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आ घंटे किताबों ठीक स्टार्ट करमन में रखा हुआ आगे डंडा आता कर लान करता हूं। सब सलाम वालेकुम रहमतुल्लाह। चले हम अभी इशाला दर् शुरू करने लगे हैं। अहम चीज यह है कि इंशाल्लाह आप इसी तरतीब से आगे जो है ना बैठ जाया करें अपने लीडर के साथ। आपकी जगह भी आपको पता है, लीडर भी आपको पता है। इसी तरकी रिजन भी होती रहेंगी इशाला ठीक। हम अभ शुरू करने लगे। बला हा सलाम वालेकुम रहमतुल्ला बरका अलुला सला सलाला रस करीम वाला आलीही राला सल तरा अमा बाद।
सभी मो भाइयों और बहनों को हमारे कोर्स के लिए खुशामदीद कहते हैं और अल्लाह के फल तौफीक से आज ला उसकी दूसरी क्लास शुरू करते हैं। साबका दर्स में आपको याद होगा कि हमने दीनी मसाइल को किस तरह से लेना है और कहां से हासिल करना है और यह भी जिक्र हुआ था के इंसानी फितरत है अलग-अलग मिजाज होने की। इसलिए लोगों के अंदर चीजों में खलाफा हो जाना एक फिी चीज है। अल्लाह ताला ने हमें उस लाफ के वक्त हल दिया है, सलूशन दिया है। क्या सलूशन दिया है? हमारा इलाफ हो जाए तो हमें क्या करना चाहिए? कौन भाई आयत सुना सकता है? मन में जो हमने जी माशाल्ला तक म भाई ने माशाल्ला आयत कोट की है सुनाई है। अल्लाह ताला का फरमान याला रसल नकना फला रसल व लोग जो ईमान लाए हो अल्लाह की तात करो और रसूला स की तात करो और अपने ली अम की तात करो। कौन है क है? हा हाक में वकत और भी कोई जी हा उलमा। हमने बताया था कि ली अमर में उलमा है और हुक्मरान है। मुसलमान हुक्मरान हो और उलमा है। य दोनों ही उ अमर है। उलमा आपकी कुरान और सुन्नत के मुताबिक रहनुमाई करते हैं दीन के लिहाज से और हुक्मरान उलमा के उस दिए हुए कुरान सुन मुताबिक जो इनके मुल्क का दस्तूर है या निजाम है उसको नाफ करते हैं। समझे ना? यह दोनों का बड़ा किरदार है और बात रान ही आलिम होता है व खुद ही समझता है कि अल्लाह ताला का हुक्म क्या है और फिर उसको नाफ करता है। तो लेकिन यहां पर हमने देखा था कि उमर के साथ अती का लफ नहीं आया। अल्लाह के ल के साथ अल्लाह के साथ अ आया है, रस आया न उ के साथ नहीं आया। अती का लफ उम के साथ ना आने की वजह क्या है? हा जी हा क्योंकि अल्लाह की तात मुस्तकिल मुस्तकिल होने का माना के हम अल्लाह के बंदे हैं और पैदा ही उसकी तात के लिए गए और रसूल करीम स की तात भी मुस्तकिल है क्योंकि आप अल्लाह की तरफ से हुकम देते हैं। लेकिन रान हो या उलमा हो उनकी तात कुरान और सुन्नत के मुताबिक अल्लाह उसके रसूल के हुक्म के मुताबिक होगी। अगर फर्ज करो किसी भी ऐसी चीज का हुक्म दे देते हैं कि जो कुरान और सुन्नत के अल्लाह उसके रसूल के हुक्म के खिलाफ हो तो फिर उनकी तात नहीं होती। इसलिए यहां पर इस बात का बयान हुआ।
उसके बाद हमने आराम के मुख्तलिफ अवाल जिक्र किए थे। आराम की क्या तालीमाबाद से और दीन में जो लाफा हो जाते हैं उनको हल करने के हवाले से उलमा हमारे अराम की क्या तालीमाबाद फिक खलाफा के हवाले से यह बात भी मद्देनजर रखनी है कि ये मसाइल दीन के बुनियादी असू मसाइल नहीं है। वजू के मसाइल हो, नमाज के मसाइल हो, रोज़ हज के मसाइल हो। क्या ये उस तरह से है जिस तरह अकीदा तौहीद का मसला है? समझे ना? दीन के अंदर कुछ वो मसले हैं कि जो बुनियाद