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मन पर काबू कैसे पाएं ♥️!! स्वामी विवेकानंद जी परिव्राजक @AdhyatmYaatra-xt6kp#मन #viralvideo

अध्यात्म यात्रा – Adhyatm Yaatra45:29

Transcription

[संगीत]

[प्रशंसा]

[संगीत] और के नाम से भी व फेमस हो गया पतंजलि। पतंजलि स्टोर तो महर्षि पतंजलि जी ने एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है योग दर्शन। क्या नाम? उस योग दर्शन में यह सारी विद्या बताई।

मन के बारे में। मन एक बहुत सूक्ष्म तत्व है। लोग मन के बारे में जानते नहीं ज्यादा। बहुत थोड़ा जानते हैं। मन शब्द का प्रयोग तो करते हैं। एक विद्यार्थी से मैंने पूछा, क्यों भैया, पढ़ाई कैसी चल रही है? बोला, गुरुजी, चल रही है। मैंने कहा, ऐसे ऐसे ढीले ढीले क्यों बोल रहे हो, चल रही है? ऐसे क्यों नहीं कहते कि बहुत अच्छी चल रही है? तो उसने कहा, कैसे कहूं अच्छी चल रही है? पढ़ाई में मन तो लगता नहीं। क्या नहीं लगता? हां, वह जो नहीं लगता ना, उसी की बात कर रहा हूं। उसी का नाम है मन। पढ़ाई में मन तो लगता नहीं, फिर मैं कैसे कहूं कि पढ़ाई अच्छी चल रही है? ऐसा नहीं है कि मन कहीं भी नहीं लगता। विद्यार्थी का मन पढ़ाई में नहीं लगता और तो 10 जगह लगता है। खाने में खूब लगता है, टीवी में खूब लगता है, कंप्यूटर में खूब मन लगता है, मोबाइल फोन में खूब मन लगता है, गेम खेलने में खूब मन लगता है, आउटडोर गेम्स में भी खूब लगता है। क्रिकेट खेलनी हो, वॉलीबॉल खेलनी हो, खूब मन लगता है। गप्पे मारने में खूब मन लगता है, घूमने फिरने में, शहर सपाटे में खूब मन लगता है। बस पढ़ाई में नहीं लगता। वही समस्या है और तो कुछ नहीं।

अच्छा, यह तो विद्यार्थी की बात। फिर जो कुछ बड़े लोग हैं, ध्यान करते हैं, ईश्वर का, सीनियर सिटीजंस। वो कहते हैं, महाराज जी, भगवान का दिया हमारे घर में सब कुछ है, कोई कमी नहीं है। बस एक मन की शांति नहीं है। और तो सब कुछ है। एक मन की शांति नहीं है। भगवान में मन नहीं लगता। भगवान में मन नहीं लगता? तो जो भक्ति करता है, साधना करता है, उसका मन कहां नहीं लगता? भगवान में नहीं लगता और तो खूब लगता है। 10 जगह खूब लगता है। खाने पीने में, शॉपिंग में खूब मन लगता है और 20 जगह पर मन लगता है। बस भगवान में नहीं लगता। तो यह मन है क्या? उसको समझना है। क्यों नहीं लगता? आप मन के बारे में ऐसी ऐसी बातें बोलते रहते हैं। अब मैं थोड़ी सी शास्त्रीय टेक्निकल भाषा में बात करूंगा। थोड़ा सा उसका भी आपको परिचय हो जाए।

शास्त्रों में दो प्रकार की वस्तुएं बताई हैं। एक वस्तुएं हैं जड़ और दूसरी है चेतन। हां, बताएंगे, दोहराएंगे। पहली कौन सी? जड़ और दूसरी? अब मैं आपको जड़ चेतन की परिभाषा पहले नहीं बताऊंगा, बाद में बताऊंगा। पहले आपसे प्रश्न पूछता हूं। आप मन के बारे में क्या जानते हैं? मन जड़ है या चेतन? देखो, कोई जड़ कह रहा है, कोई चेतन कह रहा है। जो लोग यह मानते हैं मन जड़ है, वह कृपया हाथ ऊंचा करेंगे। जो यह मानते हैं मन जड़ है। बहुत अच्छा। धन्यवाद। जो यह मानते हैं मन चेतन है, वह हाथ ऊंचा करेंगे। बहुत बढ़िया। और जिनको समझ में नहीं आया, वह हाथ ऊंचा करेंगे। हां, ऐसे लोग भी तो हैं। कन्फ्यूजन है। समझ में नहीं आया, जड़ है या चेतन? तो तीनों पक्षों में से सही उत्तर है कि मन जड़ है। जड़ वस्तु है, जड़ पदार्थ है। हां, क्या बोला? मन कैसा है? जड़ है। जड़ किसे कहते हैं? चेतन किसे कहते हैं? अब अंतर सुनिए। जड़ वस्तु में इच्छा नहीं होती। क्या बोला? दोहराए। और चेतन वस्तु में इच्छा होती है। चेतन में पहला अंतर हो गया। तो मैंने अभी बताया कि मन जड़ है। यह मेरी बात नहीं है। महर्षि पतंजलि जी की बात। इसी योग की बात कर रहा हूं। अष्टांग योग की। महर्षि पतंजलि जी ने बताया मन जड़ है। और आप कौन हैं? शरीर या आत्मा? आत्मा जड़ है या चेतन? हां, अब ठीक बताया आपने। आत्मा चेतन है। चेतन क्यों है? क्योंकि उसमें इच्छा है। यहीं से बात शुरू की थी मैंने। आप में इच्छा है या नहीं? आपने कहा था है। तो जिसमें इच्छा है, वह चेतन। जिसमें इच्छा नहीं है, वह जड़। एक अंतर समझ में आ गया। तो मन जो है, वह जड़ है।

अब जड़ वस्तु में इच्छा होती नहीं। तो आपके अंदर इच्छा है या नहीं है? वह इच्छा मन की है या आत्मा की है? बहुत बढ़िया। बस। तो यह पहला पाठ याद कर ले। आत्मा चेतन है, उसमें इच्छा होती है। मन जड़ है, जड़ वस्तु में इच्छा नहीं होती। तो आपको अपने अंदर जो इच्छाएं दिख रही हैं, बहुत सारी इच्छाएं दिख रही हैं, वह मन की इच्छा नहीं है। वह आत्मा की इच्छाएं हैं। आत्मा चेतन वस्तु है। पर क्योंकि की वो इच्छाएं प्रकट होती है मन में, इसलिए हम मोटी भाषा में कह देते हैं, मेरे मन की इच्छा पूरी नहीं हुई। मेरे मन की इच्छा पूरी नहीं हुई। ऐसे मन के नाम से बोल देते हैं। क्योंकि इच्छाओं की जो अभिव्यक्ति है, जो प्रकट होती है इच्छाएं, वह मन के द्वारा होती है, मन के माध्यम से होती है। इसलिए ऐसा हम बोल देते हैं। वास्तव में इच्छाएं मन की नहीं है, वो आत्मा की है।

