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Reality of Make in India | Nope w/ Kunal Kamra ft. Surajit Mazumdar | 027

Kunal Kamra49:32

Transcription

ऐसे टाइम पे जब मेक इन इंडिया जैसा प्रोग्राम नहीं चलता है, तो हमें बताया जाता है, "हम वी आर अ $5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी।" सो इफ वी आर अ 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी, व्हाई आर वी नॉट मैन्युफैक्चरिंग?

वर्ल्ड जीडीपी में आपका शेयर तो 18% से बहुत कम है, ठीक है? और वर्ल्ड के जो इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन है, मैन्युफैक्चरिंग का है, उसमें आपका शेयर 3.5% है। उधर चाइना का 18% पॉपुलेशन है और 31% वर्ल्ड का शेयर है मैन्युफैक्चरिंग का।

बट अब पर कैपिटा टर्म्स में जब बात करते हो कि पर हेड ऑफ़ पपुलेशन, तो यह इंडस्ट्री बड़ी है। पॉपुलेशन के कंपैरिजन में कम है। एक ही प्रोडक्ट है हिंदुस्तान में जो कि 80-90% पॉपुलेशन के पास है, वो है मोबाइल फोन। पर बाकी आप कोई प्रोडक्ट को देखेंगे, 15%, 20%, 25% उससे आगे जाता ही नहीं है।

वैसे देश का हाल देख के लगता है, टीवी तो जितने कम बिके बेहतर है। आज इंटरनेट सिर्फ आधे अधूरे सच और पूरे झूठ में डूबा हुआ है। किसी के पास गहराई से सोचने का या शांति से सुनने का वक्त ही नहीं है। हम एक ऐसा शांत कोना बनाने की कोशिश कर रहे हैं। नो, नॉट योर ऑर्डिनरी पॉडकास्ट फॉर एंटरटेनमेंट। नो, नो, नो, नो।

टुडे विथ मी इज़ सुरजीत मजूमदार, ah प्रोफेसर इन जेएनयू, द मच कंट्रोवर्शियल जेएनयू। एंड वी आर हियर टू डिस्कस व्हाट हैपेंड टू मेक इन इंडिया। सो सर, इट्स योर एक्सपर्टीज इन द सब्जेक्ट। सो आई वांट टू आस्क यू, व्हाट हैज़ हैपेंड टू मेक इन इंडिया एज़ अ प्रोजेक्ट?

वेल, आई थिंक मेक इन इंडिया, लाइक मेनी अदर पॉलिसीज, इज़ मोर टॉक देन एक्चुअल रिजल्ट। बिकॉज़ द अटेम्प्ट विथ मेक इन इंडिया वाज़ दैट आफ्टर ऑल, प्लीज नोट दैट इट सेड "मेक इन इंडिया", इट नेवर सेड "मेक फॉर इंडिया"। हम व्हिच मीन्स व्हाट? दैट इन द ग्लोबलाइज़्ड वर्ल्ड, डिफरेंट कंट्रीज ऑफ़ द वर्ल्ड आर इन अ सेंस कमिटिंग टू बी लोकेशनेशंस ऑफ़ प्रोडक्शन ऑफ़ मैन्युफैक्चर प्रोडक्ट्स फॉर द वर्ल्ड मार्केट और फॉर अदर प्रोड्यूसर्स इन अदर कंट्रीज। इंडिया शेयर इन दैट पाई हैज़ बीन वेरी स्मॉल। एंड मेक इन इंडिया वाज़ एसेंशियली एन अटेम्प्ट टू ट्राई एंड गेट अ लार्जर शेयर ऑफ दैट पाई टू इंडिया।

डिज़ाइन ऑफ़ द पॉलिसी इटसेल्फ वाज़ वन वेयर इट डिड नॉट एड्रेस द फंडामेंटल रीज़ंस व्हाई इंडिया वाज़ फेलिंग टू बी एम्ज़ एज़ अ सिग्निफिकेंट लोकेशन ऑफ प्रोडक्शन फॉर वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग। इन द वे दैट आवर नेबर इन आवर नेबरहुड मच ऑफ़ दैट। बाय नेबर यू मीन चाइना? लेट्स आई मीन, नॉट जस्ट चाइना। आई मीन, आल्सो चाइना इज़ पार्ट ऑफ़ अ लार्जर ईस्ट एशियन रीजन। एंड इफ यू लुक एट व्हाट हैज़ हैपेंड टू मैन्युफैक्चरिंग इन द वर्ल्ड, देयर हैज़ बीन अ शिफ्ट फ्रॉम द वेस्ट एंड फ्रॉम जापान टू द रेस्ट ऑफ़ ईस्ट एशिया, ऑफ़ व्हिच चाइना इज़ द मोस्ट इंपोर्टेंट। बट इट्स चाइना है इज़ आल्सो कनेक्टेड टू दैट एंटायर रीजन। इंडिया हैज़ रिमेन इंडिया। वी हैव नॉट बीन एबल टू मेक इवन साउथ एशिया एन इकॉनमिक रीजन। आवर पॉलिटिकल बैरियर्स टू दैट हैव बीन फार मोर फॉर्मिडेबल। सो वी आर लेफ्ट विथ इंडिया।

नाउ, इफ इंडिया एज अ इंडिविजुअल इकॉनमी हैज़ टू कंपीट विथ इवन से, ईस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया, द होल रीजन। व्हाट डज़ इंडिया हैव? इज़ हैव अ लार्जर पपुलेशन? बिकॉज़ चाइना वंस पार्ट ऑफ़ चाइना इज़ पार्ट ऑफ़ इट? इट इज़ अ लार्जर पपुलेशन। डज़ इंडिया हैव अ बिगर मार्केट? नो, दे हैव अ लार्जर पपुलेशन। ईस्ट एशिया हैज़ अ लार्जर पर कैपिटा इनकम। दे हैव दैट एडवांटेज। इफ इन इंडिया, डज़ इंडिया हैव बेटर इंफ्रास्ट्रक्चर एंड लॉजिस्टिक्स? नो, दे हैव हैड अ मच मोर डेवलप्ड इंफ्रास्ट्रक्चर। एंड इन दैट रीजन, यू कैन फाइंड ऑल काइंड्स ऑफ़ इकॉनमीज़ विथ ऑल काइंड्स ऑफ़ कंडीशंस। यू वांट वेरी चीप लेबर, दैट इज़ अवेलेबल इन सम कंट्रीज इन दैट रीजन। यू वांट टू डू हाईटेक मैन्युफैक्चरिंग, यू हैव कंट्रीज लाइक साउथ कोरिया, ताइवान एसेट्रा, व्हिच हैव इवॉल्व्ड इंडस्ट्रियल स्ट्रक्चर व्हिच कैन डू दैट।

कंड। सो व्हाट वर यू लेफ्ट विथ एज अ मैटर ऑफ़ कंपिटिटिव एडवांटेज? ओनली थिंग दैट यू हैड टू ऑफर वाज़ चीप लेबर। चीप लेबर वाज़ फर्स्टली, नॉट सफिशिएंट टू गेन दैट कंपिटिटिव एडवांटेज। एंड चीप लेबर वाज़ आल्सो इज़ समथिंग व्हिच इज़ प्रोग्रेसिवली लूजिंग इट्स कैपेसिटी टू बी अ सोर्स ऑफ़ कंपिटिटिव एडवांटेज। बिकॉज़ व्हाट इज़ हैपनिंग इज़ दैट, इफ यू लुक एट मशीनरी इक्विपमेंट, दे आर आल्सो मैन्युफैक्चर और इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स वर्ल्ड वाइड। यू सी अ ट्रेंड, लॉन्ग टर्म ट्रेंड, वेयर दे आर बिकमिंग चीपर बिकॉज़ ऑफ़ इंक्रीज्ड प्रोडक्टिविटी इन देयर प्रोडक्शन। ऑन दी अदर साइड, फूड प्राइसेस हम हैव बीन गोइंग अप। नाउ, फॉर वर्कर्स, फर्स्ट थिंग दे हैव टू स्पेंड ऑन इज़ फ़ूड। याह। सो, इवन इफ यू आर नॉट पेइंग देम मोर इन टर्म्स ऑफ़ देयर, यू आर जस्ट ट्रैकिंग द इंक्रीज़ इन फूड प्राइसेस। सो देयर दे आर जस्ट एबल टू मेंटेन देयर कंजम्पशन लेवल। इवन व्हेन वेजेस आर नॉट गोइंग अप। हम्म। दी अह एडवांटेज इज़ अह इन अ सेंस, लेबर टेंड्स टू बिकम मोर एक्सपेंसिव। रियलिटी, इट बिकम्स चीपर टू रिप्लेस देम विथ मशीनरी। सो यू हैव इंक्रीजिंग मैकेनाइजेशन ऑफ़ एन ऑटोमेशन ऑफ़ प्रोडक्शन टेकिंग प्लेस। सो दैट चीप लेबर एडवांटेज इज़ आल्सो नो लगर अ दैट एन एडवांटेज।

बट द पॉलिसी वाज़ एसेंशियली अबाउट इनवाइटिंग द होल वर्ल्ड टू टेक एडवांटेज ऑफ योर चीप लेबर हम टू प्रोड्यूस फ्रॉम। व्हाट आई अंडरस्टैंड, आप ये बोल रहे हैं कि हमारे पास जो चीजें हैं उसमें सिर्फ चीप लेबर ही बचा है और वो फ़ूड प्राइसेस ऊपर जा रहा है तो वो लेबर चीप रहा नहीं है। वो एक्सपेंसिव हो गया है बिकॉज़ ऑफ़ द इनफ्लेशन।

ऐसे टाइम पे जब मेक इन इंडिया जैसा प्रोग्राम नहीं चलता है, तो हमें बताया जाता है, "हम वी आर अ $5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी।" सो इफ वी आर अ $5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनमी, व्हाई आर वी नॉट मैन्युफैक्चरिंग? फॉर फॉरगेट रेस्ट ऑफ इंडिया, वी आर नॉट मैन्युफैक्चरिंग फॉर आवर ओन सेल्स? व्हाई इज़ दैट हैपनिंग? वो क्यों हो रहा है?

