Transcription
पुराने जमाने का जिक्र है। बगदाद में एक अब्दुल्लाह रहता था। अपने फन में उस्ताद और अच्छा का मिलता यह कुलाह बनाता जिसको बेचने के बाद उसे बेशुमार दौलत उसके हाथ आ जाती।
इसी तरह रफ्ता रफ्ता उसके पास उसकी मेहनत का बहुत सा माल जमा हो गया और जब माल जमा हुआ तो उसने एक जवान पाकीजा और निहायत खूबसूरत औरत के साथ शादी कर ली। उसने उसके साथ निकाह कर लिया और एक खूबसूरत और निहायत मुकम्मल मकान किराए पर लेकर उसमें रिहााइश इख्तियार कर ली।
उसके पड़ोस में एक आदमी रहता था जो बला का होशियार था और फरेब में काफी इल्म रखता था। लेकिन उसके पास सिवाय तमाशा बिनी और सुनने के कुछ ना था। वह दिन रात बुरे ख्यालात में पड़ा रहता। खुदा का करना ऐसा हुआ कि एक रोज उसने अब्दुल्लाह की बीवी को देख लिया और उसकी खूबसूरती देखकर हजार चांद से उस पर फैदा हो गया। उस पर आशिक्त हो गया और हरचंद कोशिश करने लगा कि किसी तरह उसकी उस औरत तक रसाई हासिल हो सके। लेकिन उस नेक और सालेह औरत ने उस बुरे आदमी से अपने आप को दूर रखा था और अपनी इज्जत और हुरमत की हिफाजत की।
लेकिन वह आदमी इतना चालाक था कि उस पर दिलो जान से फैदा था और इस जान उसका ध्यान लगा रहता था और दिन रात इसी कोशिश में लगा रहता था कि किसी तरह उसे अपने काबू में ले आए। मगर उसका बस नहीं चला था। जब उसने यह देखा कि उसके सब मकरोफरेब बेकार गए हैं तो कोई तरकीब ना सोच सका तो उसने तरीका यह निकाला कि जबदा के शौहर यानी अब्दुल्लाह से अपनी दोस्ती पैदा की। उससे उल्फत बढ़ाई और ऐसा राब्ता पैदा किया कि चंद ही रोज में वह अब्दुल्लाह उसे अपना सबसे अच्छा और मुखलिस दोस्त समझने लगा और फिर नौबत यहां तक पहुंच गई कि उससे कोई राजपोशीदा ना रखता और कोई काम भी उसे चालाक पड़ोसी के मशवरे के बगैर ना करता था।
एक रोज अब्दुल्लाह ने अपने इस दोस्त यानी अपने चालाक पड़ोसी से कहा, "दोस्त, मुझे लगता है कि मेरी नजर में बहुत फर्क आ गया है। मुझे यह अंदेशा है। मुझे खौफ है कि चंद रोज के बाद मेरी नजर बिल्कुल जाती रहेगी। मेरी औरत जवान है। और मेरे अलावा इस घर में कोई दूसरा आदमी नहीं है। कोई मर्द नहीं जो मेरे माल और दौलत को संभाल सके और हिफाजत से रख सके। और मुझे यह भी डर है कि किसी रोज मेरी औरत की नीत में फर्क आ जाए। वह मुझे धोखा दे जाए। मुझे बेवफा करे और मेरा माल लेकर भाग जाए। मौका पर मेरे माल को नोच ले उड़। मैं चाहता हूं कि उसका कुछ पहले से ऐसा इंतजाम कर दूं कि मेरी दौलत भी हिफाजत में रहे और मेरे बुढ़ापे के लिए मेरे काम आए।"
चालाक दोस्त ने कहा, "तुमने बड़ी दूर अंदेशी और बहुत अकल की बात की है। बिल्कुल तुम्हें उसकी हिफाजत का कोई बंदोबस्त करना चाहिए। मेरे दिल में भी अक्सर यही ख्याल होता है। लेकिन मैं इस डर से यह बात अपनी जुबान पर नहीं लाया कि शायद तुम्हें बुरा ना लगे। तुम अपने दिल में इस बात को बुरा ना ख्याल करो। मेरा मशवरा है कि तुम सिर्फ जरूरी सामान और नकार नकद यानी नकद दौलत अपने पास रखो और बाकी तमाम दौलत और माल उस शख्स के पास रख दो जिस पर तुम सबसे ज्यादा एतबार करते हो। जिसे मुतब्बर समझते हो, जिस पर भरोसा करते हो, जिसे तुम अपना खैर रखवा समझते हो, उसके पास सामान तन यह सब कुछ रख दो।"
अब्दुल्लाह ने कहा, "मेरे पास 5000 दीनार नकद मौजूद है, और मेरे दोस्त, मुझे तो इस दुनिया में तुमसे ज्यादा काबिल एतबार कोई दोस्त नजर नहीं आता और तुम्हारे ऊपर मुझे पूरा पूरा एतबार है। अगर तुम मेरी दरख्वास्त मंजूर करो, तो मैं तुम्हारा बड़ा शुक्रगुजार हऊंगा कि सारी दौलत मेरे पास रख लो। तुम्हारे पास दौलत रखकर मुझे एक और आराम ही रहेगा कि तुम मेरे करीब रहते हो। मेरे पड़ोसी हो। मुझे जिस वक्त भी किसी माल और दौलत की जरूरत होगी, मैं उस वक्त फौरन तुम्हारे पास हाजिर हो जाऊंगा और तुमसे वह ले लूंगा।"
दूसरे चालाक दोस्त ने कहा, "मैं तुम्हारी इस मेहरबानी का शुक्रिया अदा करता हूं कि तुमने मुझे इतना मुतब्बर समझा, इतना भरोसा किया और खुदा ने तुम्हारे दिल में मेरे लिए इतनी मोहब्बत डाली। मैं इसे हासिल करूंगा।" वह बेचारा अब्दुल्लाह इस चालाक दोस्त की बातों में आ गया और 5000 दीनार उसके हवाले कर दिए। और इस तरह की यह किसी तीसरे आदमी को इस बात की भनक तक ना पड़ी।
जब इस बात को एक मुद्दत गुजर गई और अब्दुल्लाह की दोनों आंखों की बीना आई। यानी उसकी दोनों आंखों की नजर जवाब दे गई। तो एक रोज उसने अपनी बीवी से कहा कि मेरे पास तो जमा पूंजी खत्म हो गई है। अब खर्च के लिए कुछ रकम की जरूरत है। तुम मेरे शफकत वाले दोस्त के पास जाओ और उसे मेरा सलाम देना और कहना कि जो रकम मैंने तुम्हारे पास अमानतन रखवाई है उसमें से 500 दीनार मुझे इस वक्त सख्त जरूरत है।
