इसी लोक का नाम मृत्यु लोक है, जहां सबको मरना है। आज जगतगुरु शंकराचार्य ने कहा, पुनरपि जन्मं पुनर पुनर जननी जठरे स। जिसका जन्म होगा, वो मरेगा। जो मरेगा, वो फिर से जन्म लेगा। इसका उत्तर रामचरित मानस में भी गोस्वामी जी ने दिया, जो जन्मे सो निश्चय नासा। जो ना से सो पुन प्रका। तो मृत्यु लोक कौन है? जिस लोक में हम लोग रहते हैं, इसी लोक का नाम है। क्या नाम है? लोक मतलब जो जन्म लिया, वो मरेगा। यहां सब कुछ नाशवान है। संसार का मतलब ही है, जो नित्य सरक रहा हो। यही संसार है, इसमें नित्य सब कुछ खिसक ही रहा है। संसार भी खिसक रहा है। या अब कथा के बीच में बोलना नहीं चाहिए, पर उदाहरण देना चाहिए। दृष्टांत कुश लो धीरा वक्ता कार तो उदाहरण के रूप में बताए। संसार खिसक रहा है। यही बगल में जोशी मठ में पूरी जमीन ही खिसक रही। संसार खिसक रहा है, नित्य चल रहा है। इसी का नाम संसार है।
तो नारद जी से पूछा, कहां से आए हो? मृत्यु लोक से आए। क्या करने गए महाराज? नाना प्रकार के मनुष्यों को पीड़ा से दुखी देखकर के हमारा मन बड़ा दुखी हो गया है। मृत्युलोके जन सर्वे नाना क्लेश समन्विता। नाना योनी समन्विता। पाप कर्म भी महाराज, म लोक में अपने पाप कर्मों के द्वारा विभिन्न योनियों में उत्पन्न सभी लोग बहुत प्रकार के क्लेश से दुखी हो रहे हैं। भगवान बोले, हम क्या करें? अगर वह दुखी हो रहे, जो करेगा, सो भरेगा। उन्होंने कर्म किया है, सो प रहे। भगवन! आप दयालु हो, दीनानाथ हो, हम आपसे उन मनुष्यों के दुखों के निवृत्ति के लिए कोई लघु उपाय, छोटा सा उपाय पूछने आए हैं। अगर आप वह उपाय बता दें, आपकी बड़ी कृपा होगी।
इतना कहते ही भगवान मुस्कुरा करके नारद जी से बोले, धन्य है साधु साधु साधु साधु। धन्य हो, धन्य हो। साधु कौन? अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचन द्वयम्। परोपकाराय पुण्याय, पापाय परपीड़नम्। साधु कौन है, जो परोपकार की भावना से जीवन जीता है? जो दूसरों के हित के लिए जीता है? जो केवल अपने लिए जिए, वो दानव। जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिए जिए, वो मानव। और जो केवल दूसरों के लिए जिए, वही साधु कहलाता है। तो धन्य है नारद जी। साधु साधु साधु कहते हुए भगवान मुस्कुरा कर के बोले, हे वत्स! संसार के ऊपर आपने अनुग्रह करने की इच्छा से बहुत अच्छी और उत्तम बात पूछी है। एक व्रत हम बतला रहे हैं, नारद जी, जिसके करने से प्राणी मोह से मुक्त हो जाएगा। मतलब देखो, संसार में जितना भी दुख है, वो मोह का है। मोहे मूलं बहु शूल प्रदं, त्याग तम अभिमान। रामचरित मानस में भी आया, मोह ही सबसे बड़ा कष्ट है। पुराने जमाने के महात्मा अपने गांव में नहीं रहते थे, 100 डे स किलोमीटर दूर भजन करते थे। अब मठ बनाते थे, आश्रम क्यों? क्योंकि गांव में रहेंगे तो मोह उत्पन्न होगा। भाई से मोह उत्पन्न होगा, पिता से मोह उत्पन्न होगा, चाचा से मोह उत्पन्न होगा, ताई से मोह उत्पन्न होगा, फिर कष्ट होगा। वो दुखी होंगे, तो दुख होगा। फर दुख में सम्मिलित होंगे, तो फिर साधु में और गृहस्ती में अंतर क्या रह जाएगा? तो मोह मूलं बहु शूल प्रदं, त्याग तम अभिमान। अच्छा मोह से बचने का उपाय क्या है? भगवान ने कहा, हे नारद जी! प्राणियों को मोह से मुक्त करने का एक उपाय बताता हूं, सुनो। स्वर्ग और मृत्यु लोक दोनों में दुर्लभ है। हम भगवान सत्यनारायण का एक महान पुण्य प्रद व्रत बतला रहे हैं। आपके स्नेह के कारण इस समय हम उसको, इसी समय हम उसको बतला रहे हैं। हे नारद जी! जो सत्यनारायण भगवान के व्रत को अच्छी प्रकार विधि विधान से, भगवान सत्यनारायण का व्रत करेगा, वह मनुष्य शीघ्र ही संसार के समस्त सुखों को पाकर, लोक के समस्त सुखों को पाकर, परलोक में मोक्ष को प्राप्त करेगा।
नारद जी प्रणाम करते हुए बोले, जय हो! जय हो! जय हो! भगवान! वो कौन सा उपाय है? आप हमको बतलाइए। किम फलं किम विधानं च कृतं कैनेव तद्व्रतम्। तत सर्वं विरं बही कदा कारं अमृतं प्रभु। नारद जी बोले, हे प्रभु! इस व्रत को करने का नियम क्या है? सत्यनारायण भगवान के व्रत करने का विधान क्या है? उसका फल क्या है? और इस व्रत को किसने किसने किया? और जिस जिसने किया, उसने क्या क्या पाया है? हमको यह सब विस्तार पूर्वक बताइए। पूरा एक-एक करके बताइए, कैसे करना चाहिए, कब करना चाहिए, किसने किसने किया है? हमको विस्तार पूर्वक बताइए।
भगवान बोले, यह सत्यनारायण भगवान का व्रत दुख, शोक आदि का समन करने वाला है। दुख को मिटाने वाला है, शोक को हरने वाला है। यह धन-धान की वृद्धि करने वाला है। बंधन में पड़े हुए व्यक्ति को बंधन से मुक्त करने वाला है। संतान नों को संतान देने वाला है। यह सत्यनारायण भगवान का जो व्रत करेगा, सत्यनारायण का व्रत मतलब सत्य के व्रत को जो करेगा, सत्य के पालन को जो करेगा, सत्य पर जो चलेगा, सत्य नारायण की जो चर्चा करेगा, जो सत्य का अनुसरण करेगा। हे नारद जी! उसकी सर्वत्र सब जगह विजय होगी। धन-धान से मु युक्त हो जाएगा, बंधन से मुक्त हो जाएगा, सौभाग्य संतान प्राप्त होगी। जिस किसी दिन भी यह भक्ति और श्रद्धा समन्वित होकर, भक्ति भाव से इस व्रत को करेगा, उसकी मनवांछित इच्छा पूर्ण हो जाएगी।
जय हो महाराज! कब करना चाहिए? किसी भी दिन कथा को सत्यनारायण की कथा करने का कोई भी दिन निश्चित नहीं है। कब कौन सी तिथि? किसी भी तिथि। कितने समय? इसका समय बताया। बोले कब? बोले जब गोधूली का समय होवे, सायम काल समय। इस व्रत को करना चाहिए। आज कल के जमाने में ठ ही बजे सत्यनारायण की कथा होकर बोले, महाराज बहू बेटा भूखे हैं, कथा कर दो। ठ ही बजे पूरी हो जाती है। फिर कहते, महाराज हर अमावस्या सत्यनारायण सुन, कुछ नहीं हो रहा। टरी के भरे। अरे भाई, सत्यनारायण के नियम को तो समझ लो। चार अंकों का फोर डिजिट का पासवर्ड है। तीन डिजिट बढ़िया डालो, एक डिजिट गड़बड़ डाल दो, तो क्या पासवर्ड का लॉक खुलेगा? जब तक फोर डिजिट ठीक नहीं डालोगे, तब तक नहीं खुलेगा। वैसे ही सत्यनारायण कथा का नियम है। कब करना चाहिए? कभी भी, किसी भी दिन। लेकिन कितने समय? सायम काल समय, जब गौ के खुर से धूल उड़ने लगे, तब सत्यनारायण भगवान की कथा को कैसे करना चाहिए? ब्राह्मणों को बुलाकर, अपने बंधु बांधव के साथ, परिवार के साथ, धर्म में तत्पर होकर, सायम काल भगवान के व्रत को करना चाहिए।
