📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

Badshah Or Do Bhaiyo Ka Hairat Angez Waqia || Sabaq Amoz Kahani || Moral Stories in Urdu & Hindi

VibeElevate51:05

Transcription

बहुत पुराने जमाने की बात है कि मुल्क बगदाद में एक बहुत मुफलिस और मोहताज, यानी गरीब आदमी रहता था। हर रोज जंगल में जाकर घास की गठरी बांधता था और उसे शहर में जाकर फ़रोख्त करता था। जो कुछ कीमत मिलती, उससे आटा दाल लेकर अपना और अपने बीवी बच्चों का पेट भरता था।

उसकी बीवी, जिसका नाम खातून था, निहायत हसीन और साहिबे जमाल थी। दोनों मियां बीवी की उम्रों में काफी फर्क था, मगर आपस में बहुत मोहब्बत थी। उसके दो बेटे थे। बड़े का नाम साद और छोटे का नाम शाहिद था।

एक रोज इमाद अपनी बीवी के पास बैठा हुआ अपनी गरीबी का जिक्र कर रहा था कि, "देखो, अब मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूं। ताकत ज्यादा मेहनत की नहीं रही मुझ में। कमजोरी की वजह से ज्यादा सख्त काम नहीं कर सकता और कुछ फरमाइश हमारे पास नहीं। कोई जमा पूंजी नहीं, वरना मुझे शेफ इस बात का कि जंगल से घास काट कर लाऊं और शहर में फरोखत करूं। कोई और ऐसा फन याद नहीं जिसके जरिए मैं अपना गुजर बसर कर सकूं। तुम लोगों के लिए रोजी रोटी कमा सकूं। मुझे शब रोज इसी फिक्र में गुजरते हैं। अगर मैं अकेला होता तो कोई फिक्र की बात ना होती। किसी ना किसी तरह अपना पेट तो भर लेता। अगर किसी रोज खाना मुझे सर ना भी आता तो भूखा पड़ा रहता। मगर अल्लाह ताला ने मुझे बीवी और बच्चे दिए हैं और उनकी रोजी रोटी का फिक्र हराम होकर क्या करूं? बहुत गौर करता हूं। बजाहिर कोई ऐसी बात समझ में नहीं आती जिससे अपनी हालत दुरुस्त कर सकूं।"

औरत बेचारी अपने खविंद की यह बातें सुनकर रोने लगी और उससे कहा कि, "अगर मेरे लायका कोई काम हो तो मुझे कहो, मैं तुम्हारे बदले उसे कर लूंगी।"

तो फूल से भी ज्यादा नाजुक बदन है। तो उससे मुझे यह कहवा रहा है कि जब तक मेरे हाथपांव जलते हैं, मुझ में ताकत है। तुझे मेहनत और रंग में डालूं। बेहतर यह है कि सब्र इख्तियार करें। अल्लाह ताला बड़ा कारसाज है। कोई ना कोई सूरत ऐसी निकलेगी जो हमारे वहम गुमान में भी नहीं होगी।"

इन बातों को थोड़ा ही अरसा गुजरा था कि बरसात का मौसम आ गया। अब इमाद ने अपनी बीवी से कहा, "आजकल जंगल में घास बह कसरत पाई जाती है। मेरा इरादा है कि मैं एक गठरी तो रोज काट कर लेकर शहर में फरोख्त करता रहूं और एक गठरी घास की जमा करके दामन को में, जो एक बड़ा ही गार है, यानी पहाड़ी के दामन में एक बहुत बड़ा गार है, उसमें घास इकट्ठी करता जाऊं ताकि वह जकीरा घास का मौसम शर्मा में हमारे काम आए। क्योंकि मौसम सरमा में घास खूब कीमत पर बिकती है, महंगी बिकती है। उसे फरोख करूं। उससे मुझे एक मुकद्दर रकम हासिल हो जाएगी। और यह फायदा होगा कि मौसम शरमा में जब सर्दी की शिद्दत बहुत होती है, मुझे जंगल में जाना और दिन भर घास काटने की दशावारी होती है और सर्दी से मेरे बूढ़े बदन को तकलीफ पहुंचती है। बस अगर ऐसा कभी दफा हो कि मैं उन दिनों में एक दो रोज ना जा सकूं तो हम भूखे ना मरे।"

उसकी बीवी ने कहा, "तुम्हारी राय बहुत दुरुस्त है और तुमने बड़ी दानिशमंदी और अकल की बात की है। जरूर इस पर अमल करना मुनासिब है।"

चुनांचे इमाद ने इस पर अमल किया। बरसात के चार महीनों में इस कदर घास इकट्ठी कर ली कि गार घास से ऊपर तक भर गया। जब बरसात का मौसम गुजर गया और सर्दी शिद्दत से पड़ने लगी तो एक रोज इमाद ने इरादा किया कि गार पर जाकर घास उठाकर फरोख्त कर दे। शहर में ले जाकर उसे बेच डाले। यह सोचकर जिस दिन धूप जरा तेज निकली, वहां जाकर देखा तो बड़ा हैरान हुआ और बहुत परेशान हुआ क्योंकि वह सारी घास जल चुकी थी। वह घास फूंक कर खाक हो गई थी।

जब पहुंचा तो यह हाल देखकर सख्त घबराया और नोहा की हालत दिल पर ऐसी तारी हुई कि एक सरद आह भर कर बेहोश हो गया। जब थोड़ी देर के बाद होश आया तो रोता हुआ गार्ड तक पहुंचा और अंदर दाखिल हुआ तो देखा कि बड़े-बड़े टुकड़े किसी सफेद चीज के, जिनकी रंगत और सूरत चांदी के मुशाबेह थी, अंदर पड़े हुए थे। जब उसने गौर से देखा तो उसे कुछ शक ना रहा कि वह चांदी के टुकड़े हैं। सबब यह था कि गार में एक चांदी की कान थी। जब सौदागर के काफिले ने घास में आग लगा दी तो घास की तपश से चांदी पिघलकर बड़े टुकड़ों की सूरत में मुंजमिद हो गई।

इमाद यह नेमत देखकर जो अचानक उस पर वारिद हुई थी, बहुत खुश हुआ और गार के अंदर जाकर उन सब टुकड़ों को उठा लिया और जितने अपनी गठरी में भर सकता था, उन्हें बांध दिया और उसके अर्धगिर्द जो बिखरी हुई घास थी, उन्हें उसके ऊपर रख दिया। यानी बाकी चांदी को छुपा दिया। अपने घर ले आया और तमाम माजरा अपनी बीवी से बयान किया। उस रात उन दोनों मियां बीवी को खुशी के मारे नींद ना आई। बीवी भी खुश होकर उससे बातें करती रही कि इस इतनी बड़ी दौलत से हम मकान खरीदेंगे और सौदागरी करेंगे।

दूसरी सुबह वह लेकर बाजार में गया और सोनार के हाथ उन्हें फरोख्त किया और सिक्के अपने घर ले आया। यानी जितनी दौलत उस वक के मुताबिक उन चांदी के टुकड़ों के बदले मिली, वह घर ले आया और सब सामान अपना दुरुस्त करके एक आलीशान मकान अपने रहने के वास्ते बनाया। बहुत से मकान खरीदे और फिर सौदागरी करने लगा। उनके दिन फिर गए और अपने दोनों लड़कों को मकतब में तहसील इल्म के वास्ते भिजवा दिया। उनकी जिंदगी बड़े ऐश व इशरत से गुजरने लगी। बड़े अमीराना तरीके से वह जिंदगी गुजरने लगे।

एक रोज का जिक्र है कि जुम्मे की नमाज पढ़कर जामे मस्जिद से अपने घर को आ रहा था कि रास्ते में देखा एक चिड़िया मार, यानी परिंदे बचने वाला खड़ा है और उसने पिंजरे में एक बड़ा खूबसूरत परिंदा, यानी नादिर मुर्गा कैद कर रखा है, जो फरोख्त कर रहा है। इमाद को वह परिंदा नवा मुर्गा इतना खूबसूरत मालूम हुआ कि उसने दिल में ख्याल किया कि यह खूबसूरत मुर्गा सद और शाहिद, यानी अपने बेटों के लिए खेलने के लिए घर ले जाऊं। वह देखकर बहुत खुश होंगे। बस उसकी कईमत अदा की उस परिंदे बचने वाले को और उससे वह जानवर खरीद लिया और उसे अपने घर ले आया।

सहद और शाहिद उसके बेटे जब अपने मकतब से पढ़ लिखकर वापस घर में आए तो उस मुर्गा नाम परिंदे को देखकर निहायत खुश हुए और शाम तक उससे खेलते रहे। जब रात हुई तो उसको पिंजरे में बंद करके सो गए। वह मुर्गा नामक परिंदा बड़ा खूबसूरत था और बड़ा ही कीमती था। मगर कोई उसको सख्त नहीं कर सकता था। वह बड़ा ही बाबरकत और कीमती परिंदा था और उसकी खासियत यह थी कि उसके अंडे को अगर लोहे पर लगाया जाता तो वह चांदी बन जाती और अगर पीतल पर लगाया जाता तो पीतल सोना बन जाता और जो उस मुर्गा का सीना और बाजू खा लेता, उसको बादशाहत नसीब होती और जो उसका सर खा लेता, उसके सराहाने हर रोज हजार दीार मौजूद होते।

