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बादशाह था जिसका नाम जफर खान था। वो बहुत लालची और कंजूस था। रियाया उसके हाथों सताई जाती थी। वजीर और अमीर भी उससे खुश ना थे। मगर उसे किसी की परवाह ना थी। उसे सिर्फ एक फिक्र रहती कि किसी ना किसी तरह खजाने में दौलत दिन रात बढ़ती रहे।
दौलत में इजाफा करने की खातिर मुल्क में सफाई का इंतजाम ना था। रियाया की हिफाजत के लिए कोतवाल मुकरर थे। मगर सिपाहियों की तादाद बहुत कम थी। इसलिए चोरियां और डकैतियां सुबह शाम होती रहती थी। मगर बादशाह सिपाहियों की तादाद बढ़ाने पर राजी ना था।
रियाया फरियाद लेकर दरबार में हाजिर होती। मगर बादशाह उसके साथ इंसाफ करने की बजाय उल्टा जुर्माना कर देता और कहता कि तुम्हारी कमजोरी, बेदारी और गफलत की वजह से तुम्हें नुकसान पहुंचा है। लिहाजा कसूर तुम्हारा है और सज्जा भी तुम्हें मिलेगी।
एक मर्तबा एक गरीब बीवा औरत के मकान में चोरी हो गई। वो रोती पीठी दरबार में गई। बादशाह ने उसे करीब बुलाया और रोने का सबब पूछा। उसने कहा, बादशाह सलामत मेरे पास पांच बेटियां हैं और सब जवान है। मैंने अपना जहेज का सामान उनकी शादी के लिए रख छोड़ा था। मगर आज रात उसे कोई बदमाश चोरी ले गया। मैं लूट गई। तबाह बर्बाद हो गई। मेरी मदद कीजिए।
बादशाह ने अपनी दाढ़ी को उंगलियों से खुजाते हुए कहा, तुम्हें अपनी बेटियों की शादी हरगिज़ ना करनी चाहिए। आज उन्होंने एक घर बर्बाद किया है। कल शादी हो गई तो पांच घरों को बर्बाद करेंगी। बीवा औरत और जोर से रोई और दहाई लगाने लगी। बादशाह सलामत ऐसा ना कहिए मेरी बेटियों की जिंदगी खराब हो जाएगी।
बादशाह ने हुक्म दिया तुम अपनी बेटियों को लेकर हमारे महल में चली आओ और कनिजों में शामिल होकर आराम की जिंदगी गुजारो। बीवा कहने लगी बादशाह सलामत मुझे अपना माल असबाब चाहिए। महल की जिंदगी नहीं। बादशाह ने वजीर को हुक्म दिया कि यह कोई दीवानी है, पागल है। इसे इसकी बेटियों समेत शहर से निकाल दो और इसका मकान और सामान ज्त कर लो। बस यही हमारा फैसला है और यही हमारा इंसाफ।
बीवाशाह के कदमों पर गिर पड़ी और रोते-रोते बेहोश हो गई। मगर बादशाह को उस पर तरस ना आया। उसने वज़र को इशारा किया और उन्होंने गुलामों से बीवा को उठवाकर दरबार से बाहर भिजवा दिया। फिर उसका मकान और सामान ज्त किया और पांचों लड़कियों को उनकी मां के साथ शहर से निकाल दिया।
बीवा अपनी प्यारी बेटियों के साथ रोती पीटी जंगल में भटक रही थी। ना वहां खाने का सामान, ना पीने के लिए पानी, ना सर छिपाने के लिए कोई जगह नजर आती, ना कोई सहारा दिखाई देता। शाम तक जंगल की खाक छानने के बाद एक जगह जंगली फलों के दरख्त दिखाई दिए तो उनकी जान में जान आई और उन्होंने फल तोड़कर पेट की आग बुझाई। थकावट की वजह से पैरों में दर्द महसूस होने लगा था और अब उठने की हिम्मत ना थी। इसीलिए खुदा की जात पर भरोसा करते हुए उसी जगह सो गई।
आधी रात गुजरने के बाद बीवा ने ख्वाब में देखा कि एक बूढ़ी औरत उसके सिरहाने खड़ी हुई है। उसके सफेद बाल चांदी के बारीक-बारीक तारों की तरह चमक रहे हैं। चेहरे से नूर टपक रहा है और वो कह रही है यह वक तेरे आराम का नहीं। तू उठ खुदा की इबादत कर और यहां से सीधी चली जा। सैहर होने तक एक चश्मे पर पहुंचेगी। वहां एक फकीह मिलेगा। उसे अपना हाल सुनाकर उसकी दवा ले। तेरी मुश्किल दूर हो जाएगी।
बीवा की आंख खुल गई। उसने गर्दन उठाकर देखा मगर बूढ़ी औरत नजर ना आई। फिर उसे ख्याल हुआ कि वह ख्वाब देख रही थी। उसने अपनी बेटियों को जगाया और ख्वाब का हाल बयान करने के बाद सब ने बैठकर खुदा की इबादत की। इबादत करने के बाद बीवा अपनी बेटियों के साथ चश्मे की जानिब रवाना हो गई।
सूरज की पहली किरण के साथ बीवा को चश्मा नजर आया। उसे अपने ख्वाब की सच्चाई मालूम हुई और उसकी थकी हुई टांगों में एक नई ताकत पैदा हो गई। वो तेज-तेज़ कदमों से चलने लगी और जल्द ही चश्मे पर पहुंच गई। वहां दरख्त के नीचे एक फकीह बैठा हुआ इबादत में मशगुल था। बीवा और उसकी बेटियां हाथ बांधकर उसके बाएं हाथ की जानिब खड़ी हो गई।