हैं, फंडामेंटल्स है। समझे ना? उसके असूल है और कुछ वो चीजें हैं जिनको फरू का नाम दिया जाता है। फरू के माने ब्रांचेस, शाखे। इसमें क्या है? जहां तक अकीदत का मामला है उसमें तो हमें बिल्कुल वही चीज करना है कि जिस तरह कुरान और सुन्नत में है और इन चीजों के अंदर भी फरी मसाइल में भी हमें वही करना चाहिए जो कुरान और सुन्नत में है। लेकिन अगर अकीदत में कोई खिलाफ वर्जी करता है तो हम देखेंगे कि सही कौन है उसी के साथ चलेंगे। लेकिन फई मसाइल में इतहाद होता है। बहुत मसाइल में इतहाद के माना उलमा की अपनी एक यानी के कोशिश होती है किसी हुक्म को अखज करने की। उसमें फिर क्या है कि बाज औकात उसमें गुंजाइश होती है किसी मसले को लेने की या छोड़ने की। समझे ना? आमा कराम का सहाबा इराम का यही अंदाज रहा है कि बाज औकात वो किसी चीज को समझते कि ऐसे करना चाहिए लेकिन दूसरे की राय के एहतराम करते हुए क्या करते कि अपनी राय को छोड़ देते। समझे ना? अपनी राय को छोड़ देते। तो यह है जो फरी मसाइल है जिस पर ईमान कुफर का फैसला नहीं होता। फर्ज करो वजू में एक बाज उलमा कहते कि कुली करना अभी हम पढ़ेंगे उसके कि कुली करना क्या है फर्ज है, बाद कहते सुन्नत है। अब सुन्नत होने का माना अगर आप फज को कुली नहीं भी करते तो तब भी वजू हो जाएगा उनके नजदीक। इसी तरह नमाज के मसाइल में इस तरह की बहुत सी चीजें हैं। रफ दैन करना बाज कहते हैं कि अल्लाह के नबी अ सलाम सुन्नत है करना चाहिए, बाज इस तरह की चीजों में हमारे दिल में कुशा दगी होनी चाहिए। समझे ना? इस तरह के मसाइल में हमारे दिल में कुशा दगी होनी चाहिए। कहीं यह ना हो कि मसला तो इतना बड़ा नहीं है लेकिन हमने उसको कुफर ईमान का मसला बनाकर अपने किसी भाई को अपने से दूर कर दिया हो और बाज औकात मुमकिन है उसको दीन से खारिज कर दिया हो। ऐसा होता है बाज औकात। इसलिए हमें यहां पर यह भी हमारी ची मद्देनजर होमा किराम के इतिहा दत की वजह से बाज कात इलाफ होते हैं तो इन मसाइल में हमको तशदूद करने की सख्ती करने की इजाजत नहीं है। कराम का अंदाज रहा है इलाफ हो जाता किसी मसले पर लेकिन फिर भी उनके दिल मिले होते। उनके दिलों के अंदर इलाफ ना आता मसाइल पर इलाफ होते लेकिन इन खलाफा से उनकी अलग जमात पार्टिया नहीं बनती थी जिस तर कि आज हमारे यहां हो रहा है। आप इस मस्जिद में यहां तो अल्लाह के फजल से एक ही तरह का माहौल है। हमारे मुल्कों में जाए हर जमात के अलग मसले है। समझे ना? तो आप किसी मस्जिद में दाखिल होंगे तो मुकन आपको वहां पर नमाज भी ना पढ़ने दे। आप फला हो आपकी मस्जिद ये नहीं है। ये सोचने की जरूरत है कि अल्लाह का दन यह है, अल्लाह का दन इस चीज का हुक्म देता है। इसलिए हमें चाहिए इन चीजों के अंदर हमारे दिल कु शदा हो। वैसे अगर कोई सुन्नत मालूम हो जाती है किसी चीज के बारे में इल्म हो जाता है कि नबी की सुन्नत ऐसे ही है हमें वही करना चाहिए और हम उसी के उसी का हमें हुक्म है। लेकिन फर्ज करो किसी दूसरे को देखते हैं कि वो उस तरह नहीं दूसरे तरीके से कर रहा है और उसके पास भी कोई दलील होगी या दलील है तो अल्हम्दुलिल्लाह गुंजाइश बाकी है तो इन चीजों की वजह से हमारे दिलों में कोई नफरत खलाफा पैदा ना हो। नी कहने का मकसद यह है के बाज फिक मसाइल में खलाफा जो है