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सैयदा खदीजातल कुबरा रदी अल्लाहहु ताला अन्हा का जो विसाल है वो 10 रमजान मुबारक को हुआ। सबसे पहली मोसना है इस्लाम की और ये वो खूबसूरत और अजीम हस्ती है कि कायनात सारी को मुस्तफा के पास जाके सुकून होता है और मेरे मुस्तफा फरमाते हैं मुझे खदीजा के पास जाकर सुकून होता। सुभान अल्लाह। खदीजा के पास जाके सुकून होता है।
आप फरमाते हैं सैय मां पहली मां काफ अमनो अमा हक गुजारे रिफाकत पे लाखों सलाम। आप फरमाते हैं जिस तरह असहाबे काफ को उस गार के अंदर जाके सुकून मिला था। इस तरह हमारी पहली मां के पास जाके हमारे नबी को सुकून मिला करता था। सुभान अल्लाह। काफ अमनो अमा ये गार है अमनो अमा की जिस तरह असबे काफ की गार थी।
मेरे भाई हजरत सैयदा खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाहहु ताला अन्हा की याद मनाना उनका जिक्र करना इसलिए तो जरूरी था ही कि वो हम सबकी मां है। इसलिए भी जरूरी है कि वो उम्मते मुस्लिम की मुसिना है और इसलिए भी जरूरी है ये जुमला याद रखिएगा। इसलिए भी जरूरी है कि जब हजरत खदीजा का तजरा होता है तो मेरे रसूल पाक राज़ होते हैं। सुभान अल्लाह। हुजूर खुश होते हैं जब हजरत खदीजा की बात होती है। जब हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला अन्हा से कोई मोहब्बत करता कोई एतराम करता तो हुजूर राजी होते।
पहली मोहसना कुरान मजीद सूर अहजाब की आयत नंबर छह में अल्लाह करीम ने फरमाया नबीलासी ये नबी मोमिनों की उनकी जानों से भी ज्यादा मालिक है। वाज उ और फरमाया नबी पाक की अजवाज मोमिनों की माएं हैं। हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला अन्हा पहली मां है मोमिनों की।
हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला अन्हा उस दौर के अंदर जिस दौर में अभी इस्लाम नहीं आया था। अभी पर्दे के अहकाम नहीं आए थे। अभी औरतों के बारे में वो सारे अहकामात नाजिल ना हुए थे जिसकी पाबंद एक मुसलमान खातून होती है। उस जमाने में भी हजरत खदीजातुल कुबरा पर्दे की पाबंद थी। उस दौर के अंदर भी हजरत खदीजातुल कुबरा सच बोला करती थी। उस दौर के अंदर भी जनाबे खदीजातुतुल कुबरा के मिजाज में नफासत थी। बहुत बड़े ताजर की बेटी थी। बहुत बड़े। और बाप के इंतकाल के बाद हजरत खदीजा ने खुद तजारत संभाली खुद। ये कैसी ताजरा है जो कभी घर से बाहर नहीं निकली। ये कैसी ताजरा है जिन्होंने कभी जाके किसी आदमी के साथ गुफ्तगू नहीं की। ये किस किस्म की तजारत पेशा खातून है जो कभी मार्केट और बाजार नहीं गई लेकिन मक्के में जिनका माल सबसे ज्यादा बिकता था वो हजरत खदीजातुल कुबरा है। वो किसी शख्स का तायु करती कहती सरमाया मैं लगाऊंगी मेहनत तू करेगा। और वो डील भी जब होती ना उस शख्स के साथ गुफ्तगू होती तो भी डायरेक्ट हजरत खदीजा ना करती बल्कि आपकी एक खातमा थी हजरत नफीसा बाद में वो मुसलमान हुई उनकी जिम्मेदारी होती वो खातून जाकर उस आदमी से गुफ्तो शनीद करती। हजरत खदीजा का माल लेके लोग जाते मक्के में जब सब लोगों का नुकसान हुआ ना जिस साल जनाबे नफीजा कहती है जिस साल सारे मक्के वालों का माल डूब गया हजरत खदीजा को उस साल भी अल्लाह ताला ने 11 गुना नफा अता फरमाया। उस साल भी बड़ा नफा दिया। हालांकि तजारत के साथ नहीं इब्तदा इस्लाम में।
