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ए पागल दिखाई नहीं देता। साहब लोग आ रहे हैं। उधर जा। तुम्हें पता है यह कौन है? जिस आदमी को तुम लोग पागल कह रहे हो, पत्थर मार रहे हो, जानते हो यह कौन है?
नमस्कार दोस्तों, आज मैं आपके लिए एक ऐसी कहानी लेकर आया हूं जो ना सिर्फ आपकी आंखों को नम कर देगी बल्कि आपके रोंगटे खड़े कर देगी। यह कहानी उस गुमनाम नायक की है जिसे दुनिया पागल समझकर पत्थर मारती रही। लेकिन जिसके सीने पर सजे मेडल और शरीर पर लगे घाव इस देश की सुरक्षा की गवाही दे रहे थे। सोचिए जिस तिरंगे को हम और आप साल में दो बार लहरा कर भूल जाते हैं। उस तिरंगे की रक्षा के लिए एक इंसान अपना मानसिक संतुलन खो बैठा। आज की घटना इंसानियत और देशभक्ति की एक ऐसी मिसाल है जिसे सुनकर आपका सीना गर्व से चौड़ा हो जाएगा। तो चलिए शुरू करते हैं।
कंपाने वाली दास्तान
दोपहर के 2:00 बज रहे थे और उत्तर भारत के एक छोटे से शहर का मुख्य चौराहा यानी घंटाघर चौक पूरी तरह से तप रहा था। मई की गर्मी थी और लू के थपेड़े चल रहे थे। सड़क पर डामर पिघलने को तैयार था। इसी भीड़भाड़ वाले चौराहे के एक कोने में कूड़े के ढेर के पास एक अजीब सा आदमी बैठा था। उसके बाल झटाओं की तरह उलझे हुए थे और मिटटी से स्नेह थे। दाढ़ी बड़ी हुई थी जिसमें शायद कई महीनों से कंघी नहीं हुई थी। उसके बदन पर कपड़ों के नाम पर चेथड़े लटके थे जो शायद उसने किसी कूड़ेदान से उठाए होंगे। वह आदमी अपनी ही धुन में कुछ बड़बड़ा रहा था। आने जाने वाले लोग उसे हिकारत भरी नजरों से देखते। कोई उसे पागल कहता तो कोई गंदा भिखारी।
चौराहे पर एक फलों की दुकान थी जिसका मालिक सोहन लाल बहुत ही गुस्सैल था। वह पागल आदमी सोहन लाल की दुकान के पास पड़े एक सड़े हुए केले को उठाने के लिए बड़ा भूख इंसान को जानवर बना देती है और वह तो फिर भी मानसी का रूप से बीमार था। जैसे ही उसने हाथ बढ़ाया सोहन लाल चिल्लाया। अरे ओ पागल चल हट यहां से। ग्राहक खराब कर रहा है मेरा। भाग यहां से वरना डंडे से मारूंगा।
वह आदमी डरा नहीं। उसने एक अजीब सी मुस्कान के साथ सोहन लाल की तरफ देखा और एकदम सावधान की मुद्रा में खड़ा हो गया। उसने अपने माथे पर हाथ रखकर सोहन लाल को सैल्यूट किया और जोर से बोला जय हिंद सर दुश्मन सीमा पर है। हम पीछे नहीं हटेंगे।
सोहन लाल और वहां खड़े कुछ लड़के जोर-जोर से हंसने लगे। एक लड़के ने कहा, "अरे यह तो पागल फौजी है। रोज इसका यही ड्रामा रहता है। दिन भर खुद को बॉर्डर पर समझता है।" दूसरे लड़के ने मजाक उड़ाते हुए सड़क पर पड़ा। एक पत्थर उठाया और उस पागल की तरफ फेंक दिया। पत्थर सीधा उस आदमी के माथे पर लगा। खून की एक पतली धार निकल आई। लेकिन उस पागल ने ना दर्द की परवाह की ना खून की। उसने बस अपना सैल्यूट नहीं तोड़ा। वह वैसे ही तना खड़ा रहा जैसे कोई सिपाही अपने कमांडर के सामने खड़ा होता है। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी जो पागलपन की थी या जुनून की कोई नहीं समझ पा रहा था।
