Transcription
नमस्कार दोस्तों! 2014 में अगर आपको याद हो, डायरेक्टर क्रिस्टोफर नोलन की एक बड़ी ब्लॉकबस्टर फिल्म आई थी, इंटरस्टेलर। इस फिल्म में स्पेस रिलेटेड कांसेप्ट को—वर्म होल्स, ब्लैक होल्स, एलियन प्लेनेट—इन सबको बड़े ही साइंटिफिकली एक्यूरेट तरीके से दर्शाया गया था। लेकिन शायद सबसे भयंकर सीन इस फिल्म के एंड में था, क्लाइमैक्स में जब फिल्म के मेन कैरेक्टर, कूपर, एक ब्लैक होल के अंदर गिर जाते हैं। इस ब्लैक होल का नाम फिल्म में बताया जाता है, र्गन टुआ। और कूपर अपने स्पेसक्राफ्ट को लेकर ब्लैक होल के अंदर गिरते हैं। शुरू में इनके आसपास सब कुछ काला-काला होता है, कंप्लीट डार्कनेस। लेकिन जैसे ही और अंदर गिरते हैं, कुछ ग्रेन जैसे पार्टिकल्स इन्हें सामने दिखाई पड़ते हैं। ये पार्टिकल्स इनके स्पेसक्राफ्ट पर आकर लगते हैं, चिपकने लग जाते हैं। कुछ लाइट के फ्लैशेस निकलते हैं, कुछ चिंगारियां लगती हैं, और आग लगने लग जाती है इनके स्पेसक्राफ्ट पर। इन्हें मजबूरन इजेक्ट करना पड़ता है अपने स्पेसक्राफ्ट से, और ये ब्लैक होल के अंदर गिरते चले जाते हैं। लेकिन फिर अचानक से अपने आप को ये एक फाइव डायमेंशन स्पेस के अंदर पाते हैं, फाइव डायमेंशन टेसर। ये एक बहुत ही दिमाग हिला देने वाली चीज है, एक ऐसी जगह है जहां पर ये अपने पास्ट से कम्युनिकेट कर सकते हैं, ग्रेविटी का इस्तेमाल करके।
यह सब देखकर एक बड़ा सवाल आपके मन में उठा होगा: क्या यह सब पॉसिबल है? क्या एक ब्लैक होल के अंदर सही में ऐसा कुछ होता है? अगर हम सही में ब्लैक होल के अंदर गिरेंगे तो क्या देखने को मिलेगा? आइए समझने की कोशिश करते हैं इन सारे सवालों को आज के इस वीडियो में। ब्लैक होल्स रिमेन्ड लार्जली अननोन अंटिल द 20th सेंचुरी। अ ब्लैक होल इज अ रीजन इन स्पेस व्हेयर द फोर्स ऑफ ग्रेविटी इज सो स्ट्रांग दैट नथिंग, नॉट इवन लाइट, कैन एस्केप आउटसाइड यू कैन नॉट सी व्हाट इज इनसाइड अ ब्लैक होल। ब्लैक होल्स आर द यूनिवर्स' डार्केस्ट सेंटर्स ऑफ ग्रेविटी, स्वालोइंग एवरीथिंग इन देयर पाथ। कहानी की शुरुआत करते हैं दोस्तों। ब्लैक होल्स का इतिहास कोई ज्यादा पुराना नहीं है। आज से 100 साल पहले कोई ब्लैक होल्स के बारे में जानता तक नहीं था। आइंस्टाइन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी की वजह से ही बाद में जाकर ब्लैक होल्स की डिस्कवरी करी गई। इस थ्योरी के एक्चुअली में दो हिस्से हैं दोस्तों: द स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी और द जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी।