महाराज! इसमें सामग्री क्या लगती है? नैवेद्य के रूप में, इसमें सामग्री में बताया, नैवेद्य के रूप में आटा का चूर्ण, आटा के अभाव में साठी का चूर्ण, पदार्थ को जमा कर लेवे। केले का फल होना चाहिए। कल सब लोग केला लेकर के आएंगे और पंडित जी भी यहां पर केले का खंभ लगवा दे, तो बहुत अच्छा है। केले का फल, घी, दूध, गेहूं का चूर्ण, गेहूं के चूर्ण के अभाव में साठी का चूर्ण, मतलब चावल का चूर्ण, शक्कर या गुड़। यह सभी सामग्री जमा कर ले, एकत्रित कर ले। इसको एकत्रित करने के बाद, सायं काल ब्राह्मणों को बुला कर के, भक्ति भाव, एकाग्र चित्त मन से कथा के मध्य में, इस व्रत के मध्य में, सत्यनारायण संकल्प के मध्य में, मन में विचलित नहीं लानी चाहिए। मन के हारे हार है, मन के जीते जीत। मन के हारने से हार है, मन के जीतने से ही जीत है। इसलिए मन को एकदम सावधान होकर के, हमको सत्यनारायण भगवान के व्रत को करना चाहिए और व्रत पूजन करना चाहिए। ब्राह्मणों की वाणी को मानना चाहिए। जब सायं काल पूजन हो जावे, फिर ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिए। ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद में, बंधु बांधव को भोजन कराना चाहिए। विप्रायण दत् कथं सुवा जने तत, बंधुर भी सारं विप्रा प्रति भोज। कथा की दक्षिणा भी ब्राह्मण को देनी चाहिए। बंधु बांधव को भोजन करा कर के, प्रसादम भक्ष भक्त नित्य गीतादि कम चरित। जिस दिन कथा करो, उस दिन शाम के समय, जब बंधु बांधव को भोजन करा दो, तो रात को गीत गाना चाहिए। सत्यनारायण भगवान के गीत को, नारायण भगवान के कीर्तन को गाना चाहिए। रात्रि जागरण कर सको, तो और अनंत गुना फल प्राप्त होगा। रात्रि जागरण करना चाहिए। भक्ति पूर्वक प्रसाद ग्रहण करना चाहिए। नित्य गीत आदि का आयोजन करना चाहिए। तद उस दिन व्रत लेना चाहिए। क्या आज से हम सत्य पर चलेंगे, सत्य पर ही जीवन जिएंगे, सत्यनारायण भगवान के ही आश्रित रह कर के अपने जीवन को को सार्थक बनाएंगे। क्योंकि साच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप। जाके हृदय साच है, प्रभुता के हृदय आ। ऐसा व्रत लेना चाहिए। सत्य बराबर तप नहीं है, झूठ बराबर कोई पाप नहीं है। विशेष रूप से कलयुग में पृथ्वी में यही सबसे छोटा उपाय है।
इति श्री रे। इति श्री स्कंद पुराण रेवा खंडे श्री सत्यनारायण कथाया प्रथम अध्याय समाप्त। बोलो वृंदावन बिहारी लाल की। सत्यनारायण भगवान की जय हो। भत्री विशाल भगवान की हल्दी चावल ही सामने छोड़ दो। दक्षिणा हमारे पास। [संगीत] छोड़ना।
आज सत्यनारायण भगवान की द्वितीय अध्याय की कथा को सुनेंगे। श्री सत्यनारायण भगवान की जय हो। ॐ गं गणपति नमः। ॐ गं गुरुवे नमः। कल तक की कथा में जो हम आप सबने श्रवण किया था, नारद जी महाराज ने भगवान श्री हरि विष्णु से पूछा था कि हे प्रभु! कली काल में नाना योनियों में जन्मे मनुष्य को दुख मिलेगा, नाना प्रकार के कष्ट में लेंगे। कलयुग के लोग कम समय में आपके कौन से व्रत करने से पुण्य फल को प्राप्त करेंगे, मनोवांछित फल प्राप्त करेंगे? किस साधारण व्रत, कम समय के व्रत को करने से उनके नाना प्रकार के दुख संकट मिट जाएंगे, धन-धान से परिपूर्ण हो जाएंगे? भगवान श्री हरि ने नारद जी को कहा था, जो भी भक्त, जो भी साधक हमारी सत्यनारायण कथा को प्रेम पूर्वक, भाव पूर्वक करेगा, उसके सभी, उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होंगी। धन-धान से संपन्न हो जाएगा, निर्धन धनवान बन जाएगा, संतान नों को संतान की प्राप्ति होगी, बंधन में पड़े हुए व्यक्ति बंधन से मुक्त हो जाएंगे। उसका विधि पूर्वक भगवान श्री हरि ने नारद जी को उपाय भी बतलाया था।
अब द्वितीय अध्याय में श्री सूत वाचा। अब दूसरे अध्याय में वर्णन आता है, जिन्होंने सत्यनारायण भगवान की कथा को किया, उनको क्या क्या फल प्राप्त हुआ? कश्चित् काशिपुरे रम आहा। काशीपुरी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था। वह अत्यंत निर्धन ब्राह्मण था। भूख प्यास से व्याकुल होकर के, वह ब्राह्मण नित्य पृथ्वी पर घूमा फिरा करता था। भगवान ब्राह्मणों को बड़ा प्रेम करने वाले हैं, क्योंकि रामायण में भी वर्णन आया, विप्र धेनु सुर संत हित लीन मनुज अवतार। भगवान ब्राह्मणों से बड़ा प्रेम करते हैं। ब्राह्मण को निर्धन ब्राह्मण को देखकर के भगवान को दया आ गई। ब्राह्मण का काम क्या था? वह बूढ़ा ब्राह्मण, वृद्ध ब्राह्मण घर घर जाकर भिक्षा मांगता था और भिक्षा मांग कर के लाकर के अपने परिवार का स्वयं का भरण पोषण करता था। एक दिन भगवान को दया लगी। भगवान ने उस ब्राह्मण के पास एक बूढ़े ब्राह्मण का रूप धारण करके कहा, हे विप्र! तुम नित्य दुखी होकर के पृथ्वी पर क्यों घूमते हो? हमसे कहो, क्या मन में इच्छा है? वह ब्राह्मण बोला, हे भगवन! हम भिक्षा के लिए पृथ्वी पर घूमते हैं। भिक्षा याचना हैं। हे प्रभु! यदि दरिद्रता मिटाने का कोई उपाय आप जानते हो, कोई नियम जानते हो, तो हमको बतला दो, हम उसको अवश्य करें।
भगवान ने इतना जैसे ही सुना, मुस्कुराते हुए बूढ़े रूप में ब्राह्मण उस ब्राह्मण से बोले, पंडित जी! तुम सत्यनारायण भगवान का व्रत वा पूजन करो। जिस व्रत के करने से मनुष्य सब दुखों से छूट जाता है, जिस व्रत के विधान करने से निर्धन धनवान हो जाता है। ऐसे व्रत का मैं विधान बतला रहा हूं। हे ब्राह्मण देवता! अगर तुम इस व्रत को करोगे, तो तुम्हारी निर्धनता दूर हो जाएगी। बूढ़ा ब्राह्मण, वह ब्राह्मण देवता हाथ जोड़कर कहने लगे, भगवान! विधि बतलाइए। भगवान ने सत्यनारायण भगवान की विधि बतलाई, जो कल हमने आपको बतलाई थी। शाम के समय कथा को करना चाहिए, व्रत रखना चाहिए और बंधु बांधव को बुलाकर साठी का चूर्ण, साठी का चूर्ण ना हो तो गेहूं का चूर्ण, गेहूं के अभाव में साठी का चूर्ण, शक्कर, गुड़, केले का फल आदि सब सामग्री को रख कर के, बंधु बांधव को बुलाकर, ब्राह्मणों को बुलाकर इस व्रत को करना चाहिए। ब्राह्मण देवता को उपाय बतलाया। भगवान उपाय बतला करर अंतरध्यान हो गए।
उसके बाद जब अंतरध्यान हुए, तो वह ब्राह्मण अपने घर को गया। ब्राह्मण रात्रि काल में उसको नींद नहीं आई। हमको उपाय तो कह दिया कि व्रत को करो, व्रत को करने से धन धनवान हो जाता है, पर हमारे घर पर तो फूटी चवन्नी नहीं है, फूटी कौड़ी नहीं है। हम कहां से इस व्रत को करेंगे? पर प्रातः काल उस ब्राह्मण ने उठकर संकल्प लिया। देखो संकल्प में कितना बल होता है। संकल्प लिया कि आज ग्राम में लकड़ी बेचने से जो भी धन मिलेगा, आज ग्राम, आज ब्राह्मण ने विचार किया, आज भिक्षा में हमें जो भी धन मिलेगा, उस धन से हम सत्यनारायण भगवान की कथा को करवाएंगे। ऐसा मन में प्रण ले लिया। ब्राह्मण देवता ने प्रण लेकर के भिक्षा याचना के लिए गए, भिक्षा मांगने के लिए गए। भगवान की बड़ी कृपा हुई। उस दिन उनको चार गुना भिक्षा में धन प्राप्त हुआ। ब्राह्मण देवता भगवान को धन्यवाद कहने लगे, जय हो प्रभु! आज ही हमने संकल्प लिया था, आज ही आपने हमारी सुन ली। खूब संपदा प्राप्त हुई। जैसे ही बहुत संपदा प्राप्त हुई, तुरंत ब्राह्मण देवता अपने घर को आए। बंधु बांधों को बुलाया, ब्राह्मणों को बुलाया। भक्ति पूर्वक सभी सामग्री को एकत्रित करके, सायं काल के समय, ब्राह्मण देवता ने सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। भगवान से प्रार्थना की, हे प्रभु! अगर हम पर कृपा होगी, तो हम हर महीने आपकी व्रत कथा, सत्यनारायण की कथा को करवाएंगे, सत्यनारायण भगवान के व्रत को करेंगे। भगवान भक्ति भाव पूर्वक इस व्रत के करने से प्रसन्न हो।