जबदा अपने शौहर के कहने के मुताबिक अपने इस चालाक पड़ोसी के मकान पर पहुंची और उसको अपने शौहर का पैगाम दिया। तो उस चालाक आदमी ने उस औरत की बड़ी खातिरदारी की और उसे बिठाया। इशारा से दी और कहा 500 दीनार की क्या हकीकत है? मैं तो तुम्हारे ऊपर अपनी जान तक निसार कर दूंगा। तुमसे ज्यादा हुस्न जमीन की औरत इस दुनिया में मैंने नहीं देखी है। ऐ औरत मैं तुम्हारे इश्क में एक बरस से मुब्तला हूं और दिलो जान से तुम पर मरता हूं। लेकिन तुमने तो कभी नजर भरकर मुझे नहीं देखा। मेरे पास बैठना तक गवारा नहीं किया। तुम्हारे दिल में मेरे हवाले से इतनी नफरत है। कभी तो हम पर नजर करम करो। तुम्हारा शौहर बिल्कुल नाबीन और बूढ़ा हो गया है। और तुम जैसी हुस्न औरत के काबिल नहीं रहा। यह कैसे हो सकता है कि तुम उस जैसे लाचार बूढ़े और अंधे के साथ खुश रह सको। मेरी मोहब्बत और इल्तफात में कभी कोई कमी नहीं आएगी।
तुम मेरी जवानी उठकर खड़ी हो गई और कहा तुम अजीब नालायका और बेहया मर्द हो बेहूदा इंसान तुमको शर्म नहीं आई कि पराई औरत पर बुरी निगाह डालते हो और ऐसी हमाकत की बातें करते हो मालूम होता है कि तुम्हें खुदा का खौफ बिल्कुल नहीं है। यह कहकर औरत ने चलने का इरादा किया तो वह चालाक पड़ोसी अपने दिल में नादम और शर्मिंदा हुआ और उल्टा गुस्से में आकर कहने लगा ए बेहूदा औरत मेरे सामने से दफा हो जा दूर हो जा और मुझे अपनी सूरत ना दिखाना मैं नहीं जानता कि तेरा शौहर कौन है और उसने कौन सी अमानत मेरे पास रखवाई है। वह तो इस कदर मोहताज और फकीर है। उसके पास 5000 दीनार कहां से आए कि मेरे पास अमानत रखवा दे।
औरत बेचारी नौ उम्मीद और मायूस होकर अपने घर वापस लौट आई और शौहर से बयान किया कि उसका दोस्त इस बात से इंकार करता है कि तुमने उसके पास 5000 दीनार रखे थे। अब्दुल्लाह बेचारा आंखों से अंधा था और बीमारी से निहाल तो सही हो रहा था। बदन में ताकत नहीं थी। इतनी हिम्मत नहीं रखता था कि खुद उठकर उस दोस्त के पास जाए। बीवी से कहने लगा अच्छा तो मेरा दोस्त यह कहता है शहर का हकीम भी मेरा दोस्त है। तुम उसके पास जाओ और इस चालाक पड़ोसी का सर हाल बयान करो। मुझे यकीन है कि इस मामले में वह हमारी मदद करेगा और हमारे दीनार इस चालाक आदमी से हमें वापस दिलवाएगा।
वह औरत बेचारी अपने शौहर के हुक्म की तामील में हसन के पास गई और उसे सर हाल बयान किया। हसन भी जब इतनी खूबसूरत औरत देखी तो फौरन ही उस पर लट्टू हो गया। उसकी उल्फत और इश्क में गिरफ्तार हो गया और उसको बजाहिर लफ्जों से बहुत तसल्ला दी और कहा मैं सब काम छोड़कर अभी तुम्हारे पैसे की वसूली की तस्वीर करता हूं। और खुदा ने चाहा तो तुम्हारी कोढ़ी-कोढ़ी उस बदकिरदार आदमी से तुम्हें एक लम्हे में वसूल करवा दूंगा। बस तुमसे एक बात पूछना चाहता हूं कि तुम्हारा शौहर तो इतना शरीफ और बूढ़ा है, बीमार भी है और अंधा भी है। तुम जैसी जवान और खूबसूरत औरत तुम्हारा दिल कैसे चाहता है कि तुम उसके पास रहो। अगर तुम मेरी उल्फत प्यार करो तो मैं तुम्हें 5000 दीनार दूंगा और उसे आजाद भी करवाऊंगा और जो कुछ तुम्हें और दरकार होगा मैं अपनी तरफ से तुम्हारी खिदमत में पेश करूंगा।
अब्दुल्लाह की बीवी जबदा यह बात सुनकर बहुत रंजीदा हुई और कहने लगी तुम्हें इस बात से क्या सरकार है कि मेरा शौहर जैसा भी है मैं जी मतलब के लिए आपके पास आई हूं अगर आप वह हाल कर सकते हैं तो ठीक है वरना साफ जवाब दे दीजिए मैं सब्र कर लूंगी और अपने घर का रास्ता हूं औरत ऐसी बातें मत कर मेरे पास बैठ और दो बातें सुन औरत का चेहरा यह सुनकर गुस्से से सुर्ख हो गया और चीख कर बोली मैं तुम पर लानत भेजती हूं तुम हो शहर होकर ऐसे बुरी नींद रखते हो जरा ख्याल तो करो कि मैं एक पाक दामन औरत हूं। मगर अब तक मेरी नीत यह है कि मैं उसको अपना मालिक और शौहर समझती हूं। और सच्चे दिल से उसकी तात और फरमानबरदारी करती हूं। खुदा ने तुमको हकीम बनाया है और आवाम पर इंसाफ और बेहतरीन अपना काम करो। तुम दूसरों की औरतों पर गलत निगाह डालते हो और हरामकारी और बदकारी पर कमर बस्ता रखते हो।
जबान से सुन तो गौसे में अब से बाहर हो गया और कहा औरत तेरा शौहर कहां का नवाब है कि 5000 दीनार किसी के पास जमानत रखे तू बड़ी तेज जबान और जवानदार है और मेरे सामने ऐसी गुस्ताखी से बात करती है अभी मेरे मकान से निकल जा और फिर कभी इधर का रुख ना करना वह औरत बेचारी आंसू बहाती सर झुकाए अपने मकान पर आई और शौहर से कहा कि हसन हमारे मुआले में हाथ नहीं डालता वह अब्दुल्लाह बेचारा यह सुनकर दम बहुत रंज हुआ। थोड़ी देर के बाद औरत से बोला कि तू उमर के पास जा और उससे यह हाल बयान कर। शायद वह हमारी दाद रस्सी करे क्योंकि मैंने उसका काम बहुत बनाया है और मुझे बड़ी मेहरबानी से पेश आता था।
औरत उमर के रूबरू गई और अपना माजरा सुनाया। बड़ी खंदा पेशानी और मेहरबानी से उसका हाल सुना और कहने लगा तुम दिल जम रखो। यह कौन सी बड़ी बात है? मैं अभी उसे बाजार से तुम्हारे दीनार वापस दिलवा दूंगा। और जो तुम्हारा इरशाद होगा बस सरोज कम बजाना होगा। मगर यह तो कहो कि तुम्हारा शौहर तो अंधा हो गया है। बूढ़ा है। तुम्हारा उसके साथ गुजर कैसे होता है? तुमको अल्लाह ताला ने इतना हसन दिया है कि जो अमीर और रईस को चाहे एक दम में तुम्हारा गुलाम बन जाए तुम्हारा हो जाए। तुम्हारा जोबन देखकर तो मेरे होश जाते रहे। जरा मेरे करीब आओ और मेरे दिल को तस्कीन दो।
