📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

Shehzadi Or Ek Gareeb Ka Anokha Qissa || Sabaq Amoz Kahani || Moral Stories in Urdu & Hindi

VibeElevate1:05:36

Transcription

अलमामून के जमाने में उनका एक वजीर था। निहायत अकलमंद और फाजिल, नाम उसका यहिया बिन खालिद था। और फिर ऐसा इंसाफ पसंद वजीर था कि तमाम रियाया उसकी रियायत में बड़े अमन व आंसू से रहती थी।

खलीफा अलमामून की यह आदत थी कि हर वक्त सबके सामने अपनी तारीफ किया करते कि दुनिया में कोई मुझ जैसा बा हिम्मत व सखावत वाला नहीं। ना कोई हुआ है। यहिया को यह बात पसंद ना थी।

एक रात का जिक्र है कि खलीफा अलमामून अपने अरखाने दौलत के साथ खुशनवाइयों में मुश्ताक थे और हस्बे मामूल अपनी तारीफ करने लगे। यहिया भी उस वक्त वहां मौजूद था। ना रह सका और खलीफा से कहने लगा, "ऐ बादशाह, बावकार बुजुर्गों का कॉल है कि अपनी तारीफ आप नहीं किया करते। आपकी तारीफ के वास्ते हजारों दूसरे आदमी मौजूद हैं। अपनी इस आदत को छोड़ दीजिए।"

खलीफा अलमामून को वजीर यहिया की यह बात नागवार गुजरी और कहने लगे, "ए वजीर, क्या मैं कोई झूठी बात अपनी निस्बत से बयान करता हूं? अगर मैं गलत कहता हूं तो तुम बतलाओ कि आज तक दुनिया में मेरे बराबर सखावत और फयाज़ कौन है?"

याहिया ने कहा, "ऐ ईशाह, मेरी खता माफ कीजिए। शहर हलब में एक नौजवान अब्बू अब्दुल्लाह हलबी है। उसकी सखावत के रूबरू हातिम की सखावत भी बेहकीकत है और फयाज शजात बहादुरी में कोई उसके के बराबर नहीं है। उसका हम मर्तबा नहीं।"

खलीफा अलमामून को यह बात सुनकर गुस्सा आया और वजीर यहिया की तरफ देखकर कहने लगे, "ऐ यहिया, तूने यह नहीं सुना कि बादशाहों की मजलिस में मबा आराई से काम नहीं लेते? किसी बात को बढ़ा चढ़ाकर बयान नहीं करते? बादशाहों को बाज औकात सरतन से जुदा कर देने का हुक्म देने में एक लम्हा की देर नहीं लगती?"

वजीर याहिया ने कहा, "आप जो कुछ फरमा रहे हैं वह बजाय है और दुरुस्त है। मगर सच्ची और इंसाफ की बात यही है। और सच्ची बात से किसी को रंजीदा नहीं होना चाहिए और किसी बेगुनाह कसूर पर किसी तरह का इल्जाम लगाकर उसे जुर्म रवा नहीं रखना चाहिए। बाकी आप जो मुनासिब समझे। आपने जो अर्ज किया वह बिल्कुल हकीकत है। और जब मैंने कहा वह भी सब कुछ सही है। अगर आप चाहें तो उसकी तहकाई खात कर लें। अगर मेरी यह बात गलत निकली जो कुछ मैंने आपके सामने बयान की है तो फिर आपका गुस्सा जायज है और फिर जो आप सजा कहेंगे मैं उसका मुस्तखूंगा।"

खलीफा अलमामून ने जब वजीर यहिया की यह बातें सुनी तो उन्हें सख्त गुस्सा आया और बा आवाज बुलंद कहने लगे, "अकल से पैदल आदमी! मेरी गलती कि तुझ जैसे को अपनी मजलिस में इतना रुतबा दिया। तुझे मालूम नहीं कि मेरी मजलिस में ऐसी बातें और लफ्ज कहना अदब के खिलाफ समझा जाता है। किसी की क्या मजाल है जो ऐसी बात करे?"

वजीर ने कहा, "ऐ शहंशाह, अगर आप मेरा इम्तिहान लेना चाहते हैं तो कोई हर्ज नहीं। मेरी बात गलत हो तो जो मैं अर्ज कर चुका हूं, जो कुछ सजदा आप मेरे वास्ते तजवीज फरमाएंगे, मैं उसे बाखुशी कबूल करूंगा।"

खलीफा ने कहर आलूद नजरों से वजीर यहिया की तरफ देखा और एक मुलाजिम को हुक्म दिया कि इसे फौरन ले जाकर कैदखाने में रखो और कसम खाई कि जो बात वजीर ने कही है मैं बजाते खुद उसका इम्तिहान लूंगा। अगर अब्बू अब्दुल्लाह हलबी ऐसा शख्स ना निकला जैसा वजीर यहिया ने बयान किया है तो इसे कत्ल करके बाजार में इसकी लाश एक दरख्त पर लटका दूंगा ताकि बाकी लोगों को इबरत हासिल हो और आइंदा बादशाहों की मजलिस में ऐसी बेहूदा बात करने की किसी की जरूरत ना हो। वह इससे बाज रहे। यह कहकर खलीफा ने मजलिस बर्खास्त कर दी और गुस्से में उठ खड़ा हुआ।

मजलिस से उठकर महल में गया। अपनी बीवी नूरजहां बेगम से मिला। उन्होंने खलीफा अलमामून को खामोश देखकर पूछा कि, "ऐ फरमाया, क्या बात है? आज आपकी तबीयत कुछ परेशान परेशान सी लगती है?"

खलीफा ने अपनी बीवी नूरजहां बेगम से वह तमाम गुफ्तगू बयान कर दी जो उनके और वजीर के दरमियान हुई थी और कहा कि, "मैं वजीर यहिया को ऐसा बेहूदा नहीं समझता था जैसा वह निकला है।"

उनकी जोझा नूरजहां बेगम ने जब यह सारा हाल सुना तो कहा कि, "खलीफा, वजीर यह एक आखिल और जहां दिला आदमी है। मेरा ख्याल है कि वह इतनी झूठी बात आपके सामने कहने की जरूरत नहीं कर सकता। अगर उसकी बात आपको बुरी लगी और आपको उसकी बात पर यकीन नहीं आया तो आप अपने अरकाने दौलत अपने मुलाजिमीन में से किसी को तहकीक करने का हुक्म दीजिए और अपना शक निकाल कर अपने दिल का गुबार मिटा दें।"

खलीफा ने अपनी बीवी नूर जहां बेगम से कहा, "मेरा इरादा है कि मैं खुद इस बात की तजवीज करने के लिए शहर हलब का रुख करूं और अब्बू अब्दुल्लाह को अपनी आंखों से देखूं और उसको आजमाइश करूं ताकि किसी तरह का शक मेरे दिल में बाकी ना रहे और फैसला करने में मुझे आसानी हो। अगर वजीर का बयान गलत साबित हुआ तो हलब से वापस आकर उस वजीर की निस्बत बिना सोचे समझे उसकी फांसी का हुक्म जारी कर दूंगा ताकि दूसरों को इबरत हो और अगर उसकी बात सच्ची निकली तो मैं अपनी बात पर कायम हूं। मैं उसके हक में बहुत कुछ करूंगा। उसे बहुत कुछ सिला दूंगा।"

खलीफा ने तमाम रात ख्यालात में बसर की। सुबह होते ही नमाज वगैरह से फारग होकर लिबास तब्दील किया। घोड़ी पर सवार हुआ और खुफिया तौर पर शहर दमिश्क से बाहर जाकर हलब की जानिब रवाना हो गया।

जब खलीफा अलमामुन हलब में पहुंचे तो सौदागरों का लिबास पहनकर एक कारवा सराय में गए और सराय के मालिक से कहा कि, "मेरे लिए अलग हजरा बना दीजिए।" सराय के मालिक ने हुक्म की तमील की और उनके लिए अलग हजरों का इंतजाम किया और सब जरूरत का सामान मुहैया किया।

खलीफा अलमामून ने हजरा में उतर कर खाना तनावल किया। और खाना खाने के बाद सराय के मालिक के एक आदमी से कहा कि, "ए बुजुर्ग, मैंने सुना है कि तुम्हारे शहर में एक शख्स रहता है जिसका नाम अबू अब्दुल्लाह है वह बहुत सखी है और उसकी सखावत की मिसाल कहां और नहीं मिलती। क्या यह बात सच है या नहीं?" उस मर्द ने कहा, "जनाब, हकीकत यह है कि अब्बू अब्दुल्लाह की सखावत व मुरव्वत की तारीफ जुबान से अदा करना मुमकिन नहीं। जैसा कि लोग उसके बारे वे कहते हैं, वह उससे 100 दर्जे ज्यादा बढ़कर है।"

खलीफा अलमामून ने जब यह बात सुनी तो अपने दिल में कहा, "कोई हजार तारीफ करे जब तक मैं खुद बजाते खुद उसका इम्तिहान ना लूं। हरगिज़ मेरे दिल को इत्मीनान ना होगा।" फिर उसी मर्द से पूछा कि, "उस नवजवान अब्बू अब्दुल्लाह का मकान कहां है?" तो उस मर्द ने अब्बू अब्दुल्लाह के मकान का पता बतलाया। मगर अर्ज करने लगा कि, "आप इस शहर में नए आए हैं। इस शहर से वाकिफ नहीं है। अगर आप कहते हैं तो मैं आपको उसके घर ले चलता हूं।"

चुनांचे खलीफा अलमामून उसी आदमी के साथ अबू अब्दुल्लाह के घर की तरफ रवाना हो गए। जब उसके मकान में पहुंचे तो देखा कि एक बड़ा आलीशान मकान बना हुआ है। बहुत सी कनीज व गुलाम दरवाजे पर खड़े हैं। खलीफा अलमामून ने एक दरबान से कहा, "तुम अब्बू अब्दुल्लाह से जाकर कहो कि एक गरीब वतन आदमी तुमसे मिलने आया है।" उस आदमी ने अंदर जाकर अब्बू अब्दुल्लाह को इत्तला दी। वह सुनते ही फौरन दौड़ता हुआ मकान से बाहर आया और खलीफा को निहायत इज्जत व एहतराम से मकान के अंदर ले गया और एक दिलान में बिछे हुए तख्त पर बिठाया।