फकीह ने थोड़ी देर के बाद निगाह उठाकर उनकी तरफ देखा और हाथ से बैठने का इशारा किया। फिर दुआ मांगने के बाद उनसे कहा बादशाह ने तुम पर बहुत जुल्म किया है मगर उसका जुल्म तुम्हारे लिए फायदे से खाली नहीं। वो देखो सामने स्याह मिट्टी का ढेर लगा हुआ है। उसे उठाओ और एक तरफ फेंक दो। जिस वक्त स्याह मिट्टी का एक झर्रा भी बाकी ना रहेगा तुम्हारी नई जिंदगी शुरू हो जाएगी। इतना कहने के बाद फकीह ने अपना बोरिया उठाया और एक तरफ चल दिया।
बीवा ने हाथ उठाकर खुदा से दुआ की। ऐ अल्लाह तू इस फकीह का कहा पूरा कर दे। वरना इस बीवा बूढ़िया का कोई आसरा नहीं है। बीवा और उसकी बेटियों ने हाथों से मिट्टी को उठाउ उठाकर दूसरी तरफ फेंकना शुरू किया और इसी में दोपहर हो गई। सब पसीने में शराबोर सांस फूली हुई। बाजू सूझ गए और चेहरे लाल हो गए। तब कहीं जगह साफ हुई।
बड़ी बेटी जरीन ने कहा अम्मी मेरा तो ख्याल है कि यहां कोई खजाना होगा। मगर यहां तो कुछ भी नहीं। जरीना बोली बहन कोई ना कोई राज तो जरूर है वरना फकीह को हिदायत देने की क्या जरूरत थी नाजनीन कहने लगी अम्मी भूख से मेरी तो बुरी हालत हो गई है और यहां यह चश्मा है इसका पानी ही पी लो गुलाब बोली खाली पेट पानी किससे पिया जाएगा रज बारी बारी हर लड़की कुछ ना कुछ कहती और गरीब बीवा खामोशी से उनकी सूरतें देखती या जमीन पर निगाह जमा लेती।
इन सब की यह परेशानी ज्यादा देर तक ना रही क्योंकि थोड़ी ही देर के बाद एक सूफी इस तरफ आया और स्याह मिट्टी को दूसरी ओर देखकर कहने लगा तुम्हारा भला हो। तुमने इस मिट्टी को हटाकर मुंह सूफी पर बड़ी मेहरबानी की। यह मेरी बैठने की जगह है। इस पर दुश्मनों ने स्याह मिट्टी का ढेर लगा दिया था। अगर मैं इसे हाथ लगाता तो मेरा जिस्म झलस जाता। अब मैं तुम्हारे एहसान का बदला देना चाहता हूं। सब खामोश थी। किसी की जुबान से भी एक शब्द ना निकला।
सूफी ने अपनी झोली से एक संदूकचा निकाल कर दिया और कहा, "इसे अपने पास रखो और किसी को इसका भेद ना बताना।" बीवा ने झुक कर संदूकचा उठाया और सूफी की सूरत देखने लगी। वह बोला, हर सुबह इसे खोलो। तुम्हारी जरूरत के लिए अशरफियां इसमें रखी हुई मिलेंगी। फकीह की यह बात सुनकर पांचों बहनों के चेहरे खुशी से कलियों की तरह खिल गए।
बीवा ने कहा, सूफी बाबा हमारा तो भला हो गया। मगर उस बादशाह का भी तो इलाज कीजिए जिसने हमें शहर से निकाला है क्योंकि वह हम जैसे ना जाने कितने लोगों को बर्बाद कर रहा है। सूफी मुस्कुराया। फिर उसने झोली में से एक मुट्ठी बीज निकाले और बीवा को देते हुए बोला थोड़े दिनों के बाद अजीज लिबास पहनकर बादशाह के पास जाना और उससे कहना कि अपने बाग के बीच में इन बीजों को बो दो। फिर ऐसा दरख्त निकलेगा जिसमें खाली सोने के सेब उगने लगेंगे। इसके बादशाह का मिजाज दुरुस्त हो जाएगा।
बीवा सूफी को दुआएं देती हुई आगे रवाना हुई और चलते-चलते एक दूसरे शहर में पहुंच गई। यहां उसने एक मकान किराए पर लिया और आराम से रहने लगी। खर्च के लिए अशरफियों की कमी ना थी। हर सुबह संदूकचा में से निकल ही आती।
बीवा 101 दिन के बाद आला दर्जे के कीमती लिबास पहनकर बादशाह के पास गई और उसे बीज देते हुए बोली बादशाह सलामत जंगल से यह बीज आपके लिए लाई हूं। अगर आप अपने बाग के मुकद्दर मध्य इन्हें बो दें तो खाली सोने के सेब उगने लगेंगे। कंजूस और लालची बादशाह बहुत खुश हुआ और बीज लेकर वजीर को हुक्म दिया कि इस औरत को रहने के लिए एक आलीशान हवेली दे दो। उसने हमें एक बहुत बड़े खजाने की चाबी दी है।
वजीर ने उसको शहर के पुराने रौनक वाले इलाके में एक हवेली दी और वह अपनी बेटियों को बुलाकर उसमें रहने लगी। बादशाह और उसके वजीर को शुभा तक ना हुआ कि यह वही औरत है जिसे शहर से बाहर निकाला गया था। बादशाह का खजाना तहखाने में था और उस तहखाने के बिल्कुल ऊपर बादशाह ने बाग बनवा रखा था। यही वजह थी कि किसी को यह मालूम ही ना था कि बादशाह का खजाना किस जगह है।
