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Episode 4 - Ashtavakra Gita 2025 Camp | By Sandeep Maheshwari

SandeepMaheshwariSpirituality36:49

Transcription

अष्टावक्र जी कह रहे हैं, "जिस विषय रिक्त व्यक्ति को पलक खोलने बंद करने जैसे सहज कर्म में भी आलस्य होता है, उसके जैसा सुखी कौन होगा? अर्थात, जो विषयों में प्रवृत्त नहीं है, वही इस संसार में सुखी है।" यही अष्टावक्र गीता में एक जगह आत्मज्ञानी को कहा गया है। उसको एक नाम दिया गया है, "आलसी शिरोमणि"। जैसे आपने सुना होगा, "मूर्ख शिरोमणि" मतलब मूर्खों में सबसे बड़ा मूर्ख, तो आलसियों में सबसे बड़ा आलसी कौन? आत्मज्ञानी।

क्यों? क्योंकि जब तक यह इल्यूजन है कि आप कुछ कर रहे हो, आप कुछ कर सकते हो, आपकी वजह से कुछ हो रहा है, तभी तक तो करने के लिए कुछ है। जिस दिन यह समझ आ गया कि मैं कुछ नहीं करता, सब कुछ अपने आप होता है, अब करने को क्या बचा? सब कुछ है, लेकिन करने को कुछ भी नहीं है। क्योंकि आप लोग कैसे करते हो? कुछ भी करते हो, देयर हैज़ टू बी अ गोल, ड्रीम, एंबिशन, टारगेट, लक्ष्य। ज्ञानी के लिए क्या बचा? क्या करेगा वो? सब कुछ उसी में है, पूरा ब्रह्मांड। उसके लिए सोना और पत्थर बराबर हो गया है। हां, यूटिलिटी अलग-अलग है। तो ज्ञानी करे तो क्या करें? ज्ञानी के लिए करने को कुछ भी बाकी नहीं रह जाता है।

जब सब कुछ अपने आप ही हो रहा है और ये गलतफहमी मिट गई है। जिसको ये गलतफहमी है, वो तो कुछ करे कि मैं कर रहा हूं, मैं कर सकता हूं। जिसको यह समझ आ गया कि सब कुछ अपने आप होता है, फ्री विल इज जस्ट एन इल्यूजन। आपका इंडिपेंडेंट कहीं कोई एक्सिस्टेंस है ही नहीं। कहीं कोई थिंकर है ही नहीं। कोई एक्सपीरियंसर है ही नहीं। कोई डूअर है ही नहीं। जहां भी एंड में इआर लग जाए ना, समझ जाओ एरर है।

अब क्या करें? यहां तक कि उसके लिए आंख बंद करने में और खोलने में भी कोई फर्क नहीं है। आंख खोल करके भी वही है, आंख बंद करके भी वही है। उसके सिवा कहीं कुछ और है ही नहीं। कभी कुछ हुआ ही नहीं। कुछ होता ही नहीं। कुछ होगा ही नहीं। तब करें क्या? उसके जैसा सुखी कौन होगा?

कुछ भी करने से पहले, यानी फिजिकली कुछ भी करने से पहले आपको सोचना पड़ता है। उसी को करना कहते हैं। बिना सोचे जो होता है, आपकी बॉडी के लेवल पे, क्या वो आप करते हो? आपका डाइजेशन आप चलाते हो? किडनी को आप कंट्रोल करते हो? पूरे जो बॉडी के अनलिमिटेड प्रोसेससेस हैं, क्या वो आप कंट्रोल कर रहे हो? अगर आपके हाथ में कंट्रोल दे दिया जाए तो अच्छे से करोगे काम को या काम खराब कर दोगे? मतलब पूरा कंट्रोल आपकी बॉडी का एक्चुअल में आपके हाथ में आ जाए। संभालो इसको।

कहीं जा रहे हो मेट्रो में, बस में, किसी ने जेब काट ली। ₹15 थे आपके पास, वो भी गए। अब ध्यान वहां चला गया। उसके बारे में सोचने लग गए, तो सांस लेना भूल गए, वहीं मर गए। तो आप करते क्या हो, ये तो बताओ। सब कुछ तो अपने आप होता है। बट ये गलतफहमी है कि हां, मैं करता हूं। ऑन द बेसिस ऑफ़ व्हाट? ऑन द बेसिस ऑफ़ थॉट। उसने थॉट के भी झूठ को देख लिया है।

थॉट अपने आप आ ही नहीं सकता है। कैन यू प्रेडिक्ट योर नेक्स्ट थॉट? प्रेडिक्ट करके दिखाओ कि अगला थॉट क्या आएगा, बिना किसी थॉट को यूज किए। एक दिन में हजारों थॉट्स आते हैं। उसमें से अभी यह प्रेडिक्ट करके दिखाओ कि अगला थॉट आपकी ब्रेन में क्या आने वाला है। इसका मतलब क्या? कुछ भी आ सकता है। जैसे आसमान में देखते हो, तो आप प्रेडिक्ट नहीं कर सकते कि अगली जो फॉरमेशन है बादल की, वो कैसी होगी? कुछ भी बन सकती है। अभी देखोगे कुछ और है, थोड़ी देर में कुछ और है। तो ये थॉट कैसे आता है? आपको लगता है, मैं सोचता हूं। अच्छा। बिना थॉट के क्या कोई थॉट आ सकता है? थॉट इज नॉट अ कॉज। इट इज़ एन इफ़ेक्ट व्हिच इज़ इन द रेल्म ऑफ़ अननोन।