अलमामून की तबीयत मकान को देखकर निहायत खुश हुई कि वह बहुत अच्छी किस्म का बना हुआ था और उम्दा सामान से आरास्त था। अबू अब्दुल्लाह ने अपने नौकरों को हुकुम दिया कि फौरन शरबत ला दें। जब वह लाए तो अबू अब्दुल्लाह ने अपने हाथ से शरबत तैयार करके खलीफा को पिलाया। बाद अजा खाना तैयार हुआ। ऐसे उम्दा लतीफ किस्म किस्म के खाने थे कि खलीफा अलमामून उनको तनावल करके निहायत महसूस हुए। जब खाने से फारग हुए तो अबू अब्दुल्लाह ने अलमामून का मुंह हाथ धुलवाया और फिर उनको अपने हमराह बाग में जो मकान से मिला हुआ था वहां ले गए और वहां पहुंचकर रक्स की मजलिस शुरू हुई और काफी देर तक यह जलसा होता रहा और खलीफा उसे कमाल हद तक महसूस होते रहे।

इसी असना में अब्बू अब्दुल्लाह वहां से उठकर अपने मकान में गया और एक दरख्त जिसके ऊपर एक बड़े परों वाला परिंदा बैठा था वह ले आया। परिंदा ऐसा बना था कि उसकी नाफ में जैसे पानी भरा हुआ था जिसे जरा सी हरकत दी जाती तो फौरन पवारे की तरह फूटना शुरू हो जाता और पानी बरसने लगता और उस दरख्त को अब्बू अब्दुल्लाह उस तख्त के किनारे पर लाया जहां खलीफा अलमामून बैठे थे और हरकत दी। हरकत देने से उस खुशनुमा परिंदे की नाप से पानी बरसना शुरू हो गया। खलीफा अलमामून को यह दरख्त व यह परिंदा निहायत पसंद आया और अब्बू अब्दुल्लाह से कहा कि, "अजीज, मैंने तमाम दुनिया में इस किस्म की चीजें नहीं देखी। निहायत शानदार।"

अबू अब्दुल्लाह ने यह बात सुनते ही दरख्त व उस परिंदे को तख्त के किनारे से उठवा दिया और बाहर भिजवा दिया। अलमामून को अबू अब्दुल्लाह की बात पर बड़ा ताज्जुब हुआ। खलीफा अलमामून दिल में सोचने लगे, "कुछ लोगों ने मुझसे इस शख्स की सखावत की बात की थी। लेकिन मुझे तो सब झूठ लगता है। जो शख्स मेरे एक दरख्त की तारीफ करने पर उसे उठा दे। वह किस तरह सखी वबा मुरव्वत हो सकता है। खैर, मुझे यह हाल मालूम हो गया है कि यह सखी नहीं। दमिश पहुंचते ही वजीर को उसके झूठ की सख्त सजा दूंगा।"

खलीफा इसी ख्याल में था कि अब्बू अब्दुल्लाह फिर एक दरवाजे से बरामद हुआ और एक नाजुक अंदाम जिसका नाम गुलशन था और उसका हुस्न बयान से बाहर था उसका हाथ पकड़े हुए अंदर दाखिल हुआ। गुलाम ने एक हाथ में शरबत से भरा हुआ प्याला उठा रखा था। जब खलीफा के सामने आया तो उस गुलाम ने खलीफा को झुक कर सलाम किया और शरबत उनके रूबरू पेश किया। खलीफा को उस गुलाम की सूरत इतनी पसंद आई और उसका अंदाज दिल को इतना भाया कि वो उस दरख्त वह उस परिंदे को बिल्कुल भूल गया। खुशी के साथ गुलाम के हाथ से वह शरबत लेकर बिला तकलीफ नोश किया। गुलाम ने खलीफा के हाथ से खाली प्याला लेकर एक तरफ रखा और खुद अदब से एक तरफ खड़ा हो गया और एक लम्हे की ताची के बाद फिर जाम शरबत से भरा उठाकर खलीफा के रूबरू पेश किया। खलीफा ने शरबत पीकर फिर जाम उसे पकड़ा दिया। गुलाम ने वह जाम लेकर फिर रख दिया और फिर जब उठाया तो वह शरबत से भरा हुआ था। खलीफा इस माजरे को देखकर निहायत हैरान हुआ।

अबू अब्दुल्लाह ने खलीफा की हरनी को देखकर अर्ज की कि, "ऐ शफी का मेहमान, बड़े-बड़े उस्तादों व सना आने यानी इसको बनाने वालों ने अपनी सारी अकल इस जाम को बनाने में खर्च कर दी और ऐसी नादिर तरकीब इसमें रखी कि जब चाहो जिस कदर चाहो यह जाम जिसमें शरबत पियो तो यह फौरन खाली होने के बाद खुद भर जाता है। आप इसे कभी खाली ना पाएंगे।"

खलीफा ने हैरत से उंगली दांतों में दबा ली और हैरत से कहा, "आमीन, हमने तमाम उम्र कभी ऐसा हसीन व वज इंसान भी नहीं देखा जैसा कि यह गुलाम गुलशन है और ना ही कभी ऐसे जाम जैसी कोई चीज देखी जैसा कि यह जाम है बल्कि ऐसी नादिर चीज का हाल भी कहा नहीं सुना।"

अबू अब्दुल्लाह ने जो खलीफा की जुबान से यह बात सुनी तो फौरन गुलाम का हाथ पकड़ कर उसको जाम के साथ उस मकान से बाहर ले गया। खलीफा अलमामून को अबू अब्दुल्लाह की इस हरकत से निहायत रंज हुआ और दिल में कहने लगे, "यह शख्स जरूर दीवाना है कि मेरी मर्जी वो मेरी दरख्वास्त के बगैर यह चीजें मेरे सामने लाया और फिर मेरे कहे बगैर ही मेरी जुबान से तारीफ सुनकर इन चीजों को यहां से ले गया।"

खलीफा इसी फिक्र में था कि वह जवान हलबे फिरा मौजूद हुआ और एक कनीज को अपने साथ लाया जिसका हुस्न जमाल ऐसा था कि चांद की तरह चमकता उस पर नजर ना ठहरती थी और वह निहायत उमदाव बेशकीमती लिबास पहने हुए थी। खलीफा की निगाहें जो उस पर पड़ी तो खलीफा हजार जान से उस पर फरिश्ता हो गए। वो खूबसूरत कनीज खलीफा अलमामून के तख्त के सामने लाई गई। वो खूबसूरत कनीज अलमामून खलीफा के तख्त के सामने आई और बा अदब सलाम करके बैठ गई और रबाब यानी कि साज जिसे सीने पर रखकर बजाया जाता है उसे हाथ में लेकर गाना शुरू किया। खलीफा अमाल मामून उसकी खूबसूरती व हुस्न देखकर और उसका गाना सुनने में महाव हो गए। और फिर उस जवान हलबी की तरफ देखकर कहने लगे, "ऐ जवान, मैंने कभी ऐसी हसीन व पाकीजा औरत आज तक नहीं देखी।"

उस जवान हलबी ने यह बात सुनी ही थी कि कनीज का हाथ पकड़ा और उसे मकान से बाहर ले गया। खलीफा अलमामून की आंखों में जैसे जहां तारीख हो गया। अपने दिल में कहा कि, "मैं दमिश्क पहुंचकर यहिया को ऐसी सख्ती से कत्ल करूंगा कि जानवरों को भी उसकी हालत पर रोना आ जाएगा कि उसने ऐसे खबीस आदमी को फयाज़ व सखी मानकर मेरी गुस्ताखी की। देखो ऐसी समदिल रूपा ऐसी हसीन कनीज को एक लम्हा उसने मेरे सामने बिठाया और जब मैंने तारीफ की तो उसे उठाकर ले गया।"

इसी असना में अबू अब्दुल्लाह आ पहुंचा और खलीफा को नींद के गलबे में देखकर एक तख्त निहायत आराम दे उनके वास्ते बिछवाया और उनके लिए शबे ख्वाबीदा और उन्हें पहनाए। दूसरे रोज सुबह ही इससे पहले कि खलीफा उठते अब्बू अब्दुल्लाह मौजूद हुआ और खलीफा को जिस वक्त के वह ख्वाब राहत से उठे हममाम में ले गया। आला किस्म की पोशाक जो शाहाना थी वह पहनवाई और हमाम से उनको मजलिसगाह में लाकर खाना खिलाया और खाने के बाद फिर रक्स सुरूर व नाच की महफिल शुरू हुई। मगर खलीफा के दिल में उस छोटे ताुस यानी उस परिंदे उसकी हवस व गुलाम व कनीज की सूरतें ऐसी जमी हुई थी कि खलीफा अलमामून की तबीयत किसी और जानिब माइल ना होती थी।

उस जवान अब्बू अब्दुल्लाह खलबी ने खलीफा से पूछा कि, "हजरत, आप शहर में किस जगह पर ठहरे हुए हैं? किस जगह पर मुकीम है?" खलीफा अलमामून ने जवाब दिया कि, "मैं फला सराय में ठहरा हुआ हूं।" इस पर अब्बू अब्दुल्लाह उस जवान हलबी ने कहा, "मैं चाहता हूं कि तीन रोज तक आप मेरे गरीब खाने पर रौनक अफरोज रहे मेरे मेहमान बने।"

खलीफा अलमामून ने इस बात को मंजूर किया। उस जवान अब्बू अब्दुल्ला हलबी ने तीन रोज तक ऐसे ऐसे पुर तकलीफ खानों से उनकी तवाजो की और खातिर मदारी की और निहायत इज्जो अदब व एहतराम से उनके साथ पेश आया कि खलीफा अल मामून अपने दिल में उसके हुस्नों खुलकव मेहमान नवाजी का कमाल ममनून व मशकूर हो गए।

फिर तीन दिन गुजारने के बाद खलीफा कहने लगे, "अब मुझको इजाजत दो कि मैं रुखसत हूं।" उस जवान अबू अब्दुल्लाह हलबी ने कहा, "मुझसे आपकी कुछ खिदमत नहीं हो सकी। यह सरासर आपकी इनायत तो नवाज कि आप अपनी खुशनूदी जाहिर करते हैं। मैं तो हकीकत में बहुत शर्मिंदा हूं कि जैसे खिदमत वो तवाजो आपकी होनी चाहिए थी। मुझसे ना हो सकी और चाहता हूं कि जो कुछ कसूर मुझसे आपकी खिदमत गुजारी में हो गया उसको माफ कर दें।"

खलीफा अलमामून ने उसकी बहुत तारीफ की और वहां से रुखसत हुए। वह अब्बू अब्दुल्लाह जवान हलबी मकान के दरवाजे तक नंगे पांव खलीफा अलमामून को छोड़ने के लिए आया और रुखसत होते वक्त उसकी आंखों में आंसू आ गए। फिर गुजारिश की कि, "मुझे आपकी मेहमान नवाजी व खिदमत गुजारी जैसी कि होनी चाहिए थी नहीं हो सकी। आप नजरेकरम करते हुए मुझे माफ कर दीजिएगा।"