दूसरे रोज जब इमाद के बेटे परिंदे के अंडे से बिल्कुल ठंडे को लड़के पिंजरे से निकालकर खुश होते हुए अपने बाप के पास ले गए। इमाद उसको देखकर बहुत हैरान हुआ और उसको अपने हाथ में लिए हुए मस्जिद में नमाज पढ़ने चला गया। नमाज पढ़कर जब घर को वापस आ रहा था तो उसको अपने मकान के करीब शमून यहूदी नजर आया। उसकी दुकान जहरी की थी। वह जहरी का काम करता था शहर में और इमाद का पड़ोसी था। उसने अंडा इमाद के हाथ में देखा तो फौरन उसको पहचान लिया कि यह उसी कीमती परिंदे नामुर्ग का अंडा है। हैरान हुआ कि इमाद के हाथ में ऐसी नायाब चीज कैसे आ गई? यह तो किसी बादशाह के खजाने में भी नहीं मिलती। यह कैसे उसे मिल गई और अपने दिल में ख्याल किया कि इमाद को इस अंडे की असलियत मालूम नहीं। वरना ऐसी बेइज्जती और लापरवाही से उसको हाथ में लिए बाजार में ना फिर रहा होता। अजब नहीं कि मुर्ग उसके घर में हो। मुझे कोशिश करनी चाहिए कि जिस तरह भी हो सके, उससे वह बाबरकत परिंदा मुर्गर परिंदा उसके हाथ से छीन लूं।

यह मंसूबा अपने दिल में बांधकर शमून यहूदी इमाद के पास आया और निहायत खंदा पेशानी और एहतराम से उससे कहने लगा, "आपको मेरे पड़ोस में आए हुए कितने रोज हुए हैं। मगर अब तक मुझे आपसे मुलाकात का मौका ना मिल सका। अगर आपको तकलीफ ना हो तो मेरे गरीब खाने पर एक लम्हे के लिए तशरीफ लाएं और मुझे शरफ बख्शे।"

इमाद ने उसकी मोहब्बत भरी दावत कबूल कर ली और उसकी खुशी मंजूर की और शमून के साथ उसके मकान पर गया। शमून ने उसकी बड़ी खातिर तवाजो की और बड़ी इज्जत करामत से पेश आया। फिर बातोंबातों में उससे पूछा कि, "आपके हाथ में यह क्या है?"

इमाद ने अंडा अपने हाथ से जमीन पर शमून के सामने रख दिया और कहा, "साहिब, मैं उसको बेचता हूं। उसकी कीमत क्या पूछते हो? जो आप देना मंजूर हो, वह दे दें। अब जो खुशी से देंगे, मैं ले लूंगा।"

शमून ने कहा, "मेरे साथ मजाक कर रहे हैं। यह तो एक अंडा है और मुझे आजमा रहे हैं।" मुस्त थीला हजार दीनार की उठाकर शमून की तरफ रख दी और कहा, "अरे भाई, तुम्हारी अभी उम्र 30 साल की है और मैं 80 बरस का बूढ़ा हूं। तुम्हारी शायद यह बात नहीं कि तुम मेरे साथ मजाका करो। अपनी थी उठा लो। क्या भला मैं इस अंडे को फरोख्त करता हूं।"

शमून के दिल में ख्याल आया कि हो सकता है शायद मैं गलती पर हूं और यह इमाद इस अंडे की खासियत से वाकिफ है, जो उसे हजार दीार में फरोख्त नहीं करता। यह सोचकर शमून ने इमाद से कहा, "ए बुजुर्ग, हकीकत में मुझसे गलती हुई कि मैंने इसकी थोड़ी कीमत आपको दी। अब मुझे लगता है कि अंडा बहुत नायाब है। आप मुआफ कीजिए। मैं आपको 12,000 दीनार और तीन गुलाम, जो हर एक कीमत 10,000 की कीमत के बराबर है, आपको इस अंडे के एवज देता हूं।"

इमाद ने कहा, "ठीक है, बहुत अच्छा, मुझे मंजूर है।" शमून ने 12,000 दीनार और तीन कीमती गुलाम उसको दिए और अंडा उससे ले लिया।

अब इमाद यह बड़ी कसीर रकम लेकर खुशियों खर्मियों अपने घर आया और अपनी बीवी से सारा हाल बयान किया। मगर उसे कहा कि, "हमें सब बात से होशियार हो जाना चाहिए। क्योंकि शमून यहूदी है। ऐसा ना हो कि कोई फरेब करे, हमें किसी मुसीबत में फंसा दे।" बीवी ने कहा, "तुम मेरी तरफ से हौसला रखो। मैं इस राज को किसी पर आशिकार नहीं करूंगी। बड़ी होशियारी और एहतियात से काम करूंगी।"

दूसरे दिन उस बाबरकत मुर्गा परिंदे ने फिर अंडा दिया और इमाद ने पहले रोज की तरह उसको कहा। एक रोज उसके दिल में ख्याल आया कि, "यह क्या बात है कि शमून जहरी जैसा होशियार और चालाक दुकानदार इस कदर कीमत पर यह अंडे खरीद कर क्या करता है? जरूर इसमें कोई अजीब व गरीब बात है, जो मुझे मालूम नहीं। वह तो बड़ा ही मक्कार आदमी है। मुझे इतनी ज्यादा कीमत क्यों देता है?" यह सोचकर अंडे हाथ फरोख्त करने रोक दिए। अब उसको वह नहीं देता था और उनको अपने पास जमा करता रहा।

शमून इस बात पर बड़ा फिक्रमंद हुआ और इरादा किया कि किसी तरह से यह पता करे कि इमाद के पास यह बाबरकत परिंदा मुर्गा आया कहां से और यह है भी उसके पास या नहीं। आखिरकार उसने एक औरत को, जिसका नाम दाला था, उसको बुलाया और इमाद के घर भेजा और उसको मुर्गा सादत के बारे में सारी मालूमात हासिल करने की हिदायत की। शमहून यहूदी ने उसे पता लगाने के लिए भेजा था। इस किस्म का मुर्गा नाम परिंदा जानवर इमाद के घर में मौजूद है और उसके बेटे सद और शाहिद उससे खेल रहे हैं। बस उसने वापस आकर शमून यहूदी को सारा हाल बयान किया।

शमून यहूदी ने अपने दिल में सोचा कि कोई तदबीर वहां से निकालने की करनी चाहिए। सोचते-सचते उसके दिल में ख्याल आया कि इमाद की बीवी, जो उससे ज्यादा जवान और खूबसूरत थी, उस पर किसी हिकमत से हाथ डाला जाए। इस औरत के साथ अपनी उल्फत और मोहब्बत और दोस्ती पैदा करनी चाहिए। इसी तरीके से उस मुर्गे को वहां से हासिल किया जा सकता है। यह सोचते ही उसने फिर उसी औरत को बुलाया और उसको बहुत सा इनाम वरा और दीनार देने का वादा किया। उसे लालच दिया और कहा कि इमाद की बीवी के पास जाओ और उसे किसी तरह बहका कर मेरे पास ले आओ।

उस मकान औरत ने इमाद के घर में पहुंचकर उसकी बीवी को शमून की हसन व जवानी की तारीफ में ऐसीऐसी बातें की कि वह औरत शमून के घर जाने को तैयार हो गई और उसी रोज यहूदी के घर पर जा पहुंची। उसे जवान मर्द को खूबसूरत और ताकतवर देखकर फौरन उस पर आशिक हो गई और अपने बूढ़े शौहर से दिल हटा लिया। वह शमून को दिल ही दिल में चाहने लगी। हाथ के रहने रसम इस तरह भारी कि शमून को अपने घर पर भी बुलाने लगी। शमून के साथ उसकी मोहब्बत इस कदर बढ़ गई कि वह अपने शौहर इमाद की गैर मौजूदगी में शमून को अपने घर पर भी बुलाने लगी।

उधर जब से शमून ने देखा कि इमाद की बीवी बिल्कुल उसके काबू में आ गई है। उसकी मोहब्बत के जाल में इस कदर फंस चुकी है कि वह उसके बगैर रह नहीं सकती, तो शमून ने एकदम उस औरत के पास जाना छोड़ दिया। जब एक हफ्ता गुजर गया और शमून उसके घर ना आया तो बेचैन हो गई और उसी औरत को बुलाकर अपने दिल का हाल और शमून की जुदाई उससे बयान की। अपने सदमे रंज और दुख का वाकया उसको बयान किया और कहा कि मुझे मालूम नहीं कि मुझसे ऐसी क्या गलती हुई कि शमून मुझसे नाराज हो गया। तो जिस तरह मुमकिन हो सके, उसको समझाकर मेरे पास ले आ और उससे पूछ कि ऐसी क्या खता हुई मुझसे, जिसके बाईस एकदम उसने मेरे पास आना छोड़ दिया। मैं उसके वास्ते अपनी जान तक सब कुछ हाजिर कर सकती हूं। किसी बात से इंकार नहीं कर सकती।

