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The Almanack of Naval Ravikant

SyllabuswithRohit 4:18:12

Transcription

नवल रविकांत। मैं एक सिंगल पेरेंट घर में बड़ा हुआ। मम्मी काम करती थी, स्कूल जाती थी और मुझे और मेरे भाई को अकेले ही संभालती थी। हम छोटी उम्र से ही अपना काम खुद करना सीख गए थे। जिंदगी में बहुत मुश्किलें आई, लेकिन मुश्किलें तो सबकी जिंदगी में आती हैं। लेकिन इनसे मुझे काफी हेल्प भी मिली।

हम गरीब इमीग्रेंट थे। मेरे पापा इंडिया में फार्मासिस्ट थे। लेकिन यहां यूएस में उनकी डिग्री नहीं चली। तो वह एक हार्डवेयर की दुकान में काम करने लगे। अच्छी परवरिश नहीं थी और मेरा परिवार अलग हो गया। मम्मी ने मुश्किल समय में भी हमेशा बिना शर्त के प्यार किया। अगर जिंदगी में कुछ भी नहीं है, लेकिन एक इंसान है जो आपको बिना किसी वजह के प्यार करता है, तो आपका कॉन्फिडेंस काफी बढ़ जाता है।

हम न्यूयॉर्क सिटी के एक अनसेफ एरिया में रहते थे। लाइब्रेरी ही मेरा आफ्टर स्कूल सेंटर था। स्कूल के बाद सीधा लाइब्रेरी चला जाता था। वहां रहता था जब तक बंद नहीं हो जाती। फिर घर आ जाता था। यही रोज का रूटीन था मेरा। जब हम यूएस आए तब हम बहुत छोटे थे। मेरे ज्यादा दोस्त नहीं थे, तो कॉन्फिडेंस भी कम था। ज्यादा टाइम पढ़ाई में बिताता था। मेरे असली दोस्त बस किताबें ही थीं। किताबें अच्छे दोस्त होती हैं, क्योंकि बड़े सोचने वाले लोगों की बातें उनमें होती हैं।

मेरी पहली नौकरी एक इललीगल कैटरिंग कंपनी में थी। वैन के पीछे इंडियन खाना डिलीवर करता था। तब मेरी उम्र 15 साल थी। और भी छोटी उम्र में पेपर बांटता था और कैफेट एरिया में बर्तन धोता था। मैं एक अननोन बच्चा था न्यूयॉर्क सिटी में। एक ऐसे परिवार से जिसका कोई नाम नहीं था। इमीग्रेंट की तरह बस सर्वाइव कर रहे थे।

फिर मैंने स्टेवसेंट हाई स्कूल का टेस्ट क्लियर कर लिया। उसने मेरी जिंदगी बदल दी। क्योंकि इस स्कूल का नाम मिलते ही मुझे आईवी लीग कॉलेज मिल गया। फिर वहीं से टेक में घुस गया। स्टसेंट एक ऐसा चांस था जहां एकदम से सब कुछ बदल सकता है। ब्लू कॉलर से वाइट कॉलर बन गए एक ही बार में। डार्ट माउथ में मैंने इकोनॉमिक्स और कंप्यूटर साइंस पढ़ी। एक टाइम था जब लगा मैं इकोनॉमिक्स में पीएचडी करूंगा।

आज मैं खुद के पैसों से लगभग 200 कंपनीज़ में इन्वेस्टर हूं। कई जगह एडवाइजर भी हूं। कई बोर्ड्स पे भी हूं। मैं एक छोटे से क्रिप्टो करेंसी फंड में भी पार्टनर हूं, क्योंकि मुझे क्रिप्टो करेंसी का फ्यूचर पसंद है। मैं हमेशा कुछ नया सोचता रहता हूं। साइड प्रोजेक्ट्स भी हमेशा चल रहे हैं। इन सबके अलावा मैं एंजेलिस्ट का फाउंडर और चेयरमैन भी हूं। मैं गरीबी में पैदा हुआ था। दुखी था। अब मैं ठीक-ठाक अमीर हूं और बहुत खुश हूं। मैंने यह सब मेहनत से हासिल किया।

मैंने कुछ चीजें सीखी हैं। कुछ प्रिंसिपल्स। मैं उनको सिंपल तरीके से आपको समझाता हूं, ताकि आप खुद समझ सकें। क्योंकि लास्ट में मैं कुछ सिखा नहीं सकता। बस आपको इंस्पायर कर सकता हूं। या कुछ बातें याद रखने के लिए दे सकता हूं।

वेल्थ धन कैसे अमीर बने बिना किस्मत के भरोसे। पैसे कमाना कोई काम नहीं है। यह एक स्किल है जो सीखनी पड़ती है। आइए समझिए कि धन कैसे बनता है। मुझे लगता है अगर मेरा सारा पैसा चला जाए और मुझे किसी भी अंग्रेजी बोलने वाले देश में किसी भी गली में छोड़ दीजिए, तो 5-10 साल में फिर अमीर हो जाऊंगा। क्योंकि यह एक स्किल है जो मैंने सीखी है और यह कोई भी सीख सकता है। यह सिर्फ मेहनत करने की बात नहीं है। आप रेस्टोरेंट में 80 घंटे काम करिए, फिर भी अमीर नहीं बन सकते। अमीर बनना मतलब सही काम करना, सही लोगों के साथ करना और सही वक्त पर करना। सिर्फ मेहनत से नहीं होता। समझना भी जरूरी है। हां, मेहनत भी जरूरी है। बिना उसके नहीं चलेगा। लेकिन सही जगह लगानी पड़ती है। अगर आपको अभी भी नहीं पता कि आपको किस चीज पर काम करना चाहिए, तो सबसे पहले यही समझिए। जब तक यह नहीं समझेंगे, तब तक बस काम मत करते रहिए।

मैंने अपने कुछ प्रिंसिपल्स बहुत छोटी उम्र में बनाए थे, जब मैं 13-14 साल का था। 30 साल से इन्हें फॉलो कर रहा हूं। धीरे-धीरे मुझे बिजनेसेस को देख के समझ आ गया है कि कैसे सबसे ज्यादा फायदा उठाया जा सकता है। कैसे धन बनता है वेल्थ और कैसे थोड़ा हिस्सा मिलता है। यही चीज मैंने अपने फेमस ट्वीट स्टॉर्म में बताई थी। हर एक ट्वीट पर घंटों बात की जा सकती है। लेकिन यह ट्वीट स्टॉर्म शुरू करने के लिए सही जगह है। इसमें सारी इंपॉर्टेंट बातें हैं। अगर इन्हें समझ लीजिए और 10 साल तक मेहनत करिए, तो आपको अपनी मंजिल मिल जाएगी।

कैसे अमीर बने बिना किस्मत के भरोसे? धन बनाइए। पैसा और स्टेटस नहीं। धन मतलब ऐसे एसेट्स जो आपके सोने पर भी पैसा कमा के दें। पैसा सिर्फ समय और धन को बदलने का तरीका है। स्टेटस मतलब आपकी जगह सोसाइटी में। धन चाहिए, पैसा और स्टेटस नहीं। समझिए कि सही तरीके से धन कमाना मुमकिन है। अगर आप अंदर ही अंदर धन से नफरत करते हैं, तो यह आपसे दूर रहेगा। उन लोगों को इग्नोर करिए जो सिर्फ स्टेटस के लिए गेम खेलते हैं। स्टेटस यानी आपकी जगह सोसाइटी में। उन लोगों को इग्नोर करिए जो सिर्फ स्टेटस के लिए गेम खेलते हैं। यह लोग उन पर अटैक करते हैं जो धन बना रहे हैं।

आप अपना समय बेच के अमीर नहीं बन सकते। आपको इक्विटी चाहिए। इक्विटी यानी किसी बिजनेस का हिस्सा। तभी आपको फाइनेंशियल फ्रीडम मिलेगी। आप तभी अमीर बनेंगे जब आप सोसाइटी को वह देंगे जो सोसाइटी चाहती है, लेकिन उसे मिल नहीं रहा। और यह सब स्केल पर करना होगा। ऐसी इंडस्ट्री चुनिए जहां आप लंबी रेस के लोगों के साथ लंबी रेस का खेल खेल सकें। इंटरनेट ने काम की दुनिया को बहुत बढ़ा दिया है। ज्यादा लोगों को अभी तक यह समझ नहीं आया। बार-बार खेलने वाले गेम्स खेलिए। जिंदगी में सारा फायदा, चाहे पैसा हो, रिश्ता हो या ज्ञान हो, सब कंपाउंड इंटरेस्ट से मिलता है।

बिजनेस पार्टनर ऐसे चुनिए जिनमें इंटेलिजेंस हो, एनर्जी हो और सबसे जरूरी ईमानदारी हो। उन लोगों के साथ पार्टनरशिप मत करिए जो हमेशा नेगेटिव सोचते हैं। उनका सोचना सच हो जाता है। बेचना सीखिए, बनाना सीखिए। अगर आप बेचना और बनाना दोनों कर सकते हैं, तो आपको कोई नहीं रोक सकता। खुद को स्पेशल नॉलेज, जिम्मेदारी और लेवरेज से तैयार करिए। स्पेशल नॉलेज वो होती है जो किसी स्कूल में नहीं सिखाई जा सकती। जो चीज सोसाइटी किसी को भी सिखा के रिप्लेस कर सकती है, वह स्पेशल नहीं है। स्पेशल नॉलेज तब मिलती है जब आप अपनी असली क्यूरियोसिटी और पैशन के पीछे जाते हैं, ना कि सिर्फ जो आजकल पॉपुलर है उसके पीछे। स्पेशल नॉलेज बनाना आपको खेल जैसा लगेगा, लेकिन दूसरों को काम जैसा लगेगा। स्पेशल नॉलेज सिखाई जाती है अप्रेंटिसशिप में, स्कूल में नहीं। स्पेशल नॉलेज अक्सर टेक्निकल या क्रिएटिव होती है। इसको आउटसोर्स या ऑटोमेट नहीं किया जा सकता।

जिम्मेदारी लीजिए। बिजनेस रिस्क अपने नाम पर लीजिए। सोसाइटी आपको रिस्पांसिबिलिटी, इक्विटी और लेवरेज देगी। आर्कमडीज ने कहा था, "मुझे एक लंबी छड़ी और एक सही जगह दे दीजिए, मैं धरती को हिला दूंगा।" धन के लिए भी लेवरेज चाहिए। बिजनेस लेवरेज कैपिटल, लोग और ऐसे प्रोडक्ट से मिलती है जिन्हें बार-बार बनाने की कॉस्ट नहीं लगती, जैसे कोड और मीडिया। कैपिटल मतलब पैसा। पैसा उठाना है तो अपना स्पेशल नॉलेज दिखाना पड़ेगा, जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी और अच्छा डिसीजन लेना पड़ेगा। लेबर मतलब लोग आपके लिए काम करें। यह सबसे पुराना और सबसे ज्यादा लड़ा गया लेवरेज है। आपके पेरेंट्स को लेबर लेवरेज अच्छा लगेगा, लेकिन अपनी जिंदगी इसके पीछे मत बर्बाद करिए। कैपिटल और लेबर, यह दोनों परमिशन वाले लेवरेज हैं। इस खेल में पैसा सब चाहते हैं, लेकिन जब तक कोई किसी को देगा नहीं, उसको मिलेगा नहीं। इसलिए यह खेल अब पुराना हुआ। नया खेल कोड और मीडिया का है। कोड और मीडिया बिना परमिशन के लेवरेज है। नए अमीर लोग इसी से बने हैं। आप सॉफ्टवेयर और मीडिया बना सकते हैं जो आपके सोने पर भी आपके लिए काम करें। एक आर्मी ऑफ रोबोट्स आपके लिए फ्री में है, बस डाटा सेंटर्स में बंद है। आप इस आर्मी को यूज करिए। अगर आपको कोडिंग नहीं आती, तो बुक्स लिखिए, ब्लॉग्स लिखिए, वीडियोस बनाइए, पॉडकास्ट रिकॉर्ड करिए। लेवरेज आपके डिसीजन पावर को मल्टीप्लाई करता है। अच्छा डिसीजन लेने के लिए एक्सपीरियंस चाहिए। लेकिन यह बेसिक स्किल्स मैं अभी आपको सिखा देता हूं।

बिजनेस नाम की कोई स्किल नहीं होती। बिजनेस मैगजीनंस और बिजनेस क्लासेस से बहुत दूर रहिए। माइक्रोइकोनॉमिक्स, गेम थ्यरी, साइकोलॉजी, पर्सुएशन, एथिक्स, मैथ्स और कंप्यूटर साइंस पढ़िए। पढ़ना, सुनने से तेज है। करना, देखने से तेज है। इसलिए पढ़िए मत, करिए। इतने बिजी मत हो जाइए कि चाय पर बैठने का समय भी ना हो। अगर ऐसा है, तो कैलेंडर को सिंपल बनाइए। अपने लिए एक बड़ा पर्सनल आवरली रेट सेट करिए। अगर कोई प्रॉब्लम सॉल्व करने से आपका टाइम का पैसा कम बचता है, तो इग्नोर करिए। अगर कोई काम आउटसोर्स करने का खर्चा आपके रेट से कम है, तो आउटसोर्स करिए। जितना हो सके उतनी मेहनत करिए। लेकिन आप किसके साथ और किस चीज पर काम करते हैं, यह ज्यादा इंपॉर्टेंट है। जिस भी काम में जाइए, उसमें दुनिया में बेस्ट बनिए। बार-बार अपने काम डिफाइन करते रहिए, जब तक यह सच नहीं हो जाता कि आप जिस काम में हैं, उसमें दुनिया में बेस्ट बन जाइए। जल्दी अमीर बनने के शॉर्टकट नहीं होते। वह सिर्फ दूसरे तुमसे पैसा बना रहे होते हैं। स्पेशल नॉलेज यूज करिए। लेवरेज लगाइए। धीरे-धीरे आपको वह मिलेगा जो आप डिर्व करते हैं। जब आप फाइनली अमीर हो जाएंगे, तो समझेंगे कि आप असल में यह नहीं चाहते थे।

लेकिन यह बात फिर कभी। समरी यह है कि खुद को एक प्रोडक्ट बना दीजिए। प्रोडक्टाइज योरसेल्फ। प्रोडक्टाइज योरसेल्फ। योरसेल्फ मतलब तुम्हारी अलग पहचान। प्रोडक्टाइज मतलब लेवरेज। योरसेल्फ मतलब जिम्मेदारी लेना। प्रोडक्टाइज मतलब स्पेशल नॉलेज। योरसेल्फ में भी स्पेशल नॉलेज होती है। यह सब मिलकर यह दो शब्द बनते हैं: प्रोडक्टाइज योरसेल्फ।

अगर आप लंबी रेस में धन बनाना चाहते हैं वेल्थ, तो खुद से पूछिए। क्या यह असली में मेरा है? क्या मैं वही दिख रहा हूं जो मैं हूं? फिर सोचिए। क्या मैं इसे प्रोडक्ट बना रहा हूं? क्या मैं इसे बढ़ा रहा हूं? मैं किस चीज से स्केल कर रहा हूं? लोगों से, पैसे से, कोड से या मीडिया से? यह एक सिंपल याद रखने वाली चीज है। यह आसान नहीं है। इसीलिए मैंने बोला, यह दशक लग जाते हैं। मैं यह नहीं कह रहा कि करने में दशक लगते हैं, लेकिन यह समझने में काफी टाइम लग जाता है कि तुम क्या नया दे सकते हो।

धन और पैसे में क्या फर्क है? पैसा सिर्फ धन आगे बढ़ाने का तरीका है। पैसा मतलब सोशल क्रेडिट। दूसरों के समय को लेना या देना। अगर मैं अपना काम सही करता हूं, सोसाइटी को कुछ फायदा देता हूं, तो सोसाइटी कहती है, "शुक्रिया। हम तुम्हें फ्यूचर में कुछ देंगे, क्योंकि तुमने पास्ट में काम किया। यह लो एक छोटा आई ओ यू।" इसको पैसा कहते हैं। धन वह चीज है जो तुम चाहते हो। धन मतलब ऐसे एसेट्स जो तुम्हारे सोने पर भी पैसा बनाते हैं। धन फैक्ट्री है, रोबोट्स हैं जो चीजें बनाते रहते हैं। धन एक कंप्यूटर प्रोग्राम है जो रात में भी काम करता है। धन वह पैसा है बैंक में जो आगे बिजनेस में लग जाता है। एक घर भी धन हो सकता है, क्योंकि तुम उसे किराए पर दे सकते हो। लेकिन शायद वह ज्यादा प्रोडक्टिव यूज़ नहीं है लैंड का। तो मेरे हिसाब से धन ज्यादा बिजनेस और ऐसे एसेट्स हैं जो तुम्हारे सोते हुए भी कमाई लाते हैं।

टेक्नोलॉजी सबको चीजें खरीदने का मौका देती है, लेकिन बनाने का पावर सिर्फ टॉप लोगों के पास होता है, जो दुनिया में सबसे बेस्ट है। वह सबके लिए बना सकता है। सोसाइटी तुम्हें उस चीज के लिए पैसे देगी जो वह चाहती है, लेकिन सोसाइटी खुद नहीं बना सकती, इसलिए तुम जरूरी हो। अगर वह बना सकते, तो तुम्हारी जरूरत नहीं होती। जो चीजें तुम्हारे घर, ऑफिस या रोड पर हैं, वो कभी टेक्नोलॉजी थी। एक टाइम था जब ऑयल टेक्नोलॉजी था, जिसने रॉकी फिलर को अमीर बनाया। एक टाइम था जब कार टेक्नोलॉजी थी, जिसने फोर्ड को अमीर बनाया। तो टेक्नोलॉजी वही है जो अभी सही से काम नहीं करती। जब काम करने लगती है, वो टेक्नोलॉजी नहीं रहती। सोसाइटी को हमेशा नई चीजें चाहिए। अगर तुम्हें धन चाहिए, तो यह समझिए कि कौन सी चीज आप बना सकते हैं जो सोसाइटी को चाहिए, लेकिन मिल नहीं रही। और वह आपके स्किल के अंदर है। फिर आपको समझना पड़ेगा कैसे स्केल करें, कैसे बड़ा बनाएं, क्योंकि सिर्फ एक बना के काम नहीं चलेगा। बहुत बनाने पड़ेंगे। आपको हजारों, लाखों, करोड़ों बनाने पड़ेंगे, ताकि सबको मिल सके।

स्टीव जॉब्स और उनकी टीम ने समझा कि लोग स्मार्टफोन चाहेंगे। एक कंप्यूटर जो पॉकेट में हो, फोन की पावर से 100 गुना ज्यादा और यूज करना आसान हो। उन्होंने बना दिया। फिर उनको स्केल भी कर दिया। स्पेसिफिक नॉलेज ढूंढिए और बनाइए। सेल्स भी एक तरह की स्पेसिफिक नॉलेज है। कुछ लोग नेचुरल सेल्स वाले होते हैं। स्टार्टअप्स या वेंचर कैपिटल में ऐसे लोग मिलते हैं। जब आप किसी नेचुरल सेल्स वाले को मिलते हैं, समझ पाते हैं कि यह कमाल का है। यह एक तरह की स्पेसिफिक नॉलेज है। जरूर उन्होंने कहीं ना कहीं से सीखा, लेकिन स्कूल में नहीं। शायद बचपन में प्लेग्राउंड में या पेरेंट्स से बात करते हुए सीखा हो। शायद जींस में हो। लेकिन आप सेल्स स्किल्स बेटर बना सकते हैं। रॉबर्ट सीएलडी नहीं पढ़िए। सेल्स ट्रेनिंग सेमिनार में जाइए। डोर टू डोर बेचिए। यह मुश्किल है, लेकिन जल्दी सिखा देता है। सेल्स स्किल्स पक्का सुधार सकते हैं। स्पेसिफिक नॉलेज सिखाई नहीं जा सकती, लेकिन सीखी जा सकती है।

जब मैं स्पेसिफिक नॉलेज की बात करता हूं, तो मेरा मतलब है पता करिए कि आप बचपन में या जवानी में कौन सी चीज आराम से कर लेते थे, जो आपको स्किल भी नहीं लगती थी, लेकिन दूसरे नोटिस करते थे। आपकी मम्मी या बेस्ट फ्रेंड को पता होता है। स्पेसिफिक नॉलेज के एग्जांपल्स हैं सेल्स स्किल्स, म्यूजिक टैलेंट यानी किसी भी इंस्ट्रूमेंट को जल्दी सीख लेना, ज्यादा क्यूरियस होना, किसी चीज में घुस जाते हैं और सब कुछ याद रख लेते हैं, साइंस फिक्शन पढ़ने का शौक मतलब आप जल्दी नॉलेज अब्सॉर्ब कर लेते हैं, बहुत गेम्स खेलते हैं तो गेम थ्यरी अच्छे से समझ आती है, गसिप करना, फ्रेंड की बातें निकालना, शायद यह आपको अच्छा जर्नलिस्ट बना दे। स्पेसिफिक नॉलेज एक अजीब सी मिक्स है आपके डीएनए की, आपके अलग तरीके की, परवरिश की और आप कैसे रिएक्ट करते हैं उस पर। यह आपकी पर्सनालिटी और पहचान में घुसी होती है। फिर आप इसे और बेहतर बना सकते हैं। कोई भी आपसे आप होने में कमपीट नहीं कर सकता।

जिंदगी का ज्यादा टाइम यही ढूंढने में निकलता है कि आपको सबसे ज्यादा कहां और किस चीज में जरूरत है। जैसे मुझे पढ़ना पसंद है। मुझे टेक्नोलॉजी पसंद है। मैं जल्दी सीख लेता हूं। मुझे जल्दी बोर भी हो जाता है। अगर मैं ऐसी जॉब करता जहां मुझे 20 साल तक एक ही टॉपिक पर काम करना पड़ता, तो मैं नहीं कर पाता। मैं वेंचर इन्वेस्टिंग में हूं, जहां मुझे नई टेक्नोलॉजी जल्दी-जल्दी सीखनी पड़ती है और बोर होने का फायदा भी मिलता है, क्योंकि नई चीजें आती रहती हैं। यह मेरे स्पेसिफिक नॉलेज और स्किल्स से मैच करता है। मैं साइंटिस्ट बनना चाहता था। मेरे अंदर की वैल्यूस यहीं से आई हैं। मैं साइंटिस्ट को ह्यूमैनिटी के टॉप प्रोड्यूसर मानता हूं। जितने भी साइंटिस्ट ने असली डिस्कवरीज की हैं, उन्होंने सोसाइटी को सबसे ज्यादा दिया है। दूसरे किसी भी ग्रुप से ज्यादा। आर्ट, पॉलिटिक्स, इंजीनियरिंग या बिजनेस की वैल्यू कम नहीं है, लेकिन बिना साइंस के हम अभी भी मिट्टी में लड़ रहे होते, लकड़ी से आग जलाना सीख रहे होते। सोसाइटी, बिजनेस और पैसा सब टेक्नोलॉजी के नीचे है। और टेक्नोलॉजी खुद साइंस के नीचे है। साइंस लगाने से ही इंसानियत आगे बढ़ती है। सीधी बात, जो लोग साइंस को लगाते हैं, वह दुनिया के सबसे पावरफुल लोग हैं। अगले कुछ सालों में यह और भी क्लियर हो जाएगा।

मेरा पूरा वैल्यू सिस्टम साइंटिस्ट के अराउंड बना था और मैं बड़ा साइंटिस्ट बनना चाहता था। लेकिन जब मैंने देखा कि मैं किस चीज में यूनिक हूं और किस में मैं सबसे ज्यादा टाइम दिया, तो वह पैसा बनाना, टेक्नोलॉजी से खेलना और लोगों को चीजें बेचना था। चीजें समझना, बात करना। मेरे पास थोड़ी सेल्स स्किल है। यह भी स्पेसिफिक नॉलेज का पार्ट है। मेरे पास पैसा बनाने का तरीका समझने की स्किल है। डाटा अब्सॉर्ब करने, उस पर सोचने और तोड़ने की एबिलिटी है। यह भी मेरी स्पेसिफिक स्किल है। टेक्नोलॉजी से खेलना भी मुझे बहुत पसंद है। मुझे यह सब खेल लगता है। दूसरों को यह काम लगता है। बहुत लोगों को यह सब मुश्किल लगता है। वह पूछते हैं, "मैं कैसे आइडियाज बेचने में अच्छा बनूं?" अगर आप ऑलरेडी इस चीज में अच्छे नहीं हैं या इसमें इंटरेस्ट नहीं है, तो शायद यह आपके लिए नहीं है। अपनी असली पसंद की चीज पर ध्यान दीजिए।

मेरी असली स्पेसिफिक नॉलेज पर पहली बार मेरी मम्मी ने ध्यान दिया था। उन्होंने एक दिन किचन से बात करते हुए कहा, जब मैं 15 या 16 साल का था, तब मैं अपने दोस्त को कह रहा था कि मैं एस्ट्रोफिजिसिस्ट बनना चाहता हूं। मम्मी बोली, "नहीं, तुम बिजनेस में जाओगे।" मैंने सोचा, "मम्मी को क्या पता? मैं तो साइंटिस्ट बनूंगा।" लेकिन मम्मी को सब पता था। स्पेसिफिक नॉलेज तब मिलती है, जब आप अपने नेचुरल टैलेंट, असली क्यूरियोसिटी और पैशन के पीछे जाते हैं, ना कि उस चीज के पीछे जाइए जो सबसे ज्यादा हॉट है या इन्वेस्टर्स बोल रहे हैं। बहुत बार स्पेसिफिक नॉलेज वो होती है जो नॉलेज के एज पे होती है, या फिर वह चीजें होती हैं जो अभी नई-नई समझ आई हैं या बहुत मुश्किल है समझना। अगर आप 100% इसमें नहीं है, तो जो दूसरा इंसान 100% लगा हुआ है, वह आपसे बहुत आगे निकल जाएगा और सिर्फ थोड़ा नहीं, बहुत ज्यादा आगे। क्योंकि यहां आइडियाज की दुनिया है। कंपाउंड इंटरेस्ट और लेवरेज यहां सच में काम करते हैं।

इंटरनेट ने कैरियर्स की दुनिया बहुत बड़ी कर दी है। बहुत लोगों को अभी भी यह समझ नहीं आया है। आप इंटरनेट पर अपनी ऑडियंस ढूंढ सकते हैं। आप बिजनेस बना सकते हैं। प्रोडक्ट बना सकते हैं। धन यानी वेल्थ कमा सकते हैं। लोगों को खुश कर सकते हैं, सिर्फ अपनी पहचान से इंटरनेट के थ्रू। इंटरनेट किसी भी छोटी सी इंटरेस्ट को बड़ा बना सकता है। बस आप उसमें बेस्ट बनिए और उसको स्केल करिए। अच्छी बात यह है कि हर इंसान अलग है, तो हर कोई किसी ना किसी चीज में बेस्ट है, अपने तरीके से।

एक और ट्वीट जो मैंने किया था, पर वह हाउ टू गेट रिच वाले ट्वीट स्टोर में नहीं था, वह यह है कि मुकाबले से बचिए। असली बनिए, ऑथेंटिक। जब आप दूसरों से कंपीट कर रहे हैं, तो उनको कॉपी कर रहे हैं। आप वही कर रहे हैं जो सब कर रहे हैं। लेकिन हर इंसान अलग है। किसी को कॉपी मत करिए। अगर आप कुछ ऐसा बना रहे हैं या बेच रहे हैं जो असली में आपका ही एक्सटेंशन है, तो कोई भी आपसे कंपीट नहीं कर सकता। कौन कंपीट करेगा? क्या रोगन या स्कॉट एडमम से इंपॉसिबल है? क्या कोई और आकर डिलबर्ट बेटर लिख सकता है? नहीं। क्या कोई बिल वाटरसन से बेटर केल्विन और होप्स बना सकता है? नहीं। क्योंकि वह लोग असली हैं, ऑथेंटिक।

सबसे अच्छी जॉब्स ना तो डिग्री से मिलती है, ना किसी के कहने से मिलती है। यह जॉब्स उन लोगों की होती है जो हमेशा कुछ नया सीखते रहते हैं और अपनी क्रिएटिविटी दिखाते हैं। अमीर बनने के लिए सबसे जरूरी स्किल यह है कि आप हमेशा सीखते रहिए। आपको यह आना चाहिए कि जो भी सीखना है, वह कैसे सीखें। पहले पैसा कमाने का पूरा तरीका था कि चार साल स्कूल जाइए, डिग्री लीजिए और 30 साल एक ही जॉब करिए। अब सब कुछ जल्दी बदल रहा है। अब आपको नई फील्ड सिर्फ 9 महीने में सीखनी पड़ सकती है और 4 साल बाद वह फील्ड पुरानी हो जाएगी। लेकिन उन तीन प्रोडक्टिव साल में भी आप बहुत पैसा कमा सकते हैं। आज के टाइम में यह ज्यादा इंपॉर्टेंट है कि आप नौ या 12 महीने में किसी नए फील्ड के एक्सपर्ट बन सकें, ना कि सिर्फ यह सोचिए कि आपने सालों पहले सही सब्जेक्ट पढ़ा था।

आपको असल में फाउंडेशंस पढ़नी चाहिए, ताकि आप किसी भी किताब से ना डरें। अगर लाइब्रेरी में कोई ऐसी किताब है जो आपको समझ नहीं आ रही, तो खुद से पूछिए, "मुझे यह समझने के लिए कौन सी बेसिक चीज सीखनी है?" बेसिक चीजें बहुत इंपॉर्टेंट है। सिंपल मैथ्स और नंबर्स समझना जिंदगी में ज्यादा इंपॉर्टेंट है, कैलकुलस से भी ज्यादा। वैसे सिंपल अंग्रेजी में अपनी बात रख पाना ज्यादा जरूरी है, पोएट्री लिखने, बड़ा वोकैब या सात अलग भाषाएं बोलने से ज्यादा। जब आप बात करते हैं, दूसरों को अपनी बात समझाना ज्यादा इंपॉर्टेंट है। बेसिक चीजें सबसे इंपॉर्टेंट है। बेसिक में न आउट ऑफ 10 या 10 आउट ऑफ 10 हो जाना ज्यादा अच्छा है, बजाय हर चीज में ज्यादा डीप जाने के। लेकिन किसी एक चीज में डीप होना जरूरी है, वरना आप बस ऊपर ऊपर रह जाएंगे। जिंदगी में कुछ खास नहीं पाएंगे। सिर्फ एक या दो चीजें में ही आप मास्टर बन सकते हैं। और यह यूजुअली वह चीजें होती हैं जिनमें आपका दिल लगा रहता है।

लंबी रेस का खेल लंबी रेस के लोगों के साथ खेलिए। जिंदगी में जितना भी फायदा होता है, चाहे धन हो, वेल्थ, रिश्ता हो या ज्ञान, सब...

