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If the Great Pyramid Was Built Today — What Would It Cost?

Zem TV16:46

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इंजीनियरिंग की तारीख में देखा जाए तो हम इंसानों ने चांद पर कदम रखा है। दुनिया की सबसे ऊंची इमारत तामीर की है। समंदर के नीचे टनल बनाकर दो कॉन्टिनेंट्स तक को आपस में जोड़ दिया है। लेकिन जब बात आए इजिप्ट के अजीमो शान पिरामिड्स की तो यहां पर आकर दुनिया भर के इंजीनियर्स के पसीने छूट जाते हैं। वो राज जो 4500 सालों से दुनिया की हर टेक्नोलॉजी को चैलेंज कर रहा है।

अक्सर लोग सोचते हैं कि इंसान इतनी तरक्की कर चुका है। क्या वह दोबारा से सिर्फ एक भी पिरामिड खड़ा कर सकता है? शायद सुनने में यह आसान लगे, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा खौफनाक और महंगी है। ऐसा बेशक प्रैक्टिकल में ना हो, लेकिन आज हम कुछ ठोस कैलकुलेशंस करके पता लगाने की कोशिश करेंगे कि 2026 में अगर पिरामिड दोबारा बनाया जाए तो हमें किन-किन चैलेंजेस का सामना करना पड़ सकता है और इस पूरे मेगा प्रोजेक्ट में कितना खर्चा आएगा। ZM टीवी की वीडियोस में एक बार फिर से खुशामदीद।

नाजरीन, इजिप्ट का कैपिटल कायरो दुनिया के उन अजीम शाहकार के साए तले मौजूद है जिन्होंने हजारों सालों से इंसानी अकल को दंग कर रखा है। गीजा प्लेटो के यह पिरामिड्स इजिप्ट के ताकतवर तरीन रूलर्स की निशानी है। मगर इन सब में फेरो कुफू का बनाया गया यह अजीम पिरामिड सबसे बड़ा और सबसे अलग है। कहा जाता है कि अगर आप एक पिरामिड खड़ा कर सकते हैं तो दुनिया में कुछ भी कर सकते हैं। यह इंसानी तारीख का वो अनमोल नमूना है जिसने बड़े से बड़े तूफानों का मुकाबला किया है। 147 मीटर ऊंचा, 12 एकड़ पर फैला हुआ यह पहाड़ नुमा स्ट्रक्चर। यूं समझ लें यह 40 स्टोरी बिल्डिंग जितना ऊंचा और 10 फुटबॉल फील्ड्स जितना चौड़ा है। 200 लेवल्स में बिछाया गया यह पत्थरों का ढेर 60 लाख टन वजनी है और हर एक पत्थर का ब्लॉक रेंज रोवर की साइज जितना बड़ा। लेकिन असली हैरत तो इन पत्थरों की क्वांटिटी में छुपी है। 23 लाख ब्लॉक्स, जिनमें से हर किसी का कम से कम वजन 2 टन और ज्यादा से ज्यादा 60 टन है।

मशहूर जमाना इजिप्शियन आर्कियोलॉजिस्ट जाही हवास का मानना है कि इजिप्ट ने पिरामिड्स को नहीं बनाया, बल्कि इन पिरामिड्स ने इजिप्ट को बनाया है। उनका मानना है कि इन्हें बनाने के लिए उन लोगों ने जिस इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया, वो आज भी एक राज है। लेकिन यहां सवाल पैदा होता है कि अगर 4000 साल पहले के लोग यह कर सकते थे, तो क्या आज की जदी दुनिया भी ऐसा कर सकती है? इसका सीधासाधा जवाब है, नहीं। सबसे बड़ी वजह है मकसद। हमारे पास कोई वजह ही नहीं है पिरामिड जैसा स्ट्रक्चर बनाने की। 4500 साल पहले यह पिरामिड्स एंशिएंट इजिपशियंस के खुदाओं, फेरोज़ के मकबरे के तौर पर तैयार किए गए थे। उनके पास एक रिलीजियस मोटिव था। वो जज्बा और जुनून था। तभी उन्होंने इस आलीशान स्ट्रक्चर को, जाहिर सी बात है, इंतहाई मुश्किल के बाद खड़ा किया। पर मान लेते हैं कि अगर हमारे पास भी कोई मोटिव हो, कोई वजह हो और आज हमें पिरामिड का रेप्लिका बनाना पड़े। हूबहू दिखने वाला, जो इतना ही मजबूत हो कि 4500 साल बाद भी खड़ा रहे। तो इसमें हमें किन-किन मुश्किलात का सामना करना पड़ेगा?