और इतनी ही कलम सुनकर कहा उमर साहब जरा अपनी सफेद दाढ़ी को देखिए और अपने का ख्याल कीजिए। आपके लायक यह बातें नहीं है। क्या हराम हल में आप तमीज नहीं कर सकते? यह हल हराम का फरकर आपके नजदीक कुछ नहीं रखता। ऐसा मालूम होता है कि आपने अपनी ईमान को बनाए तक रख दिया है जो आपकी नीत ऐसी बुरी हो गई है और ऐसी नाजायज और खिलाफ शरीयत अजीब बातें आपकी जुबान से निकलती है।
उमर यह बातें सुनकर निहायत गुस्से में आ गया और कहा औरत क्या डर डरात करती है तो उसको मालूम नहीं कि मैं कौन हूं और क्या इख्तियार रखता हूं। चलिए यहां से निकल और खबरदार फिर कभी मेरे पास ना आना। वह अब्दुल्लाह की बीवी बेचारी परेशान उठकर उमर को अपने दिल में गालियां और बद्दुआएं सुनाती। वापस अपने घर आई और अपने शौहर से कहा कि तुम मुझे नाक जलील करते हो। दुनिया में कोई दीन ईमान नहीं रहा और इंसाफ तो बिल्कुल खत्म हो गया है। हकीमी के दिल से बिल्कुल इंसाफ निकल गया है।
अब्दुल्लाह को यह हाल सुनकर बहुत दुख हुआ। आखिरकार अपनी बीवी से कहा कि तुम खालिद को भी जाकर आसमान लो। वह मेरी मोहब्बत और दोस्ती का क्या हक निभाते हैं। मैं बरसों उसके लिए उमदा उमदा और कीमती कीमती चीज तैयार करता रहा और मजदूरी के तौर पर उससे कुछ नहीं लिया। अगर उसने मेरी खिदमत को भुला नहीं तो उम्मीद है कि हमारी दाद रस्सी जरूर करेगा। हमारी मदद करेगा।
औरत कहने लगी मुझे तुम्हारी हुक्म की तामील में कुछ गुजर नहीं। जो कुछ कहोगे बजा लाऊंगी। लेकिन मेरा दिल गवाही नहीं देता कि जब हसन और उमर दोनों की नींद खराब है। दोनों ने इंकार कर दिया तो खालिद से हमारा मतलब हाल होगा। लेकिन ठीक है उसको भी आजमा लेने में कोई हरज नहीं। दिल में अंदेशा ना रहे। यह कहकर अब्दुल्लाह की बीवी अपने मकान से रवाना हुई और खालिद के पास पहुंची।
खालिद की तबीयत भी उसकी सूरत और परी पिककर को देखते ही उसकी जान से मिल गई। पूछा ए नाजनीन तुम्हारा नाम क्या है? और मेरे पास कैसे आने की तकलीफ की? औरत ने उसको रूबरू भी अपनी सारी दास्तान सुनाई। खालिद ने बड़े गौर से उसका सर हाल सुना और कहने लगा, "मैं तुम्हारा गुलाम हूं। तुम्हारे हुक्म की तामील फौरन बस चालाक मर्द से तुम्हारे सारे दीनार वापस दिलवा दूंगा और उसको ऐसी सख्त सजा दूंगा कि सारी जिंदगी याद रखेगा। एक बात मेरी कबूल करो कि तुम आज मेरे मकान बराबर रहो और मेरे दिल को अपने मिलन से खुश करो।"
अब्दुल्लाह की बीवी को खालिद की बात सुनकर बहुत गुस्सा आया और उसको हजार गालियां दी और जो कुछ जुबान पर आया उसे कह दिया और उसके मकान से नौकरी वापस अपने शौहर के पास पहुंची और रोई कि इस दुनिया में अब हमें इंसाफ की तवकु नहीं रखनी चाहिए। तुम क्यों मुझे रुसवा और जलील करने पर तुले हुए हो। सब्र करो और जिस तरह हो अपनी उम्र बसर करो। अपनी जान पर करके खामोश हो जाओ। मगर रुपए की आज बड़ी बुरी हालत है।
थोड़ी देर बाद औरत से बोला, "बीवी यूं तो अपने दिल को सब्र नहीं आता। कुछ ना कुछ तरकीब जरूर करनी चाहिए। वरना दम मेरा इसी हसरत और रंज में निकल जाएगा।" जबदा ने कहा तुम जो कुछ फरमाओ मैं करूंगी। उसने कहा अहमद शहर बाकी रह गया है। उसके पास भी होना चाहिए कि शायद उससे हमारा हाल बयान करें तो कोई सूरत कामयाबी की निकल आए।
औरत बेचारी ने अपना बुर्का संभाला और अहमद शहर की खिदमत में जा पहुंची। मगर वहां भी वही बात हुई जो पहले हसन, उमर और खालिद के यहां हुई थी। कास्सा मुखतसर औरत ने वापस आकर शौहर को समझाया कि तुम अपने 5000 दीनारों का ख्याल दिल से निकाल दो और मजदूरी करके कुछ ना कुछ जिंदगी गुजारे और पेट भरने की तदबीर करो। हमारे दीनार तो हमें मिलने से रहे।
अब्दुल्लाह बेचारा अपनी आंखों में आंसू भर लाया और कहने लगा मैंने अपनी सारी उम्र मेहनत और मशक्कत करके यह 5000 दीनार पैदा किए थे कि बुढ़ापे में अपनी जिंदगी आराम से बसर करूंगा। अब यह कलेक्टर मेरी वह सारी कमाई बर्बाद हो गई। अब मेरी तबीयत में कार कैसे रहेगा? मेरी जिंदगी अब तबाह हो गई है और मैं चाहता हूं कि खुदा जल्द जल्द दुनिया से उठा ले।
औरत को अपने शौहर की हालत अज़ार पर बड़ा अफसोस हुआ और दुख हुआ। रोई और अपने दिल में कहने लगी खुदा ने चाहा तो इस चालाक पड़ोसी और उम्र वगैरह से ऐसा बदला लूंगी उनकी हरामजदगी और बेईमानी का कि वह याद करेंगे। अपने शौहर से कहने लगी कि तुम चंद रोज सब्र करो और अपनी तबीयत को याद रखो। मैंने एक तरकीब सोची है। अगर बन गई तो इन सब बदमाशों को ऐसा मजा चखाऊंगी कि तमाम उम्र ना भूलेंगे।
यह कहकर अब्दुल्लाह की बीवी बाजार में गई और एक संदूक साज से कहा कि मुझे एक ऐसा संदूक बना दो जिसमें चार बड़े-बड़े खाने हो और हर खाने में इस कदर गुंजाइश हो कि एक आदमी आराम से उसमें बैठ सके और हर खाने का कुंडा अलग होना चाहिए। संदूक साझ ने कीमत मुकर्रर करके कहा कि बहुत अच्छा। आज शाम तक मैं यह संदूक तैयार कर दूंगा।