तो अब मन जो है, वह जड़ है। दूसरी बात। जड़ वस्तु स्वयं क्रिया नहीं करती। बोलिए। चेतन वस्तु स्वयं क्रिया करती है। यह दोनों में अंतर है। आपकी कार खड़ी है बाहर। यह जड़ है या चेतन? कार में इच्छा है या नहीं? कार स्वयं चलती है क्या? नहीं चलती। वह जड़ है। तो जड़ है, इसलिए नहीं चलती। जड़ वस्तु का नियम है, वह स्वयं नहीं चलती। कोई दूसरा चलाए तो चलेगी। आप कार चलाते हैं तो चलती है। कार में कोई इच्छा नहीं है। वह अपनी इच्छा से नहीं चलती। उसको दाए मोड़ो तो दाए मुड़ेगी। बाए मोड़ो तो क्या वह अपनी इच्छा से मुड़ती है? क्या अपनी इच्छा से चलती है? तो जैसे कार जड़ है, स्वयं भी नहीं चलती और अपनी इच्छा से नहीं चलती। ऐसे ही मन भी जड़ है। महर्षि पतंजलि जी ने बताया अष्टांग योग में मन भी जड़ है।

तो मन जो चलता है, चलता तो है। मन भी। लोग कहते हैं, साहब, मेरा मन तो कहां कहां भागता है। मन बड़ा चंचल है। मन भटकता रहता है। और हमको भी भटका रहता है। ऐसा लोग बोलते हैं। तो यह जो मन भागता है, क्या यह स्वयं भागता है या कोई इसको भगाता है? हां जी, भगाता है। कौन भगाता है? आप। कौन हैं? तो आज की सत्संग कक्षा का दूसरा पाठ याद कर लीजिए। मन भागता नहीं है, हम उसको भगाते हैं। बोलिए। हम उसको भगाते हैं। अच्छा, जो ड्राइवर कार चला रहा है, अगर कार रोकनी पड़े, तो ड्राइवर रोकेगा या पिछली सीट बैठा व्यक्ति रोकेगा? ड्राइवर। क्यों रोकेगा? उसके पास कंट्रोल्स हैं। ब्रेक उसके पास है, गियर उसके पास है। सारे कंट्रोल कार के उसके पास हैं। जो चला रहा है। तो जो चला रहा है, वही तो रोकेगा। पीछे वाला कैसे रोकेगा? उसके पास है ही नहीं ना स्टीयरिंग है, ना ब्रेक है, ना गियर है, कुछ भी नहीं। वह चला भी नहीं रहा, रोक भी नहीं सकता। जो चला रहा है, वही रोकेगा। तो मन को कौन चला रहा है? और मन को रोकेगा कौन? आप। कौन हैं? तो बस, आप ही चला रहे हैं और आप ही रोकेंगे। ठीक है। मन को आपके मन को कौन चला रहा है? आप स्वयं चला रहे हैं। और उसको कौन रोकेगा? आप ही रोकेंगे।

यह महर्षि पतंजलि जी ने अष्टांग योग में यह सारी बातें बताई। मन जड़ है, वह उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं है, वह स्वयं क्रिया नहीं करता। आत्मा चेतन है, इच्छाएं आत्मा की होती हैं। वह अपनी इच्छा के माध्यम से मन को चलाता है। जड़ वस्तु स्वयं नहीं चलती। चेतन वस्तु स्वयं क्रिया करती है। दूसरे जड़ पदार्थ में क्रिया को उत्पन्न करती है। जैसे ड्राइवर कार को चलाता है। तो मन जड़ हुआ। कार भी जड़ है। मन भी जड़ है।

एक दिन में टैक्सी में बैठा हुआ था। दो घंटे का रास्ता था। यहां से अपने रोजड़ जा रहा था। कई साल पुरानी बात। तो रास्ता था जंगल का। ऐसे ही गांव जंगल रास्ता था। तो ड्राइवर बेचारा बोर होने लगा। तो उसने क्या किया, अपना स्टीरियो बजाना शुरू किया। कार का स्टीरियो बजाया और उसमें गीत बजने लगा। गीत के शब्द थे, दिल है कि मानता नहीं। आपने सुना होगा। हां जी, सुना है। दिल है कि मानता नहीं। तो मुझे बड़ी हंसी आई। मैंने कहा, ये कैसे-कैसे गीत बनाते हैं। दिल है कि मानता नहीं। ऐसा गीत क्यों नहीं बनाते, कार है कि मानती नहीं? अगर कोई व्यक्ति ऐसा गीत बनाए, कार है कि मानती नहीं, तो लोग क्या समझेंगे? इसका दिमाग ठीक ठाक है या कुछ गड़बड़ है? गड़बड़ है ना? क्यों? कार जड़ है। यह तो लोगों को समझ में आ गई।

[संगीत]

बात कार जड़ है, यह बात तो लोगों को समझ में आई। हां या ना? इसलिए कार के बारे में ऐसा नहीं कहते कि कार मेरी मानती नहीं। वो कार को चलाना सीख लेते हैं। उसकी प्रैक्टिस कर लेते हैं। अभ्यास कर लेते हैं। छह महीने में आदमी एक्सपर्ट हो जाता है। फिर ठीक से चलाता है। रोकता है। दाएं बाएं मोड़ता है। सब तरफ ठीक-ठाक चलाता है। कार जड़ वस्तु है। उसको चेतन ड्राइवर चलाता है। उसको चलाना सीखता है। उसको दाएं बाए मोड़ना सीखता है। फिर उसका अभ्यास करता है। तो वह कार पर कंट्रोल कर लेता है। हां या ना? आप में बहुत सारे लोग हैं जो कार चलाते हैं। और वह पूरा अच्छी तरह कंट्रोल रख के 100% कंट्रोल रख के कार चलाते हैं। क्यों? लालचंद जी, आप कार चलाते हैं। आपका कार पर कंट्रोल है 80% या 100%? देखो, 100%। क्योंकि आपने चलाना सीख लिया और उसका अभ्यास कर लिया। कार जड़ है। वह आपके कंट्रोल में रहती है।