उसी औरत ने शमून के पास जाकर उससे तमाम हाल बयान किया और कहने लगी, "इमाद की बीवी तुम्हारी मोहब्बत में मर रही है।" शमून ने कहा कि, "मुझको कोई शिकायत उस औरत दिलरुबा से नहीं। फकत उसकी मोहब्बत और वफादारी की आजमाइश के वास्ते मैंने यह किया कि उसके पास जाना छोड़ दिया। मैं उसे आजमाना चाहता हूं। तुम जाकर उसे हर तरह से तसल्ली दो और कहो कि शमून भी तुम्हें उसी तरह चाहता है और मेरी तरफ से उसे फरमाइश करो कि जो मुर्गा सादत, यानी वह बाबरकत मुर्गा परिंदा उसके पास है, उसका गोश्त निहायत लजीज और मजेदार है, मगर यह मुर्गा बहुत कम मिलता है। मेरा दिल चाहता है कि मैं उस मुर्गा का गोश्त खाऊं। वह गोश्त उसका तैयार करके रखे। मैं आज सुपर को जरूर उसके पास आऊंगा।"

उस औरत ने बीवी से सारा हाल कहा। उसने कहा, "बहुत अच्छा।" इमाद की बीवी इश्क में इतनी पागल हो गई थी कि उसकी अकल पर पर्दा पड़ गया। उसने कहा कि, "इस मुर्ग की हकीकत ही क्या है? उसकी हैसियत क्या है? मेरी मोहब्बत के आगे। मेरी जान भी मांगे तो हाजिर है।" यह कहकर उसने उसी वक्त उस मुर्ग को हलाल किया। यानी ज़बाह कर दिया। और उसके चंद किस्म के लजीज खाने तैयार करके अपने घर में रख दिए। और फिर उस औरत को बलाकर कहा कि शमून को यहां पर बला कर लाओ। मैंने उसकी फरमाइश पर इस मुर्गा को ज़बाह कर दिया है और उसका खाना तैयार किया है।

उसी असना में उसके बेटे सद और शाहिद मकतब से पढ़कर वापस आ गए और मां को उस औरत के साथ बातों में मशगूल देखकर मकान के अंदर चले गए। उन्होंने किताबें रखकर अपनी मां से खाना मांगा। मां ने कहा, "थोड़ा सब्र करो, अभी देती हूं।" इतने में उन दोनों भाइयों को कई तरह के खाने दस्तर ख्वान पर चने हुए नजर आए। उनकी भूख बहुत भड़क उठी और वह दोनों भाई बेतल्लुफ होकर खाने में मशगूल हो गए। सद ने मुर्ग सादत का सीना और बाजू खा लिया और शाहिद के हिस्से में उसका सर आया। फिर खाने से फरग होकर दोबारा अपनी किताबें संभाली और मकतब को चले गए।

खातून की तरफ से पैगाम दिया और कहा कि, "तुम्हारी फरमाइश पर तुम्हारी महबूबा ने खाना तैयार कर रखा है।" और शमून उसी वक्त के मकान पर आया। मुफी मांगने लगा और कहा, "मैं तुम्हारी मोहब्बत और वफादार का कमाल ममनून और शुक्रगुजार हूं और निहायत शर्मिंदा हूं कि मैंने खामी खान तुम्हें इतना तड़पाया।" अगर थोड़ी देर तक उसी तरह मोहब्बत और गले शिकवे की बातें होती रही। फिर शमून ने कहा कि, "वह मुर्गा जो तुमने तैयार किया है या नहीं।"

खातून ने कहा, "भला मुझसे ऐसा हो सकता है कि आपकी फरमाइश को मैं रद्द कर दूं। आप मुझे कोई काम करने का हुक्म दें और मैं आपकी बात को टाल दूं। आप यहां तशरीफ रखिए। मैं अभी वह खाना लेकर आती हूं।" यह कहकर खातून मकान के अंदर गई और जहां खाना रखा हुआ था, वहां जाकर देखा तो बड़ी हैरान हुई और परेशान भी कि मुर्गा तो उसके दोनों बेटे खा गए हैं।

खातून इस बात से निहायत शर्मिंदा हुई और वापस आकर शमून से बयान किया कि वह मुर्गा उसके दोनों बेटे खा गए हैं। शमून सुनकर गुस्से से उठ खड़ा हुआ और खातून की तरफ गुस्से की निगाहों से देखकर कहा कि, "तू अजीब नालायक और झूठी औरत है। क्या तुमने अपने निकट मुझे ऐसा बेवकूफ समझा कि मैं तेरे जाल में आ जाऊंगा? यह किस तरह मुमकिन है कि इतनी थोड़ी सी देर में मुर्गाब हो जाए। यह सब तेरी चालाकी है। याद रखना कि मैं तुझको इस तेरी हरकत की ऐसी सजा दूंगा कि तू सारी उम्र ना बोल पाएगी।"

खातून बेचारी दम ब खुद खड़ी यह बातें सुनती रही और उसकी जुर्रत ना हुई कि कुछ जवाब दे सके। मगर जब शमून ने अपनी रवानगी के लिए कदम दरवाजे से बाहर रखा तो खातून ने जज्बा इश्क और जोर से उससे लिपट पड़ी। उसके कदमों में गिर पड़ी और रो-रो कर कहने लगी, "मैं सख्त बदनसीब हूं कि नाकरदा गुनाहों की सजा मुझे मिली। ना हक तुम मुझ में पर गुस्सा हुए और तुम्हारे जाल में गई। मैं कसम खाकर कहती हूं कि इसमें मेरा बिल्कुल कोई कसूर नहीं है। यह बात इत्तफाकी तौर पर जरूर में आई है। आप नाराज ना हो। इसके अलावा कुछ और हो तो फरमाइए, मैं आपका हुक्म बजा लाऊंगी।"

शमून ने कहा कि, "तुम अपने बेटों का पेट चाक करो और उस मुर्ग के सीना सर बाजू को उसमें से निकालकर मेरे हवाले कर दो। अगर तुम्हें इसमें कुछ हार है तो मैं अपने घर पर खुश हूं और मैं तुम्हारी सूरत देखने का राहदार भी नहीं हऊंगा। बल्कि तुम्हारी शरारत और बेदर्दी का तुमसे किसी ना किसी तरह ऐसा बदला लूंगा कि तुम याद रखोगी।"

खातून, जो उसके इश्क में दीवानी हो चुकी थी, कहने लगी, "साहिब, मुझे इसमें भी कोई आर नहीं कि मैं तुम्हारी खातिर अपने मासूम बच्चों को ज़बा कर दूं। मगर यह तो गौर कीजिए, क्या मुर्गा के वह हिस्से अब तक सही सलामत ही होंगे, जो उनके पेट में से निकल सके।"

शमून कहने लगा, "तुम्हें मालूम नहीं पागल औरत, इस मुर्गे के अज्जा कभी भी हजम नहीं होते। हमेशा अपनी असली हालत में कायम रहते हैं।"

खातून कहने लगी, "बेहतर है, मैं तुम्हारी फरमाइश के मुताबिक अमल करूंगी।" अल्लाह की कदरत से उसी वक्त सद और शाहिद मकतब से आकर बराबर के मकान में बैठे खेल रहे थे और अपनी अमाओं की सब बातें उन्होंने सुन ली। वह दोनों बहुत ही परेशान और घबराए हुए और आपस में सलाह की कि अब हमें यहां से निकलना चाहिए। यहां से निकलकर जिस तरह हो अपनी जान बचाएं। यह कहकर वह दोनों छुपकर मकान से निकल आए और शहर से बाहर जाकर जंगल की तरफ भागने लगे।

तीन रोज तक हैरान और सरगर्दा फिरते रहे। चौथे रोज फिरते फिरते एक मकाम पर जा पहुंचे, जहां दो रास्ते जाते थे और दरमियान में एक पत्थर नसब था और उस पत्थर पर लिखा हुआ था, "जो शख्स अपने दाएं हाथ को जाएगा, तो वापस ना आएगा और जो बाएं हाथ को जाएगा, तौबा है कि वह वापस आ सके।"

दिल में इस तहरीर को पढ़कर बड़ा तज्जुब हुआ और कहने लगे, "यह अम्र जरूर आजमाना चाहिए कि जरूर अल्लाह ताला ने हमारे वास्ते कोई बेहतरीन बात निकाली है कि हमें इस मौके पर भेज दिया।" बस दोनों भाई गले लगकर रोए और फिर जुदा होकर सद दाएं रास्ते और शाहिद बाएं रास्ते चुपचाप रवाना हो गए।