खलीफा अलमामून जब रुखसत होकर सराय के दरवाजे पर पहुंचे तो देखा कि बहुत सी कनीज गुलाम वो संदूक व खमा बस बहुत सी चीजें वहां मौजूद हैं। फिर अपने हजरे में गए तो देखा कि वह दरख्त वो ताऊस परिंदा वहां रखा हुआ है और गुलाम उस जाम के हमराह और वह गाने वाली कनीज वहां पर बैठे हुए हैं। कनीज गुलाम ने जो खलीफा अलमामून को आते देखा तो खड़े होकर बड़े अदब से सलाम किया। कनीज के हाथ में एक रुक्का था। वह उसने खलीफा अलमामून को दिया।

खलीफा अलमामून ने उसे खत लेकर पढ़ा तो उसमें लिखा था, "ए जवान, मुझे ना आपका नाम मालूम है ना आपका वतन। अगर आपकी खिदमत गुजारी में मुझसे कुछ कसूर रहा हो तो उसको माफ कर दीजिएगा। और यह मुझे मालूम है कि जिस वक्त मैंने यह दरख्त जरी वो गुलाम वो जाम कनीज आपके सामने से हटा लिए थे तो आपको यह ख्याल हुआ कि मैंने बुखल से यह हरकत की है मगर मेरी नियत हरगिज़ ऐसी ना थी और मेरा असूल यही है कि मेरे मेहमान को जो चीज पसंद आती है उसको अपने पास रखना हराम समझता हूं और मेहमान की नजर कर देता हूं। अब वह तमाम चीजें व चंद तफों के साथ आपकी खिदमत में पेश करता हूं। नजरें इनायत करते हुए उन्हें कबूल फरमाइए।"

रुक्के के नीचे उन चीजों की तफसील लिखी हुई थी। खलीफा अलमामून ने यह देखकर निहायत ताज्जुब किया कि हजारों रुपए का माल उसमें लिखा हुआ था। और कहा था कि, "खुदा यहिया को जजा खैर दे।" फिर खलीफा अलमामून कहने लगे, "खुदा यही वजीर को जजा खैर दे कि उसकी बदौलत मेरी ऐसे शख्स से मुलाकात हुई कि जिसके जैसा दुनिया में कोई दूसरा ना होगा। अफसोस कि मेरे हाथ से उस गरीब वजीर पर बड़ा जुल्म हुआ है।"

बस जल्दी-जल्दी तमाम सामान दुरुस्त किया और दमिश्कन की जानिब रवाना हुए। वहां पहुंचकर फौरन एक आदमी भेजा कि यहिया वज़र को कुवैत खाने से निकाल लाए। वजीर जब हाजिर हुआ तो खलीफा ने कमाल शफकत व मेहरबानी के साथ उससे बगलगिर हुए और बड़े इजाज से उसको अपने बराबर मसनद पर बिठाया और कहा, "मैंने तुम्हारे हक में बड़ी सख्ती दिखाई तुम पर बड़ा जुल्म किया ना इंसाफ की। मैं चाहता हूं कि मुझे माफ कर दो।" और फिर अपनी अबू अब्दुल्लाह के साथ मुलाकात का तमाम हाल बयान किया और तोहफे जो उसने दिए थे वह वजीर यहिया को दिखाए और कहा, "यहिया, हकीकत में अब्बू अब्दुल्लाह दमिश की जैसा कोई आदमी दूसरा दुनिया में ना होगा। मुझसे उसकी तारीफ नहीं हो सकती।"

फिर वजीर को दरख्त तावुज दिखाया और कहा, "तुम बतलाओ कि अब्बू अब्दुल्लाह के साथ ऐसी सखावत व मुरवत के बदले में क्या सलूक करना चाहिए। मैं इस बात को तुम्हारी राय पर छोड़ता हूं कि तुम खजाने में जाकर जो चीज उम्दा बेशकीमत हो उसके वास्ते ले लो और उसके नाम फरमाने हुकूमत हलब लिखकर फौरन वहां को रवाना हो जाओ और अब्बू अब्दुल्लाह को मेरी तरफ से दुआ देना और कहना कि मैं उसको बहुत अजीज समझता हूं।"

वज़र ने उसी वक्त एक खत हाकिम ए हलब के नाम लिखा कि, "तुम खुद पहुंचकर इस खत को शहर हलब के अबू अब्दुल्लाह के सुपुर्द करो और उसको अपना हाकिम समझो। मैं भी थोड़े अरसे में तहफे जो खलीफा ने अबू अब्दुल्लाह के वास्ते भेजे हैं। लेकर आता हूं। इस हुक्म की तामील में। हरगिज़ देर ना करना।" यह खत लेकर कासिद रवाना किया।

जब कासिद हलब पहुंचकर वह खत दिया तो वली हलब का रंग हो गया और हुकूमत के हाथ से जाने का उसे बहुत रंज हुआ। हलब के हाकिम का एक वजीर था अबू लहाब नाम का। निहायत ही खबीस और बदनियत आदमी था। हर वक्त आदमियों को तकलीफ पहुंचाने की फिक्र में लगा रहता। और कुदरती बात यह थी कि उसको अब्बू अब्दुल्लाह के साथ खुद भी अदावत थी, दुश्मनी थी। वह बार-बार हलब के वली से अबू अब्दुल्लाह की शिकायतें करता रहता था। उस शख्स ने यह बहाना बनाया कि उसने लोगों को अपना मती कर रखा है और तमाम तफ में उसकी नेक नामी की रोज-बरोज शोहरत बढ़ती ही जाती है। ऐसा ना हो कि उसकी वजह से आपके इख्तेदार को अज़यत पहुंचे। बेहतर यह है कि वह खतरा बन जाने से पहले उसे कत्ल करवा दिया जाए। मगर वली हलब हमेशा यह जवाब देता कि, "ऐसा करने में बड़ा अंदेशा है क्योंकि तमाम शहर उसे अच्छा समझता है उसका मती है और उसके लिए जान देने तक को तैयार रहता है और इस हालत में हमको बड़ी दिक्कत उठानी पड़ेगी।"

जब यहिया के खत का उसे हाल वजीर को मालूम हुआ तो दिल में बहुत खुश हुआ कि खूब मौका का हाथ आया। अब मैं वली हलब से अबू अब्दुल्लाह के बारे में जो कुछ कहूंगा वह जरूर मान लेगा। चुनांचे उसकी खिदमत में हाजिर होकर वजीर ने यहिया के खत का सारा हाल बयान किया और कहा, "देखिए, मैं आपके हुजूर कई बार पहले भी गुजारिश कर चुका था कि अबू अब्दुल्लाह का जिंदा रहना हरगिज़ हरगज़ ठीक नहीं। किसी रोज आपको उसमें नुकसान पहुंचेगा। अब आप फरमाएं कि मेरी बात सही थी या नहीं। खैर, अब आपका हुक्म हो जाए तो मैं अबू अब्दुल्लाह का काम किसी तदबीर से कर दूं और उसे कत्ल कर डालूं और उसका तमाम माल लो जर इकट्ठा करके आपकी खिदमत में पेश करूं। इस तदबीरस मुल्क हुकूमत भी बदस्तूर आपके पास रहेगी और दौलत भी हाथ लग।"

जाएगी। वली हलब इस बात को सुनकर बहुत खुश हुआ। वजीर से कहने लगा, मैं इस सब बातों की तुझे खुशी से [संगीत] इजाजत देता हूं। मगर मेरा दिल यह बात कबूल नहीं करता कि अब्बू अब्दुल्लाह जैसा नेकबख्त आदमी जान से मारा जाए। उसके सिवा और कुछ। तुम जो चाहो कर लो। उसे जान से ना मारो।

वजीर ने कहा, मैं तो उस अब्बू अब्दुल्लाह से ऐसा नाराज हूं कि उसको हरगिज़ हरगिज़ जिंदा नहीं देखना चाहता। मगर बहरहाल आपकी बात मानना मजबूरी है। मैं आपका फरमाबरदार हूं। जिस तरह आपका इरशाद होगा, बचा लाऊंगा। लेकिन यह आपसे दरख्वास्त करता हूं कि उसकी जान लेने के सिवा जिस कदर तकलीफ उसको देना चाहूंगा, मैं जरूर दूंगा। उसमें कुछ मजाक नहीं करूंगा।

हलब के वली ने वजीर की इस बात को मंजूर किया। बस वजीर इजाजत लेकर हलब से रुखसत हुआ और चंद आदमी अपने हमराह लेकर अब्बू अब्दुल्लाह के [संगीत] मकान पर पहुंचा। अब्बू अब्दुल्लाह को जो वजीर के आने की खबर मिली तो फौरन उसके इस्तकबाल को दौड़ा चला और बड़ी इज्जत ए अजम वो इकराम के साथ उसको अपने मकान में ले गया और निहायत तकलीफ से उसकी दावत की और उसके बाद रक्सो सरूर व शरबतों के पीने का एहतमाम हुआ। फिर रात गए तक यह जलसा होता रहा। अबू अब्दुल्लाह वजीर को अपने हाथ से शराब पिलाते।

जब अब्बू अब्दुल्लाह को खूब नशा हो गया तो वजीर ने एक जाम शराब का भरकर और उसमें एक दवा जो वह खुफिया तौर पर साथ लाया था। उसमें मिलाकर अबू अब्दुल्लाह को दे दी। अबू अब्दुल्लाह ने वो फौरन प्याला पी लिया। मगर वह पीते ही चकरा कर गिर पड़ा और बेहोश हो गया। उस दवा की खासियत [संगीत] यह थी कि जो कोई उसको पीता वह फौरन उसकी नब्ज़ बंद हो जाती और दम उसका रुक जाता। मगर खुदा की कुदरत के अब्बू अब्दुल्लाह को जिंदा रहना था।

अब्बू अब्दुल्लाह जब गिरा और बेहोश हो गया और उसका दम रुकता नजर आने लगा तो वजीर तख्त से उतर कर गतिरिया जारी करने लगा। रोने लगा और अब्बू अब्दुल्लाह के नौकरों ने भी यह हाल देखकर रोना पीटना शुरू किया। वजीर बहरहाल रोता रहा। मगर अपने दिल में अपने इस फरेब की कामयाबी पर बहुत खुश था और नाजा था। उसी रात वजीर ने तमाम जोर नकद जवाहरात वगैरह अब्बू अब्दुल्लाह का सारा माल दौलत शाही खजाने में भिजवा दिया और सुबह होते ही एक बड़ा पुर तकलीफ जनाजा अब्बू अब्दुल्लाह का तैयार करवाया और उसकी लाश को उस पर रखा शहर में।