वह हमारे दिलों में खलाफा पैदा ना कर दे क्योंकि इस्लाम का अहम तरीन जो एक मकसद है मुसलमानों को एक जमात बनाना ला जमीया ला कि सभी मिलकर अल्लाह की रस्सी को मजबूती से पकड़ो और त फरका ना करो, इलाफ ना करो, अलग अलगना हो जाओ। इसलिए हमें इत्तेहाद के इस रिश्ते को कायम करना है, इत्तेफाक अपने अंदर पैदा करना है। यह ना हो कि किसी मसले के लाफ की वजह से हम दूसरे से दूर हो जाए, उसको अपने से दूर कर ले। ऐसा तरीका इस्लाम का तरीका नहीं है।
तो यह थी एक अहम और चीज जो हमारे बाकी रह गई थी। उसके बाद इंशाल्लाह हम बरा रास्त अपने रत के मसाइल जो कि हमारा सबसे पहला चैप्टर है उसको शुरू करते हैं। तो तहर के हवाले से तहर की फजीलत अहमियत सबसे पहले आपके सामने यह है कि दीन इस्लाम की मुख्तलिफ इदात कासार उसका दारो मदार किस चीज पर है? तहर और पाकी पर है। जिस्मानी तत भी और रूहानी तत भी। यानी आपका दिल भी पाक हो। दिल का पाक होना किस चीज से? शिर्क से, ऐसी चीजों से। क्योंकि अगर दिल के अंदर को ऐसी चीजें हैं तो इबादत का फायदा कोई नहीं है। तो दिली तौर पर भी मुसलमान हर तरह की ऐसी चीजों से पाक हो कि जो दिल को इन के इने गलीज कर देने वाली है, दिल को जो है परा गंदा कर देने वाली है और जिस्मानी तौर पर आदमी पाक हो। उसी हवाले से नबी की हदीस है अर ईमान कि रत क्या है? आधा ईमान है। शत्र के मानी आधा आधा ईमान है ही तहर के अंदर, सफाई के अंदर, सुथरा के अंदर। आप नमाज पढ़ते हो, नमाज के लिए रत शर्त है, आप बा वजू हो, पाकीजा पाक हालत में हो। परना नमाज नहीं होगी। बैतुल्लाह का तवाफ करने के लिए तहर शर्त है। इस तरह इसी से पता चलता है कि तत की कितनी बड़ी अहमियत है और पाकीजा। इस तरह दूसरी हदीस जिसम आप माते है ला सला ब तत के बगैर पाकी कीी के बगैर नमाज होती ही नहीं है। और तीसरी हदीस में आप क्या फरमाते हैं? मता सलार के नमाज की चाबी ही क्या है? वह तहर है, पाकी कीी है। इससे पता चलता है के इस तहर की कितनी बड़ी जरूरत है, कितनी अहमियत है दीन के अंदर। के बाद इबादत जब तक तहर नहीं उस वक्त तक आपकी इबादत है ही नहीं। अच्छा इस तत के हुकम से हमको मालूम क्या होता है कि इस्लाम ने इस कदर इसकी ताकीद की है बल्कि नबी करीम सलाम दो कब्रों के पास से गुजरे तो आपने क्या फरमाया? इन दोनों कब वालों को अजाब हो रहा है। एक अजाब की वजह क्या थी? कि वो नापाकी से नहीं बचता था, पेशाब की छीट से, नापाकी से परहेज नहीं करता था, बचता नहीं था कि जिस वजह से उसको कब्र में ही अजाब हो रहा है कि ना कि सिर्फ इबादत कबूल नहीं होगी बल्कि इसके दुनिया आखिरत के बड़े गलत अल्लाह की इबादत का जो मामला वो तो है बजाते खुद इंसान के जिस्म के हवाले से, इंसान की जात के हवाले से इस्लाम ने कितना एहतमाम किया है कि बंदा जो है इंसान जो है वह साफ सुथरा हो, पाकीजा हो। उसके जिस्मानी तौर पर भी उसके अंदर कोई ऐसी चीज ना हो कि जो उसके लिए नुकसान दे हो। क्योंकि गलाते नजासत गंदग किसी और को नुकसान बाद में देंगी। सबसे पहले किसको देती है? कि जो खुद इनके अंदर पड़ा होता है। इसी से हमें पता चलता है कि इस्लाम की अजमत क्या है।