अब हम सद का किस्सा बयान करते हैं, जो सीधे हाथ की तरफ रवाना हुआ था। उसने चंद कोस चलकर थोड़े फासले पर एक सराय में रात को कयाम किया। दूसरी रोज उथल सुबह जाकर दोबारा रवाना हो गया। थोड़ी दूर आगे चलता के सामने उसको शहर नजर आया। वह शहर

की ओर हो लिया और देखा कि शहर के दरवाज़े पर एक बहुत बड़ा हुजूम जमा है। बहुत से लोग खड़े हैं और बहुत से हाथी और घोड़े सवार और पैदल लोग खड़े हैं। जब साद दरवाज़े के करीब पहुँचा तो बहुत से अमीर और अकाबिर आगे बढ़कर उसके रूबरू आए और निहायत अदब से उसको सलाम किया। फिर एक बुजुर्ग ने उसके सामने आकर दस्त बस्ता अर्ज़ की, "हुज़ूर की सवारी पर चलना पसंद है।" घोड़े पर सवार होते ही वह तमाम जुलूस सवार और पैदल शहर में क़िले की तरफ़ बढ़कर सब हाज़िर हुए। दरबार में उसके सामने खड़े हो गए।

फिर दरबार बर्खास्त हुआ और साद को खादिमों ने आस्तक पर बिठाकर महल सुल्ताना ले गए। वहाँ पर सबने उसकी ताज़ीम की और फिर उसको हम्माम में ले जाकर नहलाया गया और कीमती और साफ़-सुथरे लिबास पहनाए गए। उसी शान से ख़ास तैयार होकर आया। सैकड़ों किस्म के लज़ीज़ खाने लाए गए। उसने खूब पेट भरकर खाना تناول किया यानी खाना खाया और फिर अल्लाह के हुज़ूर सजदा अदा किया। फिर उसके बाद एक निहायत आरामदेह और कीमती पलंग पर आराम किया और अपने दिल में कहता था कि, "हे इलाही, यह क्या माजरा है? कुछ समझ में नहीं आता कि वह लोग मुझे यहाँ शान और शौकत से क्यों लाए हैं और इस क़दर मेरी ख़ातिरदारी और एहतराम क्यों करते हैं?"

थोड़ी देर के बाद साद ने एक खादिम को हाज़िर किया, "जो सबसे पहले मेरे पास आया था, उसको मेरे सामने लाया जाए।" उसके हुक्म के मुताबिक उन बुजुर्ग को लाया गया। साद ने उन बुजुर्ग से पूछा, "ऐ मर्द, तुम कौन हो और मेरे साथ ऐसा सुलूक क्यों पेश आ रहे हो?" उसने दस्त बस्ता अर्ज़ की कि, "जहाँपनाह, आप हमारे बादशाह हैं और हम सब आपकी रियाया और फ़रमानबरदार हैं और कमतरीन आपके मुमताज़ हैं और आपका ताबेदार और जान निसार हैं।"

साद जो कि अभी वैसा बच्चा ही था, लेकिन इन बातों को समझने की अक्ल नहीं रखता था, वज़ीर की तरफ़ मुख़ातिब होकर बोला, "साहिब, मुझको तुमने बादशाह क्यों बनाया है?" उसने अर्ज़ की, "हुज़ूर, असल हाल यह है कि चंद रोज़ हुए हमारे बादशाह सलामत ने वफ़ात पाई और उनकी कोई औलाद नहीं थी। इसी वास्ते सब अहलकार और वज़रा में आपस में इतना झगड़ा हो गया, मारपीट तक नौबत पहुँची, बहुत सा खून हुआ। अंजाम यह कि सब ने मिल बैठकर आपस में फ़ैसला किया कि इससे कुछ हासिल नहीं होगा। क्यों आपस में लड़ते-मरते हो? एक दूसरे को मारते हो? किसी शख्स को मुत्तफ़िक होकर तख़्त पर नहीं बिठाना चाहिए।"

"तो सबसे बेहतर तदबीर यह है कि एक रोज़ उठकर सुबह दरवाज़ा शहर पर चलो। शहर के मरकज़ी सदर दरवाज़े पर चलो और जो अजनबी शख्स सबसे पहली बार वहाँ पर आए उसको बादशाह मुक़र्रर कर लो।" यह बात सबको पसंद आई और सब इस बात पर राज़ी हो गए और मुत्तफ़िक होकर आज सुबह दरवाज़ा शहर पर जमा हुए और क्योंकि बादशाहत आपके नसीब में लिखी थी इसलिए सबसे पहले आपका ही गुज़र इस दरवाज़े से हुआ और सल्तनत आपके हवाले कर दी गई। "अब आप बादशाह बन गए। अब आप किसी तरह का वहम और अंदेशा दिल में ना लाएँ। बेफ़िक्री के साथ हुकूमत करें। हम सब आपके परवरदिगार नामक हार खूबी अंजाम देते रहेंगे। सल्तनत के कामों में आपका हाथ बटाएँगे।"

साद यह हाल सुनकर बहुत खुश हुआ और अपनी क़िस्मत पर अल्लाह का शुक्र अदा करने लगा। फिर वज़ीर से कहा कि, "मैं अभी नादान हूँ, ना तो तजुर्बाकार हूँ। जब तक मुझे सल्तनत के समझने की लियाक़त नहीं होगी तुम्हें मेरी तरफ़ से इख़्तियार होगा कि जो चाहो सो करो।" वज़ीर ने कहा कि, "आप हौसला रखिए, मैं सब संभाल लूँगा। फ़क़त आपकी इजाज़त हर काम में ले लिया करूँगा।"

चुनाँचे उस रोज़ सुबह के वक़्त दरबार मुनक़िद हुआ और साद के हुक्म के मुताबिक जो लोग झगड़ालू और बदमाश थे उन्हें गिरफ़्तार करके क़ैद किया गया और जो लोग साहिब हुनर और समझदार थे उनको इनाम और कीमती लिबास दिए गए और हर शख्स को उसके रुतबे और ज़हानत के मुताबिक जगह इंसाफ़ करने लगा।

उधर शाहिद जो दूसरे रास्ते पर रवाना हुआ था, शाम को एक शहर के करीब पहुँचा और दरवाज़ा शहर के सराय में वहाँ क़याम किया। रात वहाँ गुज़री। जब सुबह उठा तो अपने सिरहाने हज़ार दीनार की थैली रखी हुई मौजूद पाई। बड़ा हैरान हुआ कि यह इतनी बड़ी रक़म कहाँ से आ गई। अल्लाह का शुक्र अदा किया और थैली से चंद दीनार निकालकर अपने लिए एक खूबसूरत लिबास तैयार करवाया और दीगर ज़रूरी सामान खरीदा।

दूसरे रोज़ फिर जब बेदार हुआ तो उसी तरह हज़ार दीनार की थैली अपने सिरहाने पाई। जब कई रोज़ तक मुतवातिर यह बात आती रही तो शाहिद बेपरवाह हो गया और क्योंकि तबीयत माशा अल्लाह की जानिब थी तो उसने शहर में अपने हमउम्र बहुत से दोस्त बना लिए जो आवारा थे। उनके साथ रोज़ मिलते उनको बेफ़िक्री के साथ खर्च करने लगा। इस रक़म को नाच-गाने और खाने-पीने में उड़ाता। चंद रोज़ तक उसी हाल से इस शहर में आराम की ज़िंदगी गुज़ारता रहा। उसे मालूम नहीं कब रात हुई और कब दिन निकला। उसके निकट दिन ईद और रात शब-ए-बारात थी। क्योंकि रोज़ हज़ार दीनार की थैली मिलने से उसकी ज़िंदगी बहुत खुशगवार हो गई थी।

मुख़्तसर जब इस शहर के तमाशों से उसकी तबीयत भर गई तो उसने इरादा किया कि और शहरों की सैर की जाए। बस अपने दोस्तों को साथ लिया जिनकी तादाद चालीस थी, अपने साथ लिया और उनके साथ सैर करता हुआ और दुनिया का दाना-पानी खाता हुआ रवाना हुआ। चंद रोज़ के बाद उन बेफ़िक्रों का क़ाफ़िला शहर रूम में पहुँचा।

वहाँ उस शहर में उसी तरह उनके साथ दोस्त बनकर उनके साथ मिल गए और रात-दिन ऐश करते। वहाँ एक बहुत ही खूबसूरत सनम उसका नाम है। उस सनम के यहाँ तमाशाबीनों और आशिक़ों का जमघटा लगा रहता है। सब उस औरत के दीवाने हैं। वह औरत इतनी हसीन और खूबसूरत है कि उसके बहुत से चाहने वाले हैं। दूर-दूर से उस नाज़नीन के हुस्न-ओ-जमाल का चेहरा सुनकर शहज़ादे उसके हुस्न के क़ैदी बनकर आ जाते हैं।