और फिर अजीब बात ये है कि दो दफा शादी हुई, दो दफा बेवा हुए। दो दफा शादी हुई, दो बेटे थे हजरत खदीजा के। नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से कबल आपके दो बेटे थे हिन्द और हाला दोनों मुसलमान हुए। दोनों हुजूर के सहाबी हुए। दो शहजादे थे हजरत खदीजा के। दो दफा पहले शादी हुई। दोनों खामंद इंतकाल कर गए। अरब के बड़े-बड़े और हजरत खदीजा बनू कुरैश में से हैं। तीन चार नस्लें ऊपर जाकर इनका खानदान नबी पाक सल्ला वसल्लम के साथ मिल जाता है। हजरत खदीजा का दो दफा निकाह हुआ। आप बेवा हो गई। दोनों दफा खामंद विसाल कर गए। बड़े-बड़े मक्के के सरदारों ने पैगाम निकाह दिया। हजरत खदीजा खामोश रही। निकाह नहीं किया। लोगों ने बड़ी वजूहात बयान की। अलग-अलग बातें लिखी। शेख मोहक शाह अब्दुल हक मुस्लवी फरमाते नहीं असल बात और थी।
अरब के अंदर साल के बाद औरतों का एक मेला लगता था खाना काबा के पास। सिर्फ औरतें इकट्ठी होती थी। मेला लगा हुआ था। एक तरात जानने वाला यहूदी आलिम भी आया हुआ था। वो बीवियों के मजमे पर नजर डाल के कहने लगा बीबियों मर्द का काम तो कोई नहीं औरतों के मजमे में बात करना। लेकिन मैं तुम्हें एक पैगाम देने लगा हूं। अल्लाह के आखरी रसूल जो मक्के में पैदा होने वाले हैं उनके आने का वक्त करीब आ गया है। वो बीवी बड़ी खुशनसीब होगी जिन्हें उनकी रफाकत मिलेगी। औरतों ने जब देखा कि मर्द आ गया औरतों के मेले में तो उन्होंने डांटा झिड़का कहा चल उठा अपनी किताबें और निकल जा। हजरत खदीजा कहती है बाकियों ने डांटा पर मैंने बात पल्ले से बांध ली। मैंने पल्ले से बांध ली और मैं इंतजार करने लगी कि अल्लाह करे वो नसीब मेरे ही हो। अल्लाह करे मुकद्दर मेरा ही खुले। आप फरमाती मैं तस्बीह पढ़ती, दुरुद पढ़ती, मैं उस जमाने में जो अल्लाह का जिक्र जिस तरह होता था वो मैं शुरू करती और जब फारग होती तो मैं इल्तजा करती कि अल्लाह मेरे नसीबे खोल दे। कहती है आहिस्ता आहिस्ता आहिस्ता आहिस्ता मैं हुजूर की तारीफ सुनने लगी। आहिस्ता आहिस्ता तारीफ सुनने लगी नबी पाक। सादिक हैं, अमीन हैं, सच्चे हैं, दनतदार हैं। इस बुरे और मैले मुआशरे में भी वो सबसे आला भी हैं और सबसे उजले भी हैं। वो सबसे पाकीजा है। मैं सुनने लगी तारुफ। आहिस्ताआहिस्ता मैं उनकी गविदा होने लगी।
उधर नबी-ए पाक सल्लल्ला वसल्लम अपने चाचा जनाबे अबू तालिब के पास रहते थे। कहत आ गया। हालात बिगड़ गए। हुजूर सैयद आलम सल्लल्लाहु ताला वसल्लम से चाचा कहने लगे बेटे अगर माले तजारत लेके शाम जाओ तो बड़ा नफा कमाओगे हमें जरूरत भी है और अगर हो सके तो खदीजा का माल लेके जाओ और नबी पाक ने कहा चाचा मैं नहीं कहूंगा किसी से जाके मैं नहीं कहता किसी से जाके जो मेरे नसीब में होगा मेरा रब खुद अता फरमाएगा मैं नहीं कहूंगा मुस्तफा ने तो नहीं कहा। हजरत खदीजा रदी अल्लाह ताला अन्ह कहती है मैंने खुद अपनी खातिमा को भेजा मैंने कहा जाके पूछो तो सही कि मेरा माल कबूल होता भी है कि नहीं? पूछो नबी पाक सल्ला वसल्लम से पूछा हजरत खदीजा की ख्वाहिश है कि आप माल लेके जाए। हुजूर ने कबूल कर लिया।
जनाबे खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला के गुलाम थे। मैसरा उनका नाम था। जनाबे खदीजा ने उनको साथ भेजा। फरमाया एक तीन बातें इरशाद फरमाई। एक तो फरमाया सारा रास्ता गौर से देखना मेरे नबी के साथ क्या मामलात दरपेश होते हैं। अभी ऐलान नबूवत नहीं किया। फरमाया जरा गौर करना मेरे मुस्तफा का मुतालिया करना और मुझे वापस आके सबक सुनाना वो जो तुमने चेहरा बद्दुआ की तिलावत की हो जरा मुझे वापस आके सुनाना जिन ने दिल पर जानी डिटठा हो अिया तक तू मिले हो साजन मिल हूं ना साल लग पया जरा जाके ना तिलावत करना मुझे। और दूसरा फरमाया तुम मेरे गुलाम हो तो मुस्तफा के भी गुलाम बनके रहना मैं सुनती हूं के किरदार के अफकार के नजरियात के अजमत के बुलंद बाला वो जैसे कहे वैसे करना। और तीसरी हजरत खदीजा ने नसीहत फरमाई फरमाया मोहम्मद इबने अब्दुल्लाह सल्लल्लाह वसल्लम की राय से इख्तलाफ ना करना ये चलते हुए मुआयदा किया जो वो कह दे सो कर जाना।