स्पेशल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी, जिसे आइंस्टाइन ने साल 1905 में पब्लिश किया था, हमें बताती है कि कैसे स्पीड टाइम को इन्फ्लुएंस करती है। अगर आप एक ऐसी स्पेसशिप में बैठे हो जो बहुत तेज उड़ने लग रही है, जिसकी स्पीड बहुत ज्यादा है, तो आपके लिए टाइम धीरे चलेगा, रिलेटिव टू वो लोग जो स्पेसशिप में नहीं बैठे हैं, धरती पर ही हैं। रिलेटिव शब्द बहुत जरूरी है, क्योंकि आप जब स्पेसशिप में बैठे होंगे तो आपको फील नहीं हो रहा होगा कि टाइम बहुत धीरे चलने लग रहा है। आपके लिए टाइम उतनी ही स्पीड पर चल रहा होगा जितनी पर नॉर्मली चलता है। बस आप अगर वापस धरती पर जाएंगे, तब आपको पता चलेगा कि टाइम कितना अलग चल रहा था। इस चीज को काइनेटिक टाइम डायलेटेशन कहा जाता है। और अगर आपने मेरा टाइम ट्रेवलर वाला वीडियो देखा है, तो उसमें मैंने डिटेल में एक्सप्लेन किया है ये कैसे काम करता है। अब स्पीड से ही नहीं बल्कि ग्रेविटी से भी टाइम डायलेटेशन हो सकती है, जिसे आइंस्टाइन ने बताया अपनी जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी में। ये उन्होंने डेवलप करी थी साल 1915 में। इसमें, जितना ज्यादा आप ग्रेविटेशनल फोर्स एक्सपीरियंस करेंगे, उतना ही ज्यादा टाइम आपके लिए धीरे हो जाएगा। इसे ग्रेविटेशनल टाइम डायलेटेशन कहा जाता है, और इंटरस्टेलर फिल्म में इसे बढ़िया तरीके से दिखाया गया था। जब कूपर और उनके साथी एक एक्वा प्लेनेट पर लैंड करते हैं, उस प्लेनेट पर उनके लिए एक घंटा धरती पर सात सालों के बराबर होता है। ऐसा इस प्लेनेट पर इसलिए होता है क्योंकि ये प्लेनेट र्गन टुआ ब्लैक होल के काफी करीब होता है, तो ब्लैक होल की तरफ से आ रहा ग्रेविटेशनल फोर्स इस पर इम्पैक्ट डालता है।
अब आइंस्टाइन ने इस चीज को विजुअलाइज करने के लिए कहा था कि एक स्पेस-टाइम का फैब्रिक इमेजिन करो, एक तरीके का मेश इमेजिन करो जिस पर सारे प्लेनेटरी ऑब्जेक्ट्स रखे हुए हैं। जितना ज्यादा उनका मास है, उतना ही ज्यादा वो इस स्पेस-टाइम के मेश को बेंड कर रहे हैं नीचे। और जब ये मेश बेंड होने लग रहा है, ना सिर्फ फिजिकल ऑब्जेक्ट्स इसकी तरफ ज्यादा आकर्षित हो रहे हैं, बल्कि टाइम की भी स्पीड डायलेट होने लग रही है। और जो बाकी फॉर्म्स ऑफ एनर्जी हैं, जैसे कि साउंड, हीट और लाइट, उन सब पर भी ग्रेविटेशन का असर पड़ता है। सही सुना आपने दोस्तों, ये एक और कंक्लूजन था जो आइंस्टाइन ने निकाला था: ग्रेविटेशन से ऑलमोस्ट हर चीज पर असर पड़ता है। ग्रेविटेशन के फोर्स से ना सिर्फ फिजिकल ऑब्जेक्ट्स अट्रैक्ट होते हैं, बल्कि हीट, साउंड और लाइट भी अट्रैक्ट होते हैं। तो इसका मतलब ये हुआ दोस्तों कि ऐसे भी ऑब्जेक्ट्स हो सकते हैं यूनिवर्स में जिनमें ग्रेविटेशनल फोर्स इतना ज्यादा है, इतना ज्यादा है कि वो लाइट को पूरी तरीके से अपने अंदर एब्जॉर्ब कर ले। और अगर ऐसे ऑब्जेक्ट्स हैं, तो इसका मतलब यह है कि वो कंप्लीट ब्लैक होंगे, हमें दिखेंगे ही नहीं क्योंकि लाइट भी उनसे बाहर नहीं निकल पाएगी। एग्जैक्टली यही होते हैं दोस्तों, ब्लैक होल्स।