औरत अपने मकान पर वापस आई और अपनी कनीज को हुक्म दिया कि मकान को साफ करके फर्श पर अच्छी सी कालीन बिछा दो और सुबह चंद लजीज किस्म के खाने तैयार करके रख दो। शाम को संदूक तैयार होकर आ गया। तब जबदा खूब बना श्रृंगार करके और खूबसूरत साफ सुथरे कपड़े पहनकर उस चालाक पड़ोसी के पास पहुंची जिसे उसके शौहर ने 5000 दीनार अमानत के तौर पर रखे थे। वह उसे देखकर बड़ा हैरान हुआ। वह बड़ी निगाहों से कहने लगी कि तुम बड़े अच्छे इंसान हो। जरा से इम्तिहान में पूरे उतरे। मैंने तुम्हारे साथ बड़ी तिरछी और कड़वी बातें की। मुझे बाद में बड़ा दुख हुआ। मुझे मालूम होता कि तुम इतने अच्छे हो तो ऐसी बातें हरगिज़ ना करती। मैं चाहती हूं कि तुम मुझे जो सजा देना चाहो दे लो। मेरे दिल में बहुत रंज है और मैं इस कसूर के तुम्हारी खिदमत में हाजिर हुई हूं और तुम्हारी तबीयत को खुश करना चाहती हूं। मैंने कल तुम्हारे लिए दावत तैयार की है अपने मकान पर। सुबह तो वहां तशरीफ लाना और मुझे शुक्रिया का मौका देना।
वह चालाक पड़ोसी जो अब्दुल्लाह की बीवी पर पहले से ही बहुत मरता था। उसकी बातें सुनकर उसकी बातों ही में आया। हंसकर बोला ऐ जान मैं हकीकत में तुम्हारे इस अदा को नहीं समझा था। मुझे बड़ा कसूर हुआ कि तुमसे ऐसी बदजबानी से पेश आया। तुम खुदा के लिए ऐसी बातों को अपने दिल में कुछ ख्याल ना करना और मुझे अपना खादिम और गुलाम समझना। मैं तुम्हारे कहने के मुताबिक सुबह तुम्हारे मकान पर हाजिर हो जाऊंगा और जो कुछ तुम्हारा हुक्म होगा दिल और जान से बजाना होगा।
बजबदा वहां से रुखसत होकर हसन के घर पर पहुंची और उससे कहा कि रहते दिल जिस वक्त से मैं तुम्हारे मकान से गई हूं तुम्हारी सूरत हर वक्त मेरी आंखों के सामने है और मैं अपने दिल में शर्मिंदा हूं कि उस रोज मेरी जुबान से तुम्हारे लिए ऐसे गौलत कलमात निकले बस मैं शर्मिंदा होकर अब तुम्हारे पास वापस आई हूं इस बात की उम्मीद रखती हूं कि मैं एक सर्वर हूं माफी के लिए। मैं चाहती हूं कि कल सुबह मेरे मकान पर आप कम राझे फरमाएं और आपकी दावत करना चाहती हूं। फिर वह हसन के बराबर बैठ गई और उसके हाथों पर बोसा दिया। हसन उस हुस्न औरत की यह दिल नवाजी देखकर एकदम से उसके दाम उल्फत में गिरफ्तार हो गया। कहने लगा जहां नसीब की तुम जैसा माशूक और ऐसे दिलदारी करें। मैं जरूर तुम्हारे कहने के मुताबिक कल सुबह तुम्हारी दावत पर आ जाऊंगा।
औरत वहां से भी रुखसत हुई और उमर की खिदमत में पहुंची और कहने लगी मैं आपकी लौंडी मेरा कसूर माफ कर दे तमाम उम्र आपकी बंदगी में गुलामी में रहूंगी और कल आपके लिए कुछ दावत का सामान मैंने अपने मकान पर किया है। बारम मेरी दावत कबूल फरमाइए। उमर साहब उस खूबसूरत औरत से यह हाल सुनकर बहुत खुश हुए और अपने लिबास में फूल ना समेटे। उस अब्दुल्लाह की बीवी से कहने लगे कि हमारी तौबा जो हम तुम्हारी दावत का इंकार करें। मैं तो तुम्हारा मुती और फरमानबरदार हूं। जैसा तुम्हारा इरशाद होगा बजा लाऊंगा। जिस वक्त कहो कि तुम्हारे मकान पर चलाऊंगा। औरत ने कहा हुजूर कल सुबह के वक्त तशरीफ लाए। यह कहकर उसने उमर की दाढ़ी को बड़े अंदाज से बोसा दिया और उससे रुखसत हुई और खालिद के मकान पर आई और उससे कहा हुजूर जिस दिन से मैंने तुम्हारा दिल दुखाया। तुम्हारे साथ ऐसी बातें की मुझे रात भर नींद ना आई ना दिल को आराम है जिस रोज आपकी खिदमत में हाजिर हुई थी मेरी जुबान से इतने मौजूद फंस आपके लिए निकले थे आप उनका कुछ ख्याल ना कीजिए और मुझे अपनी खनिजों में शुमार करें खालिद ने कहा व्लाह मुझे तुम्हारी उस रोज की बात का कुछ ख्याल नहीं है बल्कि मैं खुद शर्मिंदा हूं कि मैंने उस वक्त तुम्हें दुखी किया और चाहता था कि खुद तुम्हारी खिदमत में पहुंचकर तुमसे माफी मांगू मैं तुम्हारे तुम्हारे हुस्न एक लाख का कमाल मममानून और शुक्रगुजार हूं और तुम्हारे लिए दिलो जान फिदा करने को तैयार हूं।
अब्दुल्लाह की बीवी ने कहा आप मुझे क्यों शर्मिंदा करते हैं? मैं तो खुद शर्मिंदा हूं और नादम हो और क्योंकि आपके मकान पर दिल खोलकर अपना हाल दिल कहने का मौका नहीं मिल सकता। इसलिए मैंने यह राह निकाली है कि कल आप मेरे मकान पर तशरीफ लाए ताकि मैं आपकी खिदमत बजा लाऊं। मैंने आपके लिए दावत रखी है और छकना कहा बेहतर है मुझे क्या एतराज है तुम्हारे कहने के मुताबिक मैं कल हाजिर हो जाऊंगा अब्दुल्लाह की बीवी जबदा वहां से भी रुखसत हुई और अहमद शहर के पास आई और उसके कदमों पर गिर कर और उसके सामने हाथ जोड़कर कहा ऐ वली यह शहर मुझे ऐसा कसूर आपकी खिदमत में समझता हुआ मैं बहुत शर्मिंदा और नादम हूं मगर आपकी जात की बरकत से बड़ी उम्मीद माफी की लाई हूं। मेरे दिल में यह ख्याल था कि मैंने उस दिन बड़ी मौज की हरकत की है। आपके लिए कुछ खाने पीने की दावत का इंतजाम मैंने अपने मकान पर किया है। मैं उम्मीद करती हूं कि कल सुबह आप
मेरे मकान पर कम रझा फरमाएं और मेरे गरीब खाने को इज्जत बखशे, रौनक बखशे और मुझे अपना मून फरमाएं। आपके मकान पर ऐसा मौका नहीं मिल सकता कि फुर्सत से बैठकर अपने दिल मुस्ताक की हसरत निकाल सकूं। क्योंकि यहां तो हर वक्त दरबार लगा रहता है। इसलिए मैंने बहुत सोच कर तरकीब निकाली है। अगर आप मेरे मकान पर आ जाए तकलीफ तो होगी। मगर उम्मीद रखूंगी कि आप जरूर कर दीजिए।