तो सबसे पहले तो आप यह याद रखिए कि पूरे दुनिया का 18% पॉपुलेशन जो है हिंदुस्तान में है। अदर देन चाइना, कोई इन दोनों देशों के आसपास भी नहीं है इन टर्म्स ऑफ़ पॉपुलेशन। अमेरिका का पॉपुलेशन इज़ 4% लेस देन 4% ऑफ़ द वर्ल्ड्स टोटल। तो जब आपके यहां 18% वर्ल्ड का पॉपुलेशन है, तो आप नेचुरली यू विल बी अ बिग इकॉनमी। तो कंजम्पशन तो होगा, बिकॉज़ इतने लोग तो है ना। लेकिन वर्ल्ड जीडीपी में आपका शेयर तो 18% से बहुत कम है, ठीक है? और वर्ल्ड के जो इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन है, मैन्युफैक्चरिंग का है, उसमें आपका शेयर 3.5% है। उधर चाइना का 18% पॉपुलेशन है और 31% वर्ल्ड का शेयर है मैन्युफैक्चरिंग का। हमारे यहां 3, उनका 31, 10 गुना करीब ज्यादा है उनका।

यह बोलना कि आपकी इकॉनमी बड़ी है, बिकॉज़ आप तो टोटल का बात कर रहे हो। बट अब पर कैपिटा टर्म्स में जब बात करते हो कि पर हेड ऑफ़ पपुलेशन, तब वो टोटली अलग चीज हो जाता है। मैन्युफैक्चरिंग या इंडस्ट्री का भी अगर आप देखें, तो अगर आप 2015 के कीमतों पर ले, तो लास्ट डाटा जो दिखाता है कि पर कैपिटा मैन्युफैक्चरिंग वैल्यू एडेड हिंदुस्तान में 310 डॉलर का था।

सर, इसको थोड़ा सिंपलीफाई करें तो पर कैपिटा का मतलब यह हुआ कि जितना आपका टोटल प्रोडक्शन है, उसको आप पॉपुलेशन से डिवाइड करके कि प्रति व्यक्ति कितना प्रोडक्शन होता है आपके यहां। हां, तो वो प्रति व्यक्ति प्रोडक्शन जो है इंडिया का अगर 310 है, चाइना का 3000 है, हम ताइवान का 10,000 है, हम कोरिया का 8000 है। आपकी इकॉनमी जो है बड़ी है क्योंकि आपकी जनसंख्या बढ़ी है। हम जब आप इन इंडिया को दूसरे देशों से की तुल से तुलना करते हैं, जब लेकिन आप अपने पॉपुलेशन के से जब तुलना करेंगे, इंडिया की इकॉनमी छोटी है। और इस छोटे होने में एक मुख्य कारण ये है कि इंडिया का जो मैन्युफैक्चरिंग या इंडस्ट्री है, हम उसका कभी पूरा डेवलपमेंट हो नहीं पाया।

पर ये जो पर कैपिटा इनकम हमें बताया जाता है, 5 ट्रिलियन की इकॉनमी बन जाएगी, 35। इसको अगर सिंपल भाषा में समझाना हो, तो इट्स लाइक सेइंग कि अरे, मेरी शादी पे 5000 किलो बिरयानी खाई गई। देखो, 10,000 लोग ने खाई ना, 15 लोग ने थोड़ी जो खाई। बिल्कुल। तो बिल्कुल 5000 किलो, 10 लोग खाए, ठीक है, हो गया भाई। इसमें क्या है? बट यही हम पे बताया जाता है कि हम विश्व की तीसरी सबसे बड़ी इकॉनमी बनने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि जब पॉपुलेशन आपका, आप अब तो सबसे ज्यादा पॉपुलेशन इंडिया में, चाइना से भी आप आगे चले गए हैं। हां।

पर इसमें जब ये 2013-14 के टाइम पे जब ये स्किल इंडिया ले आए, मेक इन इंडिया ले आए, तो एक उम्मीद तो थी कि भैया इसको कोई एड्रेस करने वाला है। बट दीज़ प्लांस, व्हाई डू यू थिंक कि पूरी तरह से ही फिसड्डी हो गए?

देखिए, ऐसा है कि आपको आपके यहां अगर इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन होना है, इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन इज़ टू टेक प्लेस। एक बेसिक रिक्वायरमेंट यह है आपका, उसके लिए कोई मार्केट चाहिए जहां आप उस प्रोडक्शन को बेचे। खासतौर पे, आप तो प्राइवेट इन्वेस्टमेंट पे डिपेंड कर रहा है। ये तो कोई सरकारी पब्लिक सेक्टर तो नहीं बना रहा है उद्योग इंडस्ट्री। तो आप जब कह रहे हैं कि प्राइवेट इन्वेस्टर्स आके इन्वेस्ट करें इंडस्ट्री में, तो वह इन्वेस्ट तो करेंगे, विथ द एक्सपेक्टेशन कि हमें कुछ प्रॉफिट मिलेगा, हम मुनाफा मिलेगा। उसके लिए तो सिर्फ प्रोड्यूस करना काफी नहीं है, बेचना भी है। हम तो आप कहां बेचेंगे? या तो आप देश के बाहर बेचिए, एक्सपोर्ट कीजिए, या आप देश के अंदर मार्केट में बेचिए।

अब देश के बाहर बेचने के लिए यह जरूरी है कि आप जिस कीमत पर इस चीज को प्रोड्यूस कर रहे हैं, उतने ही क्वालिटी में आपको ऐसे प्राइस पर आप बेच सकते हैं जो बाकी देश में नहीं हो सकता। कंपटीशन है। बहुत कम प्रोडक्ट्स इसमें है जिसमें इंडिया यह अचीव कर पा रहा है। कौन से प्रोडक्ट्स है जिनमें हम कर पाते हैं? कुछ जैसे। और जिनमें कर भी रहा है, उनमें भी उनको प्रोड्यूस करने के लिए जो दूसरे प्रोडक्ट्स चाहिए होते हैं, इंटरमीडिएट जिनको हम कहते हैं, वो इनपुट जो होते हैं, उनको आप इंपोर्ट कर रहे हैं। तो अगर आपका एक्सपोर्ट भी इंपोर्ट पे टिका हुआ है, एक्सपोर्ट भी इंपोर्ट पे टिका हुआ है और बहुत सारी चीजें जो है, आपका जो अपना प्रोडक्शन है, वही बहुत हद तक इंपोर्ट पर डिपेंडेंट है।