लेकिन आइंस्टाइन ने जब अपनी थ्योरी ऑफ जनरल रिलेटिविटी बताई थी, उस वक्त ये ब्लैक होल्स का कांसेप्ट सिर्फ थियोरेटिकल था। आइंस्टाइन को पता था कि ग्रेविटेशन लाइट को इन्फ्लुएंस करती है, और थ्योरेटिकली ऐसे ऑब्जेक्ट्स हो सकते हैं जो लाइट को ऑब्जर्व कर सकें। लेकिन आइंस्टाइन ये नहीं जानते थे कि एक्चुअली में भी ब्लैक होल्स होते हैं। इनफैक्ट, आइंस्टाइन जब तक जिंदा थे, उन्हें ये ब्लैक होल्स का कांसेप्ट बड़ा अजीबोगरीब लगता था। वो जानते थे कि थियोरेटिकली ऐसी चीजें हो सकती हैं, लेकिन उन्हें ये लगता था कि हां, थ्योरेटिकली तो हो सकती हैं, लेकिन रियलिस्टिकली, प्रैक्टिकली उन्हें यकीन नहीं था कि ऐसी चीजें असली में एग्ज़िस्ट करती हैं। तो एक्चुअली में, उनका देहांत होने तक ब्लैक होल्स जैसा शब्द इन्वेंट भी नहीं हुआ था। यहां पर एक इंटरेस्टिंग फन फैक्ट: आइंस्टाइन की थ्योरी में एक की पॉइंट ये भी था कि लाइट की स्पीड ग्रेविटी के इन्फ्लुएंस को लिमिट करती है। ऐसा नहीं है कि ग्रेविटी का फोर्स इंस्टेंट हमें हर जगह फील होता है। इसकी अप्पर लिमिट है, लाइट की स्पीड। प्रैक्टिकल एग्जांपल से समझाऊं तो इसका मतलब यह है कि मान लो सूरज अचानक से गायब हो गया। आप सब जानते ही होंगे कि हमें 8 मिनट बाद ही पता लगेगा धरती पर कि सूरज गायब हो गया है, क्योंकि लाइट को 8 मिनट का समय लगता है धरती तक पहुंचने में। लेकिन आइंस्टाइन के अकॉर्डिंग, सूरज गायब होने का जो धरती पर ग्रेविटेशनल इम्पैक्ट पड़ेगा, ये भी हमें 8 मिनट बाद ही फील होगा। है ना बहुत इंटरेस्टिंग चीज!
तो आइंस्टाइन के बाद दोस्तों, जो थ्योरी ऑफ जनरल रिलेटिविटी थी, इस पर कई और साइंटिस्ट ने काम किया, जैसे कि कार्ल श्वार्जचाइल्ड, योहानेस ड्रोस्टे, सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर। कई इक्वेशंस थीं। इन लोगों ने उन इक्वेशंस को सॉल्व किया, उनके सॉल्यूशंस निकालने की कोशिश करी। और इन इक्वेशंस के सॉल्यूशन निकालने से पता चला कि थ्योरेटिकल ब्लैक होल्स जैसी चीज एग्ज़िस्ट करती हैं। 1960 तक आते-आते, फाइनली, रिसर्चर्स और साइंटिस्ट ने माना कि थियोरेटिकली ही नहीं, शायद एक दिन रियलिस्टिकली भी हम ब्लैक होल्स को देख पाएंगे, क्योंकि ये चीजें एक्चुअली में स्पेस में एग्ज़िस्ट करती हैं। ब्लैक होल शब्द को पहली बार एक मैगज़ीन ने इस्तेमाल किया था साल 1964 में। लेकिन ये साल 1967 के बाद ही शब्द पॉपुलर बना, जब एक फिजिसिस्ट, जॉन व्हीलर ने इसे पॉपुलर किया। हालांकि ब्लैक होल शब्द सुनने में काफी सेंसेशनल लगता है, लेकिन ये थोड़ा सा मिसलीडिंग शब्द है। ब्लैक होल सुनकर आपको लगेगा कि एक्चुअली में कोई होल है वहां पर, लेकिन ऐसा नहीं होता, वहां कोई होल नहीं है। स्पेस में ब्लैक होल्स स्टार्स से बनते हैं, तो इनके सेंटर में कुछ मटेरियल जरूर है।