गुलाम कहते हैं मैं साथ गया बातें मैंने सुन ली लेकिन जब सफर शुरू हुआ ना अभी चंद मंजिलें तय हुई थी मैंने कहा खदीजा आपने क्या नसीहत करनी थी इनके साथ जो रहेगा वो इनका गुलाम ही बन जाएगा इनके साथ जो रहेगा तू अ मेरा महबूब नहीं डिटठा जिन देख के चंद शर्मावे जे रखे हाथ फुल विच हाथ नाल फुल रल जावे अ रात चंद चढ़ जलवा फरमावे। फरमाया जो भी साथ रहता गुलाम हो जाता मैं कहते मैं गया तजारत शुरू हुई कहते नबी पाक सल्ला वसल्लम जब मंडी में पहुंचे तो लोग कसमें उठा उठा के माल बेच रहे थे अल्लाह के महबूब जब गए ना तजारत करने तो एक आदमी कहने लगा चलो माज़ अल्लाह बुतों के नाम थे लातो मनात कहने लगा लात की उजा की मनात की कसम उठाओ तो नबी पाक फरमाने लगे उनकी कसम उठाऊं जिनका मैं नाम लेना भी पसंद नहीं करता अभी अल्लाह ने नबूवत नहीं किया और फरमाया वैसे भी मैं कसम देके माल नहीं बेचता खरीदना है तो खरीदो नहीं खरीदना तो ना खरीदो कहते हैं लोग कसमें उठा उठा के पीछे जाते थे पर मेरे नबी जिससे रुख फेरते थे वो नबी पाक के पीछे हो जाता था फरमाते हैं कई गुना ज्यादा नफा कमाया।
हम रास्ते में थे। हुजूर एक दरख्त के नीचे आराम करने लगे। एक ईसाई राह गार में बैठा था। निकल के आ गया। मुझसे कहने लगा मुझे वो जानता था। मैं ये किसको साथ लाएगा? ये कौन है? मैंने कहा अहले कुरैश के एक मुअजज़ आदमी है। कहने लगे यार जिस दरख्त के नीचे ये लेटे हुए हैं। यहां आम आदमी नहीं लेट सकता। यहां वही लेटेगा जो अल्लाह का सच्चा रसूल होगा। यहां दूसरा कोई लेट ही नहीं सकता। ये रसूल है इनका ख्याल रखना। ख्याल रखना काश मैं उस वक्त तक जिंदा रहूं जब ये नबूवत का ऐलान करें। मैशरा कहते हैं मैं गुलाम हो गया। नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की अदाएं मुझे भाने लगी। जब वापसी पे निकले तो गर्मी बड़ी शदीद थी। फरमाते हैं जब धूप तेज होती तो बादल का साया आके हुजूर पे साया कर देता। सुभान अल्लाह। बादल का टुकड़ा नबी पाक पे। अल्लाह जाने कहां बैठ के लोगों ने किताबें पढ़ी है। जो कहते हैं 40 साल के बाद नबी बने थे। पता नहीं कहां बैठ के किताबें पढ़ी है। हमने तो जो सीरत पढ़ी है वो बताती है कि तेरी हयात पाक का हर लम्हा पैगंबर लगे। हर लम्हा पैगंबर लगे। यहां तो वो लोग जो कई साल पहले 20 और 25 साल पहले हुजूर सैयद आलम सल्लल्ला वसल्लम की रफाकत में रहे। वो ऐलान कर रहा है। लोग पता नहीं कहां बैठ के किताबें पढ़ते हैं। कहां बैठ के? मेरे नबी पाक से सहाबा ने पूछा हुजूर आप कब नबी थे? फरमाया अभी आदम की मिट्टी गूदी जा रही थी। अभी आदम की मिट्टी गूदी जा रही थी। मैं तब भी अल्लाह का रसूल था।
मेरे भाई नबी-ए रहमत सैयद आदलम सल्ला वसल्लम के गुलाम हजरत खदीजा के गुलाम कहते हैं वापस आया। और पहले भी कई दफा हजरत खदीजा का माल गया था। बड़े नफे आए थे। पर जो नफा इस साल आया वो पहले कभी नहीं आया था। कहते हैं मुझसे हजरत खदीजा की सहेली भी बैठी थी। मैं भी आ गया। और जनाबे खदीजा की सहेली कहने लगी चल माल के बारे में कुछ बता कितना बिका। मैंने कहा माल छोड़ो मुस्तफा की सुनो। तो फिर कहती चलो ठीक है बादल साया करता था। चलो ठीक है। तुमसे राहब ने पूछा था ये सही है। उन्होंने तेरी सारे रास्ते बड़ी खिदमत की। तेरा बड़ा ख्याल रखा। पर ये भी बता तजारत कैसे हुई? तो मैसरा कहने लगा जिंदगी मैंने भी सारी गुजार दी है पर इस रसूल के साथ चार दिन ही गुजारे हैं। हद हो गई मुझसे और कुछ ना पूछो और कुछ ना पूछो आ मेरे दिल आमना के लाल की बातें करें। और कुछ ना पूछो बस जिक्र उनका छेड़िए हर बात पर और छेड़ना शैतान का आदत कीजिए। बस मुझे हुजूर के तज़रे बयान करने हैं। जिक्र मुस्तफा करना है।
