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नमस्कार दोस्तों।
हम में से हर किसी को अपनी जिंदगी में कुछ ना कुछ करना होता है। अगर आप एक स्टूडेंट हैं या कॉलेज में पढ़ने लग रहे हैं, तो आपको अपनी असाइनमेंट करनी होगी।
या फिर अगर आपके एग्जाम्स आने वाले हैं, तो आप सोचेंगे अपने आप से कि मैं अच्छे से पढ़ाई करूंगा, इस साल के एग्जाम्स के लिए एग्जाम्स को टॉप करूंगा।
अगर आप कोई नौकरी ढूंढने लग रहे हैं, तो आप सोचेंगे कि नौकरी के लिए तैयारी करूंगा।
तो कर ना परेशान हो गए। हम लोग ढाई साल से यह भी परेशान हो गए। हम भी परेशान हो गए।
फिर हम सब डिसाइड तो बड़ी जल्दी कर लेते कि हमें ये करना है, वो करना है। लेकिन जो हमें करना चाहिए, वो हम करते नहीं हैं।
अंदर से एक फीलिंग आती है कि आज मूड नहीं कर रहा, इसे कल देखते हैं। इस काम को अभी क्या है? अभी मैं फोन उठाकर थोड़ा कोशिश करते हैं।
इस काम को टालने की साइकोलॉजी को और जानते हैं। क्या है इसका एक्चुअली में सलूशन? आज हम बात करेंगे आलस्य के बारे में।
मैं बचपन से आलसी हूं। मेरे मां-बाप मुझे बदलने की कोशिश कर रहे, पर वो भी आलसी हैं। ऐसे व्यक्ति के अंदर आराम करने की इच्छा बहुत होती है।
थय कन पर कल तो वो कर रहा जो मुझे परसों करना था। नड प्र आ आर शिवजी करेंगे। हम क्या करें? शिवजी करेंगे, खाए।
और सो दोस्तों, इस वीडियो में मैं कोई मोटिवेशनल लेक्चर नहीं दूंगा। क्योंकि मेरा मानना है, मोटिवेशन एक काफी शॉर्ट लिड चीज होती है।
अगर आप एक वीडियो देखकर मोटिवेटेड फील करते हैं और उसके बल पर काम करने लग जाते हैं, तो वह काम आप अगले कुछ घंटे तक करेंगे।
ज्यादा से ज्यादा दो-तीन दिन तक आप मोटिवेटेड रहेंगे, लेकिन उसके बाद वो मोटिवेशन सीधा नीचे चली जाती है और आप काम करना बंद कर देते हैं।
हम यहां पर साइंस का इस्तेमाल करके रूट कॉज पर जाएंगे प्रोक्रेस्टिनेशन की। डॉक्टर पियर स्टील दुनिया के लीडिंग रिसर्चस हैं मोटिवेशन और प्रोक्रेस्टिनेशन की साइंस पर।
10 सालों से ज्यादा से यह इस साइंस को स्टडी करने लग रहे हैं। इनका कहना है कि प्रोक्रेस्टिनेशन कोई ऐसी प्रॉब्लम नहीं है जो सिर्फ आज के जमाने में देखने को मिलती हो।
ये सदियों से चली आ रही है। आज से हजारों सालों पहले, 1400 बीसी में इजिप्शियन हायरो ग्लिफ देखने को मिले हैं, जो इसी चीज की बात करते थे।
यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के एक इजिप्टोलॉजिस्ट हैं, जिन्होंने इसे ट्रांसलेट किया। मेरे दोस्त, काम टालना बंद करो, अपना काम कर लो ताकि हम खुशी से घर जा सकें।
इस समय से करीब 600 सालों बाद, 8800 बीसी में एक पुराने ग्रीक पोएट ने भी सिमिलर सी चीज कही थी। "पुट योर वर्क ऑफ टिल टुमारो एंड द डे आफ्टर फॉर अ स्लगिश वर्कर डज नॉट फिल हिज बर्न।"
नॉर वन हु पुट्स ऑफ हिज वर्क। इंडिया में भी आज से कई सेंचुरी पहले बड़े फेमस संत कबीर ने कहा था।
आपको याद ही होगा, "ये काल करे सो आज कर, आज करे सो अब पल में परले होएगी, बहुरी करेगा कब।"
इसका मतलब बनता है, जो कल करना है, उसे आज कर लो और जो आज करना है, उसे अभी कर लो। नहीं तो कुछ ही समय में जिंदगी खत्म हो जाएगी और फिर क्या करोगे?