गए और खूब आशीर्वाद भगवान ने दिया। वह ब्राह्मण उस व्रत के प्रभाव से सभी दुखों से छूट गया एवं खूब धनवान हो गया। ब्राह्मण बड़ा प्रसन्न हुआ। उस दिन के बाद वह ब्राह्मण प्रत्येक महीने सत्यनारायण भगवान के व्रत को करने लगा। ऐसे सत्यनारायण का व्रत जो करेगा वह पापों से छूटकर दुर्लभ मोक्ष को प्राप्त होगा।
श्री सूत जी बोले, "हे विप्रो! हे ऋषियों! इस व्रत को जो भी पृथ्वी पर करेगा वह मनुष्य सभी दुखों से छूट जाएगा। उसके समस्त दुख नष्ट हो जाएंगे।" ऐसे श्री सूत जी ने अपनी वाणी से कहा। ऋषियों से कहते हुए कहा, "सूत जी बोले, हे मुनियों और सुनो! इस ब्राह्मण की देखा देखी करके और किसने सत्यनारायण भगवान के आशीर्वाद को पाया।"
एक दिन वही ब्राह्मण धन के और विस्तार के लिए सत्यनारायण की कथा कर रहा था। भाव पूर्वक श्रद्धा पूर्वक अपने भवन में। लेकिन उसी समय एक लकड़ी वैष्णव वाला लकड़हारा वहां से निकला। उसने बहुत भीड़ को देखा पंडित जी के घर पर तो लकड़ियों का गट्ठा बाहर रख दिया अंदर भवन में पहुंच गया। सत्यनारायण की कथा उसने कभी सुनी नहीं थी देखी नहीं थी। भाव पूर्वक जब देखा बड़ा प्रसन्न हुआ। जब सत्यनारायण की कथा पूरी हो गई तो ब्राह्मण देवता ने चरणामृत दिया भगवान का। उसने चरणामृत पिया पंजीरी का प्रसाद दिया उसने प्रसाद पाया। हाथ जोड़कर ब्राह्मण से पूछा, "हे देव! यह कौन सा व्रत है इसके करने से क्या फल मिलता है? कृपा करके हमको विस्तार पूर्वक बताइएगा।"
ब्राह्मण देवता ने कहा, "अरे भैया लकड़हारा! यह सभी मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला मनोवांछित फल देने वाला धन धान को बढ़ाने वाला। इसकी ही कृपा से हमारे घर पर धन धान आदि की वृद्धि हुई है। हे लकड़हारे भैया! यह कोई और नहीं श्री सत्यनारायण भगवान का व्रत है।"
लकड़हारा बड़ा प्रसन्न हुआ। महाराज जब तुम्हारे धन धान बढ़ गया पहले तुम्हारी भी स्थिति हमारे जैसी थी अब बढ़िया हो गई अब हमारी स्थिति गड़बड़ है आपने व्रत किया आप यहां पहुंच गए हमें भी विधि बतला दो थोड़ा हमारी भी जिंदगी जुग जुग आ जाए हमको भी कुछ प्राप्त हो जाए प्रभु की कृपा।"
ब्राह्मण देवता अपने विस्तार पूर्वक लकड़हारे को नियम बतलाया विधि बतलाई। प्रसाद पाकर जल पीकर वह लकड़ हार अपने घर को चला आया पर मन ही मन में चिंतन करता हुआ आया कि आज ग्राम में लकड़ी बेचने से जो भी धन मिलेगा उससे मैं सत्यनारायण भगवान के उत्तम व्रत को करूंगा। भगवान की ऐसी माया भगवान क्या नहीं कर सकते जिस पर भगवान की कृपा हो जाए। रामायण में वर्णन आया जा पर कृपा राम की हो ता पर कृपा करे सब कोई। जिस पर राम की कृपा होती है उस पर सभी लोग कृपा करने लगते हैं।
लकड़हारे ने कहा, "हे प्रभु! अगर हमारी लकड़ी बेचने से बढ़िया धन मिलेगा तो हम सत्यनारायण भगवान के व्रत को करवाएंगे।" भगवान की कृपा से जो लकड़ियों लकड़ियों का गट्ठा अपने सिर पर रख कर के ले जा रहा था प्रभु की ऐसी कृपा हुई कि वह लकड़िया चंदन की बन गई तो पहले के दिनों में काष्ट मूल्यम चद गणम प्राप्त वान स उसको दुगना धन प्राप्त हुआ। लकड़ियों का इतना आज तक नहीं मिला। उसने कहा बढ़िया उपाय है सोचने और संकल्प करने मात्र से दो गुना धन मिल गया। बा उसने तुरंत लकड़ियों को बेच कर धन से सामग्री खरीद कर ऐसे सुंदर नगर में जैसे ही उसने लकड़ियों को बेचा हृदय प्रसन्न करते हुए केले का फल शक्कर घी दूध गेहूं का आटा इसके अभाव में साथ में सवा शेर इकट्ठा किया। सब सामग्री को एकत्रित करके आनंद के साथ अपने घर आया। भाइयों को बुलाया बंधुओं को बुलाया भूदेव ब्राह्मणों को बुलाया। सायम काल समय उस लकड़हारे ने सत्यनारायण भगवान के व्रत को करना प्रारंभ कर दिया। पंडित जी ने कथा को गाया सत्य का व्रत दिलवाया सत्य पर चलना सत्य ही बोलना सत्य पर पर ही अपने जीवन को व्यतीत करना इसी से नारायण प्रसन्न होए। लकड़हारे ने व्रत ले लिया और संकल्प किया सत्यनारायण भगवान की कथा को सुना उसने सबको प्रसाद पाया पूरी रात रात्रि जागरण किया कीर्तन किया। इसके प्रभाव से वह धनवान हो गया। इस लोक में समस्त सुख भोग करर अंत में भगवान के लोक को गया।
इति श्री स्कंद पुराने रेवा खंडे सत्यनारायण वृत कथाया द्वितीयो अध्याय समाप्त। बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय हो सत्यनारायण भगवान की जय हो। हल्दी चावल ले हमारे ऊपर नहीं चढ़ाने थाली में चढ़ा तुम हमारे ऊपर फेंक रहे हम साले ग्राम जी दिख रहे तुमहे जल्दी चावल ले लो।
अथ तृतीय [संगीत] अध्याय। आप भी ले श्री सूत वाचा। तीसरे अध्याय में सत्यनारायण की महिमा और गाई जाती है। आज अध्याय को श्रवण करेंगे। अत तृतीय अध्याय ध्यान से सुनना।
श्री सूत जी बोले, "हे मुनि श्रेष्ठ! आगे की कथा सुनो। पहले के समय में एक उल्का मुख नाम का राजा था। उसका क्या नाम था उल्का मुख। उल्का मुख नाम का राजा बड़ा ही बुद्धिमान था जितेंद्रिय था। बुद्धि तो तेज थी ही इंद्रिया भी उसने जीत रखी थी इसलिए जितेंद्रिय था। सदा सत्य बोलने वाला था बुद्धिमान था। वह प्रतिदिन देवालय में जाता था मंदिर में जाता था रोज ब्राह्मणों को साधुओं को धन देता था। ब्राह्मणों को प्रसन्न करता था। उसकी पत्नी भी कमल के समान मुख वाली साधवी सती साधवी थी। उन दोनों ने संतान की कामना के लिए भद्र शलाला नदी के किनारे सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। राजा के पास सब कुछ था लेकिन एक कमी थी क्या संतान नहीं थी। और एक संत कहते थे पति बिन सनी मांग पुत्र बिन है घर सना। स्त्री कितनी भी सुंदर हो पर अगर सिंदूर से मांग ना भरी हो तो ठीक नहीं लगती। किसी राजा के घर पर कितना भी राजपाट हो धन हो दौलत हो पर संतति ना हो तो वो धन किसी काम का नहीं है। कौन संचालित करेगा कौन चलाएगा किसके लिए है? तो राजा के पास सब कुछ था लेकिन संतान नहीं थी। तो राजा ने अपनी पत्नी जो कमल के समान मुख वाली थी उसके साथ में जो है सत्यनारायण भगवान का व्रत किया। भद्र शीला नदी के किनारे पर सत्यनारायण की कथा कर रहे थे। उसी समय धन से परिपूर्ण एक नाव आई। उस नाव में एक साधु नाम का वैश्य बनिया बैठा हुआ था। वह वैश्य व्यापार के भाव से इस तरफ आया था। नाव को तीर के किनारे खड़े कर कर राजा के पास आ गया। राजा को भाव पूर्वक व्रत करते देखकर विनय भाव से पूछने लगा साधु बानिया कहने लगा, 'हे राजन! भक्ति युक्त भाव से बड़े प्रसन्नता पूर्वक आप ये क्या कर रहे हैं? इसके करने से क्या फल मिलता है और इसको क्यों करना चाहिए? इस समय मेरी सुनने की इच्छा है मुझको बताओ।'
राजा बोले, 'हे साधु बानिया! हम पुत्रा प्राप्ति की कामना के लिए बंधु बांधव के साथ अतुल तेजस्वी संतान के लिए भगवान सत्यनारायण का व्रत और पूजन कर रहे हैं।'
साधु नाम का बानिया बोला, 'महाराज! क्या सत्यनारायण का व्रत करवाने से संतान होगी?'