मन जड़ है या चेतन? वह आपके कंट्रोल में रहना चाहिए या नहीं? क्या आपका मन आपके कंट्रोल में रहता है? क्यों नहीं रहता? आपने उसको चलाना सीखा ही नहीं। रोकना सीखा नहीं। चलाना सीखा नहीं। उसको कंट्रोल करना सीखा नहीं। दाएं बाएं मोड़ना सीखा नहीं। उसका अभ्यास ही नहीं किया। तो बताओ, आपके कंट्रोल में कैसे रहेगा? इसलिए लोग ऐसा गीत बनाते हैं, दिल है कि मानता नहीं। जैसे कार जड़ है, ऐसे दिल भी जड़ है। दिल और मन एक ही बात है। मन थोड़ा शास्त्रीय भाषा है। दिल जरा चालू भाषा है। व्यवहार की जो हम बोलते रहते हैं। तो यदि कार जड़ है, वह अपनी इच्छा से नहीं चलती, वह आपके कंट्रोल में रह सकती है। तो मन भी जड़ है। वह भी अपनी इच्छा से नहीं चलता। वह भी आपके कंट्रोल में रह सकता है। बस थोड़ी सी बात है सीखने की।

तो मन कैसे चलता है? उसको थोड़ा चलाना सीख लीजिए। और रोकना भी सीख लीजिए। महर्षि पतंजलि के अष्टांग योग से ही बताऊंगा। तो महर्षि पतंजलि जी ने कहा कि मन कैसे चलता है? उसके अंदर सबसे पहले इच्छा पैदा होती है। क्या पैदा होती है? इच्छा। और इच्छा कौन पैदा करता है? आत्मा। इच्छा तो आत्मा की है। आत्मा चेतन है। जड़ वस्तु में इच्छा होती नहीं। कार जड़ है। कार में इच्छा है क्या? नहीं। तो जब कार जड़ है, उसमें कोई इच्छा नहीं है, तो मन भी जड़ है। उसमें भी कोई इच्छा नहीं है। फिर भी जो इच्छा उठ रही है, तो समझ लीजिए यह चेतन आत्मा का गुण है। आत्मा अपनी इच्छाएं उठाता रहता है। और उल्टी सीधी इच्छाएं उठाता रहता है। उसको मैंने जैसे बताया, इच्छाओं का एनालिसिस करना नहीं आता। वह ऐसी ऐसी इच्छाएं उठाता रहता है जो पूरी नहीं हो सकती। और जब वह पूरी नहीं होती, फिर दुखी होता है। फिर मन में अशांति होती है।

और दूसरे लोगों से इच्छा के साथ-साथ एक और चीज है, वह है आशा। क्या है? आशा। उम्मीद। एक्सपेक्टेशन। जैसे आप अपने मन में इच्छाएं पैदा करते हैं। ऐसे ही कुछ दूसरे लोगों से कुछ उम्मीद भी रखते हैं। एक्सपेक्टेशंस भी रखते हैं। अपने भाई से, बहन से, पत्नी से, पति से, पड़ोसी से, मित्रों से, व्यापारी से, ग्राहक से, रेल यात्री से, बस यात्री से, पता नहीं जो जो लोग आपके संपर्क में आते हैं, आप उनसे कुछ कुछ इच्छाएं रख, आशाएं रखते हैं। एक्सपेक्टेशन रखते हैं। मेरे भाई को मेरे लिए ऐसा तो करना ही चाहिए। मेरी पत्नी को मेरे लिए इतना तो करना ही चाहिए। मेरे पति को मेरे लिए इतना तो करना ही चाहिए। हां या ना? ऐसी एक्सपेक्टेशन रखते हैं आप। इसका भी वही नियम है, जो इच्छाओं का। क्या नियम है? इच्छाओं को पूरा करने से इच्छाएं घटती हैं या बढ़ती हैं? बस। यही नियम एक्सपेक्टेशंस का भी है। एक्सपेक्टेशन पूरी होने पर वह घटती हैं या बढ़ती हैं? वह भी बढ़ती है। जैसे-जैसे कोई आपकी एक्सपेक्टेशन पूरी करता जाता है, वैसे-वैसे वह और बढ़ती जाती है। और इसका भी वही नियम है। क्या सारी एक्सपेक्टेशंस कोई आपकी पूरी कर देगा? जी। आप किसी की 100% एक्सपेक्टेशन पूरी कर सकते हैं? जब आप नहीं कर सकते, तो दूसरा भी नहीं कर पाएगा। आप व दोनों एक जैसे हैं। आप भी अल्प शक्तिमान, वह भी अल्प शक्तिमान। जब आप किसी की 100% एक्सपेक्टेशन पूरी नहीं कर सकते, तो दूसरा भी नहीं कर पाएगा। फिर भी आप उससे 100% उम्मीद रखते हैं कि इसको मेरी 100% एक्सपेक्टेशन पूरी करनी चाहिए। बस यही गलती है। इसके कारण अशांति पैदा होती है।

तो रिड्यूस योर एक्सपेक्टेशन। जो दूसरों से आप एक्सपेक्टेशन रखते हैं, उनको भी थोड़ा कम करें। बिल्कुल सेम लॉ। वही नियम है, जो इच्छाओं के बारे में था, वही एक्सपेक्टेशंस के बारे में भी है। कम एक्सपेक्टेशन रखें। दूसरे व्यक्ति के सामर्थ्य को ध्यान में रखकर उससे एक्सपेक्टेशन रखें। शास्त्री जी, पानी दे। जो लोग आपसे परिचित नहीं हैं, नए लोग मिलते हैं, तो उनके बारे में तो आप अधिक नहीं जानते। उनका कितना सामर्थ्य है, कितनी बुद्धि है, कितनी योग्यता है, कहां कहां उनके पास साधन हैं, क्या-क्या साधन हैं। चलो मान लिया, उसके बारे में आप अधिक नहीं जानते। लेकिन जिस व्यक्ति के साथ 5 साल से रह रहे हैं, 10 साल से रह रहे हैं, 20 साल से रह रहे हैं। पति-पत्नी। आप समझ गए होंगे। समझ गए। पति-पत्नी तो 20-20, 30-30 साल से साथ में रह रहे हैं। कृते जी बता रहे थे, 40 साल पति-पत्नी रहे, तो बहुत बड़ी अचीवमेंट है। सही बात है। तो जिस व्यक्ति के साथ आप 20 साल से रह रहे हैं, 30 साल से रह रहे हैं, उसका तो एक्सपीरियंस हो गया ना आपको। उसके सामर्थ्य का तो पता चल गया ना। उसकी रुचि का पता चल गया। उसकी हैबिट्स का पता चल गया। उसकी सारी बातें आप समझ चुके। तो कम से कम उससे तो ठीक ठाक एक्सपेक्टेशन रखें। उससे भी इतनी ज्यादा एक्सपेक्टेशन रखते हैं, जो पूरी नहीं होने वाली। आपको उसका पति का सामर्थ्य मालूम है। पत्नी को पति का सामर्थ्य मालूम है। पति को पत्नी का सामर्थ्य मालूम है। तो जितना मालूम है, तो उतनी उम्मीद रखो। उससे ज्यादा क्यों रखते हैं? जितनी ज्यादा उम्मीदें रखेंगे, बस उतना ही आप परेशान होंगे। तो इस बात का ध्यान रखें। जिन-जिन लोगों को आप पहचानते हैं, जानते हैं, वर्षों से साथ में रहते हैं, तो उतनी उम्मीद रखें उन लोगों से, जितनी वह आपकी पूरी कर सकते हैं। पिछला 20 साल का रिकॉर्ड आपको मालूम है, उसके बेस पर उतनी ही एक्सपेक्टेशन रखें।