अब स्टार्स में क्या होता है दोस्तों, जैसे कि सन भी हमारा एक स्टार है, उनके बीच में न्यूक्लियर फ्यूज़न रिएक्शंस होते रहते हैं। इन रिएक्शंस की वजह से हीट और लाइट प्रोड्यूस होती है। ये जो हीट प्रोड्यूस हो रही है, ये बाहर की तरफ एक फोर्स डालती है, और अंदर की तरफ स्टार्स में फोर्स आता है ग्रेविटेशन की वजह से, जिसकी वजह से ये स्टार इकट्ठा हो के जिंदा रह रहा है। तो एक तरीके से हर स्टार अपनी जिंदगी में एक इक्विलिब्रियम मेंटेन करके रखता है: बाहर की तरफ जाने वाली फोर्सेस रिएक्शन की वजह से, और अंदर की तरफ आने वाली फोर्सेस ग्रेविटेशन की वजह से। लेकिन ये जो रिएक्शन होने लग रहा है, ये कोई फ्यूल की वजह से होने लग रहा है—हाइड्रोजन या हीलियम। ये फ्यूल हमेशा नहीं रहेगा, ये फ्यूल कभी तो खत्म हो जाएगा। और जब ये फ्यूल खत्म होगा, तो बाहर की तरफ जो फोर्स जाने लग रहा है वो रहेगा नहीं, अंदर की तरफ जो ग्रेविटी का फोर्स है, उसे काउंटर करने के लिए कोई फोर्स नहीं रहेगा। तो यह स्टार अपने ऊपर ही कोलैप्स कर जाएगा, अपनी खुद की ग्रेविटी में। ये होने में काफी लंबा समय लगेगा। वैसे हमारे खुद के सन की लाइफ है अराउंड 10 बिलियन इयर्स। लेकिन आगे क्या होता है, ये डिपेंड करता है कि उस स्टार का मास कितना है। यहां पर एक चार्ट देखते हैं स्टार के लाइफ साइकिल का। अगर स्टार का मास ज्यादा नहीं है, छोटा, एवरेज साइज़ स्टार है, तो वो रेड जाइंट में बदल जाता है। उसके बाद वो एक प्लेनेटरी नेबुला बन सकता है, या फिर एक व्हाइट ड्वार्फ बन सकता है। लेकिन अगर एक बड़ा स्टार है, एक ज्यादा भारी स्टार है, जब उसका फ्यूल खत्म होता है, वो ठंडा हो जाता है, एक रेड सुपर जाइंट में बनता है, और फिर वो सुपर जाइंट फटकर सुपरनोवा बन जाता है। उसके बाद बहुत ही छोटा सा कोर रह जाता है। अगर वो कोर ज्यादा छोटा है, तो वो न्यूट्रॉन स्टार कहलाता है, और अगर थोड़ा सा बड़ा कोर है, तो उसे हम ब्लैक होल कहते हैं। बेसिकली कहा जाए, जितना मास था एक स्टार में, जब वो अपने ग्रेविटेशनल फोर्स की वजह से कंप्रेस हो गया, छोटा हो गया, कॉम्पैक्ट हो गया, तो वो ये ब्लैक होल बन सकता है। स्पेसिफिकली कितनी छोटी वॉल्यूम में ये मटेरियल कंप्रेस हो जाता है? अगर कोई स्टार हमारे सन जितना बड़ा है, उसका अगर कोई ब्लैक होल बनता है, तो उसका डायमीटर, उस ब्लैक होल का सिर्फ 50 किमी का होगा। इतनी कम हो जाती है वॉल्यूम! आप इमेजिन कर सकते हो। लेकिन इंटरेस्टिंग चीज यहां पर ये है कि हमारा सन बड़ा होकर कभी ब्लैक होल नहीं बनेगा। इस चीज को प्रूफ किया था एक इंडियन-अमेरिकन एस्ट्रोफिजिसिस्ट, सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर ने, जिन्होंने एक चंद्रशेखर लिमिट वैल्यू निकाली। उन्होंने कहा कि एक व्हाइट ड्वार्फ का मैक्सिमम मास हो सकता है 1.4 टाइम्स द मास ऑफ आवर सन। उसके ऊपर वो स्टेबल नहीं रह पाएगा, फिर वो न्यूट्रॉन स्टार या ब्लैक होल बन जाएगा। लेकिन क्योंकि हमारा सन इस लिमिट से नीचे है, तो वो एक व्हाइट ड्वार्फ ही रहेगा, ब्लैक होल नहीं बनेगा।