हजरत खदीजातुल कुबरा बड़ी मुतासिर हुई। कहती है मुझे दर्जनों लोगों ने पैगाम निकाह दिया था पर मैंने सुनी नहीं थी। मैंने नफीसा के हाथ पैगाम भेजा। मैंने कहा मेरी उम्र 40 साल है। उनकी 25 साल है। और मेरा आमाल और तरह का है। वो शहंशाह है। जा के पूछो तो सही। भला मैं कबूल होती हूं? पूछो। नफीसा कहती है मैं आई तो वो खातून जिनके लिए लोग बड़े-बड़े कुरैश पैगाम देते थे। पैगाम लेके आई तो रसूल पाक ने अजीब रंग बयान किया अपनी सीरत का। जब मैं पहुंची मैंने कहा खदीजा निकाह करना चाहती हैं। नफीसा कहती है मेरा ख्याल था कि कोई और होता तो कुर्सी से उठ खड़ा होगा। फौरन कहेगा अच्छा जल्दी करो बात करो। जब मैंने आके कहा ना हुजूर खदीजा निकाह करना चाहती है तो नबी पाक ने मेरी तरफ देखा। फरमाया वो कहती है कि तुम कहती हो? कहा वो कहती हैं? तो हुजूर ने फरमाया ठहर जाओ मैं अपने चाचा से पूछ के बताऊंगा। मैं मशवरा करूंगा मैं पूछ के बताऊंगा। आज बच्चों को कुछ सबक बड़े याद है। कहते हैं पसंद की शादी करना हजरत साहब नाजायज है। पसंद की शादी करना कोई नाजायज है? ओ मैंने कहा भाई सिर्फ एक ही जायज चीज रह गई और कोई शय जायज नहीं। ये एक ही जायज चीज है जिसका फतवा सारे नौजवान पूजते फिरते है। सारे रजे बने फिरते हैं, मजनू बने फिरते हैं। सारे माईवाल हो गए। अल्लाह पाक हिदायत की तौफीक अता फरमाए। सारे इस बुरी लत का शिकार हो गए। ओ भाई नबी पाक सिवाय खुदा के किसी के पाबंद नहीं। लेकिन मेरे मुस्तफा ने अपनी उम्मत को ये दर्स दिया है कि जो बड़ों के शफकत के साए में चलता है अल्लाह उसकी मदद फरमाया करता है। तुझे क्या पता तेरा अच्छा भला किस बात में? कहा निकाह करना चाहती हूं। फरमाया चाचा से पूछ के बताऊंगा।
खदीजा रदी अल्लाह ताला कहती है उन्होंने पूछा जनाबे अबू तालिब कहने लगे ये तो खुशकिस्मती है कि हमें ऐसी बहू मिल जाए जिसके किरदार में अफकार में नजरियात में इतनी नफासत हो मुस्तफा करीम के साथ निकाह हुआ कुर्बान जाएं हजरत खदीजातल कुबरा की शादी हुई तो भाई बड़ा मुश्किल होता है बड़ा मुश्किल बड़ा मुश्किल होता है अपने आप को ढालना लेकिन जनाबे खदीजा की जिंदगी उठा के देखो मैं ये नहीं कह सकता करोड़पति थी अरब खरब की मैं बात ही नहीं कर सकता और 2020 नौकरानियां थी उनके पास दर्जनों उनके पास गुलाम थे लेकिन जब रसूल अल्लाह के दरवाजा नूर पे आई हैं उन्होंने मेरे नबी के घर में झाड़ू भी दिया है उन्होंने हुजूर के कपड़े भी धोए हैं। उन्होंने रसूल अल्लाह के लिए अपने हाथों से खाना बनाया। उन्होंने देखा कि नबी पाक सल्ला वसल्लम को दौलतों से, तजारतों से, सरमाए से प्यार नहीं। जितनी दौलत थी शाम को लाके कदमों में रख दी। कहा महबूबा जब मैं तेरी हूं तो मेरी हर शय ही आपकी है। चंद दिनों में हुजूर ने सारी चीजें दे दी अल्लाह के रस्ते में। हर चीज नबी पाक ने दे दी। हजरत खदीजातुल कुबरा का हाल ये था कि एक जोड़ा रह गया। कई जगह से पेबंद लगे हुए। मैं गुड्डी हाथ डोर सज्जन दे ओ ज रखे रहना है वाजिब नहीं जे शरीयत मंदा कसम न कहना बस ठीक है जिस हाल में महबूब राजी है कहा हर चीज कदमों में रख दी और हुजूर के हर रिश्ते का ख्याल किया नबी पाक की हर ख्वाहिश का।