जिस वक्त अब्बू अब्दुल्लाह के वफात का हाल मालूम हुआ तो तमाम अमीर गरीब बहुत हैरान हुए। सबको बहुत अफसोस और रंज हुआ। हजारों आदमी अब्बू अब्दुल्लाह के मकान पर ताजिया करने के लिए आ गए। और जिस वक्त जनाजा उसका [संगीत] उठाया गया। हर शख्स बहुत रंज दर्दो अलम से आारी करता था। गर्ज़ के अब्बू अब्दुल्लाह के जनाज़े को वजीर अपनी हमराही में कब्रिस्तान में ले गया। कब्रिस्तान के बीच में गुंबद बना हुआ था।

वजीर ने कहा कि मैं अबू अब्दुल्लाह को हरगिज़ जमीन के अंदर [संगीत] दफन नहीं करूंगा। मुझको इसके साथ बहुत मोहब्बत और उल्फत थी और वह ऐसा नेक खुश था कि हरगिज़ जमीन में उसको गाड़ना [संगीत] नहीं चाहिए। बस गुंबद में चार जंजीरें गाड़वा कर अब्बू अब्दुल्लाह के ताबूत को उसमें आवेजा कर दिया जाए। फिर ऐसा ही किया गया और बड़ी दर्दमंदी के [संगीत] साथ वह रात गए तक गुंबद में बैठा रोता रहा।

जब रात बहुत आ गई और तमाम लोग वहां से रुखसत हो गए तो वजीर ने कब्रिस्तान का दरवाजा बंद करके ताबूत को जंजीर से निकाला और अब्बू अब्दुल्लाह [संगीत] के बदन पर गर्म पानी जो तैयार करवा कर रखा हुआ था उस पर डाला पानी की गर्मी का असर हुआ और अब्बू अब्दुल्लाह को होश आ गया और भुनचक्कर होकर इधर-उधर देखने लगा। वजीर ने उसको एक दरख्त जो गुंबद के [संगीत] करीबी था उसके साथ बांध दिया और खुद कूड़ा हाथ में लेकर उसको मारने के वास्ते उसके करीब पहुंचा।

अबू अब्दुल्लाह ने हाल देखकर कहा, मुझे बता कि मुझसे [संगीत] ऐसा क्या कसूर सर्जद हो गया कि जिसके एवज मुझको ऐसी सख्त सजा देने पर तू आमादा हो गया है। वजीर ने कहा, बदजात तुझको ऐसी सख्ती से हलाक करूंगा कि फरिश्तों को भी तेरी हालत पर रोना आएगा। यह कहकर कमाल संगद अली से उसने अब्बू अब्दुल्लाह को कोड़े लगाने शुरू किए। यहां तक कि अब्बू अब्दुल्लाह का तमाम बदन जख्मी हो गया और बिल्कुल बेहोश हो गया। तब वजीर ने फिर उसको ताबूत में रखकर बदस्तूर ताबूत को जंजीरों में आवेजा कर दिया।

जब सुबह हुई तो वजीर वली हलब की खिदमत में हाजिर हुआ। और वली हलब को सारा हाल कजिया सुनाया। वली हलब ने कहा, देखो इस बात की निहायत होशियारी करनी चाहिए [संगीत] कि किसी आदमी को यह राज पता ना चले क्योंकि अगर खुदा ना फंसता किसी आदमी को जरा सी भी इस बात की खबर लग गई तो फिर हमारी खैर नहीं।

वली हलब वजीर इसी गुफ्तगू में थे कि उन्हें यहिया वजीर के हलब में वारिद होने की खबर [संगीत] आ पहुंची वह दोनों उसी वक्त अपने अराखी सल्तनत व शहर के उमरा के साथ उनके इस्तकबाल के वास्ते रवाना हुए जब यहिया यहिया के पास पहुंचे तो यहिया ने देखा कि वली हलबव उसके तमाम हमराह मातमी लिबास पहने हुए हैं। हैरान होकर पूछा कि इसका क्या वजह है?

वली हलब उसके वजीर ने आह भर कर कहा, हम सब पर बड़ा सदमा हुआ है। हाल यह है कि जिस वक्त अब्बू अब्दुल्लाह के बारे में आपका हुक्म हमारे पास पहुंचा। हम सब उसकी खिदमत में फौरन हाजिर हुए और उसको उसकी हुकूमत की तकरीर की खबर सुनाई। अब्बू अब्दुल्लाह यह सुनकर बहुत खुश हुआ। मगर अपनी आदत के मुताबिक वह अपनी ऐशोइत में मशगुल हो गया और खुशी के बायस इतनी ज्यादा उसने [संगीत] शराबनशी की कि बेहोश होकर गिर पड़ा और फिर उसकी जान निकल गई। तमाम हलब शहर इस हादसे से बहुत गमगीन और मलूल है। और हमारा तो वह बहुत ही प्यारा व अजीज दोस्त था। उसकी मौत से जो सदमा हमारे दिलों पर गुजरा है, वह बयान नहीं हो सकता।

यहिया ने यह सुनकर एक सर्द आह भरी और रोता हुआ वली हलबा तमाम आदमियों के हमराह उस कब्रिस्तान की जानिब रवाना हुआ। अबू लहब वजीर यहिया को गुंबद में ले गया और ताबूत अबू अब्दुल्लाह का उसको दिखाया। यहिया को ताबूत देखकर बड़ी रक्त आई। थोड़ी देर वहां ठहर कर फिर वापस अपने खेमे पर आया और वली हलब से कहा, मुझे अब्बू अब्दुल्लाह की [संगीत] शक्ल देखने की बहुत तमन्ना थी। अफसोस कि यह ख्वाहिश पूरी ना हो सकी। यह बात मयस्सर ना आई। अब मेरा ठहरना यहां फजूल है। मैं दमिश को वापस [संगीत] जाता हूं। तुम बदस्तूरकार ए रियासत सल्तनत अंजाम दो। मैं दमिश्क पहुंचकर जो कुछ खलीफा का हुक्म [संगीत] सादिर होगा उसे तुम्हें इत्तला कर दूंगा।

वली हलब ने बहुत कुछ तारुफ वजीर की नजर किए और उसको बाइज्जत व इकराम रुखसत किया। यहिया ने दमिश्क पहुंचकर खलीफा से अब्बू अब्दुल्लाह की वफात का हाल बयान किया खलीफा को। जब अब्बू अब्दुल्लाह [संगीत] की मौत का पता चला तो उसको इस कदर रंज हुआ कि इस बात के सुनते ही तीन रोज तक उसने कुछ ना खाया ना आराम किया। बराबर आजारी करता रहा। चौथे रोज वजीर को बुलाया और उससे कहा कि अब्बू अब्दुल्लाह के मरने के वाक्यात ऐसे हैं कि जिससे मेरे दिल में शक पैदा होता है। इसकी अच्छी तरह तहकीक करनी चाहिए।

वजीर ने कहा कि बेहतर है मैं आपके हुक्म के मुताबिक इसकी तहकीक करूंगा। वली हलब को जो खबर अलमामून की मातमदारी व इस बात की पहुंची कि अब्बू अब्दुल्लाह की वफात के हालात की तहकीक [संगीत] करनी चाहिए वह अपने दिल में बहुत डरा और उसी मकर वज़र [संगीत] अब्बू लहाब को बुलाकर कहा कि इसका क्या इंतजाम करना चाहिए अगर खलीफा को असलियत [संगीत] इस मसले की मालूम हो गई तो कोई शक नहीं कि हमें हमें बेदर्दी से [संगीत] कत्ल करवा देगा।

वजीर अबू लहाब जिसने अब्बू अब्दुल्लाह पर जुल्म किया था। उसने कहा कि इसका तो बहुत आसान इलाज है। अगर आप इजाजत दें तो कल सुबह मैं कब्रिस्तान में जाकर अब्बू अब्दुल्लाह का कस्सा ही [संगीत] तमाम कर दूंगा। वली हलब ने कहा, मेरी अकल अब इस मसले में कुछ काम नहीं कर रही। तुम्हें [संगीत] इख्तियार है जो मुनासिब हो।

अमल बिला वजीर वली हलब से इजाजत लेकर शाद मानिफ खुशीखुशी अपने घर आया और शाम को अब्बू अब्दुल्लाह के कत्ल करने का पक्का इरादा कर लिया। खुदा की कुदरत के उस रात को एक चोरों का गिरोह रजनी के वास्ते गया हुआ था। लूटमार करने और उनके हाथ एक सगर के काफिले से बहुत सा मालो असबाब हाथ आया था चोरों का। यह गिरोह रात को रास्ता भूलकर शहर हलब के दरवाजे पर उस जगह पहुंच गया जहां वह कब्रिस्तान था।

चोरों के सरदार ने अपने साथियों से कहा, अब रात हमारे मकाम का जो सामने नजर आता है। थोड़ी देर मकाम करेंगे। यानी अब हमारी कयाम का यही है। यहां हम आराम करेंगे अपना अपना हिस्सा माले मुसरका का बांटकर अपने मंजिल मकसूद को रवाना होंगे। यह सब माल आपस में दम कर लेंगे। यह कहकर सब चोर उस कब्रिस्तान में दाखिल हो गए।

जब कब्रिस्तान में पहुंचे तो उनको कब्रिस्तान के दरमियान एक गुंबद नजर आया। उसको देखकर सब ने कहा, आओ इस गुंबद में चले। वहां बैठकर दिलजमी से तमाम माल आपस में तकसीम करेंगे। चुनांचे गुंबद में दाखिल हुए और वहां क्षमा की रोशनी देखी। चोरों के सरदार की निगाह उस ताबूत पर पड़ गई जिसमें अब्बू अब्दुल्लाह मौजूद था। यह देखकर बड़ा हैरान हुआ और कहने लगा, यह क्या माजरा है? उसने [संगीत] अपने साथियों से कहा, लगता है यहां यही रस्म है कि मुर्दे को ताबूत में रखकर जंजीरों से आवेजा कर दिया जाता है।

एक शख्स जो हलब का रहने वाला था बोला, नहीं सरदार ऐसा कानून यहां नहीं या यहां ऐसा कोई दस्तूर नहीं। इस बात की दो वजह [संगीत] हो सकती हैं। या तो यह मरने वाला शख्स अपने अकाबा अपने रिश्तेदारों को इतना प्यारा था कि उन्होंने इसे जमीन में [संगीत] दफन करना गवारा ना किया और या कोई ऐसा जालिम था कि जमीन की खाक ने इसे कबूल नहीं किया।