अहमद यह शहर यह सुनकर बहुत खुश हो गया और कहने लगा कि तुम बड़ी अकलमंद हो और दूर अंदेश तुमने यह तजवीज निकाली है। मैं जरूर इंशा्लाह ताला तुम्हारे कहने के मुताबिक सुबह तुम्हारे घर पर हाजिर हो जाऊंगा।
अब्दुल्ला की बीवी इस अजीम काम को सर अंजाम देकर वहां से खुशख अपने घर वापस आ गई। अपने मकान पर पहुंची और अपनी कनीजों के इंतजाम में दावत मेहमान डारी में मशरूफ हो गई और अपने मकान को खूब सजाया। बहुत से लजीज खाने तैयार करवाए और मशरूबात तैयार करवाए हुए और करीना से उन्हें रखा और फिर रात से उठकर अपने वतन को निहायत नफीस लिबास और जेवरात से आरास्ता किया। खूब सर्च की।
उनके चालाक पड़ोसी हसन उमर को रात भर उस हुस्न औरत की याद में नींद ना आई। रात भर बेचारे पलंग पर पड़े तारे गिनते रहे और दुआ मांगते थे कि इलाही यह रात जल्दी खत्म हो जाए और हर शख्स अपने दिल में इस बात पर नाजा था कि ऐसी नाजनीन परी चेहरा हमारे हाथ लगी है।
गज जब सुबह हुई तो चालाक पड़ोसी बड़ी खूबसूरत पोशाक पहनकर और बदन में इतर इत्र लगाकर खुशबू लगाकर और 100 दीार जेब में डालकर अब्दुल्लाह के मकान पर आया। वह अब्दुल्लाह की बीवी पहले से तैयार होकर इंतजार में बैठी थी। जिस वक्त उसको उसके आने का पता चला तो उठकर उसका इस्तकबाल किया और उसे एक उम्मदा कमरे में ले जाकर मसनद पर बिठाया और कमरे का दरवाजा बंद कर दिया। अपने साथ लाया था। उसकी नजर अब्दुल्लाह की बीवी ने अपनी कनीजों से शरबत और मेवे मंगवाकर उसके सामने रखे और फिर दावत का सामान मौजूद हुआ और जाबदा और चालाक पड़ोसी दोनों बैठकर खाने में मशरूफ हो गए।
जब उसे फुर्सत हुई तो औरत ने चालाक से कहा कि आज का दिन तुम यही मेरे पास रहो। आो इशरत में गुजरो। बेहतर यह है कि तुम अपनी कीमती पोशाक उतार कर फारग से बैठो। चालाक पड़ोसी ने औरत के कहने के मुताबिक अपनी दस्तार और कीमती पोशाक उतार दी और अपनी कनीज को देखकर कहा कि इनको दुरुस्त करके एक बक्स में बांध कर रख दे और फिर उसे चालाक की खातिरदारी और तवज्जो में मशरूफ हो गई।
इसी असना में कनीज ने जिसको पहले से जबदा से कह रखा था दरवाजे पर दस्तक दी। औरत ने उठकर कहा बात है मिलने के लिए आया है आपके शौहर के पास है और कहने लगी कि आप थोड़ी देर के लिए मुझे इजाजत दें। मैं अपने भाई को तलाक करके अभी जाती हूं। चालाक पड़ोसी ने कहा, बहुत अच्छा देर ना लगाना जानमन। मुझ में अब ताकत नहीं रही कि तुमसे जुदाई और सह सकूं। जल्द आकर अपने मिलन से मुझे फैजियाब करना।
औरत ने हिजड़े से बाहर निकालकर कमरे का कुंडा लगाकर उसे बंद कर दिया और संदूक के खाने वाला मंगवाकर हुजूर के बराबर रख लिया। इतनी देर में हसन पहुंचा और दरवाजे पर दस्तक दी। जबदा कनीज को भेजकर मकान का दरवाजा खुलवाया और खुद दरवाजे पर जाकर इकराम से अपने साथ लेकर अपने पहलू में बिठा लिया और मोहब्बत की बातें उससे करने लगी। फिर उसके लिए भी खाना मंगवाया और खाने से फौरग होने के बाद कहा कि आज आपको दिन भर और शब तक अपने मकान पर रखूंगी। तकलुफ दूर कीजिए और अपना खूबसूरत लिबास उतार कर आराम से बैठ जाइए। और फिर उसने कपड़े उसके उतार दिए। उसके बाद अब्दुल्लाह की बीवी ने एक खूबसूरत पलंग बिछाया और उससे कहा हसन साहब आप इस पर आराम फरमाइए। हसन उस पर लेट गया और जिबदा से बोला कि तुम भी आराम करो। वह बोली अच्छा हासिल होती हूं।
यह दोनों इसी गुफ्तगू में थे कि उमर साहब ने दरवाजा खटखटाया। कुंडा मटका और ने कहा कौन है? उमर ने कहा मैं हूं। औरत ने फिर कहा अपना नाम बताओ कौन हो? उमर ने कहा मैं उमर शहर हूं। तो घबराकर औरत से कहने लगा कि यहां क्यों? साहब मेरे शौहर के दोस्त हैं। उनकी खबर हाल पूछने आए हैं। मैं क्या करूं? औरत ने कहा आप यह जो बराबर में संदूक रखा है उसके खाने में चुप कर बैठ जाइए। हसन बेचारा बहनों संदूक के खाने में जा बैठा। औरत ने ढकना संदूक का बंद करके ताला लगा दिया। और फिर उमर साहब के पास बड़ी निगाहों से गई और उसका हाथ पकड़ कर मकान में अपने साथ ले आई। तमाम दिन भर ऐश कीजिए और रात को भी यही आराम फरमाइए। यह खाकर खाना मंगवाया और उमर को खिलाया। जब उमर खाना का चुका तो औरत ने उमर से कहा आप अपने खूबसूरत कपड़े पोशाक उतार कर रख दें और बगैर तकफ उसे अपना घर समझकर बेफिक्री के साथ यहां रख दें। उमर ने कहा बहुत खूब। मैं ऐसा ही करूंगा। मगर जुदाई की ताकत मुझ में नहीं। तुम अब तक को कम में ना लो और मेरे साथ आराम करो। और अपने कहा मुझे का रहा है मैं हाजिर हूं। बस उमर ने अपने तमाम कपड़े उतार कर औरत को दिए। उसने अपनी एक सपोर्ट की और पलंग पर आराम किया।