राजा बोला, 'बिल्कुल होगी। भरोसा दृढ़ होगा नियम का पालन करोगे व्रत को पूर्ण करोगे तो निश्चित तुम्हारे घर पर संतान होगी।'
साधु नाम का बानिया घर लौटा व्यापार करके आनंदित होकर के घर आया। उसने संतान देने वाली अपनी स्त्री से कहा, 'हे देवी! आज हम दोनों संकल्प ले रहे देखो सत्यनारायण का एक फल है आप व्रत करो तो तो फल मिलना ही है पर सामर्थ्य नहीं है समय नहीं है और उस वक्त आप सत्यनारायण की कथा ना करवा पाओ तो किसी भी परिस्थिति में सत्यनारायण कथा करवाने का अगर आप संकल्प ले लोगे तब भी आपका काम सफल हो जाएगा।'
साधु नाम का बानिया महा कंजूस था। उसने सोचा पहले कर देंगे और फिर बाद में संतान ना हुई तो तो पत्नी से बोला एक काम करो देखो जो जितना बड़ा होता है पुण्य की पुण्य की जड़ पाताल तक पाप की जड़ ल तक। साधु नाम का बानिया अपनी पत्नी से बोला एक काम करो हम दोनों संकल्प ले लेते हैं अच्छा क्या संकल्प हमारे जब संतान होगी तब हम सत्यनारायण भगवान के व्रत को करेंगे। पत्नी भी बड़ी प्रसन्न हो गई लीलावती नाम था पत्नी का लीलावती प्रसन्न हो गई बहुत अच्छा उपाय महाराज जय हो आपकी। लेकिन भगवान की कृपा कालांतर में साधु नाम के बाण के यहां लीलावती के गर्भ से एक सुंदर कन्या का जन्म हुआ। वह दिनों दिन ऐसे बढ़ने लगी दसवे महीने में उस कन्या का जन्म हुआ वह कन्या रत्न की उत्पन्न दिनों दिन ऐसे बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष का चंद्रमा बढ़ता है। उस कन्या के स्वरूप को देखकर ब्राह्मणों ने उसका नाम कलावती रखा। क्या रखा कलावती नाम रखा। नामकरण हो गया।
एक दिन लीलावती अपने पति से बोली, 'महाराज! आपने संकल्प किया था कि जब हमारे संतान होगी तब हम सत्यनारायण भगवान के व्रत को करेंगे।'
साधु नाम का वानिया बड़ा कंजूस था चमड़ी चली जाए पर दमड़ी ना जाए। उसने सोचा अभी कर देंगे पर शादी होगी फिर करना पड़ेगा दोदो बार खर्चा लगे। देवी चिंता मत करो बेटी का जब विवाह होगा तो दोनों इकट्ठी सत्यनारायण भगवान के व्रत को करेंगे। पत्नी को समझा बुझा दिया बचारी पत्नी क्या बोले समझ गई। साधु नाम का वानिया व्यापार करने चला गया। जब व्यापार करने चला गया कुछ दिनों बाद वापस आया। दृष्ट वात सुंदरम बालम वाण पुत्रम गुणा वित जब वापस आया उसने अपनी कन्या को खेलते हुए देखा। विवाहा अतम च कनया बम शेषम विचार कन्या को विवाह योग देखकर मन में सोचा बेटी का विवाह कर देना चाहिए। दूतों को बुलाया इधर आओ हमारी बेटी के लिए कोई सुंदर वर देख कर के लाओ। दूत गए एक सुंदर व्यापारी के बालक को देखकर महाराज के पास आकर साधु नाम के बानिया के पास आकर खबर की। साधु नाम के वाणिया ने उस सुयोग भ को देख कर के दृष्ट वात सुंदरम बालम माणिक के पुत्रम गुणात तुरंत अपनी बेटी कलावती का विवाह कर दिया। विवाह के बाद भगवान की कथा को भूल गया। पहले ही नहीं की ऊपर से विवाह की भागदौड़ में भूल गया। जब भूल गया तो दमान को घर पर ही रख लिया बेटा यहीं रहो हमारे पास तो बेटी भर है यही व्यापार करो हमारा काम देखो। कुछ दिनों के लिए दमान के साथ वह चतुर साधु बानिया दमान को लेकर व्यापार करने समुद्र के किनारे एक रतनपुर नामक नगर में गया। दमान भी बड़ा आदमी साधु नाम का बानिया भी बड़ा आदमी दोनों राजा चंद्रकेतु के नगर में व्यापार करने लगे। भगवान ने सोचा बड़ा कंजूस है पहले कह रहा था कि बेटी हो जाएगी तो फिर सतन करवाएंगे बेटी हो गई सु फर कह रहा था कि जब विवाह हो जाएगा तब करवाएंगे अब शादी हो गई फिर तो वही हाल है फिर कहेगा नाती पोता और हो जाए फिर करवाए नाती पोता हो जाएंगे फिर कहेगा महाराज इनकी शादी और हो जाए इसका मतलब यह करवाएगा नहीं तो थोड़ा सा मजा चखा देना चाहिए भगवान ने ऐसा सोचा थोड़ी सी मिर्ची खिला दे क्या करें।
राजा चंद्रकेतु के नगर में जब वह वाणिया व्यापार करने लगा भगवान रुष्ट हो गए उसकी प्रतिज्ञा को भ्रष्ट देखकर देखो ये बात सा नी की या तो प्रतिज्ञा करो मत करो तो पूरी करो नहीं तो करो मत या तो संकल्प लो मत लो तो पूरा करो। उसकी भ्रष्ट प्रतिज्ञा को देखकर भगवान ने श्राप दे दिया जाओ तुम्हें महा दारुण दुख कठिन दुख प्राप्त होगा। साधु नाम के बानिया को कुछ पता नहीं लगा। कई लोगों का ऐसे ही हाल होता है उन्हें लगता है भगवान है ही नहीं है करते जाओ पाप कहां देख रहा है लेकिन जब भगवान की मार घलती है तब फिर ठिकाने लग जाता फिर जय बजरंग बली करता भैया कोई बताओ महात्मा जी अच्छे हो अर्जी लगानी है जब तक पाप करता है तब तक ध्यान नहीं आता है बोलो सीताराम।
साधु नाम का मानिया बड़ा प्रसन्न व्यापार करने लगा चंद्रकेतु के नगर में भगवान ने श्राप दे दिया। एक दिन भगवान ने माया के दो चोर बनाए कितने चोर दो। वह राजा का धन चुरा करके भागने लगे और दिखा के भागे सिपाहियों से बोले देखो जो ले जा रहे। सिपाही बोले अरे हमारे रहते जा पीछे पीछे सिपाही आंगे आंगे चोर। इतने माया के चोर गजब के थे कि उन्होंने इतनी तेज दौड़ लगाई कि चोरों ने कहा सोचा सिपाहियों को पता लगे कि हम यहां जा रहे और जिस भवन में वह बानिया और दमाद ठहरा था वहीं पर चोरों ने जा चोरों ने जाकर धन को रख दिया और माया के चोर गायब हो गए। दो चोर यह भी दो सिपाही ने समझा यही है बानिया को और दमाद को दोनों को पकड़ कर ले गए राजा के सामने जाकर खड़ा किया महाराज हमने आपके धन को चुराने वाले दो चोरों को पकड़ लिया है आप आज्ञा करें। राजा ने कहा इनका धन छीन लो इनको कठोर कारावास में डाल दो। दोनों खूब सफाई देते रहे पर भैया जब लाठी घलती राम की नहीं चलती किसी की भगवान की लाठी बड़ी खतरनाक है इसलिए तो हमने पहले ही कहा पुण्य की जड़ पाताल तक की जड़ अस्पताल तक। साधु नाम का बानिया रोने लगा कारा ग्रह में पड़ा पड़ा। इधर सत्यनारायण भगवान की माया के कारण उसकी बात को किसी ने नहीं सुना। राजा चंद्र केत ने सारा धन छीन लिया और श्राप के कारण उसके घर पर भी चोरी हो गई ले हम आए एक संत कहते थे बाही धन अनीत को दशक बरस तक राय दते जो लगे जरा मड़ते जाए अनीति का धन 10 साल तक टिकता है 10 से 11 लगते ही जरा मर से चला जाता है। इसने भगवान के संकल्प को पूरा नहीं किया तो खुद भी जेल में गया घर पर भी चोरी हो गई सु कंगाल हो गए बेटी और मां दोनों भिक्षा मांग करके जीवन जीने लगी लो आ गई ज के ते बोलो जय सियाराम। शरीर में पीड़ा मन में चिंता भूख प्यास से दुखी होकर के लीलावती कलावती घर-घर घूमने लगी।