पिरामिड को बनाने के लिए सबसे पहला चैलेंज पैसों का पिरामिड अरेंज करना होगा। जी हां, पिरामिड दिखने में बेशक ही सिंपल लगते हैं, लेकिन यह दुनिया के किसी भी मेगा प्रोजेक्ट से ज्यादा महंगे पड़ सकते हैं। दूसरा चैलेंज होगा जमीन सेलेक्ट करना। 60 लाख टन का यह पहाड़ खड़ा करने के लिए हम कोई आम जमीन नहीं खरीद सकते। यह इतना ही वजन है जितना 60 लाख नॉर्मल सेडान गाड़ियों का वजन होता है। इतनी ज्यादा गाड़ियां तो आज की तारीख में कायरों के शहर में भी रजिस्टर्ड नहीं है। और आपका यह बात भी जानना जरूरी है कि दुनिया की सबसे ऊंची बिल्डिंग बुर्ज खलीफा के नीचे बहुत मजबूत फाउंडेशन बनाई गई थी। लेकिन फिर भी उसका वजन सिर्फ 5 लाख टन है। यानी किसी भी एक पिरामिड का सिर्फ 8%। अगर जमीन की बेस कमजोर हुई तो यह आलीशान पहाड़ बनाने से पहले ही जमीन में धंसकर एक कब्रिस्तान बन जाएगा।

जमीन का सही चुनाव इतना अहम है कि इसको एंशिएंट इजिपशियंस ने भी काफी सीरियस लिया था। सिनेफू पिरामिड, जिसे बेंट पिरामिड भी कहा जाता है, फेरो कुफू के बाप का पिरामिड था और इसे बनाते वक्त उस वक्त के इंजीनियर्स ने एक गलती की थी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि जमीन का सही से लेवल ना होना और नीचे बेड रॉक की खराब सपोर्ट की वजह से यह हल्का सा एक तरफ झुक गया। यही वजह है कि इसको ऊपर से मोड़ना पड़ गया। तो इसका मतलब है कि हमें ऐसी जमीन चाहिए जो रेतीली ना हो, बल्कि उसके नीचे टेक्टोनिक प्लेट्स काफी स्टेबल हो। अगर हम गीजा प्लेटो को ही सेलेक्ट करें, तो यहां 13 एकड़ जमीन की कॉस्ट और लीगल परमिट्स में 100 से 120 मिलियन डॉल का खर्चा हो सकता है। यानी कि इंडियन रूपीस में ₹180 करोड़ और पाकिस्तानी रुपयों में यह रकम 3360 करोड़ बनती है।

जमीन लेने के बाद सेंसर्स के जरिए जमीन के 200 फीट नीचे तक का जायजा लिया जाएगा। साइज में टेस्ट होंगे ताकि अर्थक्वेक की सूरत में पिरामिड को नुकसान ना हो। इसमें तकरीबन $5 मिलियन का खर्चा आसानी से आ सकता है। इसके बाद एंशिएंट इजिपशियंस ने जमीन को पानी के चैनल्स के जरिए लेवल किया था। आज हम लेजर लेवलिंग और जीपीएस गाइडेड बुलडोजर्स इस्तेमाल करेंगे। पूरी 13 एकड़ की जमीन को 1 मिलीमीटर के फर्क के बगैर बिल्कुल सीधा करना है। क्योंकि ज्योमेट्री के कानून के हिसाब से जमीन पर 1 मिलीमीटर का भी फर्क 147 मीटर की ऊंचाई पर 14.7 सें.मी. का झुकाव पैदा करेगा। और चकि हम पुराने जमाने की तरह सिर्फ बेड रॉक पर भरोसा नहीं कर सकते, हमें एक रीइंफोर्स्ड कंक्रीट मैट भी डालना होगा। इसमें लाखों टन कंक्रीट और स्टील की जरूरत होगी। तब जाकर तैयार होगी एक ऐसी फाउंडेशन जो 4000 साल तक हमारे पिरामिड के वजन को झेल सके। अगर 4 मीटर मोटी कंक्रीट की फाउंडेशन डलेगी, तो इसमें 5 लाख टन कंक्रीट इस्तेमाल होगा। जितना कंक्रीट यहां सिर्फ फाउंडेशन में इस्तेमाल हो रहा है, उतना तो पूरे मेगा प्रोजेक्ट में इस्तेमाल होता है। यानी 10 से 15 लाख सीमेंट की बोरियां, कई 100 कंक्रीट मिक्सचर ट्रक्स और हजारों लोगों का मैन पावर। रफ एस्टीमेट्स के हिसाब से फाउंडेशन पर ही सिर्फ 400 मिलियन का खर्चा आएगा।