बादशाह ने बाग के बीच में बीज बो दिए और थोड़े ही दिनों के बाद एक दरखास्त पैदा हो गया। उसके पत्ते हरे थे। तना कट्ठा रंग का शाखें हरी और रूपली थी और सेब निकले तो वे सोने के थे। बादशाह ने एक सेब तोड़ा तो मालूम हुआ कि वह इतना सख्त है जैसे ठोस सोना। फिर उसने सोनार को बुलाया कर दिखाया। उसने भी यही कहा कि यह सेब खाली सोने का है।
बादशाह बहुत खुश हुआ और उसने सेबों की निगरानी के लिए बहुत से सिपाही मुकर्रर कर दिए। एक रोज बादशाह ने सेबों को गिना तो वे संख्या में 110 थे मगर दूसरे दिन 109 रह गए। बादशाह बहुत परेशान हुआ और उसने सिपाहियों को सख्त सजाएं दी और उनकी जगह दूसरे सिपाहियों को मुकर्रर कर दिए। मगर सुबह एक सेब और कम हो गया। फिर इसी तरह हर रोज एक सेब कम होने लगा।
आखिर बादशाह ने परेशान होकर बीवा औरत को बुलाया और सेबों के कम होने का हाल सुनाया तो उसने कहा आप रियाया पर जुर्माना करना छोड़ दीजिए और उनकी निगरानी के लिए खर्च में इजाफा कर दीजिए। फिर सेब गायब ना होंगे। मगर बादशाह को यह तस्वीर पसंद ना आई। और उसने अपने बड़े बेटे से कहा बेटा आज रात तो इस दरख्त की निगरानी करना ताकि मजरम को गिरफ्तार किया जाए और ऐसी सजा दी जाए कि दूसरों को अब्रत हासिल हो।
बड़ा शहजादा हैदर रात होते ही निगरानी के लिए दरख्त के पास जाकर खड़ा हो गया। मगर आधी रात होते ही उसे नींद आ गई और वह सो गया। सुबह बादशाह ने सेबों को गिना तो एक सेब फिर कम था। शहजादा हैदर बहुत शर्मिंदा हुआ और गर्दन झुका कर खड़ा हो गया।
बादशाह ने दूसरे दिन दूसरे शहजादा उमैर को निगरानी के लिए मुकर्रर किया। मगर उसके साथ भी ऐसा ही हुआ। फिर तीसरे दिन छोटे शहजादा राशिद को दरख्त के पास खड़ा किया। वह बहुत ही बहादुर शहजादा था। नींद आने के बावजूद वह खड़ा रहा। आधी रात गुजरने के बाद उसने देखा कि एक सुनहरी परिंदा उड़ता हुआ आया और एक सेब चोंच में लेकर उड़ गया। शहजादा राशिद ने तीर कमान उठाकर एक तीर छोड़ा। मगर वह परिंदे के परों से लगकर निकल गया और एक पर तोड़कर नीचे गिरा।
शहजादे ने दौड़कर सुनहरी परिंदे का पर उठा लिया और उस सिम देखने लगा जहां वह परिंदा गया था। मगर देखने से क्या होता। वह मायूस होकर वापस लौट आया और सुबह बादशाह से कहा। इन सेबों का चोर एक अजीब व गरीब परिंदा है। उसके पर सुनहरी है और उड़ने की रफ्तार बहुत तेज है।
इस बात को सुनकर बादशाह बहुत हैरान हुआ और कहने लगा अगर सेबों का चोर एक परिंदा है तो हमें यकीन कर लेना चाहिए कि यह तमाम सेब थोड़े ही दिनों में गायब हो जाएंगे। फिर उसने पर को गौर से देखा और शहजादे से कहा यह पर भी सोने का मालूम होता है। शहजादे ने भी बार-बार पर को देखा और कहा हकीकत में यह सोने का है। फिर बादशाह बोला जब एक पर सोने का है तो यह परिंदा कितना कीमती होगा। काश यह सुनहरी परिंदा मुझे मिल जाए।
बादशाह को सारी रात नींद ना आई और सुबह होते ही उसने तीनों शहजादों को बुलाया कर हुक्म दिया। मुझे सुनहरी परिंदा चाहिए। लिहाजा शिकारियों को बुलाया कर उनसे कहो कि इसे तलाश करके लाएं। शहजादा हैदर बोला। अब्बा हजरत यह काम शिकारियों के सुपुर्द ना कीजिए। मुमकिन है वह इसे पकड़ कर अपने ही काम में ले आए। इससे तो बेहतर है कि मैं खुद जाकर जंगलों में तलाश करूं।
बादशाह ने उसे दुआएं देते हुए रुखसत किया और सोचने लगा अगर यह परिंदा मिल गया तो सेबों की भी चोरी ना होगी और एक कीमती परिंदा भी मेरे हाथ आएगा।
शहजादा हैदर मंजिल तय करता हुआ चला जा रहा था कि एक जंगल के करीब एक लोमड़ी बैठी हुई नजर आई। शहजादे ने इसकी तरफ कोई तवज्जो ना दी और घोड़े को दौड़ाता हुआ उसके सामने से गुजरने लगा। मगर लोमड़ी ने इंसानों की जुबान में पुकारते हुए कहा मियां शहजादे क्या सुनहरी परिंदे का शिकार करने जा रहे हो?