तो एक उदाहरण ले लीजिए आप कि एक प्रोडक्ट इंडस्ट्री के क्षेत्र में जिसमें आप कह सकते हैं कि इंडिया सक्सेसफुल है, अ वो है थे फार्मास्यूटिकल्स, दवाइयां। ठीक है? आपका इंडस्ट्री भी बहुत एक्सपोर्ट करता है, पर हम जेनेरिक ड्रग्स एक्सपोर्ट करते हैं, हम नए दवाइयां बनाते नहीं हैं, क्योंकि वो हमारे पास क्षमता नहीं है उसमें। आरएडी, रिसर्च एंड डेवलपमेंट का एक बहुत बड़ा रोल। तो जो दवाइयां बन चुकी हैं, सक्सेसफुल है, उनका सस्ता विकल्प हम बना के दुनिया में कंपीट करते हैं, वो बेच सकते हैं। लेकिन इसके पीछे भी एक इतिहास है कि 1970 में इंडिया का जो पेटेंट एक्ट लागू हुआ था, जिसमें आपने कहा कि आप दवाई के केस में, यह था कि जो दवाई है, हम उसको आप पेटेंट नहीं कर सकते। उसको बनाने का जो प्रोसेस है, हम उसको आप पेटेंट कर सकते कि अगर आपने उस आविष्कार किया है कि उस दवाई को कैसे बनाया जाए, तो उस प्रोसेस को आप पेटेंट कर सकते हो। तो उसको आपका 20 वर्ष के लिए, 15 वर्ष जैसे भी है, इंग्रेडिएंट्स लॉ नहीं कर सकते आप, जो भी ज्यादा नहीं, लेकिन वो प्रोडक्ट को नहीं पेटेंट कर सकते। तो इंडिया में जो फार्मास्यूटिकल इंडस्ट्री का ग्रोथ हुआ, वो इस पेटेंट लॉ के कारण हुआ। हम कि जब आपने कहा कि मल्टीनेशनल कंपनीज़ जो दवाइयां बनाती है, वो अपने प्रोसेस को इंडिया में पेटेंट कर सकती है, हम लेकिन प्रोडक्ट को नहीं। तो जब इन भारत की सरकार ने वो कहा, तो इंडिया की फार्मास्यूटिकल कंपनीज उन्हीं दवाइयों को दूसरे तरीके से बनाना सीख गए। हम और इसी बेसिस पर इंडिया जो है दुनिया भर में सस्ते दामों पर दवाइयां बेचने की कैपेबिलिटी इंडिया ने एक्वायर किया। हम तो उसका एक इतिहास है, वो ऐसा नहीं कि आपने बस छोड़ दिया था और सस्ती मजदूरी थी, तो इसलिए आप कम। इसमें तो इंसान की जरूरत बहुत कम है। हां, ये तो मशीनीकरण से। ये पर इसमें भी ये है कि उस दवाइयों को बनाने के जो इंग्रेडिएंट्स है, वो आप इंपोर्ट करते हैं। उस पे भी आप इंपोर्ट पे डिपेंडेंट है।

तो बेसिकली क्या है कि अगर आपको एक्सपोर्ट के आधार पर इंडस्ट्री को बढ़ाना है, तो जरूरी यह है कि कुछ चीजें आप इंपोर्ट करेंगे, कुछ चीजें आप एक्सपोर्ट करेंगे। तो आपका कंपटीशन में इतने प्रोडक्ट्स में आपको खड़ा रहना पड़ेगा ताकि आपका एक्सपोर्ट ज्यादा हो और इंपोर्ट कम हो। तब आप एक्सपोर्ट के आधार पर ग्रो कर सकते हैं। अदरवाइज, आपका जो इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स का बाजार है, ठीक है? उसमें एक्सपोर्ट में तो जो कर रहे हैं, वो जुड़ जाता है। इंपोर्ट जो कर रहे हैं, वो घट घट जाता है। तो अगर आप इंपोर्ट ज्यादा कर रहे हैं, तो आपका बाजार सिकुड़ जाता है। मार्केट फ्रिंक्स। तो हमारा सिचुएशन ये है कि हम इंपोर्ट ज्यादा कर रहे हैं, एक्सपोर्ट नहीं कर पा रहे। तो मतलब जब हमने इकॉनमी को खोला, लिबरलाइज किया, एक्सपोर्ट बढ़ा, लेकिन इंपोर्ट ज्यादा बढ़ा, तो आपके पास एक्सपोर्ट के आधार पर इंडस्ट्री को ग्रो आप नहीं कर पा रहे।

और आपके डोमेस्टिक मार्केट का क्या है? और यही इसका इससे जुड़ जाता है। अगर आप कंपीट करना चाहते हैं इस आधार पर कि आपके यहां चीप लेबर है, हम तो चीप लेबर चीप क्यों है? हम स्किल नहीं है उनके पास। स्किल केवल नहीं, उनका स्थिति ये है कि हिंदुस्तान में ज्यादातर लोगों के पास काम नहीं है। वो भी एक चीज है। काम नहीं है। जितने जितना काम है, उससे ज्यादा लोग काम ढूंढ रहे हैं। हम उसी के कारण जो है, अगर शॉर्टेज होगा लोगों का, जैसे चाइना में हो गया, वेजेस बढ़ने लग गए। जब इंडस्ट्री के ग्रो करने के कारण आपने अपने लोगों को काम में लगा दिया, शॉर्टेज हो गया, तो वेतन बढ़ने लग गए। उनके इस वजह से उनका पर कैपिटा भी ऊपर गया।

आपने एक अर्थव्यवस्था बना रखी है जिसमें 90% लोग की स्थिति क्या है कि वो काम पर डिपेंड करते हैं। उनके पास कोई प्रॉपर्टी नहीं है, वेल्थ नहीं है जिसके आधार पर वो कमाई करेंगे। तो वो काम पे डिपेंड करते हैं। तो उनकी स्थिति ये है कि या तो उनके परिवार में कोई होगा जो बेरोजगार है, या कोई होगा जो कि साल भर में 40, 50, 60, 70 दिन उसको काम मिलेगा। सारा टाइम काम नहीं मिलेगा। या वो होगा कि वो सारे साल भी काम कर रहा हो, तो उस काम का दाम नहीं मिलेगा। तो 90% जब आपका पॉपुलेशन इस स्थिति में है और उसको ज्यादातर अपना जो इनकम है, वो एसेंशियल नेसेसिटीज पे खर्च करने के लिए होता है, तो वो मैन्युफैक्चर या इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स पे खर्च करने के लिए उसके क्षमता नहीं है। तो आपका डोमेस्टिक मार्केट भी नहीं है। तो अगर आप एक्सपोर्ट में नहीं बेच पाते, आप डोमेस्टिक मार्केट में नहीं बेच पाते, तो आपका कैसे इंडस्ट्री ग्रो करेगा?

और इसका एक जो एडिशनल असर होता है कि एक सेक्टर, एक खर्चा जो होता है, वो होता है कि जिसे हम इन्वेस्टमेंट कहते हैं। हम अगर आप इंडस्ट्री बनाते हैं, तो आप फैक्ट्री खड़ा करेंगे, कंस्ट्रक्शन करेंगे, उसमें प्लांट लगाएंगे, उसमें मशीनरी लगाएंगे। वह सब भी तो इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट है। तो जब इन्वेस्टमेंट होता है इस तरीके का, तो वह भी कुछ मार्केट तैयार करता है इंडस्ट्री के लिए। लेकिन इन्वेस्टमेंट करने का भी मेन सेक्टर क्या होगा? वो भी इंडस्ट्री है। हम अगर आपको एक होटल खड़ा करना हो सर्विस सेक्टर में, जिसको आप कहते हैं, तो आप सिर्फ होटल खड़ा करेंगे ना। उसमें कोई प्लांट तो नहीं लगाएंगे, मशीनरी नहीं लगाएंगे। हम ठीक है? तो उस सर्विस में, जो है ज्यादा इन्वेस्टमेंट इस तरीके का नहीं होगा जो कि इंडस्ट्री के लिए डिमांड करे। वो भी इंडस्ट्री खुद ही तैयार करता है अपने लिए मार्केट। तो जब आपके पास एक्सपोर्ट मार्केट नहीं है, जब आपके पास डोमेस्टिक मार्केट नहीं है, आपका इंडस्ट्री में इन्वेस्टमेंट भी कम हो जाता है और उससे यह होता है कि उससे जो मार्केट तैयार होता है, वो भी नहीं हो पाता है। तो फिर जब यह अगर आपकी स्थिति है और आपका पॉलिसी यह कह रहा है कि हम सिर्फ लोगों को सस्ते मजदूरी के आधार पर, चीप लेबर के आधार पर प्रोड्यूस करने के लिए एनकरेज करेंगे, तो आप कैसे सक्सीड करेंगे? क्योंकि प्रॉब्लम उल्टी तरफ है। ऐसा नहीं है कि लोग कुछ साधन नहीं है इन्वेस्ट करने को कि रिसोर्सेज की कमी है इन्वेस्टमेंट फैक्ट्री लगाने में, यह तो दिक्कत नहीं है। हम दिक्कत ये है कि कोई लगा नहीं रहा है क्योंकि उसको कहीं मार्केट नहीं दिख रहा उसके लिए।

मतलब, अगर हमारे लोग समझो खरीद नहीं पाए चीजें, तो फिर जो भी पैसा लगाना चाहता है, वो मार्केट में ही लगा के कमा लेगा। लाइक वो इसमें नहीं लगा पाए। वो जहां मार्केट है, वहां लगाएगा। हां। बट जैसे जैसे फार्मासटिकल की बात हुई, फार्मासटिकल में हमने थोड़ा बेचा बाहर। वैसे Bajaj की बाइक्स या Hero की बाइक या TVS की बाइक हो गई, ये सब भी हम काफी देशों में बेचते हैं। बिकॉज़ उधर जो डिलीवरी बाइक्स होती है, वो 150, 180 सीसी की होती है। आई थिंक वो सिर्फ यही एरिया बनाते हैं।