ये समझ लिया आपने कि ब्लैक होल क्यों होता है। अब समझते हैं कि ब्लैक होल कैसा होता है। मेनली तीन-चार टाइप के ब्लैक होल्स होते हैं दोस्तों। पहला है स्टेलर ब्लैक होल, जो कि सबसे कॉमन टाइप है ब्लैक होल्स का। वो ब्लैक होल्स जो स्टार्स से फॉर्म होते हैं। साइंटिस्ट का एस्टीमेट है कि हमारी मिल्की वे गैलेक्सी में कम से कम 10 मिलियन से लेकर 1 बिलियन ऐसे ब्लैक होल्स हैं। इसके अलावा होते हैं प्राइमॉर्डियल ब्लैक होल्स। ये वो ब्लैक होल्स हैं जो एक एटम जितने छोटे होते हैं, लेकिन इनका वज़न, इनका मास एक पहाड़ी जितना बड़ा होता है। तो इवन ये भी एक अज़मन है कि इनका साइज़ एक एटम जितना छोटा होता है। ये वाले ब्लैक होल्स दोस्तों सिर्फ थ्योरी हैं, हाइपोथेटिकल हैं। इनके बारे में हम ज्यादा नहीं जानते। तीसरा टाइप होता है ब्लैक होल्स का, सुपर मैसिव ब्लैक होल्स। ये बहुत ही बड़े ब्लैक होल्स होते हैं, इतने बड़े कि इनका मास 1 मिलियन सन्स के कंबाइंड मास से ज्यादा होता है, और ये एक इतनी बड़ी बॉल में फिट होंगे कि उस बॉल का डायमीटर हमारे सोलर सिस्टम जितना बड़ा हो। साइंटिस्ट का मानना है कि हर बड़ी गैलेक्सी के बीच में एक सुपर मैसिव ब्लैक होल है। हमारी मिल्की वे गैलेक्सी के बीच में जो सुपर मैसिव ब्लैक होल है, उसे नाम दिया गया है सेजिटेरियस A। और जो इंटरस्टेलर फिल्म में ब्लैक होल दिखाया गया है, र्गन टुआ, जो उन्होंने नाम दिया था, वो भी एक सुपर मैसिव ब्लैक होल बताया है उन्होंने। इसके अलावा, साइंटिस्ट का मानना है कि एक चौथे टाइप का ब्लैक होल भी हो सकता है, शायद। फॉर श्योर नहीं कहा जा सकता। ये चौथे टाइप का ब्लैक होल होगा इंटरमीडिएट ब्लैक होल, जो कि स्टेलर ब्लैक होल और सुपर मैसिव ब्लैक होल के साइज़ के बीच में कहीं है। हालांकि इसका कोई प्रूफ अभी तक डिस्कवर नहीं किया गया है।
तो एक चीज़, जैसा आपने फिल्म इंटरस्टेलर में देखा होगा और जो फोटोज़ अभी तक आपने देखी होंगी, उन्हें देखकर पता चलेगा कि ब्लैक होल ऐसा नहीं है कि एक बड़ी सी काली बॉल है जो हर चीज़ को अपने अंदर सोख कर लेती है। ब्लैक होल्स दिखने में एक्चुअली में कुछ ऐसे दिखते हैं—मैं स्क्रीन पर आपको मूवी वाला ब्लैक होल दिखा रहा हूं, क्योंकि वो ज्यादा एचडी है और ज्यादा थ्री-डायमेंशनल है उस फोटो के कंपैरिजन में जो इंसानों ने अभी कुछ साल पहले ली थी। तो सबसे पहली चीज़ जो आप इस फोटो में नोटिस करेंगे वो है एक ऑरेंज कलर का रिंग जो इस ब्लैक होल के अराउंड फॉर्म होने लग रहा है। इसे एक्रीशन डिस्क कहा जाता है, और ब्लैक होल्स का एक बड़ा इम्पॉर्टेंट फीचर है ये। अब जैसा कि आप जानते ही हैं, ब्लैक होल्स में ग्रेविटेशनल फोर्स बहुत ज्यादा होता है, तो ग्रेविटेशन