तो मैं यह निवेदन कर रहा था। इच्छाएं और आशाएं। यह आत्मा उपन करता है। तो मन में विचार कैसे आता है? उसका पहला कारण है इच्छा। मन में विचार उत्पन्न होने का पहला कारण क्या है? और दूसरा कारण बताया महर्षि पतंजलि जी ने, दूसरा कारण है प्रयत्न। दूसरा कारण यह प्रयत्न भी आत्मा की विशेषता है। आत्मा की प्रॉपर्टी है। न्याय दर्शन में आत्मा की पहचान के छह लक्षण लिखे हैं। चलो एक बार गिन तो ले। बोलिए मेरे साथ। इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख का अनुभव करना, दुख का अनुभव करना और ज्ञान। ज्ञान मतलब नॉलेज। वह हिंदी वाले उसको ज्ञान बोलते हैं। हम लोग ज्ञान बोलते हैं। संस्कृत वालों ने हमको ऐसे ही सिखाया कि इसका शुद्ध उच्चारण है ज्ञान। तो मेरे पिताजी संस्कृत के टीचर थे, तो बचपन से उनके पास ही पढ़े हम। घर में भी उनसे ही सीखा। तो उन्होंने हमको ज्ञान उच्चारण सिखाया। अब वो आदत पड़ गई, तो मैं ज्ञान ही बोलता हूं। जब मैं ज्ञान बोलूं, तो आप समझ लीजिए वही कह रहा हूं, जिसको हिंदी वाले ज्ञान बोलते हैं। और गुजराती वाले जनान यही बोलते हैं ना? हां, वही। और उल्टा सीधा नहीं समझिए। यही समझिए।

तो आत्मा में ज्ञान है, नॉलेज है। वह सुनता है, सीखता है। बहुत सारी बातें सीख जाता है। पर जड़ वस्तु में ज्ञान नहीं होता। मैं इतनी देर से बोल रहा हूं और आप सुन रहे हैं। आपको मेरी बातें समझ में आ रही है। आ रही है ना? क्या इस माइक्रोफोन को भी समझ में आ रही है? यह कुछ नहीं सीख रहा। क्यों नहीं सीख रहा? यह जड़ है। तो जड़ वस्तु कुछ नहीं सीख है। उसमें ज्ञान नहीं है। ना पहले से ज्ञान है और ना आगे सीख है। जिसमें थोड़ा ज्ञान पहले से हो, वह आगे भी सीखता है। नई नई बातें सीखता रहता है। आप एलकेजी से लेकर पीएचडी तक बताइए, कितनी सारी बात सीख गए, क्योंकि आप चेतन हैं। तो चेतन आत्मा में एक ज्ञान गुण है। एक इच्छा है। एक प्रयत्न है। एक द्वेष भी है। दो कुत्तों के बीच में एक रोटी डाल दीजिए, फिर देखिए क्या होगा। झगड़ा। हां या ना? और दो कारों के बीच में 10 लीटर पेट्रोल रख दीजिए। दो कारें झगड़ी? क्यों? वह जड़ है। उसमें द्वेष नहीं है। दो कुत्ते, वह चेतन हैं। उसमें आत्मा है। उसमें द्वेष है। द्वेष के कारण वो दो कुत्ते झगड़ा करते हैं, लड़ते हैं। वह कहता है, मैं खाऊंगा रोटी। वो कहता है, मैं खाऊंगा। तो जितने ये चेतन हैं ना, उनमें सब में द्वेष है। वह झगड़े करते हैं, लड़ाइयां करते हैं। दो कुत्ते लड़ते हैं, दो बकरियां लड़ती हैं, दो भैंस लड़ती हैं, दो गौएं लड़ती हैं, दो मनुष्य लड़ते हैं। पर दो मोटरसाइकिल नहीं लड़ेंगी। दो कारें नहीं लड़ेंगी। उनमें द्वेष नहीं है। तो आत्मा की ये प्रॉपर्टी है। इच्छा है, द्वेष है। और कभी सुखी होता है, कभी दुखी होता है। सुख-दुख तो हर रोज लगा ही रहता है। वह आप सब जानते ही हैं। तो आपके अंदर ज्ञान भी है, सुखी भी होते हैं, दुखी भी होते हैं, इच्छाएं भी हैं, कहीं-कहीं द्वेष भी कर लेते हैं। और प्रयत्न भी करते हैं। प्रयत्न का मतलब यह स्वयं क्रिया करना। बोलिए। दो तरह की वस्तु हैं, जड़ और चेतन। जड़ वस्तु भी क्रिया करती है, चेतन भी क्रिया करती है। दोनों क्रिया करती हैं। पर दोनों में अंतर क्या? जड़ वस्तु स्वयं क्रिया नहीं करती। बोलिए। चेतन वस्तु स्वयं क्रिया करती है। बस। यह जो चेतन वस्तु स्वयं क्रिया करती है, इसी का नाम प्रयत्न है। प्रयत्न गुण। हां। तो आत्मा में प्रयत्न है। वह स्वयं क्रिया करता है। कुत्ता स्वयं चलता है। बकरी स्वयं चलती है। गाय स्वयं चलती है। घोड़ा स्वयं चलता है। उसको कार की तरह ड्राइव नहीं करना पड़ता। घोड़े को कार को तो ड्राइव करना पड़ता है। घोड़े को ड्राइव करना पड़ता है। वह अपने आप चलता है। चींटी अपने आप चलती है। मनुष्य अपने आप चलता है। उसमें चेतन आत्मा है। उसमें प्रयत्न गुण है।