बोल दो सर, ये ज्यादा हो गया। समझाओ जरा आप क्या बोल रहे हो? मैं नहीं सोचता तो कौन सोचता है? मैं नहीं करता तो कौन करता है? पहले तो ये समझो, बिना सोचे जो किया गया कर्म होता है, वो तो कर्म है ही नहीं ना। जैसे जानवर करते हैं। उसको कर्म कहोगे? एक बिल्ली ने चूहे को खाया, तो उसने बुरा कर्म कर दिया। किसी शेर ने, चीते ने शिकार किया, तो बुरा हो गया। तो अच्छा, बुरा, इट इज ऑल कनेक्टेड टू व्हाट? थॉट। इट इज जस्ट अ थॉट।

पहले आपके माइंड में ये प्लांट करना पड़ेगा कि ये करना बुरा होता है। अगर वो प्लांट हो गया है, आपने एक्सेप्ट कर लिया है, फिर आपने अगर वो किया, तो उस कर्म का आपके ऊपर असर होगा। गिल्ट होगा। कि ये मैंने क्या कर दिया? मेरे से इतनी बड़ी गलती हो गई। अगर यह थॉट ही नहीं है कि वो गलत है, इनफैक्ट आपके अंदर बचपन से ये प्लांट कर दिया, ये अच्छा होता है, तो गिल्ट होगा। तो फीलिंग्स, इमोशंस, ये सब किससे कनेक्टेड है? थॉट से।

अब ये थॉट क्या होता है? कहां से आता है? ये आपने पैदा किया है। जैसे अपनी ये जो बॉडी है, इसको आपने पैदा किया है। ये तो हो गई। कैसे हुई? बताया नहीं आपके पेरेंट्स ने, कि चंदा मामा से हमने मांगा था और तुम प्रकट हो गए। ऐसे ही तो हुए थे। नहीं तो उसमें आपने क्या किया? जो किया चंदा मामा ने किया और आप आ गए, तो आप इसको मैं क्यों बोलते हो? मेरा क्यों बोलते हो? या तो बोलोगे, मैं ये हूं, या कहोगे, नहीं, ये मेरी बॉडी है। आपकी कैसे हुई? आपने बनाई है। ये तो अपने आप बनी है। तो जब बॉडी को आपने नहीं बनाया, बॉडी की प्रोसेससेस को आपने नहीं बनाया, बॉडी अपने आप अपने हिसाब से काम करती है, आपकी सुनती है क्या? बॉडी को बोलो एक बार स्ट्रिक्टली, तीन दिन तक कोई प्यास नहीं लगनी चाहिए। बॉडी सुनेगी आपकी? कोशिश करके देख लो। बॉडी तो वही करेगी जो बॉडी के अंदर फीडेड है और वो आपने फीड नहीं किया है, क्योंकि वो हर बॉडी में फीडेड है, एस पर द लॉज़ ऑफ नेचर।

तो ये थॉट कहां से आता है? सारी गलतफहमी थॉट पे ही टिकी है। इन रिलेशन टू थॉट यू से दैट आई एम द थिंकर ऑफ दिस थॉट। आई थिंक देयर फॉर आई एम। मैं सोचता हूं। पहले थॉट आता है, उसके बाद में एक और थॉट आता है, फिर थिंकिंग शुरू होती है। अब ये जो बात है, ये आपको दुनिया की और किसी किताब में या कहीं पर भी नहीं मिलने वाली। ध्यान से सुन लो। ये जब अपने अंदर झांक के देखोगे, तब नजर आएगा।

पहले एक थॉट आता है। वो कैसे आता है? क्यों आता है? आपके सबकॉन्शियस में या फिर कहो आपके अनकॉन्शियस में, जहां पर करोड़ों, अरबों, खरबों एक्सपीरियंसेस पड़े हुए हैं, फीलिंग्स हैं, सेंसेशंस हैं, इमोशंस हैं, उसके अकॉर्डिंग एक थॉट आ जाता है। नाउ, व्हाट इज अ थॉट? लोग कहते हैं, अपने थॉट्स को कंट्रोल करो। अच्छा, थॉट्स क्या होते हैं? जो आप अपने अंदर बोलते हो, दैट इज अ थॉट। विदाउट अ वर्ड देयर कांट बी अ थॉट। बोलने से ही तो वो स्टोर होता है। और बिना बोले जो आया, उसको आप एक इमेज कह सकते हो, उसको आप एक साउंड की रिकॉर्डिंग कह सकते हो। बट इट विल नॉट लीड टू थिंकिंग।

जैसे एक बच्चे के केस में होता है या एक जानवर के केस में होता है। जब एक जानवर टीवी देख रहा है, तो आपको क्या लगता है? वो मूवी देख रहा है। उसको कुछ समझ आ रहा है? तो वो क्या देख रहा है उस टीवी में? क्या कलर्स देख रहा है? क्या लाइट देख रहा है? क्या साउंड सुन रहा है? वो तो आपको पता ही नहीं है। तो उसको थॉट नहीं कह सकते, क्योंकि वो कुत्ता या बिल्ली बैठ के कुछ सोच नहीं रहा है। इट इज बीइंग, नॉट थिंकिंग। दोनों में फर्क देख पा रहे हो? जैसे एक बच्चा कुछ देख रहा है। एक इंसान अच्छा, एक बुरा है। तो उस बच्चे के माइंड में अच्छा, बुरा कुछ नहीं है। वो तो बस देख रहा है दोनों को। और यह भी नहीं पता कि उन दोनों को देख रहा है, या दोनों को मिलाकर के कुछ देख रहा है, या उनके कपड़ों को देख रहा है। या ऐसा लग रहा है कि देख रहा है, लेकिन वो देख ही नहीं रहा है। पता नहीं अभी क्या इमेज बनी है। वो तो ट्रेनिंग होती है, जब आप स्कूल में जाते हो कि देखो, ये जो इमेज है, इसको ये कहते हैं। तब तक तो पता ही नहीं कि एप्पल क्या है और ऑरेंज क्या है? कलर तक नहीं पता। शेप तक नहीं पता। तो शेप, फॉर्म, ये सब चीजें कैसे स्टोर होती हैं? विद दी हेल्प ऑफ साउंड, विद द हेल्प ऑफ अ वर्ड, एन अल्फाबेट। इज इट नॉट? उससे पहले थिंकिंग होगी कैसे? इट इज़ नॉट पॉसिबल।