एक दिन कलावती बड़ी देर रात को घर आई एक जगह ब्राह्मण के घर सत्यनारायण की कथा को देखकर बैठ कर के सुनने लगी। रात को प्रसाद पाकर घर आई माता प्रेम बहुत करती थी कलावती से कन्या से बोली, 'हे बेटी! इतनी रात तक कहां रही तेरे मन में क्या है क्या तू मुझे नर्क में ले जाएगी मेरी नाक कटवाए गी?' यह सुनकर कलावती बोली, 'नहीं मां हम एक ब्राह्मण के घर पर थे वहां पर हमने सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा।' लीलावती को याद आ गया कि तेरे पिता ने संतान प्राप्ति के लिए इस संकल्प का व्रत लिया था हो ना हो ये सत्यनारायण भगवान का ही श्राप हो। तुरंत पड़ोस में जाकर सामग्री को मांगा। कन्या के वाक्य सुनकर साधु वैश की स्त्री सत्यनारायण का व्रत करने के लिए तैयार हो गई उद्यत हो गई। उस स्त्री ने बंधु बांधों को बुलाया सत्यनारायण भगवान की कथा की और सत्यनारायण की कथा के अंत में कहा, 'हे प्रभु! मुझसे मेरे पति से मेरे दमान से जो भी अपराध हुआ हो क्षमा कर दो हमसे भूल हो गई अज्ञानी है।' भगवान प्रसन्न हो गए। छड़े रुष्ट छड़े तुष्टा तुष्टा तुष्टा छड़ छ भगवान थोड़े में प्रसन्न हो जाते हैं और थोड़े में नाराज हो जाते हैं। भगवान प्रसन्न हो गए। प्रसन्न भए राजा चंद्रकेतु के स्वप्न में गए, 'हे राजा! उठ सुबह होते ही जो दो चोर तुमने कारा ग्रह में बंद किए हैं खोल देना वरना पूरा राज्य पाठ नष्ट कर देंगे।' धमकी दे दी। राजा की नही बजे रात को नींद खुल गई और कौन नाश करवाना चाहे भगवान बोल रहे दिमाग खराब हो गया। रात को ही उठ बैठा सुबह सभा लगी सभा में अपना स्वप्न सुनाया। ब्राह्मण बोले महाराज खोल दो काहे को बर्बाद करवा रहे खोल दो। दोनों चोरों को दोनों को बुलाया साधु और दमाद को बुलाया। भगवान की कृपा से दोनों ने आकर हाथ जोड़ लिए कैदियों की तरह उनको बांध करके लाए थे पर उनको खुलवा दिया हाथ जोड़ लिए। राजा ने तो जो धन लिया था जो छीना था वह भी लौटा दिया दुगना दे दिया। दोनों बड़े शर्म के मारे नीचे सिर करें। राजा चंद्र केतु बोले, 'आप मत करो ये आपका अपराध नहीं है देव अपराध था आपसे कोई अपराध हो गया था तुमसे देवताओं का अपराध हो गया था इसलिए तुमने दुख को पाया है।'
दोनों वैश्य दोनों वैश्य राजा चंद्रकेतु को नमस्कार करके कुछ नहीं बोल पाए। दुगना धन ले लिया दुगना धन लेकर के प्रसन्न मन से बड़े भाव पूर्वक अपने घर को चलने लगी। राजा ने कहा साधु साधु अपने घर को जाओ को प्रणाम करके नाव में पूरी संपत्ति को रख करके जाने लगे।
इति श्री स्कंद पुराने रेवा खंडे सत्यनारायण प्र कथा याम तृतीय अध्याय समाप्त। बोलो वृंदावन बिहारी लाल की ज हो सत्यनारायण भगवान की जय [संगीत] हो। छोड़ आद मन के मूर पर ना फेंको हीं अपनी थाली में रख लो हल्दी जो चावल हल्दी हल्दी चावल लिए वही रख लो बोलो सत्यनारायण भगवान की जय हो।
आज अब चतुर्थ अध्याय की कथा को लक्ष्मी नारायण भगवान की जय हो। लक्ष्मी नारायण भगवान की जय हो। अ चतुर्थ अध्याय यात्रा तु कृतन साधुर मंगलायतन गरम जयद दूरे गते साधु सत्य नारायण प्रभु जिज्ञासा कवान मम।
श्री सूत जी बोले, "हे मुनियों! जब वह साधु नाम का बानिया राजा के पास से धन लेकर के अपने नगर को चलने लगा तो मंगलाचरण किया ब्राह्मणों को उसने धन भी दान में दिया और अपने नगर के लिए जाने लगा। साधु बानिया कुछ ही दूर निकला ही था कि भगवान ने सोचा इसकी परीक्षा ले ली जाए अभी भी इसने सत्य को अपनाया है या नहीं सत्य को स्वीकार किया या नहीं सत्य बोलेगा या नहीं। ऐसा भगवान ने विचार किया। भगवान सन्यासी का भेष धारण करके परीक्षा लेने के लिए आए। नाव में धन भरा हुआ मद से चूर जब सन्यासी जी ने आकर के पूछा, 'हे साधु बानिया तुम्हारी नाव में क्या है क्या भरा है?' तब धन के मध में चूर दोनों महाजन दोनों साधु बानिया और उसका दमाद अब हेलना पूर्वक हंसते हुए बोले, 'अरे महात्मा! अरे ओ दंडी स्वामी आप क्यों पूछते हो क्या तुम्हारा धन चुराने का इच्छा है क्या धन लेने की इच्छा है महाराज हमारी नाव में तो लत्ता पत्रादि भरे हुए हैं।' झूठ बोल दिया कि हमारी नाव में धन नहीं है लता लता पत्रादि भरे हुए हैं। यह बात सुन कर के दंडी सन्यासी का रूप धारण करने वाले भगवान ने कह दिया, 'जाओ तुम्हारा वचन सत हो निष्ठुर चा वचा निरम चाव सुवा सत्यम भवतु तेव।' जाओ तुम्हारा वचन सत्य हो। ऐसा कह कर के भगवान कुछ दूर जाकर के समुद्र के किनारे बैठ गए जाकर।
जब भगवान बैठ गए इधर साधु नाम का बानिया दंडी स्वामी के जाने के बाद नित्य क्रिया कर निवृत हुआ स्नान आदि करके निवृत्त हुआ और घर जाने के लिए जैसे ही नाव के पास आकर देखा तो जो नाव धन से भरी हुई दबी थी वह लता पत्रा जी की वाणी दंडी सन्यासी की लग गई वह नाव ऊपर पानी में आ गई और इतराने तैरने लगी जैसे उसमें कुछ हो ही ना। साधु नाम के बानिया को संदेह उत्पन्न हुआ पहले तो नाव थोड़ी पानी में झुकी हुई थी अब ऊपर आ गई क्या बात है। जैसे ही जल में जाकर नाव में जाकर के देखा अत्यंत आश्चर्य में पड़ गया नाव में धन की जगह लता पत्ते भरे हुए हैं। यह देख कर के मूर्छित होकर के जमीन पर गिर पड़ा अचेत हो गया। बड़ी मुश्किल से तो डबल धन मिला था वही चला गया अब पत्र लता पत्र आदि बन गए पत्ते बन गए फूल बन गए लता टहनिया बन गई है। रोने लगा मूर्छित होक के जमीन पर जब गिर पड़ा दमाद जगाने की कोशिश करने लगा खूब चिंता में पड़ गया तब दमान ने जगाया प्रयत्न किया और कहा कि आप शोक ना करें आप शोक क्यों करते हैं यह तुम्हारे झूठ बोलने का ही परिणाम है लगता है यह श्राप दंडी स्वामी की वचन का प्रभाव है उन्होंने श्राप दे दिया। अब अगर वह वैसा ही चाहते हो तो चलो उनकी शरण में चलते हैं सत्य का पालन करते हैं वह सब कुछ कर सकते हैं इसमें कोई संशय नहीं है हमें उन्हीं की शरण में चलना चाहिए।