शहजादे ने घोड़े को रोका और लोमड़ी से मुखातिब होकर कहने लगा क्या तुम्हें सुनहरी परिंदे का आस्ताना मालूम है? लोमड़ी बोली हां शहजादे मुझे सब कुछ मालूम है। अगर तुम मेरे कहने के मुताबिक चलोगे तो सुनहरी परिंदा तुम्हारी मुट्ठी में होगा। शहजादे ने कहा बी लोमड़ी मैं तुम्हारी हिदायत पर अमल करूंगा। तुम मुझे उसके आशियाना बता दो।
लोमड़ी बोली मैं तुम्हारी मदद करूंगी और अब सुनो आधी रात के वक्त तुम्हें दो सराएं मिलेंगी। एक में अंधेरा होगा और दूसरी में रोशनी नजर आएगी और गाने बजाने की आवाजें सुनाई देंगी। मगर उसमें दाखिल ना होना बल्कि अंधेरी सराय में जाना। तुम्हारा दिल तो घबराएगा मगर तुम उसी में दाखिल होना।
शहजादे ने एक लम्हे के लिए सोचा कि एक जानवर के मशवरे पर अमल नहीं करना चाहिए। क्योंकि जानवर अगर सही मशवरा देने के काबिल होते तो अपनी जिंदगी इस तरह क्यों गुजारते? लोमड़ी तो उसके जवाब का इंतजार कर रही थी। मगर वह उसे नफरत की निगाह से देखता हुआ चल दिया।
चलते-चलते शाम हो गई। सूरज ढल गया। रात हुई। आसमान पर नन्हे मुन्नाहे तारे जगमगा गए और वह तारों की हल्की फुल्की रोशनी में घोड़ा दौड़ाता रहा। आखिर आधी रात गुजरते ही वह लोमड़ी के बताए हुए मकाम पर पहुंच गया। अंधेरी सराय को देखकर उसने दिल में कहा अगर मैं इसमें कदम रखूं तो मुझसे बेवकूफ कोई ना होगा। फिर उसने रोशन सराय की तरफ कदम बढ़ाए और सोचने लगा यहां रोशनी भी है। गाना बजाना भी यहां खुशकिस्मत लोग ही आते होंगे और वैसी ही बातें सोचता हुआ वह अंदर चला गया। उसे क्या मालूम था कि यह चोरों और लुटेरों का अड्डा है। गरीब अंदर पहुंच ही था कि गिरफ्तार कर लिया गया। चोरों ने कहा, "यह पुलिस का आदमी मालूम होता है। उसके हाथ पैर बांधकर एक तरफ पड़ा रहने दो।"
शहजादा हैदर जब वापस ना आया, तो बादशाह को बहुत फिक्र हुई। वह अफसोस करने लगा। शहजादा उमैर ने बादशाह को उदास और रंजीदा देखा तो कहने लगा बा हजरत अब फिक्र ना कीजिए। मैं भाई की तलाश में जाता हूं और मुझे यकीन है कि मैं उनको ढूंढ निकालूंगा। फिर मैं उनके साथ मिलाकर सुनहरी परिंदे को तलाश कर। बादशाह ने मजबूर होकर उसे जाने की इजाजत दे दी और वह भी तीर कमान लेकर घोड़े पर सवार हुआ और उसी सिमत रवाना हो गया जहां शहजादा हैदर गया था।
जंगल के करीब पहुंचने पर उसे भी लोमड़ी ने रोका और वही अल्फाज़ कहे जो शहजादा हैदर से कहे थे। मगर उसने भी परवाह ना की और सीधा चला गया। चलते-चलते आधी रात के वक्त वह भी सराय के पास पहुंच गया। घोड़ों की टाप की आवाज सुनकर शहजादा हैदर चौंका। वह उस वक्त सराय की दूसरी मंजिल पर था। उसने खिड़की से झांक कर देखा और इशारे से उसे अंदर बुला दिया कि एक से दो हो जाएंगे तो यहां से निकलने की तदबीर करेंगे। मगर वह गरीब भी अंदर पहुंचते ही गिरफ्तार कर लिया गया।
शहजादा उमैर भी वापस ना आया तो बादशाह बहुत ही बेचैन हुआ और आंसुओं से रोने लगा। खाना पीना भी छोड़ दिया। हुकूमत के कामों में दिलचस्पी लेना भी कम कर दिया। यह हालत देखकर शहजादा राशिद को बहुत रंज हुआ और उसने भी अपने भाइयों की तरह बादशाह से इजाजत मांगी। मगर उसने कहा, बेटा जिस काम को तुम्हारे दो बड़े भाई अंजाम ना दे सके उसे तो क्या करोगे?