तो थॉट मतलब क्या? बॉडी के लेवल पर कुछ हुआ। या तो वो प्लेजरेबल है, या वो पेनफुल है। तभी आपका ध्यान वहां पर जाता है। नहीं तो ध्यान नहीं जाता है। दैट प्लेजर कुड बी साइकोलॉजिकल और फिजिकल। पेन कुड बी साइकोलॉजिकल और फिजिकल, व्हिच इज कनेक्टेड टू मेमोरी। जैसे ही ऐसा कुछ होता है, तो उसके बारे में आप अपने अंदर कुछ बोलते हो। लेकिन वो काम इतना तेज होता है कि हमें पता ही नहीं लगता है, या यह कह लो, वो काम अपने आप ही हो जाता है। बिकॉज़ वी आर नॉट अवेयर। हम ध्यान करते हैं, ध्यान देते थोड़ी ना है। जब ध्यान दोगे, तो आपको ये सब नजर आ जाएगा स्लो मोशन में। कि कैसे हम अपने अंदर कुछ बोलते हैं, लेकिन बोलने से पहले कुछ होता है, और वो जो होता है, उसमें हमारा कोई रोल नहीं होता है।

तो जैसे ही हम कुछ बोलते हैं, यानी कि वो जो हुआ या वो जो हो रहा है, उसको कोई नाम देते हैं, उसके अकॉर्डिंग या तो अंदर क्रेविंग उठती है, उस सेंसेशन को, उस एक्सपीरियंस को बनाए रखने की, उसको पकड़ने की, उसको कंटिन्यू रखने की, या फिर अंदर एवर्जन उठता है। जैसे पेन है, तो ये क्या हो गया? दर्द हो रहा है। अब मुझे इसके लिए कुछ करना पड़ेगा। इसको थिंकिंग कहते हैं। कैन यू सी दैट? है ये तीनों ही थॉट्स। एक थॉट है जो कुछ हुआ, जहां पर आपने कुछ कहा। यहां तक भी कोई दिक्कत नहीं है। यह तो जानवरों में भी हो जाता है।

जैसे जब जंगल में शेर आ रहा होता है, तो जो जानवर हैं, वो उनकी अपनी एक भाषा है, जिसमें वो एक दूसरे को कम्युनिकेट करते हैं और एक्शन हो जाता है फटाफट से। बट एक्शन में और थॉट में कोई डिफरेंस नहीं है। इमीडिएट होता है। उनकी अपनी जो लैंग्वेज है, उस लैंग्वेज में जैसे ही वो साउंड आई, वो सिग्नल आया, इमीडिएट एक्शन हो गया। भागने लग गए। तो देयर इज नो सफरिंग। दिस थॉट इज हेल्पिंग देम। यह तो अच्छा है। जैसे कोई जानवर है, जिसको सांप खाता है, तो जैसे ही उसको सांप की आवाज आई, वो जानवर इमीडिएटली एक्शन में आ गया। फाइट और फ्लाइट। दिस इज फाइन। प्यास लगी, तो एकदम पानी की तरफ चला गया वो जानवर। या पानी की खोज शुरू। इसमें क्या दिक्कत है?

बट हमारे केस में क्या होता है? इंसान के केस में क्या होता है? हमको सिर्फ कोई साउंड नहीं आती है। कुछ दिखता नहीं है। कुछ फील नहीं होता है। उसके जैसे ही कोई एक्सपीरियंस होता है, जो जानवरों को भी होता है, बच्चों को भी होता है। उसके साथ में क्या होता है हमारे साथ में? हम उसके बारे में अपने अंदर कुछ बोलते हैं। इस बोलने को थॉट कहते हैं। दिस इज द बिगिनिंग ऑफ़ माइंड। दिस इज द ओरिजिन ऑफ़ माइंड।

अब अगर आपने बोला और वो आया और गया, उससे भी कुछ फर्क नहीं पड़ता है। बट इसके बाद फिर कुछ और होता है। दो लोगों के साथ या ये कह लो आप सबके साथ में कुछ एक जैसा होता है। लेकिन सब अपने अंदर कुछ अलग बोलते हैं। कि एसी की हवा हम सबके लिए बराबर है, एक जैसी है। कोई अपने अंदर बोल रहा है, कितना अच्छा लग रहा है। कोई बोल रहा है, कितनी ठंड लग रही है। तो जो बोल रहा है, कितना अच्छा लग रहा है, अगर एसी बंद हो गया, तो तो अंदर बोलना बढ़ जाएगा। ये क्या हो गया? एसी कैसे बंद हो गया? हम फ्री में आए हैं। एसी भी नहीं चलता यहां पर। ये क्या है? और जो एसी की वजह से परेशान हो रहा है या हो रही है, बहुत ठंड है। ये हवा मेरे पे डायरेक्ट क्यों आ रही है? तो जैसे ही एसी बंद हुआ, तो वो इंसान खुश हो जाएगा।