मजीद अगर आपको देखना हो कि इस्लाम ने तत के अकाम हमको देकर इंसानियत पर कितना बड़ा एहसान किया है तो थोड़ा सा आप बाकी दिनों का जायजा लेले। थोड़ा सा इस्लाम को उनके साथ कंपेयर करके देखें कि इस्लाम के अंदर तहर के मसाइल इन चीजों के हवाले से किस कदर लीमा है, किस कदर एहतमाम है और दूसरे दिनों के अंदर क्या हाल था। इस वक्त जमीन पर दुनिया पर सबसे ज्यादा मजबी लिहाज से किनकी परसेंटेज है? हा क्रिश्चन है। सबसे ब बड़ी परसेंटेज उनकी बताई जाती है। इन्हीं के लिहाज से देखा जाए आज तो हमको बड़े वो ऊपर से बड़े पा साफ नजर आते हैं और बड़े चमक तमक उनकी नजर आती है। उसकी तरफ हम जाते हैं लेकिन थोड़ा सा पीछे जाए दो तीन 300 साल पहले बल्कि शायद डेढ़ दो साल पहले अगर आप पीछ जाए तो आपको पता चलेगा कि इनके दीन के अंदर क्या गलाज थी। इनके दीन के अंदर क्या गलाज थी के इनके पो पादरी ऐसे आदमी को कत्ल करते थे कि जो गुस्ल किया करता था। एक यूरोप के एक बादशाह के बारे में आता है उसके खिलाफ इसलिए पोजीशन खड़ी हुई उसके बारे में मशहूर था कि वह गुसल करता है। समझे ना? इसी तरह से उनकी गंदग ना पाकिया। आज भी आपको जो उनकी चमक दमक नजर आती है वह बड़ी ऊपर ऊपर से। सबसे ज्यादा परफ्यूम किस मुल्क के हैं? फ्रांस के। क्यों है पता है आपको? हा इसलिए है कि वो जो उनकी नजासत गलाते हैं उनको छुपाने के लिए उनको पानी के लिए कि ताकि अंदर तो गलाज से हैं लेकिन ऊपर से यह परफ्यूम डालो ताकि कम से कम दूसरे जो लोगों तक यह गलाज नजासत ना पहुंचे उनको बदबू ना आए क्योंकि उनके यहां देखिए उनके हा आज भी किसी भी पाकीजा नहीं है। वैसे अपने तौर पर को गुसल कर ले कर ले लेकिन वो गुसल जो तहा का गुसल है पाकीजा के अंदर वाश रूमों के अंदर सवाय ड्रेनिंग के और सफाई करने के लिए पानी का सिस्टम होता ही नहीं है। हमारे तो वाश रूमों के अंदर पानी का सिस्टम है ना शावर होता है जिससे आपने आपको साफ करें हाजत के बाद। इस तरह से उनके वाश रूमों के अंदर ये सिस्टम होता ही नहीं है। हमारे मुसलमान जो वहां रहने वाले क्या करते हैं? व अलग से वहां लोटे रखते हैं या को अपने तौर पर कोई लगा देते हैं। कुवर ग वरना उनके सिस्टम के अंदर को ऐसी चीज है ही नहीं। इसी से आपको अंदाजा हो जाएगा कि वह आज भी किन गलाज के अंदर रह रहे हैं। अभी चंद दिन पहले मेरे पास एक पोस्ट आई। पोस्ट किस चीज की थी? के यूरोप में एक नॉन मुस्लिम एक गोरा जो लांड्री का काम करता था वह मुसलमान हुआ। उसके मुसलमान होने की वजह क्या थी? कहता कि लरी में मेरे पास कपड़े आते हैं लोगों के मुसलमानों के भी आते हैं और नान मुस्लो के भी आते हैं। तो मैं हैरान होता था कि मुसलमानों के कपड़ों के अंदर वह गलाज नजासत बदबू गंदगी नहीं होती कि जो नान मुस्लिम लोगों के कपड़ों के अंदर होती है। बाज औकात खुले तौर पर गलाते नजर आती कपड़ों के रंग बदले होते पता चलता कि वाक ही किस लाजत से कपड़ा निकल कर आया है। किनका जो नॉन मुस्लिम है उनके मुकाबले में मुसलमान हालांकि वहां के मुसलमान भी आप तसवर कर सकते हैं कि किस हाल में है आपके सामने है यानी दीन का मामला किस कदर कमजोर है उनके अंदर लेकिन फिर भी अल्लाह के फजल से एक फितरत मौजूद है तो कहता मैं जब इन दोनों को कंपेयर किया देखा कि मुसलमानों के कपड़ों के अंदर फर्क क्यों है और काफिरों के अंदर ये फर्क क्यों है तो पता चला कि मुसलमानों के अंदर तहा है, उनके अंदर