शाहिद जो निहायत रात-दिन ऐश-ओ-इशरत में पड़ा रहता था और उन तमाशों में लगा रहता था, उसने जब यह बात सुनी तो बहुत खुश हुआ और अपने उन दोस्तों के साथ उस मक़ाम पर पहुँचा। देखा कि वहाँ एक बहुत अज़ीम शान इमारत बनी हुई है। जब इमारत के अंदर दाख़िल हुआ तो उसने देखा कि एक तख़्त पर वही नाज़नीन खूबसूरत लड़की जलवा फ़रमा बैठी हुई नज़र आई और तख़्त के गिर्द सैकड़ों नौजवान बैठे हुए जो उस नाज़नीन की शक्ल-सूरत देख रहे, उसके हुस्न को अपनी आँखों में समा रहे। जब शाहिद खुद वहाँ पहुँचा तो एक कनीज़ ने उसको देखा और कहा, "साहिब, तुमको मालूम है कि यह ख़ानक़ाह है और यह दफ़्तर। यह लड़की जो कि तख़्त पर जलवा अफ़रोज़ है उसका नाम सनम है। जो लोग तख़्त के इर्द-गिर्द बैठे हैं उसके इश्क़ में गिरफ़्तार होकर और अपनी दौलत और हुकूमत छोड़कर यहाँ आए हैं। इस लड़की सनम ने अपना क़ायदा कर रखा है कि जो शख्स एक साल तक 1000 दीनार रोज़ देगा उसके साथ शादी करेगी। अगर तुम में कोई ऐसा साहिब तौफ़ीक़ हो तो कोई मुज़ायका नहीं कि यहाँ तशरीफ़ रखो और अगर तुम 1000 दीनार रोज़ नहीं दे सकते तो अपने घर का रास्ता लो क्योंकि यह हज़ारों अमीर शहज़ादे जो अब तक आए हैं अब तक सनम की इस शर्त को कोई पूरा नहीं कर सका जिस क़दर ज़रूरी जौहर वह लाए हैं वह काफ़ी नहीं हो सका और अब बेकस रहते तमाम यहाँ पड़े हुए हैं।"

शाहिद यह बात सुनकर हँसा और कहा, "खूब जान निसार की भलाई मिली और मेरा सच्चा यार मिल गया। अल्लाह ताला ने इसलिए सनम को मेरे वास्ते पैदा किया है।" कनीज़ से कहा कि, "मैं इस खूबसूरत लड़की की शर्त इंशा अल्लाह ज़रूर पूरी करूँगा।" कनीज़ ने कहा, "बहुत अच्छा," और उसे लेकर सनम के सामने पेश किया। "मुबारक हो, यह जवान आपकी मोहब्बत में गिरफ़्तार होकर यहाँ आया है।" सनम ने शाहिद से पूछा कि, "तुमने मेरी शर्त सुनी है?" उसने कहा, "मैंने सुनी और खुदा ने चाहा तो बखूबी अपना अहद पूरा करूँगा।" सनम ने कहा, "बेहतर है आप यहाँ एक साल तक क़याम कीजिए और हर रोज़ हज़ार दीनार मुझे दिया करें। मगर यह याद रखें कि जिस रोज़ नहीं देंगे उसी रोज़ से मेरा आपका ताल्लुक़ ख़त्म हो जाएगा।"

शाहिद ने कहा, "बहुत खूब, मुझे मंज़ूर है।" फिर अपने यारों को 1000 दीनार देकर रुख़सत किया और बाक़ी दो हज़ार दीनार के करीब उसके पास बच गए। वह लेकर उस लड़की के पास उसी इमारत में रहने लगा। हर रोज़ सुबह होते ही सनम को हज़ार दीनार उसके हवाले करता और शव रोज़ साल का ऐसा ख़त्म होने पर आया तो उस चालाक खूबसूरत लड़की को छुटकारा हासिल करने की कोई तदबीर इस्तेमाल करनी चाहिए, वरना तमाम उम्र उसके साथ बंधकर गिरफ़्तार होकर रहना पड़ेगा।

और बड़ा ताज्जुब कि यह शख्स मेरे मकान से कहीं बाहर नहीं जाता और इस क़दर अमीर है कि और बराबर 1000 दीनार रोज़ मेरे हवाले करता जाता है। आख़िर उसके पास इतना रुपया कहाँ से आया? उसका सबब क्या है? और यह हज़ार दीनार उसके पास कहाँ से आते हैं? यह तो यहीं पर रहता है, कहीं आता-जाता भी नहीं। फिर हज़ार दीनार उसके पास कहाँ से पहुँच जाते हैं?

इस बाबरकत मुर्गा परिंदे की ख़ासियत का हाल सनम ने लोगों की ज़ुबानी सुन रखा था। पर उसके दिल में ख़्याल आया कि किसी तरह इस मुर्गा सादत का सर जो उसके पेट में मौजूद है उसे निकालना चाहिए। बस उसी वक़्त रात के वक़्त शाहिद की दावत की और शराब में एक बेहोशी की दवा मिलाकर वह शाहिद को पिला दी। शाहिद शराब पीकर मदहोश हो गया और दवा की तासीर से जो शराब में मिला रखी थी उसकी वजह से उल्टियाँ होने लगीं। उसके मुँह के आगे तश्त रख दिया। थोड़ी ही देर में उस मुर्गा सादत का सर शाहिद के मुँह से निकलकर तश्त में गिर पड़ा।

सनम ने फ़ौरन उसकी नज़र बचाकर उसे उठा लिया और पानी से धोकर ब-हिफ़ाज़त उसको अपने पास रखा। दूसरे रोज़ जब शाहिद बेदार हुआ तो हसब मामूल अपने सिरहाने हज़ार दीनार की थैली को तलाश करने लगा। जब थैली ना पाई तो सख़्त घबराया। थोड़ी देर में सनम ने अपना मुलाज़िम तलब किया ताकि वह हज़ार दीनार उसे लेकर आए। शाहिद के पास इनकार के अलावा कोई चारा ना था क्योंकि हज़ार दीनार उसके पास तो मौजूद नहीं थे। मुलाज़िम ने वापस जाकर सनम से हाल बयान किया।

सनम ने शाहिद को अपने रूबरू तलब किया और कहा, "तुम अपनी शर्त को पूरा करने में नाकाम रहे। अब मेरे साथ ज़िंदगी भर रहने की उम्मीद अपने दिल से निकाल दो और अपना रास्ता लो।" शाहिद निहायत परेशान होकर और उदास होकर ना चाहते हुए वहाँ से बाहर निकला और अपनी हालत और बेकसी पर रोता हुआ एक रास्ते पर चल पड़ा।

कई रोज़ तक अपनी मंज़िल ढूँढता रहा। आख़िरकार एक रोज़ उसका गुज़र एक बड़े शहर के करीब से हुआ। जब करीब पहुँचा और देखा कि दरवाज़ा शहर के बाहर तीन कम उम्र लड़के आपस में लड़ रहे हैं। उनके पास पहुँचा और बीच-बचाव कराकर उनको एक दूसरे से जुदा किया और उनसे पूछा कि, "तुम कौन हो और आपस में क्यों लड़ते हो?" उन्होंने कहा, "हम तीनों हक़ीक़ी भाई हैं। चंद रोज़ हुए कि हमारे माँ-बाप ने वफ़ात पाई और हमने उनका तुर्का आपस में तक़सीम कर लिया। मगर हमारे माँ-बाप के छोड़े हुए इस तुर्के में तीन चीज़ें ऐसी हैं कि हम तीनों भाई वह लेना चाहते हैं और इसी वजह से हमारे दरमियान कई रोज़ से लड़ाई चल रही है। आज हाथापाई तक नौबत आ गई है।"

"हमारे शहर का यह दस्तूर है कि अगर आपस में कोई लड़े तो कोई शख्स उनको नहीं छोड़ता, चाहे किसी की जान ही क्यों ना जाती रहे। इत्तेफ़ाक़ से तुम्हारा गुज़र हो गया और तुमने छुड़ा दिया, वरना शक नहीं किसी का खून हो जाता। अब हमारी भी बात यही है कि तुम हमारा फ़ैसला करो।"

शाहिद ने पूछा कि, "वह तीन चीज़ें क्या हैं जिस पर तुम्हारे दरमियान तकरार हो रही है?" तीनों भाइयों ने कहा, "आप यहाँ ज़रा रुकिए। हम उन चीज़ों को आपके पास ले आते हैं और जिस तरह फ़ैसला करेंगे हम तीनों को मंज़ूर होगा।"

यह कहकर वह तीनों भाई शहर में गए और अपने मकान से एक फटा हुआ टुकड़ा का कालीन और एक सांटा और एक सुरमादानी लाकर शाहिद के सामने रख दिया और कहा कि, "इन चीज़ों की वजह से हमारी लड़ाई है।" शाहिद ने कहा, "यह तीनों चीज़ें तो बड़ी बे-हैसियत मालूम होती हैं। बज़ाहिर तो इनकी कोई क़ीमत नज़र नहीं आती। एक फटा हुआ टुकड़ा है कालीन का और एक सांटा यानी डंडा और एक सुरमादानी। अगर इनके अंदर कोई ख़ासियत है तो बयान करो।"