दोनों ही केस में क्या होगा? थिंकिंग, अंदर बोलना बढ़ जाएगा। ये एसी आपके हाथ में नहीं है। ये किसके हाथ में है? बाहर किसी के हाथ में है। वो किसके हाथ में है? वो मेरे हाथ में है। उसको मैं बोलूंगा, एसी चला दे, चला देगा। कहूंगा, बंद कर दे, बंद कर देगा। तो आपके सुख का और दुख का कंट्रोल किसके हाथ में है? किसी और के हाथ में है। यही तो है आपकी लाइफ।

कुछ होता है। बिना बोले कैसे कुछ होने देते हैं? वो तो हमें पता ही नहीं है। कुछ भी होता है। एकदम ही कुछ बोलने लग जाते हैं। फिर धीरे-धीरे क्या होता है? बोलने की ऐसी आदत पड़ जाती है। कुछ नहीं भी होता है, तब भी बोलते रहते हैं। ये बोलना पता है क्या होता है? स्ट्रेस। यह एक फाइट ऑफ फ्लाइट मैकेनिज्म है। जब खतरा होता है, तो जानवर भी बोलते हैं आपस में। जिसकी वजह से जानवर अपने अंदर भी बोलते हैं। उसकी वजह से अंदर कुछ केमिकल्स रिलीज होते हैं, जिसकी वजह से एक्शन होता है। या तो लड़ते हैं या भागते हैं।

बट आपके साथ क्या होता है? एक्चुअल में कुछ नहीं हुआ है। कोई प्रॉब्लम नहीं है। बट नॉनस्टॉप कुछ ऐसा बोले चले जा रहे हो अंदर, जिसकी वजह से स्ट्रेस क्रिएट होता जा रहा है और वो फ्लाइट और फाइट मोड एक्टिवेट हुआ पड़ा है। बट एक्चुअल में या तो आप लड़ो या भागो, वो भी नहीं कर रहे। बस बैठ गए एक जगह पर। इसको डिजीज बोलते हैं। डिसईज, समझे?

तो ये जो दो थॉट्स होते हैं, इसको आपस में कौन जोड़ता है? अगर थॉट एक हो और थॉट आते ही इमीडिएटली एक्शन हो जाए, तो कोई दिक्कत नहीं है। जैसे बचपन में कभी आपका हाथ आग के पास में गया और हाथ जल गया, तो अभी भी वो मेमोरी अंदर स्टोर्ड है। जैसे ही हाथ आग के पास जाएगा, एकदम हाथ पीछे हट जाएगा। तो उसमें क्या दिक्कत है? थॉट इज हेल्पिंग यू।

बट आपके साथ क्या होता है? कोई भी थॉट आ जाता है, जिसमें से नॉट 99% 100% जो इंफॉर्मेशन अंदर फीडेड है, उसमें आपका कोई रोल है ही नहीं। वो फीड हो जाती है। बेस्ड अपॉन योर अपब्रिंगिंग, योर फैमिली बैकग्राउंड, जहां पर आप गए, मोबाइल पे जो देखा, कहीं कुछ दिख गया। वो सब जो अंदर फीड हुआ, उसी के बेस पर थॉट आया। जैसे थॉट आए, फिर वैसे इंफॉर्मेशन फीड हुई। तो शुरुआत कहां से हुई? अंदर कुछ इंफॉर्मेशन फीड हुई, तब थॉट आए। यह बिल्कुल ऐसा है, मुर्गी पहले आई या अंडा? तो मैं आपको बता रहा हूं कि पहले क्या आया? पहले थॉट नहीं आया। पहले अंदर मेमोरी, इंफॉर्मेशन, क्या वो आपने डाली बचपन में अपने अंदर? किसी और ने डाली ना। आपका नाम तक आपने खुद अपने को नहीं दिया। किसी और ने दिया। उसी के साथ तो सब कुछ जुड़ा है।

तो वो जो अंदर इंफॉर्मेशन पड़ी है, उसकी वजह से थॉट आता है। और जैसा थॉट आता है, वैसी और इंफॉर्मेशन एक्वायर होती है। जैसी इंफॉर्मेशन एक्वायर होती है, वैसा थॉट ऑटोमेटिकली आता है। फिर अंदर जो इंफॉर्मेशन पड़ी है, उसके अकॉर्डिंग ऑटोमेटिकली आप बोलते हो और उसके अकॉर्डिंग फिर कोई थॉट आता है। फिर आप बोलते हो। फिर इंफॉर्मेशन एक्वायर होती है और ये साइकिल घूमती रहती है। यही वो भवसागर है जिसमें आप फंसे हुए हो और ये सब है ही नहीं। या ये कह लो, इसमें से 99.9999% है ही नहीं।

लास्ट टाइम ऐसा कब हुआ कि आपकी जान को खतरा था, जिसकी वजह से थॉट आया और आपने एक्शन लिया? यानी कि कोई शेर पीछे पड़ गया? कोई सांप आपको काटने के लिए आ गया? या इस थॉट ने एक्चुअल में आपकी हेल्प करी? दिस थॉट इज सेल्फ डिस्ट्रक्टिव। जब ये अपने आप चलने लग जाता है। यानी थॉट थिंकिंग में कन्वर्ट हो जाता है। फिर थिंकिंग ओवरथिंकिंग में कन्वर्ट हो जाती है। फिर जितना फिजिकल स्ट्रेस, उतना ही साइकोलॉजिकल स्ट्रेस। जितना साइकोलॉजिकल स्ट्रेस, उतना ही फिजिकल बीमारियां। यह लूप बन जाता है।