पाकीजा है कि जिस वजह से अगरचे कपड़ा लांड्री में भी आया है और सफाई के लिए आया है लेकिन फिर भी कपड़ा इतना गंदा इतना बदबूदार नहीं है कि जो काफिरों की तरफ से आ रहा है। वो इसी चीज को देखकर मुसलमान हुआ। इसी चीज को देखकर खुद उसका तरा है मुसलमान क्यों हुआ? इस चीज को देखकर। ये हमने थोड़ी सी आपको झलक पेश की है क्रिश्चन इन लोगों की। हमारे बहुत से भाई इंडिया के भी है व खुद उन लोगों के अंदर रह रहे हैं। हिंदुओं के यहां उनके दीन के अंदर नजासत गलाज उनका दीन का हिस्सा है। उनके दीन का हिस्सा है बल्कि हम छोटे होते थे और इंडिया का एक वजीर आजम था मेरा जीी डि साई। उसके बारे में क्या जानते हैं आप? कि अपना अपना पेशाब पीता था। अपना पेशाब पीता था। देखि भाइयों कि कहां पर वह दन के पेशाब का कतरा भी अगर मामूली जिस्म पर लग गया तो नमाज नहीं होगी, मस्जिद में ना जब तक उसको पाक ना कर लो, उसको साफ ना कर लो और दूसरी तरफ अपना पेशाब पीने वाला। जिससे पता चलता है आपको कि दीन इस्लाम की क्या अमत है। इसलिए यह रत का मौजू ना समझे कि सिर्फ मामूली सी चीज है। सबसे पहले अल्लाह ताला का एहसान है, अल्लाह का इनाम है हम पर कि जिसने हमको ना कि सिर्फ तालीम दी बल्कि हमारे दीन का हिस्सा बना दिया, दीन की बुनियादी शर्त बना दी कि जब तक तहर नहीं नमाज नहीं, जब तक रत नहीं तवाफ नहीं। कुरान पढ़ना चाहते हो, कुरान की पकड़ना चाहते हो पहले बावजूद है जिसके अंदर इस चीज का और ना भी हो ना भी तुम को इबादत नहीं भी करनी तब भी बावजूद कीी के साथ रहना इस्लाम का हुक्म देता है। तो कहने का मकसद इन चीजों से हमें पता चलता है भाइयों कि इस्लाम कितना अजमतों का दीन है और तत के मसाइल यह चीजें हमारे दन की बुनियाद है और हमें जरूरत है इन चीजों को समझने की, इन चीजों को जानने की बल्कि सूरतुल मायदा में, सरल मायदा में अल्लाह ताला ने जिसमें वजू का ससल का तम का इन चीजों का हुकम दिया है इन सारे अह कामात को देने के बाद क्या फरमाया है? कि के ताकि तुम शुक्र अदा करो। वजू करके शुक्र अदा करो, गुसल करके शुक्र अदा करो। हा ठंडा पानी है, सर्दी का मौसम है, मुश्किल है वजू करना, गुसल करने में थोड़ी मुश्किल है तो यह तो मुश्किल काम है। अल्लाह माता है कि मुश्किल जरूर है इसमें किसी हद तक लेकिन अल्लाह ताला तुमको इन चीजों में डालकर तुमको मुश्किल में डालना चाहता बल्कि तुमको पाक करना चाहता है ताकि तुम अल्लाह का शुक्र अदा करो, अल्लाह की इस नेमत पर। इसी से हमको अंदाजा हो जाता है तहर के ये मौजू और अब मजीद जो है आपके पास किताब में तफसी आत है उनको पढ़ ले इंशाल्लाह। उसके बाद हम आते हैं तहा की किस्में। दो तरह की बयान हुई है कि तहर की दो बड़ी किस्में हैं। एक मानवी तहर जिसका हमने इशारा किया है कि दिल का शिर्क से, गुनाहों से इन चीजों से पाक होना और दूसरी जिस्मानी तहा। समझे ना? तो जब तक दिल पाक नहीं है आदमी अपने आप को जिस्म को कितना भी पाक कर ले व फिर भी पाक नहीं होता। अल्लाह क्या फ माता है कुराने करीम में इमल मुशरिक नजस मुशरिक क्या है? नजस क्या होता है? पलीद नापाक। के मुशरिक नापाक है। अच्छा नापाक होने का माना कि किसी क्रिश्चन से किसी हिंदू से अगर हाथ मिला ले तो क्या आप भी नापाक हो जाएंगे? क्योंकि अल्लाह फता