की वजह से बहुत सा गैसियस मैटर और बाकी डेब्री ब्लैक होल की तरफ आकर्षित होता है और उसके चारों तरफ फ्लोट करता रहता है, जैसे हमारे सन के अराउंड बाकी के प्लेनेट गोल-गोल घूमते रहते हैं क्योंकि सन का ग्रेविटेशनल फोर्स इतना ज्यादा है। यहां फर्क ये है कि ग्रेविटेशनल फोर्स इतना ज्यादा हो गया है कि जो चीज़ें इसके आसपास घूमने लग रही हैं वो बहुत तेजी से घूमने लग रही हैं, इतनी हीट अप हो चुकी हैं कि वो सब कुछ एक फ्लोइंग फ्लूइड सा मैटर बन चुका है, लिटरली आग के पार्टिकल्स जैसे बन चुके हैं, जो मिलियन डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा गर्म हैं। जितना ब्लैक होल के ज्यादा करीब जाएंगे, उतनी ही ज्यादा तेज ये पार्टिकल्स इसके अराउंड रिवॉल्व कर रहे होंगे। ये पार्टिकल्स इतनी ज्यादा तेज़ घूमते हैं, एक दूसरे के साथ रब होते हैं, कंप्रेशन होता है, कि ये ग्लो करने लग जाते हैं। इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडिएशन इनसे निकलने लग जाती है, जो कि मेनली एक्स-रेज़ होती हैं। तो इस एक्रीशन डिस्क को बड़े ही एक्यूरेटली मूवी में दिखाया गया है। बस एक चीज़ गलत दिखाई गई है कि एक्चुअली में ऑरेंज कलर की नहीं होती। इंसानों की आंखें एक्स-रेज़ को एक्चुअली में देख ही नहीं सकतीं। एक्स-रेज़ विज़िबल लाइट के स्पेक्ट्रम से बाहर होती हैं। हम लोग बस इसे रिप्रेज़ेंट करते हैं ऑरेंज-येलो कलर देकर ताकि हम इसे दिखा सकें कि यहां पर कुछ है। असली कलर इस डिस्क का ब्लू के ज्यादा पास होगा। साल 2019 में पहली बार एक्चुअली में ब्लैक होल की फोटो खींची गई थी, और इसमें भी इन्होंने इस लोइश ऑरेंज कलर का यूज़ किया था इस एक्रीशन डिस्क को रिप्रेज़ेंट करने के लिए।
अब एक चीज़ जो आप क्लियर नोटिस कर सकते हैं असली फोटो में, जो आप मूवी में इतना नोटिस ना करें, वो ये है कि एक साइड पर ये पार्टिकल्स ज्यादा ब्राइट कलर के दिखते हैं, दूसरी साइड के कंपैरिज़न में। इसके पीछे एक बड़ा सिंपल सा रीज़न है: जो पार्टिकल्स हमारी तरफ स्पिन करने लग रहे हैं वो हमें ज्यादा ब्राइट कलर के दिख रहे हैं, और जो हमसे दूर स्पिन करने लग रहे हैं वो हमें डिम हो के दिख रहे हैं। ये होता है डॉप्लर बीमिंग इफेक्ट की वजह से। तो जब आप इस ब्लैक होल की असली फोटो को देखते हो, तो इस ब्लर सी फोटो को देखकर ये चीज़ तो आप समझ सकते हो कि कौन सी डायरेक्शन है जिसमें ये पार्टिकल्स घूमने लग रहे हैं। जो जगह ज्यादा ब्राइट है वो हमारी तरफ आने लग रही है, और जो डिम है वो हमसे दूर जाने लग रही है। अब मूवी वाली इमेज पर वापस आएं, तो एक और इंटरेस्टिंग चीज़ आप नोटिस करोगे: एक्रीशन डिस्क एक तरीके का ऑप्टिकल इल्यूज़न देती है ग्रेविटी की वजह से। देखकर ऐसा लगता है कि ब्लैक होल के ऊपर और नीचे भी इस डिस्क ने कवर कर रखा है। ऐसा हमें बस इसलिए दिखता है क्योंकि