शहजादा राशिद ने जवाब दिया, "अब्बा हजरत, मैं अपने भाइयों के बगैर नहीं रह सकता। अगर आपने इजाजत ना दी, तो मैं घुट-घुट कर मर जाऊंगा। आखिर बादशाह ने मजबूर होकर उससे भी रुखसत कर दी।
चलते-चलते वह लोमड़ी के पास पहुंचा तो उसने उसे भी वही नसीहत की जो शहजादा हैदर और शहजादा उमैर को जंगल में दाखिल होने से पहले की थी। शहजादे ने खुश होकर कहा मैं बचपन से सुनता चला आता हूं कि लोमड़ी से ज्यादा होशियार और चालाक कोई दूसरा जानवर नहीं होता। लिहाजा मैं तुम्हारी नसीहत पर जरूर अमल करूंगा।
लोमड़ी खड़ी हो गई और कहने लगी अगर यह बात है तो मैं तुमसे बहुत खुश हूं। आओ घोड़े से उतर कर मेरी दुम पर बैठ जाओ। मैं तुम्हें सराए तक पहुंचा दूंगी। शहजादा राशिद ने हैरानी से इसकी दुम की तरफ देखा और कहने लगा, क्या तुम्हारी दुम इतनी मजबूत है कि यह मेरा वजन बर्दाश्त कर लेगी? लोमड़ी बोली, हां शहजादे, तुम बैठकर तो देखो।
शहजादा राशिद ने घोड़े से उतर कर उसे एक तरफ छोड़ दिया और खुद लोमड़ी की मजबूत दुम पर बैठ गया। लोमड़ी ने कहा, "कहो शहजादे, "मेरी बात गलत तो ना निकली?" उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, हकीकत में तुम्हारी दुम बड़ी मजबूत है। क्या तमाम लोमड़ियों की दुम में वैसी ही सख्ती होती है? उसने कहा, नहीं शहजादे, सिर्फ मेरी ही दुम वैसी है। और इसका सबब क्या है? यह मैं फिर कभी बताऊंगी।
लोमड़ी निहायत तेज रफ्तार से जंगल में दौड़ने लगी और शहजादा इतने आराम से बैठा रहा कि उसे महसूस ही ना हुआ कि वह सफर कर रहा है। लोमड़ी थोड़ी देर के बाद सराय के पास पहुंच गई और शहजादे से बोली इस अंधेरी सराय में चले जाओ। शहजादा उसे सलाम करके अंधेरी सराय में दाखिल हुआ। यहां एक औरत और उसका शौहर मौजूद था। उन्होंने शहजादे को खुशामदीद कहा और उसके साथ अपने बेटे जैसा सुलक किया। शहजादा उनका प्यार और मोहब्बत का एहसान देखकर बहुत खुश हुआ। उन्होंने शहजादे को निहायत उम्दा और लजीज खाना खिलाया। फिर एक आरामदेह बिस्तर सोने के लिए दिया और शहजादा उस पर लेटते ही बेखबर की नींद सो गया।
सुबह उठने के बाद वह फिर लोमड़ी की दुम पर सवार हुआ और वह उसे लेकर एक खेत में पहुंची। लोमड़ी ने कहा, अब हम दोनों सामने वाली सड़क तय करेंगे। मगर जब एक महल के करीब पहुंचेंगे, तो तुम्हें तन्हा जाना पड़ेगा। शहजादा बोला क्या महल में दाखिल होना पड़ेगा? उसने कहा हां मगर डरने की कोई बात नहीं क्योंकि तमाम पहरेदार गहरी नींद सो रहे होंगे। तुम अंदर जाओ और सहन को तय करते हुए दीवान खाने में पहुंच जाओ। यहां तुम्हें सुनहरी परिंदा नजर आएगा। सुनहरी परिंदा महल में रहता है।
शहजादे ने हैरानी से इसकी तरफ देखते हुए कहा, हां, वह महल में रहता है। मगर यह याद रखना कि वहां दो पिंजरे हैं। एक बहुत ही खूबसूरत है और चांदी का बना हुआ है। दूसरा पुराना है और लकड़ी का है। तुम खूबसूरत पिंजरे को हाथ ना लगाना वरना किसी मुसीबत में गिरफ्तार हो जाओगे। सिर्फ लकड़ी का पिंजरा उठाकर ले आना। शहजादे ने कहा, बेहतर है मैं वैसा ही करूंगा।
फिर लोमड़ी उसे महल के सामने ले गई और कहने लगी जाओ शहजादे मैं यहां इंतजार कर रही हूं। शहजादा राशिद महल के दरवाजे में दाखिल हुआ तो उसने तमाम पहरेदारों को गहरी नींद सोता हुआ पाया। वह बहुत खुश हुआ। निहायत बहादुरी और दिलेरी से सहन को तय करता हुआ दीवान खाने में जा पहुंचा। इसकी निगाह जैसे ही सुनहरी परिंदे पर पड़ी, इसका दिल खुशी से उछलने लगा। परिंदा कितना खूबसूरत था और इसकी आवाज कितनी प्यारी, कितनी सरसरीली और कितनी मीठी थी। इसका अंदाजा नहीं किया जा सकता।
शहजादे ने दिल में कहा, इतना प्यारा और खूबसूरत परिंदा कैसे मामूली पिंजरे में बंद है। इसे क्यों ना चांदी के खूबसूरत पिंजरे में छोड़ दूं। और उसने सुनहरी परिंदे को लकड़ी के पिंजरे से निकालकर चांदी के पिंजरे में बंद कर दिया। मगर परिंदा उसी वक्त जोरजोर से चिल्लाने लगा कि सोए हुए तमाम सिपाही जाग उठे और उन्होंने शहजादा राशिद को गिरफ्तार कर लिया।