साधु बानिया ने सोचा मरते क्या नहीं करते बर्बाद तो होही गए चलो दमान के साथ में दंडी स्वामी जहां किनारे पर बैठे थे वही आ गए। महाराज प्रणाम आपकी जय हो आदर पूर्वक प्रणाम करने लगा। पहले अवहेलना पूर्वक हंस रहा था अब आदर पूर्वक प्रणाम कर रहा। काम पड़े कछु और है काम करे कछु और ब्याह होत के बाद में नदी सरावत मो काम निकलते ही कुछ और है काम पढ़ते ही कुछ और है। पहले अवहेलना करके साधु की मजाक बनाकर हंस रहा था ये अब जब सब बर्बाद हो गया तो भगवान याद आ गए ये हम लोगों का भी यही हाल है जब तक सब कुछ बढ़िया बढ़िया चकाचक रहता है तब तक कुछ याद नहीं आते जहां घुटनों का दर्द हो जाए बेटा बेकार निकल जाए घाटा लग जाए सोही बागेश्वर धाम याद आ जाते हैं। तो एक संत ने कहा दुख में सुमिरन सब करे दुख में सुमिरन सब करे सुख में करे ना कोई जो में सुमिरन करे सु दुख काहे। रोने लगा महाराज जैसे ही गया हमने आपके सामने असत्य भाषण को कहा हमारे अपराध को क्षमा करो बार-बार वह रोते हुए शोक में भरा होकर के व्याकुल होकर के रुदन करने लगा रोने लगा नवत प्रणाम करने लगा और कहा, 'हे महाराज! हम आपकी माया को नहीं जानते आप ब्रह्म हो ब्रह्मा द भी आपकी माया को नहीं जान सकते तब हम साधारण मनुष्य कैसे जान सकते हैं हम पर कृपा करो।' तवा भगवत वाक्यम
स्तम करत समता बारबार रोते हुए वह साधु नाम का बानिया चरणों में गिर पड़ा। हे प्रभु, आश्चर्य की बात है, आपकी माया बड़ी विचित्र है। आपकी माया से सभी मोहित हो जाते हैं। देवता भी आपके गुण और रूपों को नहीं जान पाते, फिर मैं मूर्ख आपकी माया से मोहित क्यों ना हो जाऊं। आप प्रसन्न होइए, मैं अपनी धन और संपत्ति के अनुसार आपकी पूजा करूंगा। मेरी रक्षा करो, पहले के समान मेरी नौका में धन भर दो।
भगवान उसकी भक्ति युक्त वाणी को सुनकर के प्रसन्न हो गए। भगवान ने अभीष्ट वर प्रदान किया। जाओ, तुम्हारी नाव में नौका में जैसा धन था, वैसा ही हो जावे। जय हो महाराज।
जैसे ही उसने वापस नाव में आकर देखा, नाव धन से परिपूर्ण पाई। बड़ा प्रसन्न हो गया। तुरंत ब्राह्मणों को बुलाया। ब्राह्मणों को बुलाकर वहां तट पर रहने वाले लोगों के साथ भक्ति पूर्वक विधि पूर्वक भगवान श्री सत्यनारायण की कथा को करवाया एवं सत्य बोलने का व्रत लिया।
नाव में संभल करके बैठ गया। अपने देश के लिए प्रस्थान करने लगा। वह साधु नाम का बानिया जब भगवान की कथा कर लिया, तब अपने देश को आया। जैसे ही नगर के नजदीक पहुंच गया, सामने उसे रतनपुरी नगरी दिखाई दे रही। दमान से कहा, देखो अपनी नगरी आ गई है। एक दूत को किनारे से कहा, जाओ घर पर खबर करो नगरी में कि हम जो है, बहुत सा धन लेकर के नगर में सा कुशल दोनों वापस आ गए। ऐसी खबर हमारे घर पर जाकर दो।
जैसे ही दूत नगर में साधु बानिया के घर पर गया, उसने साधु की भार्या को पत्नी को देखा कि हाथ जोड़ कर के बड़े प्रेम पूर्वक श्रद्धा पूर्वक कोई व्रत अनुष्ठान कर रही है। वह साधु की पत्नी लीलावती, उसकी पुत्री कलावती कोई और व्रत नहीं, सत्यनारायण भगवान का ही व्रत कर रही थी। इतने में दूत आ गया। आपकी जय हो, क्या बात है, क्यों आए हो मैया। अपने नगर के निकट में आपके स्वामी जी, आपके पति देव साथ में दमाद दोनों लोग सा कुशल बहुत सा धन धान लेकर के वापस आ गए।
इतना सुनते बड़ी प्रसन्न हुई। कलावती भी प्रसन्न हुई। लीलावती ने अपनी पुत्री से कहा, बेटी तुम सत्यनारायण की कथा पूरी करके आओ, थोड़ी रह गई है। हम दर्शन करने जा रहे हैं। हम पति के दर्शन कर ले, बहुत दिन हो गए हम दर्शन करने जा रहे हैं। इतना कह कर के चली गई और तुम भी सत्यनाम भगवान का व्रत पूर्ण करके तुम भी प्रसाद पा कर के आ जाना।
पर लीलावती ने अंत सुना कर दिया। व्रत तो पूरा किया, पर पति के स्नेह के कारण, पति के दर्शन के कारण उसने सोचा प्रसाद बाद में पा लेंगे, पहले पति के दर्शन कर ले। प्रसाद को अलमारी में रख दिया और दौड़ती हुई पति के दर्शन को गई। इससे भगवान सत्यनारायण रुष्ट हो गए और साधु नाम का बानिया तो किनारे पर खड़ा था, पर कलावती का पति नाव में बैठा था। संपत्ति के पास उसी समय भगवान ने ऐसी झोका की लीला की, भयंकर हवा का झोका लगा और देखते ही देखते कलावती के पति जिस नाव में बैठे थे, वोह नाव उसका पति दोनों कब डूब गए, पता ही नहीं चला।
अब तो रोने लगी, ये क्या अपराध है, भगवान के प्रसाद को ना पाने का अपराध है। देखो प्रसाद में तीन अक्षर हैं, कितने प्रा सा दा। प्रा माने प्रत्यक्ष, सा माने साक्षात, दा माने दर्शन। जिसको पाते ही प्रत्यक्ष साक्षात दर्शन करने का अनुभव प्रतीत हो, उसी का नाम प्रसाद है। इसलिए प्रसाद को प्रेम पूर्वक प्रा प्रेम पूर्वक सा साक्षात दा दर्शन मानकर भगवान के प्रसाद को पाना चाहिए। तिरस्कार नहीं करना चाहिए, वरना महापाप लगता है। ना पाप पाओ, पोटली बना लो, थोड़ा सा किंचित मात्र पा पोटली बना लो, बांट दो सबको दे दो, जो मिले दे दो और ना पा पाओ, कोई है नहीं, गौ माता को पवा दो। गौ माता नहीं है, विदेश में रहते हो, जल में जीवों को पवा दो, पर भैया प्रसाद का तिरस्कार नहीं करना चाहिए।
कलावती ने प्रसाद का तस्क किया। देखते ही देखते उसका पति नाव सहित डूब गया पानी में। तथा कलावती कन्या ना विलोक निजं पतिं सकेन महिता तत्र रुदंती चा पद भूब। रोने लगी, हमारे पति देव चले गए हैं। तुरंत खड़ा उली और सती होने के लिए तैयार हो गई।
उधर भगवान का सिंहासन डोला। भगवान ने देवताओं से पूछा, हमारी सिंहासन डोलने का कारण क्या है। देवता बोले, महाराज, मृत्युलोक में कोई स्त्री अपने पति के साथ सती होने के लिए आतुर है, सती होने चली है। भगवान बोले, किस कारण। बोले, प्रसाद ना पाने के कारण उसका पति नाव में डूब गया, जल में डूब गया, नाव सहित। भगवान बोले, जाओ वम वाणी कर दो, आकाशवाणी कर दो।