बिल्कुल, बिल्कुल। इनफैक्ट, सवाल को इस तरीके से करना चाहिए कि अगर आप किसी कंट्री के इंडस्ट्रियल सेक्टर को देखते हैं और उसको इंडिया से कंपेयर करते हैं, हम तो इंडिया काफी ऊपर आता है। इतना बड़ा आपका इंडस्ट्रियल सेक्टर है। स्टील का बात कर लीजिए, हम दूसरे नंबर पे हैं दुनिया में। सीमेंट का बात कर लीजिए, वहां पे भी हम दूसरे नंबर पर हैं। ऑयल रिफाइनिंग का बात कर लीजिए, वहां चौथे नंबर पे। बिजली के प्रोडक्शन में अब तीसरे चौथे नंबर पर हैं। हर एक में जो है साइज बहुत बड़ा है। मोटरसाइकिल के तो दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरर हैं। सबसे बड़ा इंडस्ट्री इंडिया में है मोटरसाइकिल का। मतलब, मैंने कहां पढ़ा था कि 30 करोड़ से ज्यादा मोटरसाइकिल्स हैं। साइकिल्स, बाइक सब। तो इतना जब आपका यहां बड़ा इंडस्ट्रियल सेक्टर बन सकता है, तब भी इंडस्ट्री क्यों नहीं ग्रो कर रहा है? ये सवाल होना चाहिए ना।

तो यह इंडस्ट्री बड़ी है, बट अगेन, पॉपुलेशन के कंपैरिजन में कम है। तो हिंदुस्तान में सबसे बड़ा मोटरसाइकिल इंडस्ट्री तो है, लेकिन हिंदुस्तान में भी जिन लोगों के पास मोटरसाइकिल है, अगर उनको पॉपुलेशन के परसेंटेज के टर्म्स में देखेंगे, तो इंडोनेशिया से कम है। इंडोनेशिया में क्या है? इंडोनेशिया में चार गुना ज्यादा है। लोगों के पास ट्रांसपोर्ट, उनका पापुलेशन हमसे कम है, पर पर पर्सन जो है एक्सेस हां, ज्यादा है। हमारे यहां क्या है कि हमारा मार्केट इस तरीके का हो गया है कि 90% लोग बहुत मुश्किल से किसी।

तो अगर आप इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स का सोशियोइकोनॉमिक कास्ट सेंसस 2011 में हुआ था, हम उसमें यह सवाल था कि किस-किस के पास वाशिंग मशीन है, एयर कंडीशनर है, फ्रिज है, टीवी है। इस तरह के सवाल थे। एक ही प्रोडक्ट है हिंदुस्तान में जो कि 80-90% पॉपुलेशन के पास है। हम जो इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट है, वो है मोबाइल फोन। पर बाकी आप कोई प्रोडक्ट को देखेंगे, 15%, 20%, 14%, 25% उससे आगे जाता ही नहीं है।

वैसे देश का हाल देख के लगता है, टीवी तो जितने कम बिके बेहतर है। टीवी तो मैं लगता है। नो, देन पर आफ्टर ऑल, मार्केट तो कोई चाहिए इन चीजों को बेचने के लिए। हम वह मार्केट आपके पास यहां नहीं है। और यहां जो है कंट्राडिक्शन आता है। अगर आप चाहते हो कि आप एक्सपोर्ट करके इंडस्ट्रियलाइज करो और आपके पास एक ही सोर्स ऑफ कॉम्पिटिटिव एडवांटेज है कि आपके यहां चीप लेबर है, तो आप जितना उसको कोशिश करोगे, उतना आप कम इस प्रॉब्लम को एड्रेस करोगे कि आपका घरेलू बाजार भी बढ़ बने। क्योंकि आपको चीप लेबर रखना है। लोगों को काम मिल जाएगा, तो चीप लेबर नहीं रहेगा।

तो जिस हिसाब से आप बता रहे हैं सर, ऐसा लग रहा है फिर इंडिया में दो ही क्लास है। मिडिल क्लास शायद है ही नहीं ना। अगर हम 90% लोग के पास अगर एक हफ्ते के खाने का पैसा भी नहीं है, तो 90 बना 10 का ही आर्गुमेंट है यहां पे।

बिल्कुल, बिल्कुल। आपको मैं एक आंकड़ा देता हूं, ठीक है? सैलरी क्लास जो है, जिसको हम मिडिल क्लास तो नॉर्मली सैलरी क्लास कहते हैं ना। हम तो ये तो हम मान सकते हैं कि सैलरी जो हाई सैलरी इनकम वाले हैं, वो इनकम टैक्स से नहीं बचते। टीडीएस सिस्टम के कारण। बिजनेस इनकम जो है, वो लोग छिपा लेते हैं। सैलरी इनकम छिपता नहीं है। तो इनकम टैक्स के आंकड़े जो बताते हैं कि लोगों की सैलरी इनकम क्या है? उस उन आंकड़ों के हिसाब से हिंदुस्तान में जितने लोग वर्क फोर्स में हैं, उनमें से उनका 3% भी नहीं है, जिनके मंथली सैलरी ₹50,000 से ऊपर है। 3%? 3% भी नहीं है, जिनके सैलरी ₹50,000 से ऊपर है महीने के। तो 97% और और आपके पीएलएफएस डाटा में जो है, बाकियों का आता है कि जो सेल्फ एंप्लॉयड है, जो कि 58% एंप्लॉयमेंट है इंडिया में, हम उनका मंथली इनकम एवरेज ₹13,000। जो कैजुअल लेबर है, हम उनका एवरेज डेली, जिस दिन काम मिलता है, ₹450। और जो रेगुलर एंप्लॉयमेंट में है, जो सारा साल काम करते हैं, किसी ना कोई फिक्स्ड एंप्लयर के यहां काम करते हैं। उनका भी एवरेज जो है, हम ₹21,000 है महीने का। तो इसमें 3% का।

पपुलेशन ही कंज्यूम कर सकता है ना? 3% है या बाकी वो बाकी भी छ सात% और है जो कि सेल्फ एंप्लॉयमेंट जिनके पास वेल्थ है वेल्थ के आधार पर तो बेसिकली क्या होता है कि आपके यहां कोई भी एक्टिविटी होती है उस एक्टिविटी में किसी का वेल्थ इन्वेस्ट होता है कोई काम करता है उसमें जब उससे इनकम जनरेट होता है उसका जब बंटवारा होता है वो ज्यादा चला जाता है उनके पास जिनके पास वेल्थ है क्योंकि काम करने के लिए तो आप ज्यादा अच्छा हो। अरे 80% दूसरे आदमी को लगा लेंगे। कोई दिक्कत नहीं है। 80% लोग फ्री है। काम के लिए अवेलेबल है। बिल्कुल।

तो सर जैसे ये है फज़ तो अगर ये इकॉनमी को एट सम पॉइंट किसी को इसका बरोबर एक्सरे निकाल के अगर इस इकॉनमी को रिवाइव करना हुआ तो कौन सी चीजें हैं जो कोई सरकार आके कर सकती है? देखिए सबसे पहले जो है कि जो हम लोगों के सरकारी पॉलिसी है कि आप जो टैक्स करते हो और खर्चा करते हो उसके प्रति जो रवैया है उसको बदलना पड़ेगा। टैक्स खर्चा अभी जो अभी रवैया यह है कि आपको कंपट करना है। आप तो चाहते हो दुनिया भर के जिनके पास पैसा है वह हिंदुस्तान में आके पैसा लगाए। तो इसलिए आप करते क्या हो कि आप जिनके पास पैसा है जिनकी आमदनी अधिक है उन पर टैक्स कम रखते हो और फिर आप कहते हो कि सरकारी खर्चे को भी सीमित रखना है घाटे को एक लिमिट के ऊपर नहीं होना चाहिए सरकारी जो खर्चा है फिसिकल डेफिसिट को लेके अब आप देखते हैं हर बजट में ये होता है कि फिसिकल डेफिसिट कितना हुआ तो खर्चे को आप कम रखना चाहते हो मतलब कि जो अर्थव्यवस्था के वर्किंग से जो आय का डिस्ट्रीब्यूशन हो रहा है इनकम का डिस्ट डिस्ट्रीब्यूशन हो रहा है। उसको आप कुछ चेंज नहीं कर सकते। तो अगर यह अप्रोच रहा तो जो मैं कह रहा हूं कि जो आपका एक डिमांड का प्रॉब्लम है इंडस्ट्री के लिए आप उसका कुछ नहीं कर सकते। आपके हाथ बंध जाते हैं। आप उसको कुछ नहीं कर सकते। तो यह रवैया बदलना जरूरी है और यह रवैया अगर बदलता है तो कई चीजें हो सकती है कि एक तो सरकारी खर्चा जो है वो भी ऐसा फॉर्म ले सकता है जिससे एक तो आपके इंफ्रास्ट्रक्चर जो है उसमें इंप्रूवमेंट हो और इंफ्रास्ट्रक्चर में अगर आपका इंप्रूवमेंट होता है तो आप एक्सपोर्ट मार्केट में भी कमट करने की आपकी कैपेसिटी बढ़ जाती है।