कि नापाक है। क्या ख्याल है? हां हां मुशरिक की नापाकी मानवी नापाकी है, उसके दिल की नापाकी है। समझे ना? हां वैसे जिस्म अगर उसके जिस्म के अंदर को जाहिरी तौर पर गलाज नहीं लगी तो वो जिस्म अगर टच होता है आपसे व पाक ही होगा लेकिन उसके नापाकी उसकी किस चीज की है? शिर्क की, कुफर की। नापाकी उसकी शिर्क और कुफर की नापाकी है। यह भी हम चाहते हैं इस चीज को समझा जाए। बाज औकात ये गफी ना हो कि शायद कोई काफिर वैसे ही नापाक होता है जिस तर कुत्ता नापाक है। ऐसी चीज नहीं है। तो नापाक जरूर है लेकिन उसकी नापाकी क्या है? मानवी है, उसका कुफर की शिर्क की नापाकी है और दूसरी अल्लाह ताला जो मुसलमान से पाजी चाहते है जिस्म की जिस्मानी तौर पर उसकी जिसके आगे तलात हम सारी इसी जिस्म की जिस्मानी रत के हवाले से पढ़ेंगे। आज जो दिल की पाकीजा सब्जेक्ट है कौन सा? अकीदा तौहीद का। हां उसमें मानवी पाकी मानवी तौर पर मुसलमान का पाक होना कि दिल में कोई ऐसी चीज ना हो कि जो इंसान को नापाक कर दे और जाहिरी पाकी जो है जिस्मानी तहर जो है उसमें भी दो चीजें हैं। एक है आप देख रहे हैं रफल हद के जिस्मानी तहर में क्या है कि सुथरा सफाई को कहते हैं। एक सफाई सुथरा वजू गुसल इन चीजों से हासिल होती है के आदमी अगरचे जिस्म पाक भी है, जिस्म पर कोई नापाक चीज नहीं भी लगी तब भी आपको हुक्म है कि वजू करें। समझे ना? अगर गुसल की जरूरत है गुसल करें। यह एक एक पाकीजा य दूसरा क्या है कि आपके जिस्म बजाते खुद जाही तौर पर पाक हो कि जिस्म पर कोई गलीज नापाक चीज ना लगी हो, कपड़े पाक हो, जगह पाक हो जहां पर आपने नमाज पढ़नी है, बिस्तर जहां पर आपने लेटना है वह पाक हो। यह पाकी के दो अंदाज एक मानवी क्या आपका मानवी से मुराद यानी एक तो दिल के पाकी है ना एक वो पाकी है कि जो हिस्सी जाहिरी नहीं है कि जो तहर वजू से गुसल से तालुक रखती है और दूसरी जो जिस्मानी पाकी जिसका ताल्लुक जो है वो क्या है कि जिस्मानी तौर पर कोई गलाज है कोई नजासत है उसको दूर करना। तो ये अच्छा पाकी गी हासिल हो जाती गुसल करके कहीं पर वजू काफी होता है और जब गुसल वजू ना कर सके तो फिर क्या है तम है तो अल्लाह ताला के मुख्तलिफ दिए हुए तरीके हैं पाक होने के कि जो एक बहुत बड़ी अल्लाह की इबादत हमारे लिए। अच्छा इसके बाद हम आगे चलते हैं। आगे आप देख रहे हैं पानी के मसाइल। पानी के मसाइल सबसे पहले तो पानी के मसाइल को यहां पर लाने की क्या जरूरत है रत के मसाइल क्योंकि अमूमन तहा किससे हासिल होती है? पानी से। पाकीजा करना है किससे? पानी से होता है। असल पानी है उसका बा वो चीज है कि जो इसके काम मुकाम होती है इसके वो दूसरा यानी के इसके मुकाम आती है लेकिन असल पानी है इसलिए उलमा ने सबसे पहले तारत के मसाइल में पानी का जिक्र किया है ताकि हम सबसे पहले पानी को जाने कि किस पानी से हासिल करनी है। मुमकिन है कि जिस पानी से आप वजू कर रहे हो वो पानी वजू के काबिल हो ही ना। जिस पानी से गुसल करने जा रहे हैं मुमकिन है उस पानी से गुसल हो ही ना सके। इसलिए सबसे पहले हमें पानी को जानना है कि पानी क्या होता है, पानी कब पाक है, कब नापाक है। उसमें मस नबर छ में देख रहे आप के समुंदर का पानी, दरियाओ का पानी, चश्मों तालाबों बारिशों का पानी सभी पानी क्या