जमीन की कॉस्ट $100 मिलियन, लेवलिंग और स्कैन्स पर $50 मिलियन और फाउंडेशन बनाने में $400 मिलियन। यानी अभी पिरामिड का एक पत्थर भी नहीं लगा और खर्चा $550 मिलियन डॉल तक पहुंच चुका है। ₹4950 करोड़ इंडियन और ₹15400 करोड़ पाकिस्तानी रूपीस। अभी तक हमने जो कुछ भी किया, इसमें कम से कम 3 साल का वक्त लगेगा। लेकिन असल मसला तो अब शुरू होगा। 23 लाख पत्थर और वो भी एसयूवी जितने बड़े। इन्हें कहां से लाया जाएगा? कौन सी ऐसी मशीन है जो 60 लाख टन का बोझ उठाकर 147 मीटर ऊपर लेकर जाएगी? जमीन तैयार है। बुनियाद भर चुकी है। लेकिन अब हमारे सामने वो सवाल है जिसका जवाब बड़े से बड़े इंजीनियर्स के पास भी नहीं है। कि 23 लाख पत्थरों के ब्लॉक्स को रेक्टेंगल शेप में कैसे काटा जाए?

आज के दौर में एक फैक्ट्री ठीक ऐसा ही पत्थर काटकर सप्लाई करना शुरू करें, तो ज्यादा से ज्यादा वह दिन में 100 बड़े पत्थर काट कर दे सकती है। अगर इस स्पीड से यह काम हुआ, तो 23 लाख कटे हुए पत्थर अरेंज करने में 63 इयर्स का वक्त गुजर जाएगा। पर अगर हमें यह काम सिर्फ 5 साल में करना है, तो आज के दौर की डायमंड वायर 100 जैसी 250 मशीनंस एक साथ चलानी पड़ेंगी। वह भी दुनिया के मुख्तलिफ हिस्सों में नहीं, बल्कि सीधा स्टोन क्वेरी के अंदर। ऐसे एक दिन में 1260 ब्लॉक्स की सप्लाई मिल सकेगी। यह एक मशीन $1 लाख की है। तो कैलकुलेशंस के हिसाब से हमें सिर्फ कटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर $25 मिलियन का खर्चा करना होगा। तब जाकर हम 5 साल में इतने पत्थर काट सकते हैं। वरना 63 इयर्स तो क्या, सदियां भी बीत सकती हैं। उस दौर में इन पत्थरों को छेनी हथौड़ों से काटने में कितना वक्त और मैन पावर लगा होगा, इसका अंदाजा अब आप बा आसानी लगा सकते हैं।

पिरामिड को बनाने में सिर्फ लाइम स्टोन ही नहीं, बल्कि अंदर के किंग्स चेंबर को बनाने में ग्रेनाइट भी इस्तेमाल हुआ। और यह दोनों किस्म के पत्थर आज की तारीख में काफी कॉस्टली हैं। हाइड्रेटेड लाइम स्टोन $120 पर टन, जबकि ग्रेनाइट का रेट $150 फी टन है। तो इस हिसाब से पत्थरों की टोटल कॉस्ट $1 बिलियन के आसपास बनती है। याद रहे कि अर्ली 2000 में पूरे बुर्ज खलीफा को बनाने में $1.5 बिलियन लगे थे। कटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर पर $25 मिलियन और पत्थरों की कॉस्ट $1 बिलियन।