औरतें बिलखसूस मेरी बात पे तवज्जो करें जो अर्ज करने लगा हूं आग लगी हुई है घरों में फसाद है लड़ाई है झगड़ा है दंगा है ये तेरा रिश्तेदार वो मेरा रिश्तेदार जब तेरे आते हैं तो रोटियां जल्दी पकती है जब मेरे आते हैं तो बीमारियां बड़ी होती है तेरे मेरे का झगड़ा आओ मेरे मुस्तफा करीम सैयद आलम का भी हाल देखो हजरत हलीमा सादिया मिलने आई शादी को कुछ दिन गुजरे तो हलीमा सादिया मिलने आई हजरत हलीमा सादिया सगी अम्मा नहीं रजाई अम्मा है यहां तो सगी अम्मा बर्दाश्त नहीं होती सगी अम्मा और वो बहू सोच सोचती नहीं बात करते हुए सोचती नहीं वो सोचती नहीं कि किसके बारे में बात कर रही है उसे पता ही नहीं कि तुझे तो पला पलाया ये मिला है ना कभी इसकी अम्मा से पूछ उसने कितनी तकलीफें बर्दाश्त की उससे पूछ किस दिक्कत में किस आजमाइश में इस बच्चे को परवान चढ़ाया है तू आज मालिक बनी है तो तू तू रंग ही बदल गई है और बच्चा भी बीवी के साथ मिलकर के अम्मा की गीबत करता है सोचता ही नहीं कि बात किसकी हो रही है इसे ख्याल ही नहीं आता। हजरत हलीमा सादिया रजाई मां है। जब तशरीफ लाई तो मुस्तफा करीम ने फरमाया खदीजा ये मेरी अम्मा है। जनाबे हलीमा सादिया कहती है मैं घर में रही मेरी खिदमत की। मुझे खाना पका के दिया, बिस्तर बिछा के दिया, कपड़े लेके दिए और जब मैं जाने लगी तो कहने लगी आप मेरे मुस्तफा की अम्मा है। पहली दफा आई है। थोड़ा सा तोहफा ना दे दूं। कहने लगा जैसे मर्जी हजरत हलीमा कहने लगी तो जनाबे हलीमा सादिया को 40 बकरियां और एक ऊंट तोहफे में अता फरमाया। और ये जो बीवी आके माली बनी है ना आज जिस दरख्त की छांव में तू बैठी हुई है ना अगर तू समझे तो असल एहसान उस मां का है जिसने ये परवान चढ़ा के तुझे दिया है। असल नेकी उस अम्मा की है जिसने तेरे सर पे ये सरताज रखा है और तू उस मां को ही भूल गई है और शिकवा बहू से नहीं शिकवा उस बेटे से है बेटे से है जो अलेदा भी होने लगा था तो अम्मा से अदा हो गया है जिसने सोचा ही नहीं कि मां के हाथ उठ जाए तो अर्श का मालिक कहता है फरिश्तों से के पीछे हट जाओ मां और बाप औलाद के लिए जो मांगेंगे मैं फौरन अदा करूंगा तुझे पता ही नहीं और उधर रसूल पाक का क्या हाल है कहते हैं वो तेरे रिश्तेदार हैं तेरे बहन भाई हैं तू तू जा मैं तुझे दरवाजे पे छोड़ आऊंगा। तू मिल उनसे मैं नहीं मिलता। मैं साहब होता हूं। मेरा उनसे क्या लेना देना?
हजरत खदीजा के भाई नहीं थे। नबी पाक सल्लल्ला वसल्लम के ससुर हयात नहीं थे। दो बेटे थे हजरत खदीजा के। और वो दोनों बेटे पिछले खावंद से थे। जरा अकल की कसौटी पर तोलिएगा कि किसी बीवी के बेटे हो और पिछले खावंद से हो। उस आदमी का रवैया किस तरह का होता है? लेकिन मेरे रसूल पाक का रवैया इस तरह का था। मैं आपको सीरत की किताबों से इमाम हलबी ने कस्तानी ने साहिब फतूल बारी ने लिखा है। रसूल कायनात सैयद आलम सल्लल्ला वसल्लम सोए होते थे। ओ जागो और सुनो। अल्लाह करे हजरत खदीजा का मेरे नबी से रिश्ता और मेरे नबी का हजरत खदीजा का रिश्ता हमारी समझ में आ गया तो समझ लो हमारे घर जन्नत बन जाएंगे। रोशनी फैल जाएगी। समझो और सीखो।