इतिहास में ढेरों पोएट्स और मोटिवेशनल स्पीकर्स ने यह चीज बार-बार हमें बताई है। लेकिन हमारी हालत एक्चुअली में बद से बदतर हो गई है।
डॉक्टर स्टील के अकॉर्डिंग, पिछले 40 सालों में 300 से 400 पर ग्रोथ देखने को मिली है क्रॉनिक प्रोक्रेस्टिनेशन में। आज के दिन दुनिया की आधी पॉपुलेशन काम को टालते हैं।
फ्रीक्वेंसी करती है। लेकिन हम ऐसा करते क्यों हैं? इसे थोड़ा और गहराई से समझना पड़ेगा।
जरा सोच कर देखिए, किन चीजों को लेकर आप प्रोक्रेस्टिनेट करते हैं। जब आपको किसी एग्जाम की तैयारी करनी हो, जॉब इंटरव्यू के लिए प्रिपेयर करना हो, तब आप प्रोक्रेस्टिनेट करते हैं।
लेकिन कभी आपने प्रोक्रेस्टिनेट किया है? देता हूं मैं। तो बेसिकली हम सीरियस काम को लेकर प्रोक्रेस्टिनेट करते हैं।
कोई ऐसा काम, जिसको करने में काफी एफर्ट लगता हो, फिजिकल, मेंटल या इमोशनल एफर्ट। हम उस काम को ऐसी चीज से रिप्लेस कर देते हैं, जो हमारे दिमाग के लिए आसान और मजेदार चीज हो।
जैसे कि सोशल मीडिया ब्राउज करना या कोई फिल्म देखने लग जाना। यहां पर डेडलाइंस एक बड़ा इंपॉर्टेंट रोल प्ले करती हैं।
अगर हमारे काम को लेकर कोई डेडलाइन है कि इस डेट से पहले हमें वो काम करना है, तो हम प्रोक्रेस्टिनेट करते हैं। उस डेडलाइन के एकदम पहले तक।
मान लो, हमें कोई प्रेजेंटेशन बनानी है, कल सबमिट करनी है। आज सुबह तक आपको लगेगा कि अभी नहीं करता।
मैं पहले थोड़ा लगोगे, फिर आपको याद आएगा, थोड़ी भूख लग रही है। थोड़ा फ्रिज खोलकर थोड़ा खाना ले लेता हूं। एनर्जी आएगी, फिर पढ़ना स्टार्ट करूंगा।
लेकिन खाना खाने के बाद आपको लगता है कि थोड़ा मूड सेट करना जरूरी है। यहां पर तो मूड सेट करने के लिए मैं कोई यूट्यूब एक घंटा फिर निकल गया।
और थोड़ा फिर आपको थकान फील होती है। आपको लगता है कि अब बड़ा लेट हो रहा है, चलो पहले नहा धो लेता हूं, फिर अच्छे से करूंगा।
घंटों बीतते चले जाते हैं, दिन रात में बदल जाती है। और फिर एकदम से आपके दिमाग में अलार्म बचता है कि अब तो 12 घंटे का समय रह गया है।
अब तो यह करना ही पड़ेगा। मुझे रात को जब सोने का टाइम होता है, आप प्रेजेंटेशन बनाने में लग जाते हो और पूरी रात भर जगकर इसे लास्ट मिनट तक करते हो।
कई स्टडीज करी गई हैं कॉलेज स्टूडेंट्स पर। जैसे कि एलिस और नाउस की 1977 की स्टडी या ओब्रायन की 2002 की स्टडी।
इनके अकॉर्डिंग, एप्रोक्सीमेटली 80 टू 95 पर कॉलेज स्टूडेंट्स प्रोक्रेस्टिनेट करते हैं। लेकिन कॉलेज में तो चलो, हम सबको एक डेडलाइन मिल जाती है और हम किसी ना किसी तरीके से एंड मूमेंट तक काम कर ही लेते हैं।
लेकिन तब क्या होता है जब हमें कोई डेडलाइन नहीं मिलती? तब दोस्तों, प्रोक्रेस्टिनेशन इंफाइटिंग का कोई अंत नहीं होता।
कॉलेज में टाइम वेस्ट करने का मतलब था कि चलो, आपके मार्क्स इतने अच्छे नहीं आते। चलो, शायद से आपको जॉब इतनी अच्छी नहीं मिली होगी। कोई इतनी बड़ी चीज नहीं है।