वह आदमी वहां से हटा और चौराहे के बीच में लगे खंभे के पास चला गया। उस खंभे पर किसी ने 15 अगस्त को एक छोटा सा प्लास्टिक का तिरंगा लगाया था जो अब फटकर नीचे गिरने ही वाला था। वह पागल दौड़कर वहां गया और उस गिरते हुए झंडे को अपने गंदे हाथों से ऐसे लपक लिया जैसे कोई मां अपने गिरते हुए बच्चे को बचाती है। उसने उस गंदे झंडे को अपनी फटी हुई कमीज से सांड किया। उसे चूमा और अपनी जेब में रख लिया। लोग यह देख रहे थे और कह रहे थे देखो नौटंकी यह पागल अब झंडा लेकर नाचेगा।
तभी दूर से सायरन की आवाजें सुनाई देने लगी। यह पुलिस की जीभ का सायरन नहीं था। यह सेना की गाड़ियों का भारी भरकम सायरन था। शहर के लोग जानते थे कि आज आर्मी के नए जनरल साहब शहर के आर्मी कैंट का दौरा करने आ रहे हैं। पुलिस वालों ने एक तुरंत चौराहे का ट्रैफिक रोक दिया। सीटी बजाते हुए हवलदार चिल्लाने लगे। ए सब पीछे हो जाओ। रोड खाली करो। आर्मी का काफिला आ रहा है। कोई बीच में नहीं आएगा। इंस्पेक्टर राठी अपनी जीप से उतरे और डंडा फटकारते हुए उस पागल की तरफ लपके जो अभी भी सड़क के किनारे खड़ा होकर उस प्लास्टिक के झंडे को सीधा करने की कोशिश कर रहा था। इंस्पेक्टर ने डांटते हुए कहा ए पागल दिखाई नहीं देता। साहब लोग आ रहे हैं। उधर जा गटर के पास बैठ जा। तेरी बदबू से साहब का मूड खराब हो जाएगा। चल भाग। इंस्पेक्टर ने उसे धक्का दिया। वह आदमी लड़खड़ाया। लेकिन उसने इंस्पेक्टर को भी पलट कर सैल्यूट मारा और बोला सर मिशन पूरा हुआ। रिपोर्टिंग फॉर सैंड ड्यूटी सर। इंस्पेक्टर ने अपना माथा पीट लिया। उसने दो हवलदारों को इशारा किया कि इसे पकड़ कर पीछे खड़ा कर दो। हवलदारों ने उस पागल को बाहों से पकड़ा और भीड़ के पीछे धकेल दिया।
तभी सामने से आर्मी का काफिला नजर आया। सबसे आगे मिलिट्री पुलिस की बुलेट थी। उसके पागल बां की बाज पीछे जिप्सी और बीच में थी एक काले रंग की चमचमाती टाटा सफारी जिस पर तीन स्टार लगे थे। यह गाड़ी थी लेफ्टिनेंट जनरल विक्रम सिंह की। विक्रम सिंह भारतीय सेना के एक बहुत ही सख्त और सम्मानित अधिकारी थे। उनका नाम सुनकर ही दुश्मन कांपते थे। उन पीछे सेना के ट्रकों की एक लंबी लाइन थी। काफिला धीरे-धीरे चौराहे से गुजर रहा था। जनरल विक्रम सिंह अपनी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठे बाहर का नजारा देख रहे थे। उनकी नजर भीड़ पर थी। तभी उनकी गाड़ी उस जगह से गुजरी जहां भीड़ के पीछे वह पागल आदमी खड़ा था। हवलदारों ने उसे पकड़ा हुआ था। लेकिन जैसे ही उस पागल ने सेना की गाड़ी और उस पर लगा तिरंगा देखा उसके अंदर ना जाने क्या बिजली दौड़ी। उसने हवलदारों के हाथ झटक दिए। वह पूरी ताकत से चिल्लाया। अटेंशन। उसकी आवाज में इतनी कड़क और बुलंदी थी कि आसपास खड़े लोग सहम गए। वह पागल भीड़ को चीरता हुआ आगे आया और सड़क के किनारे एकदम सावधान खड़ा हो गया। उसने अपनी ठोड़ी ऊपर उठाई। सीना चौड़ा किया और अपनी दाहिनी हथेली को माथे पर रखकर एक ऐसा परफेक्ट सैल्यूट मारा जिसे देखकर किसी भी फौजी का दिल धड़क जाए। उसके कपड़े फटे थे। शरीर गंदा था, खून बह रहा था। लेकिन उसका पोश्चर खड़े होने का तरीका इतना सटीक था कि जैसे वह किसी परेड ग्राउंड में खड़ा हो।