तो यह दो गुण ध्यान से सुनिए। पहला इच्छा और दूसरा प्रयत्न। बोलिए। इन दो गुणों से मन चलता है। मन के चलने का मतलब मन में विचार उत्पन्न होता है। आप बैठे यहां पर अहमदाबाद में ध्यान करने के लिए। चलो भाई, ध्यान कर ले ईश्वर का थोड़ी देर। तो आपने गायत्री मंत्र शुरू किया। ओम भूर भूव स्वाह। बस। इतना ही बोले थे। इतने में आपका मन पहुंच गया बंबई चौपाटी पर। दो साल पहले आप बंबई चौपाटी पर गए थे। जो भी सेंटर पर। शाम का टाइम था। 6 बज रहे थे। दिन ढल रहा था। सूरज समुद्र में डूब रहा था। ठंडी ठंडी हवा चल रही थी। बहुत सारे लोग घूम रहे थे। भेलपुरी वाले भेलपुरी बेच रहे थे। सिंघाड़े वाले सिंघाड़े बेच रहे थे। कोई गुब्बारे वाला था, वो गुब्बारे बेच रहा था। आपको थोड़ी शरारत सूझी। आपने सिंघाड़े वाले को आवाज लगाई। उसने पीछे मुड़ के देखा, भाई, मुझे कौन बुला रहा है? तो आपने भी इधर-उधर देखा। जैसे आपने बुलाया नहीं बुलाया तो आपने ही था। आपका उद्देश्य उसको छेड़ना था। तो आपने उसको छेड़ा और वो इधर-उधर देखने लगा। दो साल पहले की वह पूरी पिक्चर आपको यहां मन में बैठे-बैठे याद आ जाएगी। हां या ना? फिर आप कहेंगे, यह क्या हुआ? हम तो बैठे थे अहमदाबाद में। यह बंबई कैसे पहुंच गए? फिर ध्यान आएगा, अरेरे, हम तो भगवान का ध्यान कर रहे थे। चलो, अभी बंद करो। थोड़ा ध्यान कर ले। फिर जैसे-तैसे आपने उस विचार को हटाया और फिर आप बैठे। दोबारा शुरू किया आपने। ओम भूर भूव स्वाह। तत सावितुर वरेण्यम। बस यहीं तक पहुंचे थे और दिल्ली के चिड़ियाघर में पहुंच गए। अब वह सीरीज शुरू हो जाएगी। चार-पांच साल पहले दिल्ली चिड़ियाघर देखा था। फिर चिड़ियाघर की चित्र सारे पूरे हो जाएंगे। फिर वह इंडिया गेट शुरू हो जाएगा। फिर कनॉट प्लेस शुरू हो जाएगा। फिर करोल बाग की शॉपिंग शुरू हो जाएगी। पता नहीं क्या-क्या दिमाग में घूमता रहता है। हां या ना? बस इसी को लोग कहते हैं, साहब, हमारा मन बहुत भटकता है। और यह टिकता नहीं। यह कंट्रोल में नहीं आता। यह हमको भी भटका रहता है। यह सारा झूठ। मन भटकता है या हम मन को भटकाते हैं? हम भटकाते हैं। तो आज से अपनी भाषा भी ठीक कर ले।

भाषा बदले मन नहीं भटकता है। हम भटका हैं। एक ड्राइवर थोड़ा अड़ी था, नया नया चलाना सीख रहा था। उसने ठोक दी गाड़ी। क्या वह अपनी गलती मानता है? वो कहता नहीं साहब, मैं तो ठीक चला रहा था। यह कार बहुत खराब है, यही ठुक जाती है। वह अपनी गलती नहीं समझ रहा, स्वीकार नहीं करता।

छह महीने बाद वह एक्सपर्ट हो जाता है। छह महीने बाद उसको समझ में आता है, जो पिछली बार ठूकी थी तो मैंने ही ठोकी थी। तब छह महीने बाद समझ आता है, पर शुरू शुरू में पांच-सात दिन में उसको समझ नहीं आता कि मैंने ठोकी थी। बस यही बात मन के विषय में है। मन भटकता नहीं है, भटका जाता है। आत्मा उसको भटका है अपनी इच्छा से और अपने प्रयत्न से। पर शुरू शुरू में यह बात समझ में नहीं आती।

10-20 साल अभ्यास करें, प्रैक्टिस करें और इसको रोकना सीखें, चलाना सीखें तो 10-20 साल के बाद आपको समझ में आएगा कि मन कहीं नहीं भटकता, हम ही भटका हैं। क्यों भटका है? मन कहीं जाता है तो क्यों जाता है? उसके पीछे मनोविज्ञान है। जिस वस्तु में आपको सुख दिखता है, बोलिए आपका मन वही जाएगा। हां या ना? बस तो यह है साइकोलॉजी।

आपका मन क्यों भागता है बंबई में चौपाटी पर? क्योंकि चौपाटी में मजा आया था, सुख मिला था। बढ़िया सीन था, ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी और फिर भेलपुरी भी खाई थी वहां। तो फिर वह अच्छा लगा था, तो फिर उसका संस्कार मन में हो गया जमा। तो जब वह जमा हो गया संस्कार, तो आप बैठे तो ध्यान में। अब ध्यान में ईश्वर में क्यों नहीं टिका मन? क्योंकि ईश्वर में सुख नहीं दिखता है। क्या बोला? जितना सुख आपको भेलपुरी में दिखता है, उतना ईश्वर में दिखता है? नहीं दिखता। इसलिए भेलपुरी याद आती है। ईश्वर कहां याद आता है? ईश्वर से मन उखड़ जाता है। भेलपुरी खूब याद आती है, गुलाब जामुन खूब याद आता है, रसगुल्ले खूब याद आते हैं और जलेबी खूब याद आती है, पाव भाजी खूब याद आती है। हां या ना? तो जितना सुख इन चीजों में दिखता है, उतना ईश्वर में नहीं दिखता। इसलिए मन वहां भागता है जहां-जहां आपको सुख दिखता है, वहां मन भागता है। तो इच्छा के कारण भाग रहा है। आत्मा की इच्छा है उन चीजों का सुख दोबारा लेने की, जिन चीजों का सुख वह पहले ले चुका। उन्हीं चीजों का सुख वह दोबारा लेना चाहता है। इसलिए पुरानी मेमोरीज को रिकॉल करता है, पुरानी स्मृतियों को उठाता है और उन बातों को याद कर-कर के उन्हीं में घूमता रहता है। उसको अच्छा लगता है, मजा आता है, खुशी मिलती है। इसलिए वह मन को उधर भटकाए रहता है और आगे की योजना बनाता रहता है कि अबकी बार जलेबी कब मिलेगी? अबकी बार रसगुल्ले कब मिलेंगे? फिर उसको याद आया, हां तीन दिन फलानी पार्टी में जाना है। तीन दिन बाद वहां खाएंगे जम करके। और लोग तो ऐसे खाते हैं कि लंच भी छोड़ देते हैं, लंच नहीं खाते। थोड़ा पेट में अच्छी भूख लगे तो वहां जम के खाएंगे रात को। ऐसे-ऐसे भी हैं लोग। तो मन कहां जाता है जहां पर हमें सुख दिखता है।