अब इससे बाहर कैसे निकलोगे? क्योंकि सबके सेंटर में कौन बैठा है? आप, जो क्या कर रहे हो सुबह से रात तक? थॉट को कंट्रोल करने की कोशिश, जबकि करना क्या है? सिर्फ इस सच को देख लेना, यह सब अपने आप होता है। द मोमेंट यू अंडरस्टैंड दिस, तो आपका इंटरेस्ट इस सब में से खत्म हो जाता है। तो थॉट की पावर धीरे-धीरे खत्म होती चली जाती है। या यह कहो, जो थॉट ऑटो पायलट पर चलता है, अपने आप चलता है, यूजलेस है, किसी काम का नहीं है, वो सारे थॉट्स छूट जाते हैं। योर ब्रेन बिकम्स लाइक अ कंप्यूटर, जिसको अभी-अभी फॉर्मेट किया है।

उसी की बात यहां पर कर रहे हैं। जो पूरी तरह से खाली नहीं है। यानी कि यह नहीं है कि उसकी याददाश्त चली गई। ज्ञानी की। उसको कुछ भी याद नहीं है। क्योंकि अगर अष्टावक्र को कुछ भी याद नहीं होता, तो इतनी सारी बातें कैसे करते वो राजा जनक से? इसका मतलब सब कुछ याद है। लेकिन अंदर यह जो एडिक्टिव थिंकिंग है, नॉन-स्टॉप, यह नहीं चल रही है। सिस्टम ओवरलोडेड नहीं है। जैसी आप लोगों की हालत है, वैसी नहीं है ज्ञानी की हालत।

आप लोगों की कैसी है? अंदर एक साथ इतना कुछ चल रहा है, जहां पर कोई ऑर्डर नहीं है। कंप्लीट डिसऑर्डर है। एक थॉट का दूसरे थॉट के साथ में कोई कनेक्शन ही नहीं है। और हर थॉट अपने आप में या तो आपको डरा रहा है, या आपको एक्साइट कर रहा है। आज अभी एक थॉट, सेम थॉट आपको एक्साइट करता है, थोड़ी देर में डरा देता है। तो योर लाइफ इज लाइक अ रोलर कोस्टर।

ज्ञानी के साथ क्या होता है? ज्ञानी मतलब आत्मज्ञानी, जिसने खुद को जान लिया। आई हैव गॉट नथिंग टू डू विथ दिस थॉट। थॉट इज जस्ट फॉर द नेम सेक। एक्चुअल में उसकी कोई एग्जिस्टेंस है ही नहीं। आप तो बस इन बातों में उलझे पड़े हो कि वहां ये लिखा है, वहां वो लिखा है, उसने ये कह दिया, उसने वो कह दिया। अरे, सबका बेसिस क्या है? कुछ भी नहीं। आप इसको पानी कहो, मानी कहो, टानी कहो, जानी कहो, आत्मा कहो, अनात्मा कहो, क्या फर्क पड़ता है? बट आप लोगों को शब्दों से ही फर्क पड़ता है। तभी कहते हैं, शब्दों में बहुत ताकत है। सोच समझ करके यूज़ करो।

बट ये किसके लिए कहा गया है? ज्ञानी के लिए। अज्ञानी के लिए। यानी एक अज्ञानी की अगर लाइफ खराब करनी है, तो बहुत ही आसान है। उसको जा करके कुछ भी बोल दो। उसकी पूरी जिंदगी तहस-नहस हो जाएगी। यानी कि अगर मुझे आपकी लाइफ की धज्जियां उड़ानी है, कितना आसान है। रोज रात को आपके घर की बालकनी में, आप मेरे पड़ोसी हो और जो मेरे घर की पार्किंग है, वहां पर अपनी गाड़ी खड़ी करते हो और रोज मेरे से लड़ते हो। तो देखो कितना बढ़िया आईडिया है। रोज आपकी बालकनी में, थोड़े से कोई नाई के पास में गए, कुछ सफेद बाल, काले बाल ले आए। उसमें थोड़ा सा कुछ लाल सा कुछ छिड़क दिया और कुछ नींबू, मिर्च, ये वो, कुछ थोड़ा बहुत करके और उठा के रोज आपकी बालकनी में फेंक दिया। तो क्या होगा? आपका हाल। अपने अंदर क्या बोलोगे? इसको देख कर के हसोगे? यहां पर हंस रहे हो। नींदें उड़ जाएंगी। घर में 24 घंटे सबके माइंड में यही थॉट चलेगा।

और फिर जैसे ही कुछ आपकी लाइफ में होगा, और वो तो होगा ही। ऐसा कब होता है कि जब कुछ नहीं होता है? ऐसा कभी होता है कि जब सब कुछ सही होता है। और यहां पर एक ज्योतिष का रोल बहुत कमाल का है। यह एक ऐसा प्रोफेशन है जिसको एआई नहीं खा सकता। इनफैक्ट, जितना एआई बढ़ेगा, उतना ही यह प्रोफेशन बढ़ेगा, क्योंकि लोगों का अंधविश्वास बढ़ेगा। क्योंकि आप लोग किसी काम के नहीं रहोगे आने वाले टाइम में, तो करोगे क्या? आपको ये तो समझ आएगा नहीं कि ऐसा क्यों हो रहा है। नौकरी नहीं है, काम धंधा नहीं है, पैसा नहीं है, तो क्या करें? बताओ भाई साहब, क्या करें? तुम्हारा वक्त खराब चल रहा है। सभी का चल रहा है, इसमें नई बात क्या है? तुमने पैसा तो बहुत कमाया, लेकिन लेकिन हाथ में टिका नहीं। तुमने अपनी तरफ से सबके साथ अच्छा ही तो किया जिंदगी में। तुम्हारे साथ बुरा हुआ। तुम्हें हमेशा गलत लोग ही टकराते हैं। ये सब पे अप्लाई हो रहा है। मेहनत तो बहुत करते हो, लेकिन फल उतना नहीं मिलता है। कोई और तुम्हारे पीठ में छुरा घोंप कर के तुम्हारे भी हिस्से का सब कुछ ले जाता है। ऐसा हुआ तुम्हारे साथ? हां जी। हां जी। बिल्कुल हुआ। आपको कैसे पता? तुम्हारे ऊपर किसी ने कुछ कर दिया है। हां, वो मेरी बालकनी में मुझे था। कोई बात नहीं। अब तुम आ गए हो, सब ठीक हो जाएगा। यह है एक अज्ञानी का हाल।