कंपाउंड इंटरेस्ट से मिलता है। कंपाउंड इंटरेस्ट बहुत पावरफुल चीज है। सिर्फ पैसे पर नहीं लगती। पैसा तो शुरुआत है।

बिजनेस रिलेशनशिप्स में भी कंपाउंड इंटरेस्ट काम आता है। सोसाइटी के टॉप लोगों को देखिए। जैसे कोई सीईओ या कोई जो बिलियन डॉलर संभाल रहा है। लोग उन पर ट्रस्ट करते हैं। यह ट्रस्ट उन्होंने अपने रिश्तों और काम से बनाया है जो टाइम के साथ कंपाउंड हुआ है। यह लोग बिजनेस में बने रहे हैं। ईमानदारी दिखाई है।

आपकी रेपुटेशन में भी कंपाउंड इंटरेस्ट लगता है। अगर आपका नाम साफ है और आप सालों तक उसको बनाए रखते हैं तो लोग ध्यान देंगे। आपकी रेपुटेशन हजारों गुना ज्यादा वैल्यूुएबल हो जाएगी। किसी ऐसे से जिसके पास टैलेंट तो है पर उसने रेपुटेशन पर ध्यान नहीं दिया।

यह तब भी होता है जब आप किसी एक इंसान के साथ काम करते हैं। अगर आपने किसी के साथ पांच या 10 साल काम किया और कभी भी अच्छा लगता है तो मतलब आप उस पर ट्रस्ट करते हैं। छोटी-छोटी बातें खत्म हो जाती हैं। बिजनेस में नेगोशिएशन आसान हो जाती है क्योंकि दोनों एक दूसरे पर भरोसा करते हैं।

जैसे सिलिकॉन वैली में एक एंजेल है इलेट गिल। मैं उसके साथ डील करना पसंद करता हूं। मुझे अलर्ट के साथ काम करना इसलिए अच्छा लगता है क्योंकि जब डील होती है वह हमेशा मेरी तरफ से एक्स्ट्रा देने की कोशिश करता है। अगर कहीं से एक्स्ट्रा पैसा मिल रहा है तो वह मेरे हिस्से में डाल देता है। अगर कहीं कुछ खर्चा आता है तो वह अपनी जेब से दे देता है। मुझे बताता भी नहीं। क्योंकि वह मुझे इतनी इज्जत देता है। मैं भी हर डील उसको देता हूं। मैं भी उसके लिए कुछ एक्स्ट्रा करने की कोशिश करता हूं। रिश्तों में यह कंपाउंडिंग बहुत वैल्यूएबल है।

सोच से कुछ नहीं होता। काम से होता है। इसलिए ईमानदारी मुश्किल है। जब सही चीज मिल जाए, जब सही लोग मिल जाए तो पूरा इन्वेस्ट करिए। सालों तक जुड़े रहिए। बड़ी कमाई और बड़े रिश्तों के लिए यही जरूरी है। कंपाउंड इंटरेस्ट बहुत इंपॉर्टेंट है।

99% मेहनत बेकार जाती है। लेकिन कुछ भी पूरा बेकार नहीं होता। क्योंकि हर चीज से कुछ ना कुछ सीखने को मिलता है। लेकिन मान लीजिए अगर स्कूल का एग्जांपल लें तो 99% पेपर्स, बुक्स, एक्सरसाइजेज याद भी नहीं रहते। हो सकता है आपने जग्राफी पढ़ी हो जो दोबारा काम ना आए या कोई लैंग्वेज पढ़ी हो जो अब नहीं बोलते या कोई मैथ्स पढ़ी हो जो बिल्कुल भूल गए। यह सब सीखने का पार्ट है। आपने मेहनत करना सीखा या कुछ ऐसा सीखा जो आपकी सोच में घुस गया। लेकिन जब बात गोल की हो तो सिर्फ 1% ही काम आता है।

मैं यह इसलिए नहीं कह रहा कि 99% जिंदगी वेस्ट है। सिर्फ 1% यूज़फुल है। मैं यह कह रहा हूं कि आपको सोच समझ के काम करना चाहिए। जिंदगी में, रिश्तों में, काम में, पढ़ाई में। आपको वह चीज ढूंढनी है जिसमें आप पूरा इन्वेस्ट कर सकें जहां कंपाउंड इंटरेस्ट मिले।

जब आप डेट कर रहे हैं और पता लग जाए कि यह रिश्ता शादी तक नहीं जाएगा तो आगे बढ़ जाइए। जब पढ़ाई में समझ आ जाए कि यह सब्जेक्ट काम का नहीं तो छोड़ दीजिए। दिमाग का टाइम वेस्ट है। मैं यह नहीं कहता कि 99% मत करिए क्योंकि पहचानना मुश्किल है कि 1% क्या है। लेकिन जब आपको अपने फील्ड का वो 1% मिल जाए जो कभी वेस्ट नहीं होगा। जिसमें आप जिंदगी भर इन्वेस्ट कर सकते हैं। तो सब कुछ दांव पर लगा दीजिए। बाकी सब भूल जाइए।

अकाउंटेबिलिटी लीजिए। अकाउंटेबिलिटी अपनाइए और बिजनेस का रिस्क अपने नाम पर लीजिए। सोसाइटी आपको जिम्मेदारी, इक्विटी और लेवरेज देगी। अमीर बनने के लिए लेवरेज चाहिए। लेवरेज लेबर से मिल सकती है, कैपिटल से मिल सकती है या कोड या मीडिया से भी मिल सकती है। लेकिन लेबर और कैपिटल जैसे लेवरेज आपको तभी मिलते हैं जब लोग आपको देते हैं। लेबर के लिए कोई आपको फॉलो करेगा। कोई आपके लिए काम करेगा। कैपिटल के लिए कोई आपको पैसा, एसेट या मशीन देगा। यह सब चीजें पाने के लिए आपको क्रेडिबिलिटी बनानी पड़ेगी अपने नाम से।

यह रिस्की है। अकाउंटेबिलिटी एक डबल एजेड तलवार है। जब काम अच्छा है तो क्रेडिट मिलता है। जब गलत हो जाए तो ब्लेम भी मिलता है। क्लियर अकाउंटेबिलिटी बहुत जरूरी है। अकाउंटेबिलिटी के बिना इंसेंटिव नहीं होता। अकाउंटेबिलिटी के बिना क्रेडिबिलिटी नहीं बनती लेकिन रिस्क भी लेना पड़ता है। आपका नाम फेल हो सकता है। सबके सामने फेल होने का रिस्क होता है। बेइज्जती का रिस्क होता है।

आज के टाइम में अगर आप फेल भी हो जाइए तो जेल नहीं होती। किसी को मार नहीं दिया जाता। लेकिन फिर भी हम सब अंदर से डरते हैं अपने नाम पर पब्लिक में फेल होने से। जो लोग अपने नाम पर पब्लिक में फेल हो सकते हैं उनके पास असली पावर आ जाती है।

मैं अपना एग्जांपल देता हूं। 2013 2014 तक मेरी पब्लिक आइडेंटिटी सिर्फ स्टार्टअप्स और इन्वेस्टिंग के अराउंड थी। 2014 2015 में मैंने फिलॉसफी, साइकोलॉजी और और भी टॉपिक्स पर बोलना शुरू किया। पहले थोड़ा डर लगा क्योंकि मैं अपने नाम से बोल रहा था। कुछ लोगों ने मुझे मैसेज भी किया यह क्या कर रहे हो? करियर खत्म हो जाएगा। यह बेवकूफी है। मैंने रिस्क लिया। क्रिप्टो में भी ऐसा ही किया। अपना नाम सामने लाने पर रिस्क होता है। लेकिन जब नाम पर रिस्क लेते हैं तो रिवॉर्ड भी मिलता है, फायदा भी मिलता है।

पहले के जमाने में कैप्टन को शिप के साथ डूब जाना पड़ता था। शिप डूब रही है तो कैप्टन सबसे लास्ट उतरता था। अकाउंटेबिलिटी में असली रिस्क होता है। लेकिन यहां हम बिजनेस की बात कर रहे हैं। यहां का रिस्क यह है कि आपको सबसे लास्ट में अपना पैसा मिलेगा। सबसे लास्ट में आपको अपने काम का पैसा मिलेगा। आपका टाइम और पैसा जो आपने कंपनी में लगाया वह रिस्क में होता है। आज की सोसाइटी में रिस्क इतना बड़ा नहीं है। पर्सनल बैंकरप्स में भी अच्छे सिस्टम में आपका डे जीरो हो सकता है। मैं सिलिकॉन वैली का एग्जांपल देता हूं। बस आपको ईमानदारी से मेहनत करनी होती है। आज डरने की जरूरत नहीं है फेलियर से। इसलिए लोगों को और ज्यादा अकाउंटेबिलिटी लेनी चाहिए।

किसी बिजनेस का हिस्सा नहीं है तो फाइनेंशियल फ्रीडम मिलना मुश्किल है। बिजनेस में हिस्सा रखना अमीर बनने के लिए क्यों जरूरी है? देखिए यह ओनरशिप और वेज का फर्क है। अगर आप सिर्फ अपना समय बेच के पैसा कमा रहे हैं जैसे डॉक्टर या लॉयर तो पैसा आ सकता है लेकिन फाइनेंशियल फ्रीडम नहीं मिलेगी। आपके पास ऐसा पैसा नहीं आएगा जो आपके सोते हुए भी आए जो बिजनेस आपके लिए काम करे। यह बहुत इंपॉर्टेंट पॉइंट है। लोग सोचते हैं कि सिर्फ काम करके धन बना सकते हैं। लेकिन यह सही नहीं है। बहुत वजह हैं इसके।

अगर ओनरशिप नहीं है तो आपकी मेहनत और आपका पैसा सीधा-सीधा जोड़ा जाता है। कोई भी सैलरी वाली नौकरी हो। चाहे एक घंटे की सैलरी ज्यादा हो जैसे डॉक्टर या लॉयर। फिर भी आपको घंटे देने पड़ते हैं। तभी पैसा मिलता है। अगर ओनरशिप नहीं है तो जब आप सो रहे हैं आपको पैसा नहीं मिलता। जब रिटायर हो जाएंगे तो पैसा नहीं आएगा। जब छुट्टी पर होंगे तो पैसा नहीं आएगा। और आपका पैसा नॉन लीनियरली नहीं बढ़ेगा।

जो डॉक्टर बहुत अमीर हो जाते हैं, वह भी इसलिए होते हैं क्योंकि वह अपना बिजनेस खोल लेते हैं। अपनी प्राइवेट प्रैक्टिस खोलते हैं। प्राइवेट प्रैक्टिस का नाम बन जाता है। फिर लोग आते हैं या फिर कोई मेडिकल डिवाइस, प्रोसीजर या प्रोसेस बनाते हैं जिसका पेटेंट होता है। असल में जब आप दूसरे के लिए काम करते हैं तो रिस्क दूसरा उठाता है। अकाउंटेबिलिटी उसके पास है। ब्रांड उसका है। इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी भी उसकी। आपको वह उतना ही पैसा देगा जितना मिनिमम देना जरूरी है। हो सकता है वह मिनिमम भी ज्यादा हो। लेकिन असली धन नहीं होगा जिसमें आप रिटायर होकर भी कमा रहे हो।

बिजनेस में हिस्सा रखना मतलब आपके पास ऊपर की कमाई का चांस है। डेप्ट लेने से सिर्फ फिक्स्ड इनकम आती है। रिस्क भी होता है। आपको इक्विटी चाहिए। यानी किसी बिजनेस में हिस्सा। अगर बिजनेस में आपका हिस्सा नहीं है तो पैसा कमाने का चांस बहुत कम है। आपको यहां तक काम करना पड़ेगा कि आप बिजनेस में इक्विटी रख सकें। छोटे शेयर होल्डर बनकर भी इक्विटी ले सकते हैं। शेयर्स खरीद के भी ले सकते हैं या अपनी कंपनी शुरू करके भी ले सकते हैं। ओनरशिप बहुत जरूरी है। जो भी सच में पैसा कमाता है उसके पास प्रोडक्ट, बिजनेस या किसी आईपी का हिस्सा होता है।

टेक कंपनी में काम करते हैं तो स्टॉक ऑप्शन मिल सकता है। यह अच्छी शुरुआत है। लेकिन असली धन तब बनता है जब आप अपनी कंपनी खोलते हैं या इन्वेस्ट करते हैं। इन्वेस्टमेंट फर्म में भी इक्विटी खरीदते हैं। यही अमीर बनने का रास्ता है। सिर्फ घंटे देकर पैसा नहीं बनता।

लिवरेज वाली पोजीशन ढूंढिए। आज के जमाने में लेवरेज अनलिमिटेड है और असली क्यूरियोसिटी की वैल्यू कभी इतनी ज्यादा नहीं थी। अपनी असली क्यूरियोसिटी के पीछे जाइए। यह करियर के लिए पैसा देखने से ज्यादा अच्छा है। जो नॉलेज सिर्फ आपको या कुछ लोगों को ही है। वह आपकी हॉबीज और पैश से ही निकलेगी। अगर आपके शौक आपकी क्यूरियोसिटी से जुड़े हैं तो आपको अपनी असली पैशन मिल जाएगा। अगर कोई चीज अभी आपको मजा दे रही है लेकिन बाद में बोर कर देगी तो बस डिस्ट्रैक्शन है और ढूंढते रहिए।

मैं बस वही चीजें करना चाहता हूं जो मुझे अंदर से अच्छी लगती हैं। इसका मतलब है असली आर्ट। चाहे बिजनेस हो, एक्सरसाइज हो, प्यार हो, दोस्ती हो जो भी हो। जिंदगी का मतलब है चीजें सिर्फ खुशी के लिए करना। जब आप चीजें असली खुशी के लिए करते हैं तो बेस्ट काम निकलता है। पैसा कमाने की भी सोचिए तो भी सबसे ज्यादा सफल वही होता है।

जब मैं सबसे ज्यादा धन कमाया तो मैंने सबसे कम काम किया और फ्यूचर की बिल्कुल चिंता नहीं की। बस मजे के लिए काम कर रहा था। मैं कह रहा था लोगों को कि मैं रिटायर हूं। काम नहीं कर रहा। तभी मुझे अपने सबसे इंपॉर्टेंट प्रोजेक्ट्स का टाइम मिला। खुशी के लिए किया तो काम भी बेस्ट हुआ।

जितना कम किसी चीज को चाहिए, जितना कम उसके बारे में सोचिए, जितना कम उस पर ऑब्सेस्ड होइए, उतना नेचुरली वह चीज होती है। आप खुद के लिए करते हैं। आपके तरीके से करते हैं। और आप लगे रहते हैं। लोग देखते हैं कि आपका काम कितना अच्छा है। अपनी क्यूरियोसिटी को फॉलो करिए ना कि उस ट्रेंड को जो अभी हॉट है। अगर आपकी क्यूरियोसिटी आपको वहां ले जाए जहां सोसाइटी भी जाना चाहेगी तो आपको बहुत पैसा मिलेगा।

आपके पास वह स्किल्स होनी चाहिए जो सोसाइटी अभी दूसरों को सिखाना नहीं जानती। अगर कोई दूसरे को सिखाना शुरू कर दे तो वह आपको रिप्लेस कर देगा। और जब रिप्लेस कर देगा तो आपको ज्यादा पैसा नहीं देगा। आपको वही काम करना है जो दूसरे नहीं कर पा रहे जब उसकी सबसे ज्यादा डिमांड हो। अगर वह आपको सिखाने लग जाए तो जल्दी ही कंप्यूटर को भी सिखा देंगे। सोसाइटी आपको उस चीज के लिए रिवॉर्ड देगी जो वह चाहती है लेकिन कहीं और नहीं मिल रहा।

लोग सोचते हैं स्कूल जाकर पैसा कमाने का स्किल सीख सकते हैं। लेकिन असली में बिजनेस नाम की कोई भी स्किल नहीं होती। सोचिए सोसाइटी को कौन सा प्रोडक्ट या सर्विस चाहिए जो अभी नहीं मिल रही। आप वही इंसान बनिए जो वह चीज स्केल पर दे सके। पैसा कमाने की असली मुश्किल यही है। अब प्रॉब्लम यह है कि जो यह है उसमें अच्छा कैसे बने? हर जनरेशन में यह बदलता रहता है। लेकिन आजकल ज्यादा चीजें टेक्नोलॉजी में होती हैं। आपका टाइम आएगा जब दुनिया में कोई नई चीज निकलेगी। लोगों को नई स्किल चाहिए होगी और आप उसमें एक्सपर्ट होंगे। तब तक अपना नाम बनाइए। Twitter, YouTube पर या फ्री काम देकर थोड़ा रिस्क लीजिए। नाम बनाइए। जब मौका आए तो लेवरेज के साथ जंप करिए। मैक्सिमम लेवरेज।

लेवरेज के तीन तरीके हैं। पहला लेवरेज है लेबर यानी दूसरे लोग आपके लिए काम करें। यह सबसे पुराना लेवरेज है और आज के जमाने में इतना अच्छा नहीं है। मैं मानता हूं यह सबसे बेकार लेवरेज है। दूसरों को संभालना बहुत मुश्किल है। लीडर बनना पड़ता है। रिस्क भी ज्यादा है। कभी भी गड़बड़ हो सकती है।

दूसरा लेवरेज है पैसा। मतलब जब भी आप डिसीजन लेते हैं पैसा लगाते हैं। पैसा हैंडल करना थोड़ा ट्रिकी है। लेकिन इसी से पिछले 100 साल में लोग बहुत अमीर हुए हैं। बड़ी-बड़ी कंपनीज में सीईओ का काम भी मोस्टली फाइनेंशियल होता है। पैसा बहुत आसानी से स्केल होता है। अगर आप कैपिटल हैंडल करना सीख जाइए तो ज्यादा पैसा संभालना आसान है। ज्यादा लोग संभालने के मुकाबले।

तीसरा लेवरेज बिल्कुल नया है। सबसे डेमोक्रेटिक यही है प्रोडक्ट जो बनाने के बाद फ्री में बिक जाए। जैसे बुक्स, मीडिया, मूवी या कोड। कोड सबसे पावरफुल लेवरेज है। आपको सिर्फ कंप्यूटर चाहिए। किसी की परमिशन की जरूरत नहीं। अब बात पैसे वालों या गरीबों की नहीं है। ब्लू कॉलर या वाइट कॉलर की नहीं है। अब बात है लेवरेज लेने वालों की और बिना लेवरेज वालों की।

सबसे इंटरेस्टिंग और सबसे इंपॉर्टेंट लेवरेज यह है कि ऐसे प्रोडक्ट बनाइए जिसका कॉपी करने का कोई एक्स्ट्रा खर्चा नहीं हो। यह नई तरीके की लेवरेज है। पहले यह सिर्फ कुछ 100 साल पहले शुरू हुई। पहले प्रिंटिंग प्रेस आई, फिर टीवी और रेडियो और अब इंटरनेट और कोडिंग ने इसको बहुत बड़ा कर दिया है। अब आप अपनी मेहनत को बिना किसी और इंसान के, बिना किसी और के पैसे के मल्टीप्लाई कर सकते हैं। यह किताब भी एक लेवरेज का एग्जांपल है। पहले मुझे सबको पर्सनली लेक्चर देना पड़ता तो सिर्फ कुछ 100 लोगों तक बात पहुंचती। अभी जो नई लेवरेज है उसी से नए बिलेनियर्स बन रहे हैं। पिछली जनरेशन में पैसा कैपिटल से बनता था। बड़े पैसे वाले लोग वारेन बफे जैसे थे। लेकिन अब नए लोग कोड या मीडिया से अमीर बन रहे हैं। जो रोगन अपने पडकास्ट से 50 मिलियन या 100 मिलियन डॉलर कमाते हैं। प्यूडीपाई भी न्यूज़ से बड़े हैं। जेफ बेजोस, मार्क जकरबर्ग, लेरी पेज, सरगी ब्रेन, बिल गेट्स, स्टीव जॉब्स सबका पैसा कोड बेस्ड लेवरेज से आया है।

नई लेवरेज का सबसे इंटरेस्टिंग पॉइंट यह है कि यह परमिशन लेस है। आपको किसी से परमिशन नहीं चाहिए। लेबर वाले लेवरेज में कोई आपको फॉलो करेगा तभी काम चलेगा। कैपिटल लेवरेज में कोई पैसा देगा तभी हो पाएगा। लेकिन कोडिंग, बुक लिखना, पडकास्ट रिकॉर्ड करना, ट्वीट करना, YouTube वीडियो बनाना सब परमिशन है। किसी की इजाजत नहीं चाहिए इसलिए सबके लिए बराबर है। अच्छा सॉफ्टवेयर डेवलपर आज कोड लिखकर रात में सोता है। उसका कोड उसके लिए काम करता है। अपना समय बेच के कभी अमीर नहीं बन सकते।

जहां भी हो सके पैसा नहीं इंडिपेंडेंस चुनिए। अगर आप इंडिपेंडेंट हैं और सिर्फ अपने रिजल्ट के लिए अकाउंटेबल हैं तो वही सपना है। पहले समाज में लेवरेज नहीं थी। अगर मैं आपके लिए लकड़ी काट रहा था या पानी ला रहा था तो जितने घंटे काम उतना ही रिजल्ट। अब हमने लेवरेज बना लिया है। पैसा, टेक्नोलॉजी, टीम वर्क, प्रोडक्टिविटी सबसे। आज के टाइम में लेवरेज का जमाना है। आपको लेवरेज लेना चाहिए ताकि कम टाइम में ज्यादा रिजल्ट मिले। एक लेवरेज्ड वर्कर दूसरे वर्कर से हजार या 10,000 गुना ज्यादा काम कर सकता है। यहां जजमेंट सबसे इंपॉर्टेंट है ना कि कितने घंटे काम किए। 10 टाइम्स प्रोग्रामर को भूल जाइए। असली में 1000 टाइम्स प्रोग्रामर्स होते हैं। बस लोग मानते नहीं। एक अच्छा सॉफ्टवेयर इंजीनियर सिर्फ सही कोड लिखकर सही ऐप बनाकर आधा बिलियन डॉलर की वैल्यू क्रिएट कर सकता है। लेकिन 10 लोग मिलके गलत प्रोडक्ट गलत तरीके से गलत वायरल लूप के साथ बनाएं तो पूरा टाइम वेस्ट हो जाता है। इनपुट और आउटपुट का मिलन नहीं होता। स्पेशली लेवरेज काम में।

जिंदगी में आपको चाहिए कि आप अपने समय के मालिक बनिए। ऐसी लेवरेज्ड जॉब चाहिए जहां आपका टाइम आपके कंट्रोल में हो और रिजल्ट पे आपको जज किया जाए। अगर आपने बिजनेस में बड़ा फर्क ला दिया तो आपको पैसा मिलना ही चाहिए। और अगर कोई नहीं जानता कि आपने कैसे किया क्योंकि यह आपके ऑब्सेशन या स्किल से हुआ है तो फिर भी आपको पैसे मिलते रहेंगे। अगर आपके पास स्पेसिफिक नॉलेज है, अकाउंटेबिलिटी है और लेवरेज है तो आपको अपनी वैल्यू का पूरा पैसा मिलता है।

जब आपको अपनी वैल्यू का पैसा मिलता है तो आप अपना समय वापस ले सकते हैं। बहुत एफिशिएंट हो सकते हैं। आप फालतू मीटिंग्स नहीं करेंगे। दूसरों को इंप्रेस नहीं करेंगे। ना ही बस शो ऑफ के लिए कुछ लिखेंगे। आप सिर्फ असली काम करेंगे। जब आप सिर्फ असली काम करते हैं तो आप ज्यादा प्रोडक्टिव ज्यादा एफिशिएंट होते हैं। जब एनर्जी हाई हो तब काम करते हैं। जब एनर्जी लो हो तो आराम करते हैं। आप अपना टाइम वापस पा लेते हैं। 40 घंटे का काम पुराने जमाने की बात है। नॉलेज वर्कर्स एथलीट्स की तरह होते हैं। पहले ट्रेनिंग, फिर स्प्रिंट, फिर रेस्ट और सोचते हैं।

सेल्स एक एग्जांपल है। स्पेशली टॉप लेवल सेल्स। अगर आप रियलस्टेट एजेंट हैं जो घर बेचते हैं तो जरूरी नहीं यह बेस्ट जॉब हो। बहुत भीड़ है इसमें। लेकिन अगर आप टॉप रियलस्टेट एजेंट हैं, मार्केटिंग करना आता है, घर बेचना आता है तो हो सकता है आप $5 मिलियन वाले घर दूसरे एजेंट के कंपैरिजन में वन 10थ टाइम में बेच दें। जबकि कोई दूसरा बंदा $1 लाख के फ्लैट बेचने में स्ट्रगल कर रहा है। रियलस्टेट एजेंट की जॉब में इनपुट और आउटपुट अलग हो सकते हैं। कोई भी प्रोडक्ट बनाना और बेचना इस एग्जांपल में आता है। और असल में और क्या है जिंदगी में?

जहां आपको नहीं जाना चाहिए वह है सपोर्ट रोल। जैसे कस्टमर सर्विस। कस्टमर सर्विस में आप जितना टाइम देंगे उतना ही रिजल्ट मिलेगा। इनपुट और आउटपुट एक दूसरे से जुड़े रहते हैं। टूल्स और लेवरेज यही इनपुट आउटपुट का रिलेशन तोड़ते हैं। जितनी ज्यादा क्रिएटिविटी वाली जॉब उतना ज्यादा इनपुट और आउटपुट अलग हो सकते हैं। अगर आप ऐसी जॉब में हैं जहां आपका इनपुट और आउटपुट सीधे जुड़े हैं तो धन बनाना मुश्किल होगा।

अगर आप अच्छी टेक कंपनी का हिस्सा बनना चाहते हैं तो आपको सेल या बिल्ड आना चाहिए। अगर दोनों नहीं आता तो सीखिए। बेचना सीखिए और बनाना सीखिए। अगर दोनों आ गया तो आपको कोई नहीं रोक सकता। यह दो बड़े कैटेगरी हैं। एक है प्रोडक्ट बनाना। इसमें डिजाइन, डेवलपमेंट, मैन्युफैक्चरिंग। लॉजिस्टिक्स, प्रोक्योरमेंट या सर्विस डिजाइन और चलाना सब आ सकता है। इसका मतलब है चीजें हो सकती हैं। हर इंडस्ट्री में बिल्डर का अपना मतलब होता है। टेक में बिल्डर, सीटीओ, प्रोग्रामर, सॉफ्टवेयर, इंजीनियर या हार्डवेयर इंजीनियर हो सकता है। लॉन्ड्री बिजनेस में भी बिल्डर वह है जो सर्विस चलाता है। सब काम टाइम पर करता है। कपड़े सही जगह सही टाइम पर पहुंचाता है।

दूसरा पार्ट है सेल्स। बेचने का मतलब सिर्फ किसी कस्टमर को चीज बेचना नहीं। इसमें मार्केटिंग, कम्युनिकेशन, रिक्रूटिंग, पैसा उठाना, लोगों को इंस्पायर करना, प्यार करना भी आता है। यह एक बड़ा छाता है। दिमाग से कमाइए। समय बेच के मत कमाइए।

अब रियलस्टेट का एक और एग्जांपल लेते हैं। सबसे बेकार जॉब है जो सिर्फ लेबर करता है। जैसे घर रिपेयर करने वाला। शायद 10 या $20 पर आवर मिलता है। सुबह 8:00 बजे काम पर जाना पड़ता है। बॉस आपको आर्डर देता है। यहां कोई लेवरेज नहीं है। थोड़ी अकाउंटेबिलिटी है लेकिन बॉस के लिए क्लाइंट के लिए नहीं। कोई स्पेशल नॉलेज नहीं क्योंकि यह काम कोई भी कर सकता है। पैसा भी कम मिलता है। मिनिमम वेज या थोड़ा सा ज्यादा।

अगला लेवल है जनरल कॉन्ट्रैक्टर जो ओनर के लिए काम करता है। हो सकता है इसको पूरे प्रोजेक्ट का $00 मिले और वह लेबर को $5 पर आवर दे बाकी पैसा अपने पास रखें। जनरल कॉन्ट्रैक्टर का पोजीशन ऑब्वियसली बेटर है। कैसे पता चले? क्योंकि इस बंदे के पास अकाउंटेबिलिटी है। रिजल्ट के लिए रिस्पांसिबल है। काम सही ना हो तो रात को टेंशन लेगा। कॉन्ट्रैक्टर के पास लेवरेज है। लेबर काम करते हैं उसके लिए थोड़ी स्पेसिफिक नॉलेज भी है। टीम कैसे मैनेज करनी है, टाइम पर काम कैसे करवाना है, सिटी के रूल्स कैसे हैंडल करने हैं।

अगला लेवल है रियलस्टेट डेवलपर का। डेवलपर प्रॉपर्टी खरीदता है। कई कॉन्ट्रैक्टर हायर करता है। और प्रॉपर्टी को कुछ और वैल्यूुएबल बनाता है। शायद घर खरीदने के लिए लोन लेना पड़े या इन्वेस्टर से पैसा उठाना पड़े। पुराना घर खरीद के तोड़ के नया बनाता है। फिर बेचता है। कॉन्ट्रैक्टर को $00 मिलते हैं। लेबर को $5 पर आवर मिलता है। लेकिन डेवलपर को पूरा घर बेचने के बाद $5 लाख या $ लाख भी मिल सकते हैं। जब पूरा खर्चा निकाल के प्रॉफिट बचा हो। लेकिन यहां डेवलपर को बहुत बड़ी अकाउंटेबिलिटी लेनी पड़ती है। डेवलपर को ज्यादा रिस्क लेना पड़ता है। ज्यादा अकाउंटेबिलिटी होती है। ज्यादा लेवरेज चाहिए और और भी ज्यादा स्पेसिफिक नॉलेज चाहिए। उसको फंड रेिंग समझनी पड़ती है। सिटी के रूल्स जानने पड़ते हैं। मार्केट कहां जा रहा है वह देखना पड़ता है और रिस्क लेना चाहिए या नहीं यह डिसाइड करना पड़ता है। यह काफी मुश्किल है।

उससे एक लेवल ऊपर हो सकता है कोई जो रियलस्टेट फंड में पैसा मैनेज करता है। उसके पास बहुत ज्यादा कैपिटल लिवरेज होती है। वह बहुत सारे डेवलपर्स से डील करता है और बहुत सारे घर खरीदता है। फिर उससे भी एक लेवल ऊपर कोई हो सकता है जो कहे कि मैं मैक्सिमम लेवरेज और मैक्सिमम स्पेसिफिक नॉलेज लाना चाहता हूं। ऐसा बंदा बोलेगा कि मुझे रियलस्टेट आता है। मुझे हाउसिंग बनाना, बेचना, मार्केट का ट्रेंड समझना आता है और मुझे टेक्नोलॉजी बिजनेस भी आती है। मुझे डेवलपर्स हायर करने आता है। कोड लिखने आता है। अच्छा प्रोडक्ट बनाना।

आता है। मुझे पता है कैसे वेंचर कैपिटलिस्ट से पैसा उठाना है। कैसे पैसा वापस करना है और यह सब कैसे काम करता है। जरूरी नहीं कि एक ही इंसान यह सब जानता हो। आप एक टीम बना सकते हैं जिसमें सब अपनी स्किल लाएं। लेकिन मिलके उनके पास टेक्नोलॉजी और रियलस्टेट की स्पेसिफिक नॉलेज होगी।

बहुत बड़ी अकाउंटेबिलिटी होगी क्योंकि कंपनी का नाम भी रिस्क पर होगा। रिवॉर्ड भी बड़ा होगा और लोग अपनी जिंदगी लगा देंगे। कोड का लेवरेज होगा क्योंकि डेवलपर्स होंगे। पैसे का लेवरेज होगा क्योंकि इन्वेस्टर्स पैसा लगा रहे हैं। फाउंडर का खुद का पैसा भी लगा है। बेस्ट लेबर मिलेगा। इंजीनियर, डिजाइनर, मार्केटर जो कंपनी के लिए काम कर रहे हैं। फिर आपके पास ट्रूलिया, रेडफिन या zilo जैसी कंपनी हो सकती है जिसमें फायदा करोड़ों या बिलियन डॉलर तक हो सकता है।

हर लेवल पर लिवरेज बढ़ जाती है। अकाउंटेबिलिटी बढ़ जाती है। स्पेसिफिक नॉलेज बढ़ जाती है। आप पैसे का लिवरेज लेबर के लिवरेज पे ऐड करते हैं। कोड का लेवरेज, पैसा और लेबर पे ऐड करके आप कुछ बड़ा बना सकते हैं। सैलरी से आगे बढ़ सकते हैं। आप शुरू में सैलरी पर काम करते हैं। लेकिन आपको ऊपर बढ़ना है। ज्यादा लिवरेज, ज्यादा अकाउंटेबिलिटी, ज्यादा स्पेसिफिक नॉलेज पानी है। यह सब सालों तक साथ में कंपाउंड इंटरेस्ट के मैजिक के साथ आपको अमीर बना देगा।

एक चीज जो आपको अवॉइड करनी है वो है पूरा बर्बाद हो जाना। बर्बाद होने से बचने का मतलब है जेल से बचना। कुछ इललीगल मत करिए। जेल जाना कभी वर्थ नहीं है। पूरा लॉस होने से बचिए। बर्बाद का मतलब यह भी है कि अपनी हेल्थ का ख्याल रखिए। कोई ऐसा रिस्की चीज मत करिए जिससे आपको चोट लग सकती हो। ऐसी चीजों से बचिए जिससे आपका पूरा पैसा, पूरा सेविंग चला जाए। सब कुछ एक ही दांव पर मत लगा दीजिए बल्कि सोच समझ के बड़े फायदे के लिए पॉजिटिव रिस्क लीजिए।

अपने जजमेंट के लिए पैसा लीजिए। कौन सी जॉब, करियर या फील्ड चुननी है, कौन सा डील अपने बॉस से लेना है, यह आपको ज्यादा फ्री टाइम देता है। तब आपको टाइम मैनेजमेंट की इतनी टेंशन नहीं होती। मैं चाहता हूं मुझे सिर्फ अपनी जजमेंट के लिए पैसा मिले। काम के लिए नहीं। मैं चाहता हूं काम रोबोट कैपिटल या कंप्यूटर करें। लेकिन मुझे जजमेंट के लिए पैसे मिले। मुझे लगता है हर इंसान को किसी चीज में नॉलेज बनाना चाहिए। और अपने यूनिक नॉलेज के लिए पैसा लेना चाहिए। अपने बिजनेस में जितना हो सके लेवरेज लीजिए। चाहे रोबोट या कंप्यूटर से। फिर आप अपने टाइम के मालिक बन जाएंगे। क्योंकि आप सिर्फ आउटपुट पर जज किए जाएंगे। इनपुट पे नहीं।

सोचिए कोई बंदा आता है जिसका जजमेंट दूसरे से थोड़ा सा अच्छा हो। वो 85% सही होता है। दूसरा 75% सही। तो उसको 50 मिलियन, 100 मिलियन, 200 मिलियन भी देंगे क्योंकि 10% अच्छी जजमेंट जब 100 बिलियन डॉलर की कंपनी को चला रही हो तो उसकी वैल्यू बहुत बड़ी हो जाती है। सीईओस को उनकी लेवरेज की वजह से बहुत पैसा मिलता है। थोड़ी सी जजमेंट या टैलेंट का फर्क बहुत बड़ा हो जाता है। जजमेंट दिखाइए, क्रेडिबिलिटी दिखाइए। यह बहुत इंपॉर्टेंट है।

वारेन बफे इसीलिए जीत रहे हैं। उनकी क्रेडिबिलिटी बहुत बड़ी है। उन्होंने हमेशा अकाउंटेबिलिटी दिखाई है। वह बार-बार पब्लिक में सही साबित हुए हैं। उन्होंने ईमानदारी की रेपुटेशन बनाई है। इसलिए सब उन पर ट्रस्ट करते हैं। लोग उनके पीछे अनलिमिटेड लिवरेज लगाते हैं। क्योंकि उनकी जजमेंट पर भरोसा है। कोई नहीं पूछता वह कितनी मेहनत करते हैं, कब उठते हैं, कब सोते हैं। सब कहते हैं वारेन अपना काम करो। जजमेंट स्पेशली जो सबके सामने दिखा सकते हैं। जिसमें अकाउंटेबिलिटी हो, क्लियर ट्रैक रिकॉर्ड हो। यह सबसे इंपॉर्टेंट है। हम अपना समय छोटी सोच और बिजी काम में वेस्ट कर देते हैं। वारेन बफे एक साल सोचते हैं। एक दिन काम करते हैं और उनका एक काम डिकेड्स तक चलता है। बस थोड़ा सा बेटर होने से भी जैसे रेस में थोड़ा सा भी तेज भागने से कुछ लोग बहुत ज्यादा पैसा कमा लेते हैं। लिवरेज इनडिफरेंसेस को और बड़ा कर देता है। अपने फील्ड में टॉप पर रहना लिवरेज के जमाने में बहुत इंपॉर्टेंट है।