जनरल विक्रम सिंह की नजर उस पागल पर पड़ी। गाड़ी आगे निकल चुकी थी लेकिन जनरल साहब ने कुछ ऐसा देखा जिसने उन्हें बेचैन कर दिया। उन्होंने उस पागल के खड़े होने का तरीका देखा। उन्होंने उसके हाथ का वो घाव देखा और सबसे बड़ी बात उन्होंने उसकी आंखों में वह आग देखी जो उन्होंने 15 साल पहले एक और सिपाही की आंखों में देखी थी। जनरल विक्रम सिंह ने तुरंत ड्राइवर को आदेश दिया, गाड़ी रोको। स्टॉप द कार। ड्राइवर ने अर्जेंट ब्रेक मारा। टायरों की चीख के साथ पूरा काफिला रुक गया। पीछे आ रहे ट्रक और जीप भी रुक गई। पुलिस वाले घबरा गए। इंस्पेक्टर राठी दौड़ते हुए आए कि शायद कोई सुरक्षा में चूक हो गई। जनरल विक्रम सिंह दरवाजा खोलकर गाड़ी से नीचे उतरे। उनके बूटों की आवाज सड़क पर गूंजी। उनकी वर्दी पर लगे मेडल सूरज की रोशनी में चमक रहे थे। उन्होंने अपना काला चश्मा उतारा और पीछे की तरफ देखा। वहां वह पागल अभी भी सैल्यूट की मुद्रा में खड़ा था। उसका हाथ नीचे नहीं आया था। जनरल विक्रम सिंह धीरे-धीरे उसकी तरफ बढ़ने लगे। पूरा चौराहा सांस रो के देख रहा था। सोहन लाल और पत्थर मारने वाले लड़के डर के मारे कांप रहे थे। उन्हें लगा कि जनरल साहब अब इस पागल को मरवाएंगे क्योंकि इसने रास्ता रोका है। इंस्पेक्टर राठी बीच में आए और बोले सर आई एम सॉरी। यह यहां का पागल है। दिमाग से पैदल है। मैं अभी इसे हटवाता हूं। ए सिपाही ले जाओ इसे। जनरल विक्रम सिंह ने हाथ के इशारे से इंस्पेक्टर को चुप रहने को कहा। उनकी नजरें सिर्फ उस पागल पर टिकी थी। जनरल साहब उस गंदे और बदबूदार आदमी के बिल्कुल करीब जाकर खड़े हो गए। वह आदमी अभी भी सैल्यूट किए हुए था। उसकी नजरें सामने टिकी थी। पलक भी नहीं झपक रही थी।
जनरल विक्रम सिंह ने कांपती हुई आवाज में पूछा, मेजर मेजर रणवीर यह नाम सुनते ही उस पागल के शरीर में एक सिहरण हुई। उसका हाथ धीरे-धीरे नीचे आया। उसने अपनी धुंधली आंखों से सामने खड़े वर्दी वाले को देखा। यादों के बादल छंठने लगे। उसने धीरे से कहा, "कोड नेम, तूहान, मिशन, लाहौर।"
जनरल विक्रम सिंह की आंखों से आंसू छलक पड़े। यह देश के आर्मी चीफ थे जो कभी नहीं रोते थे। लेकिन आज सड़क के बीचोंबीच उनकी आंखों से गंगा जमुना बह रही थी। वह आगे बढ़े और उस गंदे पागल को अपने सीने से लगा लिया। कसकर इतना कसकर जैसे कोई खोई हुई दौलत मिल गई हो। जनरल साहब का बेदाग यूनिफार्म उस पागल की गंदगी और खून से सन गया लेकिन उन्हें कोई परवाह नहीं थी। जनरल साहब रोते हुए बोले रणवीर तुम जिंदा हो? मेरे शहर तुम जिंदा हो। हमने तो मान लिया था कि तुम शहीद हो गए। 15 साल 15 साल कहां थे तुम?