यहां पे ना सर इंफ्रास्ट्रक्चर या वर्ड को ही लेके बहुत कंफ्यूजन है। लोगों ने इंफ्रास्ट्रक्चर को कर दिया है कि रास्ता टोल अंडरपास ब्रिज ये इंफ्रास्ट्रक्चर पर आप बताइए अगर हमें साउथ एशिया की कंट्री से कमपीट करना हुआ तो आप जो इंफ्रास्ट्रक्चर की बात कर रहे हैं उसमें क्या आता है? तो उस इंफ्रास्ट्रक्चर में ऑफ कोर्स ट्रांसपोर्ट और कनेक्टिविटी इंपॉर्टेंट है। बट ट्रांसपोर्ट और कनेक्टिविटी एक है जो जिसमें पैसे वाले फटाफट एक जगह से दूसरे जगह जा सकते हैं। वो इंपॉर्टेंट नहीं है ना। चीजें हैं उनका मूवमेंट है। पोर्ट्स के थ्रू मूवमेंट है। जो देश से बाहर जाएगा उसका जो सारा इंफ्रास्ट्रक्चर है। प्रोडक्शन करने के लिए जो चीजें चाहिए बिजली चाहिए इलेक्ट्रिसिटी प्रोडक्शन। अभी तो सब अपना ही करते हैं। बिकॉज़ इलेक्ट्रिसिटी प्रोडक्शन जो है इंडस्ट्री के लिए इजीली अवेलेबल नहीं होता है।

सर सर जो आप इंफ्रास्ट्रक्चर की बात कर रहे हैं उसमें क्या है? तो इंफ्रास्ट्रक्चर को जिसे कहा जाता है उसको दो हिस्सों में आप बांट सकते हैं। पहला तो जो कि फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर है। रोड्स, ब्रिजेस वगैरह तो आते हैं लेकिन रोड्स, ब्रिजेस, रेलवेेज अन्य चीजें जिसके आधार पर जो है जो आप प्रोड्यूस कर रहे हो सस्ते में और एफिशिएंटली जो है मूव कर सके एक जगह से दूसरी जगह तक। क्योंकि अगर आपको मान लीजिए प्रोड्यूस करना है वर्ल्ड मार्केट के लिए तो जहां भी आप प्रोड्यूस करेंगे वहां से तो उसको जाना है कहीं और एक पोर्ट तक पहुंचने के लिए पोर्ट तक पहले पहुंचना है फिर पोर्ट में आपका फैसिलिटी चाहिए कि वो उसको भेजें तो ये मूवमेंट वगैरह जो है ये एक इंपॉर्टेंट चीज है। प्रोडक्शन प्रोसेस के लिए रिक्वायरमेंट्स है इलेक्ट्रिसिटी और इस तरह की चीज़ें जिसके लिए और हम कहीं पे भी आप प्रोड्यूस करते हैं उसके लिए भी जो इनपुट्स रॉ मटेरियल्स वगैरह वो भी तो ट्रांसपोर्ट हो के आएंगे वहां क्योंकि इंडस्ट्री का कैरेक्टर क्या है कि कम जगह पर बहुत प्रोडक्शन होता है। एग्रीकल्चर तो जमीन लेता है या पर इंडस्ट्री कम जमीन पर बहुत प्रोडक्शन होता है। तो उसके लिए जरूरी है कि ये चीजें वहां आए और चीजें वहां से जाए। तो उसके लिए एक फिजिकल इंफ्रास्ट्रक्चर दूसरा जो है आपका जिसे आप सोशल इंफ्रास्ट्रक्चर कहते हैं कि आपका जो वर्क फोर्स है उसका एजुकेशन उसका स्किल उसका हेल्थ भी हेल्थ क्योंकि हेल्दी वर्कर होगा तब वो बहुत ज्यादा प्रोडक्टिव होगा क्योंकि ये इंपॉर्टेंट नहीं है कि आपको एक आदमी को 8 घंटे के काम के लिए कितने पैसे देने हैं। इंपॉर्टेंट चीज ये है कि आप जो उसको 8 घंटे के काम के लिए पैसे दे रहे हैं उस 8 घंटे में उसका प्रोडक्टिविटी कितना है? तो ये सब इन सब चीजों पर डिपेंड करता है। अगर वर्कर भी हेल्दी होगा, एजुकेटेड होगा, स्किल्ड होगा तब वो तो ये सब चीजें जो है इन इनका कैरेक्टर क्या है कि ये इन्वेस्टमेंट खर्चा मांगते हैं। लेकिन ये एक ऐसा खर्चा है जिसके लिए आप प्राइवेट सेक्टर पर डिपेंड नहीं कर सकते। बिकॉज़ इसमें हमेशा रेवेन्यू रिटर्न नहीं आता है हर समय क्योंकि रिटर्न इसका सोशल है। समाज को रिटर्न मिलता है। इंडिविजुअल को नहीं मिलता हर समय। तो इस यह इन्वेस्टमेंट जो है सरकार की तरफ से अगर हो तो और इसके साथ जो इंपॉर्टेंट है वो यह है कि इसके साथ आपको जो विशेष कैपेबिलिटीज आपको चाहिए चीजों को प्रोड्यूस करने के लिए उनको तैयार उनका प्रोडक्शन जैसे आपको किसी चीज का मैन्युफैक्चर करना है सेमीकंडक्टर का मैन्युफैक्चर करना है तो कैसे करना है पहले तो आपको उसका ज्ञान होना चाहिए तो उसके लिए ज्ञान कैसे प्राप्त होगा उसके लिए आरएडी कौन करेगा? ठीक है? और उसको प्रोड्यूस करने के लिए जो अलग-अलग चीजें टूल्स स्पेशलाइज टूल्स वगैरह चाहिए वो इंडस्ट्री कैसे बनेगा? तो आप पॉलिसी स्पेसिफिक जब तक नहीं बना पाएंगे इस तरीके का आप नहीं कर पाएंगे। आप मान लीजिए एक सेक्टर में आपने बोल दिया कि आ जाइए। अरे उसको प्रोड्यूस करने के लिए जो वर्क फोर्स चाहिए वो आपके यहां नहीं है। उसको प्रोड्यूस करने के लिए जो वेरियस टूल्स वगैरह इंप्लीमेंट मशीनरी चाहिए वो नहीं है। तो अब वो आ भी गए तो वो भी इंपोर्ट करेंगे। सेम वापस रिपीट हो रहा है। ये वही सेम चीज रिपीट होगा।

तो अभी किसी को अगर समझना है ना इंडिया में ये सॉफ्टवेयर क्रांति कहां से आई? वो ईली आप समझ सकते हैं। बिकॉज़ सॉफ्टवेयर किसी से करवाना है तो क्या चाहिए? एक लैपटॉप चाहिए। ठीक है? एक ऑफिस चाहिए। कांच की बिल्डिंग वाला थोड़ा जिम डाल दो। एक रेजिडेंशियल कॉम्प्लेक्स कर दो। गाड़ी का पार्किंग बना दो। सॉफ्टवेयर क्रांति। तो सवाल ये पूछना चाहिए कि आपके यहां इतना सॉफ्टवेयर बनता है। आपके यहां हार्डवेयर इंडस्ट्री क्यों नहीं है? आपके यहां इतना बड़ा टेलीकॉम सर्विसेस इंडस्ट्री है। सर्विस इंडस्ट्री है। हां। टेलीकॉम इक्विपमेंट नहीं है। गोल आपके यहां बनता ही नहीं है। इसका जो एक असर हुआ है कि इस तरह के स्थिति के कारण बिजनेस भी जो है उनका भी ध्यान अब इन सर्विज के प्रति ज्यादा हो गया है। इजी टू प्रोड्यूस है। हां इजी टू प्रोड्यूस है। और दूसरा यह है कि बहुत सारे ये सर्विज में आप या तो कमपीट कर सकते हैं या आपको इंपोर्ट से कंपटीशन नहीं है। देखिए सर्विसेज जो है ज्यादातर सर्विसेज आईटी सर्विसेज को छोड़ दीजिए आईटी सर्विज तो आप एक्सपोर्ट करते हैं। ज्यादातर एक्सपोर्ट ही करते हैं। जितना भी प्रोड्यूस होता है वो एक्सपोर्ट करते हैं। 80% एक्सपोर्ट होता है। हिंदुस्तान में बहुत कम बिकता है। पर आईटी सर्विज में भी आप बेसिकली आउटसोर्सिंग पर डिपेंडेंट हैं। और उनका बैक एंड ही है आप एक तरीके से। बिल्कुल। आप उस पे लिमिटेड है। उससे आगे आप नहीं जा पाए। हम तो दुनिया भर के जो बड़े आईटी कंपनीज़ है टेक मेजर्स जिनको कहते हैं वहां पे तो कोई हिंदुस्तानी कंपनी की गिनती नहीं है। ठीक है? और पर दूसरे सर्विज में जैसे है कि टेलीकॉम सर्विज में ये है वहां तो कोई कंपटीशन नहीं है ना इंपोर्ट से वो तो जो यहीं यहां यूज़ होना है तो यहीं प्रोड्यूस होना है। और ये वो इंपोर्ट नहीं हो सकता। हां 90% लोग ने टेलीफोन खरीद लिया। बट इन इंडस्ट्री में ऐसा नहीं है क्योंकि इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट हर समय एक्सपोर्ट इंपोर्ट हो सकते हैं। तो इंपोर्ट कंपटीशन इंडस्ट्री में हर समय रहेगा। तो इसलिए आपको इतने लेवल पे प्रोड्यूस करना पड़ेगा कि आप दुनिया में और जगह जहां प्रोड्यूस हो रहा है उसके कमपीट कर पाए।