मैंने भी जिंदगी में बहुत बैड लक देखी है। पहली छोटी कमाई मैंने स्टॉक मार्केट में तुरंत खो दी। दूसरी छोटी कमाई या मिलनी चाहिए थी। बिजनेस पार्टनर्स ने छीन ली। तीसरी बार ही कुछ अच्छा हुआ। तब भी सब स्लो और स्टडी स्ट्रगल था। कभी एकदम से बड़ा पैसा नहीं आया। हमेशा छोटी-छोटी चीजें धीरे-धीरे जुड़ती गई। धन यानी वेल्थ बनाना कंसिस्टेंसी से होता है। बिजनेस बनाना, नए मौके बनाना, इन्वेस्ट करना। कभी एकदम का ब्लास्ट नहीं हुआ। मेरा पैसा एक साल में नहीं बना। बस धीरे-धीरे थोड़ा-थोड़ा ज्यादा ऑप्शंस, ज्यादा बिजनेस, ज्यादा इन्वेस्टमेंट्स, ज्यादा चीजें जो मैं कर सकता था। इंटरनेट की वजह से अब मौके ही मौके हैं। इतने तरीके हैं पैसा कमाने के कि मेरे पास टाइम कम पड़ जाता है। मौके इतने हैं कि हैंडल ही नहीं कर सकता। धन बनाना, प्रोडक्ट बनाना, बिजनेस बनाना, सोसाइटी से पैसा मिलना सब पॉसिबल है। मैं सब नहीं कर सकता।

अपने टाइम को एक आवरली रेट पर वैल्यू दीजिए और उस रेट पर टाइम बचाने के लिए पैसा उड़ा दीजिए। आप कभी अपनी सोच से ज्यादा वैल्यूुएबल नहीं बन सकते। कोई भी आपको उतना वैल्यू नहीं देगा जितना आप खुद को देंगे। अपनी पर्सनल आवरली रेट बहुत हाई सेट करिए और उस पर टिके रहिए। जब मैं छोटा था, मैंने सोच लिया था कि मेरी वैल्यू मार्केट से ज्यादा है। और मैंने खुद को वैसे ट्रीट किया। हमेशा हर डिसीजन में अपने टाइम का हिसाब लगाइए। कितना टाइम लगेगा? अगर एक चीज लेने सिटी के दूसरे कोने जाना एक घंटा लगाता है और आप अपनी वैल्यू $ पर आवर रखते हैं तो यह समझिए कि एक घंटा गया तो $ गया। आप कैसे करेंगे? अपने आप को फ्यूचर में सक्सेसफुल सोचिए। एक एवरेज आवरली रेट डिसाइड करिए। मान लीजिए एक टाइम था जब मुझे कोई हायर कर सकता था। अब तो नहीं कर सकते लेकिन तब मेरा रेट था $5000 पर आवर। आज सोचूं तो असल में $000 पर आवर था। फिर भी मैं स्टूपिड चीजें करता था जैसे इलेक्ट्रिशियन से झगड़ा या ब्रोकन स्पीकर वापस करना। लेकिन काम करता था दूसरे दोस्तों से कम। मैं खुली आंखों से कोई चीज ट्रेश में फेंक देता या सेल्वेशन आर्मी को दे देता वापस नहीं करता या किसी को दे देता रिपेयर नहीं करता। मैं अपनी गर्लफ्रेंड से झगड़ा करता था। अब भी वाइफ से कहता हूं मैं यह नहीं करता। यह मेरा काम नहीं। अब भी मम्मी जब छोटे-छोटे काम देती है, तो कह देता हूं, मैं यह नहीं करता। मैं आपके लिए असिस्टेंट हायर कर सकता हूं। यह तब भी सच था जब मेरे पास पैसे नहीं थे।

एक और तरीका सोचने का यह है कि अगर आप कोई काम किसी और से करा सकते हैं। और आपका आवरली रेट से कम में हो सकता है तो आउटसोर्स करिए या छोड़ दीजिए। अगर आप किसी को हायर कर सकते हैं कम पैसों में तो हायर कर लीजिए। इसमें कुकिंग भी आ सकती है। शायद आप हेल्दी घर का खाना खाना चाहते हो। लेकिन अगर आउटसोर्स कर सकते हैं तो वह कर लीजिए। अपना आवरली रेट बहुत हाई सेट करिए और उस पर टिके रहिए। वो इतना हाई होना चाहिए कि थोड़ा अजीब लगे। अगर अजीब नहीं लगता तो और बढ़ाइए। जो भी आपने सोचा है उससे ज्यादा ही रखिए। जैसे मैंने पहले भी बोला मेरे पास पैसे आने से पहले भी मैं अपना रेट $5000 पर आवर मानता था। अगर इसको एनुअल सैलरी में देखें तो यह कई मिलियन बनता है। आयरनी यह है कि मुझे लगता है मैं इससे भी आगे निकल गया। मैं सबसे मेहनती इंसान नहीं हूं। मैं एक्चुअली थोड़ा लेजी हूं। मैं एनर्जी के बस्ट में काम करता हूं। जब कुछ काम में दिल लगता है। अगर मैं देखूं कि मैंने कितना कमाया है हर असली घंटे में तो वह और भी ज्यादा था।

अगर आप अंदर ही अंदर धन से नफरत करते हैं तो धन आपसे दूर रहेगा। अगर आप हमेशा दूसरों से कंपेयर करते हैं तो आप उन लोगों से नफरत करेंगे जो आपसे आगे हैं। उनसे जलन भी करेंगे। जब आप इनसे बिजनेस करने जाएंगे वह लोग आपकी फीलिंग समझ लेंगे। जब आप बिजनेस करते हो किसी से अगर आपके मन में कोई बुरा ख्याल या जजमेंट है तो सामने वाले को फील हो जाता है। ह्यूमंस आपस में अंदर की फीलिंग समझ लेते हैं। आपके कंपेयर वाली सोच से बाहर निकलना है। अगर आप असली में धन के अगेंस्ट हैं वेल्थ के तो आप कभी अमीर नहीं बन सकते क्योंकि आपका माइंडसेट सही नहीं होगा। आपका एटीट्यूड सही नहीं होगा और आप दूसरों से सही लेवल पर डील नहीं कर पाएंगे। पॉजिटिव सोचिए, ऑप्टिमिस्टिक रहिए। यह बहुत इंपॉर्टेंट है। ऑप्टिमिस्ट लोग लॉन्ग रन में ज्यादा अच्छा करते हैं। बिजनेस वर्ल्ड में कई लोग जीरो सम गेम खेलते हैं और कुछ लोग पॉजिटिव सम गेम खेलते हैं। जो एक दूसरे को भीड़ में ढूंढ रहे होते हैं।

जिंदगी में दो बड़े गेम है। एक है पैसे का गेम। पैसा आपकी सारी प्रॉब्लम सॉल्व नहीं करेगा। लेकिन पैसे वाली प्रॉब्लम सॉल्व करेगा। लोग यह समझ जाते हैं इसलिए पैसा बनाना चाहते हैं। लेकिन बहुत लोग अंदर ही अंदर सोचते हैं कि वह पैसा बना ही नहीं सकते। वह नहीं चाहते कि कोई धन बनाए। इसलिए वह कहते हैं पैसा बनाना गलत है। पैसा बनाना नहीं चाहिए। लेकिन असल में वह दूसरा गेम खेल रहे हैं। स्टेटस का गेम। वह दूसरे लोगों के सामने हाई स्टेटस दिखाना चाहते हैं। कहते हैं, मुझे पैसा नहीं चाहिए। हमें पैसे की जरूरत नहीं। स्टेटस आपकी सोशल रैंकिंग है। धन बनाना एक नया पॉजिटिव सम गेम है। स्टेटस एक पुराना जीरो सम गेम है। जो धन बनाने को अटैक करते हैं, वह असल में सिर्फ स्टेटस ढूंढ रहे हैं। स्टेटस जीरो सम गेम है। बहुत पुराना गेम है। बंदर की ट्राइब से चल रहा है। कौन नंबर वन, कौन नंबर टू, कौन नंबर थ्री। और नंबर थ्री को नंबर टू बनना है तो नंबर टू को हटना पड़ेगा। यानी स्टेटस जीरो सम है। पॉलिटिक्स एक एग्जांपल है स्टेटस गेम का। स्पोर्ट्स भी एक एग्जांपल है। जीतने के लिए किसी को हारना ही पड़ेगा। मैं खुद स्टेटस गेम्स को नहीं पसंद करता लेकिन सोसाइटी में रोल है ताकि पता चले कौन बॉस है। लेकिन असल में यह सिर्फ जरूरी बुराई है। स्टेटस गेम जीतने के लिए आपको किसी को नीचे दिखाना पड़ता है। इसलिए स्टेटस गेम से बचिए। यह आपको गुस्से वाला और लड़ाकू इंसान बना देते हैं। आप हमेशा दूसरे को नीचा दिखाने की कोशिश करते हैं। खुद को या अपने ग्रुप के ऊपर। स्टेटस गेम्स हमेशा रहेंगे। पर यह समझ लीजिए जब आप धन बनाना चाहते हैं और कोई आपको अटैक करता है तो वह अपने स्टेटस बढ़ा रहा है आपके खर्च पे। वह अलग गेम खेल रहा है और वह गेम खराब है क्योंकि वह जीरो सम है। पॉजिटिव सम नहीं। अगर आप बेवकूफ गेम खेलेंगे तो बेवकूफी वाले इनाम मिलेंगे।

जवान लोगों के लिए सबसे इंपॉर्टेंट काम क्या है? ज्यादा समय बड़ी डिसीजंस लेने में लगाइए। जिंदगी में तीन सबसे बड़े डिसीजंस होते हैं। कहां रहेंगे, किसके साथ रहेंगे और क्या काम करेंगे। हम बहुत कम समय लगाते हैं यह डिसाइड करने में कि कौन से रिश्तों में जाना है। हम जॉब में बहुत टाइम लगाते हैं। लेकिन यह डिसाइड करने में कि कौन सी जॉब सही है। बहुत कम समय लगाते हैं। कौन से शहर में रहना है, यह आपकी जिंदगी की डायरेक्शन डिसाइड कर सकता है। लेकिन इस पर भी हम कम सोच समझ करते हैं। अगर आप किसी शहर में 10 साल रहेंगे, किसी जॉब में 5 साल रहेंगे, किसी रिश्तों में 10 साल रहेंगे, तो आपको इन चीजों को डिसाइड करने में एकद साल लगाने चाहिए। यह सबसे इंपॉर्टेंट डिसीजंस हैं। यह तीन डिसीजंस बहुत मैटर करते हैं। आपको हर चीज को ना भूलना होगा और अपना टाइम फ्री करना होगा ताकि आप इंपॉर्टेंट प्रॉब्लम सॉल्व कर सकें। यही तीन सबसे बड़े काम है।

अगर आपको सक्सेसफुल लोगों के आसपास रहना है तो क्या करें? समझिए कि आप किस चीज में अच्छे हैं और दूसरों की मदद करना शुरू करिए। जो आता है वह बांट दीजिए। दूसरों के लिए कुछ अच्छा करिए। कर्म काम करता है क्योंकि लोग कंसिस्टेंट होते हैं। टाइम के साथ आप वही पाएंगे जो आप दूसरों को देंगे। लेकिन गिनिए मत। अगर आप काउंट करना शुरू कर देंगे तो आपका पेशेंस खत्म हो जाएगा।

एक पुराने बॉस ने कहा था तुम कभी अमीर नहीं बन पाओगे क्योंकि तुम स्मार्ट हो और हमेशा कोई तुम्हें एक अच्छी जॉब ऑफर कर देगा जो काफी है। मैं एक टेक कंपनी में काम करता था होम नेटवर्क में और मैंने सबको बॉस, कोवर्कर्स, दोस्तों को बोला कि सिलिकॉन वैली में सब अपनी कंपनी शुरू कर रहे हैं। वह कर सकते हैं तो मैं भी कर सकता हूं। मैं बस टेंपरेरी यहां पे हूं। मैं एंटरप्रेन्योर हूं। मैंने एक्चुअली खुद को मजबूर नहीं किया। यह कोई सोची समझी प्लान नहीं थी। बस दिल की बात बोल रहा था। ज्यादा ऑनेस्ट था। लेकिन मैंने कंपनी नहीं शुरू की थी। यह 1996 की बात है। तब कंपनी शुरू करना बहुत मुश्किल और स्केरी था। लेकिन सबने बोलना शुरू किया। अभी तक यहीं हो। तुम्हें तो कंपनी शुरू करनी थी ना। अरे अभी तक गए नहीं। मैं लिटरली शर्म के मारे अपनी कंपनी शुरू कर दी। हां, मुझे पता है सब लोग एंटरप्रेन्योर बनने के लिए रेडी नहीं होते। लेकिन सोचिए लंबी रेस में यह आईडिया कहां से आया कि सबको दूसरों के लिए काम करना चाहिए। यह बहुत हाईरिकल मॉडल है। ऐसा काम ढूंढिए जो खेल जैसा लगे। इंसान पहले हंटर गैदर थे। सब अपने लिए काम करते थे। जब एग्रीकल्चर आया तो हेरिकी शुरू हुई। इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन और फैक्ट्रीज ने सबको हेरार्की में डाल दिया। क्योंकि एक आदमी अकेला फैक्ट्री ओन या बना नहीं सकता था। लेकिन अब इंटरनेट की वजह से हम वापस उस जमाने में जा रहे हैं जहां ज्यादा लोग अपने लिए काम कर सकते हैं। मैं तो फेल हुआ एंटरप्रेन्योर बनना पसंद करूंगा बजाय उसके जो कभी ट्राई ही नहीं किया। क्योंकि फेल हुआ एंटरप्रेन्योर भी अपने लिए जीने की स्किल्स सीख लेता है। दुनिया में लगभग 7 बिलियन लोग हैं। एक दिन आएगा जब 7 बिलियन कंपनीज़ होंगी।

मैंने पैसा बनाना सीखा क्योंकि जरूरत थी। जब जरूरत खत्म हो गई तो पैसे की फिक्र छोड़ दी। मेरे लिए काम सिर्फ एक जरिया था। पैसा बनाना एक जरिया था। मुझे असली में प्रॉब्लम्स सॉल्व करने में ज्यादा मजा आता है। पैसा कमाने से। हर एंड गोल एक नए गोल की तरफ ले जाता है। जिंदगी में हम बस गेम्स ही खेलते हैं। बच्चे हैं तो स्कूल गेम या सोशल गेम खेलते हैं। फिर पैसे का गेम, फिर स्टेटस का गेम। हर गेम का टाइम और बड़ा हो जाता है। आखिर में लगता है यह सब बस गेम ही है। गेम जहां रिजल्ट का कोई फर्क नहीं पड़ता जब आप उस गेम को देख पाते हैं। फिर आप गेम से थक जाते हैं। मैं तो यही स्टेज पर हूं। मुझे गेम ही नहीं खेलने। कोई एंड गोल या पर्पस नहीं लगता। मैं बस जिंदगी जी रहा हूं। जैसा चाहता हूं। बस हर मोमेंट जैसा है वैसा ही। मैं हेडनिक ट्रेड मिल से उतरना चाहता हूं।

असली में आपको क्या चाहिए? आजादी चाहिए। आपको अपने पैसे की प्रॉब्लम से छुटकारा चाहिए। है ना? जब आप अपने पैसों की प्रॉब्लम सॉल्व कर लेते हैं। चाहे अपनी लाइफ स्टाइल कम करके या इतना पैसा कमा के कि आप रिटायर होना चाहते हैं। लेकिन मेरा रिटायरमेंट का मतलब है वह नहीं जो 65 की उम्र में होता है। नर्सिंग होम में बैठकर चेक मिलता है। मेरा मतलब अलग है। रिटायरमेंट तब है जब आप आज को कल के लिए सैक्रिफाइस करना छोड़ दें। जब आपका आज खुद में ही कंप्लीट हो तब आप रिटायर्ड हैं। वहां कैसे पहुंचे? देखिए एक तरीका है इतना पैसा बचा लीजिए कि आपका पैसिव इनकम यानी बिना कुछ किए आपका खर्चा पूरा कर दे। दूसरा तरीका है अपना खर्चा जीरो करके जैसे एक मक तीसरा तरीका है कुछ ऐसा करिए जो आपको इतना पसंद हो कि पैसा इंपॉर्टेंट ही ना लगे। तो रिटायरमेंट के कई तरीके हैं।

कंपटीशन के ट्रैप से बाहर निकलने का तरीका है असली बनना। ऑथेंटिक। वह काम ढूंढना जो आप सबसे अच्छा करते हैं। आप वह काम इसलिए अच्छा करते हैं क्योंकि आपको उससे प्यार है। और कोई आपसे कमपीट नहीं कर सकता। अगर आपको वह काम करना अच्छा लगता है तो असली बनिए। फिर देखिए सोसाइटी को किस चीज की जरूरत है और अपनी स्किल उसमें लगा दीजिए। थोड़ा लेवरेज लगाइए। अपना नाम उस पर डालिए। रिस्क आपका होगा लेकिन रिवॉर्ड भी आपका होगा। ओनरशिप आपकी होगी। इक्विटी आपकी होगी। बस लग जाइए।

मेरे से पूछा जाता है कि जब मैं फाइनशियली फ्री हो गया तो पैसा कमाने की मोटिवेशन क्या कम हो गई? इसका जवाब है हां और ना। हां, इसलिए क्योंकि अब डेस्पिरेशन खत्म हो गई थी। लेकिन अब बिजनेस बनाना और पैसा बनाना मेरे लिए एक आर्ट बन गया है। चाहे बिजनेस हो, साइंस हो या पॉलिटिक्स। हिस्ट्री आर्टिस्ट्स को ही याद रखती है। आर्ट मतलब क्रिएटिविटी। आर्ट मतलब कोई काम सिर्फ खुशी के लिए करना। कौन से काम होते हैं जो सिर्फ अपने लिए होते हैं? पीछे कुछ नहीं होता। जैसे किसी को प्यार करना, कुछ बनाना, खेलना। मेरे लिए बिजनेस बनाना भी खेल है। मैं बिजनेस इसलिए बनाता हूं क्योंकि मुझे मजा आता है। प्रोडक्ट में इंटरेस्ट है। मैं 3 महीने में नया बिजनेस खड़ा कर सकता हूं। पैसा उठाइए, टीम बनाइए, ल्च करिए। यह मेरे लिए फन है। देखना अच्छा लगता है कि मैं क्या बना सकता हूं। पैसा साइड इफेक्ट की तरह आ जाता है। बिजनेस बनाना मेरा गेम है जिसमें मैं अच्छा हो गया हूं। बस अब मेरी मोटिवेशन गोल से आर्ट की तरफ शिफ्ट हो गई है। और मुझे लगता है अब मैं पहले से भी अच्छा हो गया हूं। मैं जब इन्वेस्ट भी करता हूं तो सिर्फ इसलिए कि मुझे लोग अच्छे लगते हैं। उनके साथ टाइम बिताना अच्छा लगता है। उनसे कुछ नया सीखने को मिलता है या प्रोडक्ट ही मुझे कूल लगता है। अब मैं अच्छे इन्वेस्टमेंट्स भी छोड़ देता हूं। अगर प्रोडक्ट इंटरेस्टिंग ना लगे तो यह सब 100% या नथिंग वाली चीज नहीं है। आप धीरे-धीरे इस तरफ बढ़ सकते हैं।

जब मैं छोटा था तो पैसा कमाने की इतनी भूख थी कि कुछ भी कर लेता। अगर कोई आकर बोलता देखो मेरे पास गटर का बिजनेस है। शामिल होना है तो मैं तुरंत हां बोल देता। मैं पैसा बनाना चाहता था। अच्छा हुआ किसी ने यह मौका नहीं दिया। अच्छा हुआ कि मैं टेक्नोलॉजी और साइंस के रास्ते पर गया जो मुझे सच में पसंद है। मैंने अपना काम और अपना शौक मिला दिया। मैं हमेशा काम करता रहता हूं। दूसरों को लगता है मैं काम कर रहा हूं। मुझे लगता है मैं खेल रहा हूं। इसीलिए मुझे पता है कोई कमपीट नहीं कर सकता। क्योंकि मैं तो खेल रहा हूं 16 घंटे दिन में। अगर कोई कम्पीट करेगा तो उसके लिए वह काम होगा 16 घंटे और वह हार जाएगा क्योंकि वह इतना टाइम नहीं दे सकता।

पैसा बुरा नहीं है। पैसा खुद में कोई प्रॉब्लम नहीं है। लेकिन पैसे की भूख बुरी है। यह सोशल सेंस में नहीं कि आप बुरे इंसान हैं। बल्कि आपके लिए खुद बुरा है। पैसे की भूख बुरी है क्योंकि यह एक बॉटमलेस पिट है। दिमाग में बस पैसा चलता रहेगा। अगर आप पैसे से प्यार करते हैं, पैसा बना लेते हैं, फिर भी कभी इनफ नहीं होता क्योंकि यह डिजायर बंद नहीं होती। कोई नंबर नहीं है जहां रुक जाए। पैसे की भूख की सजा उसी समय मिलती है जब पैसा आता है। जैसे-जैसे पैसा बढ़ता है और ज्यादा चाहिए होता है। और डर लगता है कि जो है वह भी चला ना जाए। फ्री लंच नहीं है। पैसा इसलिए कमाइए ताकि पैसा और मटेरियल वाली प्रॉब्लम सॉल्व हो सके।

मेरा यह मानना है कि पैसे की भूख से बचने का सबसे अच्छा तरीका है कि जैसे-जैसे पैसा आए लाइफस्ट मत बढ़ाइए। पैसा आते ही लाइफ स्टाइल बढ़ाना बहुत आसान है। लेकिन अगर आप लाइफस्ट सेम रख पाइए और पैसा एक साथ लमसम मिल जाए ट्रिकल ट्रिकल के बजाय तो आप इतने आगे निकल जाएंगे कि एक दिन फाइनेंशियल फ्रीडम मिल जाएगी। एक और बात जो हेल्प करती है। मैं आजादी को सबसे ऊपर रखता हूं। हर तरह की आजादी जो चाहता हूं वह करूं जो नहीं चाहता वह ना करूं अपने इमोशन से आजादी या जो भी मेरी शांति तोड़ती है उन सबसे मेरे लिए फ्रीडम नंबर वन वैल्यू है जितना पैसा आपको आजादी देता है उतना अच्छा है लेकिन जब पैसा मुझे कम फ्री करता है जो कि कभी-कभी होता ही है मुझे वह पसंद नहीं।

किसी भी गेम के विनर्स वह लोग होते हैं जो इतने एडिक्टेड हो जाते हैं कि जब जीतने का मजा कम हो जाए फिर भी खेलते रहते हैं। क्या सक्सेसफुल होने के लिए कंपनी शुरू करनी ही पड़ती है? देखिए सिलिकॉन वैली में सबसे सक्सेसफुल लोग या तो वेंचर कैपिटलिस्ट होते हैं क्योंकि उनके पास डायवर्सिफिकेशन है और रेयर रिसोर्स कंट्रोल करते हैं। या फिर वह लोग जो समझ जाते हैं कि कौन सी कंपनी ने प्रोडक्ट या मार्केट फिट जस्ट हिट किया है। इनके पास वह बैकग्राउंड, स्किल और नेटवर्क होता है जो कंपनी को स्केल करने में मदद करता है। फिर यह लोग जैसे ही नई ड्रॉप बॉक्स या नई एयरबीएनबी जैसी कंपनी में जुड़ जाते हैं। जब जकरबर्ग अपनी कंपनी स्केल कर रहे थे और घबरा गए तब उन्होंने जिम ब्रियर को फोन किया। जिम ब्रियर ने कहा मेरे पास दूसरे कंपनी में एक बहुत अच्छा प्रोडक्ट

हेड है। तुम्हें वह चाहिए। ऐसे लोग ही सबसे अच्छा परफॉर्म करते हैं। रिस्क के हिसाब से लॉन्ग टर्म में। वेंचर इन्वेस्टर्स के अलावा। सिलिकॉन वैली में जो सबसे सक्सेसफुल लोग मैंने देखे उनका करियर स्टार्ट में ही ब्रेक आउट हो गया था। जल्दी वीपी, डायरेक्टर या सीईओ बन गए। यह कंपनी शुरू की जो जल्दी चल गई। अगर आपको अर्ली प्रमोशन नहीं मिल रही तो बाद में कैचअप करना मुश्किल हो जाता है। छोटी कंपनी में जल्दी जुड़ना अच्छा है क्योंकि इंफ्रास्ट्रक्चर कम होता है तो प्रमोशन मिलने के चांसेस ज्यादा।

जब करियर के स्टार्टिंग में हो और कभी-कभी बाद में भी तो कंपनी के बारे में सबसे इंपॉर्टेंट चीज होती है एलुमिनी नेटवर्क। सोचिए किसके साथ काम करेंगे। वह लोग बाद में क्या करेंगे?

कैसे लकी बने? लकी हुए बिना अमीर बनिए। क्यों? क्योंकि अगर हजार लोग अलग-अलग यूनिवर्स में हैं तो 999 में अमीर बनना चाहिए। सिर्फ 50 में लक से अमीर बनना सही नहीं। इसलिए हमें लक को इक्वेशन से निकालना है। लेकिन लकी होना हेल्प तो करता है। है ना?

मेरे को फाउंडर बेबेक नेवी और मैंने Twitter पर डिस्कस किया था। लकी कैसे बन जाए और चार तरीके के लक होते हैं। पहला लक है ब्लाइंड लक। जहां बस कुछ भी आपके कंट्रोल के बाहर हो जाता है। जैसे किस्मत, फेट, ईटीसी। दूसरा लक है हसल, मेहनत और मूवमेंट से। जब आप हर तरफ घूम रहे हैं, नए मौके बना रहे हैं। आप एनर्जी क्रिएट कर रहे हैं। चीजें हिला रहे हैं। जैसे पेट्री डिश हिला रहे हैं और देख रहे हैं कि क्या रिएक्ट करता है। बस इतनी एनर्जी डाल दीजिए कि लक आपको ढूंढ ले। तीसरा तरीका है स्किल की वजह से लक देख पाना। अगर आप किसी फील्ड में एक्सपर्ट हैं तो जब लक का चांस आएगा तो आप पहचान लेंगे। दूसरे नहीं समझेंगे। आप लक को फील करने लगते हैं। चौथा लक सबसे अलग है। सबसे मुश्किल है। आप अपनी यूनिक पर्सनालिटी, अपनी अलग पहचान, अलग माइंडसेट बना लेते हैं। जिससे लक खुद आपको ढूंढ लेती है।

मान लीजिए आप दुनिया के बेस्ट डीप सी डवर हैं। आप ऐसे डव्स लेते हैं जो कोई नहीं लेता। बाय चांस किसी को समुंदर में डूबा हुआ खजाना मिल गया लेकिन वह निकाल नहीं पा रहा। अब उसका लक आपके लक बन गया क्योंकि वह आपके पास आएगा और आपको पैसे देगा। यह एक्सट्रीम एग्जांपल है। लेकिन यह दिखाता है कि एक बंदे को ब्लाइंड लक मिला। दूसरे को उसकी स्किल की वजह से लक मिला। आपने खुद अपना लक बनाया। अपने आप को उस पोजीशन में रखा जहां लक आपको मिल सके।

अमीर बनने के लिए हमें चांस पे नहीं छोड़ना। हमें डिटरमिनिस्टिक बनना है। लकी होने के तरीके हैं। उम्मीद करिए कि लक आपको मिल जाए। मेहनत करिए जब आपका टकराव लक से हो जाए। अपने माइंड को रेडी करिए और वह चांसेस ढूंढिए जो दूसरे मिस कर देते हैं। अपने काम में बेस्ट बनिए। अपने काम को तब तक सुधारिए जब तक यह सच ना हो जाए कि आप अपने काम में बेस्ट हो। फिर मौका आपको ढूंढ लेगा। लक आपकी किस्मत बन जाती है। जब यह डिटरमिनिस्टिक हो जाता है तो यह लक लगता ही नहीं। यह डेस्टिनी लगने लगती है।

चौथे तरीके का मतलब है अपनी पर्सनालिटी ऐसी बना लीजिए कि आपका कैरेक्टर आपकी किस्मत बन जाए। मुझे लगता है पैसा कमाने के लिए एक इंपॉर्टेंट चीज है अपनी रेपुटेशन बनाना। ताकि लोग आपके थ्रू डील करना चाहे। याद करिए डीप सी डवर का एग्जांपल ट्रेजर हंटर्स आपको अपनी स्किल्स के लिए पैसे देंगे। अगर आप ट्रस्टवर्दी, रिलायबल, ईमानदार, लंबी सोच रखने वाले हैं, तो जब लोग दूसरे के साथ डील नहीं करना चाहेंगे, वह आपके पास आएंगे। सिर्फ आपकी रेपुटेशन के लिए आपको अपना हिस्सा दे देंगे।

वारेन बफे को कंपनीज खरीदने, वारंट्स लेने, बैंक्स को बेल आउट करने और ऐसे डील्स मिलते हैं जो दूसरे लोग नहीं कर सकते। सिर्फ उनकी रेपुटेशन की वजह से। उनकी अकाउंटेबिलिटी लाइन पर होती है। उनका ब्रांड स्ट्रांग है। आपका कैरेक्टर और रेपुटेशन आप खुद बना सकते हैं और इसकी वजह से आप ऐसे मौके ले सकते हैं जो दूसरे लोग सिर्फ लक बोलेंगे। लेकिन आपको पता है वह लक नहीं है।

मेरे को फाउंडर निवी ने कहा लंबे गेम में लगता है सब एक दूसरे को अमीर बना रहे हैं और छोटे गेम में लगता है सब सिर्फ खुद को अमीर बना रहे हैं। मुझे लगता है यह बहुत अच्छी बात है। लंबे गेम में सब मिलके पाई बना रहे हैं। जितना बड़ा हो सके उतना। छोटे गेम में बस पाई को टुकड़ों में बांट रहे हैं।

नेटवर्किंग कितनी इंपॉर्टेंट है। देखिए मुझे लगता है बिजनेस नेटवर्किंग पूरा टाइम वेस्ट है। मुझे पता है कुछ लोग और कंपनीज़ इस आईडिया को फेमस कर रहे हैं। क्योंकि उनके बिजनेस को फायदा है। लेकिन असली में अगर आप कुछ इंटरेस्टिंग बना रहे हैं तो लोग खुद आपके पास आएंगे। आपको ढूंढ लेंगे। बिजनेस रिलेशनशिप को एडवांस में बनाने की कोशिश करना टाइम वेस्ट है। मेरा सिंपल फंडा है। कुछ ऐसा बनाइए जो लोग देखना चाहे। अपना काम दिखाइए, अपनी कला दिखाइए। सही लोग खुद आ जाएंगे।

और जब किसी से मिलते हैं तो कैसे पता करें कि भरोसा कर सकते हैं या नहीं? कौन से सिग्नल देखने चाहिए? देखिए। अगर कोई बंदा बार-बार बोलता है कि मैं कितना ऑनेस्ट हूं तो अक्सर वह सच नहीं होता। मैंने यह ऑब्जर्व किया है। जब कोई अपने वैल्यूस या अपनी तारीफ ज्यादा करे वह कुछ छुपा रहा होता है।

मेरे लाइफ में भी कुछ लोग हैं जो बहुत सक्सेसफुल हैं। सब उनके फ्रेंड बनना चाहते हैं। बहुत स्मार्ट हैं। लेकिन मैंने देखा है वह कभी-कभी दूसरे के साथ छोटी गलत हरकत कर लेते हैं। पहली बार मैं बोलता हूं यह मत करिए। इसलिए नहीं कि पकड़े जाएंगे। पकड़े नहीं जाएंगे। लेकिन एंड में यह आपको ही हर्ट करेगा। कोई कॉस्मिक या कर्म वाली बात नहीं। लेकिन मुझे लगता है अंदर से हम सब जानते हैं कि हम कौन हैं। अपने आप से कुछ नहीं छुपा सकते। अपनी गलतियां दिमाग में लिखी होती हैं। खुद को दिख जाती हैं। अगर आप बहुत ज्यादा गलत काम करेंगे तो आप खुद की इज्जत नहीं कर पाएंगे। दुनिया में सबसे खराब चीज है सेल्फस्ट्रीम का ना होना। अगर आप खुद से प्यार नहीं करेंगे तो कौन करेगा? मुझे लगता है यह बहुत सोच समझ के काम करिए। कोई ऐसा काम मत करिए जिसके बाद आपको खुद पर शर्म आए क्योंकि यह आपको अंदर से तोड़ देगा।

पहली बार कोई ऐसा करता है तो मैं वर्न करता हूं। वैसे कोई बदलता नहीं। फिर मैं उससे दूर हो जाता हूं। अपनी लाइफ से निकाल देता हूं। मेरे दिमाग में एक लाइन है जो जितना मेरे करीब आना चाहता है उसकी वैल्यूस उतनी ही अच्छी होनी चाहिए।

एक चीज जो मैंने लाइफ में बाद में समझी वह यह है कि कम से कम टेक बिजनेस में सिलिकॉन वैली में कि अच्छे लोगों का एंड रिजल्ट हमेशा अच्छा होता है। बस आपको सब्र पेशेंस रखना है। मेरे करियर के स्टार्टिंग में जो लोग मिले थे जिनको देख के लगता था वाह यह लड़का या यह लड़की बहुत कैपेबल है। बहुत स्मार्ट है, बहुत डेडिकेटेड है। वह सब लगभग बिना किसी एक्सेप्शन के बहुत सक्सेसफुल हो गए। बस उनको सही टाइम देना पड़ता है। यह कभी आपके हिसाब से नहीं होता ना उनके हिसाब से लेकिन होता जरूर है। अपने स्पेसिफिक नॉलेज लेवरेज के साथ लगाइए। धीरे-धीरे आपको आपका हक मिल जाएगा। टाइम लगता है। इवन जब सब कुछ सही हो जाए फिर भी कितना टाइम लगेगा यह डिसाइड नहीं कर सकते। अगर आप काउंट करेंगे तो पेशेंस खत्म हो जाएगी सक्सेस आने से पहले ही।