हजरत आयशा सिद्दीका फरमाती है नबी पाक सो जाते थे ना दोपहर को तो कहती थी मौला अली से लेकर अबू बकर सिद्दीक तक किसी की ताकत नहीं होती थी हुजूर को आके बेदार करे सुबह अदब समझा जाता था और मैं एक जुमला आगे बढ़ा के कहूंगा मैं कहूंगा अम्मा जी आप तो मौला अली से लेकर अबू बकर सिद्दीक तक फरमाती है ना हमारा तो अकीदा ये है कि मुस्तफा सो जाए तो जिब्रील भी नहीं जगा सकते वो भी नहीं आ सकते वो भी हाथ बांधे खड़े कि मौला कैसे जगाऊं? हजरत जिब्रील भी नहीं जगा सकते। लेकिन हजरत आयशा सिद्दीका फरमाती है मैं थी मदीने में। बीत गया हजरत खदीजा के विसाल मैं मदीने में हुजूर के घर में थी। नबी पाक मेरे घर में मौजूद थे और सैयद आलम सोए हुए थे। हजरत खदीजा के पिछले खावंद के बेटे जनाबे हाला आ गए। और वो मस्जिद में आके बोले मस्जिद में। तवज्जो करना मस्जिद में बोले। उन उन्होंने मस्जिद में आके पूछा कि नबी पाक कहां है? मस्जिद में। तो जनाबे आयशा सिद्दीका फरमाती है हुजूर सोते हुए बेदार हो गए। हुजूर तामत समेटी फौरन सर के ऊपर कपड़ा रखा। मैंने कहा हुजूर कहां जा रहे हैं? फरमाती है मैंने एक दफा पूछा तो हुजूर ने तीन दफा फरमाया। फरमाया मेरा हाला आ गया है। मेरा हाला आ गया है। मेरा हाला आ गया है। खदीजा का बेटा आ गया है। मेरे रसूल पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने बीवी के रिश्तों का जो तकद्दुस बयान किया उसको समझिए। फरमाया हाला आया है। बेदार होके खुद तशरीफ़ ले गए। ये तो हाला थे ना। बड़े बेटे हजरत खदीजा के सबसे उनका नाम हिंद था। और हजरत हिंद से कोई बंदा तारुफ पूछता ना नबी पाक का जो हुलिया मिलता है ना किताबों में सीरत की किताबों में हुजूर का मुखड़ा कैसा था मुख चंद बदर शाशानी है मत्थे चमक दी लाट नूरानी है काली जुल्फ ते मस्तानी है मखमूर अ है मद भर ये जो हुजूर का हुलिया मिलता है ना ये हजरत हिंद का बयान किया हुआ है वो बयान किया करते थे कि नबी पाक की आंखें कैसी थी हुजूर के जलवे कैसे थे वो बयान हजरत खदीजा के बेटे कोई उनसे पूछता कि बड़े राजी रहते हो हिंद बड़े राजी रहते हो तो हजरत कैसे राजी कैसे ना रहूं राजी कैसे ना रहूं मेरे भाई का नाम अली उल मुर्तजा है बहन का नाम फातिमातु जहरा है मां का नाम खदीजातुल कुबरा है और बाप का नाम मोहम्मद मुस्तफा है मैं राजी कैसे ना रहूं।
हजरत खदीजातुल कुबरा के रिश्तों के साथ रसूल अल्लाह का प्यार उनके कंजुलमाल में हजरत आयशा सिद्दीका की हदीस है जनाबे आयशा फरमाती है दोपहर को हुजूर आराम करते तो कोई आया नहीं करता था। एक दिन एक बूढ़ी आ गई दरवाजे पे उसने छड़ी पकड़ी हुई है। कहते हैं वो अंदर आई तो नबी पाक बड़ी तेजी के साथ उठे। हुजूर सैयद आलम ने करीब बिठाया। देर तक हुजूर बातें करते रहे। देर तक देर तक गुफ्तगू होती रही। फरमाते हुजूर ने उसे कोई इजाफी वक्त दिया। आम सहाबा इस इस वक्त आते नहीं हुजूर के आराम का वक्त इजाफी वक्त दिया नबी पाक ने और फरमाते हैं जब वो जाने लगी तो नबी पाक ने तोहफे भी अता फरमाए और फिर एक गुलाम से हजरत बिलाल से या किसी गुलाम से फरमाया कि साथ जाओ और घर छोड़ के आओ नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने एजाज दिया हजरत आयशा सिद्दीका फरमाती है देर तक मुलाकात भी तोहफे भी इनफरादी मुलाकात बाद में नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम लेट गए मेरे दिल के अंदर ख्याल आया कि हुजूर जाएंगे और जब रात को वापस आएंगे तो फिर मैं पूछूंगी कि हुजूर ये बीवी कौन है? हुजूर अब आराम कर रहे हैं। फरमाती है मेरा ख्याल था कि ये सवाल शाम तक मेरे ज़हन में रहेगा कि ये कौन है? आपने बड़ा एजाज दिया। दरवाजे तक छोड़ने गए। हजरत आयशा सिद्दीका फरमाती है मैं सोच रही थी आराम कर रहे हैं। और मैंने जैसे ही निगाह डाली तो हुजूर तो गहरी सोच में गुम है। नबी पाक सोचों में गुम हैं। और बे आंखें खुली हुई। फरमाती है मैं करीब जाके बैठी कदमों पे हाथ रखा। मैंने कहा महबूबा