तो जैसे हम स्यूशन या बोल रहे थे कि एक एक्टिव पार्टिसिपेशन सरकार का लगेगा इंडस्ट्री बनाने में। बिल्कुल। तो एक्टिव पार्टिसिपेशन तो मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया ये सब नहीं रहा है। नहीं तो देखिए मेक इन इंडिया या स्किल इंडिया ये तरह के पॉलिसीज जो है ये इनको कहा जाए कि जिसे हम इंडस्ट्रियल पॉलिसी कहते हैं। वो वो इंडस्ट्रियल पॉलिसी ये सिर्फ नाम में है। क्योंकि मेक इन इंडिया में आपने क्या किया है बताइए? ई ऑफ डूइंग बिजनेस हम कर देंगे। इसके अलावा आपने क्या किया है और बाकी चीजें जो आप कह रहे हैं ठीक है आप इंफ्रास्ट्रक्चर की बात करते हैं आप बात तो सब कुछ होता है लेकिन कुछ बनाने के लिए तो आपको वो रिसोर्सेज कमिट करने पड़ेंगे और एक साल दो साल के लिए नहीं एक लंबे पीरियड के लिए अगर आज आप सरकार कहे कि हम इस तरह का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने वाले हैं और यह जो है इसमें इतना जो इन्वेस्टमेंट लगेगा हम सरकार उसको कमिट कर रही है और 15 साल तक यह कमिटमेंट बरकरार रहेगा। तब कोई प्राइवेट इन्वेस्टर भी कहेगा हां यह होने वाला है। उसके हिसाब से आप अपना भी डिसीजन ले सकते हो कि भाई ठीक है मैं ये इंडस्ट्री में इन्वेस्ट करूं या उसमें मैं करूं। ऐसा वो सर्टेनिटी नहीं है। तो प्राइवेट इन्वेस्टर भी कहते हैं अरे ये सब तो होना नहीं है। छोड़ो सरकार से भी हम भी वही कहें जहां हम पैसा बना सकते हैं। उसके लिए कहें इसलिए सरकार हमसे टैक्स भी ना लें। हम कम कर ले हमसे टैक्स। यह कहेंगे हम यह नहीं कहेंगे कि सरकार इस पे इन्वेस्टमेंट करें। यह हो जाता है। तो मेक इन इंडिया और स्किल इंडिया इन सब में जो एक या एक तो प्रॉब्लम ये है कि देखिए प्रॉब्लम आपका बड़ा है। उसके लिए आप एक छोटा सा स्टेप लेंगे। आपको बड़ा सा पत्थर मूव करना। आप एक उंगली से उसको धक्का मारेंगे तो वो नहीं होने वाला है ना। तो या तो पॉलिसी ऐसे हैं जिनमें कोई दम ही नहीं है। इतने छोटे पॉलिसी है उसमें कोई कमिटमेंट नहीं है। या पॉलिसी इसी प्रॉब्लम को देख रहे हैं कि भाई कैसे बिजनेस करना इजी हो जाए। लेकिन जो मार्केट का प्रॉब्लम है वो मार्केट का प्रॉब्लम कैसे सॉल्व करेंगे आप? सवाल यह है जबकि मैं कह रहा हूं कि अगर सरकार सार्वजनिक खर्चे को पब्लिक एक्सपेंडिचर इन्वेस्टमेंट को बढ़ाने के प्रति सोचे तो उससे एक तो कि उस इन्वेस्टमेंट से ही कुछ मार्केट बनता है। जब सरकार इन्वेस्ट करेगी तो वो भी तो खरीदेगी ना चीजें तो उससे कुछ मार्केट बनता है और उसमें जो लोगों को काम मिलता है उससे भी कुछ मार्केट बनता है। फिर वो लोग जब खर्चा करते हैं उससे और मार्केट बनता है जिसको हम मल्टीप्लायर प्रोसेस कहते हैं। ये इन सब से जो है आपका मार्केट बढ़ सकता है और मार्केट बढ़ने के साथ-साथ यह होगा कि जैसे-जैसे आप इंफ्रास्ट्रक्चर इंप्रूव करते हैं आपके यहां कभी प्रोडक्टिविटी और एफिशिएंसी प्रोडक्शन का बढ़ता है। आप हो सकता है एक्सपोर्ट मार्केट में भी उस आधार पर आ सकते हैं। आ सकते हैं। लेकिन आप सोचते रह कि बाकी सब दुनिया में वेतन बढ़ जाए और हम ही रह जाए सस्ते मजदूरी वाले इसलिए आखिरकार सब हमारे पास आएंगे हम इसी इंतजार में बैठे रहेंगे पर इस पे एक और तरह से एक चर्चा हम कर सकते हैं व्हिच इज कि जैसे हमने देखा है कि ये पूरी तरह से मतलब नहीं हो पा रहा है इसीलिए लोग जैसे आपने बोला एव्री टाइम दे आर नेगोशिएटिंग अ वर्स्ट कॉन्ट्रैक्ट फॉर देमसेल्व्स के इसमें इसमें गिग वर्क भी आ गया। अब कोई अर्बन क्लैब वालों ने मेड का सर्विस डाला था ₹49 में और उन लोग का प्रॉब्लम स्टेटमेंट ही वही था कि मेड टाइम पे नहीं आती है। छुट्टी के टाइम गुम हो जाती है और ये सब मतलब थॉट ही इनका यह है कि जिसकी भी लाइफ में कुछ रेगुलैरिटी है पहले तो उसको डिस्प्लेस करो। उसको थोड़ा हिलाओ उधर इधर-उधर से। अभी उसको एक सर्विस पे लेके आ गए हैं उन लोग ऐप पे लेके आ गए हैं। और ये इकोनमी जो आपको लगता है ये मतलब व्हाट आर द व्हाट आर द इवल्स ऑफ़ दिस इकोनॉमी अगर आप ये समझाएं और ये जो इकोनॉमिक पीरियड है हमारा करंट और जो अभी मतलब अब जैसा चल रहा है वैसे ही कल मतलब कल आज से ही बनेगा और आज कल वहां पे ही जाना है। तो नेक्स्ट 10 साल में हमारी इकॉनमी जैसे हम आज 2025 में जहां हमारी इकॉनमी है कोई भी बेस मार्क लेके के ये या हम अपने आप से ही कंपेयर कर लें कि हम पहले कब यहां थे या पहले से बेहतर है। सो थोड़ा कंपैरेटिव एनालिसिस ऑफ दिस इकॉनमी सर अगर उस पे डिस्कस करें तो अगर आप करंट जो फज़ है इंडियन इकॉनमी का उसको देखें तो उसके कई इंपॉर्टेंट फीचर्स हैं। पहला तो ये कि इंडस्ट्रियल सेक्टर में स्टैग्नेशन है। प्रोडक्शन बढ़ नहीं रहा है। हिंदुस्तान के आजादी के बाद के इतिहास में एक ही दौर रहा है जहां इंडस्ट्रियल प्रोडक्शन की ये स्थिति रही है। और वो 1965 टू 75 का जो दशक है प्रीलिबरलाइजेशन प्रीलिबरलाइजेशन तीसरे थर्ड फाइव ईयर प्लान जब खत्म होता है उसके बाद का जो पीरियड है ठीक है उस टाइम पे एक क्राइसिस की सिचुएशन का सिचुएशन था और उस पीरियड में जो है उसको हम डेकेड ऑफ इंडस्ट्रियल स्टैग्नेशन कहते हैं। ठीक है? डेकेड ऑफ इंडस्ट्रियल स्टग्नेशन और इस पर इकोनॉमिक्स में बहुत बड़ा डिबेट है कि उसके कारण क्या थे और यह दुनिया भर में फेमस डिबेट है। स्टग्नेशन डिबेट इसको कहते हैं। ये 2011-12 से ले अभी तक डेढ़ दशक का टाइम हो गया। वन एंड हाफ डेकेड्स सेम ट्रेंड है। सो हम 40 साल पीछे इकोनॉमिकली। हां। और दूसरा जो और भी इंपॉर्टेंट चीज है जो उस टाइम नहीं हो रहा था बट अब हो रहा है वो ये कि जिसे हम डीइंडस्ट्रियलाइजेशन कहते हैं हम तो कोशिश करते रहे हैं कि हम इंडस्ट्रियलाइज करें इंडिपेंडेंस के बाद से हम लगातार कोशिश करते रहे हैं बहुत सफल नहीं हुए लेकिन अब जो दौर है कि इंडिया दूसरी बार अपने इतिहास में डीइंडसलाइज कर रहा है। पहला तो 19वीं सदी में हुआ था जब ब्रिटिश इंपोर्ट्स हिंदुस्तान में आए और यहां का जो पारंपरिक इंडस्ट्री था खत्म उसको खत्म किया तो उसको हम जानते हैं हमारे इतिहास में एक डीस्ट्रलाइजेशन हुआ था अब जो है दूसरी बार डीस्ट्रलाइजेशन हो रहा है यानी कि इंडस्ट्रियल सेक्टर का जो अर्थव्यवस्था मेंेंस है प्रोडक्शन में जो शेयर है और एंप्लॉयमेंट में शेयर है दोनों जो है घट रहे हैं। पहले ब्रिटिशर्स ने किया अभी हम अपने आप ही