है? पाक है। अच्छा इससे पहले पानी के पाक या नापाक होने किसी भी चीज पाक नापाक होने के हवाले से हमारे सामने एक रूल हमको समझने की जरूरत है। अग आपसे पूछा जाए कि पाकीजा दीन से है, शरीयत से है या लोगों की समझ सोच से है? क्या खल है? दीन से है। यानी अगर मैं समझूं कि यह चीज मुझे अच्छी नहीं लगती यह गंदी है य नापाक है? क्या ख्याल है? वो नापाक होगी, नापाक नहीं होगी। इस चीज को देखता कि बड़ी साफ सुथ मुझे लग रही है तो यह पाक होना चाहिए तो मेरे किसी चीज को साफ सतरा देखना या उसको गंदा नजराना उससे वह चीज पाक या नापाक नहीं होती। इसलिए पाकीजा हुक्म है शरी हुक्म होने का माना कि शरीयत का हुक्म है कि जिसमें मेरी आपकी मर्जी मिजाज नहीं चलता कि मुक किसी चीज को देखो कि आपको गंदी लगती है तो यह नापाक है ऐसा नहीं। उसके लिए हमको कुरान और सुन्नत को देखना होगा कि अल्लाह उसके रसूल सलाम ने किस चीज को पाक कहा है उसको हम पाक करार दे और किस चीज को नापाक करार दिया उसको नापाक करार दे। जिस तरह के हलाल और हराम का मसला है। हलाल हराम ऐसे ही के फर्ज करो खाना आपके सामने है आपको बड़ा मजे का लग रहा हैय खाना तो इतना मजे का खाना तो हराम नहीं हो सकता? क्या ख्याल है? हो सकता है, नहीं हो सकता? हो सकता है। मजे का होना दूसरी चीज है। समझे ना? बद मजा होना एक और चीज है लेकिन उसका हलाल और हराम एक और अलग चीज है। इसलिए सबसे पहले हमारे सामने रूल हमें मालूम होना चाहिए क्या है कि पाकी और नापाकी शरी हुक्म है जिसमें किसी के अपने मिजाज का दखल नहीं है कि मैं इसको अच्छा नहीं समझता मुझे बुरी लगती है यह चीज ऐसे है। नबी करीम सलाम और सहाबा किराम के दौर में आपके सामने आपके दस्तरखान पर आप सांडा जानते हैं सांडा वो सहराई जानवर होता है एक तरह का। अगरचे हमारे यहां क्या करते हैं उसको गो के साथ मिक्स कर देते हैं। गो और चीज है जहरीली है। समझे ना? और सांडा ये जमीन के साथ चिप के चलता है और इसकी शक्ल सूरत मुख्तलिफ होती है। जरा तो आपके दस्तरखान पर सांडा खाया गया तो सहाबा ने आपको भी कहा कि अल्लाह की सर आप भी खाइए। आप कि मेरा खाने को दिल नहीं चाहता क्योंकि हमारे यहां नहीं पाया जाता तो मेरा इसको खाने को दिल नहीं चाहता। तो क्या सांडा हराम हो गया, हलाल हुआ? साबा खा रहे हैं और आपने क्या फरमाया? कि मुझे े खाने को दिल नहीं चाहता। तो आपने यह फरमाया कि मेरा दिल नहीं चाहता खाने को यह नहीं कहा कि ये हराम है। तो सांडा खाया गया आपके दस्तरखान पर। मैं सिर्फ मिसाल देना चाहता था इस बात की कि बा औकात किसी कोई चीज आपको अच्छी नहीं लगती इसका माना यह नहीं कि वो चीज हराम है। इस माने य नहीं कि वो चीज नापाक है। पाकी नापाकी के लिए हलाल और हराम के लिए हमें कुरान और हदीस को देखना होगा। शरीयत का हुकम देखना होगा। तो यहां पर भी बात हो रही थी कि समुंदरों का पानी हो, तालाबों का हो, नहर दरियाओ का हो, बारिशों का हो सभी पानी क्या है? पाक है। अल्लाह ताला क्या माते है बारिशों के पानी के हवाले से?