तब तक साधु नाम का बानिया रोने लगा। लीलावती भी रोने लगी। हे भगवन, हमसे क्या भूल हुई है, हमको क्षमा करो। हमारे दमाद का के से क्या अपराध हो गया। हे प्रभु, यदि हमारा दमाद सकुशल सजीव जीवंत हो जाएगा, सामने दिख जाएगा, मिल जाएगा, हम पुनः हर महीने आपके व्रत सत्यनारायण भगवान के व्रत को करेंगे।
आकाशवाणी हुई, हे साधु नाम का बानिया, हे साधु वाणिया, तुमने भगवान की कथा के प्रसाद का तिरस्कार किया है, इसलिए तुम्हारी बेटी का पति दिखाई नहीं पड़ता है। यही है प्र यदि यह प्रसाद पाकर साथ सम्मान पूर्वक प्रणाम वंदन करके के क्षमा याचना करें, तो निश्चित ही पति प्राप्त होगा।
आकाशवाणी जैसे ही सुनी, भागी हुई कलावती घर को गई। सत्यनारायण भगवान के व्रत को पुनः पूर्ण किया। भगवान के प्रसाद को पाया। नवत प्रणाम करके सतना भगवान से क्षमा मांगी और जैसे ही क्षमा मांगी, इधर भगवान की कृपा से वह तूफान शांत हो गया और उसका दमाद और नाव दोनों साधु नाम के वाणिया के देखते ही देखते पानी के जल के ऊपर आ गए।
साधु नाम का बानिया बड़ा प्रसन्न हुआ। अंत में हर पूर्णमासी को संक्रांति को वह साधु नाम का वानिया बंधु बांधव के साथ ब्राह्मणों के साथ सत्यनारायण भगवान के व्रत को करता रहा। इस संसार के समस्त सुखों को भोग कर अंत में वह बैकुंठ धाम को चला गया। इति श्री स्कंद पुराण अंतर्गत रेवा खंडे श्री सतान कथा चतुर्थ अध्याय समाप्त। बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय। सत्यनारायण भगवान की। लक्ष्मी नारायण भगवान की जय हो।
अब पांचवा अंतिम अध्याय। हल्दी चावल छोड़ दो, फिर से ले लो। पूरे लेले, अगल बगल बांट लो। अ पांचवा अध्याय। पांचवे अध्याय में राजा तुंग धवज नाम के राजा की कथा को कहते हैं। बोलो श्री बद्री नारायण भगवान की जय हो। सत्यनारायण भगवान की जय हो। श्री सूत जी बोले, हे मुनियों, अब इसके बाद हम पंचम अध्याय में दूसरी कथा को कहते हैं। सतना भगवान के प्रसाद की महिमा की कथा।
एक राजा था, उसका नाम था तुंग ध्वज। क्या नाम था। तुंग। तुंग धवज नाम का राजा था। उसने भी सत्यदेव भगवान के प्रसाद का परित्याग करके बड़ा दुख प्राप्त किया। एक बार राजा वन में गया, बहुत से पशुओं को मारा, शिकार करने गया, बहुत से पशु को मारा। एक बट के वृक्ष के नीचे आ गया। वहां उसने देखा कुछ गोप बैठे हुए बंधु बांधव के साथ बड़े संतुष्ट होकर भक्ति भाव पूर्वक मनसा वाचा कर्म इंद्रिया मानो सभी प्रकार से किसी व्रत का पूजन कर रहे हो।
राजा यह देखकर अहंकार के बस नहीं गया। ना घोड़े से उतरा, ना प्रणाम किया। कुछ लोगों को बड़ा घमंड होता है। व कथा में भी सम्मान पाना चाहे, वो कथा में भी आते हैं, तो उन्हे लगता है कि लोग हमें देखें, हमें जाने और जो कथा करने वाले पंडित जी हैं, वो तुरंत हमारा नाम ले और अगर उनका नाम ना लो, उन्हें ना देखो, उन्हें कोई बैठने को ना पूछे, अगर वो बैठ जाए, तो उन्हें कथा ऐसे लगती है जैसे सूजा चु भाए जा रहे हो। उनका मन नहीं लगता है। फर मन ही मन वो ये कहते हैं, होंगे अपने लिए बड़े बाड़ में गया, हम एक बार आ गए, हम नहीं आएंगे। होंगे बागेश्वर महाराज, अपने लिए ऐसे तो बहुत महात्मा हमने देखे, हम भी 10 लाख खर्च करेंगे, उनसे बड़े वाले महात्मा बुलाएंगे, इनके गुरु जी को बुलाएंगे। और अगर कोई आवे और तुरंत ना फलाने नेता जी आ गए, फिर देखो तुम ऐसे बहुत अच्छे महाराज है, बहुत अच्छे क्या कथा बोल रहे, संगीत बहुत अच्छा है। नाम ना लो, ना देखो उने य लगने लगता जैसे हम नाहर बैठे हो, सिंह बैठे हो। अनुभव की बात।
ऐसे ही इस राजा के साथ हुआ। तुंग धज नाम का राजा वन में शिकार खेलने गया। वहां गोप लो को सत्यनारायण भगवान का व्रत होते देखा। राजा अहंकार के बस, अभिमान के बस, ना घोड़े से उतरा, ना प्रणाम किया। बाद में जब उन गोप ग वालों ने सतना भगवान का पंजीरी प्रसाद दिया, महाराज यह प्रसाद है सत्यनारायण का। राजा ने नहीं पाया। मन ही मन सोचा, हम राजा होकर यह भुंगा हुआ आटा पाएंगे, हम राजा है। प्रसाद को वही छोड़ दिया और जैसे ही छोड़कर के राजा घर आया लौटकर भगवान के प्रसाद का परित्याग करने के कारण उसने महान दुख को पाया। आते ही उसके नगर में आग लग गई, आग में भवन जल गया, उसके 100 पुत्र भी मर गए।
अब तो राजा के ऊपर बड़ा पहाड़ दुख का टूट गया। राजा रोने लगा, हमने ऐसा कौन सा अपराध किया। सैनिक बच गए, सिपाही बच गए, पर पुत्र क्यों मर गए। कुछ ना कुछ तो कारण है। मन में राजा यह निश्चय कर ही रहा था, तब तक मन में विचार आया, कहीं हो ना हो, सत्यनारायण भगवान के प्रसाद को नहीं पाया, उसी का अपराध ना हो। राजा भागता हुआ गया जहां सत्यनारायण की कथा हो रही थी। तो एक जगह हमने एक संत के मुंह से ऐसा सुना कि वहां गोप गवाल तो घर चले गए थे, पर जो दोना होते हैं, पत्तल के पहले दोना बनाए जाते थे, छेला के पत्ते के दोना ब उनको दोना कहते और छिवला के पत्ते का दोना में प्रसाद इसलिए लगाया जाता था, क्योंकि उसका नाम ही था दोना। दोना एक ही है, इसलिए भगवान को दोना बड़ा प्रिय। भगवान को दोना इसलिए प्रिय है कि ब्रह्म एक ही है, दो है ही नहीं, इसलिए दोना प्रिय है। इसलिए दोना में प्रसाद लगाया जाता था। तो जो दोना होता था, उसमें प्रसाद दिया था। यह तो कटोरी है, जो जो आप टीवी पर दिखा रहे हो, दिखाइए जरा कटोरी है ना। हा, यह तो कटोरी है भाई। यह दोना नहीं है। दोना अलग होता है। हा, वो पत्ता का बनता है दोना। बल्कि आज तो जो है, यहां भी बना लेना चाहिए था, पर यहां इतने बड़े पत्ते भी नहीं मिलेंगे। छेला कहां मिलेगा। य छेला नहीं, पर छेला जिसको आपकी भाषा में पलास कहते हैं, हमारे बुंदेलखंड उसे छिवला कहते। छिवला प्लास। प्लास के पत्तों का दौना बनाते थे, बहुत पवित्र होता था। अन्य पत्तों के भी बनते थे, पर पलास के पत्तों का दोना पवित्र। तो दोना देखो, उसका नाम ही है दोना। दो ना, दो ना। तो राजा ने राजा गया, जब सब नष्ट हो गया, पुत्र मर गए, राजपाट जल गया, वापस गया, पर वहां पर गोप गवाल नहीं थे। एक संत बता रहे थे, दोना पड़े हुए थे, जिनम प्रसाद पाया। प्रसाद तो था नहीं, पहले पूरा प्रसाद नहीं पाया, फिर राजा ने झूठा पाया, जो तिनके लगे हुए थे, उसी को सीख से निकाल निकाल करके पाया। भगवान की कृपा से उसके पुत्र पुनः जीवित हो गए। राजा बड़ा प्रसन्न हुआ। गोप गणों के समीप गया, उसने गोप गणों को बुलाया, कहा भैया, जो व्रत तुम कर रहे थे, वो हमें भी करवाओ। भक्ति और श्रद्धा से युक्त होकर विधि पूर्वक उसने भगवान सत रायण के पूजन को किया। सत्यनारायण भगवान के पूजन के प्रभाव के कारण उसके पुत्र जीवित हो गए, उसका धन वैभव पुनः लौट कर के आ गया। अंत में वह राजा इस संसार के समस्त सुखों को भोग कर भोग कर भगवान के बैकुंठ धाम को गया। वह भगवान श्री हरि के यह लोके सुखं भुक्तं चाते सत्यपुरं यय। वह भगवान के लोक को गया।