हर भाई ने कहा कि, "तुम बड़े नादान हो। दरअसल यह चीज़ें देखने में बड़ी अदना नज़र आती हैं। मगर इनकी ख़ासियत बड़ी अजीब-ओ-ग़रीब है। जो फटा हुआ टुकड़ा का है उसकी तासीर यह है कि जो आदमी इस पर बैठकर हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम को याद करके उससे दरख़्वास्त करे कि मुझे फ़लाँ मकान पर पहुँचा दे, यह कालीन आन की आन में उसी वक़्त उसे वहाँ पहुँचा देगा। और इस डंडे की तासीर यह कि अगर इसको हाथ में लेकर ज़मीन पर मारा जाए और कहा जाए कि हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के वास्ते फ़लाँ चीज़ मुझे मिल जाए तो उसी वक़्त वह चीज़ उसके हाथ लग जाएगी।"

"और सुरमादानी का हाल यह है कि इसमें जो सुरमा भरा हुआ है जो शख्स इसको एक मर्तबा आँखों में लगाएगा वह हमेशा तमाम जानवरों की बोली समझने लगेगा और फिर जब इसको आँख में लगाए वह सबको देख सकेगा और खुद किसी को नज़र ना आएगा।"

"तुम मेरे कहने पर अमल करो तो मैं उसी वक़्त तुम्हारा फ़ैसला कर देता हूँ।" उन्होंने कहा, "फ़रमाइए।" शाहिद ने कहा, "मैं अपनी कमंद से तीन तीर तीन तरफ़ को छोड़ता हूँ, यानी कि तीन सिम्तों को मैं तीर छोड़ता हूँ। तुम तीनों भाई उनके पीछे दौड़ जाओ। तुम तीनों में से जो शख्स पहले मेरे पास वह तीर लेकर आएगा, यह तीनों चीज़ें उसी को मिल जाएँगी।"

इस बात पर वह तीनों राज़ी हो गए। शाहिद ने तीर कमंद से छोड़े। जिस वक़्त वह तीनों भाई तीरों के पीछे दौड़े, शाहिद ने एक सलाई सुरमे की अपनी आँख में लगाई, सांटा उठाया और सुरमादानी अपने हाथ में उठा ली और कालीन के टुकड़े पर बैठकर कहा कि, "हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के वास्ते मुझे रूम में सनम की इमारत के सामने ले जा।"

उसके कहने के मुताबिक कालीन ने परवाज़ शुरू की और शाहिद को एक लम्हे में उसी औरत यानी सनम के महल के सामने पहुँचा दिया। अब जब वह तीनों भाई तीर लेकर वापस पहुँचे तो देखा कि वहाँ ना शाहिद मौजूद है और ना ही उनकी वह चीज़ें मौजूद हैं। वह यह देखकर सख़्त घबराए और रोते-पीटते हसरतों-यास लेकर अपने घर चले गए।

सनम हसब दस्तूर अपने सैकड़ों नौजवान आशिक़ों के सामने तख़्त पर विराजमान है और ऐश-ओ-इशरत में मशगूल है। जब उसकी निगाह शाहिद पर पड़ी तो बड़ी हैरान हुई और पूछा कि, "तुम वापस कैसे आ गए?" शाहिद ने कहा कि, "तुम्हारे वास्ते हर रोज़ दीनार का बंदोबस्त फिर करके आया हूँ।" यह कहकर एक जानिब बैठ गया और उस डंडे को ज़मीन पर मारकर कहा कि, "हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के वास्ते मुझे हज़ार दीनार चाहिए।" यह कहते ही फ़ौरन थैली हज़ार दीनार की शाहिद के पास आ गई। शाहिद उसको लेकर सनम के पास पहुँचा और थैली उसके हाथ में दे दी और तमाम दिन उसके साथ हँसी-खुशी में गुज़ारा।

जब शाम का वक़्त आया तो शाहिद ने सनम से कहा कि, "मकान में हवा बंद है। चलो थोड़ी देर के लिए महल की छत पर जाकर बेरूनी हवा लें और सब्ज़ा देखें।" उसने कहा, "बहुत खूब।" दोनों छत पर पहुँचे। शाहिद ने उसे कालीन पर बैठा दिया और सनम को भी इस पर अपने बराबर बिठा लिया। थोड़ी देर तक दोनों में नोशी करते रहे, यानी शराब पीते रहे।

फिर शाहिद ने अपने दिल में कहा कि, "हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के वास्ते जज़ीरे पर पहुँचा दे।" यह कहते ही कालीन हवा में बुलंद हुआ और तमाम असबाब और सामान जो ज़रूरी था फ़ौरन मुहैया कर दिया। सनम अपने दिल में सख़्त रंजीदा कि, "यह क्या हुआ? तुमने मेरे साथ कमाल बेवफ़ाई की है। मगर मुझे तुम्हारे साथ सच्चा इश्क़ है। कोई फ़िक्र मत करो। मैं तुमको कोई नुक़सान या अज़ीयत नहीं पहुँचाऊँगी और कोई आफ़त-मुसीबत तुम तक नहीं लाऊँगी।"

सनम रोने लगी और कहा, "मुझे इस वीरान जज़ीरे में क्यों लाए हो?" शाहिद ने कहा, "मैं तो लाचार होकर तुमको यहाँ ले आया हूँ इस ख़ौफ़ से कि तुम अपने क़ानून के मुताबिक़ वही रहती तो फिर कोई ना कोई बहाना बनाकर मुझे पहले की तरह अपने महल से निकाल देती। अब यहाँ कोई और इंसान हमारे सिवा नहीं है और हम ऐश-ओ-इशरत और बेफ़िक्री के साथ अपनी ज़िंदगी यहाँ गुज़ारेंगे।"

मगर दिल में कहा कि, "अगर मेरा बस चला तो मैं तुझसे इस बात का बदला ज़रूर लूँगी।" वह हर रोज़ दिन-रात उसी फ़िक्र में रहने लगी कि किस तरीक़े से चीज़ तलब करने की तरकीब मालूम हो सके। मगर कोई बात समझ में ना आई।

आख़िरकार एक रोज़ सनम ने शाहिद के रूबरू रोना शुरू कर दिया और कहा, "तुम अजीब बेगुमान आदमी हो कि मेरी इस क़दर मोहब्बत के बावजूद जो मोहब्बत मैं दिली तौर पर तुमसे करती हूँ और फ़रमानबरदारी भी तुम्हारी करती हूँ, तुम्हारा दिल अब भी मेरी तरफ़ से साफ़ नहीं है। ऐसी हालत में मुझे अपनी ज़िंदगी का क्या लुत्फ़ है? इससे तो मौत हज़ार दर्जे बेहतर है। या तो तुम मेरी तरफ़ से अपना दिल साफ़ करके मुझ पर भरोसा करो, इत्मीनान करो वरना देख लेना कि एक दिन अपनी जान खो दूँगी।"

शाहिद इस लड़की से दिल से मोहब्बत करता था। उसकी उदासी देखकर खुद उसके करीब गया और बोला, "मेरी जान, तुम उदास मत हो। मैं तुम्हारा गुलाम हूँ। जो कुछ कहोगी, मैं उसी पर काम बंद रहूँगा। तुम्हारा हुक्म मानूँगा।" यह कहकर शाहिद ने अपने दामन से सनम के आँसू पोंछे और उसको अपने गले लगा लिया और फिर ऐश में मशगूल हो गए।

एक रोज़ जब कि सनम को शाहिद ने नशे में पाया तो उसे पूछने लगी कि, "यह कालीन तुम्हारे हाथ कहाँ से आया और क्या तरकीब है जिसके ज़रिए हवा में उड़ता है?" शाहिद ने कहा, "क्या फिर तुम्हें कोई शरारत तो नहीं की जो मुझसे इसको उड़ने का तरीक़ा जानना चाहती हो? तुम्हारा मतलब क्या है? तुम एक दफ़ा इस बाबरकत मुर्गा परिंदे का सर मुँह से छीन चुकी हो। अब इस कालीन पर भी तुम्हारी नज़र है क्या? तुम्हारी नीयत बुरी तो नहीं?"

सनम ने गुस्से से अपना चेहरा तर्श बना लिया और कहने लगी कि, "चंद रोज़ हुए कि तुम मुझे मोहब्बत कर चुके हो तो मैं मेरी वफ़ादारी में किसी तरह का शक-ओ-शुबहा नहीं है। मालूम हुआ कि तुमने ऊपर के दिल से यह बात कही थी। दरअसल तुम अब भी मुझ पर भरोसा नहीं करते। दिल से तुमने यह बात नहीं कही थी तो मैं अब तक मेरा ऐतबार बिल्कुल नहीं आया। वरना मेरी खुशी से तुम्हें क्या मतलब है? जब मैं ज़िंदा ही ना रहूँगी तो क्या करोगे? तन्हा किस तरह जिओगे और किसका दिल दुखा सकोगे?"