अब उसको ब्रेक लगानी हो, वहां से रोकना हो, तो कैसे रोके इस बात को? उससे उल्टा कर दीजिए। अगर गाड़ी की स्पीड बढ़ानी है तो गियर लगा कर क्या करेंगे? एक्सीलेटर दबाएंगे तो गाड़ी तेज हो जाएगी। और अगर गाड़ी को रोकना हो तो क्या करना चाहिए? ब्रेक लगानी चाहिए। अब एक व्यक्ति को ब्रेक का पता नहीं था, नया-नया सीख रहा था। गाड़ी आगे स्पीड ब्रेकर आया तो पड़ोस में जो बैठा था साथी, उसने कहा ब्रेक लगाओ। वह बेचारा घबरा गया, कहां है ब्रेक? उसने ब्रेक की बजाय एक्सीलेटर पर पांव रख दिया। अब कार रुकेगी या तेज हो जाएगी? और तेज हो जाएगी। तो लोग ध्यान के समय यही करते हैं। चाहते तो हैं मन को रोक लूं, ईश्वर में टिका लूं, पर वह ईश्वर में टिकता नहीं और और एक्सीलेटर दबाते रहते हैं और इच्छाएं पैदा करते रहते हैं। मन और तेज-तेज भागता है। फिर लोग यह भी शिकायत करते हैं, साहब, इसको जितना रोको उतना तेज भागता है। हां या ना? हां, यही शिकायत है ना? तो यह शिकायत इसीलिए कि उनको ब्रेक का पता ही नहीं। गलती से ब्रेक की बजाय एक्सीलेटर पर पांव रखते हैं और दबाते हैं उसको। तो फिर तो कार की स्पीड बढ़ेगी।

अब मन की ब्रेक क्या है? वह सुनिए। मन की ब्रेक है वैराग्य। क्या है? मन की ब्रेक महर्षि पतंजलि जी ने बताया अष्टांग योग में कि मन की ब्रेक वैराग्य है। अगर किसी चीज से आपको वैराग्य हो जाए तो आपका मन वहां नहीं भागेगा, रुक जाएगा। वह उसकी ब्रेक है। एक और ब्रेक है, दो ब्रेक बताई मन को रोकने की। दूसरी ब्रेक है अभ्यास। दूसरी कौन सी? आप में से योग दर्शन किस-किस ने पढ़ा है? अच्छा। अब मैं सूत्र बोलता हूं, आप बताएंगे यह सूत्र वहां है कि नहीं? पहले चैप्टर में 12वां सूत्र है। बोलिए, "अभ्यास वैराग्यभ्यां तन्निरोधाः"। यह सूत्र योग दर्शन में है, है ना? तो इस सूत्र में महर्षि पतंजलि जी ने दो ब्रेक्स बताई मन को रोकने के लिए। एक तो अभ्यास करें, प्रैक्टिस करें और दूसरा वैराग्य वह उत्पन्न करें। देखो, आपका मन रुक जाएगा।

वैराग्य कैसे होता है? जब किसी वस्तु में आपको दुख दिखता है। क्या बोला? दोहराएं। जब किसी वस्तु में आपको दुख दिखता है तो आपको उससे वैराग्य हो जाता है। राग अटैचमेंट। राग का मतलब और वैराग्य का मतलब डी-अटैचमेंट, उससे वापस उल्टा हो जाना। तो जिस चीज में राग, इच्छा, दिखता है, सुख दिखता है, जिस चीज में सुख दिखता है, उसमें इच्छा होती है, उसमें राग होता है, अटैचमेंट होती है। और यदि उसी चीज में आपको दुख दिखने लग जाए, सेम वही वस्तु अगर दुख दिखने लग जाए तो आपको फटाफट ब्रेक लग जाएगी। आप तुरंत हाथ वापस खींच लेंगे। नहीं, नहीं, नहीं, यह खतरे वाली चीज है, यह नहीं खानी। फॉर एग्जांपल, यहां अहमदाबाद के एक अच्छे हलवाई, आजाद हलवाई हैं ना? बढ़िया चीज बनाते हैं। मान लो आजाद हलवाई की बढ़िया मिठाई, ताजी-ताजी, गरमा-गरम अभी आपके सामने लाकर रख दें और आपसे यह कहें, अच्छा, आधा घंटा ईश्वर का ध्यान कर लीजिए, उसके बाद यह प्रसाद में मिठाई आपको बटेगी। उस आधे घंटे में आप ईश्वर का ध्यान करेंगे या मिठाई का? मिठाई का। क्यों? उसमें सुख दिखता है। जितना सुख मिठाई में दिखता है, उतना ईश्वर में कहां दिखता है? नहीं दिखता। तो जिसमें सुख दिखता है, उसमें राग होगा, उसमें अटैचमेंट होगी, उसकी इच्छा होगी और मन वही वस्तु आएगी, मन में उसी वस्तु का विचार आएगा।