शहजादा बहुत ही उदास हो गया और सोचने लगा मैंने लोमड़ी की नसीहत के खिलाफ काम किया तो मुझ पर मुसीबत आ गई। काश मैंने वैसा ना किया होता। सिपाही शहजादे को पकड़ कर बादशाह के पास ले गए और शहजादे का कसूर बयान करते हुए बोले जहां पनाह इस चोर लड़के को वैसी सजा देनी चाहिए कि आइंदा किसी को यहां आने की जुर्रत ना हो।
बादशाह ने शहजादे से कहा लड़के चोरी की नियत से जो शख्स यहां आता है हम उसे मौत की सजा देते हैं और यह सजा तुम्हें भी मिलेगी। शहजादे ने अर्ज की बादशाह सलामत मेरे हाल पर रहम कीजिए क्योंकि तीन भाइयों में से दो भाई तो पहले ही लापता हैं। मां-बाप इन्हीं के गम में नहाल हो रहे हैं। अगर आपने मुझे भी उनसे जुदा कर दिया तो वह जीते जी मर जाएंगे।
बादशाह ने गौर से शहजादे के मुरझाए हुए चेहरे की तरफ देखा और कहा अगर अपने मां-बाप का इतना ख्याल है तो बुरे कामों से तुम्हें दूर रहना चाहिए। वरना इंसान को बुराई की सजा जरूर मिलती है। शहजादे ने कहा बादशाह सलामत आप मुझे माफ कर दीजिए और मैं आपसे वादा करता हूं कि आइंदा कभी चोरी ना करूंगा।
बादशाह ने कहा अगर तुम अपनी जान की सलामती चाहते हो तो यहां से दूर एक पहाड़ी पर एक कैला है और उसमें एक सुनहरी घोड़ा खड़ा हुआ है। जाकर उस घोड़े को ले आओ। शहजादे ने वादा किया और कैले की जानिब रवाना हो गया। वह बहुत ही रंजीदा
और उदास था। मगर लोमड़ी से मिलते ही इसके चेहरे पर खुशी की लहरें दौड़ने लगी। फिर उसने बैठकर लोमड़ी को सारा हाल सुनाया।
लोमड़ी ने कहा, अगर तुम मेरी नसीहत पर अमल करते, तो इस मुसीबत में गिरफ्तार ना होते। खैर, मैं तुम्हारी मदद करूंगी। चलो मेरी दुम पर बैठ जाओ। शहजादा दुम पर बैठ गया और वह पहाड़ी की जानिब रवाना हो गई।
शहजादा राशिद भी वापस ना पहुंचा तो बादशाह बहुत परेशान हुआ। रोते-रोते इसकी आंखों की बीनाई कम हो गई। खाना पीना छूट गया और सेहत खराब हो गई। वजीर बादशाह को तसल्ली देता मगर वह कहता हमदर्दी के अल्फाज कहने की बजाय मेरे शहजादे को बुला दो।
और एक-एक करके सुनहरी सेब कम होते जा रहे थे। और बादशाह को उनका गम भी था। आखिर एक रोज उसने परेशान होकर बीवा औरत को हवेली से बुलाया और कहा तुमने बीज देकर मेरी जिंदगी की तमाम खुशियां खाक में मिला दी। सेब गायब हो रहे हैं और मेरे शहजादे मुंह से छूट गए हैं। सच-सच बताओ यह क्या राज है?
बीवा औरत मुस्कुराई। फिर हंसी और हंसकर कहने लगी। बादशाह सलामत आपने अपनी कंजूसी और लालच के सामने किसी मुसीबत ज्यादा की कभी कोई मदद ना की बल्कि उल्टा उस पर जुल्म किया। मेरे घर चोरी हुई। मैं आपके पास फरियाद लेकर आई। मगर आपने मुझे मेरी बेटियों के साथ शहर से बाहर निकाल दिया। अब देखिए मैं वापस शहर में आ गई और अपनी बेटियों की शादी भी कर दी। मगर आप पर मुसीबत टूट पड़ी। आपके खजाने का सोना सेब बनकर दरख्त की डालियों में लटकने लगा और सेबों को सुनहरी परिंदा ले उड़ा। आपने ज्यादा लालच किया तो तीनों शहजादों को भी खो बैठे। अगर आप रैया का ख्याल रखें। इसकी मदद करें। इसे आराम पहुंचाइए तो आपकी तमाम मुसीबतें दूर हो जाएंगी।
बादशाह बहुत रोया और उसने कसम खाकर वादा किया मैं अब रैया का ख्याल रखूंगा। तो बीवा ने कहा फिक्र ना करो शहजादे आ जाएंगे।
लोमड़ी शहजादा राशिद को लेकर कैले के सामने पहुंची और कहने लगी यह कैला बहुत बड़ा है और यहां महल के सिपाहियों से दुगने सिपाही हैं। मगर डरने की कोई बात नहीं क्योंकि तमाम सिपाही सो रहे हैं। तुम बहादुरी से अंदर चले जाओ और इस तबल में जाकर देखना सुनहरी घोड़ा तुम्हें खड़ा हुआ मिलेगा। इसकी जंजीर और लगाम पुरानी और कमजोर चमड़े की है। वहां हीरे जवाहरात का बना हुआ कीमती साज भी लटका हुआ है। मगर इसे हाथ ना लगाना।
शहजादा राशिद किले में दाखिल हुआ। तमाम सिपाही बेखबर सो रहे थे। उसने सीन ताने हुए बहादुरी से इस तबल में पहुंचा। सुनहरी घोड़े को देखकर इसकी अकल दंग रह गई। वह देर तक इसे देखता रहा। फिर दिल में कहा कितना प्यारा घोड़ा है। मगर यह कैसी बेवकूफी है कि इसकी लगाम और जंजीर पुराने चमड़े की है। फिर उसने इसे उतार कर चमकता हुआ नया साज इस पर रख दिया। घोड़ा उसी वक जोर-जोर से हिनहिनाने और लात चलाने लगा। इसका शोर सुनकर सिपाही जाग उठे और दौड़ते हुए आए। शहजादा सिपाहियों को देखकर सिहर गया और घबराकर इधर-उधर देखने लगा। मगर सिपाहियों ने इसे गिरफ्तार कर लिया और अपने बादशाह के पास ले गए।