सबको तुरंत अमीर बनना है। लेकिन दुनिया स्मार्ट जगह है। तुरंत कुछ नहीं मिलता। आपको टाइम देना पड़ेगा। आपको आवर्स लगाने पड़ेंगे और आपको खुद को ऐसी पोजीशन में रखना पड़ेगा जहां आपके पास स्पेसिफिक नॉलेज हो, अकाउंटेबिलिटी हो, लेवरेज हो, आपकी असली स्किल हो ताकि आप अपने काम में दुनिया के बेस्ट बन सकें। आपको मजा आना चाहिए और बस करते रहना चाहिए। करते रहना चाहिए, करते रहना चाहिए। काउंट मत करिए, रिकॉर्ड मत रखिए क्योंकि अगर रखा तो टाइम खत्म हो जाएगा।

सबसे ज्यादा बेकार एडवाइस जो सुनने को मिलती है कि आप अभी बहुत जवान हैं। हिस्ट्री ज्यादातर जवान लोगों ने ही बनाई है। सिर्फ क्रेडिट उन्हें बाद में मिलता है। असली में सीखने का एक ही तरीका है। खुद करके सीखिए। हां, गाइडेंस सुनिए लेकिन रुकिए मत।

लोग अजीब तरीके से हमेशा सेम ही रहते हैं। कर्म बस यह है कि आप अपने पैटर्न, अपनी अच्छाई और अपनी गलतियां रिपीट करते हैं। जब तक आपको जो चाहिए वह मिल नहीं जाता। हमेशा आगे बढ़िए। काउंट मत करिए। यह नहीं बोल रहा कि यह सब आसान है, आसान नहीं है। यह बहुत मुश्किल है। सबसे मुश्किल काम है। लेकिन रिवॉर्ड भी है।

जो बच्चे अमीर पैदा होते हैं, उनकी लाइफ में कोई मतलब नहीं होता। आपका असली रेजुमे बस आपकी सारी तकलीफों की लिस्ट है। अगर मैं आपसे बोलूं कि अपनी असली लाइफ बताइए और आप अपनी मौत के टाइम पीछे मुड़कर देखें तो सबसे इंटरेस्टिंग चीजें वही होंगी जो आपने मुश्किल टाइम में सैक्रिफाइस किया। जो टफ काम किए जो चीजें आपको मुफ्त में मिल गई उनकी कोई वैल्यू नहीं। हाथ, पैर, दिमाग, सर, स्किन यह सब मिल गया। इनकी कोई वैल्यू नहीं। आपको टफ काम करने ही पड़ेंगे ताकि लाइफ का असली मतलब बना सकें।

पैसा कमाना भी एक ठीक चॉइस है। स्ट्रगल करिए। मुश्किल है। मैं नहीं कहूंगा आसान है। बहुत मुश्किल है। लेकिन सारे टूल्स अवेलेबल है। सब कुछ बाहर है। पैसा आपको मटेरियल दुनिया में आजादी देता है। यह आपको खुश नहीं करेगा। आपकी हेल्थ की प्रॉब्लम सॉल्व नहीं करेगा। आपकी फैमिली को ग्रेट नहीं बना देगा। आपको फिट नहीं करेगा। आपको शांत नहीं करेगा। लेकिन बहुत सारी एक्सटर्नल प्रॉब्लम्स सॉल्व करेगा। पैसा बनाना सही है। पैसा कमाने से क्या होगा? आपकी पैसे वाली प्रॉब्लम्स सॉल्व हो जाएंगी। आपको खुश नहीं करेगा। लेकिन पैसे की वजह से जो चीजें खुशी में रुकावट हैं उनको हटा देगा।

मैं बहुत ऐसे अमीर लोग जानता हूं जो खुश नहीं है। मोस्टली पैसा कमाने के लिए आपको हाई स्ट्रेस, हाई एंग्जायटी, कॉम्पिटिटिव बनना पड़ता है। 20, 30, 40, 50 साल तक आप यही करते हैं। तो अचानक पैसा मिलने पर भी आप रिलैक्स नहीं कर पाते। आपको खुश रहना अलग से सीखना पड़ता है।

मैं प्रैक्टिकल हूं क्योंकि बुद्ध भी प्रिंस थे। वह पहले अमीर थे फिर जंगल गए। पहले अगर आपको अंदर से शांति चाहिए थी तो आप मक बन जाते। सब कुछ छोड़ना पड़ता था। सेक्स, बच्चे, पैसा, पॉलिटिक्स, साइंस, टेक्नोलॉजी सब कुछ। अकेले जंगल में जाना पड़ता था। सब छोड़ के ही आजादी मिलती थी। आज पैसा नाम की जबरदस्त चीज आई है। उसको बैंक में रख सकते हैं। मेहनत करिए, सोसाइटी के लिए अच्छा करिए। सोसाइटी आपको पैसा देगी उस चीज के लिए जो उसे चाहिए पर वह बना नहीं सकती। आप पैसा बचा सकते हैं। थोड़ा कम खर्च कर सकते हैं। एक अलग आजादी मिल सकती है। इससे आपको टाइम मिलेगा। एनर्जी मिलेगी अपनी खुशी और शांति ढूंढने के लिए।

मुझे लगता है सबको खुश करने का सलूशन यही है कि उन्हें जो चाहिए वह दे दो। चलिए सबको अमीर बनाते हैं। चलिए सबको फिट और हेल्दी बनाते हैं। फिर सबको खुश बनाते हैं।

यह देख के हैरानी होती है कि कितने लोग पैसा और विडम को कंफ्यूज कर देते हैं। स्मार्ट बनने का कोई शॉर्टकट नहीं है। अगर आप मैक्सिमम पैसा कमाना चाहते हैं, अगर आप चाहते हैं कि आप प्रेडिक्टेबली अमीर बन सकें तो हमेशा नए ट्रेंड्स पर रहिए और टेक्नोलॉजी, डिजाइन और आर्ट पढ़िए। किसी एक चीज में बहुत अच्छा बन जाइए। आप पैसा बचाने के लिए अपना टाइम खर्च करके अमीर नहीं बनेंगे। आप अपना टाइम बचाने के लिए पैसा कमा के अमीर बनेंगे।

ज्यादा मेहनत करना ओवररेट हो चुका है। आज की इकॉनमी में कितना मेहनत करते हैं वह इतना इंपॉर्टेंट नहीं है। जजमेंट जजमेंट अंडर रेटेड है। जजमेंट का क्या मतलब है? देखिए मेरे हिसाब से विज़डम मतलब होता है कि आपको अपने एकशंस के लॉन्ग टर्म रिजल्ट्स पता हो। विज़डम को जब आप बाहर की प्रॉब्लम्स पर लगाते हैं तो वह जजमेंट बन जाता है। दोनों कनेक्टेड है। आपको अपने काम का लॉन्ग टर्म रिजल्ट पता हो और सही डिसीजन लीजिए ताकि उसका फायदा उठा सकें। लेवरेज के जमाने में एक सही डिसीजन सब कुछ जीत सकता है। मेहनत किए बिना ना जजमेंट आएगा ना लेवरेज मिलेगा। टाइम लगाना पड़ेगा लेकिन जजमेंट ज्यादा इंपॉर्टेंट है। आप किस डायरेक्शन में जा रहे हैं वह ज्यादा मैटर करता है। जितना तेज चल रहे हो उससे कम। हर डिसीजन में सही डायरेक्शन चुनिए। वह फोर्स लगाने से ज्यादा इंपॉर्टेंट है। बस सही डायरेक्शन चुनिए और चलना शुरू करिए।

क्लियर थिंकर होना स्मार्ट होने से ज्यादा अच्छी तारीफ है। असली नॉलेज अंदर से आती है। नीचे से शुरू होती है। मैथ्स में भी ट्रिग्नोमेट्री तभी समझ आती है जब अरथमेटिक और ज्योमेट्री आती है। बेसिकली अगर कोई बंदा बहुत बड़ी-बड़ी बातें करता है तो वह शायद खुद नहीं समझ रहा। स्मार्ट लोग बच्चों को भी चीजें समझा सकते हैं। अगर बच्चों को समझा नहीं सकते तो आपको भी नहीं आती। यह कॉमन लाइन है और बिल्कुल सही है। रिचर्ड फाइमन ने सिक्स इजी पीसेस में यही किया है। उन्होंने मैथ सिर्फ तीन पेजेस में समझा दिया। नंबर लाइन से शुरू किया गिनती से। फिर प्री कैलकुलस तक ले गए। पूरे लॉजिक से स्टेप बाय स्टेप समझाया। कोई डेफिनेशन नहीं ली। सच स्मार्ट थिंकर्स क्लियर थिंकर्स होते हैं। बेसिक्स को बहुत डीप तक समझते हैं। मैं चाहूंगा कि बेसिक्स अच्छी तरह समझ आए। ना कि हर तरह के कॉम्प्लिकेटेड कांसेप्ट्स याद कर लूं जिसको बेसिक से दोबारा नहीं बना सकता। अगर कांसेप्ट्स बेसिक से दोबारा नहीं बना सकते जब चाहिए तो आप लॉस्ट हो जाएंगे। बस रट्टा मार रहे हैं। जो फील्ड के एडवांस्ड कांसेप्ट्स होते हैं, वह कम प्रूवन होते हैं। हम उनका यूज दिखाने के लिए करते हैं कि हम इंसाइडर हैं। लेकिन असली फायदा बेसिक्स को मास्टर करने में है।

क्लियर थिंकर्स अपनी अथॉरिटी पे खुद भरोसा करते हैं। इफेक्टिव डिसीजन बनाने का एक पार्ट है रियलिटी से डील करना। आप कैसे शोर करते हैं कि जब डिसीजन ले रहे हैं तो रियलिटी देख रहे हैं। देखिए अपने आप को ज्यादा इंपॉर्टेंट मत समझिए। अपने जजमेंट को ना चिपकाइए। दिमाग की प्रेजेंस में मत रहिए। आपका मंकी माइंड हमेशा इमोशन से रिएक्ट करेगा कि दुनिया कैसी होनी चाहिए। यह डिजायर्स आपकी रियलिटी को धुंधला कर देती है। यह बहुत होता है जब लोग पॉलिटिक्स और बिजनेस मिक्स करते हैं। सबसे बड़ी चीज जो रियलिटी देखने से रोकती है वह है कि हम सोच के बैठे होते हैं कि चीजें कैसी होनी चाहिए।

सफरिंग की एक डेफिनेशन है कि जब आप चीजें एग्जैक्टली वैसे ही देखते हैं जैसे वह हैं। तब तक आपको लगता है आपका बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा है लेकिन आप इग्नोर कर रहे हैं कि वह अच्छा नहीं चल रहा। फिर आपका बिजनेस फेल हो जाता है और आप दुख में चले जाते हैं। क्योंकि आपने रियलिटी से मुंह छुपा लिया था। गुड न्यूज़ यह है कि सफरिंग का मोमेंट यानी जब दर्द होता है वह सच का मोमेंट है। तब आपको रियलिटी को जैसा है वैसे एक्सेप्ट करना पड़ता है। फिर आप एक्चुअल प्रोग्रेस कर सकते हैं। प्रोग्रेस तभी होती है जब आप सच से शुरू करते हैं। सबसे मुश्किल काम है सच देख पाना। सच देखने के लिए अपना ईगो साइड में रखना पड़ता है। क्योंकि ईगो सच का सामना नहीं करना चाहता। जितना अपना ईगो छोटा रखेंगे, जितना रिएक्शनंस को कंडीशन नहीं होने देंगे, जितनी कम डिजायर्स रखेंगे, आउटकम को लेकर, उतना ही आसान होगा रियलिटी देख पाना। जो हम चाहते हैं कि सच हो, वह हमारी सोच को धुंधला कर देता है कि असल में सच क्या है। सफरिंग वही मोमेंट है जब हम रियलिटी को इग्नोर नहीं कर सकते।

सोचिए हम किसी मुश्किल फेस से गुजर रहे हैं। ब्रेकअप, जॉब चली गई, बिजनेस फेल हो गया या हेल्थ प्रॉब्लम है। और हमारे दोस्तों ने हमें एडवाइस दी। जब हम अपने दोस्तों को एडवाइस देते हैं तो आंसर बिल्कुल सिंपल लगता है। 1 मिनट में बोल देते हैं उस लड़की को भूल जा। वह तेरे लायक नहीं थी। खुश हो जाएगा। ट्रस्ट कर तुझे कोई और मिल जाएगा। आपको सही जवाब पता है। लेकिन आपके दोस्त को नहीं पता। वह नहीं देख सकता क्योंकि वह दर्द और सफरिंग में है। वह अभी भी चाहता है कि रियलिटी कुछ और होती। प्रॉब्लम रियलिटी नहीं है। प्रॉब्लम यह है कि उसकी डिजायर रियलिटी से टकरा रही है। इसलिए वह सच नहीं देख पा रहा। चाहे आप कितनी बार भी उसे समझाइए। मेरे डिसीजंस में भी यही होता है। जितनी ज्यादा इच्छा होती है कि कोई चीज एक तरीके से हो, उतनी ही कम चांसेस होते हैं कि आप सच देख पाइए। बिजनेस में भी अगर कुछ गलत हो रहा है तो मैं कोशिश करता हूं खुल के बोलो अपने कोफाउंडर फ्रेंड्स और कोवर्कर्स के सामने एक्सेप्ट करूं तब मैं किसी से नहीं छुपा रहा जब किसी से नहीं छुपा रहा तब खुद से भी सच नहीं छुपा सकता। जो आप फील करते हैं, उसका सच्चाई से कोई लेना देना नहीं है। वह सिर्फ यह बताता है कि आपको लगता क्या है।

एम्प्टी स्पेस होना बहुत जरूरी है। अगर आपके कैलेंडर में हफ्ते में एकद दिन नहीं है जब आप बिजी नहीं है, मीटिंग्स नहीं है, तो आप सोच नहीं पाएंगे। आपके दिमाग में नए आइडियाज नहीं आएंगे। बिजनेस के लिए अच्छे आइडियाज नहीं आएंगे। अच्छा डिसीजन नहीं ले पाएंगे। मैं यह भी कहता हूं हफ्ते में एक दिन या दो क्योंकि प्लान दो करेंगे तो एक मिलेगा। ऐसा रखिए जिसमें बस सोचने का टाइम हो। तभी जब आप बोर होते हैं तब अच्छे आइडियाज आते हैं। जब स्ट्रेस हो, बिजी हो, भागदौड़ हो तब नहीं आते। टाइम निकाल के रखिए।

बहुत से स्मार्ट लोग अक्सर अजीब लगते हैं क्योंकि वह हर चीज खुद से सोचते हैं। कॉन्ट्रेरियन वह नहीं जो हमेशा उल्टा बोले। वह भी एक तरीके का कंफर्मिस्ट है। कॉन्ट्रेरियन वो है जो अपने दिमाग से अलग सोचता है और प्रेशर में आकर भीड़ के साथ नहीं चलता। सिसिज्म आसान है। दूसरों की नकल करना आसान है। ऑप्टिमिस्टिक कॉन्टरियन सबसे रेयर होते हैं।

अपनी आइडेंटिटी को हटाइए सच देखने के लिए। हमारे ईगो हमारे बचपन में बनते हैं। पहले 20 साल में हमारा एनवायरमेंट पैरेंट सोसाइटी बना देते हैं। फिर पूरी जिंदगी ईगो को खुश रखने में निकल जाती है। हम हर नई चीज ईगो के थ्रू देखते हैं। जैसे मैं बाहर की दुनिया को कैसे बदलूं ताकि वह मेरी मर्जी जैसी हो जाए। टेंशन है तुम क्या बनना चाहते हो? रिलैक्सेशन है। तुम क्या हो?

हैबिट्स जरूरी है जिंदगी में। हर प्रॉब्लम को पहली बार जैसे सॉल्व नहीं कर सकते। सब हैबिट्स जमा कर लेते हैं। आइडेंटिटी, ईगो अपने आप में डाल लेते हैं। फिर उनसे चिपक जाते हैं कि मैं नवल हूं। मैं ऐसा हूं। अपने आप को अनकंडीशन कर पाना बहुत इंपॉर्टेंट है। अपनी हैबिट्स को अलग करके देख पाना और सोच पाना। यह हैबिट शायद तब ली थी जब छोटा था। पेरेंट्स की अटेंशन चाहिए थी। अब इसको इतना रीइंफोर्स कर दिया कि आइडेंटिटी का हिस्सा बन गई। क्या यह अभी मेरे काम की है? क्या यह मुझे खुश रखती है? क्या यह मुझे हेल्दी रखती है? क्या यह मुझे मेरी मंजिल तक ले जाती है? मैं दूसरे लोगों से कम हैबचुअल हूं। मैं अपने दिन को ज्यादा स्ट्रक्चर नहीं करता। जो हैबिट्स हैं वह भी सोच समझ के रखता हूं ना कि बस हिस्ट्री के एक्सीडेंट की वजह से।

कोई भी बिलीफ जो आपने पैकेज में ले ली जैसे डेमोक्रेट, कैथोलिक, अमेरिकन उस पर डाउट करिए और बेसिक से दोबारा सोचिए। मैं कोशिश करता हूं कि ज्यादा पहले से कुछ डिसाइड ना करके रखूं। आइडेंटिटीज और लेबल्स बनाना आपको बंधन में डाल देता है और सच नहीं देखने देता। अगर आपको सच बोलना है तो बिना आइडेंटिटी के बोलिए। मैं पहले खुद को लिबर्टेरियन मानता था। लेकिन फिर मुझे लगा मैं ऐसे आइडियाज डिफेंड कर रहा हूं जो मैंने सोचे ही नहीं। सिर्फ इसलिए क्योंकि वह लिबर्टेरियन पैकेज का हिस्सा है। अगर आपके सारे बिलीव्स एक बंडल में फिट हो जाते हैं तो शायद आपको फिर से सोचना चाहिए। मुझे अब अपने आप को किसी भी लेवल में फिट करना अच्छा नहीं लगता। इसलिए मेरे पास कम ऐसे सो कॉल्ड स्टेबल बिलीव्स हैं। हर किसी के पास कोई ऐसा बिलीफ होता है जो सोसाइटी को पसंद नहीं। लेकिन जितना आपकी अपनी आइडेंटिटी और आपका ग्रुप उसे नहीं मानता। उतना ही वह बिलीव असली होता है।

लॉन्ग टर्म में सफरिंग के दो इंपॉर्टेंट लेसन है। एक यह कि आप दुनिया को जैसे है वैसे एक्सेप्ट करना सीख जाते हैं। दूसरा लेसन है कि आपका ईगो बहुत पेनफुल तरीके से चेंज होता है। मान लीजिए आप कॉम्पिटिटिव एथलीट हैं और इंजरी हो गई जैसे ब्रूसली को। अब आपको एक्सेप्ट करना पड़ेगा कि एथलीट होना आपकी पूरी आइडेंटिटी नहीं है और हो सकता है आप फिलॉसफर बन जाइए।

Facebook रिीडन करता है। Twitter रिीडन करता है। लोगों की पर्सनालिटीज, कैरियर्स और टीम्स भी रिीडाइन चाहिए होती हैं। डायनेमिक सिस्टम में कुछ भी परमानेंट स्यूशन नहीं होता। डिसीजन मेकिंग के स्किल्स सीखिए। क्लासिकल वर्चूस सारे डिसीजन मेकिंग के शॉर्टकट है ताकि आप शॉर्ट टर्म की जगह लॉन्ग टर्म सोचिए। जब अपने फायदे का नतीजा निकालते हैं तो उसके लिए ज्यादा स्ट्रिक्ट होना चाहिए। मैं अपने नेक्स्ट कुछ सालों का गोल यही रखता हूं कि पुरानी सीखी हुई रिस्पांस आदतों को हटा सकूं ताकि मैं हर वक्त फ्रेश माइंड से डिसीजन ले सकूं बिना पुरानी मेमोरी या पहले से बनाए जजमेंट के। ऑलमोस्ट सब बायसेस टाइम बचाने के शॉर्टकट होते हैं। जब इंपॉर्टेंट डिसीजन लेना हो तो मेमोरी और आइडेंटिटी को साइड में रख के सिर्फ प्रॉब्लम

पर ध्यान दीजिए। रेडिकल ऑनेस्टी का मतलब है मैं फ्री रहना चाहता हूं। फ्री रहने का एक हिस्सा है कि जो सोचूं वह बोल सकूं और जो बोलूं वह सोचूं। यह दोनों एक जैसी चीजें हैं।

फिजिसिस्ट रिचर्ड फाइमन ने कहा था कभी किसी को बेवकूफ मत बनाइए क्योंकि आप खुद को सबसे जल्दी और आसानी से बेवकूफ बना लेते हैं। जब आप किसी से झूठ बोलते हैं तो आप खुद से ही झूठ बोलते हैं। फिर आप अपने ही झूठ पर यकीन करने लगते हैं और रियलिटी से दूर हो जाते हैं। मैं कभी नहीं पूछता मुझे यह पसंद है या नहीं। मैं सिर्फ सोचता हूं यह है या यह नहीं है। मेरे लिए सच बोलना बहुत इंपॉर्टेंट है। मैं किसी को हर्ट करने या नेगेटिव बात बोलने की कोशिश नहीं करता।

मैं रेडिकल ऑनेस्टी को वारेन बफे की एक पुरानी रूल के साथ कंबाइन करता हूं। प्रज़ स्पेसिफिक करिए। क्रिटिसिज्म जनरल। मैं कोशिश करता हूं कि इस रूल को फॉलो करूं। हमेशा नहीं होता लेकिन इतना फॉलो करता हूं कि मेरी लाइफ में फर्क पड़ता है। अगर आप किसी को क्रिटिसाइज करना है तो इंसान को नहीं उसकी अप्रोच या एक्टिविटी को क्रिटिसाइज करिए। और अगर किसी की तारीफ करनी है तो सबसे बेस्ट एग्जांपल वाले इंसान की करिए। नाम लेकर करिए। इससे लोगों का ईगो आपके अगेंस्ट नहीं जाता। आपके फेवर में काम करता है।

सवाल है कि इंस्टिंक्ट वाली सीधी ऑनेस्टी का टैलेंट कैसे डेवलप करें? देखिए सबको बोल दीजिए। अभी शुरू करिए। सीधा बोलना जरूरी नहीं। करिश्मा का मतलब है कॉन्फिडेंस और प्यार दोनों एक साथ दिखाना। अक्सर पॉसिबल है कि सच और पॉजिटिव दोनों रहे।

इन्वेस्टर और एंजेलिस्ट के सीईओ के तौर पर मुझे तब पैसा मिलता है जब मैं दूसरों के गलत होने पर सही हो। डिसीजन मेकिंग सब कुछ है। अगर कोई इंसान 80% सही डिसीजन लेता है 70% की जगह तो मार्केट में उसकी वैल्यू कई गुना ज्यादा हो जाती है। लोग लेवरेज के एक सिंपल रूल को समझ नहीं पाते। अगर मैं एक बिलियन डॉलर मैनेज करता हूं और मैं दूसरों से 10% ज्यादा सही हूं तो मेरे एक डिसीजन से 100 मिलियन डॉलर की वैल्यू क्रिएट हो सकती है। टेक्नोलॉजी बड़े वर्क फोर्स कैपिटल की वजह से हमारे डिसीजंस का इंपैक्ट और भी ज्यादा हो गया है। अगर आप थोड़ा ज्यादा सही हैं, ज्यादा रैशन हैं, तो आपकी अपनी लाइफ में नॉन लीनियर रिटर्न्स मिलेंगे। मुझे फर्नम स्ट्रीट ब्लॉग बहुत पसंद है क्योंकि वह आपको एक्यूरेट और अच्छा डिसीजन मेकर बनाने में मदद करता है।

डिसीजन मेकिंग सब कुछ है। जितना ज्यादा आपको पता है उतना कम आप डायवर्सिफाई करते हैं। मेंटल मॉडल्स जमा करिए। डिसीजन मेकिंग के टाइम दिमाग एक मेमोरी प्रेडिक्शन मशीन बन जाता है। खराब तरीका है कि पहले एक्स हुआ तो अब भी एक्स होगा। यह सिर्फ स्पेसिफिक सिचुएशन पर बेस्ड होता है। आपको प्रिंसिपल्स चाहिए। आपको मेंटल मॉडल्स चाहिए। मेरे बेस्ट मेंटल मॉडल्स मुझे इवोल्यूशन, गेम थ्यरी और चार्ली मुंगेर से मिले। चार्ली मुंगेर वारेन बफे के पार्टनर हैं। बहुत अच्छे इन्वेस्टर हैं। उनके पास बहुत मेंटल मॉडल्स हैं। नसीम तालिब के पास भी अच्छे मेंटल मॉडल्स हैं। बेंजमिन फ्रैंकलिन के पास भी। मैं अपना दिमाग इन सब मेंटल मॉडल्स से भर लेता हूं। मैं अपने ट्वीट्स और दूसरे लोगों के ट्वीट्स को मैक्सिमम्स की तरह यूज करता हूं ताकि अपनी लर्निंग को कंप्रेस कर सकूं और याद रख सकूं। दिमाग की स्पेस लिमिटेड है। न्यूरॉन्स लिमिटेड है। इसलिए इन्हें पॉइंटर, एड्रेस या न्यूमोनिक की तरह सोचिए जो आपके अंदर से डीपली सीखी हुई चीजें याद दिलाते हैं। अगर आपके पास असली एक्सपीरियंस नहीं है तो यह सब बस कोर्ट्स की तरह पढ़ते हैं। थोड़ी देर के लिए कूल लगता है। पोस्टर बन जाएगा लेकिन फिर भूल जाएंगे। मेंटल मॉडल सिर्फ शॉर्ट तरीका है अपनी असली नॉलेज को याद रखने का।

मुझे लगता है आज की मॉडर्न सोसाइटी को इवोल्यूशन से समझा जा सकता है। एक थ्योरी यह है कि सिविलाइजेशन इसी सवाल का जवाब ढूंढने के लिए बनी है कि किसको पार्टनर मिलना चाहिए। अगर आप सीधा सेक्सुअल सिलेक्शन की नजर से देखिए तो स्पर्म बहुत है, एग्स कम है। यह पूरा एलोकेशन का प्रॉब्लम है। इंसानों के सारे काम इसी प्रॉब्लम को सॉल्व करने के चक्कर में होते हैं। इवोल्यूशन, थर्मोडायनेमिक्स, इंफॉर्मेशन थ्योरी और कॉम्प्लेक्सिटी। यह सब चीजें जिंदगी के बहुत पहलू समझने और प्रेडिक्ट करने में काम आती हैं।

इन्वर्जन मैं नहीं मानता कि मैं बता सकता हूं कि क्या काम करेगा। मैं बस यह ट्राई करता हूं कि जो काम नहीं करेगा उसको हटा दूं। मेरे हिसाब से सक्सेस का राज यह है कि गलती ना करिए। सही डिसीजन लेने का टैलेंट नहीं गलत डिसीजन ना लेने का टैलेंट चाहिए।

कॉम्प्लेक्सिटी थ्यरी। मैं 90ज में कॉम्प्लेक्सिटी थ्यरी में बहुत इंटरेस्टेड था। जितना अंदर गया उतना समझा कि हमारी नॉलेज और प्रेडिक्शन की लिमिट क्या है। कॉम्प्लेक्सिटी ने मुझे बहुत हेल्प की है। उसने मुझे यह समझा दिया कि इग्नोरेंस में कैसे काम करें। मुझे लगता है हम लोग असली में अंधेरे में हैं और फ्यूचर प्रेडिक्ट करने में बहुत खराब है।

इकोनॉमिक्स माइक्रोइकोनॉमिक्स और गेम थ्यरी बेसिक चीजें हैं। बिजनेस में या मॉडर्न कैपिटलिस्ट दुनिया में सक्सेसफुल होने के लिए सप्लाई डिमांड, लेबर कैपिटल, गेम थ्यरी इन सब की अच्छी समझ जरूरी है। बकवास को इग्नोर करिए। मार्केट ही डिसाइड करेगा।

प्रिंसिपल एजेंट प्रॉब्लम। मेरे लिए प्रिंसिपल एजेंट प्रॉब्लम माइक्रोइकोनॉमिक्स की सबसे बड़ी प्रॉब्लम है। अगर आपको प्रिंसिपल एजेंट प्रॉब्लम समझ नहीं आई तो आप दुनिया में सर्वाइव नहीं कर पाएंगे। यह तब इंपॉर्टेंट है जब आप सक्सेसफुल कंपनी बनाना चाहते हैं या डीलिंग्स में सक्सेस होना चाहते हैं। यह कांसेप्ट सिंपल है। जूलियस सीजर ने कहा था अगर काम सही करवाना है तो खुद जाओ। अगर नहीं करवाना तो किसी और को भेजो। मतलब जब आप प्रिंसिपल हैं, ओनर हैं तो आपको फर्क पड़ता है। आप अच्छा काम करते हैं। जब आप एजेंट हैं, दूसरे के लिए काम कर रहे हैं तो शायद इतना अच्छा ना कर पाए। आप अपना फायदा देखते हैं। प्रिंसिपल के एसेट्स को नहीं। जितनी छोटी कंपनी उतना सबको प्रिंसिपल वाली फीलिंग। जितना कम एजेंट जैसे फील करेंगे उतना अच्छा काम करेंगे। जितनी क्लोजली आप किसी की सैलरी उसकी वैल्यू से जोड़ देंगे उतना वह प्रिंसिपल बन जाएगा। एजेंट कम। मुझे लगता है हम सब अंदरूनी तौर पर इसको समझते हैं। हम प्रिंसिपल की तरफ अट्रैक्ट होते हैं। उनके साथ कनेक्ट करते हैं। लेकिन मीडिया और मॉडर्न सोसाइटी आपको एजेंट की जरूरत बताकर कंफ्यूज करती हैं।

कंपाउंड इंटरेस्ट फाइनेंस में तो सबको पता ही होगा। अगर नहीं पता माइक्रोइकोनॉमिक्स की बुक खोलिए। स्टार्ट से एंड तक पढ़ने लायक है। कंपाउंड इंटरेस्ट का एग्जांपल है। मान लीजिए आपके पास $1 है और आपको 10% का रिटर्न मिल रहा है तो पहले साल आपके पास $1.1 हो जाएंगे। अगले साल $1.21 फिर $.33 यह ऐसे ही बढ़ता जाता है। अगर आप 30% की स्पीड से 30 साल तक कंपाउंड करिए तो पैसा 10 या 20 गुना नहीं हजारों गुना ज्यादा हो जाएगा। इंटेलेक्चुअल चीजों में भी कंपाउंड इंटरेस्ट का रूल चलता है। मान लीजिए एक बिजनेस है, 100 यूज़र्स हैं 20% मंथली ग्रोथ पे तो जल्दी ही यह यूज़र्स में मिलियन तक पहुंच सकते हैं। कभी-कभी फाउंडर्स भी हैरान हो जाते हैं कि बिजनेस कितना बड़ा हो गया।

बेसिक मैथ। मुझे लगता है बेसिक मैथ्स को लोग अंडरएस्टिमेट करते हैं। अगर आपको पैसा कमाना है, इन्वेस्ट करना है तो बेसिक मैथ्स आनी चाहिए। ज्योमेट्री, ट्रिग्नोमेट्री, कैलकुलस की जरूरत नहीं अगर आप बिजनेस में हैं। लेकिन अरथमैटिक, प्रोबेबिलिटी, स्टैटिस्टिक्स बहुत इंपॉर्टेंट है। बेसिक मैथ्स की बुक खोलिए। एनश्योर करिए कि मल्टीप्लिकेशन, डिवीजन, कंपाउंडिंग, प्रोबेबिलिटी और स्टैटिस्टिक्स आपको सही आती हो।

ब्लैक स्नांस। आजकल प्रोबेबिलिटी स्टैटिस्टिक्स में एक नई ब्रांच है जो टेल इवेंट्स पे बेस्ड है। ब्लैक स्नांस मतलब एक्सट्रीम्स की प्रोबेबिलिटी। मुझे फिर तालिब की बात याद आती है जो मेरे हिसाब से हमारे टाइम के बेस्ट फिलॉसफर साइंटिस्ट हैं। उन्होंने इस पर बहुत काम किया है।

कैलकुलस कैलकुलस जानना अच्छा है। आपको रेट ऑफ चेंज और नेचर का काम समझ में आता है। लेकिन कैलकुलस के प्रिंसिपल्स समझना ज्यादा जरूरी है। जैसे छोटी-छोटी चीजों में बदलाव को कैसे मेजर करते हैं। आपको इंटीग्रल सॉल्व करना या डेरिवेटिव करना जरूरी नहीं क्योंकि बिजनेस वर्ल्ड में यह काम नहीं आएगा।

फॉल्सिफायबिलिटी। सबसे कम समझी जाने वाली लेकिन सबसे इंपॉर्टेंट प्रिंसिपल है फॉल्सिफायबिलिटी। अगर कोई चीज फॉल्सिफायबल प्रेडिक्शन नहीं देती। तो वह साइंस नहीं है। किसी भी चीज पर विश्वास करने के लिए उसमें प्रेडिक्टिव पावर होना चाहिए और वह फॉल्सिफायबल भी होनी चाहिए। मुझे लगता है मैकोनॉमिक्स करप्ट हो गया है क्योंकि वह फॉल्सिफायबल प्रेडिक्शन नहीं देता। साइंस का असली टेस्ट है यही। इकोनमी को स्टडी करते वक्त आपके पास कभी भी काउंटर एग्जांपल नहीं होते। आप यूएस इकॉनमी को दो अलग एक्सपेरिमेंट में एक साथ नहीं चला सकते।