तो यह एग्जांपल था। जिस वस्तु में सुख दिखता है, उसमें राग होता है, इच्छा होती है, अटैचमेंट होती है, उसको खाने की इच्छा होती है, प्राप्त करने की इच्छा होती है। अब अगली बात सुनिए। वही मिठाई जो अच्छी है, ताजी-ताजी, बढ़िया बनकर आई है, अभी-अभी गरमा-गरम, आपको उसमें सुख दिख रहा है, इसलिए उसको खाने की इच्छा हो रही है। आपके मन में ईश्वर का विचार नहीं टिकेगा, मिठाई का विचार आएगा कि मिठाई कब मिलेगी? मिठाई खानी चाहिए। बहुत अच्छी जलेबी है और आजाद हलवाई की है, बहुत बढ़िया है, ताजी-ताजी है, गरमा-गरम है। और यदि थोड़ी देर में आपके सामने कोई व्यक्ति उस मिठाई के डब्बे का ढक्कन हटाकर थोड़ा सा उसमें जहर टपका दे, उस मिठाई में जो बहुत अच्छी लग रही थी, स्वादिष्ट थी, आपकी आंख के सामने उसमें थोड़ा सा टपका दे, तब आपको इच्छा होगी मिठाई खाने की? देखो, ब्रेक लग गई ना? ऐसे ब्रेक लगती है। उससे आपको वैराग्य हो जाएगा। क्यों? अब उस मिठाई में, जहरीली मिठाई में, सुख दिख रहा है या दुख दिख रहा है? दुख दिख रहा है। बस यही साइकोलॉजी है, यही मन का विज्ञान है। इसको समझना है। जिस वस्तु में सुख दिखता है, उसमें राग होता है। महर्षि पतंजलि जी ने बताया, "सुखाशय रागः" और "दुखान्वय द्वेषः"। जहां दुख दिखता है, वहां से द्वेष होता है, वहां से व्यक्ति पीछे हटता है, कहता है, नहीं, नहीं, यह नहीं चाहिए।

अगर आपसे कहे कि आधा घंटा ईश्वर का ध्यान कर लीजिए, फिर आपको यह जहरीली मिठाई बटेगी, जहर वाली, जो आपकी आंख के सामने जहर डाला, फिर आपसे यह कहेंगे, जहरीली मिठाई बटेगी प्रसाद में। अब आपको मिठाई का विचार आएगा? देखा, ब्रेक लग गई ना? यह है वैराग्य। महर्षि पतंजलि जी ने सिखाया। तो ऐसे अष्टांग योग से हम मन को चलाना सीखते हैं, रोकना सीखते हैं। और जब एक बार समझ में आ गया कि जहरीली चीज नहीं खानी चाहिए, आपकी इच्छा वहां ब्रेक लग जाएगी, नहीं होगी इच्छा। अब इसका रोज अभ्यास करना है। अगर अभ्यास नहीं करेंगे तो यह जो लेवल आज बना, यह थोड़ी देर में हट जाएगा। मिठाई का तो एक उदाहरण था, एग्जांपल था। ऐसा ही संसार की हर वस्तु में व्यक्ति को देखना है। ऐसा महर्षि पतंजलि जी बता रहे हैं। एक सूत्र है योग दर्शन, दूसरा चैप्टर, संख्या है 15। उसमें महर्षि पतंजलि जी कह रहे हैं, अगर आपको योग सीखना है, असली योग सीखना है तो संसार की हर वस्तु में दुख देखना सीखें। सूत्र में लिखा है, "दुःखमेव सर्वं विवेकिना"। बोलेंगे, बुद्धिमान को, विवेकी, बुद्धिमान, बुद्धिमान व्यक्ति को, ऑब्जर्वर व्यक्ति को, जो अच्छा ऑब्जर्वेशन करता है, हर चीज का परीक्षण करता है, उस व्यक्ति को दुखमेव सर्वम, हर चीज में दुख ही दुख दिखता है। जब हर चीज में दुख दिखता है तो उसका मन कहां भटकेगा? हर जगह से ब्रेक लग जाएगी। नहीं चाहिए, यह दुखदायक है। बस इसका नाम वैराग्य है।

तो यह जो वैराग्य का स्तर आज बना, इसको टिकाए रखने के लिए आपको बार-बार अभ्यास करना पड़ेगा, रोज दोहराना पड़ेगा, दिन में कई बार दोहराना पड़ेगा, लंबे समय तक दोहराना पड़ेगा। "दीर्घकाल निरंतर सत्कारासेवि तो दृढभूमिः"। तभी अभ्यास पक्का होगा। तो वैराग्य होना चाहिए पहले, फिर उसका अभ्यास करें। अगर यह चीज टिक गई तो आपका मन आपके कंट्रोल में आ जाएगा 100% आ जाएगा, वैसा ही जैसे कार आपके कंट्रोल में रहती है 100%। मन को कंट्रोल करना इंपॉसिबल नहीं है, असंभव नहीं है। एक कला है, एक टेक्निक है, जो महर्षि पतंजलि जी ने सिखाई। अगर हम उस कला को सीखें, उसका अभ्यास करें तो आपका मन भी 100% आपके कंट्रोल में रहेगा, बिल्कुल रहेगा। वह दिन आएगा। आपको यह दो काम करने होंगे - अभ्यास और वैराग्य। फिर वैसा ही कंट्रोल में रहेगा जैसे कि आपके कंट्रोल में रहती है। तो यह बात थी मन के विज्ञान की, योग दर्शन के आधार पर।

महर्षि पतंजलि जी ने अष्टांग योग में यह बात सिखाई। उनकी भाषा में योग क्या है? एक छोटा सा सूत्र है। मेरे साथ बोलिए, "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"। यह सूत्र आपने सुना होगा, सुना है ना? तीन-चार शब्द हैं, सरल से हैं। वैसे हम पढ़ते रहते हैं, इसलिए हमको सरल लगते हैं। आपको शायद थोड़ा कठिन लगता हो, कोई बात नहीं। मैं सरल बना देता हूं। इसका हिंदी अनुवाद बोलेंगे? "चित्त की च की वृत्तियों कों को रोक देना योग है।" यह इसका सीधा अनुवाद है। "चित्तवृत्तिनिरोधः योगाः"। चित्त की वृत्तियों को रोक देना योग। चित्त का मतलब मन, जो मैंने इतनी कथा सुनाई आपको, जिसकी कथा सुनाई, वह जो है, उसी का नाम चित्त है। और वृत्ति का एक मोटा सा अर्थ है विचार। तो चित्तवृत्ति का अर्थ हुआ मन में उठने वाले विचार। यह है चित्तवृत्ति। और तीसरा शब्द है निरोधः, रोकना। मन में उठने वाले विचारों को रोकना। बस इसका नाम योग है। यही योग आपके मन की शांति उत्पन्न करता है। अगर योग नहीं करेंगे तो अशांति होगी। आपके मन में ढेरों इच्छाएं बनी रहेंगी। यह चीज नहीं मिली, वह चीज नहीं मिली, वह तो रही ही गई। वह अशांति पैदा करेगी। अगर आप इच्छा को कंट्रोल कर लें, अशांति खत्म। और इच्छा को कैसे कंट्रोल करना? वैराग्य से और अभ्यास से।