चोरों के सरदार ने कहा, मेरा दिल चाहता है कि इस ताबूत को उतार [संगीत] कर देखूं कि इसमें किस शख्स की लाश है। चुनांचे सरदार के हुक्म पर उसके दोस्तों ने जंजीर से [संगीत] ताबूत को खोला और जमीन पर रखकर अब्बू अब्दुल्लाह के मुंह से कपड़ा हटाया। देखा कि एक नवजवान बहुत हसीन आदमी है। मगर उसका तमाम बदन बहुत जख्मी हो रहा है।

चोरों के सरदार को उसकी हालत [संगीत] झार पर बहुत अफसोस हुआ। अपने दोस्तों से कहने लगा, देखो किसी संगदिल [संगीत] आदमी ने इस नाजुक अंदरून पर इतनी बेदर्दी से जुल्म किया है। इसे मारा पीटा है। इसे फिर ताबूत से निकालकर जमीन पर ले आओ। चोरों ने सरदार के हुक्म से फौरन तामील की।

जब अब्बू अब्दुल्लाह को जमीन पर लिटाया। जमीन की रगड़ उसके जख्मों को पहुंची और फिर अब्बू अब्दुल्लाह जख्मों के दर्द से कराने लगा और रोकर बा आवाज बुलंद गमना अंदाज में बोला कि ऐ कमबख्त संगदिल मेरी जवानी व बेगुनाही पर रहम कर मैंने तेरा क्या कसूर किया है जो तू मुझको इस कदर अयत देता है और खैर अगर तुझे मेरा जिंदा रहना अच्छा नहीं लगता तो मुझसे खुश नहीं है तो एक ही बार से मेरा काम तमाम कर दे मुझे मार डाल मुझे इस सख्ती व जिल्लत को सहने की बर्दाश्त नहीं रही।

चोरों के सरदार ने यह बात अब्बू अब्दुल्लाह की जुबान से सुनकर कहा, ऐ प्यारे नौजवान [संगीत] फिक्र ना कर मैं तेरी सख्ती पहुंचाने वाला नहीं हूं बल्कि तुझको इस बुरी हालत से आजाद करने आया हूं। अब तू आंखें खोल और मुझे अपना हाल बयान कर कि क्या माजरा है और तुझको किस कमबख्त संगदिल ने इस हाल में पहुंचा डाला।

अब्बू अब्दुल्लाह ने इस मोहब्बत अमेज [संगीत] गुफ्तगू को सुनकर आंख खोली और देखा कि एक आदमियों का गिरोह उसके ताबूत के इर्द-गिर्द बैठा हुआ है। यह हाल देखकर वह उठ बैठा और सबको सलाम किया। चोरों के सरदार ने कहा, "नौजवान, तू अपना हाल बयान कर कि तू कौन है और इस मुकाम पर जीते जी? तुझको ताबूत में किसने रहा है। बेखौफ खतरे अपना हाल बयान कर दे। अगर तेरी मर्जी यह है कि तू हमारे बारे में जानना चाहता है तो पहले हमारा हाल सुन ले। हम एक चोरों का गिरोह हैं और आज रात रजनीव लूटमार करके अपने मकाम को वापस जा रहे थे। अंधेरे के सबब हम रास्ता भूल गए और इस गुंबद में चोरों [संगीत] का माल तकसीम करने आ गए और तुम्हारे ताबूत पर नजर पड़ी। हमारी तो बस यही पहचान है। हमारा यही हाल है जो हमने बयान किया। अब तो तू अपना हाल बयान कर और सच सच कहना।

अब्बू अब्दुल्लाह ने असली हाल जाहिर करना मुनासिब ना जाना कहा कि मैं एक सौदागर का गुलाम हूं। मेरे आखा ने ना करदा गुनाह हलीत व गुस्से में मुझे मारा और इस हाल में मुझे यहां छोड़ दिया। अब्बू अब्दुल्लाह ने यह सोचकर अपने आप को गुलाम जाहिर किया था कि यह चोर लोग हैं। उसे गुलाम समझकर उसे आगे फरोख्त करने के लालच में उसे अपने साथ ले चलेंगे। चुनांचे उसका यह ख्याल ठीक निकला।

चोरों के सरदार ने जब मालूम किया कि यह शख्स गुलाम है। तो उसको फौरन लालच आ गया कि यह तो बड़ा खूबसूरत गुलाम है। इसकी कीमत बहुत मिलेगी। बस एक चोर को हुक्म दिया कि अब्बू अब्दुल्लाह को अपनी पीठ पर बिठाकर ले चलो और फिर अपना तमाम असबाब लेकर सब अपने कयामगाह की तरफ रवाना हो गए। उन चोरों के रहने का मुकाम एक पहाड़ पर बना था जो हल्प से चंद मील के फासले [संगीत] पर वाकया है।

वहां पहुंचकर चोरों के सरदार ने अबू अब्दुल्लाह को एक बड़े गार में उतारा जहां 50 आदमियों के रहने की गुंजाइश थी और तमाम जरूरी असबाब व सामान ऐश का उसके वास्ते मुहैया कर दिया और क्योंकि सब चोर रात भर के जागे हुए थे। लिहाजा वह सो गए। जब चोरों ने गौरता यानी उस कब्रिस्तान से निकलकर अपने कयामगाह की राह ली थी तो उसी वक्त वही वजीर अबू लहब जिसने अबू अब्दुल्लाह पर जुल्म किया था उसको कत्ल करने के इरादे से एक खंजर लेकर गौरन की जानिब रवाना हुआ जब वो गौर स्थान के दरवाजे पर पहुंचा तो देखा कि दरवाजा खुला हुआ है।

इस बात से उसके दिल में शुभ पैदा हुआ। दौड़कर गुप्त के अंदर गया तो क्या देखा कि ताबूत खाली जमीन पर रखा हुआ है। मगर अब्बू अब्दुल्लाह का कोई पता नहीं है। यह हाल देखकर वह सख्त घबराया और दीवाना वार भागा हुआ वली हलब के पास पहुंचा और अब्बू अब्दुल्लाह के गुम हो जाने का सारा हाल उसके रूबरू बयान किया। वली हलब ने जब यह हाल सुना तो उसके होश जाते रहे और निहायत डर से वो वज़र से कहने लगा कि यह तो बड़ा गजब हुआ। अब इसकी क्या तदबीर की जाए?

वजीर ने कहा, देर नहीं करनी चाहिए फौरन अब्बू अब्दुल्लाह की तलाश करनी मुनासिब है ऐसा ना हो कि वह किसी तरह खलीफा अलमामून के पास जा पहुंचे और फिर मेरी व आपकी पूरी शामत आ जाए। बस वली हलब व अबू लाहब वज़र अपने बहुत बड़े लश्कर के साथ घोरस्तान के दरवाजे से पांवों की खोज पर रवाना हुए और उस सुराख का अंजाम उसी दामन में हुआ। पहाड़ के उस दामन में जहां चोरों की कयामगाह थी। वह उनके पांव के निशानों पर चलते-चलते उस पहाड़ के दामन में पहुंच गए।

तमाम चोर वहां ठहरे हुए थे और सब चोर उस वक्त ख्वाब गफलत में पड़े सो रहे थे। उन्होंने पहुंचकर सबको अब्बू अब्दुल्लाह के साथ ही गिरफ्तार कर लिया और वहां से वापस आए वली। हलब वजीर अपनी कामयाबी पर बहुत खुश थे। जब शहर के करीब पहुंचे तो वजीर अबू लहब ने वली हलब से कहा कि शहर के अंदर अबू अब्दुल्लाह को ले जाना मुनासिब नहीं। सारा शहर इसका दोस्त है और खैर ख्वाह है। ऐसा ना हो कोई फसाद बरपा हो जाए। मेरा गांव यहां से करीब है। बेहतर है कि इसको वहां रखा जाए और आप चोरों को लेकर शहर में तशरीफ लें जाएं और यह मशहूर कीजिए कि हम इन चोरों को गिरफ्तार करने के वास्ते गए थे। मैं अब्बू अब्दुल्लाह को गांव में ले जाकर कत्ल कर दूंगा।

चुनांचे वली हलब वजीर से जुदा होकर शहर में आया और हुक्म दिया कि चोरों को फांसी दे दी जाए। उधर वजीर अपने गांव में [संगीत] आकर मकान में जो उसने अपनी ऐश के वास्ते तैयार किया था उसमें पहुंचा और अबू अब्दुल्लाह को जो कि निहायत परेशान व खस्ता हाल में था। उसे एक खुश्क कुएं में डाल दिया। वह कुआं खुश था। उसमें पानी नहीं था और अपने दिल में इरादा किया कि रात को इसे कत्ल कर दूंगा।

अब्बू लहाब का एक बेटा था। वह अपने बाप से भी हजार गुना ज्यादा बदखू वो जालिम था। वजीर ने निगरानी के लिए उसे कुएं पर छोड़ दिया। उस वजीर के नाबाकार बेटे ने बहुत से पत्थर अपने पास जमा कर रखे वह कुएं के अंदर पत्थर फेंकने लगा कि हो सकता है कि अब्बू अब्दुल्लाह के जिस्म पर जाकर लगे और अब्बू अब्दुल्लाह उनके लगने से [संगीत] जारोज़ार रोए। वजीर का बेटा इस बात से बहुत खुश होता गया। उसके नजदीक यह एक तमाशा था अंजाम का।

अबू अब्दुल्लाह ने पत्थरों के सदमे से अपना जिस्म बचा [संगीत] लिया और दीवाना वार कुएं के चारों तरफ दौड़ना शुरू किया। इत्तेफाकन कुएं में फिरते फिरते उसको एक बड़ा सुराख नजर आया जिसको मिट्टी से बंद किया गया था। जब थोड़ी रात बीत गई तो वह वजीर का बेटा शराब के नशे में उसी कुएं के किनारे पड़कर सो गया और खुद वजीर अब्बू लहाब को भी थकान के वह सफर के बास नींद आ गई।

अब्बू अब्दुल्लाह ने अपने दिल में ख्याल किया कि जब वजीर का बेटा जागेगा तो फिर पत्थर मारने शुरू कर देगा। इस सुराख की मिट्टी हटानी चाहिए। शायद इसमें से गुजरने की गुंजाइश मेरे [संगीत] लायक निकल आए तो इसमें छुप रहूंगा। यह सोच मिट्टी को हाथों से उसने खोदना शुरू किया। एक बार बड़े जोर से पानी की आमद हुई। उस रास्ते से पानी आना शुरू हो गया और थोड़ी ही देर में उसमें इस कदर पानी आ गया कि वह कुआं पानी से भर गया और अब्बू अब्दुल्लाह कुएं के ऊपर आ गया।