अगर आप कभी भी डिसाइड नहीं कर पा रहे हैं तो आंसर हमेशा ना है। अगर मैं कोई टफ चॉइस फेस कर रहा हूं। जैसे मुझे इस इंसान से शादी करनी चाहिए या मुझे यह जॉब लेनी चाहिए। मुझे यह घर खरीदना चाहिए। मुझे इस सिटी में शिफ्ट होना चाहिए। मुझे इस इंसान के साथ बिजनेस स्टार्ट करना चाहिए। अगर आप डिसाइड नहीं कर पा रहे हैं तो जवाब है ना। क्योंकि आज की दुनिया में चॉइससेस बहुत ज्यादा है। इंटरनेट पर हर किसी से कनेक्टेड है। हजारों कैरियर्स अवेलेबल है। चॉइसेस इतनी है कि आप सोच भी नहीं सकते। आपके दिमाग की प्रोग्रामिंग इतनी चॉइसेस के लिए नहीं बनी है। हिस्ट्री में हम सब छोटी ट्राइब्स में जीते थे। सिर्फ 150 लोगों के बीच। जब कोई आता था तो वही ऑप्शन होता था पार्टनर के लिए। जब आप कुछ चूज़ करते हैं तो बहुत टाइम के लिए लॉक हो जाते हैं। बिजनेस स्टार्ट करते हैं तो 10 साल लग सकते हैं। रिलेशनशिप शुरू करते हैं तो पांच या उससे ज्यादा साल। किसी सिटी में शिफ्ट करते हैं तो 10 से 20 साल तक वहीं रहते हैं। यह बहुत बड़े डिसीजंस हैं। इसलिए सिर्फ तभी हां बोलिए जब अंदर से काफी श्योर हो। 100% श्योर तो कभी नहीं होंगे लेकिन काफी श्योर हो जाइए। अगर आप डिसीजन के लिए स्प्रेडशीट बना रहे हैं, प्रोज़ क्स लिख रहे हैं, बैलेंस चेक कर रहे हैं, तो छोड़ दीजिए। अगर डिसाइड नहीं कर पा रहे तो जवाब है ना।

रन और फिल सिंपल रूल है। अगर दोनों ऑप्शन में कंफ्यूज हैं किन्ही भी दो ऑप्शन में तो जो ज्यादा पेनफुल लग रहा है शॉर्ट टर्म में वह चूस करिए। अगर आपके पास दो चॉइसेस हैं और दोनों ऑलमोस्ट इक्वल लग रही हैं तो जो ज्यादा टफ और शॉर्ट टर्म में पेन वाली है उसको लीजिए। सच यह है कि एक रास्ते में शॉर्ट टर्म पेन है। दूसरे रास्ते में पेन आगे फ्यूचर में है। आपका दिमाग कॉन्फ्लिक्ट अवॉयडेंस में शॉर्ट टर्म पेन को टाल रहा है। अगर दोनों ऑप्शन इक्वल है और एक में शॉर्ट टर्म पेन है तो उसमें लॉन्ग टर्म गेन होगा। कंपाउंड इंटरेस्ट का रूल यही है। लॉन्ग टर्म गेन के पीछे जाइए। आपका दिमाग शॉर्ट टर्म खुशी को ज्यादा वैल्यू दे रहा है और शॉर्ट टर्म पेन को अवॉइड कर रहा है। आपको यह टेंडेंसी हटानी है। उस पेन वाले रास्ते को चूज़ करके जिंदगी के ज्यादातर गेंस शॉर्ट टर्म सफरिंग से आते हैं। ताकि लॉन्ग टर्म में पेमेंट मिल सके। मेरे लिए वर्कउ मजा नहीं है। शॉर्ट टर्म में पेन होता है। लेकिन लॉन्ग टर्म में मसल्स मिलती हैं। हेल्थ अच्छी होती है। जब मैं कोई किताब पढ़ रहा हूं और कंफ्यूज हो रहा हूं। वह भी वर्कआउट की तरह है। बस दिमाग थक रहा है। लॉन्ग रन में दिमाग तेज हो रहा है क्योंकि नए कांसेप्ट अब्सॉर्ब कर रहा है। अपने लिमिट पर काम कर रहा है। तो जनरल रूल है कि शॉर्ट टर्म पेन ले लीजिए लेकिन लॉन्ग टर्म गेन के लिए।

नए मेंटल मॉडल्स कैसे बनाएं? सबसे जल्दी। देखिए बहुत पढ़ाई करिए। बस पढ़िए। रोज एक घंटा साइंस, मैथ और फिलॉसफी पढ़ेंगे तो 7 साल में आप इंसानी सक्सेस के टॉप पर पहुंच जाएंगे। पढ़ाई करना सीखिए और पढ़ाई से प्यार करना सीखिए। जो असली प्यार पढ़ाई से होता है, वह एक सुपर पावर है। आज हम एलेक्जेंड्रिया जैसे जमाने में जीते हैं। हर किताब, हर नॉलेज सिर्फ एक क्लिक दूर है। सीखने के तरीके बहुत हैं, लेकिन सीखने की चाहत बहुत कम है।

पढ़ाई मेरा पहला प्यार था। मुझे याद है इंडिया में मेरे दादा-दादी का घर। मैं छोटा बच्चा था। जमीन पर बैठ के दादा के रीडर्स डाइजेस्ट पढ़ रहा होता था। क्योंकि उनके पास बस वही पढ़ने का होता था। आज तो इंफॉर्मेशन का समुंदर है। कोई भी कुछ भी पढ़ सकता है। पहले ऑप्शंस कम थे। मैं कॉमिक बुक्स, स्टोरी बुक्स जो मिलता था सब पढ़ लेता था। मुझे लगता है मुझे हमेशा पढ़ने का शौक था। क्योंकि मैं एक एंटीसोशल इंट्रोवर्ट हूं। बचपन से ही शब्दों और आइडियाज की दुनिया में खो गया था। शायद इसीलिए भी क्योंकि मेरे ऊपर किसी ने कभी जबरदस्ती नहीं की कि यह पढ़ वह मत पढ़। पेरेंट्स और टीचर्स की टेंडेंसी होती है बोलने की कि यह पढ़ो, वह मत पढ़ो। मैं तो वह भी पढ़ लेता था जो आज के हिसाब से मेंटल जंक फूड माना जाता है। जो चीज पढ़ने में मजा आए वह पढ़िए। तब तक पढ़िए जब तक आपके पढ़ने से ही प्यार ना हो जाए। आपको बस वही पढ़ना चाहिए जो आपको अच्छा लगता है। बस इसीलिए पढ़िए। कोई मिशन या टारगेट नहीं चाहिए। बस पढ़ाई का मजा लीजिए।

आजकल मैं दोबारा पढ़ने लगा हूं। जितना पढ़ रहा हूं उससे ज्यादा दोबारा पढ़ रहा हूं। एक ट्वीट में पढ़ा था। मुझे सब कुछ नहीं पढ़ना। मुझे बस 100 बेस्ट किताबें बार-बार पढ़नी है। यह बात सही है। सबसे इंपॉर्टेंट है कि अपनी फेवरेट किताबें ढूंढिए क्योंकि हर किताब हर किसी को अलग तरह से लगती है। उसके बाद आप उनको अच्छे से समझ सकते हैं। किताब पढ़ना कोई रेस नहीं है। जितनी अच्छी किताब उतनी धीरे-धीरे पढ़िए। मैं खुद बताऊं तो मेरी अटेंशन बहुत खराब है। मैं स्किम करता हूं, स्पीड रीड करता हूं। इधर-उधर जंप कर जाता हूं। मैं स्पेसिफिक पैसेज या कोट नहीं याद रख सकता। लेकिन किसी डीप लेवल पर वह सब आपके दिमाग में घुस जाती हैं। और आपके सोचने का तरीका बन जाती हैं। आपने भी शायद यह फील किया होगा कि एक किताब उठाई, पढ़ने लगे। लगा कि यह इंटरेस्टिंग है, अच्छी है। फिर आधे रास्ते में याद आता है, अरे यह तो पहले पढ़ चुका हूं। कोई दिक्कत नहीं। मतलब आप दोबारा पढ़ने के लिए रेडी थे। मैं वैसे ज्यादा किताबें नहीं पढ़ता। मैं बहुत सारी उठाता हूं लेकिन कुछ ही पूरा पढ़ता हूं जो मेरी नॉलेज का बेस बनती हैं। असली बात यह है कि मैं उतना नहीं पढ़ता जितना लोग सोचते हैं। शायद मैं दिन में एकद घंटे पढ़ता हूं। पर यही मुझे टॉप 0.01% [संगीत] में डाल देता है। शायद इस पढ़ने की वजह से ही मेरी लाइफ में मटेरियल सक्सेस और इंटेलिजेंस आई। असली दुनिया में लोग एक मिनट भी नहीं पढ़ते। असली बात है कि उनको हैबिट बनाना सबसे इंपॉर्टेंट है। क्या पढ़ रहे हैं इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। जब तक आप इतना पढ़ लेंगे कि आपके इंटरेस्ट आपको सही जगह ले जाएंगे। आपकी लाइफ बदल जाएगी। जैसे सबसे अच्छा वर्कउ वह होता है जो आप हर दिन कर सकते हैं। वैसे ही बुक्स, ब्लॉग्स, ट्वीट्स या कुछ भी। सबसे अच्छा वह है जो आपको पढ़ने का मन करता है। चार्ली मुंगेर ने कहा था कि जब तक मेरे हाथ में किताब है, मुझे लगता ही नहीं कि मैं वक्त बर्बाद कर रहा हूं।

हर किसी का दिमाग अलग होता है। कुछ लोग नोट्स बनाना पसंद करते हैं। मेरा नोट्स Twitter है। मैं पढ़ता रहता हूं। जब कुछ फंडामेंटल आहा मोमेंट मिलता है तो Twitter पर थोड़े में समराइज कर देता हूं। फिर लोग मुझ पर अटैक करते हैं। एक्सेप्शनंस निकालते हैं। फिर मैं सोचता हूं यह मैंने क्यों किया? ऑब्वियस एक्सेप्शनंस बताना मतलब या तो सामने वाला समझ नहीं रहा या आप नहीं समझ रहे। जब आप पहली बार किताब उठाते हैं, क्या आप कुछ इंटरेस्टिंग ढूंढ रहे हैं? आप कैसे पढ़ते हैं? बस किसी भी पेज से शुरू कर लेते हैं। देखिए, मैं स्टार्टिंग से ही शुरू करता हूं, लेकिन तेज पढ़ाई करता हूं। अगर इंटरेस्टिंग नहीं लगा तो आगे बढ़ जाता हूं। स्किमिंग, स्पीड रीडिंग अगर पहले चैप्टर में ही अच्छी तरह से ध्यान नहीं आया तो या तो किताब छोड़ देता हूं या आगे कुछ चैप्टर्स स्किप कर देता हूं। मैं यह नहीं मानता कि किसी चीज का मजा बाद में लेना चाहिए। जब इतनी सारी किताबें दुनिया में पढ़ने को है। इतनी अच्छी किताबें हैं। कितनी किताबें पूरी की यह बस दिखावा है। जैसेजैसे आप ज्यादा जानते हैं, उतनी ज्यादा किताबें आधे में छोड़ देंगे। नए कांसेप्ट्स पर ध्यान दीजिए जो आपको कुछ नया समझा सके। मैं आमतौर पर स्कीम करता हूं। आगे बढ़ता हूं। जो पार्ट इंटरेस्टिंग लगे वह ढूंढता हूं। ज्यादातर नॉन फिक्शन किताबें बस एक पॉइंट कहती हैं। एक पॉइंट बताती हैं। फिर उसका एग्जांपल पर एग्जांपल देती जाती हैं। हर चीज पर अप्लाई करके समझाती हैं। जब मुझे लगता है कि मैं उस पॉइंट को समझ गया हूं। मैं आराम से किताब छोड़ देता हूं। बहुत सी ऐसी किताबें हैं जो बस बेकार की है। लोग पूछते हैं क्या आपने यह किताब पढ़ी? मैं हमेशा बोल देता हूं। हां। पर असल में शायद दो चैप्टर्स ही पढ़ता हूं। मैं सिर्फ जस्ट समझता हूं। अगर किसी ने सिर्फ पैसा कमाने के लिए किताब लिखी है तो मत पढ़िए।

आप किताब पढ़ के इंफॉर्मेशन को कैसे अपने अंदर लाते हैं या ऑर्गेनाइज करते हैं? यह समझना है। जो सीखा है वह किसी और को समझाइए। सिखाने से ही असली सिखाई होती है। यह बात एजुकेटेड या अनएुकेटेड होने की नहीं है। यह सिर्फ दो चीजों की है जो पढ़ना पसंद करते हैं और जो नहीं करते। मैथ्स, साइंस और फिलॉसफी की ग्रेट बुक्स पढ़िए। अपने आसपास के लोगों और न्यूज़ को इग्नोर करिए। किसी ग्रुप या ट्राइब से अपने आप को मत जोड़िए। सच को सोसाइटी के अप्रूवल से ऊपर रखिए। लॉजिक और मैथ्स पढ़िए। क्योंकि जब आप इन पर कमांड पा लेंगे तो आपको कोई किताब डराएगी नहीं। लाइब्रेरी में कोई भी किताब हो। आपको कभी डर नहीं लगना चाहिए। चाहे वह मैथ्स हो, फिजिक्स हो, इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग हो, सोशियोलॉजी हो या इकोनॉमिक्स हो। आप कोई भी किताब उठाइए, पढ़िए। बहुत सी आपके लिए मुश्किल होंगी। कोई बात नहीं। फिर भी पढ़िए। फिर दोबारा पढ़िए। फिर दोबारा पढ़िए। जब आप कोई किताब पढ़ रहे हैं और आपको समझ नहीं आ रहा तो वह कंफ्यूजन वैसे ही है जैसे जिम में दर्द होता है। जब आप एक्सरसाइज करते हैं। पर आप दिमाग के मसल्स बना रहे हैं। बॉडी के नहीं। सीखिए कैसे सीखना है और किताबें पढ़िए। बस पढ़ लीजिए।

बोलने में दिक्कत यह है कि दुनिया में बहुत सारा कचरा है। इतने तरह-तरह के ऑथर हैं जितने तरह के लोग बहुत सारे ऑथर बेकार की चीजें लिखते हैं। मेरे लाइफ में कुछ लोग ऐसे हैं जो बहुत पढ़ते हैं पर ज्यादा स्मार्ट नहीं है क्योंकि उन्होंने गलत चीजें गलत ऑर्डर में पढ़ी। उन्होंने शुरुआत में ही कुछ गलत या हाफ गलत चीजें पढ़ी। वह उनके दिमाग की फाउंडेशन बन गई। जब नए आइडियाज आते हैं तो वह पहले से बनाई फाउंडेशन से जज करते हैं। आपकी फाउंडेशन बेस्ट होनी चाहिए। ज्यादा लोग मैथ से डरते हैं। इसलिए वह मैथ्स या सूडो साइंस से बैक्ड ओपिनियंस को ज्यादाेंस देते हैं। पढ़ने के मामले में अपने फाउंडेशन को बहुत हाई क्वालिटी बनाइए। सबसे अच्छी फाउंडेशन बनाने का तरीका शायद आपको यह पसंद ना आए। बस एक ट्रिक है। साइंस पे टिक जाइए। बेसिक्स पे टिक जाइए। बहुत कम चीजें हैं जिससे लोग आर्ग्यू नहीं करते। जैसे 2 + 2 = 4 राइट? यह असली नॉलेज है। मैथ्स सॉलिड फाउंडेशन है। वैसे ही हार्ड साइंसेस भी सॉलिड फाउंडेशन है। माइक्रोइकोनॉमिक्स भी सॉलिड फाउंडेशन है। जैसे ही आप इन फाउंडेशन से बाहर निकलते हैं। आप ट्रबल में आ जाते हैं क्योंकि फिर आपको नहीं पता क्या सच है, क्या गलत। मैं जितना हो सके उतना सॉलिड फाउंडेशन पर ध्यान देता हूं। अरथमेटिक्स और ज्योमेट्री में मास्टर हो जाना यह ज्यादा इंपॉर्टेंट है एडवांस्ड मैथ्स के कंपैरिजन में। मैं माइक्रोइकोनॉमिक्स पूरी जिंदगी पढ़ता रहूं। माइक्रोइकोनॉमिक्स वन वन।

एक और तरीका यह है कि ओरिजिनल्स पढ़िए। क्लासिक्स पढ़िए। जैसे आपको इवोल्यूशन में इंटरेस्ट है तो चार्ल्स डार्विन पढ़िए। पहले रिचर्ड डॉकिंग्स मत पढ़िए। वैसे मुझे डॉकिंग्स अच्छे लगते हैं। बाद में पढ़िए। पहले डार्विन को पढ़िए। अगर माइक्रोइकोनॉमिक्स सीखना है तो सबसे पहले एडम स्मिथ, वॉन मिसेस या हक को पढ़िए। इकोनमी के असली फिलॉसफर्स को पढ़िए। अगर आप कम्युनिस्ट या सोशलिस्ट आईडियाज में हैं जो मैं खुद नहीं हूं तो कार्ल मार्क्स को पढ़िए। करंट इंटरप्रिटेशंस को मत पढ़िए कि क्या सही है क्या गलत। अगर आप ओरिजिनल से शुरू करते हैं तो आपके पास अपना एक वर्ल्ड व्यू बन जाता है और समझ आ जाता है। फिर आपको कोई भी किताब से डर नहीं लगेगा। आप बस सीख सकते हैं।

अगर आप एक परपचुअल लर्निंग मशीन बन गए तो पैसा कमाने के तरीके कभी खत्म नहीं होंगे। आप हमेशा देख सकते हैं कि सोसाइटी में क्या नया आ रहा है, किस चीज की वैल्यू है, डिमांड कहां है और आप उसी हिसाब से सीख सकते हैं। साफ सोचने के लिए बेसिक समझिए। अगर आप एडवांस्ड कांसेप्ट्स बस याद कर रहे हैं बिना समझे या फिर से डिराइव किए तो आप खो जाएंगे। आजकल Twitter और Facebook का जमाना है। हमें छोटी-छोटी तेज वाली बातें मिलती हैं जो समझना मुश्किल है। किताबें पढ़ना आज के जमाने में बहुत मुश्किल हो गया है क्योंकि हमारी आदत बिगड़ गई है। एक तरफ हमारी अटेंशन बहुत कम हो गई है क्योंकि इतनी इंफॉर्मेशन मिल रही है। हम सब कुछ स्किप करना चाहते हैं। शॉर्ट में समझना चाहते हैं। सीधा पॉइंट पर आना चाहते हैं। Twitter

ने मुझे एक बेकार रीडर बना दिया। पर राइटर अच्छा बना दिया। दूसरी तरफ हम बचपन से सीखते हैं कि किताब पूरी करिए। स्कूल में कहते हैं कि किताब पूरी पढ़िए। किताबें पवित्र हैं। धीरे-धीरे हम भूल जाते हैं कि किताब कैसे पढ़ी जाती है। मैं जितने लोगों को जानता हूं सब किसी ना किसी किताब पर अटके हुए हैं। हो सकता है आप भी किसी किताब पर अटके हुए होंगे। शायद पेश 332 पे हो। आगे नहीं बढ़ पा रहे लेकिन लगता है फिनिश तो करनी ही है। तो क्या करते हैं? कुछ दिन के लिए किताब पढ़ना ही छोड़ देते हैं।

मेरे लिए किताब ना पढ़ना बड़ी दुख की बात है। मैं तो बुक्स पर ही बड़ा हुआ। फिर ब्लॉग्स पर आ गया। फिर Twitter और Facebook पे आ गया। और तब मुझे समझ आया कि मैं कुछ सीख ही नहीं रहा। बस छोटी-छोटी डोपेमिन वाली चीजें मिल रही हैं। पूरे दिन। 140 कैरेक्टर का एक मजा आता था। ट्वीट करता था। फिर देखता था किसने रीट्वीट किया। मजेदार गेम था। लेकिन बस एक गेम था।

फिर मुझे समझ आया कि मुझे फिर से बुक्स पढ़नी चाहिए। यह मुश्किल था क्योंकि मेरा दिमाग Facebook, Twitter पे ही सेट हो गया था छोटी-छोटी बातों पर। तो मैंने एक नया तरीका निकाला। मैंने किताब को ब्लॉग पोस्ट या ट्वीट की तरह ट्रीट करना शुरू किया। मुझे कोई मजबूरी नहीं लगती थी कि किताब पूरी करनी है। अब जब कोई किताब का नाम लेता है, मैं तुरंत खरीद लेता हूं। एक समय पर 10 20 किताबें पढ़ रहा होता हूं। आगे पीछे पलट लेता हूं। अगर किताब बोर हो रही है तो आगे बढ़ जाता हूं। कभी बीच में से पढ़ना शुरू कर देता हूं। अगर कोई पैराग्राफ अच्छा लग जाए। बिल्कुल भी प्रेशर नहीं कि किताब पूरी करनी है।

इसी तरह से बुक्स मेरी लाइब्रेरी में वापस आ गई। अच्छी बात है क्योंकि पुरानी किताबों में बहुत ज्ञान है। जब भी प्रॉब्लम सॉल्व करनी हो जितनी पुरानी प्रॉब्लम हो उतना पुराना स्यूशन। अगर आप कार चलाना या प्लेन उड़ाना सीखना चाहते हैं तो आज के जमाने की बुक्स पढ़िए क्योंकि यह प्रॉब्लम नया है और स्यूशन भी नया ही अच्छा है। लेकिन अगर बात है पुराने प्रॉब्लम्स की जैसे बॉडी कैसे हेल्दी रखें? कैसे शांत रहें? कौन से वैल्यू सिस्टम्स अच्छे हैं? फैमिली कैसे संभालें? तो पुराने स्यूशन ही ज्यादा अच्छे होते हैं। जो किताब 2000 साल टिक गई है, उसने हजारों लोगों का टेस्ट पास किया है। उसकी बातें ज्यादा सही होंगी।

मुझे वापस वैसे ही किताबें पढ़ने का मन हुआ। जैसे कोई गाना दिमाग में अटक जाता है। वैसे ही सोच भी चिपक जाती है। ध्यान से पढ़िए क्या पढ़ रहे हैं। एक शान दिमाग, अच्छी सेहत और प्यार से भरा घर। यह चीजें खरीदी नहीं जा सकती। यह खुद पानी पड़ती हैं। खुद बनानी पड़ती हैं।

[संगीत] पार्ट टू हैप्पीनेस। [संगीत]

जिंदगी की तीन बड़ी चीजें हैं। दौलत, सेहत और खुशी। हम इनको इसी ऑर्डर में ढूंढते हैं। लेकिन असलेंस उल्टा है। अगर खुशी की बात करें कि कैसे सीखें तो खुद को इतना सीरियस मत लीजिए। आप बस एक बंदर हैं जो प्लान बना रहा है। खुशी सीखी जा सकती है।

10 साल पहले अगर कोई मुझसे पूछता कि मैं कितना खुश हूं तो मैं मजाक में उड़ा देता। मुझे बात करना ही नहीं पसंद था। अगर एक से 10 स्केल पर पूछते तो मैं कहता दो या 10 में से तीन। कभी-कभी अच्छे दिन में चार 10 में से पर मैं खुश रहने को इंपॉर्टेंट ही नहीं मानता था। आज मैं 10 में से नौ हूं। हां, पैसे से मदद मिलती है। पर यह बहुत छोटा हिस्सा है। ज्यादातर तो यह सीख के आया हूं कि खुशी मेरे लिए सबसे जरूरी चीज है। और मैंने कई तरीके से यह खुद में पैदा की है।

शायद खुशी पैदाइशी चीज नहीं है। ना ही सिर्फ चूज़ करने वाली चीज है। यह एक स्किल है जो सीखी जा सकती है। जैसे फिटनेस या न्यूट्रिशन। मुझे लगता है खुशी भी बदलती रहती है। जैसे हर बड़े सवाल के जवाब। जब आप छोटे थे, मां से पूछते थे मौत के बाद क्या होता है? साक्क क्लॉज़ है या नहीं? भगवान है क्या? खुश रहना चाहिए क्या? शादी किससे करनी चाहिए? इन सब सवालों के एकदम सिंपल जवाब नहीं है क्योंकि एक ही जवाब सब पर फिट नहीं बैठते। इनका जवाब हर किसी का अलग होता है। जो मेरे लिए सही है, वह शायद आपके लिए बेकार हो। जो खुशी मेरे लिए है वह आपके लिए कुछ और हो सकती है। बहुत जरूरी है कि आप यह खुद समझिए कि खुशी आपके लिए क्या है।

कुछ लोगों के लिए खुशी मतलब फ्लो स्टेट है। कुछ के लिए सेटिस्फेक्शन, कुछ के लिए संतुष्टि। मेरी डेफिनेशन हर साल बदलती रहती है। जो जवाब मैं एक साल पहले देता, आज कुछ और दूंगा।

आज मैं मानता हूं कि खुशी एक डिफॉल्ट स्टेट है। खुशी तब आती है जब आपको लगता है कि आपकी जिंदगी में कुछ भी मिसिंग नहीं है। हम सब सर्वाइवल मशीन है। हर वक्त सोच रहे हैं। मुझे यह चाहिए, मुझे वह चाहिए। हम डिजायर्स के जाल में फंसे रहते हैं। खुशी तब है जब कुछ भी नहीं चाहिए। जब कुछ भी मिसिंग नहीं है। दिमाग शांत हो जाता है। ना पास्ट में भटकता है ना फ्यूचर की प्लानिंग करता है। उस समय अंदर ही अंदर एक साइलेंस आ जाती है। तब लगता है हां अब सही। अब सब ठीक है। मैं खुश हूं। आप चाहिए तो डिसए्री कर सकते हैं। सबके लिए अलग है।

लोग गलती से सोच लेते हैं कि खुशी मतलब पॉजिटिव सोच या पॉजिटिव काम। मेरे एक्सपीरियंस से हर पॉजिटिव सोच के अंदर एक नेगेटिव सोच भी होती है। यह सब डुअलिटी है। जैसे मैं कहूं कि मैं खुश हूं तो इसका मतलब मैं कभी उदास भी था। अगर मैं कहूं यह लड़का अच्छा दिखता है तो मतलब कोई दूसरा खराब दिखता होगा। हर पॉजिटिव के अंदर नेगेटिव का बीज होता है और नेगेटिव के अंदर पॉजिटिव का। इसीलिए जिंदगी के बड़े लेसंस दुख से ही आते हैं। जब तक आप नेगेटिव नहीं देखेंगे तब तक पॉजिटिव की वैल्यू नहीं समझेंगे।

मेरे लिए खुशी का मतलब पॉजिटिव सोच नहीं है ना ही नेगेटिव सोच। खुशी मतलब कुछ भी चाहिए नहीं। स्पेशली बाहर की चीजें जितनी कम डिजायर्स उतना ज्यादा मैं अभी के हालत को एक्सेप्ट कर सकता हूं। उतना कम मेरा दिमाग भागता है। क्योंकि दिमाग तो बस फ्यूचर या पास्ट में ही भागता है। जितना ज्यादा प्रेजेंट में रहूंगा उतना ज्यादा खुश रहूंगा।

अगर मैं किसी फीलिंग को पकड़ लेता हूं, सोचता हूं मैं अब खुश हूं और चाहता हूं यह खुशी रुके तो वह खुशी निकल जाएगी। दिमाग दोबारा चल पड़ेगा। कुछ पकड़ने की कोशिश करेगा। टेंपरेरी चीज को परमानेंट बनाना चाहेगा। मेरे लिए खुशी मतलब दुख नहीं होना। कुछ भी चाहिए नहीं। दिमाग फ्यूचर या पास्ट में ना भागे। बस इस पल को पूरी तरह महसूस करें। जैसे है वैसे एक्सेप्ट करें।

अगर आपकी अपनी जिंदगी में सुकून चाहिए तो अच्छे बुरे के चक्कर से आगे बढ़ जाइए। नेचर के लिए खुशी दुख कुछ नहीं है। नेचर बस अपने नियम पर चलती है। एक चैन है कॉज और इफेक्ट की। बिग बैंग से लेकर अब तक सब कुछ परफेक्ट है। बस हमारे दिमाग में ही खुशी और दुख परफेक्ट और इंपपरफेक्ट है। क्योंकि हम चाहते हैं चीजें हमारी मर्जी की हो। दुनिया सिर्फ आपके खुद के इमोशंस आपको वापस दिखाती है। रियलिटी न्यूट्रल है। रियलिटी का कोई जजमेंट नहीं है। एक पेड़ के लिए सही गलत अच्छा बुरा कुछ नहीं होता। आप पैदा होते हैं, कुछ चीजें महसूस करते हैं, फिर मर जाते हैं। उनको आपने कैसे समझा वह आपके ऊपर है।

इसीलिए मैं कहता हूं हैप्पीनेस यानी खुशी एक चॉइस है। अगर आप मानना शुरू कर दें कि यह आपके हाथ में है तो आप इस पर काम कर सकते हैं। आपके इमोशंस पे बाहर की कोई ताकत असर नहीं करती। चाहे लगता हो कि हो रहा हो।

मेरा यह भी मानना है कि हम खुद कुछ खास नहीं है और यह सोच बहुत हेल्प करती है। सोच अगर आप समझें कि आप दुनिया के सबसे इंपॉर्टेंट इंसान हैं तो आपको लगता है पूरी दुनिया आपके हिसाब से चलनी चाहिए। और जब ऐसा नहीं होता तो आपको लगता है कुछ गलत है। लेकिन अगर आप खुद को एक बैक्टीरिया या एक छोटी सी चीज मान लें या अपनी सारी मेहनत को सिर्फ पानी पर लिखने जैसे या रेत पर महल बनाने जैसा समझ लें तो आप कुछ एक्सपेक्ट नहीं करेंगे कि जिंदगी कैसी होनी चाहिए। जिंदगी बस है जैसे है। जब आप यह मान लेते हैं तब खुश या उदास होने का कोई रीजन ही नहीं बचता। वह सब चीजें अप्लाई ही नहीं होती।

खुशी तब मिलती है जब आपके अंदर यह फीलिंग हट जाती है कि जिंदगी में कुछ मिसिंग है। जब आप न्यूट्रल हो जाते हैं तो यह कोई बोरिंग स्टेट नहीं है। लोग सोचते हैं न्यूट्रल मतलब बोरिंग पर असल में छोटे बच्चे ऐसे ही होते हैं। उनको देखिए ज्यादा टाइम खुश ही दिखते हैं क्योंकि वह पूरे प्रेजेंट में रहते हैं। बिना किसी पर्सनल पसंद या नापसंद के। न्यूट्रल स्टेट एक्चुअली परफेक्ट स्टेट है। आदमी बहुत खुश रह सकता है जब तक वह अपने दिमाग में फंसा ना हो।

हमारी जिंदगी जुगनू के चमक जैसी है। एक पल के लिए है बस। हर सेकंड कीमती है। इसका मतलब यह नहीं कि जिंदगी भर कोई बेकार डिजायर चीज करिए। मतलब यह है कि हर पल की वैल्यू समझिए। खुद को खुश रखिए और हर चीज को अच्छी नजर से देखिए।

हम सोचते हैं कि हम फिक्स्ड हैं और दुनिया बदल सकती है। लेकिन असल में हम खुद बदलने वाले हैं और दुनिया ज्यादातर फिक्स्ड है। मेडिटेशन करने से रियलिटी को एक्सेप्ट करना आता है। लेकिन यह भी सच है कि इसका असर कम ही होता है। आप कितना भी मेडिटेट कर लीजिए पर कोई गलत बात सुन लेंगे। तो फिर आप वापस वही ईगो वाले हो जाते हैं। जैसे एक पाउंड के डमबेल से एक्सरसाइज कर रहे हैं। पर कोई आके आपके सर पर पूरा जिम गिरा दे। कुछ ना करने से तो मेडिटेशन बेहतर है। लेकिन जब असली दुख आता है तो उस वक्त यह सब भी आसान नहीं होता।

असली खुशी तब आती है जब मन में शांति हो। ज्यादातर खुशी एक्सेप्टेंस से आती है। बाहर की चीजें बदलने से नहीं। एक समझदार इंसान बाहर की चीजों से अलग होकर शांति पा सकता है। मैंने अपनी आइडेंटिटी कम कर दी है। मैंने दिमाग की बकबक कम कर दी है। जो चीजें मैटर नहीं करती उन पर ध्यान नहीं देता। पॉलिटिक्स में नहीं पढ़ता। उदास लोगों से दूर रहता हूं। अपने टाइम की वैल्यू समझता हूं। फिलॉसफी पढ़ता हूं, मेडिटेशन करता हूं। खुश लोगों के साथ रहता हूं और यह सब काम करता है। आप धीरे-धीरे लगातार अपनी खुशी का लेवल बढ़ा सकते हैं। जैसे फिटनेस बढ़ा सकते हैं।

खुशी यानी हैप्पीनेस एक चॉइस है। खुशी, प्यार, पैशन यह चीजें ढूंढने की नहीं चूज़ करने की चीजें हैं। खुशी एक चॉइस है और एक स्किल है जो आप डेवलप कर सकते हैं। दिमाग भी शरीर की तरह बदल सकता है। हम जिंदगी भर दुनिया दूसरे लोग अपने शरीर को बदलने की कोशिश में लग जाते हैं। पर खुद को वैसे ही मान लेते हैं जैसे हम अपने बचपन में प्रोग्राम हो गए। हम अपने दिमाग की आवाज को सच मान लेते हैं। पर सब कुछ बदल सकता है और हर दिन नया है।

मेमोरी और आइडेंटिटी। यह दोनों पास्ट का बोझ है जो हमें प्रेजेंट में जीने नहीं देते। खुशी के लिए प्रेजेंट में रहना जरूरी है। जब आप सड़क पर चल रहे हैं, आपका दिमाग का सिर्फ एक छोटा हिस्सा प्रेजेंट में होता है। बाकी दिमाग फ्यूचर की प्लानिंग या पास्ट का रिग्रेट करता रहता है। इस वजह से आप लाइफ का मजा नहीं ले पाते। ना ही आपको चीजों की खूबसूरती दिखती है ना ग्रेटट्यूड आता है। अगर आप सिर्फ फ्यूचर के सपनों में जिएंगे तो अपनी खुशी खुद खत्म कर देंगे। हम उन चीजों की तलाश में रहते हैं जो हमें प्रेजेंट में ले आए। पर वह क्रेविंग्स भी हमें प्रेजेंट से दूर ले जाती है।

मैं अपने पास्ट में कुछ भी नहीं मानता। ना यादें ना पछतावा ना लोग ना सफर कुछ भी नहीं। हमारी ज्यादातर उदासी इसलिए होती है क्योंकि हम पास्ट को प्रेजेंट से कंपेयर करते रहते हैं। अपनी बुरी आदतें छोड़ने से प्रेजेंट में रहना आसान हो जाता है।