यह बीवी कौन थी? इतनी देर आपने मुलाकात की और वो चली गई है तो अभी ख्यालात हैं, तसवुरात हैं। फरमाती है मैंने पूछा तो मुस्तफा की आंखों में आंसू आ गए। नबी पाक रो दिए उठ के बैठ गए। मैंने कहा हुजूर क्या हुआ? मैंने तो आपको परेशान कर दिया। मैं माज़रत चाहती हूं। हुजूर ने फरमाया आयशा ऐसी कोई बात नहीं। इस बीवी के बारे में पूछती हो जिसे मैंने ज्यादा इज्जत दी है। ज्यादा प्यार किया है। जरा ज्यादा उसके साथ मैंने तवज्जो की है। हां या रसूल अल्लाह मैंने इनफरादी रंग देखा है। रूटीन से बढ़कर आपने मोहब्बत फरमाई। तो मेरे मुस्तफा ने फरमाया ये जो औरत आई थी ना जो मेरे पास बैठी रही है। ये मेरी ज़ौजा जनाबे खदीजा की सहेली है। सुभान अल्लाह। ये हजरत खदीजा की सहेली है। जनाबे खदीजा की सहेली। फरमाया ये मक्के में खदीजा से मिलने आया करती थी। खदीजा इसे वक्त देती थी। पास बिठाती थी। खाना खिलाती थी। दुख सुख सुनती थी और थोड़ी गरीब है। जब ये जाती थी तो खदीजा तोहफे भी देती थी। फरमाया आज जब ये आई है तो खदीजा की यादें ताजा हो गई। देर तक मैंने इससे बात की है, गुफ्तगू की जाते दफा तोहफा दिया है। इसलिए कि हुस् ईमान अच्छे तरीके से वादा निभाना ये भी ईमान का हिस्सा है। अच्छे तरीके से अहद निभाना ताल्लुकात निभाना ये भी ईमान का ये भी ईमान का हिस्सा है।
हजरत खदीजा की सहेलियों से रसूल्लाह सल्लल्ला वसल्लम का रिश्ता पहली वही नाज़िल हुई नबी पाक पर। अब हुजूर जब इदा वही के अयाम आए तो हजरत खदीजा फरमाती है रसूल पाकरा में चले जाते कई कई दिन वहां रहते पहली वही आई तो कुरान मजीद की तासीर ये है कि कुरस फरमाया अगर मैं पहाड़ों पे नाजिल करूं कुरान को तो वो भी मेरे खौफ से रेजा रेजा हो जाए इतनी तासीर है जब हुजूर के कलबे अथर पर आया तो नबी पाक कांपते हुए घर आए जमिलूनी जमिनी मुझे चादर उड़ाओ चादर उड़ाओ हजरत खदीजा ने चादर दी बैठ गए कहा खदीजा आज कोई आने वाला आया है एक और रबज़ खलक ये आयात उसने मुझे दी है और मैं बड़े खौफ के आलम में हूं हजरत खदीजा के लफज़ बड़े हसीन है जनाबे खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला क्या फरमाती है कहती है या रसूल अल्लाह सल्ला वसल्लम आप गम ना करें रब आपको रुसवा नहीं करेगा, इज्जतें अता करेगा। और दलील क्या है? हजरत खदीजा फरमाने लगी दलील ये है कि आप गरीबों की मदद करते हैं। मिसकीनों का ख्याल रखते हैं और महबूबा कमजोरों का बोझ आप उठाते हैं। जिसके अंदर ये खूबियां होती है अल्लाह उसे इज्जत ही अता फरमाया करता है।
हजरत खदीजातुल कुबरा रदी अल्लाह ताला सबसे पहले नबी पाक पे ईमान लाए। बड़ा मुश्किल होता है। हमारे जो फलसफे के लोग हैं वो कहते हैं बहुत बड़ा वली अल्लाह भी हो तो बीवी उसकी मान जाए। यह मुश्किल होता है काम। यह मुश्किल होता है। हजरत खदीजात कुबरा रदी अल्लाह ताला सबसे पहले और किस तरह का ईमान किस तरह का ईमान इबने माजा में रवायत है गौर करना हजरत कासिम नबी पाक सल्ला वसल्लम के साहबजादे हुजूर की छह औलादें चार बेटियां दो बेटे हजरत खदीजा से हुए चार बेटियां और दो बेटे धोखा देते हैं बाज लोग कहते हैं हजरत खदीजा की एक ही बेटी थी हजरत कासिम हुजूर के बेटे थे वो विसाल कर गए हजरत खदीजा अभी दूध पिलाती थी कि शहजादे पर्दा कर गए। एक दिन घर में बैठी हुई थी तो कहने लगी या रसूल अल्लाह सल्ला वसल्लम मेरे बेटे कासिम के हिस्से का दूध मेरे वजूद में भर आया है। काश मेरा रब इतना मौका देता कि मेरा बेटा मुद्दते रजा ही पूरी कर लेता। वो दूध पी लेता। नबी पाक ने फरमाया खदीजा तू गम ना कर। अल्लाह