छलांग लगाकर अपने तवा कुएं से बाहर निकला और देखा कि वजीर का बेटा ख्वाब गफलत में पड़ा हुआ सो रहा है। अब्बू अब्दुल्लाह ने उसको पकड़ कर कहा, हरामजादे मैंने तेरे साथ क्या किया जो तूने इस कदर अज़ियत मुंह पहुंचाई। यह कहकर अब्बू अब्दुल्लाह ने इस जोर से उसका गला घोटा कि उसका दम निकल गया। फिर उसने उसकी लाश को कुएं में डाल दिया और फिर अब्बू अब्दुल्लाह जल्दी से उस मकान से बाहर निकला और सहरा की जानिब रवाना हो गया। खौफ के मारे के रास्ते में कहीं जरा दम ना लिया।

आखिरकार जब चलते-चलते थक गया तो एक बड़े दरख्त के साए में पड़ गया। जिसके बराबर पानी का एक चश्मा बह रहा था। वहां पर सो गया। थोड़ी देर के बाद आदमियों की बोलचाल की आवाज उसके कान में पड़ी तो वह चौंक कर उठा। देखा करीब ही 100 सवा 100 आदमियों का एक गिरोह था जिनमें बाज सवार थे वह बाज पैदल थे। उसके पास खड़े हुए थे। उस पर गुमान हुआ कि यह सौदागरों का काफिला था और उनमें जो सरदार था काफिले का उसकी निगाह जमाल [संगीत] अब्बू अब्दुल्लाह पर पड़ी।

वह अब्बू अब्दुल्लाह को देखकर बड़ा हैरान हुआ और पूछा कि ऐ जाने पदर तुम बरना क्यों हो और कहां से इस मुकाम पर आए हो? अब्बू अब्दुल्लाह कहने लगा, मैं एक गुलाम हूं। मेरे आका को चोरों ने मार डाला और मुझे इस हालत में यहां पर छोड़ गए। उस आदमी को। अब्बू अब्दुल्लाह की गुफ्तगू इतनी प्यारी व अच्छी लगी और उसकी सूरत इतनी भाई कि उसने इरादा किया कि मैं इसको हमेशा अपने पास रखूंगा। बस उसने अपने नौकरों को हुक्म दिया कि इसके वास्ते उम्दा लिबास पोशाक मुहैया करो और फिर अब्बू अब्दुल्लाह को एक घोड़े पर सवार करा कर काफिला रवाना हुआ।

शाम के करीब काफिला एक ऐसी जगह पर पहुंचा जहां हर तरफ पानी के चश्मे [संगीत] रवा थे और जंगल में हर तरफ सरसबज शादाब नजर आती थी। थोड़े फासले पर एक बाग पर नजर पड़ी जिसकी खूबी वो आराइश को काफिला बाग की जानिब चला और बाग की दीवार के पास उन्होंने कयाम [संगीत] किया। हर शख्स अपने काम में मशगूल हो गया। यह बाग अमीर हलब ने अपनी बेटी के वास्ते जिसका नाम गुलबानो था उसके लिए बनवाया था। जिसका हुस्नो जमाल की शोहरत बहुत ज्यादा थी और वह लड़की परी पैकर उसी बाग में रहती थी।

शाम के वक्त हवा खोरे के वास्ते जब बाहर निकली तो सौदागरों के काफिले पर उसकी नजर पड़ी और अपने मुलाजिमों से वह पूछने लगी कि यह [संगीत] कौन लोग हैं और कहां से आए हैं मुलाजिमों ने अर्ज की कि यह सौदागरों का काफिला है। उस लड़की ने कहा, जाओ और जो चीजें इनके पास हैं हमारे खरीदने के लायक हो इनसे ले आओ। चुनांचे एक गुलाम सरदारों का उस कारवा के पास आया और लड़की के हुक्म से उसको मुत्तला किया। उस काफिले के सरदार ने उम्दाउ उम्दा किस्म की चीजें व दीगर अशान अफरीसा एक बस्ताह में बांधकर अब्बू अब्दुल्लाह [संगीत] को कहा कि तुम जाओ और अब्बू अब्दुल्लाह वह चीजें लेकर गुलाम के साथ उस लड़की की खिदमत में हाजिर हुआ ताकि वह लड़की वह चीजें देखकर खरीद सके। बाग में पहुंचा तो देखा कि बाग की रविश

पर जिसके दोनों तरफ तरह-तरह के फूलों के दरख्त थे और एक तख्ते जवाहिर सजा सजाया हुआ और उस पर एक नाजनीन जौहर जभी जिसके हुस्न की चमक से उस पर निगाहें ना ठहरती थी बैठी हुई थी।

अबू अब्दुल्लाह उसके हुस्न को देखकर बड़ा हैरान हुआ। और फिर उधर जो उस परी पैकर की निगाह अब्बू अब्दुल्लाह पर पड़ी तो वह हजार जान से उस पर आशिक व फरिश्ता हो गई। पूछा कि ऐ जवान तू कौन है और इस काफिले के साथ क्यों कर है?

अब्बू अब्दुल्लाह ने अर्ज की कि मैं एक सौदागर का गुलाम था और उसके काफिले के साथ आया था। रास्ते में चोरों ने घेर लिया। मेरे आका वो उसके हमराहियों को कत्ल कर डाला और तमाम मालो असबाब लूट कर ले गए। मैं बड़ी मुश्किल से अपनी जान बचाकर एक मकाम पर दरख्त के साए में ठहर गया। यह सौदागरों का काफिला उस जानिब से गुजरा और काफिले के सरदार ने मुझ पर रहम खाकर अपने साथ रख लिया। तकदीर ने मेरी ऐसी मदद की कि आपके हुजूर आ पहुंचा।

अमीर हलब की लड़की ने यह हाल सुनकर गुलाम को हुक्म दिया कि तू इस काफिले के सरदार के पास जा और जो माल मैंने खरीदा है उसकी कीमत पूछ कर अदा कर दे और बाकी माल वापस दिया और इस नवजवान को यहां छोड़ जा। गुलाम ने माल की कीमत दरियाफ्त की जो उस लड़की ने खरीद लिया था और बाकी माल सरदार का उसके हवाले किया और उसने पूछा फिर सरदार ने कि मेरा गुलाम कहां है जो माल दिखाने के लिए ले गया था तो गुलाम ने कहा कि तुम्हारे गुलाम को खवासगान गई है हमारे अमीर की लड़की ने उसे पसंद कर लिया है और उसके वापस आने की उम्मीद ना रखो अपना रास्ता लो काफिले के सरदार ने अबू अब्दुल्लाह के वापस ना आने से मायूस होकर अपने साथियों को वहां से चलने का हुक्म दिया और वहां से रवाना हो गए।

उधर अब्बू अब्दुल्लाह हुआ अब वह लड़की जो वली हलब की बेटी थी। ऐशो इशरत में मशरूफ हो गए। उस खूबसूरत लड़की को देखकर अब्बू अब्दुल्लाह अपनी तमाम तकलीफें वह रंज भूल गया था। उसने वली हलब की लड़की के साथ ऐशोइरत कि।

उधर अबू लहब वजीर का हाल सुनिए कि जब गश्ता पहर उसकी आंख खुली तो हड़बड़ा कर उठ बैठा और अब्बू अब्दुल्लाह को मारने के वास्ते खंजर हाथ में लेकर कुएं के पास पहुंचा तो उसने देखा कि कुआं पानी से लबालब भरा है और एक लाश उसमें तैर रही है। जब वज़र ने लाश को अपनी तरफ खींच कर देखा तो उसके बेटे की मुर्दा लाश थी और अब्बू अब्दुल्लाह का कहीं नाम व निशान ना था। यह हाल देखकर वह सख्त घबराया और अपने बेटे को मुर्दा देखकर अपना सर पीट लिया और नंगे पांव रोता हुआ वली हलब के पास पहुंचा और तमाम हाल उसे बयान किया।

यह हाल सुनकर वली हलब के होश उड़ गए। वजीर से कहा देखो किस मशक्कत से अब्बू अब्दुल्ला हाथ आया था। अब खुदा जाने कहां चला गया होगा और कैसे हाथ आएगा। बहरहाल अपनी तरफ से एक लम्हा देर ना करो। फौरन तलाश करना शुरू करो। चुनांचे। यह कहकर अमीर हलब उसका वजीर दूसरे लश्कर वालों को साथ लेकर अब्बू अब्दुल्लाह की तलाश में रवाना हुए। दो रोज वर्दन रात बराबर जंगल में अब्बू अब्दुल्लाह की तलाश करते रहे। लेकिन कहां? अब्बू अब्दुल्लाह का पता ना चला।

तीसरे रोज निहायत थककर लाचार होकर वापसी का इरादा किया। मगर थकान के सबब ताकत बाकी ना रही थी। वली हलब ने वजीर से कहा कि गुलबानो बानो का बाग यहां से सिर्फ दो कोस के फासले पर है। मुनासिब यही है कि वहां चलकर एक रोज आराम कर ले। कल शहर को वापस चले जाएंगे। चुनांचे वह बाग की तरफ रवाना हुए।

उधर वली हलब की बेटी को जब अपने बाप के आने की इत्तला मिली तो उसने अब्बू अब्दुल्लाह को एक हजरे में छुपा दिया। उसमें बिठा दिया और अपने बाप की खिदमत में हाजिर हुई। फिर रात गए तक बाप की खिदमत में हाजिर रही। मगर अब्बू अब्दुल्लाह की जुदाई एक लम्हे के लिए उससे बर्दाश्त ना हो रही थी।

जब वली हलबो उसका वजीर अपनी-अपनी बातों में मशरूफ हो गए तो बेटी वहां से रुखसत होकर अपने हजरे की तरफ आई कि जहां उसने अब्बू अब्दुल्लाह को छुपा रखा था। फिर उसने हजरे के पास पहुंचकर अपनी एक मुलाजिमा को कहा कि तू हजरे की निगरानी कर। हजरे के बाहर पहरेदारी कर और खबरदार कोई अंदर ना आने पाए। यह कहकर वह लड़की हजरा के अंदर दाखिल हुई और अब्बू अब्दुल्लाह को गले लगाकर सो रही।