इन मशीनंस को चलाने के लिए 5 सालों में जितनी इलेक्ट्रिसिटी इस्तेमाल होगी, उसके बारे में भी कुछ हैरतंगेज फिगर्स सुन लें। डायमंड वायर शॉ कोई आम घर का एसी नहीं है। यह भारीभरकम मशीनंस इतने बड़े ब्लॉक्स का सीना चाक करने की ताकत रखती हैं। एक मॉडर्न इंडस्ट्रियल डायमंड वायर 100, 80 किलो वाट तक बिजली इस्तेमाल करती है। यानी 250 मशीनंस के 20,000 किलो वाट या फिर 20 मेगावाट्स। वह भी सिर्फ 1 घंटे में। 5 सालों में इस्तेमाल होने वाली बिजली करीब उतनी ही बनती है, जितना पूरे इटली की एक दिन की खपत है। अगर 5 सालों तक यह काम करेंगी, तो इलेक्ट्रिसिटी कॉस्ट ही आसमान से बातें करेगी। $155 मिलियन, वो भी बगैर टैक्सेस के।

अब आते हैं इन पत्थरों की ट्रांसपोर्ट पर। मान लेते हैं कि यह पत्थर वहीं से काटे गए जहां से एंशिएंट इजिपशियंस ने हासिल किए थे। गीजा से 900 कि.मी. दूर असवान में मौजूद स्टोन क्वेरी से अगर पिरामिड को दोबारा तामीर किया गया, तो यह इंसानी तारीख का सबसे बड़ा ट्रांसपोर्ट ऑपरेशन होगा। एक स्टैंडर्ड हैवी ड्यूटी ट्रेलर 30 टन का बोझ उठा सकता है। तो 60 लाख टन पत्थर ट्रांसपोर्ट करने में 2400 ट्रक्स लगेंगे। यानी 1 दिन में 132 ट्रिप्स। अब क्योंकि यह 900 कि.मी. का रास्ता है, जो हैवी ड्यूटी ट्रक्स 3 से 5 दिनों में कवर करेंगे। अगर एक दिन में 132 ट्रक्स साइट पर पहुंचाने हैं, तो 500 ट्रक्स ऐसे होंगे जो हर वक्त अगले 5 सालों तक रास्ते में ही होंगे। रफ कैलकुलेशंस के हिसाब से सिर्फ ट्रांसपोर्ट ऑपरेशन में ही 200 मिलियन का खर्चा आएगा। और बताता चलूं कि इसमें रोड टैक्स शामिल नहीं है।

अभी तक का टोटल किया जाए, तो हमारी कॉस्ट 2 बिलियन डॉल को भी क्रॉस कर चुकी है। ₹18000 करोड़ इंडियन जबकि ₹56000 करोड़ पाकिस्तानी रुपीस। अभी तक चुनाई नहीं हुई। उसके बावजूद कॉस्ट $2 अरब डॉल तक आ पहुंची है। अब पत्थर कट रहे हैं और हर 10 मिनट में एक ट्रक कंस्ट्रक्शन साइट पर पहुंच रहा है। अब हम इस प्रोजेक्ट के सबसे खतरनाक और मुश्किल मरहले में दाखिल हो चुके हैं। पत्थरों की चुनाई। मसला यह है कि इन पत्थरों को एक के ऊपर एक रखकर 147 मीटर ऊंचा पिरामिड कैसे खड़ा किया जाए? पिरामिड में इस्तेमाल होने वाले पत्थरों का वजन 2 टन से लेकर 60 टन है। और किंग्स चेंबर की छत पर लगाया गया ग्रेनाइट का ब्लॉक तो 80 टन वजनी है। दुनिया में ऐसी कोई क्रेन ही नहीं जिसका बाजू 230 मीटर का हो और वह 80 टन का वजन उठा सके। क्योंकि क्रेन का बाजू जितना बड़ा होगा, फिजिक्स के कानून कहते हैं कि उसकी वजन उठाने की कैपेसिटी उतनी ही कम हो जाएगी।