कर रहे हैं। जो जब तब ब्रिटिशर्स के चेले रहे थे अब वो कर रहे हैं सेम चीज इसको इकोनॉमिक्स में हम लोग जो कहते हैं वो इसको कहते हैं प्रीमेच्योर डीइंडस्ट्रलाइजेशन प्रीमेच्योर डीइंडस्ट्रलाइजेशन क्योंकि जो एडवांस्ड डेवलप्ड इकॉनमीज़ हैं जो इंडस्ट्रियलाइज किए हम इवेंचुअली उनका ये भी होता है कि सर्विसेज भी ज्यादा डोमिनेट कर जाता है इंडस्ट्री के कंपैरिजन लेकिन वहां क्या होता है कि एंप्लॉयमेंट भी सर्विज में होता है। अगर आप अमेरिका में देख तो 80% एंप्लॉयमेंट सर्विज में है। इन हिंदुस्तान में सर्विज सिर्फ आउटपुट में चला गया है। प्रोडक्शन में एंप्लॉयमेंट में नहीं है। हम क्योंकि दिक्कत दोनों में वही है। इंडस्ट्री में प्रॉब्लम ये है कि डिमांड जो है सारा एक छोटे से हिस्से के पॉपुलेशन से आ रहा है। सर्विज में भी वही दिक्कत है। पर ये है कि क्योंकि सर्विज में वो खर्चा ज्यादा करते हैं। तो आप सर्विज का वैल्यू तो बढ़ा सकते हैं। आम एंप्लॉयमेंट नहीं जनरेट कर सकते। अगर 10% हिंदुस्तान टूरिज्म कर रहे हैं। अब 10% हिंदुस्तान पैसे देके इलाज करा सकते हैं। 10% हिंदुस्तान का है जो ड्राइवर रख सकते हैं। जो घर पे कोई काम करने वाली को रख सकते हैं। तो वो 10% हिंदुस्तानी जो है कितने हिंदुस्तानियों के लिए नौकरी तैयार करेंगे? तो वो सर्विज में यहां पे एंप्लॉयमेंट भी नहीं हो रहा है। तो हमारे यहां जो दिक्कत यह है कि एंप्लॉयमेंट की स्थिति जो है वो लगातार खराब हो रही है। जो भी एंप्लॉयमेंट बढ़ रहा है वो जो भी एक्टिविटीज है उसमें किसी ना किसी तरह से जो लोग जीना है लोगों को किसी ना किसी तरीके से उसमें वो घुस रहे हैं। तो जो बिनेसेस या एक्टिविटीज जो बढ़ भी रहे हैं वह भी इसी का एडवांटेज ले रहे हैं। हम कि आपको इंडस्ट्री में अगर आप एक फैक्ट्री लगाते हैं हम आप 1000 1500 2000 वर्कर को वहां लगाते हैं। वो उस प्रोडक्शन के काम में एक साथ काम करते हैं। तो वहां तो यह भी संभावना है कि वो अपना यूनियन बना लें और कुछ कहें कि भ वेतन बढ़ाओ या वो करो। अब क्या हो रहा है कि लोगों के पास काम नहीं है। उनसे कम पैसे में कितना ज्यादा काम निकाला जाए उसके आधार पर बिजनेस चल रहा है सब। ठीक है? तो ये जो गिग वर्कर है सब इनकी क्या स्थिति है कि इनको तो आप एंप्लई भी नहीं मानते हो। इन पे कोई कानून नहीं लागू है कि आपको इतना वेतन देना है, कितने घंटे काम कराने हैं। ठीक है? तो सब तो इसका फायदा उठा के आप बेसिकली बिजनेस कर रहे हो। बेसिकली जो हमारा ये रेवोल्यूशनरी सेक्टर है हम अगर आप एक तरह से देखें तो दे आर डिसरप्टिंग दी अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर। लाइक कौन सी इकॉनमी में ये होता है? जैसे बाल काटने के लिए या समझिए ये हो गया टैक्सी के लिए। तो यह एक अनऑर्गेनाइज्ड सेक्टर है। आप उसमें टेक्नोलॉजी लाके डिसरप्ट कर रहे हो। उनकी लाइफ से उनको बोल रहे हो आपके पास फ्रीडम है। अरे फ्रीडम नहीं चाहिए भाई नौकरी चाहिए। इनफैक्ट आपने ये बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट हाईलाइट किया है मतलब जो कि जिस कारण से इंडिया का जो ग्रोथ का स्टोरी आंकड़े दिखा रहे हैं उस पे भी एक सवाल उठता है हम क्योंकि बेसिकली क्या है कि इंडस्ट्री या इन अन्य सेक्टर्स में प्रोडक्शन बढ़ा के प्रॉफिट बनाने की संभावनाएं कम हो जा रही है कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए भी तो पैसा कहां जा रहा है? पैसा जा रहा है इनू एक्टिविटीज जहां आप जो सेक्टर्स आपके कब्जे में नहीं थे हम उनको अपने कब्जे में ले आ तो उसका कारण एक ये हो रहा है कि आपका जितना बढ़ रहा है उतना अनऑर्गनाइज्ड सेक्टर का घट रहा है घट रहा है। आपके यहां जो एंप्लॉयमेंट बढ़ रहा है उससे ज्यादा एंप्लॉयमेंट वहां खत्म हो रहा है। लेकिन आपके आंकड़े इसको पहचानते नहीं है। तो आपका जो ग्रोथ ऑर्गेनाइज सेक्टर का है उसके आधार पर आप अनुमान लगा रहे हैं कि अनऑर्गनाइज्ड का भी कितना ग्रोथ हो रहा है। तो जहां रिप्लेसमेंट हो रहा है वहां कोई ग्रोथ नहीं है। हम लेकिन उसको आप दोनों सेक्टर में ग्रोथ मान के चल रहे हैं। आपके आंकड़े तो जो ग्रोथ भी जीडीपी वगैरह में दिखा रहे हैं वो भी आर्टिफिशियल है। पूरा वो हकीकत नहीं है। कितना खुराफाती दिमाग चाहिए आपको के आप जिसकी लाइफ पहले ही डिसरप्टेड है उसकी इंडस्ट्री आके डिसरप्ट कर दो और इंडियन बिजनेसमैन नंबर वन इनफैक्ट अगर आप अभी एक देखिए कहानी बनाने के लिए आप कुछ चीज कई चीजें अलग-अलग चीजें कहते हैं। पर उन चीजों को जब आप एक साथ रखें तो कहानी कुछ और ही बन जाती है। तो मैं आपको एक उदाहरण दे रहा हूं। एक तरफ आप कह रहे हो कि जीडीपी हिंदुस्तान का बढ़ रहा है और ठीक है पहले जितनी तेजी से बढ़ रहा था उतना नहीं बढ़ रहा है लेकिन दुनिया भर में देखिए क्या हालत है उनके मुकाबले में हम बेहतर हैं हम तो ठीक है जीडीपी के आंकड़े आपने दे दिए कि दिखाए सही गलत जो भी है ठीक है मान लिया वो सही है दूसरी तरफ आप आंकड़े दिखा रहे हैं कि रोजगार भी बहुत बढ़ गया महिलाओं का भी रोजगार बढ़ गया है सब कुछ बढ़ गया बहुत रोजगार भी बढ़ा है पिछले कुछ सालों में हम इसके भी आंकड़े हैं सरकारी। उस प्रोडक्शन के आंकड़ों को और इन उस एंप्लॉयमेंट के आंकड़ों को आप एक साथ रख दीजिए। तो यह कहानी निकल के आ रही है कि हिंदुस्तान में जो भी ग्रोथ हो रहा है उसमें पर वर्कर जो प्रोडक्टिविटी है वो घट रहा है। क्योंकि आप 10% और प्रोडक्शन बढ़ा रहे हैं। वो एक आंकड़ा कह रहे हैं 10% बढ़ गया। दूसरी तरफ कह रहे हैं 12% एंप्लॉयमेंट बढ़ गया। तो 12% एंप्लॉयमेंट बढ़ने से 10% अगर प्रोडक्शन बढ़ा। इसका मतलब पर एक आदमी का प्रोडक्शन जो है वो घट गया। यह दोनों आंकड़ों को आप साथ में रख दें पता चल जाता है कि हकीकत क्या है। क्योंकि कौन से इकॉनमी में इतिहास में देख लीजिए कि ग्रोथ इस तरीके का हुआ हो कि प्रोडक्टिविटी कम घट रहा हो। उल्टा होता है। प्रोडक्टिविटी बढ़ता है तो यहां तो घट रहा है और ये एक सेक्टर में नहीं है। ये एग्रीकल्चर में है। ये इंडस्ट्री में है। ये सर्विज में है। सब जगह वही दिख रहा है। इसलिए आप पार्शियल एक पिक्चर किसी एक आंकड़े से दिखाना चाहते हैं। उसको भी जब एक साथ रखते हैं तो उन्हीं स्टैटिस्टिक्स में उन्हीं आंकड़ों में दूसरी कहानी नजर आ जाती है। बिकॉज़ आप कितना छिपाएंगे हां कि रियलिटी क्या है?