इस वक्त खालिद ने आकर दस्तक दी। औरत ने पूछा कौन है? उसने जवाब दिया कि मैं शहर का खालिद हूं। उमर खालिद का नाम सुनकर मारे खौफ के पलंग से छलांग लगाकर जमीन पर गिर पड़ा और कहा ला हौल वला कुत इला बिल्लाह। इस वक्त यह शैतान यहां क्यों आया? और घबराकर औरत का बाजू पकड़ लिया और कहा मैं मारा गया खुदा के लिए कोई तदबीर निकालो कि मुझे खालिद देख ना ले वरना मेरी तमाम इज्जत खाक में मिल जाएगी औरत ने कहा आप क्यों फिक्र करते हैं आप इस संदूक के खाने में जा बैठे मैं थोड़ी देर में उसको रुखसत करके तुम्हारे पास वापस आई हूं उमर का बदन खौफ से कांपने लगा और उसे बोला नेटवर्क कहानी खालिद को मेरे यहां आने की तूने खबर तो नहीं कर दी उसने कहा तलवार यह आप क्या सोच रहे हैं। उसकी बीमारी का हाल सुनकर उसके लिए आया होगा। जरा सी देर में वापस चला जाएगा। यह कहकर उमर को औरत ने संदूक के दूसरे खाने में बंद कर दिया और ताला लगाकर खुद खालिद के इस्तकबाल के लिए दरवाजे पर गई और देखा खालिद खूबसूरत पोशाक पहने और खुला सर पर सजा बड़े शौक से खड़ा था। औरत ने कहा साहब मैं तो आपके इंतजार में बड़ी देर से बैठी थी। आप बड़ी देर से तशरीफ लाए। खैरियत थी। खालिद कहने लगा कि मुझे तुम्हारे मिलन की इश्तिया में रात भर नींद ना आई तो पिछले पहर आंख लगी थी इसलिए सुबह जरा देर से उठा माफ करना मुझे बड़ा दुख है कि तुम्हें मेरा इंतजार करना पड़ा औरत ने कहा आप उसके बारे में कुछ ना सोें और जल्दी से अंदर आ जाइए मुझे तो बड़ी खुशी है कि आप आ गए खालिद ने जो यह नवाजिश औरत की तरफ से अपने हाल पर देखी तो उसको दिल में यकीन हो गया कि यह औरत मुझे दिल में चाहती है। बस उसकी गर्दन में हाथ डालकर कहा मुझे खुशकिस्मत आदमी इस दुनिया में दूसरा नहीं होगा जिसे ऐसा महबूब दिलरुबा मिले और मुझे ऐसी उल्फत और मोहब्बत करेगा और बातें बनाकर ले लिया और कपड़े खालिद ने 500 दीनार जो अपने साथ लाया था अब्दुल्लाह की बीवी को दिया और कहा ए वफादार यार अब तो मेरे पास आकर मेरी मुराद पूरी कर औरत ने कहा आप जल्दी क्यों करते हैं जरा दम तोल आज का दिन और रात आपकी मेरे ही लिए है। यह कहकर उसको इस कदर देर तक बातों में मशगूल किया कि अहमद शहर ने आकर दरवाजे पर दस्तक दी। खालिद उसकी आवाज सुनकर दम बहुत हो गया और हैरान परेशान होकर भागने का इरादा किया तो औरत कहने लगी आप घबरा क्यों गए? खालिद ने कहा, तुम्हारी मोहब्बत और दोस्ती पर लानत है। तुमने मुझे दुश्मन के हाथ गिरफ्तार करवा दिया। औरत ने कहा, "आपका ख्याल गलत है।" हुजूर अहमद, यह शहर मेरे शौहर से बहुत मोहब्बत करता है दोस्तों का। उनकी बीमारी का हाल सुनकर उसको देखने के लिए आया है और कोई बात नहीं है। खालिद ने कहा कि अब मैं क्या करूं और इस बला से कैसे पीछा छुड़ाऊं। औरत बोली, एक लम्हे के लिए जरा संदूक में चुप जाइए। खालिद दौड़कर संदूक के खाने में जा बैठा। औरत ने उस तीसरे खाने को भी ताला लगा दिया और अहमद शहर को बड़े आराम से इस्तकबाल करके अपने मकान में ले आई। अहमद ने हजार दीार औरत को दिया और कहा मैं तुम्हारी जुदाई में रात भर तड़पता रहा। सुबह ही चाहता था कि अपने वादे के मुताबिक तुम्हारे पास पहुंचूं। बस मेरी बदकिस्मती कि बादशाह ने मुझे याद कर लिया और उसकी खिदमत में हाजिर रहा और अपने दिल में शर्मिंदा था कि तुम्हें वक देकर वक पर ना पहुंच सका और तुम्हें इंतजार करना पड़ा। मुझे तुमसे मोहब्बत की उम्मीद है मुझे माफ कर दो। औरत ने कहा आप क्यों शर्मिंदा करते हैं? मुझे बहुत खुशी है कि आपने मुझे याद किया। मैं तो आपकी खाद हूं। अब कुछ ख्याल ना करें और बगैर तकलीफ इस पलंग पर आराम फरमाए और मुझे तसल्ली दें। लोगों को अपने मिलन से मसरूर करें। इस तरह पर दर्स हो गया। औरत ने कहा आपकी मेज कीमती पोशाक कपड़े खराब हो जाएंगे। तकलुफ दूर कीजिए और कपड़े उतार कर आराम से बैठिए बैठिए। अहमद शहर ने फौरन अपने कपड़े उतार दिए और पलंग पर लेट गया। औरत ने अहमद शहर के भी कपड़े कनीज के हवाले किया और उसके कान में कहा कि जैसा मैंने तुझको समझा रखा है। तू जाकर बाहर से दस्तक दे। और जब मैं पूछूंगी कि कौन है? तो कहना कि मैं तुम्हारा भाई हूं। बस का नहीं। कोई हिदायत करके जबदा अहमद शहर के पास आई और उससे बातें करने लगी। इसी दौरान में कनीश ने बाहर जाकर दरवाजे पर दस्तक दी और जबदा ने पूछा कि ए बाहर कौन है? तो जवाब मिला कि मैं तुम्हारा भाई हूं। दरवाजा खोल दो। औरत ने अहमद शहर से कहा कि मेरा भाई आया है। मुझे इजाजत दीजिए कि मैं जरा उसे वापस भेज दूं। अहमद शहर का मैं इस नंगी हालत में मकान में कैसे बैठा रहूंगा? औरत ने कहा, थोड़ी देर के लिए तकलीफ तो होगी मगर मुतासिब होगा कि आप इस संदूक के अंदर जाकर थोड़ी देर के लिए बैठे। मैं अपने भाई को रुखसत करके आपकी खिदमत में हाजिर हो जाऊंगी। अहमद शहर ने कहा, मजबूरी है पास। वह संदूक के चौथे खाने में जाकर बैठ गया और औरत ने ऊपर से ताला लगा दिया।