बादशाह ने नाराज होकर कहा, तुम मेरे किले में बला इजाजत दाखिल हुए और मेरे सुनहरी घोड़े को चुराने का इरादा किया। तुमको मौत की सजा दी जाएगी। मगर मैं तुम्हारा कसूर माफ भी कर सकता हूं।
शहजादा बोला वह शर्त क्या है? मुझे बताइए। मैं इसे पूरा करूंगा।
बादशाह ने कहा सुनहरी कैले की शहजादी को ले आओ तो मैं तुम्हें जिंदा छोड़ दूंगा।
शहजादे ने वादा किया और सुनहरी कैले की तलाश में रवाना हुआ। रास्ते में लोमड़ी मिली और इसने शहजादे से कहा तुम इस मर्तबा भी नसीहत को भूल गए। तुम्हें वैसा नहीं करना चाहिए था। शहजादा बहुत शर्मिंदा हुआ और कहने लगा भी लोमड़ी अब मैं तुम्हारी नसीहत के खिलाफ कोई काम नहीं करूंगा।
लोमड़ी सुनहरी कले की जानिब रवाना हुई। यह किला बहुत दूर था। इसलिए लोमड़ी बहुत तेज रफ्तार से दौड़ रही थी और शहजादा सोच रहा था मेरा घोड़ा भी कभी इतना तेज ना दौड़ा। इस वक्त हवा कितनी तेज मालूम हो रही है और दरख्त ऐसे दिखाई दे रहे हैं जैसे वह हमसे डर कर भाग रहे हो। गरज लोमड़ी इसे लेकर सुनहरे कहिले के सामने पहुंच गई और कहने लगी कहिले में जब सुकून होगा तो शहजादी अपनी दो कनीजों के हमराह गुस्ल के लिए जाएगी। तुम होशियारी से देखते रहना। जब शहजादी सुल्तानी गुस्लखाने के दरवाजे पर पहुंचे तो तुम आगे बढ़कर इसका हाथ चूम लेना। फिर वह तुम्हारे साथ चली आएगी। मगर इस बात का ख्याल रखना कि अगर वह अपने वालिदैन से मिलने और उनसे इजाजत हासिल करने के लिए तुमसे दरख्वास्त करे तो हरगिज़ ना छोड़ना। वरना तुम पर मुसीबत आ जाएगी।
शहजादे ने वादा किया और अल्लाह का नाम लेकर कायले में दाखिल हो गया। शहजादी अपनी कनीजों के साथ गस्लखाने के पास आई तो शहजादे ने इसका हाथ चूमा। शहजादी उसी वक्त चलने पर राजी हो गई। मगर घुटनों के बल बैठकर शहजादे से कहने लगी उम्र भर मैं तुम्हारे साथ रहूंगी। इसलिए एक बार अपने मां-बाप से मिलने की इजाजत दे दो।
शहजादा रहम दिल तो था ही। इसे इजाजत दे दी। शहजादी बादशाह के पास गई और रुखसती के लिए इजाजत मांगी तो बादशाह गुस्से से आग बबूला हो गया और उसने शहजादे को गिरफ्तार करवा लिया। फिर इससे कहा वह सामने पहाड़ है। मैं इस जगह एक बाग लगवाना चाहता हूं। अगर शहर तक तुमने इसे खोदकर जगह साफ कर दी तो मैं शहजादी को तुम्हारे हमराह कर दूंगा। वरना तुम्हें मौत की सजा दूंगा।
शहजादे ने वादा किया और एक वजनी और मजबूत कुल्हाड़ी ले ली। रात गुजर गई मगर थोड़ी सी जगह ही साफ हुई और मौत इसकी आंखों में फिरने लगी। लोमड़ी को इसके हाल पर तरस आया और इसने कहा तुम कगी में चले जाओ शहर यह जगह तुम्हें साफ मिलेगी और शहजादी तुम्हारी हो जाएगी।
शहजादा राशिद कगिले में चला गया और सुबह जब इसने देखा तो जमीन साफ थी। बादशाह भी बहुत खुश हुआ और उसने शहजादी का हाथ इसके हाथ में दे दिया।
लोमड़ी दोनों को लेकर जब वापस किले के पास पहुंची तो इसने शहजादे से कहा अब जाकर बादशाह से कहना कि सुनहरी कले की शहजादी मैं ले आया हूं। लिहाजा सुनहरी घोड़ा मुझे दे दो। जब वह घोड़ा तुम्हें दे तो इस पर सवार होकर बादशाह और दरबारियों को सलाम करना। जवाब में सब हाथ उठाएंगे। उसी वक्त शहजादी को उठाकर घोड़े पर बैठा लेना। यह घोड़ा इतना तेज दौड़ेगा कि इसे कोई शख्स भी पकड़ ना सकेगा।
शहजादे ने बिल्कुल वैसे ही किया और वह सुनहरी घोड़े पर शहजादी को बैठाकर कैले से निकल आया। लोमड़ी वाले महल के सामने आई और कहा शहजादी को मेरे पास छोड़ दो और अंदर जाकर बादशाह से कहना कि मैं सुनहरी घोड़ा ले आया हूं। मुझे सुनहरी परिंदे का पिंजरा दीजिए तो मैं घोड़ा आपके हवाले कर दूं और पिंजरा लेकर भाग आना।
शहजादे ने वैसा ही किया और सुनहरी परिंदे को लेकर भाग आया। सिपाहियों ने इसका पीछा किया। मगर सुनहरी घोड़े की रफ्तार के सामने उन्हें मुंह की खानी पड़ी।