एक अच्छी डेफिनेशन है। एनलाइटनमेंट मतलब दो सोच के बीच का स्पेस। मतलब एनलाइटनमेंट पाने के लिए 23 साल पहाड़ पर बैठना जरूरी नहीं। यह हर दिन हर पल में मिल सकती है। हर दिन थोड़ा एनलाइटेंड रह सकते हैं। क्या पता शायद यही जिंदगी वह जन्नत वो स्वर्ग है जो हमें वादा किया गया था और हम ही उसको बर्बाद कर रहे हैं।

हैप्पीनेस के लिए शांति जरूरी है। खुशी इतना ओवरलोडेड शब्द है। हैप्पीनेस। मुझे तो अभी भी नहीं पता इसका सही मतलब क्या है। मेरे लिए आजकल खुशी का मतलब ज्यादा शांति है ना कि खुशी या जॉय। मुझे नहीं लगता शांति और पर्पस एक साथ चलते हैं। अगर पपस अंदर से आ रहा है जो चीज आप दिल से करना चाहते हैं तो हां आपको खुशी मिलेगी। लेकिन अगर बाहर से आया हुआ पपस है जैसे सोसाइटी चाहती है कि मैं एक्स करूं। मैं अपने खानदान का पहला बेटा हूं तो मुझे व करना चाहिए या मेरे ऊपर कोई बोझ है तो उससे खुशी नहीं मिलेगी।

मुझे लगता है हम सबके अंदर एक हल्का सा चिंता का एहसास रहता है। अगर आप अपने दिमाग पर ध्यान दीजिए कभी-कभी बिना वजह के तो थोड़ा बेचैन महसूस करेगा। आपका दिमाग में कुछ ना कुछ चल रहा होता है। शायद आप शांत नहीं बैठ पाते। हमेशा दिमाग में नेक्स्ट चल रहा होता है कि अब कहां जाना है? अब क्या करना है? हमेशा अगला कदम फिर उसके बाद अगला फिर उसके बाद भी कुछ बस यही चलता रहता है। जिसकी वजह से चिंता बनी रहती है। यह तब सबसे ज्यादा दिखता है जब आप बस चुपचाप बैठ जाइए। कुछ भी मत करिए। सच में कुछ भी मत करिए। ना कोई किताब, ना म्यूजिक। बस चुप बैठ जाइए। पर आप बैठ ही नहीं सकते। अंदर से चिंता उठाने लगती है। लगता है कुछ करना है। उठ जा कुछ कर। यही चिंता है जो आपको खुश नहीं रहने देती। यह चिंता सिर्फ दिमाग की चल रही सोच है।

मैं चिंता से कैसे लड़ता हूं। मैं उससे लड़ता ही नहीं। बस देख लेता हूं कि मेरी चिंता सिर्फ सोच की वजह से है। फिर मैं सोचता हूं। मुझे अभी यह सोच चाहिए या मुझे अपनी शांति चाहिए क्योंकि जब तक मेरे दिमाग में यह सोच है मैं शांति में नहीं रह सकता। जब भी मैं खुशी कहता हूं तो मेरा मतलब शांति होता है। पीस जब ज्यादा लोग खुशी कहते हैं तो वह जॉय या ब्लिस की बात करते हैं। लेकिन मैं पीस मैं शांति चाहता हूं। खुश इंसान वह नहीं होता जो हमेशा खुश रहता है। खुश वह है जो हर चीज को ऐसे समझ लेता है कि उसके अंदर की शांति नहीं टूटती।

हर इच्छा अपनी मर्जी से ली गई नाखुशी है। मुझे लगता है सबसे बड़ा इंसानी गलती यह है कि सोचते हैं कोई बाहरी चीज मिल जाएगी तो हम खुश हो जाएंगे। यह कोई नई बात नहीं है। यह बुद्धिज्म की बेसिक बात है। मैं इस पर अपना क्रेडिट नहीं ले रहा। बस मुझे लगता है कि मैंने इस बात को अंदर तक समझा है। अपने लिए भी।

मैंने एक नई गाड़ी खरीदी और मैं रोज उस गाड़ी का इंतजार कर रहा हूं। हर रात फोरम पे उसी गाड़ी के बारे में पढ़ रहा हूं। क्यों? यह सिर्फ एक चीज है। सिर्फ एक गाड़ी है। इससे मेरी लाइफ में कोई बड़ी बदलाव नहीं आएगा। मुझे पता है जैसे ही गाड़ी आ जाएगी मुझे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। असल में मैं चाहने को इस चाह का एडिक्ट हो चुका हूं। मुझे लगता है कोई बाहरी चीज मुझे खुशी देगी। लेकिन यह सिर्फ एक धोखा है। बाहरी चीजों में खुशी ढूंढना सबसे बड़ी गलतफहमी है।

यह नहीं बोल रहा कि बाहर कुछ करना नहीं चाहिए। बिल्कुल करना चाहिए। हम जिंदा हैं। कुछ तो करना ही है। इसीलिए हम जिंदा हैं। तो कुछ बनाने के लिए आए हैं। सिर्फ रेत में बैठ के ध्यान करने के लिए नहीं। आपको अपनी जिंदगी जीनी है। जो दिल करे वह करना है। पर सोचिएगा कि आप कुछ बाहर से चेंज करेंगे और इससे आपको हमेशा की खुशी मिल जाएगी। यह सबसे बड़ा धोखा है जो हम सब करते हैं रोज दिन भर। बाहर कुछ है जो मुझे हमेशा के लिए खुश कर देगा। यह सबसे बड़ी गलतफहमी है।

इच्छा डिजायर एक कॉन्ट्रैक्ट है जो आप अपने आप से करते हैं कि जब तक वह चीज नहीं मिलेगी आप तब तक नाख रहेंगे आप खुश नहीं रहेंगे। ज्यादातर लोगों को पता ही नहीं चलता कि असली में यह हो क्या रहा है। दिन भर कुछ ना कुछ चाहते रहते हैं। फिर सोचते हैं हम खुश क्यों नहीं है। मुझे लगता है अगर इस बात का ध्यान रखिए तो इच्छाओं को ध्यान से चुन सकते हैं। मैं कोशिश करता हूं कि एक समय में एक ही बड़ी इच्छा रखूं और समझ लूं कि मेरी नाखशी का असली रीजन वही है। मुझे पता होता है कि किस चीज की वजह से मैंने खुद को नाख बनाया है।

इच्छा यानी डिजायर एक कॉन्ट्रैक्ट है। जो आप खुद से करते हैं जब तक वह नहीं मिलेगा तब तक आप ना खुश रहेंगे। एक चीज जो मैंने अभी सीखी है यह अपनी इच्छाओं को सही करना ज्यादा इंपॉर्टेंट है। बजाय कुछ ऐसी चीज करने के जो आप पूरे दिल से नहीं चाहते।

जब आप जवान हैं और सेहतमंद हैं तो ज्यादा कर सकते हैं। लेकिन ज्यादा काम करके आप और ज्यादा इच्छा ले लेते हैं। आपको पता ही नहीं चलता कि धीरे-धीरे यह आपकी खुशी खत्म कर रहा है। मुझे लगता है जवान लोग ज्यादा नाख होते हैं पर ज्यादा हेल्दी रहते हैं। बूढ़े लोग ज्यादा खुश होते हैं पर कम हेल्दी रहते हैं।

जब आप जवान हैं, आपके पास समय है, हेल्थ है पर पैसा नहीं है। जब आप मिडिल एज में हैं तो आपके पास पैसा है, हेल्थ है पर समय नहीं है। जब आप बूढ़े हो जाते हैं तो आपके पास पैसा है, समय है पर हेल्थ नहीं है। तो असली जीत है इन तीनों को एक साथ पाना। जब तक लोगों को समझ आता है कि उनके पास पैसा काफी हो गया है तब तक उनका टाइम और हेल्थ चली जाती है।

खुश रहने के लिए जरूरी नहीं कि आप सफल हो जाइए। खुशी मतलब जो है उसमें ही खुश रहना। सफलता तो तब मिलती है जब आप अपनी हालत से संतुष्ट नहीं होते। आपको चुनना पड़ेगा।

कन्फशियस कहते हैं कि जिंदगी दो बार मिलती है और दूसरी जिंदगी तब शुरू होती है जब आपको समझ आता है कि आपके पास सिर्फ एक ही जिंदगी है। आपकी दूसरी जिंदगी कब और कैसे शुरू हुई? देखिए यह बहुत गहरा सवाल है। ज्यादातर लोग जब एक उम्र क्रॉस कर लेते हैं तो उनके साथ ऐसा होता है। वह एक तरीके से जीते रहते हैं और फिर एक दिन कुछ बड़ा बदलना पड़ता है। मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ है।

मैंने अपनी जिंदगी का काफी हिस्सा इस स्ट्रगल में बिताया कि मुझे कुछ चीजें पानी है। यह चाहे पैसा हो या लोगों की नजरों में कुछ बनना। जब मैंने वह सब अचीव कर लिया या कम से कम इतना पा लिया कि अब फर्क नहीं पड़ता था। तब मुझे यह समझ में आया कि मेरे आसपास के लोग भी जिन्होंने कुछ अचीव किया है वह भी कुछ खास खुश नहीं दिखते। मेरे केस में तो हर चीज से जल्दी ही आदत हो गई थी। मतलब एक नई चीज मिलते ही वह नॉर्मल लगने लगती थी। इसलिए मुझे लगने लगा कि असली खुशी अंदर से आती है। यह सोच मेरी जिंदगी को अंदर से सुधारने की तरफ ले गई और मुझे यह समझ आया कि असली सफलता, असली सक्सेस अंदर की होती है। बाहर की चीजों से इसका ज्यादा लेना देना नहीं है।

बाहर की चीजें फिर भी करनी पड़ती हैं। हमारे डीएनए में ही है कि कुछ करें। यह कहना आसान है कि अब मैं बंद कर देता हूं। पर जिंदगी खुद आपको वापस अंदर की तरफ ला देती है। बड़ी प्रॉब्लम यह है कि जब आप किसी गेम में एक्सपर्ट हो जाते हैं। खासकर उसमें जिसमें बड़े रिवॉर्ड्स मिलते हैं तो आप उसे खेलते रहते हैं। चाहे अब आप उसे छोड़ भी सकते थे। जिंदा रहना और आगे बढ़ना ही हमें लगातार काम करने पर मजबूर करता है। हर चीज की आदत हो जाती है और हम उस चक्की में फंसे रहते हैं। असली चक्कर तो यह है कि आप कब जंप करके इस रेस से बाहर निकलेंगे और बस जिंदा रहने के मजे लेंगे।

[संगीत] मैं किसको सक्सेसफुल मानता हूं। देखिए ज्यादातर लोग उसी को सफल मानते हैं जो उस गेम में जीतता है जो वह खुद खेलते हैं। अगर आप एथलीट हैं तो आप किसी एथलीट को ही आइडल मानेंगे। अगर आप बिजनेस में हैं तो शायद ईलॉन मस्क को देखेंगे। कुछ साल पहले मैं स्टीव जॉब्स को सक्सेसफुल मानता था क्योंकि उन्होंने दुनिया बदल दी। मार्क एड्रिसन को मैं सक्सेसफुल मानता हूं। उन्होंने नेटस्केप बनाई। सतोशी नाका मोटो सक्सेसफुल है क्योंकि उन्होंने बिटकॉइन क्रिएट किया। ईलॉन मस्क भी सक्सेसफुल है क्योंकि उन्होंने टेक्नोलॉजी और एंटरप्रेन्योरशिप का मीनिंग बदल दिया। मुझे यह क्रिएटर्स सफल लगते हैं। लेकिन मेरे लिए असली विनर वो है जो गेम से ही बाहर आ जाता है। जो गेम ही नहीं खेलता। सबसे ऊपर निकल जाता है। जो इंसान इतना मेंटली स्ट्रांग है उसको किसी चीज की जरूरत ही नहीं है। मेरे लाइफ में

भी ऐसे कुछ लोग हैं जैसे जर्जी ग्रेगुरिक। मैं उन्हें सक्सेसफुल मानता हूं क्योंकि उनको किसी चीज की जरूरत नहीं। वह शांत हैं, हेल्दी हैं। पैसा कम मिले या ज्यादा उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।

हिस्ट्री में देखूं तो बुद्ध या कृष्णमूर्ति को मैं सक्सेसफुल मानता हूं क्योंकि उन्होंने गेम ही छोड़ दिया। जीत या हार का उन पर कोई असर नहीं होता।

ब्लज़ पास्कल की एक लाइन है। सब परेशानियां इसलिए हैं क्योंकि आदमी अकेला कमरे में शांत नहीं बैठ सकता। अगर आप 30 मिनट चुपचाप बैठकर खुश रह सकते हैं तो आप सक्सेसफुल हैं। यह बहुत बड़ी बात है पर बहुत कम लोग ऐसा कर पाते हैं।

मेरे लिए खुशी एक ऐसी चीज है जो शांति से मिलती है। अगर आप अंदर से और बाहर से शांत हैं तो आखिरकार खुशी आ ही जाती है। लेकिन शांति मिलना बहुत मुश्किल है। मजेदार बात यह है कि हम सब शांति ढूंढते हैं जंग करके। बिजनेस शुरू करते हैं तो वह भी एक जंग है। रूममेट से बर्तन धोने पर लड़ते हैं तो वह भी एक जंग है। हम स्ट्रगल करते हैं ताकि बाद में शांति मिले। असली में शांति गारंटी नहीं है।

पीस यह बहती रहती है, बदलती रहती है। आप चाहते हैं कि आप लाइफ के फ्लो के साथ चलना सीख लें और ज्यादातर चीजें एक्सेप्ट कर लें। आप जिंदगी में लगभग कुछ भी पा सकते हैं। बस वह एक चीज हो और आपको वह दूसरी चीजों से ज्यादा चाहिए हो।

मेरा पर्सनल अनुभव में मैं आखिर में सबसे ज्यादा शांति चाहता हूं। पीस यानी आराम की हालत में खुशी और खुशी मतलब जब आप कुछ कर रहे हैं तब शांति। दोनों को आप कभी भी एक दूसरे में बदल सकते हैं। लेकिन ज्यादातर आप शांति चाहेंगे। अगर आप शांत हैं तो जो भी करेंगे वह काम भी खुशी वाला हो जाएगा।

आजकल हम सोचते हैं कि शांति तब मिलेगी जब सब बाहरी प्रॉब्लम सॉल्व हो जाएंगी। पर बाहर की प्रॉब्लम्स खत्म ही नहीं होंगी। असली शांति तब मिलती है जब आप प्रॉब्लम्स का कांसेप्ट ही छोड़ दें। जलना खुशी का दुश्मन है। मुझे नहीं लगता जिंदगी इतनी मुश्किल है। हम ही उसे मुश्किल बना लेते हैं।

एक चीज जो मैं अपनी जिंदगी से हटा रहा हूं वह है शुड। शुड शब्द। जब भी दिमाग में शुड आता है, समझ लीजिए वह या तो गिल्ट है या दूसरे लोगों की सोच। जो काम आप सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि आपको लगता है मुझे करना चाहिए वह असल में आप चाहते नहीं। बस अपने आप को परेशान कर रहे हैं। मैं कोशिश करता हूं कि अपनी जिंदगी से जितने शुड हटा सकूं हटा दूं।

आपके दिमाग की शांति का सबसे बड़ा दुश्मन है। वह उम्मीदें जो सोसाइटी और दूसरे लोग आपके अंदर डाल देते हैं। लोग कहते हैं जिम जाओ बॉडी बनाओ। यह एक ऐसा गेम है जिसमें सब कमपीट करते हैं। सबको दिख रहा होता है कि आप क्या कर रहे हैं। फिर कहते हैं पैसा कमाओ, बड़ी गाड़ी लो, बड़ा घर लो। यह भी बाहरी गेम है।

खुश रहना सीखना बिल्कुल ही अंदर का मामला है। यहां बाहर कुछ नहीं बदलता। ना ही बाहर कोई तारीफ करता है। यहां आप खुद से कमट कर रहे हैं। एक सिंगल प्लेयर गेम है यह। हम लोग मधुमक्खी, बीज या चींटी जैसे हैं। हम बहुत सोशल हैं। सब कुछ बाहर से ही सीखते हैं। हमें सिंगल प्लेयर गेम खेलना ही नहीं आता। सब कुछ मल्टीप्लेयर गेम बन गया है।

लेकिन असली सच तो यह है कि जिंदगी सिंगल प्लेयर गेम है। आप अकेले पैदा हुए हैं, अकेले ही मरेंगे। आपके जितने भी सपने हैं, यादें हैं, सब अकेली हैं। तीन पीढ़ी बाद कोई याद भी नहीं रखेगा आपको। आपके आने से पहले किसी को भी फर्क नहीं पड़ता था। आप चले जाएंगे तो भी नहीं पड़ेगा। सब सिंगल प्लेयर ही है। शायद इसी वजह से योग और मेडिटेशन लोगों से होता नहीं क्योंकि उसमें कोई बाहरी तारीफ या रिवॉर्ड नहीं मिलता। यह बिल्कुल सिंगल प्लेयर काम है।

बफे एक एग्जांपल देते हैं। क्या आप दुनिया का बेस्ट लवर बनना चाहते हैं और सब आपको सबसे बेकार माने। यह सबसे बेकार लवर बनना चाहते हैं और सब आपको बेस्ट माने। मतलब असली स्कोर कार्ड अंदर होता है।

मुझे भी जलने वाली फीलिंग छोड़ने में बहुत टाइम लगा। जब मैं छोटा था, मुझे बहुत जलन होती थी दूसरों से। धीरे-धीरे सीख गया छोड़ना। कभी-कभी अभी भी आ जाती हैं। यह बहुत जहरीली फीलिंग है क्योंकि आखिर में आप वहीं के वहीं रहते हैं। खुद परेशान हो जाते हैं और दूसरा बंदा तो फिर भी सक्सेसफुल या सुंदर या कुछ भी है जो है वही रहता है।

एक दिन मुझे समझ आया कि जिनसे मैं जलता हूं, मैं उनकी लाइफ के छोटे टुकड़े नहीं ले सकता। मैं यह नहीं कह सकता कि मुझे उनकी बॉडी चाहिए, उनके पैसे चाहिए, उनका एटीट्यूड चाहिए। अगर मुझे किसी की जिंदगी चाहिए तो सब कुछ लेना पड़ेगा। उसकी सोच, उसके प्रॉब्लम्स, उसकी फैमिली, उसका दुख, उसकी खुशी, सब कुछ। अगर आप पूरी जिंदगी बदलना नहीं चाहते उससे तो जलने का कोई मतलब नहीं। जब यह समझ आ गया तो जलन खत्म हो गई क्योंकि मुझे किसी और की जिंदगी नहीं चाहिए। मैं अपनी जिंदगी में खुश हूं और वैसे भी खुश रहना भी मेरा अपनी चॉइस है। इसका कोई बाहरी रिवॉर्ड नहीं है।

खुशी हैबिट से बनती है। पिछले 5 साल में सबसे बड़ी सीख यह मिली कि शांति और खुशी भी एक स्किल है। यह ऐसी चीजें नहीं है जो आपके जींस से या पैदाइश से मिलती हैं। हां, जेनेटिक्स का थोड़ा इफेक्ट होता है और काफी कुछ आपके एनवायरमेंट का भी इफेक्ट होता है। पर आप खुद को बदल भी सकते हैं। आप अपनी खुशी को टाइम के साथ बढ़ा सकते हैं। बस पहले यकीन करिए कि आप यह कर सकते हैं।

यह स्किल है। जैसे न्यूट्रिशन एक स्किल है। डाइटिंग एक स्किल है। जिम जाना एक स्किल है। पैसे कमाना एक स्किल है। लड़की या लड़के से बात करना एक स्किल है। अच्छे रिलेशन बनाना एक स्किल है। प्यार भी एक स्किल है। सब कुछ बस यह समझ से शुरू होता है कि आप सीख सकते हैं। जब आप ध्यान और नियत लगाते हैं तो दुनिया बेहतर हो सकती है।

काम करते वक्त खुद से सफल लोगों के साथ रहिए। मजे करते वक्त खुद से ज्यादा खुश लोगों के साथ रहिए। खुशी का स्किल कैसा है? देखिए सब ट्रायल एंड एरर है। जो काम करें वो करिए। आप मेडिटेशन ट्राई कर सकते हैं। देखिए क्या काम आता है। तंत्र मेडिटेशन, विपासना मेडिटेशन 10 दिन का कैंप या बस 20 मिनट का सेशन। क्या आपकी शांति मिलती है? अगर नहीं तो योग ट्राई करिए। काइट सर्फिंग ट्राई करिए। कार रेसिंग ट्राई करिए। कुकिंग करिए। क्या आपको सुकून मिलता है? सब कुछ ट्राई करके देखते रहिए। क्या आपके लिए सही है?

माइंड की दवाइयों में प्लसबो इफेक्ट 100% होता है। दिमाग के मामले में पॉजिटिव रहना चाहिए। शक करने का कोई फायदा नहीं। सब कुछ अंदर ही होता है तो विश्वास पॉजिटिव होना चाहिए। जैसे मैं द पावर ऑफ नाउ पढ़ रहा हूं एक आर्ट टोले की जो प्रेजेंट में रहने को अच्छा इंट्रो है उन लोगों के लिए जो धार्मिक नहीं है। उन्होंने बार-बार समझाया कि सबसे जरूरी चीज है प्रेजेंट में रहना। उन्होंने एक बॉडी एनर्जी एक्सरसाइज लिखी। सीधा लेट जाइए। बॉडी में एनर्जी को फील करिए। पहले वाला मैं कहता यह सब बकवास है लेकिन नया मैं सोचता हूं। चलिए मान लेते हैं शायद काम करें। मैंने लेट कर मेडिटेशन ट्राई किया और सच में मुझे अच्छा लगा।

आप अच्छी हैबिट्स बना सकते हैं। दारू ना पीने से आपका मूड स्टेबल रहेगा। चीनी ना खाने से भी आपका मूड स्टेबल रहेगा। Facebook, Snapchaat, Twitter, Instagram पर भी ना जाने से आपका मूड स्टेबल रहेगा। वीडियो गेम्स खेलना शॉर्ट टर्म में खुश कर देता है। मैं खुद भी गेमर था। लेकिन लंबी रेस में यह आपकी खुशी खत्म कर सकता है। आप डोपेमिन पे डिपेंड हो जाते हैं। कभी मिलता है, कभी नहीं मिलता। कैफीन भी ऐसा ही है। तुरंत मजा देता है लेकिन बाद में प्रॉब्लम।

असली बात यह है कि आप अपनी जिंदगी में बेकार आदतों की जगह अच्छी आदतें लाइए और डिसाइड करिए कि मुझे खुश रहना है। आखिर में आप अपनी आदतों और उन लोगों का मिक्सचर हैं जिनके साथ आप सबसे ज्यादा टाइम बिताते हैं। बचपन में हमारे पास बहुत कम आदतें होती हैं। समय के साथ हमें सीखना पड़ता है कि क्या नहीं करना चाहिए। हम सेल्फ कॉन्शियस हो जाते हैं। हम रूटीनंस बनाने लगते हैं।

ज्यादा खुश लोग और कम खुश लोगों में फर्क उनकी हैबिट से ही समझा जा सकता है? क्या उनकी आदतें ऐसी हैं जो लंबी रेस में खुशी बढ़ाएं या बस तुरंत वाली खुशी दें? क्या आप पॉजिटिव लोगों के साथ हैं? क्या उनके साथ रिलेशन सिंपल है? क्या आप उनसे जलते नहीं बस रिस्पेक्ट करते हैं?

एक थ्यरी है फाइव चिम्स थ्यरी। जिसके साथ बंदर ज्यादा टाइम बिताते हैं, उसके जैसे ही उनका बिहेवियर होता है। यह बात ह्यूमंस पे भी लागू होती है। शायद लोग बुरा माने पर दोस्तों को सोच समझ के चुनिए। बस जो पास में रहते हैं या ऑफिस में मिलते हैं उनको मत चुनिए। जो लोग सबसे खुश होते हैं उन्होंने अपने पांच चिम्स, अपने पांच मंदिर सही चुने हैं।

कॉन्फ्लिक्ट संभालने का पहला रूल है उन लोगों के साथ मत रहिए जो हमेशा झगड़े में पड़े रहते हैं। मुझे कोई ऐसा रिलेशन या चीज नहीं चाहिए जो मुश्किल हो या बनाए रखना मुश्किल हो। अगर आप खुद को किसी के साथ जिंदगी भर काम करते नहीं देख सकते तो एक दिन भी उनके साथ काम मत करिए।

मेरा एक दोस्त है बेहजद उसको जिंदगी से प्यार है और वह कभी भी उन लोगों के लिए टाइम नहीं निकालता जो खुश नहीं होते। अगर आप बेहज्जत से पूछें कि उसका सीक्रेट क्या है? तो वह सिर्फ कहेगा वाई मत पूछिए। वाओ बोलिए। दुनिया इतनी जबरदस्त जगह है। हम तो आदत से मजबूर हैं। सब कुछ फॉर ग्रांटेड ले लेते हैं। जैसे अभी आप और मैं बैठ के बात कर रहे हैं। कपड़े पहने हैं। पेट भरा है। एक दूसरे से स्पेस और टाइम में बात कर पा रहे हैं। हमें तो जंगल में दो बंदर बनके बैठना चाहिए था। सूरज देख रहे होते। सोच रहे होते रात कहां सोएंगे।

जब हमें कुछ मिलता है तो हम सोचते हैं दुनिया को हमें यह देना ही था। अगर आप प्रेजेंट में हैं तो आपको समझ में आएगा कि कितनी चीजें आपके आसपास हैं। यही सब आपको चाहिए। मैं अभी हूं। मेरे पास सब जबरदस्त चीजें हैं।

खुश रहने का सबसे बड़ा ट्रिक है यह समझना कि खुशी एक स्किल है जो आप सीख सकते हैं और एक चॉइस है जो आप करते हैं। आप खुश रहने का डिसीजन लेते हैं। फिर उस पर काम करते हैं। जैसे आप बॉडी बना रहे हैं। वजन घटा रहे हैं। जॉब में सक्सेस पा रहे हैं या कैलकुलस सीख रहे हैं। आप डिसाइड करते हैं कि खुशी इंपॉर्टेंट है। उसको सबसे ऊपर रखते हैं। फिर उस पर सब कुछ पढ़ते हैं। रिसर्च करते हैं। खुशी वाली हैबिट्स।

मेरे पास कुछ ट्रिक्स हैं जो मैं यूज करता हूं खुश रहने के लिए। शुरू में मुझे अजीब लगते थे। मुश्किल भी ध्यान भी बहुत लगता था। लेकिन अब कुछ हैबिट्स सेकंड नेचर बन गई हैं। रेगुलर कर करके मैं खुद को ज्यादा खुश रख पा रहा हूं। सबसे ऑब्वियस है मेडिटेशन। इनाइड मेडिटेशन। इसका एक ही पर्पस है कि मैं समझ सकूं कि मेरा दिमाग कैसे काम करता है। बस हर मोमेंट में अवेयर रहना। अगर मैं किसी को जज करता पकड़ लूं। तुरंत सोचता हूं इसका पॉजिटिव साइड क्या है? पहले मुझे छोटी-छोटी चीजें इरिटेट करती थी। अब मैं हमेशा पॉजिटिव देखता हूं। पहले दिमाग लगाना पड़ता था। अब तुरंत हो जाता है।

मैं कोशिश करता हूं ज्यादा धूप लेने की। आसमान की तरफ देख के स्माइल करता हूं। जो भी मैं देखता हूं कि मुझे कुछ चाहिए तो खुद से पूछता हूं। क्या यह इतना इंपॉर्टेंट है कि अगर मुझे ना मिले तो मैं दुखी हो जाऊंगा। ज्यादा केसेस में पता चलता है बिल्कुल भी इंपॉर्टेंट नहीं है। मुझे लगता है कैफीन छोड़ने से मैं खुश हो गया हूं। अब मैं ज्यादा स्टेबल इंसान बन गया हूं। रोज वर्कआउट करना मुझे खुश बनाता है। जब बॉडी में सुकून है, दिमाग में भी सुकून आता है।

जितना ज्यादा आप जज करेंगे, उतना ही आप सबसे अलग महसूस करेंगे। थोड़ी देर के लिए अच्छा लगेगा। पर बाद में आप अकेला महसूस करेंगे। फिर आपको हर जगह नेगेटिविटी ही दिखने लगेगी। दुनिया आपको वही दिखाएगी जो आप अंदर महसूस करते हैं। अपने दोस्तों को बोल दीजिए कि आप खुश इंसान हैं। फिर आप खुद को उसी हिसाब से रखने लगेंगे। दोस्तों को भी आपसे यही उम्मीद रहेगी।

अपना टाइम और खुशी वापस पाने के लिए फोन, कैलेंडर और अलार्म क्लॉक ऐप का यूज कम कर सकते हैं। जितने ज्यादा आपके पास सीक्रेट्स हैं, उतना ही आप कम खुश रहेंगे। अगर मूड खराब हो गया है तो मेडिटेशन, म्यूजिक और एक्सरसाइज का यूज करके अपना मूड रिसेट कर सकते हैं। फिर सोच समझ के डिसाइड करिए कि पूरे दिन किस चीज में अपनी इमोशनल एनर्जी लगानी है।

हेडोनिक अप्टेशन इंसानों के बनाए चीजें जैसे कार, घर, कपड़े, पैसे इसमें ज्यादा होती है। नेचुरल चीजों जैसे खाना, सेक्स, एक्सरसाइज मेकअप। एक भी एक्सेप्शन नहीं है। जितने भी स्क्रीन वाली एक्टिविटीज हैं, सब कम खुशी करती हैं। जो भी नॉन स्क्रीन एक्टिविटीज हैं, सब खुशी को बढ़ाती हैं।

एक पर्सनल मैट्रिक है। दिन का कितना हिस्सा ऐसे काम में निकालते हैं जो आप मजबूरी में करते हैं। दिल से नहीं। न्यूज़ का काम है आपको एशियस और गुस्सा दिलाना। लेकिन असली साइंस, इकोनमी, एजुकेशन और कॉन्फ्लिक्ट के ट्रेंड्स पॉजिटिव हैं। हमेशा ऑप्टिमिस्टिक रहिए। पॉलिटिक्स एकेडमिया और सोशल स्टेटस सब जीरो सम गेम्स हैं। पॉजिटिव सम गेम्स पॉजिटिव लोग बनाते हैं।

दवाएं छोड़े बिना दिमाग में सिरोटोनिन बढ़ाने के तरीके हैं। धूप में जाना, एक्सरसाइज करना, पॉजिटिव सोचना और ट्रिप्टोफेन लेना। आदतें बदलने का तरीका है कि एक चीज को चुनिए। उसकी इच्छा पैदा करिए और सोच में लाइए। एक सस्टेनेबल प्लान बनाना, अपने नीड्स, ट्रिगर्स और सब्स्टट्यूट्स को पहचानना और दोस्तों को बता देना। ध्यान से ट्रैक करना।

सेल्फ डिसिप्लिन एक ब्रिज है। नई सेल्फ इमेज तक। नई सेल्फ इमेज को अपने अंदर घुसा लीजिए। अब आप वही हैं। पहले आप जानते हैं, फिर समझते हैं, फिर समझा सकते हैं। फिर महसूस करते हैं। फिर आप वही बन जाते हैं।

खुशी पाने का रास्ता एक्सेप्टेंस में है। जिंदगी के किसी भी सिचुएशन में आपके पास तीन ऑप्शन है। आप उसे बदल सकते हैं। आप उसे एक्सेप्ट कर सकते हैं या आप उसे छोड़ सकते हैं। अगर आप उसे बदलने की कोशिश करेंगे तो वह एक इच्छा है। जब तक आप बदल नहीं लेते तब तक दुख ही मिलेगा। इसलिए ज्यादा इच्छाएं मत रखिए।

जिंदगी में एक ही बड़ी इच्छा रखिए। वही मोटिवेशन और पपस देगी। दो क्यों नहीं? क्योंकि आप डिस्ट्रैक्ट हो जाएंगे। एक ही संभालना मुश्किल है। सुकून तब मिलता है जब दिमाग में थॉट्स ना हो। और क्लेरिटी प्रेजेंट मोमेंट में रहते हुए ही मिलती है। अगर आप हमेशा सोचेंगे कि मुझे यह करना है, मुझे वह चाहिए, यह बदलना है तो आप प्रेजेंट में नहीं रहेंगे।

आपके पास हमेशा तीन ऑप्शन है। बदल, एक्सेप्ट कर या छोड़ दे। जो सही ऑप्शन नहीं है वह है बैठ के सिर्फ सोचते रहना कि काश मैं बदल पाता काश मैं छोड़ पाता पर ना बदलना ना छोड़ना ना एक्सेप्ट करना यही स्ट्रगल या अवर्जन आपके दुख का असली रीजन है।

मैं अपने दिमाग में सबसे ज्यादा एक वर्ड यूज करता हूं। एक्सेप्ट। एक्सेप्टेंस का मतलब मेरे लिए क्या है? देखिए यही कि जो भी आउटकम हो ठीक है। बैलेंस में रहना, सेंटर में रहना। एक कदम पीछे जाकर बड़े सीन को देखना। हमेशा जो आप चाहते हैं वह नहीं मिलता। कभी-कभी जो हो रहा है, वही आपके लिए बेस्ट होता है। जितनी जल्दी आप इस रियलिटी को एक्सेप्ट करेंगे, उतनी जल्दी आप एडजस्ट हो जाएंगे।

एक्सेप्टेंस पाना बहुत मुश्किल है। मेरे पास कुछ हैक्स हैं जो मैं ट्राई करता हूं। पर 100% सक्सेसफुल नहीं है। एक हैक है पीछे जाके अपने पुराने दुख देखना। मैं उन्हें लिख लेता हूं। पिछली बार जब ब्रेकअप हुआ या बिजनेस फेल हुआ या हेल्थ प्रॉब्लम आई। क्या हुआ। बाद में मैं देख सकता हूं कि उस दुख से मैं कितना ग्रो किया।