तबारक व ताला ने तेरे बेटे की मुद्दत रजा जन्नत में पूरी कर दी है। जन्नत में पूरी कर दी है। और नबी पाक ने अपना इख्तियार बयान फरमाया इबने माजा में रसूल पाक ने फरमाया अगर तू कहे तो मैं यहां बैठे-बैठे तुझे तेरे बेटे की आवाज सुनाऊं? सुभान अल्लाह। अर्ज करूं रब की बारगाह में मैं अभी-अभी तुझे सुनाऊं तेरे बेटे की बात? अभी वो जन्नत में बोले, लुत्फ नहीं आया आपको इस बात का? सुभान अल्लाह। मैं अभी अभी अभी सुनाऊं तुझे बाद से की रवा अभी सुनाऊं तेरा बेटा बोलेगा जन्नत में आवाज यहां मक्के में आएगी सुनाऊं बड़े लोग करामत देखना चाहते हैं मोजजा देखना चाहते हैं कहता है जी मैं तो वो देख के आऊंगा कहा सुनाऊं हजरत खदीजा का ईमान देखें कहने लगी महबूबा मुझे सुनने की क्या जरूरत है मैं खुदा को भी मानती हूं मोहम्मद मुस्तफा को भी मानती हूं मैं बिन देखे ही मानती हूं बिन देखे ही मानती हूं मुझे सुनने की जरूरत आपने कह दिया तो सो हो गया। मुझे हाजत हुजूर कह रहे हैं अगर तू कहे तो दुआ करूं इल्तजा करूं। अभी आवाज अल्लाह सुना दे। अभी सुनाऊं? हजरत खदीजा कहती है नहीं हुजूर मैं बिन देखे ही मैं हूं। मैं उन लोगों में से नहीं हूं जो पहले देख के आए, पलट के आए, देख के सौदा करें। मैं तो उन लोगों में से हूं जो बिन देखे माना करते हैं। युना बिल गैब की काय रसूल्लाह सल्ला वसल्लम पे ईमान लाए।
और फिर नबी पाक सल्लल्ला वसल्लम ने जैसा कहा हजरत खदीजा ने वैसा किया और हजरत आयशा की रवायत ऐसी भी मिलती है जनाबे आयशा से किसी ने पूछा था किसी ने जन्नत की नेमतें भी खाई है तो हजरत आयशा कहने लगी हां एक दफा नबी पाक ने जन्नत के अंगूरों का खोशा तोड़ के हजरत खदीजा को खिलाए थे वो अंगूर वहां से तोड़ के जनाबे खदीजा को हुजूर ने अंगूर खिलाए थे नबी-ए पाक सल्लल्लाहु ताला अलह वसल्लम पर ईमान लाई। हर मौका पर हर मौका पर हुजूर का साथ दिया। तकलीफें देखी। आजमाइशें देखी। हजरत खदीजा का जो वक्त हुजूर के साथ गुजरा है ना वो सारा आजमाइशों का वक्त है। 15 साल शादी को हुए तो नबी पाक ने ऐलान नबूवत किया। बाकी के 10 साल 25 साल की रिफाकत रही। सख्त मसला था। कुफार की मुखालफत थी। बहुत ज्यादा माल था। फिर गुरबत आई। पूरा मक्का सलूट करता था। फिर वो सारा शहर मुखालफत करने लगा। हजरत खदीजातुल कुबरा डट के रसूल्लाह का साथ देती। हर हर मौके पर किसी जगह शिकवा नहीं किया। यहां औरतें बोल पड़ती हैं। कहती है जब से तेरे घर आई हूं सुख नहीं देखा। जब से यहां आई हूं कुछ नहीं देखा। जब से यहां आई हूं बड़ी आजमाइश में। हजरत खदीजतुल कुबरा माल लेके आई। लेकिन उन्होंने देखा कि मुस्तफा को गरीबी पसंद है तो गरीब हो गई। जी जान कुछ वसा नहीं जान यार दे शाद हो जा ऐसे दिल फसाद सारे दिल दिलबर दे ते आजाद हो जा रखे आबाद ते रहो वसदा ज करे बर्बाद बर्बाद हो जा कहा या रसूल अल्लाह जिस बात में आप राजी है मैं भी उसी बात में राजी हूं जनाबे खदीजा रदी सुभान अल्लाह।
आयशा कहती है बात तो बिल्कुल तरतीब से हो रही थी पर उमर ने जुमला बोला तो उमर भी रोए अल्लाह तो मैं भी रोई फिर ना लफज़ खत्म हो गए और आंसू शुरू हो गए आशिक दा काम ही रोना तो बिना रो नहीं मंजूरी आशिक सदा ही रोा रहदा पावे वसल होवे ते पावे दूरी रो पड़े रोते रहे क्या हुक्म है मेरे लिए जनाबे आयशा सिद्दीका रदी अल्लाहहु ताला अन्हा फरमाने लगी उमर आप जाइए कहते सहाबा भी ठीक है पर जहां आप खड़े हैं आप तो बिल्कुल ही ठीक है सुभान अल्लाह आप जाइए हज़त हजरत उमर तशरीफ ले गए तो सहाबा लौट करके आए। अर्ज करने लगे अम्मा जी क्या बना? तो जनाबे आयशा