ज्ञानी कैसा होता है? उसके सामने साक्षात। साक्षात मतलब साक्षात। कोई भूत भी आ जाए ना तो उसको हंसी आ जाएगी देख के। क्योंकि भूत होता ही नहीं है। आंधी आए, तूफान आए, भूचाल आए उसको कोई फर्क नहीं पड़ता।

ज्ञानी को फर्क उसको पड़ेगा जिसके लिए जिंदगी और मौत दो अलग-अलग चीजें हैं। उसके लिए तो एक ही है। कोई फर्क नहीं है। तो वो चीजें जो आपके लिए बहुत बड़ी है। उसके लिए वो सब है ही नहीं। सब झूठ है। उसको ऐसी बातें सुनकर के हंसी आती है। "तुमने मेरा नाम खराब कर दिया।" "नाम है आपका?" "हमारी इज्जत मिट्टी में मिला दी।" इज्जत कब से हो गई आपकी? कौन करता है आपकी इज्जत? मैंने तो कभी देखा नहीं किसी को आपकी इज्जत करते हुए। पीछे से तो सब आपकी बुराई करते हैं। ऐसा कौन सा आपने काम कर दिया कि आपकी इज्जत हो। समाज में व्हाटएवर दैट मींस।

तो उसके लिए सारे जो सीरियस टॉपिक्स है ना आप लोगों के वो उसके लिए मजाक है। आप लोगों की लाइफ की प्रॉब्लम्स की जड़ क्या है? सबसे बड़ी प्रॉब्लम तो है बच्चे। बच्चे हमारी बात नहीं मानते हैं। बच्चे वह नहीं करते हैं जो हम चाहते हैं। हमारे बच्चे ऐसे हैं। हमारे बच्चे वैसे हैं। अब चाहे आप बोलो मेरे बच्चे बहुत अच्छे हैं। चाहे कहो बहुत बुरे हैं। दोनों ही तरफ से प्रॉब्लम है। बुरे हैं तो दुखी हो रहे हो। अच्छे हैं तो बेचारा कोई अच्छा ऐसा तो नहीं है ना। परमानेंट उस पे ठप्पा लग गया अच्छे का। अच्छे को बुरा बनने में क्या देर लगती है? और वहीं बुरा लगता है। कह अरे ये तो निकम्मा था। तू तो अच्छी थी। तेरे को क्या हो गया? तेरे से उम्मीद ना थी हमें। ये तो है ही ऐसा।

तो आप लोगों के लिए जो टॉपिक्स बहुत सीरियस है वो ज्ञानी के लिए पता है कैसे है? मजाक। क्यों? क्योंकि वो जाग चुका है। उसको सब कुछ एज इट इज दिख रहा है। बिना किसी डर के। और आप लोग कैसे हो? जैसे कोई चूहा हो जिसने अपनी आंखें बंद कर ली और सोचा कि मैं बिल्ली को नहीं देख पा रहा। तो बिल्ली भी मुझे नहीं देख पा रही। जो ज्ञानी चूहा है वो आंखें खोल के देखेगा बिल्ली को। और फिर जो करना होगा वह अपने आप होगा। उसके जैसा सुखी कौन होगा? अर्थात जो विषयों में प्रवृत्त नहीं है। यानी जो भी कुछ है इस दुनिया में उसमें उसका कोई इंटरेस्ट नहीं है। है भी तो लाइक अ लाफिंग बुद्धा। बस देखता है और हंसता रहता है। और क्या करें? कोई एक्चुअल में प्रॉब्लम हो तो कुछ करे भी। कोई प्रॉब्लम है ही नहीं और बेवजह ही लोग परेशान हैं और बेवजह ही लोग दुखी हैं तो वो क्या करें तो उसके जैसा सुखी कौन होगा अर्थात जो विषयों में प्रवृत्त नहीं है मतलब उसका अभी जो बी सो कॉल्ड ह्यूमन मेड स्ट्रक्चर है सोसाइटी का उसके जो नॉर्म्स हैं जो भी सही और गलत है अच्छा है या बुरा है उस सब में उसका कोई इंटरेस्ट नहीं है इंक्लूडिंग बट नॉट लिमिट टू दिस वर्ड कॉल्ड स्पिरिचुअलिटी क्योंकि वह भी एक्चुअल में है कुछ और बट कुछ और ही बन गई है। दैट्स फाइन। वही इस संसार में सुखी है।