दूसरा हैक है छोटी-छोटी परेशानियों के लिए। जब भी कोई इरिटेशन होती है, मेरा एक हिस्सा तुरंत नेगेटिव रिएक्ट करता है। लेकिन अब मैं खुद से पूछता हूं इस सिचुएशन का पॉजिटिव क्या है? ठीक है। मैं मीटिंग के लिए लेट हो जाऊंगा। पर इसमें क्या फायदा है? थोड़ा आराम से बैठकर बर्ड्स देख लूंगा। बोरिंग मीटिंग में कम टाइम लगाना पड़ेगा। लगभग हमेशा कुछ ना कुछ पॉजिटिव मिल ही जाता है। अगर कुछ पॉजिटिव ना मिले तो सोचता हूं चलो। अब यूनिवर्स मुझे कुछ सिखाने वाली है। सुन लेता हूं, सीख लेता हूं।

सबसे सिंपल एग्जांपल है कि मैं एक इवेंट में गया था। फिर किसी ने मेरे इनबॉक्स में बहुत सारी फोटोस भेज दी। एक छोटा सा जजमेंट आया यार कुछ अच्छे वाले सेलेक्ट करके भेज देते। 100 फोटो कौन भेजता है? पर फिर तुरंत सोचा पॉजिटिव क्या है? पॉजिटिव यह है कि अब मैं अपनी फेवरेट पांच फोटोस चुन सकता हूं। अपना जजमेंट यूज कर सकता हूं। पिछले एक साल में यह हैक प्रैक्टिस कर करके मैं रिस्पांस सोचने में जो पहले सेकंड्स लगते थे अब तुरंत हो जाते हैं। यह हैबिट आप भी सीख सकते हैं।

कैसे सीखें चीजें एक्सेप्ट करना जो आप बदल नहीं सकते। सबसे बड़ी ट्रिक यह है कि मौत को अपना लीजिए। मौत आपकी जिंदगी में सबसे बड़ी चीज होने वाली है। जब आप अपनी मौत को सच्चे दिल से मान लेंगे, भागने की जगह उसका सामना करेंगे, तब आपकी जिंदगी में असली मायने आएंगे। हम अपनी जिंदगी का बहुत बड़ा हिस्सा मौत से बचने में लगा देते हैं। जितनी भी हमारी कोशिश है वह सब अमर होने की कोशिश है।

अगर आप धार्मिक हैं और मान रहे हैं कि आखिरी वक्त के बाद भी जिंदगी है तो सब ठीक हो जाएगा। अगर आप धार्मिक नहीं है तो शायद आप बच्चा पैदा करेंगे। अगर आप आर्टिस्ट हैं या पेंटर हैं या बिजनेसमैन तो आप चाहते हैं कि कुछ छोड़ जाए। एक इंपॉर्टेंट बात कोई लेगसी नहीं है। कुछ भी पीछे छोड़ने लायक नहीं है। हम सब एक दिन चले जाएंगे। हमारे बच्चे चले जाएंगे। हमारे काम धूल हो जाएंगे। हमारी सभ्यता धूल हो जाएगी। हमारा प्लनेट धूल हो जाएगा। हमारा सोलर सिस्टम भी धूल हो जाएगा।

बड़ी तस्वीर में देखें तो यूनिवर्स 10 बिलियन साल पुराना है और 10 बिलियन साल और चलेगा। आपकी जिंदगी एक जुगनू के पल जैसी है। अंधेरी रात में आप यहां बहुत कम समय के लिए हैं। जब आप इस बात को पूरी तरह मान लेंगे कि जो भी आप कर रहे हैं वह बेकार है। तब आपको असली सुकून और खुशी मिलेगी। क्योंकि फिर आप समझेंगे कि सब एक गेम है लेकिन एक मजेदार गेम है। बस इतना ही मायने रखता है कि आप अपनी रियलिटी का मजा लें। जैसी भी जिंदगी चल रही है।

क्यों ना हर चीज को सबसे पॉजिटिव तरीके से देखें। जब भी आप मजा नहीं ले रहे या खुश नहीं है। आप किसी और का भला नहीं कर रहे। आपका दुख किसी और को बेहतर नहीं बनाता। आप बस अपना यह छोटा और कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं। मौत को हमेशा याद रखना और उससे भागना नहीं बहुत जरूरी है।

जब भी मैं अपने ईगो के चक्कर में फंस जाता हूं। मैं पुरानी सभ्यताओं को याद करता हूं जो आ चुकी हैं और चली गई हैं। जैसे सुमेरियंस को ले लीजिए। उन्होंने भी कुछ महत्वपूर्ण काम किए होंगे। पर आज कोई भी एक भी सुमेरियन का नाम नहीं ले सकता। उन्होंने ऐसा क्या किया जो आज भी चल रहा हो? कुछ नहीं। शायद आज से 10,000 या 1 लाख साल बाद लोग सिर्फ कहेंगे हां अमेरिकनंस के बारे में सुना है। आप एक दिन मर जाएंगे और कुछ भी मायने नहीं रखेगा।

आप खुद का मजा लें। कुछ अच्छा करें, प्यार बांटें, किसी और को खुश करें। थोड़ा हंस लीजिए। इस पल को अप्रिशिएट करिए और अपना काम करिए। अपनी मदद खुद करिए। डॉक्टर्स आपको हेल्दी नहीं बनाएंगे। न्यूट्रिशनिस्ट्स आपको पतला नहीं बनाएंगे। टीचर्स आपको स्मार्ट नहीं बनाएंगे। गुरुज आपको शांत नहीं बनाएंगे। मेंटर्स आपको अमीर नहीं बनाएंगे। ट्रेनर्स आपको फिट नहीं बनाएंगे। आखिर में आपकी खुद की जिम्मेदारी लेनी पड़ेगी। खुद को बचाना पड़ेगा। खुद बनने का चुनाव करके।

आजकल ज्यादातर लोग वही कर रहे हैं जो आप भी कर रहे हैं। अपने आप को डांट रहे हैं, नोट्स बना रहे हैं, सोच रहे हैं। मुझे यह करना है, मुझे वह करना है। पर असली बात यह है कि आपको कुछ भी करना जरूरी नहीं है। बस वही करिए जो आप करना चाहते हैं। अगर आप दूसरों की सोच पर चलने की जगह अपनी अंदर की आवाज सुनेंगे तो आप वही करेंगे जो आपको असली में करना है। तब आप खुद बन पाएंगे।

मैं कभी अपने सबसे बड़े मेंटर से मिला ही नहीं। मैं चाहता था मैं उनकी तरह हो जाऊं। पर उनका मैसेज बिल्कुल उल्टा था। अपनी असली पहचान के साथ खुद बनूं। दुनिया में कोई भी आपको हरा नहीं सकता जब आप खुद बन जाते हैं। आप कभी भी मेरी तरह अच्छा नहीं हो सकते जैसे मैं हूं। मैं भी कभी आपके जैसा नहीं हो सकता। सुनिए, सीखिए पर कभी किसी को कॉपी मत करिए। यह बेवकूफी है। हर इंसान किसी एक चीज में यूनिक है। उनके पास ऐसी नॉलेज, स्किल या इच्छा है जो सिर्फ उनके पास है। डीएनए और जिंदगी के कॉम्बिनेशंस है। डीएनए और एक्सपीरियंस का कॉम्बिनेशन इतना जबरदस्त है कि कभी दो इंसान एक

जैसे नहीं होते। आपकी लाइफ का गोल यह है कि आपको वह लोग, वह काम, वह बिजनेस या वह आर्ट ढूंढना है जिसे सबसे ज्यादा आपकी जरूरत है। कहीं ना कहीं कुछ है जो सिर्फ आपके लिए है।

गलती यह मत करिए कि आप चेक लिस्ट और डिसीजन फ्रेमवक्स बना लीजिए दूसरे लोगों को देख के। आप उनकी तरह कभी नहीं बन सकते। दूसरे बनने की कोशिश मत करिए। उसमें आप कभी अच्छा नहीं बन पाएंगे। कुछ नया करने के लिए आपको किसी चीज के लिए पागलपन की हद तक ऑब्सेस्ड होना पड़ेगा।

अपना ख्याल रखना चुनिए। मेरी जिंदगी में सबसे बड़ी प्रायोरिटी खुशी से ऊपर, फैमिली से भी ऊपर, काम से भी ऊपर, मेरी अपनी हेल्थ है। सबसे पहले फिजिकल हेल्थ। दूसरे नंबर पर मेंटल हेल्थ। तीसरे पर स्पिरिचुअल हेल्थ। उसके बाद फैमिली की हेल्थ, उसके बाद फैमिली की खुशहाली, उसके बाद ही मैं दुनिया के बाकी काम देख सकता हूं। जब हेल्थ खराब होती है, तब जिंदगी के हर रंग का फर्क समझ आता है।

आज की दुनिया में क्या चीजें हैं जो हमें वैसे जीने से रोकती हैं जैसे इंसान को जीना चाहिए? बहुत सारी चीजें हैं।

फिजिकल साइड पर देखें तो हम ऐसी डाइट लेते हैं जिसके लिए हम इवॉल्व नहीं हुए हैं। सही डाइट शायद पे डाइट के जैसी होनी चाहिए जिसमें ज्यादा सब्जियां हों, थोड़ा सा मीट हो और कुछ बेरीज हों। एक्सरसाइज की बात करें तो शायद हमें ट्रेडमिल पर भागने की जगह खेलना चाहिए।

हम शायद इसलिए बने हैं कि अपने पांचों सेंसेस का बराबर यूज करें। लेकिन आजकल हम सब कुछ आंखों से देखते हैं। मॉडर्न सोसाइटी में ज्यादा कम्युनिकेशन सिर्फ विजुअल है। हम शूज पहने रहते हैं, जबकि हम शूज के लिए नहीं बने। बहुत सारे बैक और पैर के दर्द शूज की वजह से हैं।

हम कपड़ों से हमेशा खुद को गर्म रखते हैं, जबकि हम थोड़ी ठंड भी फील करने के लिए बने हैं। ठंडी हवा इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है। हम एकदम साफ-सुथरे एनवायरमेंट में रहने के लिए नहीं बने। इससे एलर्जीज और कमजोर इम्यून सिस्टम हो जाता है। इसको हाइजीन हाइपोथेसिस कहते हैं।

हम छोटी-छोटी ट्राइब्स में जीने के लिए बने हैं, ज्यादा फैमिली के साथ रहने के लिए। मैं खुद इंडिया में पैदा हुआ हूं। वहां हर कोई आपके काम में टांग अड़ाता है। कोई कजन, कोई आंटी, कोई अंकल, हर कोई पास रहता है। इसलिए डिप्रेशन कम होता है क्योंकि आप अकेले नहीं रहते।

मैं यहां केमिकल डिप्रेशन की बात नहीं कर रहा। मैं ज्यादा उन बच्चों की बात कर रहा हूं जो बस उदासी महसूस करते हैं। लेकिन दूसरी तरफ प्राइवेसी नहीं मिलती तो आजादी नहीं मिलती। दोनों चीजों के अपने ट्रेड ऑफ्स हैं।

हम हर 5 मिनट में फोन चेक करने के लिए नहीं बने। लाइक मिलना या कोई गुस्सा भरा कमेंट मिलना मूड को चंचल बना देता है। हम कमी के लिए बने हैं, लेकिन हम अभी अबंडेंस में जी रहे हैं।

हमेशा मना करने में मुश्किल होती है जब जींस हमेशा हां बोलने के लिए तैयार है। हां, शुगर खाने के लिए। हां, रिलेशनशिप में रहने के लिए। हां, अल्कोहल के लिए। हां, ड्रग्स के लिए। हां, हां, हां! हमारा बॉडी ना बोलना जानता ही नहीं है। जब सब बीमार हो जाते हैं, तब कोई उसे बीमार ही नहीं मानता।

मैथ, फिजिक्स, केमिस्ट्री के अलावा ज्यादा साइंस फाइनल नहीं है। आज भी लोग इस बात पर लड़ रहे हैं कि सबसे अच्छी डाइट कौन सी है?

कीटोजेनिक डाइट के बारे में मेरा ख्याल यह है कि ब्रेन और बॉडी के बैकअप मैकेनिज्म के लिए सेंस बनाता है। जैसे आइस एज में जब पौधे नहीं मिलते थे, तब भी इंसान जीता था। लेकिन सालों से हम पौधे भी खा रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि पौधे बुरे हैं, लेकिन पेियो डाइट जैसे कुछ सही लगता है।

शुगर और फैट के बीच की कशमकश बड़ी इंटरेस्टिंग है। फैट से पेट भर जाता है। फैट खाने से आपको लगता है कि बस और नहीं खाना। कीटोजेनिक डाइट में हम बहुत सारा बेकन खाते हैं। फिर फैट से इतना भरा हुआ लगता है कि फैट देखने का भी मन नहीं करता।

शुगर भूख लगाती है। शुगर बॉडी को सिग्नल देती है कि अरे, यह तो जबरदस्त खाना मिल गया है जो हमने पहले कभी नहीं खाया। इसलिए हम शुगर के पीछे भागते हैं। प्रॉब्लम यह है कि शुगर का असर फैट से ज्यादा होता है। अगर आपने फैटी मिल्क खाई और उसके साथ थोड़ा शुगर भी ले लिया तो शुगर आपकी भूख लगाएगा और फैट आपकी कैलोरीज देगा और आप बस बिंज करते रहोगे। इसलिए सारे डेजर्ट्स में फैट और कार्ब्स दोनों होते हैं।

नेचर में कार्ब्स और फैट का कॉम्बिनेशन मिलना बहुत रेयर है। नेचर में मुझे कार्ब्स और फैट — कार्ब्स यानी कार्बोहाइड्रेट — नेचर में मुझे कार्ब्स और फैट एक साथ बस कोकोनट, आम या बनानास में मिलते हैं। पर वो भी ज्यादातर ट्रॉपिकल फ्रूट्स में। शुगर और फैट का कॉम्बो बहुत खतरनाक है। अपनी डाइट में इससे बच के रहना चाहिए।

मैं एक्सपर्ट नहीं हूं और डाइट और न्यूट्रिशन पॉलिटिक्स की तरह है। सबको लगता है वह एक्सपर्ट है। उनकी आइडेंटिटी खाने पर चिपकी होती है। जो वह खाते हैं, वही सही है। सबके पास अपना छोटा रिलीजन है। यह टॉपिक बड़ा मुश्किल है।

मैं बस यही कहूंगा, कोई भी समझदार डाइट, शुगर और फैट दोनों का कॉम्बो नहीं खाता। डाइटरी फैट से पेट जल्दी भरता है। शुगर खाने से भूख और बढ़ जाती है। शुगर का असर सब पर भारी है। अपनी भूख इसी हिसाब से कंट्रोल करिए।

जो लोग फिट और हेल्दी होते हैं, वह ज्यादा ध्यान इसी बात पर देते हैं कि क्या खाना है, ना कि कितना खाना है। क्वालिटी पर ध्यान देंगे तो क्वांटिटी पे भी कंट्रोल हो जाएगा।

एक अजीब बात यह है कि फास्टिंग पोर्शन कंट्रोल से आसान लगती है। अगर आप लो कार्ब या पे डाइट पे हैं तो जैसे ही बॉडी को पता चलता है कि खाना मिल गया तो वह आपके दिमाग को कंट्रोल कर लेती है।

मुझे वंडर ब्रेड के बारे में यह सोचकर अजीब लगता है कि वह कमरे के टेंपरेचर पर महीनों तक सॉफ्ट कैसे रह सकता है? अगर बैक्टीरिया उसे नहीं खाता तो क्या उसे आपको खाना चाहिए?

5000 साल हो गए। हम अभी तक यह आर्ग्यू कर रहे हैं कि मीट खराब है या प्लांट्स खराब हैं। एक्सट्रीम लोगों को इग्नोर करिए और कोई भी ऐसी चीज मत खाइए जो पिछले कुछ 100 सालों में बनी हो।

मेडिसिन और न्यूट्रिशन की बात हो तो कुछ ऐड करने से पहले कुछ हटाइए। मेरा ट्रेनर मुझे अपने खाने की फोटो भेजता है, तब लगता है हम सब फ्लेवर के एडिक्ट हैं। दुनिया का सबसे सिंपल डाइट कि जितना प्रोसेस्ड फूड है, उतना कम खाना चाहिए।

जितनी हार्ड वर्कआउट करेंगे, उतना दिन आसान हो जाएगा।

अगर बात करूं कि ऐसी कौन सी आदत है जो मेरी लाइफ पर सबसे ज्यादा पॉजिटिव इफेक्ट डालती है, तो वह है रोज सुबह की मेरी वर्कआउट। यह मेरी लाइफ का गेम चेंजर रही है। इससे मुझे हेल्दी फील होता है, यंग लगता है। मैं रात को लेट नहीं जाता। इसकी शुरुआत बस एक छोटी सी बात से हुई।

हर कोई कहता है, "मेरे पास टाइम नहीं है।" जब भी किसी को कोई अच्छी आदत बताइए तो वह हमेशा एक्सक्यूज बना लेगा। सबसे ज्यादा कॉमन है, "टाइम नहीं है।" "मेरे पास टाइम नहीं है" इसका मतलब है, यह मेरी प्रायोरिटी नहीं है। आपको डिसाइड करना है कि क्या आपके लिए प्रायोरिटी है। अगर कोई चीज आपकी नंबर वन प्रायोरिटी है तो आप उसे करेंगे ही। बस लाइफ ऐसी ही चलती है। अगर आपके पास 101 प्रायोरिटीज का झुंड है तो शायद एक भी नहीं मिलेगी।

मैंने अपने लिए डिसाइड किया कि मेरी जिंदगी में सबसे बड़ी प्रायोरिटी मेरी हेल्थ है। खुशी से ऊपर, फैमिली से ऊपर, काम से भी ऊपर। सबसे पहले फिजिकल हेल्थ।

जब मेरी हेल्थ नंबर वन प्रायोरिटी बन गई तो मैं कभी यह नहीं भूल सकता था कि मेरे पास टाइम नहीं है। मैं सुबह वर्कआउट करता हूं। जितना टाइम लगे उतना लगता है। मैं अपना दिन तब तक शुरू नहीं करता जब तक वर्कआउट ना हो जाए। चाहे दुनिया टूट रही हो या जल रही हो, सब बाद में देखेंगे। पहले वर्कआउट। यह लगभग रोज होता है। कभी-कभी छुट्टी लेनी पड़ती है क्योंकि ट्रैवल कर रहा हूं या इंजर्ड हूं या बीमार हूं। साल भर में गिन के कुछ दिन ही ब्रेक लेता हूं।

एक महीने लगातार मैंने योगा किया और मुझे लगा कि मैं 10 साल जवान हो गया हूं। फ्लेक्सिबल रहना मतलब जवान रहना।

क्या करके आदत बनाते हैं, यह इंपॉर्टेंट नहीं है। रोज कुछ करिए। बस क्या करते हैं, वह मैटर नहीं करता। जो लोग सोचते रहते हैं कि वेट ट्रेनिंग करें, टेनिस खेलें, हाई इंटेंसिटी ट्रेनिंग करें या हैप्पी बॉडी करें, वह पॉइंट मिस कर रहे हैं। इंपॉर्टेंट यह है कि रोज कुछ करिए। जो वर्कआउट आपको रोज करने में मजा आए, वही आपके लिए बेस्ट है।

अगर हो सके तो मीटिंग्स को वॉकिंग के दौरान करिए। दिमाग अच्छा काम करता है, एक्सरसाइज मिलती है और धूप भी। मीटिंग छोटी होती है, फॉर्मेलिटीज कम होती हैं, डायलॉग ज्यादा होता है, लेक्चर कम। स्लाइड्स की जरूरत नहीं। और जब चाहिए, खत्म कर दीजिए। बस वापस चल के आ जाइए।

लाइफ में भी सब कुछ में शॉर्ट टर्म सैक्रिफाइस करेंगे तो लॉन्ग टर्म बेनिफिट मिलेगा।

मेरा फिजिकल ट्रेनर जर्जी ग्रेकोरेक बहुत इंटेलिजेंट आदमी है। वह कहते हैं, "इजी चॉइसेस, हार्ड लाइफ। हार्ड चॉइसेस, इजी लाइफ।" अगर अभी आप हार्ड चॉइस कर रहे हैं मतलब जंक फूड नहीं खा रहे हैं, रोज वर्कआउट कर रहे हैं, तो आपके आगे की लाइफ आसान होगी। आप बीमार नहीं रहेंगे, अनहेल्दी नहीं रहेंगे। यही बात वैल्यूस, सेविंग्स, रिलेशनशिप्स पे भी लागू होती है। अगर आप अभी आसान चॉइसेस चुनते हैं तो पूरी लाइफ मुश्किल हो जाएगी।

इमोशन बेसिकली हमारी बॉडी की फ्यूचर प्रेडिक्शन है किसी भी इवेंट का। आज के जमाने में यह ज्यादा एक्सजेजुरेट हो जाता है या गलत भी हो सकता है।

मेडिटेशन इतना पावरफुल क्यों है? देखिए, आपकी सांस एक ऐसी जगह है जहां आपका ऑटोनॉमिक नर्वस सिस्टम और वेंटरी नर्वस सिस्टम मिलते हैं। सांस लेना ऑटोमेटिक है, लेकिन आप इसे कंट्रोल भी कर सकते हैं। बहुत सारे मेडिटेशन प्रैक्टिसेस सांस पर फोकस करती हैं क्योंकि यह एक गेटवे है आपके ऑटोनॉमिक सिस्टम में जाने का। बहुत सारे मेडिकल और स्पिरिचुअल केसेस में देखा गया है कि लोग अपनी बॉडी को कंट्रोल कर लेते हैं जो आमतौर पर ऑटोमेटिक होता है।

आपका दिमाग बहुत पावरफुल चीज है। क्या अजीब बात है कि आपका फोर ब्रेन सिग्नल भेजता है हिंड ब्रेन को और फिर हिंड ब्रेन आपकी पूरी बॉडी में रिसोर्सेज भेजता है? यह सिर्फ सांस लेने से हो सकता है। जब आप रिलैक्स्ड सांस लेते हैं, आपकी बॉडी समझ जाती है कि सब सेफ है। तब आपका फोर ब्रेन को उतनी एनर्जी नहीं चाहिए जितनी यूजुअली लगती है। अब एक्स्ट्रा एनर्जी हिंड ब्रेन को मिल जाती है जो फिर पूरे बॉडी में भेज देता है।

मैं यह नहीं कह रहा कि सिर्फ हिंड ब्रेन एक्टिवेट करने से आप अपनी कोई बड़ी बीमारी जीत लेंगे। लेकिन जो एनर्जी आप नॉर्मल लाइफ में बाहर की चीजों पर लगाते हैं, वह इम्यून सिस्टम पर लगने लगती है।

मैं स्ट्रांगली रिकमेंड करता हूं कि टीम फेरिस का पॉडकास्ट सुनिए, जिसमें विम हॉफ आए थे। वह एक चलते-फिरते मिरेकल हैं। उनका निक नेम आइसमैन है। उन्होंने दुनिया का रिकॉर्ड बनाया है, सबसे लंबा टाइम आइस बाथ में रहने का और ठंडे पानी में स्विमिंग का।

मैं उनसे इसलिए इंस्पायर्ड हुआ क्योंकि वह सिर्फ फिजिकल लेवल पर नहीं बल्कि बहुत काइंड और खुश भी हैं, जो आसान नहीं है। वह कहते हैं, कोल्ड एक्सपोजर इंपॉर्टेंट है क्योंकि आजकल लोग अपने नेचुरल एनवायरमेंट से दूर हो गए हैं। हम हमेशा कपड़े पहने होते हैं, खाना मिलता रहता है, गर्म रहते हैं। हमारी बॉडी ठंड से टच में नहीं है। ठंड जरूरी है क्योंकि वह इम्यून सिस्टम को एक्टिवेट करती है। इसलिए वह कहते हैं, आइस बाथ लीजिए।

मैं इंडियन सबकॉन्टिनेंट से हूं तो मुझे आइस बाथ का आईडिया बिल्कुल पसंद नहीं आया। लेकिन विम ने मुझे इंस्पायर किया कि मैं कोल्ड शावर ट्राई करूं और मैंने किया।

विम हॉफ ब्रीथिंग मेथड से मतलब हाइपर वेंटिलेट करके अपने ब्लड में ज्यादा ऑक्सीजन ले लीजिए जिससे कोर टेंपरेचर बढ़ जाता है। फिर आप शावर ले सकते हैं।

पहले कुछ कोल्ड शावर बहुत फनी थे क्योंकि मैं धीरे-धीरे जाता था और पूरी बॉडी सिकुड़ जाती थी। मैंने शुरू किया कुछ चार-पांच महीने पहले। अब मैं शावर ऑन करता हूं फुल ब्लास्ट पर और सीधा चला जाता हूं। मैं खुद को बिल्कुल टाइम नहीं देता हेजिटेशन का। जैसे ही मेरे दिमाग में आवाज आती है कि बहुत ठंडा होने वाला है, मैं बस तुरंत अंदर चला जाता हूं।

इससे मैंने एक इंपॉर्टेंट लेसन सीखा। हमारा ज्यादा सफरिंग अवॉइड करने में है। कोल्ड शावर का सबसे बड़ा सफरिंग होता है धीरे-धीरे अंदर जाना। जब एक बार अंदर चले गए तो सब नॉर्मल लगता है। सिर्फ ठंड लगती है। बॉडी कहती है, "ठंड है।" दिमाग कहता है, "ठंड है।" बस बॉडी को एकनॉलेज करिए, देखिए, एक्सेप्ट करिए। लेकिन दिमाग में मत भरिए कि आपको सफरिंग हो रही है। दो मिनट का कोल्ड शावर आपको कुछ नहीं कर सकता। रोज कोल्ड शावर लेने से हर सुबह यह लेसन दोबारा याद आता है। अब हॉट शावर एक चीज कम हो गई मेरी लाइफ से जो मुझे चाहिए थी।

मेडिटेशन दिमाग के लिए इंटरमिटेंट फास्टिंग जैसा है। ज्यादा शुगर खाने से बॉडी भारी हो जाती है। ज्यादा डिस्ट्रैक्शंस लेने से दिमाग भारी हो जाता है। जितना टाइम बिना किसी डिस्टरबेंस के अकेले सेल्फ एग्जामिनेशन, जर्नलिंग, मेडिटेशन में लगता है, उतना ही आपका दिमाग फिट होता है और पुराने इश्यूज सॉल्व होते हैं।

मुझे लगता है मेडिटेशन डाइटिंग जैसा है। सब कहते हैं, करते हैं, लेकिन सच में रेगुलर मेडिटेशन बहुत कम लोग करते हैं। मैंने कम से कम चार अलग तरह की मेडिटेशन ट्राई की है। जो मुझे सबसे अच्छी लगी वो है चॉइसलेस अवेयरनेस या नॉन-जजमेंटल अवेयरनेस।

जब आप अपने डेली काम कर रहे हैं, अच्छा होगा कि कुछ नेचर हो आसपास, किसी से बात नहीं कर रहे हैं, तो सिर्फ यह प्रैक्टिस करिए कि हर मोमेंट को बिना किसी जजमेंट के एक्सेप्ट करिए। आप यह मत सोचिए कि अरे, वहां एक गरीब आदमी बैठा है। रोड क्रॉस करिए या देखो कोई दौड़ रहा है, मैं उससे फिट हूं, वह नहीं है। पहले अगर मैं किसी को देखता था जिसका हेयर खराब है तो सोचता था, "हाहा, इसका हेयर खराब है।" लेकिन सोचता था, मैं ऐसा क्यों फील कर रहा हूं? मेरे अपने बाल झड़ रहे थे शायद इसलिए। मुझे लगता है 90% मेरे थॉट्स डर पर बेस्ड होते हैं, बाकी 10% डिजायर पे। कुछ डिसाइड मत करिए। कुछ जज मत करिए। सब कुछ एक्सेप्ट करिए। अगर मैं ऐसा 10-15 मिनट करूं जब मैं घूम रहा हूं तो मैं बहुत शांत और ग्रेटफुल फील करता हूं।

चॉइसलेस अवेयरनेस मेरे लिए काम करती है। आप ट्रांसडेंटल मेडिटेशन भी कर सकते हैं, जिसमें आप बार-बार एक चट, एक मंत्र बोलते हैं जिससे दिमाग में एक वाइट नॉइस बन जाती है और थॉट्स दब जाते हैं। या आप बस ध्यान से अपने थॉट्स को ऑब्जर्व कर सकते हैं जैसे ही वह आते हैं।

आपको समझ आएगा कि कितने थॉट्स डर पर बेस्ड हैं। जैसे ही आप किसी डर को पहचान लेते हैं, वह अपने आप चला जाता है। धीरे-धीरे दिमाग शांत हो जाता है। जब आपका दिमाग शांत हो जाता है, तब आप हर चीज को फॉर ग्रांटेड लेना छोड़ देते हैं। छोटी-छोटी बातें नोटिस करने लगते हैं। सोचते हैं, "वाह, मैं कितनी अच्छी जगह रहता हूं! कितने बढ़िया कपड़े हैं मेरे पास! मैं जब चाहूं बाहर जा सकता हूं, कॉफी पी सकता हूं।"

यह लोग देखो, हर किसी की अपनी पूरी जिंदगी चल रही है उनके दिमाग में। यह हमें अपनी वही पुरानी स्टोरी से बाहर निकाल देता है जो हम हमेशा अपने आप से बोलते रहते हैं। अगर आप सिर्फ 10 मिनट के लिए अपने आप से बात करना बंद कर दीजिए, अपनी स्टोरी में घुसे मत रहिए, तो आप समझेंगे कि हम मासलो की हायरार्की में कितना ऊपर आ गए हैं और जिंदगी वैसे भी काफी अच्छी है।

एक लाइफ हैक है, जब बेड पर हो तो मेडिटेशन करिए। या तो डीप मेडिटेशन मिलेगा या नींद आ जाएगी। दोनों तरह से आपकी जीत है।

एक और मेथड है जो मैंने सीखा है। बस चुपचाप बैठ जाइए और रोज कम से कम एक घंटा अपनी आंखें बंद कर लीजिए। जो भी हो रहा है, होने दीजिए। कोई एफर्ट मत करिए। कुछ चाहिए उसके लिए भी एफर्ट मत करिए, और कुछ नहीं चाहिए उसके लिए भी एफर्ट मत करिए। अगर दिमाग में थॉट्स आ रहे हैं तो आने दीजिए।

पूरे जीवन में आपके साथ बहुत कुछ हुआ होगा। कुछ अच्छा, कुछ बुरा। ज्यादातर आपने प्रोसेस करके निकाल दिया। लेकिन कुछ चीजें चिपक गईं। समय के साथ और ज्यादा चिपक गईं, जैसे बारिकल्स चिपक जाते हैं शिप पे। बचपन का वंडर, प्रेजेंट में रहना, खुश रहना सब चला गया। आपने अपनी पर्सनालिटी बना ली जो पुराने दर्द, गलतियों, डर और डिजायर से चिपकी हुई है, जैसे बारिकल्स चिपक जाते हैं। उनको आप कैसे हटाएंगे?

जब आप मेडिटेशन करते हैं, तो आप अपने दिमाग से लड़ते नहीं हैं। यह सब बातें बाहर आने लगती हैं, जैसे एक इनबॉक्स हो जिसमें बचपन से अनआंसर्ड ईमेल है। एक-एक करके यह सब थॉट्स बाहर आएंगे। आपको इन्हें देखना पड़ेगा। आपको इन्हें रिजॉल्व करना पड़ेगा। रिजॉल्व करने के लिए आपको कुछ करना नहीं होता, बस ऑब्जर्व करिए। अब आप बड़े हैं। थोड़ा डिस्टेंस, थोड़ा समय और स्पेस मिल गई है पुराने इवेंट से, तो अब आप उन्हें देख सकते हैं। समय के साथ आप अपने दिमाग की डीप बातें सॉल्व कर लेंगे।

जब यह सब हो जाता है तो एक दिन मेडिटेशन में बैठेंगे और आपका मेंटल इनबॉक्स जीरो हो जाएगा। जब आप अपना मेंटल ईमेल खोलेंगे और कुछ नहीं मिलेगा, वह एक जबरदस्त फीलिंग है। यह एक जॉय, ब्लिस और पीस का स्टेट होता है। जब आपको मिलता है, आप उसे छोड़ना नहीं चाहेंगे। अगर सिर्फ सुबह बैठकर आंखें बंद करने से रोज एक घंटा फ्री ब्लिस मिल सकती है तो वह सोने पर सुहागा है। आपकी लाइफ बदल जाएगी।

मैं रिकमेंड करता हूं कि रोज सुबह एक घंटा मेडिटेट करिए क्योंकि एक घंटा नहीं देंगे तो डीप नहीं जा पाएंगे। अगर आप सच में मेडिटेशन ट्राई करना चाहते हैं तो 60 दिन तक रोज एक घंटा सुबह मेडिटेशन करिए। लगभग 60 दिन के बाद आप अपने दिमाग की आवाज सुन-सुन के या तो इश्यूज सॉल्व कर लेंगे या फिर देख लेंगे कि वह डर या प्रॉब्लम्स बस दिखने का बहाना था।

मेडिटेशन मुश्किल नहीं है। बस बैठ जाइए, आंखें बंद करिए और कहिए, "अब एक घंटा खुद को ब्रेक दे रहा हूं। यह मेरा एक घंटा है लाइफ से दूर। इस घंटे कुछ नहीं करना। अगर थॉट्स आएं तो आने दीजिए। मैं उनसे लडूंगा नहीं। उन्हें पढूंगा भी नहीं। उन पर सोचना भी नहीं है। उन्हें रिजेक्ट भी नहीं करना है। बस बैठ के एक घंटा आंखें बंद रखनी है और कुछ नहीं करना।" कितना मुश्किल है यह? क्या आप एक घंटा खुद को ब्रेक नहीं दे सकते? क्या इसमें कोई बड़ी बात है?