लोमड़ी ने शहजादी को उसके सुपुर्द किया और कहा, "तुम अपने मकसद में कामयाब हो गए हो। अब एक नसीहत और सुनो। रास्ते में खेत पर लटका हुआ गोश्त ना खरीदो और किसी बहती हुई नदी या चश्मे के किनारे ना बैठना।"
शहजादे ने सोचा कि जंगल परिंदों और जानवरों से भरा हुआ है। फिर मुझे बाजार का गोश्त खरीदने की क्या जरूरत है? उसी तरह सराय में आराम करने की बजाय नदी चश्मे के किनारे बैठने की भी ख्वाहिश ना थी। फिर उसने लोमड़ी से कहा, "मैं रुखसत होने से पहले दरियाफत करना चाहता हूं कि तुम्हारे एहसान का बदला किस तरह अदा करूं।"
लोमड़ी ने कहा, जब मैं जंगल में से गुजरने लगूं, तो मेरा सर और पंजे काट देना। बस यही मेरे एहसान का बदला है। मगर शहजादे ने वैसा करने से इंकार कर दिया और कहा मेरे साथ जिसने इतना सुलूक किया मैं उसकी गर्दन नहीं काट सकता। गरीब लोमड़ी उदास होकर झाड़ियों में चली गई और शहजादा घोड़े को दौड़ाता हुआ चल दिया।
जब वह एक शहर में पहुंचा तो उसने देखा कि फांसी के तख्ते पर उसके दोनों बड़े भाई हैदर और उमैर लटके हुए हैं। उसने लोगों से उनका जुर्म दरियाफत किया तो उन्होंने बताया यह दोनों चोरों और लुटेरों के साथी हैं। उन्होंने कई कत्ल किए हैं। बहुत सी चोरियां की है। लिहाजा उन्हें फांसी दी जाएगी। जेल के एक अफसर ने कहा, तख्ते पर लटके हुए यह जिंदा आदमी गोश्त की मिसाल है। अगर उन्हें खरीदना चाहते हो, तो खरीद कर ले जाओ और अपनी गुलामी में रखो।
शहजादा राशिद ने उन्हें खरीद लिया और अपने साथ लेकर वतन की तरफ रवाना हुआ। मगर जब वह जंगल से बाहर पहुंचे तो भाइयों के कहने से आराम करने के लिए वह एक नदी के किनारे उतर गया। सूरज घरोब हो रहा था। मगर थकावट की वजह से शहजादा राशिद लेटा रहा। बड़े भाइयों ने आपस में मशवरा किया और शहजादा राशिद को पकड़ कर नदी में फेंक दिया। फिर सुनहरी घोड़ा, सुनहरी परिंदा और सुनहरी कगी की शहजादी को लेकर भाग निकले और अपने बाप के पास जाकर कहा, "अब्बा हजरत, हमने अपनी जान जोखिमों में डालकर यह लाए हैं।" बाप बहुत खुश हुआ और उसने शहर में जश्न मनाने का हुक्म दे दिया।
बड़े भाइयों ने चोरी की थी। इसलिए शहजादी हर वक्त रोती हुई नजर आती। घोड़ा कुछ ना खाता और परिंदा पिंजरे में उदास रहता।
इधर शहजादा राशिद नदी में बहता चला जा रहा था कि इत्तेफाक से झाड़ियां उसके हाथ में आ गई और वह उन्हें पकड़ कर बाहर निकल आया। करीब ही एक दरख्त के नीचे लोमड़ी लेटी हुई दिखाई दी। उसने कहा तुम्हारे साथ बहुत बुरा हुआ मगर मैं तुम्हारी मदद करूंगी और वह शहजादे को अपने हमराह लेकर रवाना हुई। रास्ते में एक फकीरह मला तो लोमड़ी ने कहा अपना दो शालाह और सदरी इसे दे दो और इसका पुराना कंबल तुम ले लो। शहजादे ने वैसा ही किया और लोमड़ी के साथ अपने शहर में गया।
लोमड़ी इसे छोड़कर जंगल में चली गई और शहजादा महल में दाखिल हुआ। उसी वक्त घोड़ा हिनहिनाने लगा और घास खाने लगा। सुनहरी परिंदा चहचहाने लगा और शहजादी हंसने लगी। बादशाह यह हाल देखकर बहुत हैरान हुआ। फिर शहजादी ने बादशाह को शहजादा हैदर और उमैर के जुल्म की कहानी सुनाई और कहा यह दोनों अपने भाई के दुश्मन है। बादशाह को इतना गुस्सा आया कि उसने दोनों को हमेशा के लिए अपने मुल्क से निकाल दिया और शहजादी की शादी शहजादा राशिद से कर दी।
एक रोज शहजादा और शहजादी जंगल में सैर कर रहे थे कि लोमड़ी मिली। उसने फिर दरख्वास्त की कि मेरे पंजे काट दो। शहजादे ने इस मर्तबा उसके पंजों पर तलवार मारी। उसी वक्त लोमड़ी एक खूबसूरत शहजादा बनकर खड़ी हो गई और कहा, "मैं इस शहजादी का भाई हूं। एक मुद्दत हुई कि एक जादूगर ने मुझे इंसान से लोमड़ी बना दिया था।" शहजादी इसे पहचान कर लिपट गई और तीनों हंसीखुशी महल में वापस आए।
राशिद ने बादशाह से कहा, "यह वह शहजादा है जिसने मेरी मदद की और मुझे इस काबिल बनाया कि मैं अपने मकसद में कामयाब होकर यहां पहुंचा।" बादशाह ने खुश होकर इसे अपना वजीर आजम बना लिया।
बीमा औरत की बदौलत यह सब खेल हुआ था और उसी की नसीहत और दुआओं की वजह से बादशाह को दोबारा खुशी हासिल हुई। इसलिए बादशाह ने इसे बहुत से इनामात अता किए और उसके दामाद को अच्छे-अच्छे ओदे दिए।