इसके लिए क्रेन का एक पूरा नेटवर्क बनाना पड़ेगा। हमें के रोल के 10,000 जैसी मैसिव टावर क्रेन चाहिए होंगी, जो दुनिया की सबसे ऊंची क्रेन हैं। यह एक तरह का स्ट्रक्चर बनता है ताकि क्रेन ज्यादा वजन उठा सके। पर इन क्रेन की एक लिमिट होती है। जैसे-जैसे पिरामिड ऊंचा होगा, इन क्रेन को बार-बार डिसअेंबल करके ऊंचा करना पड़ेगा। पिरामिड्स के ब्लॉक्स को मिलीमीटर एक्यूरेसी से एक दूसरे के साथ रखा गया था। इतनी एक्यूरेसी कि उनके बीच क्रेडिट कार्ड भी नहीं घुस सकता। यह सारा कमाल उस दौर के पत्थर काटने वालों और उन मजदूरों का है जिन्होंने अपनी जान दांव पर लगाकर यह कारनामा सर अंजाम दिया। इवन क्रेन की मदद से भी किंग्स चेंबर के ऊपर 80 टन के ग्रेनाइट ब्लॉक को हवा में लटकाना भी मौत को दावत देने जैसा है। 10 ऐसी स्पेशलाइज्ड क्रेन का किराया और उनकी 5 साल की मेंटेनेंस में 300 मिलियन का खर्चा भी कम से कम है।

अभी तक हमने इंजीनियर्स, मेसंस और वर्कर्स की कॉस्ट को शामिल नहीं किया। एस्टीमेट के मुताबिक पिरामिड बनाने में कम से कम 3000 वर्कर्स एक साथ काम करेंगे। 5 साल की सैलरीज, सेफ्टी इंश्योरेंस और उनके खानेपीने का एस्टीमेट लगाया जाए, तो वह 400 मिलियन बनते हैं। टोटल 8 सालों के बाद हमारा पिरामिड अभी ऑलमोस्ट तैयार है। ठीक वैसा ही दिखने वाला जैसा आज दिखता है। लेकिन क्या आपको मालूम है कि असल में पिरामिड्स ऐसे नहीं दिखते थे। उस दौर में इसके ऊपर टूरा लाइम स्टोन की एक केसिंग लगाई गई थी। एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस केसिंग की वजह से यह दूर से ही चमकता होगा। पिरामिड की चारों साइड्स को कवर करने के लिए हमें तकरीबन 1 लाख 15,000 सफेद लाइमस्टोन ब्लॉक्स चाहिए होंगे। इन पत्थरों को इस तरह काटा और लगाया जाता है कि पिरामिड का सरफेस बिल्कुल स्मूथ और फ्लैट नजर आए। हजारों साल पहले जब सूरज निकलता था, तो रेगिस्तान में यह पिरामिड्स मीलों दूर से चमकते हुए दिखते थे और रात की चांदनी में भी यह एक सफेद नूर की तरह नजर आते। यह सब कमाल टूरा के लाइम स्टोन का था, जिनकी आज कीमत 250 मिलियन बनती है।

तो क्या अब आप टोटल कॉस्ट सुनना चाहेंगे? 2.95 बिलियन। तकरीबन ₹26,500 करोड़ इंडियन रूपीस, जबकि ₹8,200 करोड़ पाकिस्तानी। और याद रहे, इसमें बहुत सारे खर्चे ऐड ही नहीं किए गए। जैसा कि ट्रांसपोर्ट के दौरान रोड टैक्स, इलेक्ट्रिसिटी ड्यूटी। 20 मेगावाट इलेक्ट्रिसिटी बनाने के लिए एक अलग पावर प्लांट चाहिए, वह भी हमने ऐड नहीं किया। पिरामिड बनाने की इस थ्योरेटिकल कैलकुलेशन से साबित होता है कि जो काम आज के दौर में ही करना इतना मुश्किल है, वह 4500 साल पहले कैसे किया गया होगा? यह सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं। और रही बात कि पिरामिड आज के दौर में बनाए जा सकते हैं कि नहीं? तो इसका जवाब हैरतंगेज तौर पर आज भी नहीं है। $3 बिलियन डॉल में पाम जुमेरा जैसा आइलैंड बना। यूएसए में मौजूद दुनिया का सबसे महंगा सोफी स्टेडियम भी ऑलमोस्ट $3 बिलियन में ही बना और क़तर का सबसे बड़ा नेचुरल गैस प्रोसेसिंग प्लांट भी इतने ही पैसों में तैयार हुआ। तो आज की मटेरियलिस्टिक वर्ल्ड में लगभग $3 अरब डॉल एक ऐसे प्रोजेक्ट में बहा देना जिसका कोई आउटपुट भी नहीं है, कोई मायने नहीं रखता।

उम्मीद है ZM टीवी की यह वीडियो भी आप लोग भरपूर लाइक और शेयर करेंगे। आप लोगों के प्यार भरे कमेंट्स का बेहद शुक्रिया। मिलते हैं अगली शानदार वीडियो में।