जब औरत ने उन चारों शख्सों को हसन उमर खालिद और अहमद शहर को अपनी कैद में ले लिया तो उसे मकान से चलकर कमरे में जहां वह चालाक पड़ोसी बैठा हुआ था उसके करीब आकर बैठी और उसकी गर्दन में हाथ डालकर कहने लगी मुझे हर दम तुम्हारी निस्बत कोई ना कोई कसूर हो जाता है। मैं बहुत शर्मिंदा हूं। माफ करना। मेरा भाई जिस वक्त से आया था, मैं हजारों तक की बेकार हो चुकी हूं कि किसी तरह से वापस रुखसत कर दूं। मगर वह तो जमकर बैठ गया है। हरगिज नहीं मान रहा। अब हजार मुश्किल से मैंने उसको रुखसत किया है। चालाक पड़ोसी ने कहा, इसमें तुम्हारा क्या कसूर हो गया? तुम्हें इस बात का कुछ ख्याल ना करो। मुझे कुछ तकलीफ नहीं। आराम से यहां बैठो। मगर तुम्हारी जुदाई का गम मुझे बर्दाश्त नहीं होता। अब तुम खुदा के लिए कहानी चली ना जाना। औरत ने कहा, भला ऐसा हो सकता है। मैं तो तुमसे ज्यादा तुम्हारे लिए बेकरार हूं। बाकी सारा दिन और तमाम रात तुम्हारी खिदमत में हाजिर हूं। यह कहकर कमाल अंदाज से अपना हाथ उसकी गर्दन में डाला और उसको कमरे के अंदर से संदूक के पास ले आई और कहा कि यह पलंग और यह शबी यह सब तुम्हारे हंस के लिए मुहैया कर रखे हैं। चालाक पड़ोसी ने कहा तुम कहां तक मुझे अपनी तारीफ करवाओगी? मैं तुम्हारी कोई बात दानिशमंदी से खाली नहीं देखता। लो अब आओ देर क्यों लगती हो? मैं बहुत बेताब हूं तुम्हारे लिए। औरत ने कहा साहब तुम बहुत जल्दबाज हो। ऐसे क्यों घबरा रहे हो? जी मैं तो खुद तुम्हें यहां बड़ी मुराद और ख्वाहिश से लाई हूं। तुमको अपने मतलब की तो खूब सोच रही है। यह फरमाओ कि मेरे 5000 दीनार का भी कुछ फिक्र है तो मैं या नहीं। तुमने वादा किया था कि अगर मैं तुम्हारी आरजू पूरी करूं तो तुम मेरे 5000 दीनारों में कोई जरा भी तामील नहीं करोगे। अब पहले अपना वादा पूरा कीजिए। चालाक पड़ोसी ने कहा जान मन मैं कस वक अपने वादे से मुकर हूं। तुम यह तन क्यों देती हो? मेरे पास 5000 दीनार तो तुम्हारी अमानत है। वह तुम्हारे हवाले कर दूंगा। और 5000 दीनार मैं तुम्हें अपनी तरफ से दूंगा। तो फिर के तौर पर मगर अब वक्त निकल रहा है। खुदा के लिए मेरे पास पलंग पर आओ और मुझे अपने मिलन से याद करो। और रब ने कहा साहब मैं तो एक औरत नादान और बेवकूफ हूं और आप इतने समझदार और चालाक हैं मगर इतना दिल में मैं भी समझती हूं कि जब तुम्हारी मुराद पूरी हो जाएगी तो फिर तुम्हारी निगाहों में मेरी कोई कद्र और अहमियत ना रहेगी और ना मालूम कि तुम्हारी नीत में क्या फर्क आ जाए। इसलिए मेरी गुजारिश है कि जैसा मैं अपना वादा पूरा करने पर तैयार हूं। तुम भी वह 5000 दीनार मंगवाकर मेरे सामने रख दो। चालाक पड़ोसी जो कि मस्ती में भारत हुआ था। बोला ए औरत तुम्हें इस वक्त ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए। तुम्हें जब नहीं देती थोड़ी देर के लिए मेरा एतबार कर लो। मैं कसम खाकर कहता हूं कि अभी यहां से फारगा होकर तुम्हारे 5000 दीनार तुम्हारे पास भेज दूंगा। और ने कहा खैर मैं तुम्हारा कहना मान लेती हूं। मगर तुम मेरे पास इकरार करो कि तुम्हारे पास मेरे 5000 दीनार अमानत रखे हैं। और तुम वह देने में जरा भी तामल नहीं करोगे तो मैं उनके देने में कोई ऐतराज नहीं। और यह मकान और संदूक और हसन उमर और खालिद अहमद यह शहर यह सब उसके गवाह हैं। इस वक्त कर लिया। तब औरत ने कहा, अब आप सोच रहे हैं मैं चलने जहां पहले से बैठे थे क्योंकि यह मकान खाली हुआ है। यहां पर था मुतासिब नहीं। यह कहकर पलंग लपेट कर उसकी बगल में दी और कहा, "मैं दरवाजा बंद करके अभी तुम्हारे पास आई हूं।"
यह कहकर वह अब्दुल्लाह की बीवी मकान से गहराई और अपने पड़ोसियों से कहने लगी कि मेरे मकान में एक चोर आकर घुस गया है। उसकी गिरफ्तारी के लिए आप मेरी मदद कीजिए क्योंकि मेरा शौहर ना बीन और बीमार है और कोई मर्द मेरे घर में नहीं है। औरत ने इस तरह वाबवीला किया तो पांच आदमियों को इकट्ठा करके अपने मकान पर ले आई और अपनी कनीजों को जिन्हें पहले वह सिखा गई थी। उन्होंने जब देखा कि कुछ मर्द उसके साथ आ रहे हैं तो उन्होंने चोरचोर करके शोर मचाना शुरू कर दिया। गरज यह कि लोगों ने मकान में आकर देखा कि वह चालाक पड़ोसी नंगे बदन लंगोट बंधे हुए कपड़ों की गठरी बगल में दबे वहां बैठा हुआ था। सब के सब उसके ऊपर गिर पड़े और उसको दाढ़ी पकड़ कर लात और गहूं से थप्पड़ जूते से ऐसी उसकी खबर ली कि वह बेहोश होकर जमीन पर गिर पड़ा। थोड़ी देर बाद जब उसको होश आया लोग उसको पकड़ कर जब वह गली में बाहर उसे मोहल्ले के करीब पहुंचे जहां उस चालाक पड़ोसी का मकान था तो पड़ोसियों ने उसको पहचान लिया और फिर बड़ी खुशामद करके उसको छोड़ दिया।
इसी दौरान अब्दुल्लाह की बीवी शोर मचा रही कि इस मालूम ने मेरे 5000 दीनार ले रखे हैं। लोगों ने समझा कि औरत का मतलब यह है कि 5000 दीनार चालाक पड़ोसी ने चोरी किए हैं। सब ने जो गठरी उसकी बगल में थी उसे लेकर खोली और जबदा को देखकर कहा कि तुम गलत कहती हो कि अगर तुम्हारे दीनार चोरी करता तो सिवाय कपड़ों के और कहां रखता था। औरत ने लोगों के कहने पर कुछ तवज्जो की और उस चालाक पड़ोसी को पकड़े बराबर फरियाद करती हुई बादशाह की खिदमत में ले गई और अर्ज किया कि जहां पनाह इस बदकिरदार इंसान ने मेरे ऊपर बड़ा सितम किया है कि मेरे 5000 दीनार जो मेरे शौहर ने उसके पास अमानत रखे थे नहीं देता बादशाह ने कहा तो इसे मेरे पास क्यों लाई है तो इसे मुझे नहीं मिला फरमाता तो काजी के पास ले जाती औरत बोली जहां अपना मकान पर नहीं है बादशाह ने कहा उमर भी नहीं मिला तो तुझे इसे खालिद के पास ले जाना चाहिए था। ने गुजारिश की हुजूर खालिद