क्योंकि सुख क्या होता है और दुख क्या होता है? कभी सोचा है? एक होता है दर्द एक होता है दुख। दोनों में क्या फर्क है? दर्द हम सब में सेम होता है। अगर अभी पिन चुभोगे तो चाहे मैं हूं आप हो कोई भी हो। ज्ञानी अज्ञानी व्हाटएवर सबको ही दर्द होगा। दुख क्या होता है? क्या उसका कॉज सबके लिए सेम होता है या अलग-अलग होता है? कोई एक ही सिचुएशन में सुखी हो रहा है, कोई उसमें ही दुखी हो रहा है। कोई शादी करके सुखी हो रहा है, कोई डिवोर्स करके सुखी हो रहा है। है ना? कमाल। तो ये सुख क्या है और दुख क्या है? इंडल्जिंग इन थिंकिंग इज सफरिंग। ध्यान से सुनना। थिंकिंग के साथ में आइडेंटिफाइड हो जाना। यानी थिंकिंग में इनवॉल्व हो जाना। ही सफरिंग है। ही दुख है। बिना थिंकिंग के दुख कहां है? गहरी नींद में दुख होता है क्या? क्या होता है? गहरी नींद में क्या होता है? डीप स्लीप में क्या होता है? अच्छा, कुछ नहीं होता है। अरे गहरी नींद में परम सुख होता है। नॉट प्लेजर। प्लेजर तो टेंपरेरी है। आई एम टॉकिंग अबाउट हैप्पीनेस। हैप्पीनेस में और प्लेजर में फर्क है। प्लेजर के लिए दो का होना जरूरी है। मतलब कोई चीज होती है या कोई इंसान होता है जिसकी वजह से प्लेजर होता है या पेन होता है। नींद में क्या होता है? कौन सी चीज होती है? कौन सा इंसान होता है? तो जो किसी पर डिपेंड करे वह प्लेजर या पेन या दुख यह सब या तो किसी इंसान की वजह से होता है या किसी चीज की वजह से होता है। तो इट इज़ रिलेटिव बट नींद में क्या होता है? ना तो कोई चीज होती है ना इंसान होता है ना कोई एक्सपीरियंस होता है। कुछ भी नहीं होता सिवाय आपके। तो आपको सुखी नहीं होना है अंकल आंटीज। आप ही सुख हो। आप ही आनंद स्वरूप हो। जब भी आनंद होता है तब आप थिंकिंग से हट के खुद के पास में आ गए हो। यानी उस वक्त थिंकिंग नहीं है तभी सुख है। और जब थिंकिंग है तो या तो प्लेजर है या पेन है। और इन दोनों का ही जो एंड है वो दुख है। ये दोनों एक दूसरे के ऑोजिट है। इट्स लाइक टू साइड्स ऑफ द सेम कॉइन।

जितना पेन होता है उतना ही प्लेजर होता है। बिना पेन के प्लेजर नहीं होता है। जिसकी लाइफ में कोई पेन नहीं होता है उसकी लाइफ में प्लेजर भी नहीं होता है। भूख क्या है? प्यास क्या है? पेन जितनी भूख यानी जितना दर्द, जितनी प्यास, जितना दर्द, उतना ही मजा खाने में और पीने में। बिना भूखे खाओ, बिना प्यास के पियो, पानी में मजा है। पानी में भी इतना मजा है जिसकी कोई हद नहीं है। अगर कभी आपने फास्टिंग करी है तो खाने में इतना मजा है। यू डोंट नीड एक्सपेंसिव, लैविश फूड। कोई महंगा खाना नहीं चाहिए। और जब मैं ये कह रहा हूं, तो अपने एक्सपीरियंस के बेस पे कह रहा हूं। आई यूज्ड टू डू वाटर फास्ट फॉर से डेज, 10 डेज। मतलब 10 दिन तक सिर्फ पानी पी रहा हूं। कुछ नहीं खा रहा। 10 दिन बाद जब फास्ट तोड़ रहा हूं। उसका एक पूरा प्रोसेस होता है। आप लोग मत करने लग जाना। बिकॉज़ एक पूरी की पूरी साइंस है। उसको समझना होता है। और डॉक्टर्स के सुपरविजन में उसको करना होता है। या फिर आप खुद इतना डेप्थ में चले गए हो कि आप उसको खुद मैनेज कर सको। बिना उसके इट इज वेरी डेंजरस। मतलब पानी के सिवा और कुछ भी नहीं 10 दिन तक। तो जब आप उस फास्ट को तोड़ते हो तो आप खाना तो दूर की बात है। आप कुछ पी भी नहीं सकते हो। इन द सेंस जूस नहीं पी सकते हो। तो जूस को भी आपको डाइल्यूट करना होगा पानी के साथ में। तो मान लो ऑरेंज जूस से फास्ट तोड़ रहे हो। तो ऑरेंज जूस थोड़ा सा उसमें बाकी का पानी वो अगर अभी आप लोग पियोगे तो आप कहोगे ये क्या है? जूस में पानी मिला दिया। वो इतना टेस्टी लगता है। 10 दिन बाद जब हम वो पीते हैं लाइक हेवन।

आज पता है क्या हुआ है आप लोगों के साथ में? वो प्लेजर जो आपको ड्राइव करता था जानवरों को ड्राइव करता है। क्या प्लेजर? बट बहुत कुछ करने के बाद उनको वो प्लेजर मिलता है। आप लोगों को बिना कुछ करे मोबाइल के ऊपर हर कुछ सेकंड्स में प्लेजर मिलता है। बिना कुछ करे तो कुछ करोगे क्यों? फिर आपके क्वेश्चन होते हैं कि सर कुछ करने का मन नहीं करता है। करेगा क्यों? बिना करे ही प्लेजर मिल गया ना। नहीं मिला होता तो कुछ करते ना। खिलाने के लिए तो आपके मां-बाप बैठे ही हैं। कपड़े हैं ही पहनने के लिए। घर है ही। तो कुछ करोगे क्यों? तो प्लेजर भी बुरा नहीं है। अगर समझ करके उसको यूज किया जाए तो क्या कहा अष्टावक्र जी ने? वही इस संसार में सुखी है जो आलसी शिरोमणि है। नॉट आलसी एज इन जिसको आप आलस समझते हो। यानी कि बहुत खा लिया और फिर खा के सो गए। आलसी हो गए। नहीं कुछ भी कर सकते हैं, कुछ भी सोच सकते हैं। लेकिन सिर्फ तब जब जरूरत हो। और जरूरत तो बहुत कम होती है। आप जो भी सोचते हो वो सब काम का होता है क्या? उससे आपकी लाइफ बेटर होती है क्या? तो बस इतना सा ही फर्क है। ज्ञानी और अज्ञानी में। ज्ञानी के माइंड में फालतू का कुछ आता ही नहीं है। फालतू के कोई थॉट चलते ही नहीं है। मतलब क्या? कोई थॉट चलता ही नहीं है। तो जब थॉट नहीं होते तो दो नहीं होते ना।