भीड़ सन्न थी। पुलिस वाले बुत बने खड़े थे। किसी को समझ नहीं आ रहा था कि एक पागल को जनरल साहब सर और शेर क्यों कह रहे हैं। जनरल साहब ने उस पागल का चेहरा अपने हाथों में लिया। वह आदमी बच्चों की तरह जनरल को देख रहा था। उसने टूटी फूटी आवाज में कहा, "सर, वह लोग बहुत मारते थे। नाखून नाखून निकाल लिए सर पर मैंने मैंने अपना नाम नहीं बताया मैंने देश का राज नहीं बताया सर मैं पास हो गया ना सर।" यह सुनकर वहां खड़े हर शख्स का कलेजा मुंह को आ गया।
जनरल विक्रम सिंह ने पलट कर भीड़ और पुलिस वालों की तरफ देखा उनका चेहरा गुस्से से लाल था वह दहाड़े तुम्हें पता है यह कौन है जिस आदमी को तुम लोग पागल कह रहे हो पत्थर मार रहे हो जानते हो यह कौन है सन्नाटा छाया रहा। जनरल साहब ने चिल्लाकर कहा, "यह भारतीय सेना के पैरा स्पेशल फोर्सेस के मेजर रणवीर सिंह राठौर हैं। 10,999 के कारगिल युद्ध के सबसे बड़े हीरो जिसने अकेले दुश्मन के बंकर में घुसकर उनके 10 सैनिकों को मारा था और उसके बाद उसके बाद एक गुप्त मिशन पर पाकिस्तान गए थे। हमें खबर मिली थी कि इन्हें पकड़ कर मार दिया गया है। लेकिन यह यह वहां की जेलों में तड़पते रहे। 15 साल सोच सकते हो तुम लोग 15 साल तक दुश्मन ने इनके शरीर का एक-एक इंच तोड़ा होगा। इन्हें पागल बना दिया और जब यह किसी तरह वतन वापस लौटे तो मेरे ही देश के लोगों ने मेरे ही हीरो को भिखारी बना दिया।"
जनरल साहब की आवाज भररा गई थी। शर्म आती है मुझे। जिस आजादी की हवा में तुम सांस ले रहे हो वह इसी पागल की भीख है। इसने अपना जवानी, अपना परिवार, अपना दिमाग सब कुछ तुम्हारे लिए खो दिया और तुम लोगों ने इसे क्या दिया? पत्थर, गालियां। सोहन लाल दुकानदार का सिर शर्म से झुक गया। जिन लड़कों ने पत्थर मारा था, वे भीड़ में छुपने लगे। इंस्पेक्टर राठी की आंखों में भी पानी आ गया।
मेजर रणवीर जो अब तक पागल समझे जा रहे थे ने अपनी जेब से वही गंदा प्लास्टिक का तिरंगा निकाला और कामते हाथों से जनरल साहब को दिया। बोले सर झंडा झंडा नहीं गिरना चाहिए। देश देश बचा लिया ना हमने। जनरल विक्रम सिंह ने वह झंडा लिया और उसे माथे से लगाया। उन्होंने तुरंत अपने साथ चल रहे मेडिकल ऑफिसर को बुलाया। डॉक्टर तुरंत एंबुलेंस लाओ। मेजर को मिलिट्री हॉस्पिटल ले जाना है। यह वीआईपी ट्रीटमेंट है। खबरदार जो कोई कमी हुई। फिर जनरल साहब ने खुद मेजर रणवीर के फटे हुए कपड़ों को ठीक किया। अपनी जेब से कंघा निकालकर उनके बाल सही किए और फिर सबके सामने उस पागल को सैल्यूट किया। इस बार यह सैल्यूट एक जनरल का एक मेजर को नहीं था। बल्कि एक भाई का एक भाई को था। एक इंसान का एक देवता को था।
देखते ही देखते वहां खड़ी हजारों की भीड़ ने तालियां बजानी शुरू कर दी। भारत माता की जय के नारे गूंजने लगे। जनरल साहब ने मेजर रणवीर का हाथ पकड़ा और उन्हें अपनी सफारी गाड़ी में बैठाया। वही सीट जहां जनरल साहब बैठते थे। जब काफिला वहां से निकला तो मेजर रणवीर गाड़ी की खिंकी से बाहर देख रहे थे और उनके चेहरे पर सुकून था क्योंकि उन्हें अपना घर और पहचान मिल गई थी।
बाद में पता चला कि मेजर रणवीर को पाकिस्तान ने पागलों की तरह बॉर्डर पर छोड़ दिया था क्योंकि उनकी याददाश्त जा चुकी थी। वे भटकते-भटकते इस शहर तक आ गए थे। मिलिट्री हॉस्पिटल में इलाज के बाद उन्हें यह याद आ गया कि वह एक फौजी हैं और आज वे अपने घर पर हैं जहां सेना ने उन्हें पूरा सम्मान और वेतन दिया।
लेकिन सवाल यह है कि क्या हमें हर बार किसी जनरल के आने का इंतजार करना पड़ेगा किसी हीरो को पहचानने के लिए? हमारे समाज में कितने ही ऐसे लोग सड़कों पर भटक रहे हैं जो किसी ना किसी हादसे का शिकार हैं और हम बिना जाने उन्हें पागल कह देते हैं। उस दिन सोहन लाल और उस शहर के लोगों ने कसम खाई कि वे कभी किसी लाचार का मजाक नहीं उड़ाएंगे क्योंकि फटे हुए कपड़ों के नीचे एक सम्राट भी हो सकता है। मेजर रणवीर ने साबित कर दिया कि एक फौजी का शरीर टूट सकता है। पर उसका जमीर और देशभक्ति कभी नहीं मरती। यह कहानी सिखाती है कि हम जिस आजादी का जश्न मनाते हैं, उसकी कीमत किसी ने अपनी जिंदगी देकर चुकाई है। अगर कभी सड़क पर कोई ऐसा व्यक्ति दिखे जो तिरंगे को सम्मान दे रहा हो तो उसका मजाक मत बनाइए।
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