सर इसमें तो काफी रीजनल पार्टीज है या जैसे बीजेपी का एनडीए अलायंस हो या यूपीए अलायंस हो राहुल गांधी ने खुद ने कहा है कि दोनों ही जॉब क्रिएट नहीं कर पाए तो आगे जो जॉब क्रिएशन कोई अगर करना भी चाहे स्टेट पे या सेंटर लेवल पे तो ये जो ठेकेदारी का काम दिया जा रहा है या गिग वर्क दिया जा रहा है या कॉन्ट्रकुअल 11-11 महीने के जॉब्स दिए जा रहे हैं। इनका क्या उपाय है? देखिए इनका तो स्पेसिफिकली उपाय यह होगा कि इनके कुछ तरीके का रेगुलेशन आना पड़ेगा और इसके कई कारणों से हो सकते हैं। एक तो उनके अपने राइट्स का प्रोटेक्शन का सवाल है और दूसरा पब्लिक सेफ्टी के भी सवाल है। मान लीजिए टैक्सी ठीक है। आप टैक्सी के जो एग्रीगेटर्स है, कंपनीज़ को अलव कर रहे हैं कि वो एक ड्राइवर को 14 15-15 घंटे दिन में गाड़ी चलवाएं। हम ठीक है। अब वो कहेंगे कि हमने तो नहीं कहा उसको 14 घंटे चलाने को। वो चला रहा है। अरे आपने स्थिति बना दी ऐसी कि 14-15 घंटे चलाए बनाए उसका गुजारा नहीं चल सकता। गुजारा नहीं हो सकता है। तो 1415 घंटे अगर वह चला रहा है तो उसके उसके अपने शरीर पर जो असर है वो है और दूसरा जो है एक्सीडेंट या कुछ होने के जो रिस्क बढ़ जाते हैं जब सब ड्राइवर इतने सारे ड्राइवर थके हुए हैं हम हम तो वो भी तो डेंजर एक है। तो इसके लिए तो इस चीजों में तो अगर ये एक्टिविटीज होने हैं तो आपको कोई ना कोई रेगुलेशन चाहिए जो कि सरकार को इंपोज करना पड़ेगा कि आप इतने नहीं ले सकते इतना आपको मिनिमम देना पड़ेगा। देखिए पहले भी तो करते थे। मान लीजिए दिल्ली में ही अगर आप देखें या किसी शहर में देखें टैक्सी और ऑटो तो चलते थे। ऐसा तो नहीं कि Ola Uber आए तो तभी टैक्सी चलना शुरू हुए। नहीं तो पहले से तो पहले क्या रेट कैसे होता था तय हम कि भाई एक जगह से दूसरी जगह इतने किलोमीटर जाने के लिए कितना खर्चा होता है। ठीक है? उस खर्चे के ऊपर रीज़नेबल जो चला रहा है ड्राइवर उसकी कमाई होनी चाहिए। उसका मेंटेनेंस गाड़ी वगैरह का जो है वो खर्चा पूरा होना चाहिए और उसको वापस आना है। अगर एक जगह से दूसरी जगह गया है। उसको कितना कवर करने में कितना लगेगा। उस हिसाब से आप तय करते थे कि गाड़ी का फेयर कितना होगा। अब इनको आपने अलऊ कर दिया कि वो फेयर कम रखेंगे। हम ठीक है? और उसका बोझ कौन लेगा फिर फाइनली? वो ड्राइवर पे आएगा। ठीक? तो आप पहले भी तो रेगुलेट करते थे हम कि भाई जो ड्राइवर है उसका एक रीज़नेबल इनकम आपको उस तरीके से एक रेगुलेशन करना पड़ेगा। तो ये तो इसका बट जॉब क्रिएशन का जहां तक सवाल है सबसे पहले तो इंपॉर्टेंट है यह पहचानना कि जॉब क्रिएशन इज नॉट द प्रॉब्लम टू बी सॉल्वड इट इज द स्यूशन टू द प्रॉब्लम। बिल्कुल। बिकॉज़ अभी सिचुएशन क्या है कि जब जॉब्स नहीं है इसलिए 90% इंडियंस का इनकम अटका हुआ है। इनकम अटका हुआ है इसलिए बाजार में डिमांड नहीं है। बाजार में डिमांड नहीं है इसलिए प्रोडक्शन ग्रो नहीं करना है। प्रोडक्शन ग्रो नहीं कर रहा है इसलिए एंप्लॉयमेंट बन नहीं रहा है। ये पूरा सर्किल सर्कल एक है जो चले जा रहा है। तो इसको आप ब्रेक कहां करेंगे? एंप्लॉयमेंट जो एंप्लॉयमेंट जो अनइंप्लॉयड है वह तो अपने आप एंप्लॉयमेंट नहीं क्रिएट कर सकते अब्सोलुटली तो आपको एंप्लॉयमेंट क्रिएशन हैज़ टू बी सीन एस द सॉल्यूशन टू द प्रॉब्लम नॉट द प्रॉब्लम टू बी सॉल्वड इट हैज़ टू बी सीन एस अ सशन तो उसके लिए जो इंपॉर्टेंट है कि जो मैंने कहा कि सरकारी खर्चा और टैक्सेशन का पॉलिसी बदलना पड़ेगा और इसके लिए आपको बाहर से जो शहर बाजार और फाइनेंसियल मार्केट मार्केट्स में पैसा लाते हैं लगाते हैं। उनके आने जाने पर भी कुछ रोक लगाना पड़ेगा। अदरवाइज आप नहीं कर पाएंगे इसको। विदाउट रेगुलेशन कोई पॉसिबिलिटी नहीं। तो जो हमने एफआरबीएम एक्ट लागू किया था। वाजपेई की सरकार ने उसको पास किया था। यूपीए की सरकार ने नोटिफाई किया था। उसी को आधार बना के हम पॉलिसी बना सकते हैं। दोनों सरकारें बनाती रही है। उस को भी उसको खत्म करना पड़ेगा। वो वहां पे यही है ना कि घाटे को इतना रखना है हम टैक्स कम रखना है हम वो जो वहां से तय हो गया उससे तो सरकार के हाथ सरकार के हाथ बंद गए नहीं कर सकते आप कुछ तो आपको वो जगह बनाना पड़ेगा पॉलिसी में कि आप इस को एड्रेस कर पाए एंड एज आई सेड एंप्लॉयमेंट सलूशन क्रिएशन इज द स्यूशन इट इज नॉट द प्रॉब्लम टू बी सॉल्वड बहुत अच्छे मोड पे आई थिंक ये पडकास्ट क्लास हम खत्म कर सकते हैं। थैंक यू सो मच सर फॉर टाइम। थैंक यू। थैंक यू फॉर हैविंग मी। अ ग्रेट टाइम टॉकिंग टू यू। काफी कुछ समझ में आया। जेएनयू से है तो अभी ट्रोल होने के लिए तो अब रेडी होंगे ही। अभी थोड़ी बहुत ट्रोलिंग तो सभी करते हैं। वो तो होता रहता है। बट मेरे ख्याल से अब धीरे-धीरे लोगों को भी हां लोगों को भी समझ समझ में आ रहा है। कि चाइना की तरफ लाल आंख नहीं दिखा रहे हम। हम आंख बंद करके खड़े हैं। हां बिल्कुल। ओके। थैंक यू सो मच। थैंक यू। थैंक यू। ओके। कट [संगीत] जाओ