शाहिद यह बात सुनकर घबरा गया। कहीं अपनी जान ना गँवाए और सोचा कि क्या करूँ? अंजाम सनम दिलरुबा की सूरत उसके दिल पर असर कर गई और ब-खुशी उसके नाज़ुक लबों पर बोसा दिया और कहा, "तुम ज़रा सी बात पर ख़फ़ा हो जाती हो, आओ बैठो मैं तुमको सारा हाल इस कालीन का बताता हूँ।" यह कहकर उसने उसे बताया कि इस कलमा के कहने से यह कालीन हवा में परवाज़ करता है।

सनम इस बात को जानकर बहुत खुश हुई और शाहिद से हटकर कहने लगी कि, "यह नेमतें बेमिसाल जो हमें अल्लाह ताला ने करामत कर रखी हैं, दुनिया में किसी और को मुझे असर नहीं," और दिल में इस फ़िक्र में रहने लगी कि मौक़ा हाथ लगे तो शाहिद को तन्हा छोड़कर जल्द ही इस कालीन पर बैठकर वहाँ से उड़ जाए।

दूसरे रोज़ जब वह दोनों बेदार हुए तो सनम ने शाहिद से कहा कि, "मेरा दिल चाहता है कि सामने जो चश्मा है मैं उसमें जाकर नहाऊँ।" उसने कहा, "बेहतर है, चलो मैं भी नहाऊँगा।" यह कहकर वह दोनों चश्मा पर जो चंद क़दम के फ़ासले पर था पहुँचे तो सनम ने मालूम नहीं इस चश्मा में पानी किस क़दर है। "ऐसा ना हो कि मैं गहरे पानी में चली जाऊँ।"

शाहिद ने कहा, "तुम फ़िक्र मत करो, मुझे तैरना आता है। पहले मैं जाकर देखता हूँ कि पानी कितना गहरा है।" यह कहकर शाहिद ने अपने बदन से कपड़े उतारे और चश्मा में नहाने लगा।

यह मौक़ा पाते ही सनम फ़ौरन जाकर कालीन पर बैठी। डंडा और सुरमा अपने साथ रखा और कहा कि, "हज़रत सुलेमान अलैहिस्सलाम के वास्ते मुझे रूम में मेरे महल तक पहुँचा दे।" यह सुनते ही एकदम से कालीन हवा में बुलंद हुआ और फिर कालीन ने परवाज़ शुरू कर दी।

शाहिद ने जब यह हाल देखा तो अपना मुँह नोचने लगा और अपने तई करता हुआ चश्मे से निकला और कपड़े पहनकर दीवानावार चारों तरफ़ फिरता रहा। अब उसे अफ़सोस हो रहा था।

था कि उसने सनम पर भरोसा क्यों किया। जब शाम हुई तो जानवरों का खौफ होने लगा। इस वीरान जजीरे में उसे डर लगने लगा। वह दरख्तों के झुंड में जाकर और तमाम रात एक दरख्त पर बैठा रहा।

जब सुबह हुई तो देखा कि दरख्त [संगीत] पर बहुत से छोटे जानवर बैठे हुए उसके बारे में बात कर रहे थे। शाहिद ने, जो कि सुरमा अपनी आंखों में लगा रखा था, उसे जानवरों की जुबान समझ आती थी। उसने सुना कि एक जानवर कहता है कि मुझे इस नवजवान के हाल पर बड़ा रहम आता है। अगर यह शख्स इस दरख्त का पत्ता रखे अपने पास जिस पर यह [संगीत] बैठा हुआ है तो इस पत्ते की तासीर यह है कि अगर किसी पागल दीवाने के दिमाग पर इसको रख दिया जाए तो उसकी अकल दुरुस्त हो जाए।

दूसरा जानवर बोला, जिस दरख्त पर मैं बैठा हूं उसके पत्ते की खासियत यह है कि जिस इंसान को यह पत्ता सलाह दिया जाए, वह फौरन गधा बन जाए। तीसरे जानवर ने कहा, जिस दरख्त पर मैं बैठा हूं उसके पत्ते की खासियत यह है उसे इंसान को सलाह दिया जाए जो गधा बन गया हो फौरन अपनी असली सूरत में आ जाता है।

जब वह अजीब व गरीब जानवर यह बात करके दरख्त से उड़कर चले गए तो शाहिद ने तीनों दरख्तों के पत्ते तोड़कर उनको अलग-अलग एहतियात से अपने पास रख लिया। मगर हैरान था कि करूं तो क्या करूं और किस तरह इस वीरान जजीरे से बाहर निकलूं। इसी फिक्र में टहलता टहलता समुंदर के किनारे की तरफ चला।

दूर उसको किनारे पर एक बड़े कद का परिंदा नजर आया। उसको देखकर उसके दिल पर खौफ तारी हो गया। एक दरख्त की [संगीत] ओठ में खड़ा हो गया और चुप कर उसे देखने लगा। थोड़ी देर के बाद उसके दिल में ख्याल आया कि इस जजीरे से निकलने की और कोई सूरत नजर नहीं आती और यहां तन्हा बेसरो सामान्य के आलम में कब तक गुजर होगी। बेहतर यह कि इस परिंदे के पांव के साथ लिपट कर यहां से उड़ चलो। आइंदा जो कुछ तकदीर में लिखा है वह होकर रहेगा। पका इरादा अपने दिल में करके शाहिद उस परिंदे के पास चला गया। और जिस वक्त उस परिंदे ने परवाज शुरू की तो शाहिद ने दौड़कर उसका पांव पकड़ लिया।

परिंदे ने उसको अपने साथ लेकर चला और दिन भर परिंदा उड़ता रहा। लेकिन समुंदर को उबूर ना कर सका। जब शाम का वक्त हुआ तो जमीन नजर आई और परिंदा जमीन की तरफ और वहां परिंदा उतरा। शाहिद ने बड़ी फुर्ती से उसका पांव छोड़कर अपने आप को घास [संगीत] में छुपा लिया। जब वह परिंदा थोड़ी देर बाद वहां से उड़ गया, तो शाहिद उठकर एक जानिब चला मगर कहीं रास्ता मालूम नहीं था।

चार दिन उसी तरह बेकस से सहरा में इधर-उधर फिरता रहता, दरख्तों की जड़ और पत्तों से अपना पेट भरता और रात को कोई महफूज़ जगह देखकर वहीं सो रहता। उसी तरह कई रोज़ सहरा में इधर-उधर भटकता रहा। आखिर एक दिन उसको एक रास्ता नजर आया। वह उसी रास्ते पर चल पड़ा।

चार रोज के बाद उसको शहर दिखाई दिया और शहर में पहुंचा तो देखा कि वहां के सब लोग गमगीन और अफसुरदा हैं। उसने बाज आदमियों से हाल पूछा तो मालूम हुआ कि [संगीत] इस शहर के बादशाह के जिसका नाम हारून है एक निहायत खूबसूरत बेटी है। मगर चंद साल से दीवानी हो गई है। बहुत से हकीमों ने उसका इलाज किया मगर कोई फायदा [संगीत] नहीं हुआ। क्योंकि बादशाह के और कोई औलाद नहीं। सो इस बेटी के बादशाह और तमाम बाशिंदे शहर के इस बेटी की दीवानगी [संगीत] और पागलपान की वजह से बहुत मायूस और गमगीन है।

शाहिद ने हाल सुनकर अपने आप को हकीम जाहिर [संगीत] किया और बादशाह की खिदमत में हाजिर होकर कहा कि मैं शर्तिया शहजादी का इलाज [संगीत] कर दूंगा। इंशा अल्लाह शहजादी बिल्कुल ठीक हो जाएगी और उसकी दीवानगी और पागलपन जाता रहेगा। बादशाह ने मायूसी भरकर कहा, मैं बहुत से हकीमों को आजमा चुका हूं। सब झूठे निकले। किसी की दवा ने असर नहीं किया और मेरा यकीन उन लोगों से बालकुल उठ गया है। मैं अपनी बेटी का इलाज नहीं करना चाहता। तकदीर में यही लिखा है कि एक बेटी [संगीत] वह भी उसी तरह दीवानगी में रहे। वही मेरी औलाद हो। मैं तकदीर से नहीं लड़ सकता है। जो अल्लाह चाहेगा वही होगा।

लेकिन मेरी आपसे हाथ जोड़कर अर्ज है कि एक मर्तबा मेरे कहने पर अमल करें। आपका कुछ बिगड़ेगा नहीं अगर आप इंकार करते हैं। बल्कि मैं इस बात का इकरार करता हूं कि अगर मेरी तरफ से शहजादी को आराम ना आया तो फौरन मेरी गर्दन उतार दीजिएगा। मुझे कत्ल [संगीत] कर दीजिएगा। बादशाह ने उसकी इस शर्त पर बेटी का इलाज करना मंजूर कर लिया और कहा कि अगर उसकी बेटी ठीक ना हुई तो उसको बिला तामूल फांसी दे देगा।