रा हमने आसमान से पाकीजा पानी नाजिल किया और आपको इंशाल्लाह इस बात का इल्म है कि जमीन पर जो भी पानी पाया जाता है वह कौन सा है? असल बारिशों का है। असल पानी बारिशों का है चाहे वो चश्मों की शक्ल में हो, जमीन के अंदर चला जाता है, चश्मे की शक्ल में निकल आता है, दरियाओ में बह रहा हो। कहां से आ रहा है? बारिशों से। और इसी तरह से तालाबों के अंदर पानी कहां से है? बारिश का पानी जमा है और यही वजह है कि जिन इलाकों में काफी काफी अरसे तक बारिश नहीं होती वहां पर क्या होता है? फिर जमीन के अंदर भी पानी बहुत दूर कहीं गायब हो जाता है क्योंकि बारिश नहीं है और बारिश के हवाले से आपके सामने आयत है। अल्लाह ताला क्या फरमाता है? कि हमने आसमान से पाकीजा पानी नाजिल किया। इसका माना हुआ कि बारिश का पानी पाक है और ये पानी खड़ा हो, तालाब में हो, नहर दरिया में हो, कहीं भी हो यह पानी पाक है और इसी तरह समुद्र का पानी। एक तो बारों का पानी है दूसरा समुद्र का पानी है और समुद्र के पानी के हवाले से ी से पूछा गया कि समुंदर का पानी इसका क्या हुक्म है? आप आपके सामने तीन नंबर लाइन में इसका पानी पाक है। रमा किसका पानी पाक है? समुंद्र में चलने वालों को पानी की जरूरत भी होती है और बाज कात समुंदर में को मरा हुआ जानवर समुंद्री जानवर मरा हुआ खाने की जर...
पेश आ जाती है। आपने उसका भी हुकम बयान कर दिया कि अगर मरी मछली को समंदरी जानवर तुमको मिल जाता है तो भी पाक है, वो भी हलाल है। तो यह माना इससे मालूम हु कि पानी असल क्या है, पाक है। वो कैसा भी कना हो, इला ये कि अगर वो किम को नापाकी की वजह से वो तब्दील हो जाए तो ना पाक हो जाए। इसलिए अगला मसला आपके पास आ रहा है। पानी में नापाक चीज मिलने से जो है वह पानी नापाक हो जाता है। पानी में कोई नापाक चीज मिली और नापाक हो गया, लेकिन कितनी मिली? थोड़ी या ज्यादा? समझे? उसकी आपके पास आपके पास रू क्या दिया गया है कि नापाक चीज पानी में डलने से पानी का रंग बदल गया, उसका टेस्ट, जायका बदल गया या उसकी स्मेल, बू बदल गई तो तब पानी नापाक होगा, वरना सिर्फ नापाकी पड़ने से पानी नापाक नहीं होता। समझे ना? नी फर्ज करें आपके पास कोई तालाब है। आप पानी तालाब का पानी देखते हो, उसके अंदर कोई स्मेल नहीं है। पहली बात तो उसके अंदर कोई नापाकी नहीं है। नापाकी नहीं तो फिर वो पाक है, चाहे बा का थोड़ा बहुत वो घास की वजह से रंग बदल भी गया, मुश्किल नहीं। लेकिन कोई नापाकी पड़ गई उसके अंदर। अब उस उसको देखेंगे। अगर उस नापाकी की वजह से उसका रंग बदल गया है, उसके अंदर स्मेल पैदा हो गई। फर्ज कर उसके अंदर कोई जानवर गिर के मर गया, कुए के कुए के अंदर कोई जानवर गिर के मर गया। अब जानवर ग के मर मर गया तो अगर तो फौरन निकाल लिया गया तो उसकी स्मल पैदा नहीं होगी, लेकिन अगर पड़ा रहा तो क्या होगा? उसके अंदर पानी के अंदर उसकी स्मेल आ जाएगी। इसका मतलब कि पानी नापाक हो गया। बा कात उसका रंग ब बदल जाता है और बाज टेस्ट के अंदर तब्दीली आ जाती है। तो ये वो चीजें हैं कि जिससे पानी नापाक होता है। उसके सामने उसकी दलील आपको दी गई है कि पानी नापाक नहीं होता। पानी को कोई चीज नापाक नहीं करती, सवाय के जब उसका उसकी बूह, उसका अपने जायका और उसका रंग बदल जाए तो तब जो है वो नापाक होता है। तो यह है और यही उलमा एकराम का मुहसीन का फुकाहा का मसलक रहा है। इसी मसले पर आज इसी पर इफा करते हैं। बकला अभी इब्राहिम भाई आएंगे। आपके पास कुछ सवालात है या कोई चीज आपको समझ नहीं आई? कोई लफजो?