इत्तेफाक का ऐसा हुआ कि थोड़ी देर में उस मुलाजिमा की भी आंख लग गई जो बाहर पहरा दे रही थी। उधर वली हलब ने अपने दिल में सोचा कि मैं तीन दिन से इस मुसीबत में पड़ा हूं। थोड़ी देर अपनी बेटी के पास चलकर उससे बातें करूं ताकि तबीयत बहल जाए। यह सोचकर वह हजरे की जानिब चल पड़ा। जहां उसकी बेटी व अब्बू अब्दुल्लाह सो रहे थे। वहां पहुंचा तो हजरे के दरवाजे पर मुलाजिमा को सोते हुए पाया। जब अंदर गया तो देखा कि तख्त पर उसकी लड़की एक अजनबी मर्द के हमरा हम आगोश पड़ी है।

वली हलब को यह हाल देखकर सख्त गुस्सा आया और दीवाना वार दौड़कर बेटी वब्बू अब्दुल्लाह के बाल पकड़ कर दोनों को तख्त से नीचे डाल दिया। और अब्बू अब्दुल्लाह को पहचान कर उसको और भी ज्यादा गुस्सा आया कि देखो मैं इस हरामजादे की तलाश में सरगर्द फिर रहा हूं और यह मेरे ही घर में बैठा मेरी चहती लड़की से रंग रेलियां मना रहा है। मेरी छाती पर मोंग ले रहा है। यह कहकर बेटी व अब्बू अब्दुल्लाह व मुलाजिमा के हाथों को रस्सी से मजबूत बांधकर हजरा में डाल दिया और हजरे का दरवाजा बाहर से बंद कर दिया। और यह कहकर बाहर आया कि मैं इस हाल से वजीर को आगाह करता हूं।

वो वजीर को इस माजरे की खबर की। वजीर ने कहा कि खैर जो कुछ होना था वह हो गया। मगर हजार शुक्र है कि अब्बू अब्दुल्लाह हमारे हाथ आ गया। वह गिरफ्तार हो गया। वली वो हलबा वजीर इसी गुफ्तगू में थे कि वली हलब की बेटी ने अब्बू अब्दुल्लाह से कहा जानेमन तुम जिस तरह मुमकिन हो अपने इस बंदे से रिहाई हासिल करके अपनी जान बचाओ।

अब्बू अब्दुल्लाह ने कहा कि पहले तो यह जो रस्ते से हाथ बंधे हुए हैं इससे आजाद होना दुष्कार है। दूसरा मैं तुमको इस हाल में छोड़कर हरगिज़ ना जाऊंगा। उस लड़की ने उससे बहुत मनाया। लेकिन लड़की ने यह सोचकर कोशिश शुरू कर दी कि रस्ते से हाथ छुड़ाया जाए। वह अब्बू अब्दुल्लाह के पास पहुंचकर अपने दांतों से उसके हाथों की रस्सी काटने लगी और कहा कि सामने जो दरीचा है तुम इस दरीचा से नीचे कूद पड़ो और अपनी जान सलामत बचाओ।

हर चंद अब्बू अब्दुल्लाह ने इससे इंकार किया। लेकिन वह लड़की ना मानी। जब अब्बू अब्दुल्लाह ने देखा कि लड़की बात नहीं मानती तो उसने अपने आप को दरीचा से नीचे गिराया। अगरचे वह दरीचा सतह जमीन से काफी बुलंद था और नीचे कूदने में कोई शक नहीं कि अब्बू अब्दुल्लाह को चोट लगती उसे शदीद जर आती लेकिन खुदा की कुदरत देखिए कि इत्तेफाकर से दरी से छलांग लगाते वक्त बराबर एक दरख्त की शाख अबू अब्दुल्लाह के हाथ में आ गई जो उस दीजे के साथ नीचे लगा हुआ था और इस सबब से वह जमीन पर गिरने से बच गया और दरख्त में अटक गया और फिर वहां से जमीन पर उतर आया।

वहां से दौड़कर कर वह दीवार बाग की फलांग कर सेहरा की जानिब दौड़ पड़ा और पकड़े जाने के खौफ से रात भर उसने जरा दम ना लिया बराबर भागता चला गया जब सुबह हुई तो थकावट व भूख के मारे उस रात को पेश आने वाली वली हलब के मुतालिक कुछ कहने की नौबत ना आई वह सख्त झप व तकलीफ में हुआ चलते-चलते सामने एक आबादी पर नजर पड़ी जो कि गांव था उस तरफ को चल पड़ा इस ख्याल से कि अगर मुमकिन हुआ तो कहां से खाना लेकर अपना पेट भरूं।

जब गांव के दरवाजे पर पहुंचा वहां एक दुकान थी और दुकान पर एक बुजुर्ग बाहर रॉ सफेद दाढ़ी वाला आदमी बैठा हुआ था। अब्बू अब्दुल्लाह को देखकर उस बुजुर्ग ने पूछा जवान तू कहां से आया है अब्बू? अब्दुल्लाह ने कहा हाय बुजुर्ग वर मैं एक फकीर आदमी हूं। वह बहुत मुसीबत मैंने उठाई है। बुजुर्ग को उसकी सूरत देखने व बातें सुनने से पता चला कि जरूर इस शख्स पर कोई आफत आई है। बुजुर्ग ने उस पर रहम खाकर उसे साथ लिया और अपने घर चला गया। वो खाना खिलाया।

बादजा उस बुजुर्ग ने पूछा कि तुम्हारा मकान कहां है? वह किस तरफ जाने का इरादा रखते हो अब्बू? अब्दुल्लाह ने कहा कि मेरा घर बाहर कुछ नहीं ना किसी खास तरफ का इरादा है। फिर उस बुजुर्ग ने कहा कि तुम बिल्कुल बेसमानी में नजर आते हो। अगर मेरी मुलाजमत कबूल करो तो मैं तुम्हें अपने पास रखूं। अब्बू अब्दुल्लाह ने कहा मुझे मंजूर है। मगर आप मुझसे क्या काम लेंगे?

बुजुर्ग ने कहा, तुम्हारे मुतालिक यह खिदमत होगी कि सुबह-सुबह उठकर 10 मशक पानी की कुएं से भर कर लाओगे। तो उसके बाद तमाम मकान को साफ करना पड़ेगा। मेरी गाय, भैंस, वो भेड़ बकरियों को जंगल में चराने के वास्ते ले जाना होगा। वो शाम को जब वापस आओगे तो तीन गट्ठे घास के लेते आओ फिर जानवरों को उनके मकाम पर बांधकर वो उनकी खिदमत करके बाग में जाओ। वो वहां से लकड़ियां लेकर खाना पकाओ। वो जब मैं खाना खा चुका मेरे पांव दबाओ। जब तक कि मुझे नींद ना आ जाए। उसके बाद तुम्हारी छुट्टी है। जो चाहे सो करो।

अब्बू अब्दुल्लाह ने कहा हजरत मैं नौकर रहूंगा या गुलाम चक्कर बनकर रहूंगा। बुजुर्ग ने कहा खैर तुम्हें इख्तियार है अब्बू अब्दुल्लाह ने फिर दिल में सोचा कि सहरा में कहां तक भटकता रहूंगा। किसी तरह फिर वजीर व वली हलब के हथे ना चढ़ जाऊं। उनके हाथ से बचने के लिए बेहतर यही है कि जो ठिकाना मिला है उसको ना छोडूंगा। मुशक्कल ज्यादा है। मगर यहां बिल्कुल हिफाजत से रहूंगा। आइंदा का खुदा मालिक है। क्या होता है ऐसे ख्यालात से? अबू अब्दुल्लाह ने उस बुजुर्ग की मुलाजमत कबूल कर ली।

उधर अमीर हलब वजीर को हमराह लेकर हजरा में जहां उसकी बेटी वो अब्बू अब्दुल्लाह को छोड़ गया था। वहां पर पहुंचा तो देखा कि अब्बू अब्दुल्लाह मौजूद नहीं। कहर भरी नजरों से बेटी की तरफ देखकर बोला। ए नाप काका वो नवजवान तेरा यार कहां है? बेटी ने कहा वह इस दरी से बाहर कूद गया।

वली हलब यह सुनकर सख्त गजब नाक हुआ। वह अपना लश्कर लेकर फिर अब्बू अब्दुल्लाह की तलाश में निकला। रात भर लश्कर ने तमाम जंगल छान मारा। कहा अब्बू अब्दुल्लाह का पता ना चला। लाचार वली हलब गमगीन और मायूस बाग को वापस। मरा और कसम खाई कि मैं हरगिज़ उस बेटी व उसकी मुलाजिमा को ना छोडूंगा।

जब बाग में पहुंचा आते ही बेटी व मुलाजिमा को अपने रूबरू बुलवाकर एक मुलाजिम को हुक्म दिया कि इन दोनों को कत्ल कर डाल मगर क्योंकि औरत का अपने सामने कत्ल करवाना रवा नहीं तो इनको मेरे सामने से ले जा और किसी जंगल में ले जाकर इनका काम तमाम कर दे।

वली हलब का वह बहादुर मुलाजिम वली हलब के हुक्म के मुताबिक उसकी बेटी वह मुलाजिमा को अपने साथ जंगल में लेकर गया और उस जगह पहुंचा जहां किसी आदमी का गुजर तक ना होता था और उनको कत्ल करने का इरादा किया। उस लड़की के पास बहुत सा जेवर वफ गहने थे। उस मुलाजिम ने सोचा कि पहले तो इनका जेवर ले लिया जाए। बाद में इनको कत्ल किया जाए। चुनांचे उनका उतारना शुरू किया।

जब सब जेवर उतर चुका तो उस लड़की की उंगली से वह अंगूठी उतारने लगा। मगर वह अंगूठी उसकी उंगली में इतनी तंग थी। वह फंसी हुई थी कि उस मुलाजिम ने बहुत जोर लगाया मगर उंगली से अंगूठी ना निकाल सका। मजबूर होकर उसने दांतों से जोर लगाकर अंगूठी उतारने चाही। खुदा की कुदरत के उस अंगूठी के नगीने के नीचे एक पाराझर कातिल का रखा हुआ था। उस मुलाजिम ने जो दांतों से जोर करके उस अंगूठी को खींचा तो वो ना उससे अलग होकर उस जहरे कातिल का पारा उस मुलाजिम के मुंह में दाखिल हो गया और उस पारे के असर से उस मुलाजिम की फौरन मौत हो गई।

बैठी वह मुलाजिमा ने हाल देखकर खुदा का शुक्र अदा किया कि उस जालिम से जान छूटी। फिर सोचने लगी कि अब इस मकाम से कहां जाए। खुदा जाने हमारा क्या अंजाम होगा। वहां से चल पड़ी इत्तेफाकत तकदीर से थोड़ी दूर जाकर उसी गांव में जा पहुंची जहां अब्बू अब्दुल्लाह उस बूढ़े का मुलाजिम बनकर रहता था। वो उसकी मुलाजमत करता था।