अब वैराग्य कैसे होगा? उस चीज में दुख देखो। एक लोमड़ी की कहानी आपने सुनी है, "अंगूर खट्टे हैं"। सुनिए ना? लोमड़ी बेचारी उछल रही थी अंगूर प्राप्त करने के लिए। अंगूर का गुच्छा थोड़ा ऊंचा था। उसने बहुत कोशिश की, उसके हाथ में नहीं आया। फिर उसने यह कहकर अपने आप को समझा लिया, यह अंगूर खट्टे हैं, छोड़ो ना, क्या खाना है। यह भी एक तरीका है, जो लोमड़ी ने अपनाया अपने आप को दिल को तसल्ली देने के लिए। यह भी एक तरीका है। पर अगर वास्तव में ही खट्टे हों तो? यह तो उसके हाथ में नहीं आए। अगर हाथ में आ जाते तो मीठे थे, तब तो मीठे होते। पर हाथ में नहीं आए तो उसने अपने आप को समझाने के लिए यह एक उपाय अपना लिया कि अंगूर खट्टे हैं। छोड़ो ना, क्या खाने हैं। तो कभी-कभी यह उपाय भी काम आता है। लेकिन हर चीज तो खट्टी नहीं। वह सारे अंगूर तो खट्टे नहीं होते ना? तो यहां पर हमको योग के अंतर्गत मन के विचारों को रोकना है। तो कैसे रोकना? यहां तो महर्षि पतंजलि जी कह रहे हैं, "दुःखमेव सर्वं"। यहां तो सारे अंगूर खट्टे हैं। बस आपको मीठे दिख रहे हैं। बस यही गलती है। इस गलती को ठीक कर लें। जो-जो अंगूर आपको मीठे दिख रहे हैं, वह उतने मीठे हैं नहीं। हां या ना?

25 साल की उम्र में, 30 साल की उम्र में दुनिया बहुत रंग-रंगीली दिखती है। हां या ना? हां। सब दुनिया अच्छी लगती है। आदमी शरीर में ताकत होती है, जवानी होती है, जोश होता है, ऐसे उछलता-कूदता है, सब काम फटाफट कर लेता है, कुछ मुश्किल नहीं लगता है। और उसको दुनिया बहुत अच्छी लगती है, सुखदायक लगती है। पैसे कमाता है, खाता-पीता है, डांस करता है, शादी करता है, बच्चे पालता है, सब काम करता है। बहुत सुख दिखता है उसको 25-30 साल की उम्र में। परंतु 25 साल गृहस्थी का अनुभव पूरा हो जाए और उसकी उम्र 50-55 की हो जाए तो उसका अनुभव बिल्कुल उल्टा हो जाता है। पूरा शीर-शासन हो जाता है। 25-30 में तो दुनिया बहुत अच्छी लगती थी, बहुत सुखदायक लगती थी। और 50-55 की उम्र में क्या अनुभव होता है? जितना सुख मैंने सोचा था, उतना तो नहीं मिला। गृहस्थ में 25 साल पूरे कर लिए जिसने, 25 साल बाद उसका यह फीलिंग होती है, यह अनुभव होता है। जितना सुख मैंने सोचा था, उतना तो? हां या ना? जिनकी शादी हुए 25 साल हो चुके पूरे, ज्यादा भी हो गए हों, बताइए, मैं ठीक कह रहा हूं? और दूसरी बात, जितना दुख मैंने सोचा था, दुख तो कहां सोचा था? आदमी सोचता ही नहीं। 25 साल की उम्र में कोई दुख सोचता है कि गृहस्थ में जाऊंगा तो दुख भी आएगा? नहीं सोचता है। कोई, कोई सोच भी ले कि चलो 5-10% आएगा दुख, इतना तो चलेगा, इतना तो भोग लेंगे, 80-90% सुख भी तो मिलेगा। यह सोच कर वह शादी भी करता है, सारे पैसे भी कमाता है, सारे धंधे करता है, खूब मेहनत करता है। तो 55-50 साल में जब उसको 25 साल का अनुभव हो जाता है, तब उस तब उसकी फीलिंग क्या होती है? जितना दुख मैंने सोचा था, उससे कई गुना अधिक भोगना पड़ा। हां या ना? बस यही सच्चाई है, जो महर्षि पतंजलि समझाना चाहते हैं। और कोई-कोई एक्सेप्शन होता है, जिसको वह, जो 55 साल की उम्र में आपको अनुभव हो रहा है ना, वह उसको 20 साल में समझ में आ जाता है। कोई-कोई होता है एक्सेप्शन। तो वह तो पहले शादी नमस्ते कर लेता है, मुझे नहीं करनी। ऐसे भी यह कई लोग बैठे हैं मेरे सामने। ऐसे कई लोग बैठे हैं जिनको 25-30 में यह बात समझ में आ गई। मैं भी उन्हीं में से हूं। मुझे भी समझ में आ गई थी, तो मैंने भी शादी नहीं की। खैर, मेरा मतलब यह था कि जहां आपको सुख दिखता है, वहां आप रंजित होते हैं। जहां दुख दिखता है, वहां से वैराग्य हो जाता है। बस यह वैराग्य हुआ और मन कंट्रोल में आया। फिर आदमी मस्त रहता है। कोई चीज उसको आकर्षित नहीं करती। "दुःखमेव सर्वं" विवेक।

तो मैं अपनी बात को यहां पूरा करता हूं। महर्षि पतंजलि जी ने बताया, "योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः"। मन के विचारों को रोको। इसका नाम योग है। इस योग से मन की शांति मिलती है। हमें संसार का परीक्षण करना है, अध्ययन करना है। कहां सुख है और कहां दुख है? है कितना सुख है और कितना दुख है? जिसको जब समझ में आ जाएगा, उसको संसार से वैराग्य हो जाएगा। जितना वैराग्य होगा, जितने परसेंट, 10% 20% जितने परसेंट वैराग्य होगा, उतने परसेंट आपका मन आपके कंट्रोल में रहेगा। जिसको 80% वैराग्य हो गया, उसका मन 80% उसके कंट्रोल में रहेगा। जिसको 100% वैरागी हो गया, उसका मन 100% उसके कंट्रोल में रहेगा। तो इस तरह से आप मन की शांति प्राप्त कर सकते हैं।