ग्रेविटी लाइट को बेंड करने लग रही है। जो डिस्क का हिस्सा ब्लैक होल के पीछे छुपा हुआ है, जब हम इसे सामने से देखने लग रहे हैं, वो लाइट जो वहां से निकल कर आ रही है वो इसके ऊपर से आती है, इतनी बेंड हो जाती है ग्रेविटी की वजह से। अगर हम ब्लैक होल्स को टॉप व्यू से देखेंगे तो वो बिल्कुल राउंड ही दिखाई देंगे, डिस्क नॉर्मल तरीके से दिखाई देगी। ये इल्यूज़न हमें सिर्फ तब दिखता है जब हम ब्लैक होल्स को साइड व्यू से देखते हैं।
इसके अलावा, ब्लैक होल्स के अगर आप अंदर जाओगे, तो बस आपको एक लास्ट लाइट का सर्कल दिखेगा। इसे कहा जाता है फोटोन स्फीयर। इस एरिया में ग्रेविटी इतनी स्ट्रांग हो गई है कि लाइट ने ही ऑर्बिट करना शुरू कर दिया है ब्लैक होल के अराउंड। लाइट किससे बनती है? फोटोन से बनती है। तो ये फोटॉन्स ही गोल-गोल चक्कर लगाने लग गए हैं ब्लैक होल्स के अराउंड। इसका मतलब ये हुआ कि अगर आप इस एरिया में पहुंच गए, ब्लैक होल के, जिंदा बचे रहे, तो थ्योरेटिकली पॉसिबल है कि आपको अपने सर का पीछे का हिस्सा दिखाई दे, क्योंकि लाइट गोल-गोल चक्कर लगाने लग रही है इस रिंग की फॉर्मेशन में। और इस पॉइंट के बाद आती है ब्लैक होल की बाउंड्री, जिसे हम कहते हैं इवेंट होराइज़न। इसे बाउंड्री इसलिए कंसीडर किया जाता है क्योंकि इस पॉइंट के बाद से ग्रेविटी इतनी स्ट्रांग हो गई है कि लाइट भी नहीं बच के निकल पा रही है, यानी सब कुछ काला-काला ही दिखाई दे रहा है। अगर आप एक ब्लैक होल के अंदर गिरने लग रहे हैं और आपने इवेंट होराइज़न को क्रॉस कर दिया है, तो थ्योरेटिकली देखा जाए तो आपके बच निकलने का कोई चांस नहीं है, क्योंकि लाइट भी नहीं बच के निकल सकती, तो एक इंसान क्या बच के निकल सकता है? अब इंटरस्टेलर फिल्म में दिखाया गया है कि कूपर का जो स्पेसक्राफ्ट है वो ब्लैक होल के अंदर जाता रहता है, जाता रहता है, इस इवेंट होराइज़न को क्रॉस कर देता है, और उसके बाद अचानक से वो फाइव डायमेंशन स्पेस में होते हैं। मूवी का यह हिस्सा प्योर इमेजिनेशन है, स्पेक्युलेटिव। एक नोबेल प्राइज़ विनिंग फिजिसिस्ट को हायर किया था सारी चीज़ों को साइंटिफिकली एक्यूरेट रखने के लिए, लेकिन ऑब्वियसली, जो चीज़ें साइंस भी नहीं जानता, अभी तक जिन चीज़ों के बारे में हम जानते ही नहीं हैं, उन चीज़ों के लिए मूवी ने इमेजिनेशन का इस्तेमाल किया है।
एक ब्लैक होल के अंदर, सेंटर में क्या होगा? इसे आइंस्टाइन की जनरल थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी डिस्क्राइब करने की कोशिश करती है। इस थ्योरी ने ब्लैक होल के सेंटर में जो जगह है, उसे सिंगुलैरिटी करके पुकारा है। सिंगुलैरिटी एक ऐसा रीज़न है ब्लैक होल का, वो सेंटर है जहां पर स्पेस-टाइम का कर्वेचर इनफाइनाइट होगा। स्पेस-टाइम की ब्लैक होल के केस में ये बेंडिंग इतनी ज्यादा हो जाती है कि वो इनफाइनाइट