भी गायब है। बादशाह ने कहा तेरी बात मेरी समझ में नहीं आई कि तीनों मूसिस और अकेले सल्तनत एकदम से गायब हो जाए। मगर मैं तेरी बात मान भी लूं तो फिर तुझे इसे अहमद शहर की अदालत में ले जाना लाजिम था। औरत ने कहा हुजूर को यकीन नहीं आएगा लेकिन मैं अहमद या शहर की अदालत में भी गई। वह भी नहीं थे। बादशाह यह सुनकर हैरान हो गया और गुस्सा होकर औरत से कहा तू बड़ी बेअदब और गुस्ताख है कि ऐसे बेगाना तौर से मेरे हुजूर में झूठ बोलती है। भला यह कैसे सोचा जा सकता है कि हसन सब एक ही बार सब गायब हो गए हो। शायद तू दीवानी हो गई है कि ऐसी बात मेरे रूबरू कहती है। यह कहकर बादशाह ने अपने दीवान को हुक्म दिया कि इसे हमारे सामने से हटा दो। जोरदार बादशाह के हुक्म की तामील के औरत के करीब आया तो औरत बादशाह की तरफ देखकर मौत होकर कहा अफसोस है कि आप जैसे आदिल और मुसिफ मिजाज होकर बगैर सोच समझे तहकीकात के मुंह पर झूठ इल्जाम लगाते हैं। आपने मेरी बात की तस्दीक तो की होती अगर मेरा बयान झूठा निकलता तो आप मुझको जो चाहे सजा दे सकते थे। बादशाह ने कहा हर शायद तेरी समित में तुझे भड़काया है जो तू ऐसे झूठ और मुबहम का ऐसे कम लेती है। बहराल तेरी गुजारिश पर मैं तहकीकात करता हूं। मगर अपने दिल में खूब याद रख कि अगर तेरी बातें झूठी ही निकली तो तेरा मुंह काला करके मुजाहरा है। बादशाह सलामत बस जो बाजार बादशाह के कहने के मुताबिक दौड़ा और वापस आकर गुजारिश की। जहां पना यह औरत सच कहती है, हकीकत में वह चारों मौजूद नहीं है। ना खालिद ना उमर। बादशाह इस बात पर बड़ा हैरान हुआ और उस चालाक पड़ोसी की तरफ देखकर कहने लगा सच सच बता कि तूने इस औरत के 5000 दीनार देने हैं या नहीं? तो उस चालाक पड़ोसी ने इंकार किया। तब बादशाह ने और उससे कहा तेरे पास कोई गवाह है कि वाकई इसने तेरे 5000 दीनार दिए हैं? तो जबदा कहने लगी जी हुजूर मैं इस बात के गवाह रखती हूं। बादशाह ने कहा अच्छा अपने गवाह को लेकर आ। औरत ने अर्श के हुजूर अपने मुजरिमों से कहकर मुझे झगड़ा इनाम कर दें। बादशाह को उसकी बात पर बड़ी हंसी आई। बादशाह ने अपने मुजरिमों को हुक्म दिया कि एक झगड़ा लेकर इस औरत के साथ जाओ और उसे चालाक पड़ोसी को हुक्म दिया कि तुम यहीं रहो जब तक कि औरत वापस ना आ जाए। और झगड़ा लेकर अपने मकान पर आई और संदूक को झगड़े पर लादकर बादशाह के महल के जानिब रवाना हुई। जब महल के करीब पहुंची तो बादशाह ने दूर से देखा कि औरत झगड़े पर एक बड़ा भारीभरकम संदूक चली आ रही है। उसका दावा गलत है। मुझे उसका एक ढीला भी नहीं देना। बादशाह ने औरत से कहा कि अपने गवाह पेश कर। औरत ने कहा हुजूर यह संदूक मेरा गवाह है। और यह सब लोग तेरी गवाही देगा। औरत ने कहा हुजूर मेरा तो यह संदूक की गवाह है। बादशाह ने हंसकर और संदूक की तरफ मुखातिब होकर कहा संदूक तू क्या गवाही देता है? कुछ जवाब ना मिला। बादशाह को बड़ा गुस्सा आया और बा आवाज बुलंद खफा होकर कहा औरत तो बड़ी चार बुझा अपनी जिंदगी प्यारी नहीं और मुझे बेवकूफ बनती है। औरत ने हाथ बांधकर कहा जहां पना मैं ऐसी हरकत करूं। मैं सच कहती हूं कि यह संदूक मेरा गवाह है। बादशाह ने कहा, अब तू और क्या चाहती है? औरत ने कहा, हुजूर, जरा हुक्म दें कि थोड़ा सा घास से इकट्ठा करके इस संदूक में आग लगा दी जाए। अगर इस पर भी संदूक मेरी गवाही नहीं देगा तो जो आपका जी चाहे मेरे लिए हुक्म फरमाए। जो चाहे सज्जा मुझे दे दे। चुनांचे बादशाह के हुक्म के मुताबिक अल्लाह ने कहा भारत में आग जलाकर संदूक के ऊपर रख दी। जब आग की गर्मी का असर संदूक को पहुंचा और उसके खानों में धुआं भर गया तो एक ही बार हसन उमर खालिद और अहमद शहर सब चीख पड़े कि हुजूर हम गवाह हैं। कैसे चालाक पड़ोसी ने इकरार किया था कि उसने औरत को 5000 दीनार देने जो इस औरत के शौहर ने उसके पास अमानत रखे थे और वह उसके देने में किसी किस्म का कोई इस्तेमाल नहीं करेगा। बादशाह और सारी सल्तनत यह सुनकर हैरान हो गए और बादशाह ने जबदा को अपने करीब बुलाकर उसे पूछा कि तुमने हमें खूब तमाशा दिखलाया। अब इस माह का हाल मेरे सामने बयान करो। औरत ने कहा कि संदूक के तले खुलवाए जाए। चुनांचे एक खाने का ताला खुला तो उसमें से हसन बरामद हुआ और इसी तरह बाकी तीनों खानों में से उमर, खालिद और अहमद निकले। बादशाह और हाजरीन उनको देखकर हैरान हो गए। और उमर और उसके तीनों दोस्त यानी हसन खालिद अहमद कमल हजल और शर्मसार अपनी गर्दन नीचे झुकाए बरना खड़े हो गए। और उन सबकी ऐसी हालत थी कि काटो तो बदन में लहू नहीं। बादशाह ने औरत को हुक्म दिया कि तुम तमाम सरगुजस्त हमारे रूबरू बयान करो। चुनांचे औरत ने बादशाह और हाजरीन के सामने दरबार को सुना दिया और सबने औरत की परहेजगारी और जहानत और हिम्मत और लियाकत पर आरीन की उसकी तारीफ की और बादशाह ने उस चालाक पड़ोसी को कैद करके उसकी तमाम दौलत औरत को अता करने का हुक्म दिया और हसन खालिद उमर और अहमद शहर का मुंह काला करके उनको गधों पर सवार कर कर घुमाया और फिर तमाम शहर में उनको फैलाने के बाद उन्हें अपने मुल्क से निकाल दिया।