शाहिद उसी वक्त बादशाह के हमरा महल में गया। देखा कि एक लड़की 15-16 साल की उम्र की जिसका चेहरा चंद की तरह चमक [संगीत] रहा था और जिसका हसन व जमाल बेअंदाजा था उसे जंजीरों [संगीत] से बंद रखा गया है और जो भी उसके पास जाता है वह उसको मारने को दौड़ती है काटने को दौड़ती है। ऐसी मजबूती से पकड़ी जाए कि वह मुझ पर हमला ना कर सके। चुनांचे ऐसा ही किया गया। मूला उसके मिलने से शहजादी बेहोश हो गई और उसको छींकें शुरू हो गई। एक घंटे के बाद छींकें यानी बंद हो गई और शहजादी [संगीत] ने जब एक गैर मर्द को अपने बाप बादशाह के साथ खड़े देखा तो इशारे से अपने बाप को बुलाया और कहा, बाबा जान यह शख्स कौन है और तुम उसको जानने खाने में क्यों लाए हो।

बादशाह अपनी बेटी की जुबान से यह बात सुनकर बड़ा खुश हुआ। उसे समझ लग गई कि उसकी बेटी ठीक हो गई है। उसने शाहिद को अपने गले से लगा लिया और कहा कि तुमने मेरे साथ वह सुलूक किया है कि मैं तमाम उम्र ना भूलूंगा। तुमने बहुत बड़ा एहसान मुझ पर किया। मेरी बेटी [संगीत] को ठीक कर दिया। बस शहजादी को शाहिद के कहने के मुताबिक हमम में भिजवा दिया गया। नहा धोकर उसे नए कपड़े पहनाए गए और खुद शाहिद को बादशाह अपने हमरा दरबार में लाया और बड़ी इज्जत [संगीत] व एहतराम से तख्त पर अपने साथ बिठाया और तमाम अहल दरबार से मुखातिब होकर कहा कि इस शख्स ने मुझ पर कमाल एहसान [संगीत] किया समझो शहजादी जब हमाम से नहाकर वापस आई तो उसमें दीवानगी और पागलपान का नाम वो निशान तक बाकी ना रहा।

बादशाह महल में गया और अपनी बेटी को अपने गले से लगाकर फिर बादशाह ने अपनी बेगम से कहा, मेरे निकट मुनासिब है कि इस जवान के साथ जिसने शहजादी को दोबारा जिंदा किया उसका पागलपान दूर किया उसका निकाह कर [संगीत] दिया जाए क्योंकि उसका हम पर बहुत हक है। उसने हमारे साथ बहुत बड़ी नेकी की है। एहसान किया है और हमारा कोई बेटा नहीं है। हमारे बाद मुल्क और ताज और तख्त का वारिस वही होगा। मलिका ने कहा कि आपकी [संगीत] राय दुरुस्त है। बस बादशाह ने एक बड़ी शानदार उरूसी महफिल का एहतमाम किया और अपने दामाद [संगीत] को सामने बिठाया और बड़ी धूमधाम से अपनी बेटी की शादी शाहिद के साथ कर दी।

शाहिद बड़े आराम [संगीत] के साथ उसके साथ जिंदगी गुजारने लगा। मगर सनम के हाथ से उसने दो मर्तबा धोखा खाया था। वह हमेशा उसके दिल पर ताजा [संगीत] रहता था। इस तमाम ऐश के बावजूद उसकी तबीयत कुछ बोझल रहती थी। उसके दिल में ख्याल था कि सनम ने उसे [संगीत] धोखा दिया है। उसके दिल में उससे बदला लेने का ख्याल था।

उसने एक रोज अपनी बीवी शहजादी [संगीत] से कहा, "मुझे एक मुहिम मुजीिम दरपेश है। एक बहुत बड़ी मुहिम पर जाना चाहता हूं। अपने मां-बाप से मेरी सिफारिश करो कि मुझे चार महीने के लिए रुखसत किया जाए। इंशा्लाह ताला मैं इस अरसे में अपनी इस मुहिम से फिक होकर दोबारा वापस आऊंगा और तमाम उम्र हम ऐश में बस करेंगे।" लड़की ने कहा, तुम्हारे जाने की क्या जरूरत है? जिस काम को तुम अंजाम देना मंजूर है तुम्हारे यहां बैठे फकत तुम्हारी जुबान से निकलने की देर है। तुम बादशाह हो उसका इंतजाम हो जाएगा। शाहिद ने कहा कि वह काम मेरे ही करने का है। मेरे बगैर कोई जा नहीं सकता ना वह कर सकता है। इसलिए मैं मजबूर हूं। वरना तुम्हारी जुदाई मुझे कब गवारा थी।

गरज कि शाहिद ने इतना इसरार किया कि बादशाह से उसने रुखसत ले ली और खुद अकेला उस मुल्क रूम की तरफ रवाना हुआ यानी उस सनम के मुल्क की तरफ। जब वहां पहुंचा तो एक रोज शहर में आराम करने के बाद दूसरे रोज सनम के महल की तरफ [संगीत] रवाना हुआ। वहां जाकर देखा कि सनम की वही गरम बाजार जा रही है तो वह शाहिद सनम के सामने गया तो वह उसको देखकर निहायत घबराई और कांपने लगी। शाहिद ने कहा, तुम ऐसे क्यों घबरा रही हो? [संगीत] मैं तुम्हारा वैसा ही आशिक हूं जैसा पहले था। जैसा तुमको हमेशा से चाहता था। तुम चाहो तो मेरे साथ बेवफा बेवफाई कर सकती हो, लेकिन मैं जब तक जिंदा हूं, तुम्हारा पीछा नहीं छोडूंगा।

यह बात शाहिद की जवानी सुनकर सनम के जी में आई और दौड़कर उसको गले लगा लिया और कहने लगी, "मैं भी बहुत दिल से तुम्हें चाहती हूं। मगर क्या करूं कि तुमने मुझे ऐसी जगह ले गई जहां मेरा दिल नहीं चाहता था। वह वीरानी थी। मेरा दिल वहां नहीं लगता था।" शाहिद ने कहा, बेशक मुझसे गलती हुई मगर आप पिछली बातों को दूर करो और मेरे साथ जिंदगी गुजारो। उसके साथ बैठकर उसके साथ नोशी करने लगा।

तो जब आधी रात का वक्त हुआ शाहिद चुपके से पलंग से उठा और दरख्त का पत्ता अपने हाथ में लेकर सनम को सुघाया। उसके सुगाते ही सनम फौरन गद्दी बन गई। शाहिद ने उसकी गर्दन में रस्सा डालकर उसको एक तरफ से बंध दिया और डंडा हाथ में लेकर उसको ऐसा मारा कि बेहोश होकर गिर पड़ी। जब बहुत देर के बाद होश में आई तो शाहिद ने उससे पूछा, बोलो तुम क्या [संगीत] कहती हो? सनम आंखों में आंसू भर लाई और रोते हुए कहा, मुझ पर रहम करो। मेरा कसूर मुफ करो। शाहिद ने कहा, अगर मैं फिर तुझे तेरी असली शक्ल पर ले आऊं तो अपनी बदफैली और हरामकारी से बाज रहेगी। तो उसने तस्लीम किया कि हां रहूंगी।

शाहिद ने दूसरे दरख्त का पत्ता निकाला और उसको सजाया। सनम फौरन अपनी असली सूरत में लौट आई और शाहिद के कदमों पर गिरी और तौबा की कि मैं आइंदा कभी हरामकारी [संगीत] नहीं करूंगी। बस उसको अपने हमरा अपने मकान में मिलाया और कालीन और डंडा और सुरमादानी उसके हवाले की। शाहिद ने वह चीजें [संगीत] लेकर कहा, जा मैंने तुझको आजाद किया। सनम ने उसका दामन पकड़ लिया और कहा, "मैं तुझ जैसे खूबसूरत और जवान मर्द आदमी को [संगीत] छोड़कर कहां जाऊंगी? तुम मुझे अपने साथ ले चलो।"

शाहिद ने हरचंद इंकार किया। लेकिन सनम ना मानी। तब लाचार होकर शाहिद ने उसको भी कालीन के टुकड़े पर अपने साथ बिठा लिया और कहा कि हजरत सुलेमान [संगीत] अलहिसलाम के वास्ते हमें शहर में पहुंचा दे। और एक घड़ी में उनको शहर के महल में पहुंचा दिया। शुरू से लेकर आखिर तक उसे सुनाया और सनम को बादशाह के सामने पेश किया। और फिर बाहम सलाह करके सनम का निकाह बादशाह ने अपने सिपाही [संगीत] के साथ कर दिया।

शाहिद और शहजादी ऐश व आराम से रहने लगे। चंद रोज बादशाह ने कहा, मैं अब बूढ़ा हो गया हूं और मामलात मुल्क के उमूर सर अंजाम नहीं दे सकता। बस अब रियाया को जमा करके शाहिद को सल्तनत के तख्त पर बिठा दिया और खुद तनहाई में बैठकर याद इलाही में मशगूल हो गया। शाहिद ने अपनी जिंदगी में बड़ी अदालत और खुशहाली के साथ सल्तनत की और रियाया को निहायत आबाद और शाद रखा। हम्म