हो जाती है। हम रिलेटिविटी की थ्योरी से जानते हैं कि टाइम, एनर्जी, सारी चीज़ों पर असर पड़ता है ग्रेविटेशन का। अगर ग्रेविटेशनल फोर्स इतना ज्यादा है, तो टाइम भी इनफाइनाइट हो जाएगा। इसका क्या मतलब है यहां पर? क्या इसका मतलब ये है कि अगर आप ब्लैक होल के अंदर जाओगे और बाहर कभी निकल पाए उससे, तो बाहर की दुनिया के लिए यूनिवर्स खत्म हो चुका होगा? ये सब हम नहीं जानते, एक्चुअली में सिर्फ थ्योरी बनाई जा सकती है। आपको क्या लगता है? यहां पर नीचे कमेंट्स में लिखकर बता सकते हो। यहां पे कुछ बड़ी इंटरेस्टिंग थ्योरी हैं जो सजेस्ट करी जाती हैं, जैसे कि हम ब्लैक होल के अंदर बाहर से नहीं देख सकते, क्योंकि सब कुछ लाइट उसके अंदर एब्जॉर्ब हो रही है। लेकिन एक थ्योरी ये कहती है कि इवेंट होराइज़न के अंदर लाइट बहुत जगह से रिफ्लेक्ट होकर सिंगुलैरिटी तक पहुंच रही है। तो हो सकता है इवेंट होराइज़न के अंदर हमें एक्चुअली में चीज़ें दिखाई दें। इंसानों ने जो चीज़ ब्लैक होल्स के बारे में एक्चुअली में आज तक फॉर श्योर देखी है वो बस यही फोटो है, इवेंट होराइज़न टेलिस्कोप के द्वारा ली गई। ये फोटो 10th अप्रैल 2019 को जिसने ब्लैक होल्स की एग्ज़िस्टेंस को प्रैक्टिकली प्रूफ किया, करीब 100 साल बाद जब उन्हें थ्योरेटिकली तो पता था।
यहां पर पक्की बात है कि अगर आप एक ब्लैक होल के अंदर गिरते हो तो चांसेस यही हैं कि आपके टुकड़े हो जाएंगे ग्रेविटेशनल फोर्स की वजह से, मिलीसेकंड्स में ही आप मारे जाओगे। लेकिन फिर भी दोस्तों, ब्लैक होल्स से इतना डरने की ज़रूरत नहीं है। बहुत से लोगों को पहले ये मिसकॉन्सेप्ट था कि ब्लैक होल्स सारे मैटर को सोख अप करते रहते हैं और बड़े होते रहते हैं और एवेंचुअली यूनिवर्स को खत्म कर देंगे। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता। जैसा मैंने बताया, हर गैलेक्सी के सेंटर में एक सुपर मैसिव ब्लैक होल होता है। बाकी सारी प्लेनेटरी बॉडीज़ और स्टार्स जो उस ब्लैक होल की ग्रेविटेशन के रेंज में हैं, उसके अराउंड रिवॉल्व करते हैं, ठीक उसी तरीके से जैसे सन के अराउंड सारे प्लेनेट रिवॉल्व करते हैं हमारे सोलर सिस्टम में। यही चीज़ गैलेक्सी के बीच में, और ताकतवर तरीके से होती है। तो एज़ अ कंक्लूज़न, अगर आप ब्लैक होल से अपनी ठीक दूरी बनाए रखेंगे, सोशल डिस्टेंसिंग मेनटेन रखेंगे, तो सेफ और सुरक्षित रहेंगे। और इंटरस्टेलर फिल्म में जो फाइव डायमेंशन के कांसेप्ट की बात करी गई थी, वो भी बड़ा इंटरेस्टिंग कांसेप्ट है, उस पर कभी किसी फ्यूचर के वीडियो में बात करते हैं। अभी के लिए इतना ही। अगर ये वीडियो पसंद आया तो और स्पेस रिलेटेड वीडियोस देख सकते हैं। टाइम ट्रेवल वाला ज़रूर देखिए अगर नहीं देखा तो, उसमें इन्हीं कांसेप्ट्स को और डिटेल में एक्सप्लेन किया गया है। बहुत-बहुत [संगीत] धन्यवाद! [संगीत]