क्या कभी ऐसा मोमेंट आया जब आपको लगा कि आप डिसाइड कर सकते हैं कैसे किसी चीज को इंटरप्रेट करना है? मुझे लगता है सबको पता है यह पॉसिबल है।

एक ओशो का लेक्चर है, "द अट्रैक्शन फॉर ड्रग्स इज स्पिरिचुअल।" उसमें वह कहते हैं कि लोग ड्रग्स क्यों करते हैं? अल्कोहल से लेकर कैनबिस तक सब लोग अपना मेंटल स्टेट कंट्रोल करने के लिए करते हैं। लोग अपना रिएक्शन कंट्रोल करना चाहते हैं। कुछ लोग ड्रिंक करते हैं ताकि ज्यादा टेंशन ना हो। कुछ लोग पॉट स्मोक करते हैं ताकि जोन आउट हो जाए। कुछ लोग साइकेडेलिक्स लेते हैं ताकि प्रेजेंट या नेचर से कनेक्टेड फील करें। ड्रग्स का अट्रैक्शन स्पिरिचुअल है।

पूरी सोसाइटी कुछ हद तक यह करती है। लोग एक्शन, स्पोर्ट्स या फ्लो स्टेट्स या ऑर्गेज्म्स चेस करते हैं। सब लोग चाहते हैं कि दिमाग की आवाज से बच जाएं, अपने खुद के ओवर-डेवलप्ड सेल्फ से बाहर निकल जाएं। मुझे तो कम से कम यह चाहिए कि जैसे-जैसे मैं बड़ा हूं, मेरा सेंस ऑफ सेल्फ और स्ट्रांग ना हो बल्कि कमजोर हो ताकि मैं रियल जिंदगी में प्रेजेंट में नेचर और दुनिया को वैसे ही एक्सेप्ट कर पाऊं जैसे बच्चे एक्सेप्ट करते हैं।

सबसे पहली बात यह समझ लीजिए कि आप अपने दिमाग की हालत को देख सकते हैं। मेडिटेशन का मतलब यह नहीं है कि आपको कोई सुपर पावर मिल जाएगी अपने दिमाग को कंट्रोल करने की। मेडिटेशन का फायदा यह है कि आपको पता चल जाता है कि आपका दिमाग कितना बेकार और आउट ऑफ कंट्रोल है।

जैसे एक बंदर जो इधर-उधर गंदगी फेंक रहा है, रूम में दौड़ रहा है, शोर कर रहा है, चीजें तोड़ रहा है, बिल्कुल भी कंट्रोल में नहीं है। एक पागल की तरह हो जाता है। आपको पहले उस पागल बंदर को काम करते देखना पड़ेगा, तभी आपको उससे अलग होने का मन करेगा। जब आप थोड़ा अलग होते हैं, वहां ही आजादी मिलती है। आप सोचते हैं, "अरे, मैं तो यह नहीं बनना चाहता। मैं इतना आउट ऑफ कंट्रोल क्यों हूं?" सिर्फ अवेयरनेस से ही आप शांत हो जाते हैं। इनसाइड मेडिटेशन से आप अपना दिमाग डीबग मोड में चला सकते हैं, जब तक आपको यह ना लगे कि आप बस एक सब रूटीन है एक बड़े प्रोग्राम का।

मैं कोशिश करता हूं कि अपने दिमाग के अंदर की बातों पर नजर रखूं। हमेशा नहीं होता। कंप्यूटर प्रोग्रामिंग की लैंग्वेज में बोलें तो मैं अपना दिमाग डीबग मोड में चलाने की कोशिश करता हूं। जब मैं किसी से बात कर रहा हूं या किसी ग्रुप एक्टिविटी में हूं तब मुश्किल हो जाता है क्योंकि दिमाग में बहुत कुछ चल रहा होता है।

लेकिन जब मैं अकेला हूं, जैसे आज सुबह मैं ब्रश कर रहा था, तो मैं सोचने लगा एक पडकास्ट के बारे में। मैं सोचने लगा शेन मुझे कैसे क्वेश्चंस पूछेगा और मैं क्या जवाब दूंगा। फिर मुझे पता चला कि मैं फ्यूचर प्लानिंग में फेंटसी कर रहा हूं। मैं अपने दिमाग को डीबग मोड पर ले आया और हर छोटी इंस्ट्रक्शन को देखने लगा। मैंने सोचा, "मैं क्यों फेंटसी फ्यूचर प्लानिंग कर रहा हूं? बस यहां खड़ा होकर ब्रश क्यों नहीं कर सकता?" यही अवेयरनेस थी कि मेरा दिमाग फ्यूचर की तरफ भाग रहा था, कोई ईगो का सीन बना रहा था। फिर मैंने सोचा, "अगर मैं ए्ब्रेस हो भी गया तो क्या, किसको फर्क पड़ता है? मैं वैसे भी मर जाऊंगा। सब जीरो हो जाएगा। कुछ याद नहीं रहेगा, तो यह सब बेकार है।" फिर मैंने शट डाउन किया और वापस ब्रश करने लगा। नोटिस किया कि टूथब्रश कितना अच्छा है और कितना अच्छा लग रहा है।

फिर अगले ही पल दिमाग कुछ और सोचने लगा। फिर मुझे देखना पड़ा कि क्या मुझे सच में इस प्रॉब्लम को अभी सॉल्व करना जरूरी है। 95% टाइम, मेरा दिमाग जो भी सोच रहा होता है, वह उस वक्त जरूरी नहीं होता। अगर दिमाग एक मसल है, तो बेहतर है मैं उसे आराम दूं, शांति दूं। जब कोई प्रॉब्लम सच में सामने आएगी, तब उसमें पूरा डूब जाऊंगा। अभी जब हम बात कर रहे हैं, मैं चाहूंगा कि मैं बस इसी बातचीत में पूरा डूब जाऊं। सिर्फ इसी पर ध्यान दो, बजाय सोचने के कि ब्रश करते वक्त सही किया या नहीं। एक चीज और, जब आप एक ही चीज पर पूरा फोकस कर लेते हैं, तो आप खुद में खो जाते हैं, प्रेजेंट रहते हैं, खुश रहते हैं और उल्टा ही सही, ज्यादा इफेक्टिव हो जाते हैं। यह ऐसा है जैसे आप खुद को एक फ्रेम से निकालकर दूसरे फ्रेम से सब देख रहे हैं, चाहे आप खुद के दिमाग में ही क्यों ना हो।

बुद्धिस्ट अवेयरनेस और ईगो की बात करते हैं। मतलब, आप अपने दिमाग को एक मल्टी लेयर्ड मशीन की तरह सोच सकते हैं। एक कोर बेस कर्नल लेवल ओएस चल रहा है, उसके ऊपर एप्लीकेशनेशंस चल रही हैं। मैं इसे कंप्यूटर और गीक वाली लैंग्वेज में सोचना पसंद करता हूं। मैं वापस उस अवेयरनेस लेवल पर आना चाहता हूं जो हमेशा शांत है, पीसफुल है, ज्यादातर खुश और संतुष्ट है। मैं कोशिश करता हूं कि अवेयरनेस मोड में रहूं, मंकी माइंड को एक्टिवेट ना करूं, जो हमेशा चिंतित, डरे हुआ, एशियस रहता है। उसकी जरूरत पड़ती है, लेकिन मैं चाहता हूं कि जब जरूरत हो तभी उसे ऑन करूं। अगर मैं उसे 24/7 चलाता रहूं तो सारी एनर्जी वेस्ट हो जाती है और मंकी माइंड ही मैं बन जाता हूं। लेकिन मैं सिर्फ अपना मंकी माइंड नहीं हूं, मैं उससे ज्यादा हूं।

एक और बात, स्पिरिचुअलिटी, रिलीजन, बुद्धिज्म या कुछ भी फॉलो करिए। सब यही सिखाता है कि आप सिर्फ अपना दिमाग नहीं है। आप सिर्फ अपनी आदतें नहीं है। आप सिर्फ अपनी पसंद नहीं है। आप अवेयरनेस है। आप एक शरीर हैं। मॉडर्न इंसान अपने शरीर में कम रहता है। अपनी अवेयरनेस में कम रहता है। हम ज्यादातर समय अपने दिमाग के अंदर की बातों में ही रहते हैं। यह सब बस सोसाइटी ने या एनवायरमेंट ने आपके अंदर डाल दिया है, जब आप छोटे थे। अब बेसिकली डीएनए है जो बचपन के असर से रिएक्ट करता है, जो अच्छा-बुरा हुआ, उसे रिकॉर्ड करता है और फिर उन्हें यूज करता है हर नए एक्सपीरियंस को जज करने में। फिर आप उन एक्सपीरियंसेस का यूज करके लगातार फ्यूचर को प्रेडिक्ट और चेंज करने की कोशिश करते हैं। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, आपके अंदर पसंद-नापसंद का भंडार बहुत बड़ा हो जाता है। यह आदतें और रिएक्शंस आपके मूड को कंट्रोल करने लगती हैं, जैसे एक तेज ट्रेन बिना ब्रेक के।

हमें अपना मूड खुद कंट्रोल करना चाहिए। लेकिन हम मूड कंट्रोल कैसे करें? यह तो हम कभी सीखते ही नहीं। सोचिए कितना बढ़िया होता अगर आप खुद से कह पाते, "आज मैं क्यूरियस बनना चाहता हूं" और आप सच में क्यूरियस फील करने लगते, या कहते, "आज मुझे किसी सपने के लिए उदास होना है। मुझे सही से उसको महसूस करना है" और आप वैसे ही फील करते। तब आपका दिमाग किसी कंप्यूटर प्रॉब्लम में नहीं उलझता। दिमाग एक मसल की तरह है। उसे ट्रेन और कंडीशन किया जा सकता है। सोसाइटी ने इसे इधर-उधर की चीजें सिखा दी हैं। इसीलिए यह हमारे कंट्रोल से बाहर हो गया है। लेकिन अगर आप अपने दिमाग को ध्यान से देखेंगे हर पल, तो आप अपने इमोशंस, सोच और रिएक्शनंस को समझ सकते हैं। फिर आप उन्हें वापस से लिखना शुरू कर सकते हैं। अपना प्रोग्राम वैसे बना सकते हैं जैसे आप चाहते हैं।

मेडिटेशन का मतलब है सोसाइटी को बंद करके खुद की सुनना। मेडिटेशन तभी काम करता है जब बिना किसी वजह के बस अपने लिए किया जाए। हकिंग चलना मेडिटेशन है। जर्नलिंग लिखना मेडिटेशन है। प्रइंग ग्रेटट्यूड मेडिटेशन है। नहाते वक्त सोचना भी मेडिटेशन हो सकता है। शांत बैठना डायरेक्ट मेडिटेशन है। अपने आप को बनाना चुनिए। सबसे बड़ी सुपर पावर है अपने आप को बदलने की एबिलिटी।

सबसे बड़ी गलती जो मैंने अपनी जिंदगी में की और कैसे सुधारा। मैंने ऐसी कई गलतियां की हैं जो बाद में सोचने पर सिंपल लगती हैं। जब भी मैं पिछले 10 साल का सोचता हूं, मैं यह एक्सरसाइज करता हूं कि जब आप 30 साल के हो जाते हैं तो सोचिए कि अगर मैं अपने 20 साल वाले आपको क्या एडवाइस देता हूं। फिर जब आप 40 के हो जाते हैं तो सोचिए मैं अपने 30 साल वाले को क्या कहता। और अगर आप यंग हैं तो हर 5 साल पर सोचिए, बैठिए और सोचिए 2007 में क्या कर रहे थे, कैसा फील हो रहा था? 208 में क्या कर रहे थे, कैसा फील हो रहा था? और बाकी के सालों में कैसा चल रहा था? जिंदगी जैसे चलनी है, चलती रहेगी; कुछ अच्छा, कुछ बुरा होगा। ज्यादातर तो आपकी सोच पर डिपेंड करता है। आप पैदा होते हैं, कुछ चीजें महसूस करते हैं, फिर मर जाते हैं। आप इन सब चीजों को कैसे देखते हैं, वह आप पर है। हर कोई अलग देखता है। सच कहूं तो मैं चाहता हूं कि मैंने जिंदगी में सब कुछ वही किया होता, बस कम इमोशन और कम गुस्से के साथ।

सबसे फेमस एग्जांपल है जब मैं यंग था। मैंने एक कंपनी शुरू की। कंपनी ने अच्छा किया, लेकिन मैं खुश नहीं था। तो मैंने कुछ लोगों पर केस कर दिया। एंड में मेरे लिए अच्छा रहा। सब ठीक हो गया। लेकिन अंदर बहुत गुस्सा, टेंशन और दुख था। आज होता तो मैं बिना गुस्से के सीधे उन लोगों के पास जाकर कहता, "देखो, यह हुआ है। मैं यह करने जा रहा हूं। यह कैसे होगा? यह सही है, यह गलत है।" आज मुझे लगता है, गुस्सा और इमोशंस की कोई जरूरत ही नहीं है। अब मैं कोशिश करता हूं वही काम सही तरीके से करूं लेकिन बिना गुस्से के एक लॉन्ग टर्म नजरिए से। जब आप लंबी सोच ले चलते हैं और इमोशंस हटा देते हैं, तो वह चीजें गलतियां लगती ही नहीं हैं।

फिर से, आदतें ही सब कुछ है। बचपन से ही हमें आदतें सिखाई जाती हैं। जैसे पॉट ट्रेनिंग। कब रोना है, कब नहीं। कैसे स्माइल करना है, कब नहीं। यह सब हैबिट्स बन जाती हैं और हमारे अंदर घुल जाती हैं। बड़े होने पर हम हजारों आदतों का सेट हो जाते हैं जो सबकॉन्शियस चलती रहती है। हमारे पास थोड़ा सा एक्स्ट्रा दिमाग है नए प्रॉब्लम सॉल्व करने का। लेकिन आखिर में हम अपनी हैबिट्स बन जाते हैं।

मुझे यह तब समझ आया जब मेरे ट्रेनर ने मुझे हर दिन एक छोटी सी वर्कआउट रूटीन दी। मैंने कभी रोज वर्कआउट नहीं किया था। सिंपल सी थी। बॉडी पर भारी नहीं पड़ती थी। लेकिन मैं हर दिन करता था। इसने मुझे फिजिकली और मेंटली बदल दिया। शांति दिमाग में लानी हो तो सबसे पहले बॉडी को शांत रखिए। इससे मुझे हैबिट्स की पावर समझ आई और मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि कोई नई अच्छी हैबिट डालने की या कोई बुरी आदत छोड़ने की। इसमें समय लगता है। अगर कोई कहे, "मुझे फिट बनना है, हेल्दी बनना है। अभी मैं मोटा हूं", तो सच बताऊं, कुछ भी सस्टेनेबल तीन महीने में नहीं होता। कम से कम 10 साल की जर्नी है। हर छह महीने में आप बुरा छोड़ेंगे, अच्छा शुरू करेंगे।

कृष्णमूर्ति कहते हैं कि हमेशा अंदर से बदलने के लिए रेडी रहिए। हमेशा अंदर रिवोल्यूशन के लिए रेडी रहिए। जब भी हम कहते हैं, "मैं ट्राई करूंगा" या "मैं हैबिट बनाऊंगा", हम असली में बहाना बना रहे होते हैं। हम खुद से बस यह कहते रहते हैं कि मैं थोड़ा और टाइम ले लूंगा। सच यह है कि जब हमारी फीलिंग्स कुछ करना चाहती है तो हम बस वह कर लेते हैं। अगर किसी लड़की से बात करनी है, या ड्रिंक लेनी है, या कुछ चाहिए, तो बस तुरंत कर लेते हैं। जब आप कहते हैं, "मैं यह करूंगा" या "मैं ऐसा बनूंगा", तो असल में आप बस उस काम को टाल रहे हैं। आप अपने लिए एक बहाना बना रहे हैं। अगर आप सच में सेल्फ अवेयर हैं, तो आप सोचेंगे, "मैं बोल रहा हूं मुझे यह करना है, पर्सनली में मुझे नहीं करना, क्योंकि अगर सच में चाहता तो अब तक कर लेता।"

बहुत लोगों को अपनी कमिटमेंट दिखानी चाहिए। जैसे अगर आपको स्मोकिंग छोड़नी है तो बस सबको बोल दीजिए कि मैंने स्मोकिंग छोड़ दी। यह मेरी कसम है। बस इतना ही काफी है। कर लो, है ना? लेकिन हम में से ज्यादा लोग कहते हैं कि अभी तैयार नहीं है। हम जानते हैं कि हम सच में अपने आप को कमिट नहीं करना चाहते। इंपॉर्टेंट है कि आप खुद से ईमानदार रहिए और कहिए, "ठीक है। मैं अभी स्मोकिंग नहीं छोड़ सकता। मुझे अभी पसंद है। यह छोड़ना मेरे लिए बहुत मुश्किल है।" कहिए, "मैं अपने लिए एक छोटा गोल सेट करता हूं। अब मैं सिर्फ इतना काम करूंगा। मैं सबको बता सकता हूं। मैं अगले तीन या छह महीने यह ट्राई करूंगा। जब यहां तक पहुंच जाऊंगा, तब नेक्स्ट स्टेप लूंगा। पर खुद को दोष नहीं दूंगा।" जब आप सच में बदलना चाहते हैं तो बस बदल जाते हैं। लेकिन ज्यादातर लोग सच में बदलना नहीं चाहते। हम अभी दर्द से बचना चाहते हैं। कम से कम इतना तो समझ लीजिए, जाग जाइए और खुद को छोटी चेंज दीजिए जो आप सच में कर पाए।

काम करने में जल्दी करिए। रिजल्ट के लिए पेशेंस रखिए। जो भी काम करना है बस कर लीजिए। क्यों वेट करना? आप जवान नहीं हो रहे। जिंदगी निकल रही है। आप अपना वक्त लाइन में लग के या ट्रैवल में नहीं खत्म करना चाहते। आप अपना टाइम उन कामों में नहीं खत्म करना चाहते जो आपके मिशन का हिस्सा नहीं है। जब आप कोई काम करिए, उसे जल्दी और ध्यान से करिए, लेकिन रिजल्ट का इंतजार पेशेंस के साथ रखिए। क्योंकि आप कॉम्प्लेक्स सिस्टम और बहुत लोगों के साथ डील कर रहे हैं।

मैं स्पेसिफिक गोल्स पर विश्वास नहीं करता। स्कॉट एडमम्स कहते हैं, "गोल्स सेट करने की जगह सिस्टम बनाइए।" आपको देखना है कौन से एनवायरमेंट में आप खेल सकते हैं। फिर अपने आसपास वैसा एनवायरमेंट क्रिएट करिए जिससे आपका सक्सेसफुल होना ऑलमोस्ट तय हो जाए। आज का एनवायरमेंट आपका दिमाग प्रोग्राम करता है। लेकिन स्मार्ट दिमाग अपना अगला एनवायरमेंट खुद चुनता है।

मैं दुनिया का सबसे सक्सेसफुल आदमी नहीं बनना चाहता। ना ही मेरी कोई ऐसी इच्छा है। मैं बस अपना बेस्ट वर्जन बनना चाहता हूं। वह भी कम मेहनत में। मैं ऐसे जीना चाहता हूं कि अगर मेरी जिंदगी हजार बार चले तो 999 बार मैं सक्सेसफुल हूं। मैं बिलेनियर नहीं हूं, पर हर बार ठीक-ठाक कर लेता हूं। हो सकता है हर चीज परफेक्ट ना हो। लेकिन मैं सिस्टम्स ऐसे सेट करता हूं कि मैं कम जगह फेल हूं। मैं इंडिया का एक गरीब बच्चा था। अगर मैं कर सकता हूं तो कोई भी कर सकता है। पर हां, मेरे पास सारे अंग थे, दिमाग ठीक था और पढ़ाई मिली थी। कुछ बेसिक चीजें होती ही हैं जो जरूरी हैं। लेकिन अगर आप यह सुन रहे हैं, तो आपके पास भी काफी चीजें हैं। एक सही बॉडी और सही दिमाग।

अगर आपको कुछ बाद में करना है तो अभी कर लीजिए। कोई बाद में नहीं होता।

मैं धार्मिक नहीं हूं लेकिन स्पिरिचुअल हूं। मेरे लिए सबसे भक्ति भरा काम है यूनिवर्स के रूल्स को समझना। जैसे कोई मक्का या मदीना जाकर प्रॉफेट को सलाम करता है, वैसे मुझे साइंस पढ़कर वही महसूस होता है। मेरे लिए यह सबसे अलग फीलिंग है। इसलिए मैं बेसिक्स पे ही टिकता हूं। यही पढ़ने का मजा है।

सबसे स्मार्ट और सक्सेसफुल लोगों ने अपनी जिंदगी की शुरुआत लूजर बनके ही की होती है। अगर आप खुद को आउटसाइडर समझते हैं, सोसाइटी ने आपको निकाल दिया है, तो आप अपना खुद का रास्ता ढूंढते हैं और तभी आप जीतने के चांस पाते हैं। अपने आप से कहिए, "मैं कभी पॉपुलर नहीं बनूंगा। मैं कभी सबको पसंद नहीं आऊंगा। मैं ऑलरेडी लूजर हूं। जो दूसरे बच्चों के पास है, वह मुझे नहीं मिलेगा। बस मुझे अपने साथ खुश रहना है।" सेल्फ इंप्रूवमेंट बिना सेल्फ डिसिप्लिन के पॉसिबल है। बस अपनी सेल्फ इमेज को अपडेट करिए। मेहनत करिए, पसीना बहाइए, मुश्किलें झेलिए। खुद का सच समझिए।

अगर मुझे अपने बच्चों को सिर्फ एक या दो प्रिंसिपल देने होते तो सबसे पहला होता पढ़ाई करिए। सब कुछ पढ़ लीजिए जो मिल सके। सिर्फ वो नहीं जो सोसाइटी कहती है या मैं कहूं वो। खुद पढ़ने का शौक बनाइए। चाहे आपको रोमांस नवेल्स पढ़नी हो, या कॉमिक्स, या कुछ भी, सब पढ़ लीजिए। कोई भी पढ़ाई बेकार नहीं होती। धीरे-धीरे आप खुद ही सही चीजें ढूंढ लेंगे जो आपको पढ़नी चाहिए। पढ़ने के साथ-साथ मैथ्स और पर्सुएशन भी सीखिए। दोनों स्किल्स लाइफ में काम आती हैं। पर्सुएशन इसलिए इंपॉर्टेंट है क्योंकि अगर आप दूसरे लोगों को इनफ्लुएंस कर सकते हैं तो आप ज्यादा कुछ हासिल कर सकते हैं। पर्सुएशन एक स्किल है, सीख सकते हैं, मुश्किल नहीं है।

मैथमेटिक्स सबसे टफ और इंपॉर्टेंट कामों में काम आती है। अगर पैसे कमाने हैं, साइंस समझनी है, गेम थ्योरी, पॉलिटिक्स, इकोनॉमिक्स, इन्वेस्टमेंट्स या कंप्यूटर समझने हैं, तो इन सबके कोर में मैथमेटिक्स है। यह नेचर की लैंग्वेज है। नेचर मैथ्स कहती है। मैथ्स हमारा नेचर की लैंग्वेज को समझने का तरीका है। और हमने अभी शुरुआत ही की है। अच्छा यह है कि आपको बहुत सारी मैथ्स नहीं आनी चाहिए। बस बेसिक स्टैटिस्टिक्स, अर्थमैटिक, प्रोबेबिलिटी आनी चाहिए। आपको स्टैटिस्टिक्स और प्रोबेबिलिटी इतनी आनी चाहिए कि उल्टा सीधा सब समझ लीजिए।

सबसे मुश्किल काम यह नहीं है कि आप क्या करना चाहते हैं। मुश्किल यह है कि आपको पता हो आपको क्या चाहिए। समझ लीजिए कि दुनिया में कोई बड़ा, कोई एडल्ट नहीं है। सब लोग बस अपने हिसाब से जिंदगी चला रहे हैं। आपको अपना रास्ता खुद ढूंढना है। जो पसंद आए वह उठाइए, जो नहीं वह छोड़िए। खुद सोचिए। खुद करिए।

जब मैं छोटा था तो मुझे फ्रीडम बहुत पसंद थी। फ्रीडम मेरी कोर वैल्यू थी। आज भी है। टॉप तीन में है। पर अब उसका मतलब बदल गया है। पहले मेरा मतलब था फ्रीडम टू: जो चाहे कर सकूं, जब चाहे तब कर सकूं। अब जो फ्रीडम मैं ढूंढ रहा हूं वह है फ्रीडम फ्रॉम, यानी गुस्से से आजादी, दुख से आजादी, जबरदस्ती के काम से आजादी। अब मैं फ्रीडम फ्रॉम चाहता हूं। पहले मैं फ्रीडम टू चाहता था।

अगर आप दूसरे लोगों को हर्ट करते हैं क्योंकि उन्होंने आपसे कुछ एक्सपेक्ट किया है, तो वह उनकी प्रॉब्लम है। अगर उनका आपसे कोई एग्रीमेंट है, तो आपकी प्रॉब्लम है। लेकिन अगर बस एक्सपेक्टेशन है, तो वह उनकी प्रॉब्लम है, आपकी नहीं। लोग लाइफ से बहुत एक्सपेक्टेशन रखते हैं। जितनी जल्दी आप उनकी एक्सपेक्टेशंस तोड़ देंगे, उतना ही बेहतर है।

हिम्मत का मतलब यह नहीं है कि मशीन गन के सामने भाग जाइए। हिम्मत यह है कि दूसरे लोग क्या सोचते हैं, इसकी परवाह मत करिए।

जो लोग मुझे काफी टाइम से जानते हैं, वह यह जानते हैं कि मेरी सबसे बड़ी पहचान यह है कि मैं बहुत इंपेशेंट और विलफुल हूं। मुझे वेट करना बिल्कुल पसंद नहीं। मुझे अपना टाइम वेस्ट करना बिल्कुल पसंद नहीं। मैं पार्टीज, इवेंट्स, डिनर्स में मशहूर हूं कि जैसे ही मुझे लगता है कि मेरा टाइम वेस्ट हो रहा है, मैं तुरंत निकल लेता हूं। अपने टाइम की कदर करिए। टाइम ही सब कुछ है। टाइम आपके पैसे से ज्यादा इंपॉर्टेंट है। दोस्तों से ज्यादा इंपॉर्टेंट है टाइम। सबसे इंपॉर्टेंट चीज है टाइम। आपका टाइम ही आपके पास है। अपना टाइम वेस्ट मत करिए। इसका मतलब यह नहीं कि आप रिलैक्स नहीं कर सकते। जब तक आप वही कर रहे हैं जो आपको पसंद है, तब तक आपका टाइम वेस्ट नहीं हो रहा। लेकिन अगर आप अपना टाइम ऐसी चीजों में लगा रहे हैं जो आपको पसंद नहीं, ना तो आप कमा रहे हैं, ना आप सीख रहे हैं, तो फिर आप क्या कर रहे हैं?

अपना टाइम दूसरे लोगों को खुश करने में मत लगाइए। दूसरे लोग खुश हैं या नहीं, यह उनकी प्रॉब्लम है, आपकी नहीं। अगर आप खुश हैं, तो दूसरे भी खुश हो जाएंगे। अगर आप खुश हैं, तो दूसरे लोग आपसे पूछेंगे कि आप कैसे खुश हैं और शायद कुछ सीख भी लें। लेकिन दूसरे को खुश करना आपकी जिम्मेदारी नहीं है।

गुस्सा क्या है? गुस्सा एक सिग्नल है दूसरे को दिखाने का कि आप वायलेंट हो सकते हैं। गुस्सा वायलेंस का पहला कदम है, हिंसा का। ध्यान दीजिए, जब आप गुस्से में हैं, तो गुस्सा मतलब सिचुएशन पर कंट्रोल चला गया। गुस्सा एक कॉन्ट्रैक्ट है जो आप खुद से करते हैं कि आप तब तक फिजिकली, मेंटली और इमोशनली परेशान रहेंगे जब तक रियलिटी चेंज नहीं होती। गुस्सा अपनी खुद की सजा है। गुस्से में इंसान दूसरे का सर पानी में दबाने की कोशिश करता है, लेकिन खुद भी डूब रहा होता है।

आज की मुश्किल यह है कि अकेले आदमी जो इन ह्यूमन विल पावर जोड़ के फास्ट करते हैं, मेडिटेट करते हैं, वर्कआउट करते हैं। और सामने है पूरी आर्मी साइंटिस्ट और स्टैटिस्टिशियंस की जो आपको जंक फूड, क्लिकबेट न्यूज़, एंडलेस गेम्स, पोर्न और एडिक्टिव ड्रग्स में उलझा देते हैं।

मेरा मानना है कि असली सच्चाई हरेसी है। यानी, उन्हें भूल नहीं सकते, बस खुद ढूंढ सकते हैं, धीरे से कह सकते हैं या पढ़ सकते हैं।

जिंदगी का मतलब क्या है? यह बड़ा सवाल है, क्योंकि यह इतना बड़ा सवाल है कि मैं आपको तीन जवाब दूंगा। पहला मतलब पर्सनल होता है। हर किसी को अपना खुद का मतलब ढूंढना पड़ता है। जो भी दूसरा आपको विज़डम देगा, चाहे बुद्ध हो या मैं हो, वह आपको बेकार लगेगा। असली चीज है खुद सवाल पूछना। आपको बस इस सवाल पर सोचना है। शायद सालों लग जाए, शायद जिंदगी लग जाए। जब आपको अपना जवाब मिल जाता है जिससे आप खुश हों, वह आपकी जिंदगी का बेस बन जाता है।

दूसरा जवाब, जिंदगी का कोई मतलब नहीं है। जिंदगी का कोई पर्पस नहीं है। ओशो ने कहा था, "यह पानी पर लिखने जैसा है या रेत में घर बनाने जैसा है।" सच यह है कि आप यूनिवर्स की इतनी बड़ी हिस्ट्री में हमेशा से डेड थे। 10 बिलियन साल या उससे भी ज्यादा, और आप अगले 70 बिलियन साल भी डेड रहेंगे जब तक यूनिवर्स खत्म नहीं होता। यूनिवर्स का कोई असली अंदर से निकला हुआ पर्पस नहीं है। अगर होता भी, तो आप अगला सवाल पूछते, "वो क्यों?" जैसे फाइमन ने कहा, "टर्टल्स ऑल द वे डाउन।" सवाल कभी खत्म नहीं होंगे। कभी भी एक जवाब नहीं आएगा जिसके बाद और क्यों न हो।

तीसरा जवाब। आखिरी जवाब थोड़ा लंबा है। साइंस पढ़ के और दोस्तों की किताबें देख के मैंने कुछ थ्यरीज जोड़ी है। शायद जिंदगी का कोई मतलब है, लेकिन वह आपको ज्यादा खुशी नहीं देगा। फिजिक्स में टाइम का एरो एंट्रॉपी से आता है। सेकंड लॉ ऑफ थर्मोडायनेमिक्स कहती है कि एंट्रॉपी सिर्फ बढ़ सकती है। मतलब, यूनिवर्स में डिसऑर्डर सिर्फ बढ़ेगा और फ्री एनर्जी कम होती जाएगी। अगर आप लिविंग थिंग्स को देखें - इंसान, पौधे, सिटी, कुछ भी - तो यह सब सिस्टम्स एंट्रॉपी को लोकल लेवल पर रिवर्स करते हैं। इंसान एंट्रॉपी को लोकल लेवल पर घटाता है, क्योंकि हम कुछ करते हैं। इस प्रोसेस में हम ग्लोबली एंट्रॉपी बढ़ाते हैं जब तक यूनिवर्स खत्म नहीं हो जाता। आप कह सकते हैं कि एक थ्योरी यह भी है कि हम यूनिवर्स को उस फाइनल पॉइंट पर ले जा रहे हैं जहां सब कुछ एक हो जाएगा। कोई फर्क ही नहीं रहेगा। सब एक लेवल पर आ जाएंगे। जो भी हम करते हैं, उससे यह प्रोसेस और तेज हो जाता है। चाहे आप कंप्यूटर बनाइए, शहर बनाइए, आर्ट करिए, मैथ्स करिए, फैमिली बनाइए। सब उस यूनिवर्स और तेज उस एंड पॉइंट की तरफ जा रहे हैं जहां सब एक हो जाएगा।

The Present Is All We Have. असली में सिर्फ यही पल है। कोई कभी पास्ट में वापस नहीं गया। कोई फ्यूचर को सही-सही प्रेडिक्ट नहीं कर पाया। सचमुच सिर्फ यही एक पॉइंट है जहां हम अभी हैं, इसी वक्त, इसी जगह। जैसे सब बड़े सच सब पैराडॉक्स होते हैं, दो पॉइंट्स हमेशा अलग होते हैं। हर पल बिल्कुल अलग हैं। हर मोमेंट इतना जल्दी चला जाता है कि पकड़ भी नहीं सकते। हर पल हम थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं और दोबारा जन्म ले रहे हैं। हमारे ऊपर हैं, हम भूल जाते हैं या याद रखते हैं।

सब कुछ ज्यादा खूबसूरत है, क्योंकि हम सबको मरना है। आप कभी इतने खूबसूरत नहीं रहेंगे जितने अभी हैं। और हम दोबारा कभी यहां नहीं आएंगे। मुझे तो याद भी नहीं है दो मिनट पहले मैंने क्या कहा। पास्ट तो बस मेरे दिमाग की एक कहानी है। मेरे लिए मेरा पास्ट मर चुका है, खत्म हो गया। डेथ का मतलब बस यही है कि अब और कोई फ्यूचर मूवमेंट नहीं आएगा।

इंस्पिरेशन जल्दी खत्म हो जाती है। इसलिए तुरंत एक्शन लीजिए। आज के लिए बस इतना ही। हम फिर मिलेंगे आपसे एक नए एपिसोड में, एक नए टॉपिक के साथ। मेरा नाम है रोहित और आप सुन रहे थे सिलेबस वि रोहित। धन्यवाद।