गांव के पास पहुंचकर वह भी उसी बुजुर्ग की दुकान पर आई। बुजुर्ग ने उनसे पूछा कि तुम कौन हो? और तुम्हारा आना कैसे हुआ? मुलाजिमा ने हिम्मत करके कहा हमारा कस्सा तो बहुत लंबा है मगर तुमसे मुख्तसर कहते हैं कि हम चोरों के हाथ से बचकर यहां तक पहुंची हैं। हमारे तमाम मर्दों औरतों को चोरों ने मार डाला है। हमें भूख बहुत लगी है। मेहरबानी करके कुछ खाना खिलाओ। वह एक ऐसी जगह बताओ जहां हम अमन से रह सकें। थोड़ी देर आराम कर लें।

वह बुजुर्ग उनकी खस्ताली देखकर उन्हें अपने मकान पर ले गया और एक अलहदा हजरे में उनको उतार कर कहा तुम थोड़ी देर यहां पर आराम कर लो। मेरा नौकर अभी जंगल में से आता होगा। मैं उसके आते ही तुम्हारे वास्ते खाना तैयार करवा दूंगा। लड़की वह मुलाजिमा ने उसके कहने के मुताबिक हजरे में आराम किया।

जब अब्बू अब्दुल्लाह जंगल से घास का गट्ठा सर पर रखे हुए आया तो उस बुजुर्ग ने कहा कि दो औरतें मेहमान बनकर मेरे मकान में आई हैं। जल्दी से उनके वास्ते खाना तैयार करो। यह कहकर बुजुर्ग अपनी दुकान पर चला गया। अब्बू अब्दुल्लाह यह पूछने के बहाने कि उन मेहमानों की मरहगूब गिजा क्या है? ताकि उनकी पसंद के मुताबिक वही चीजें तैयार। करूं हजरे के दरवाजे पर गया और पूछने लगा तो उस मुलाजिमा ने फौरन अब्बू अब्दुल्लाह को पहचान लिया और उस लड़की को खबर दी।

लड़की यह खुशखबरी सुनते ही फौरन दौड़कर अब्बू अब्दुल्लाह के पास आई और उसको गले लगा लिया और सरों सर रोना शुरू किया। अबू अब्दुल्लाह का भी दिल भर आया बेख्तियार। उसकी आंखों से भी आंसू रवा हो गए। मुलाजिमा ने कहा अजीज यह वक्त खुशी का है। तुम्हें चाहिए कि हंसो फ खुशी करो।

फिर अब्बू अब्दुल्लाह व लड़की अपनी-अपनी कहानी एक दूसरे को बयान करने लगे और अल्लाह का शुक्र अदा करते हुए सजदा शुक्र बजा लाए और खाना खाया जब खाने से फुर्सत हुई और आराम से बैठे तो लड़की ने अब्बू अब्दुल्लाह से कहा अब मेरे बाप के अमलदेव अब्बू अब्दुल्लाह मेरा दिल चाहता है कि शहर दमिश्क की मैंने बहुत तारीफ सुनी है। अगर वह यहां से बहुत फासले पर नहीं तो मेरा दिल चाहता है कि उस शहर को देखूं।

लड़की ने कहा मैं तेरी ताबेदार रहूंगी जहां तेरा दिल चाहे। मैं तेरे साथ हूं अब्बू। अब्दुल्लाह ने बुजुर्ग से दमिश्क का हाल पूछा। उसने कहा कि दमिश्क यहां से बहुत करीब है। अब्बू अब्दुल्लाह ने उस बुजुर्ग से रुखसत हासिल करके दूसरे रोज दमिश्क की जानिब कोच किया। और चंद रोज में वहां पहुंचे।

जब दमिश्क पहुंचे तो अब्बू अब्दुल्लाह ने लड़की मुलाजिमा को एक जानिब बिठाकर कहा मैं मजदूरी के वास्ते जाता हूं ताकि तुम्हारी व मेरी औकात बसर हो। लड़की ने कहा तुम ऐसा इरादा क्यों करते हो? मेरे पास इस कदर जेवर व जवाहरात है कि हमारी तमाम उम्र के वास्ते काफी होंगे अब्बू।

अब्दुल्लाह ने कहा मुझे हरगिज़ ऐसा गवारा नहीं होगा कि मैं औरत के माल को अपने काम में लाऊं। मैं सिर्फ अपनी कौवत बाजू से अपना गुजारा करना चाहता हूं। रोजी कमाना चाहता हूं। यह कहकर एक रस्सा हाथ में लिया और मजदूरी की तलाश में बाजार की जानिब चला। बाजार में एक मकाम पर एक घास की गठ रखी हुई थी। एक शख्स ने मजदूरी मुकर्रर करके अबू अब्दुल्लाह से कहा कि यह गठरी घास के मेरे मकान पर पहुंचा दो।

अबू अब्दुल्लाह ने गठरी सर पर रखी और उस शख्स के पीछे हो लिया। आखिरकार चलते-चलते खलीफा अलमामून के महल के नीचे जा पहुंचे। वहां उस वक्त इत्तेफाक का नूर जहां बेगम एक खिड़की में बैठी हुई थी और बाजार का तमाशा मुलाहिजा कर रही थी। और उनके पास वह कनीज जो अब्बू अब्दुल्लाह ने खलीफा को नजर की थी खड़ी हुई थी। उस कनीज की निगाह जो अब्बू अब्दुल्लाह पर पड़ी तो फौरन उनको पहचान कर रोने लगी।

नूर जहां बेगम ने पूछा कनीज तू क्यों रोती है? तो उसने कहा ए मलका जहां यह शख्स जो घास की गठरी सर पर ले जाता है। मेरा आका नामदार अब्बू अब्दुल्ला हलबी है। नूर जहां बेगम ने कहा तू दीवानी है। अब्बू अब्दुल्लाह तो अरसा हुआ फौत हो गया। वो अब कहां से आया? कहां मुर्दे भी जिंदा होते हैं। कनीज ने कहा मैं अरसा तक अब्बू अब्दुल्लाह की खिदमत में नहीं हूं। मैं उसको बखूबी पहचानती हूं। इसमें हरगिज़ शक नहीं कि यह शख्स जरूर अब्बू। अब्दुल्लाह है।

नूर जहां बेगम ने कहा अच्छा इसको हमारे सामने लाओ हमारे रूबरू बुलवा। चुनांचे ख्वाजा सरा को भेजकर अब्बू अब्दुल्लाह को बुलवाया गया। नूरजहां बेगम ने चेहरे पर नकाब डालकर उससे हाल पूछा। अब्बू अब्दुल्लाह ने कहा मेरा किस्सा बड़ा तवील है कहां तक अर्ज करूं मैं हुजूर।

जब कनीज ने अब्बू अब्दुल्लाह की आवाज पहचानी तो किसी तरह का शक बाकी ना रहा दौड़ कर उसके कदमों में गिर पड़ी। खुदा की कुदरत उसी लम्हे खलीफा साहब महल में आ गए और नूरजहां बेगम को एक नाहरम मर्द से गुफ्तगू करते देखकर बहुत राह हुए और कहा नूरजहां यह क्या हरकत है कि तुम एक कमी मजदूर से बैठी बातें कर रही हो।

नूरजहां ने अर्ज की जहां पनाह यह शख्स वही अब्बू अब्दुल्लाह है जिसकी जुदाई में आप शब रोज बेकरार रहते थे। खलीफा ने जो बोर अब्बू अब्दुल्लाह के चेहरे को देखा तो उसे पहचान लिया। दौड़कर उसको अपनी छाती से लगा लिया और कहा अजीज अपनी कहानी बयान करो। हम तो अरसा हुआ तुझे इस दुनिया जहां से रुखसत हुआ समझ चुके हैं।

अब्बू अब्दुल्लाह खलीफा का कदम बूस हुआ और तमाम शुरू से इंतहा तक कहानी उन्हें बयान कर दी। खलीफा को उसकी तकलीफों व सबों का हाल मालूम हुआ तो बहुत उन्हें रंज हुआ। खलीफा को उसकी तकलीफों व सतों का हाल सुनकर बहुत रंज हुआ और निहायत तैश में आया। उसी वक्त वजीर को तलब करके हुक्म दिया कि फौरन किसी शख्स को लश्कर के साथ लेकर हलब की जानिब कोच करो और जाकर वली हलब वो उसके वजीर को बजल खवारी गिरफ्तार करके हमारे हुजूर पेश करो।

और फिर चंद आदमी सवारी के साथ भेजकर वली हलब की लड़की को इज्जत के साथ अपने महल में बुलवा लिया। फिर अब्बू अब्दुल्लाह को अपने साथ लेकर दरबार में आया और तमाम हाजिरी को उसका हाल सुनाकर उसकी हिम्मत बनाई। निहायत तारीफ की और बर्खास्त व दरबार बर्खास्त करने के बाद अब्बू अब्दुल्लाह को अपने महल में ले गया। दोनों ने मिल बैठकर खाना खाया।

फिर खलीफा अलमामून ने एक निहायत आलीशान मकान अपने महल के बराबर उसको रहने के लिए दिया। चंद रोज में वली हलबव उसका वजीर लश्कर गिरफ्तार होकर आए। खलीफा ने हुक्म दिया कि उनको चौराहे। खलीफा ने हुक्म दिया कि उनको बाजार के बीच में सूली पर गाड़ दिया जाए और उनको फांसी दे दी जाए और शहर में मनादी करा दी कि जो शख्स नेकों के साथ बदी करेगा उसकी यही सजा है।

फिर काजी को तलब करके अबू अब्दुल्लाह का निकाह वली हलब की लड़की के साथ मुनकट कल कराया और चंद रोज अबू अब्दुल्लाह को अपना मेहमान रखकर उसकी निहायत खातिर तवाजो की। फिर उसको बहुत कुछ जरे नकद व तफ देकर शहर हलब की हुकूमत अता करके रुखसत किया।

अब्बू अब्दुल्लाह हलब में पहुंचकर हलब के तख्त पर बैठा रियाया की खिदमत में मशरूफ हुआ और अपनी जिंदगी में तमाम रियाया को अपने इंसाफ खुल्क मुरव्वत व हिम्मत से ऐसा खु शुक्रगुजार किया कि उसके अहदे हुकूमत में रियाया को ऐसी आजादी खुशहाली हासिल रही कि अब तक लोग अबू अब्दुल्लाह के नाम की बड़ी इज्जत व तौकीर करते हैं। वली हलब की लड़की से। अब्बू अब्दुल्लाह की कई औलाद पैदा हुई और एक अरसा तक शहर हलब की हुकूमत उसके खानदान में।