इसी बात को भगवत गीता में बहुत अच्छे से डिस्क्राइब किया गया है कि जब यह जगत जागता है तब मुनि सोता है। और जब मुनि जागता है तो ये जगत सो जाता है। तो एक ऐसी रियलिटी है जिसकी तरफ ये दुनिया सोई हुई है। वो क्या है? सत्य है। भगवान ईश्वर उसकी तरफ आप लोग सो गए। आत्मा सोए हुए हो। पता ही नहीं। किसकी तरफ जागे हुए हो? भूतों की तरफ। भूत मतलब क्या? पास्ट, मेमोरी, थॉट। उसको बहुत सीरियसली लेते हो। उसकी तरफ मुनि सो गया है। क्योंकि वो है ही नहीं। भूतों की टोली उसके पीछे चल रही है। उसके सर पर नहीं चढ़ गई है। उसके कण-कण में सिर्फ सत्य है। कोई भूत नहीं है। भूत मतलब वो जो है ही नहीं। और सत्य मतलब वो जिसका नहीं होना पॉसिबल नहीं है। जिसके सिवा और कहीं कुछ नहीं है। जिसको मिटाने का कोई तरीका नहीं है। जो कभी भी ऐसा नहीं होता कि वो ना हो। उसका ना होना पॉसिबल नहीं है। और अगर तो यह सत्य कहीं दूर कहीं कुछ और होता जो आपसे अलग होता तो आपका तो पता नहीं मेरा इस सब में कोई इंटरेस्ट नहीं होता। वो सत्य आप ही हो। आप ही वो सत्य हो। तो वो ही सुखी है। सुखी है मतलब क्या? जिसकी बोलती बंद है। तभी तो सुखी होते हो या नहीं होते हो? बोल के सुखी हो सकते हो। होके दिखाओ। कोशिश करना आज यहां से जाने के बाद अपने अंदर कुछ ऐसा बोलना जिससे सुखी हो जाओ। जो भी बोलोगे जिसकी वजह से सुख हो रहा है जैसे उसकी एक अपोजिट साइड दिखेगी या उसके सच को देख लोगे तो दुखी हो जाओगे। और अगर और कुछ नहीं तो उसमें बहुत एफर्ट है। और ज्ञानी कैसा है? आलसी है। मतलब बिना एफर्ट के ही सुखी है। इसको सहज समाधि कहते हैं। बिना किसी मेडिटेशन के, बिना किसी टेक्निक के, बिना आंख बंद किए, बिना आंख खोले। जहां पर भी है, जिस भी हाल में है, जैसा भी है, वह सुखी है। यानी क्या बोलने के लिए कुछ है ही नहीं।

ऐसा होता है आप लोगों की लाइफ में या नहीं होता है। बट यह अनजाने में होता है। आप लोगों को पता नहीं है। कहीं नई जगह जाते हो एकदम से एक गंदे से शहर से निकल कर के जहां पर पोल्यूशन है, गंदगी है, कंक्रीट जंगल है। वहां से निकल कर के एकदम से एक खुले समुद्र के सामने चले गए या किसी पहाड़ पर चले गए। क्या होता है कुछ देर के लिए? बोलती बंद हो जाती है। इसको सुख कहते हैं। उस वक्त दो नहीं होते हैं। यानी आप और यूनिवर्स। उस वक्त आप खो जाते हो। जिसको सुख कहते हैं। लेकिन फिर कुछ देर बाद आप वापस आते हो। क्यों? क्योंकि आप कैसे हो? रावण के जैसे। एक सर काटोगे दूसरा आ जाएगा। दो काटोगे तीसरा आ जाएगा। मतलब क्या होता है? कुछ देर के लिए बोलती बंद होती है। फिर अंदर आप बोलते हो कितना मजा आ रहा है। सत्यानाश समझे क्या हुआ? द मोमेंट यू से कितना मजा आ रहा है। मजा आना बंद। क्योंकि अब आपको मजाक करना है। समझे दोनों में फर्क? नाउ यू वांट टू एंजॉय एंड दिस वांट कम्स इन बिटवीन यू एंड हैप्पीनेस। ये इन दोनों को अलग कर देती है। एक है खुशी एक हो आप। एक है वांट। आई वांट खुशी। आई वांट हैप्पीनेस। हैप्पीनेस बेटर लग रहा है सुनने में। खुशी ऐसा लग रहा है किसी लड़की का नाम है। और अगर लड़की का नाम है तब भी देखो कितना इंटरेस्टिंग है। नहीं वांट की वजह से ही तो दुखी है। आई वांट खुशी। बाद में पता लगा उस खुशी की वजह से ही दुख हो रहा है। नाउ आई डोंट वांट खुशी। क्या चल रहा है? तो एक ज्ञानी की ब्रेन बिल्कुल ऐसी होती है जैसे जो होता है दिखता है जो होता है सुनाई देता है उसकी वजह से कहीं कोई एक्चुअल में डेंजर होता है तो वो भी इमीडिएटली पर्सव हो जाता है उसके हिसाब से एक्शन हो जाता है।