श्री सूत जी कहते, हे मुनियो, यह सत्यनारायण भगवान का व्रत बड़ा ही दुर्लभ है। आजकल हम लोग भूल गए, पर है ही बड़ा दुर्लभ, बड़ी महिमा है इसकी। पर सत्यनारायण का व्रत का मतलब यह नहीं है कि तुमने पांच अध्याय घंटिया बजवाई। वृंदावन बिहारी लाल की जय और बस इसके बाद में भोजन करो, आहा सत्यनारायण हो गई भैया और फिर कहो गुरु जी कह रहे थे, ऐसा होगा, वैसा होगा, कुछ ऐसा वैसा हुआ ही नहीं। सत्यनारायण का मतलब है, जिस दिन आप सत्यनारायण की कथा करवाओ, उस दिन सत्य बोलने का त जरूर लो। सत्य ही नारायण है और नारायण ही। क्योंकि साच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पा। जाके हृदय साच है, ताके हृदय।
श्री सूत जी कहते, मुनियों, श्री सत्यनारायण भगवान के को जो करेगा, करवाएगा, यह पुण्यम कथा बड़ी फल दयनी है। भगवान की कथा से भक्ति युक्त हो करके वह धन धान्य से भर जाएगा। दरिद्र धनवान बन जाएगा। बंधन में पड़ा हुआ व्यक्ति बंधन से मुक्त हो जाएगा। भय भीत व्यक्ति भय से मुक्त हो जाता है। संसार के समस्त सुखों को भोग करर, सभी इप सित मनो कामनाओं को भोग करर, अंत में वह बैकुंठ धाम को जाता है। हे मुनियों, मैंने आप लोगों से भगवान सत्यनारायण के व्रत को कहा, जिसे करके मनुष्य सभी दुखों से दुखों से मुक्त होता है। कलयुग में भगवान सत्यनारायण की पूजा विशेष फल प्रदाय नहीं है। भगवान विष्णु को ही कुछ लोग काल, कुछ लोग सत्य, कुछ लोग ईश, कुछ लोग ईश्वर, कुछ लोग सत्य देव, कुछ लोग सत्य नारायण के नाम से पुकारेंगे। भगवान के रूप अनेक हैं, नाम एक है, लेकिन सत्यनारायण भगवान का व्रत सभी मनोरथ को सिद्ध करने वाला है। कलयुग में सनातन भगवान विष्णु ही सत्य रूप धारण करके सभी लोगों के मनोरथ को पूर्ण करेंगे।
हे श्रेष्ठ मुनियों, जो व्यक्ति नित्य सत्यनारायण भगवान की व्रत कथा को पढ़ेगा, सुनेगा, कहेगा, भगवान सत्यनारायण की कृपा से उसके जन्म जन्मांतर के पाप नष्ट हो जाएंगे। हे मुनीश्वर, अब पूर्व काल में जिन लोगों ने जो पांच अध्याय हमने तुम्हें सुनाए हैं, इन पांचों अध्यायों में पांच छह अलग-अलग लोगों की चर्चा बताई हमने। अब मुनि श्री सूत जी महाराज ने उन लोगों ने जिन्होंने सत्यनारायण करवाई थी, जिन्होंने सत्यनारायण का व्रत किया था, उन्हें दूसरा जन्म क्या मिला, इसके बारे में भी सत्यनारायण में बताया गया। सतानंद महाप्रज्ञा सुदामा ब्रा। दूसरा अध्याय आपको याद होगा, पहले दूसरे दिन कल हमने एक ब्राह्मण के बारे में बताया था, जो बड़ा दरिद्र था, उसका नाम था सतानंद। क्या नाम था। यह सतानंद नाम का ब्राह्मण भगवान सत्यनारायण के प्रभाव से दूसरे जन्म में सुदामा नामक ब्राह्मण हुआ। हमको हमने आपको जिसने भगवान श्री कृष्ण का प्रेम मित्रवत प्रेम पाकर उनका ध्यान किया। इसी दूसरे अध्याय में एक लकड़हारे की कथा सुनाई थी कल, याद है। वह लकड़हारा दूसरे जन्म में ल गहर का राजा निषाद हुआ, जिन्होंने श्री राम जी से मित्रता करके प्रभु का साथ दिया। हमने आपको तीसरे अध्याय में एक राजा का नाम बताया था, उल्का मुख, जिसकी पत्नी कमल के समान मुखवा ली थी, जिसने भद्र शलादर सत्यनारायण भगवान के व्रत को किया कर रहा था, जब साधु नाम का बानिया गया था, वह उल्का मुख नाम का राजा दूसरे जन्म में र राजा दशरथ हुए, जिन्होंने रंगनाथ की पूजा की, अंत में बैकुंठ धाम को गए। इसी अध्याय में जो साधु नाम का बानिया था, वह दूसरे जन्म में राजा मोरधज बना, जिसने अपने पुत्र को आरे से चीर करर भगवान को प्रसन्न किया। आपको हमने पांचवे अध्याय में महाराज तुंगत धुज नाम का बताया। अभी अभी जो महाराज तुंग धुज ते, वह दूसरे जन्म में स्वयंभू मनु हुए और उनकी पत्नी सतरूपा हुई। इन्हीं से मानवों की सृष्टि हुई। इससे सिद्ध होता है कि जो भी सत्यनारायण भगवान को कहेगा, सुनेगा, गाएगा, उसका यह लोक भी सुधर जाए, सुधर जाएगा, परलोक भी सुधर जाएगा। यह जन्म भी सुधर जाएगा, दूसरा जन्म भी सिद्ध हो जाएगा।
इति श्री स्कंद पुराण अंतर्गत रेवा खंडे श्री सत्यनारायण व्रत कथा याम पंचम अध्याय समाप्त।
बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय हो। सत्यनारायण भगवान की जय हो। श्री विशाल भगवान की जय हो।
[संगीत]
सत्यनारायण भगवान की जय हो।
लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरि।
लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरि।
सूर नारायण नारायण हरि हरे।
सूर्य नारायण नारायण हरि हरे।
लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरि।
नारायण नारायण हरि हरि।
सर नारायण नारायण हरि हरि।
नारायण नारायण हरि हरि।
लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरि।
लक्ष्मी नारायण नारायण हरि हरि।
जय जय नारायण नारायण हरि हरि।
ज नारायण नारायण हरि हरि।
जय जय नारायण नारायण हरि हरि।
जय जय नारायण नारायण हरि हरि।
ओम नमो नारायण हरि।
ओम नमो नारायणा हरि।
ओम नमो नारायणा हरि।
ओम नमो नारायणा हरि।
ओम नमो नारायणा हरि।
ओम नमो नारायणा।
जय जय नारायण नारायण हरि हरि।
जय जय नारायण नारायण हरि ह।
जय जय नारायण नारायण हरि हरि।
जय जय नारायण नारायण हरि हरि।
लक्ष्मी नारायण भगवान की जय हो।