लेकिन आगे जाकर जिंदगी में प्रोक्रेस्टिनेट करने का मतलब है कि आपको भारी रिग्रेट्स होंगे। अगर आपका सपना था कि आपको किसी दिन फिल्म मेकिंग ट्राई करनी है, अपनी जॉब छोड़कर फिल्म मेकर बनना है।
लेकिन आप ये अरेंजमेंट कभी कर ही नहीं पाते, कभी कोशिश ही नहीं करते। आपने बहुत से अंकल आंटियों को ऐसी चीजें कहते हुए सुना होगा।
भाई, हम भी कभी सोचते थे कि यह करेंगे, वो करेंगे। लेकिन क्या करें, हमारे हालात ही नहीं थे। हमारे भी बड़े सपने हुआ करते थे।
अक्सर ये लोग सरकमस्टेंसस पर ब्लेम डालते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर यह जानते हैं कि इन्होंने कभी कोशिश ही नहीं करी। यह एक परमानेंट काश वाली फीलिंग रह गई।
फिटनेस और एक्सरसाइज जैसी चीजों में प्रोक्रेस्टिनेट करने का मतलब है कि आपको धीरे-धीरे वेट गेन होने लगेगा। कोई इतनी बड़ी चीज नहीं है।
अगर आप वापस हेल्दी खाना खाने लग गए, एक्सरसाइज करने लग गए, कुछ महीनों बाद, एक-दो सालों बाद तो आप वेट वापस लूज कर सकते हो।
लेकिन अगर सालों तक आप प्रोक्रेस्टिनेट करते चले गए, तो एक दिन अचानक से आपको पता लगेगा कि आपको तो डायबिटीज हो गया।
या फिर आपको पता चलेगा कि अचानक से आपके हार्ट में स्टंट लगाने की जरूरत है। कुछ लोगों को तो ये भी मौका नहीं मिल पाएगा।
इमीडिएट कुछ लोगों को हार्ट स्ट्रोक हो जाएगा और उनकी जान चली जाएगी। इसके अलावा, इमोशनल चीजों पे प्रोक्रेस्टिनेट करने के भी कंसीक्वेंसेस बड़े भयानक हैं।
शायद आपका ये सपना है कि आप अपने नाना-नानी, दादा-दादी से कहते हो कि आप एक दिन उन्हें एरोप्लेन में बिठा होगे, उन्हें हवाई जहाज का सफर कराओ।
लेकिन वो दिन कभी आता ही नहीं है। अब इस चीज पर प्रोक्रेस्टिनेट करते रहते हो, करते रहते हो और एक दिन अचानक से आपको पता चलता है कि वो तो गुजर गए।
और इसका नतीजा फिर से भारी रिग्रेट। बहुत सी चीजों का अफसोस होना। प्रॉब्लम यहां पर सिर्फ लाइफ टाइम रिग्रेट की नहीं है, बल्कि स्ट्रेस, एंजाइटी और डिप्रेशन की भी है।
जो आप करना चाहते हो और जो आप कर रहे हो, अगर इसमें एक बड़ा गैप है, तो आपके दिमाग में एक मेंटल कॉन्फ्लेट होगा।
इसे कॉग्निटिव डिसोनेंस कह सकते हो। एक जर्मन यूनिवर्सिटी में स्टडी करी गई थी, हजार से ज्यादा लोगों पर।
इसने पाया कि प्रोक्रेस्टिनेशन की वजह से अक्सर स्ट्रेस ज्यादा होता है, डिप्रेशन ज्यादा होती है, एंजाइटी, फिटीग। इन सब चीजों पर इसका इंपैक्ट पड़ता है।
इसके अलावा, एक और फीलिंग जो प्रोक्रेस्टिनेशन के साथ अक्सर देखी गई है, वो है गिल्ट की फीलिंग। सवाल यहां पर यह है कि अगर काम को टालने से हमें खुशी नहीं मिलती, तो हम उस काम को टालते क्यों हैं?
साइंटिस्ट ने इसको लेकर चार थ्योरी बताई हैं। पहली थ्योरी है एक्सपेक्टेंसी थ्योरी। इसे विक्टर रल्ड ने बनाया था साल 1964 में।
इस थ्योरी के अनुसार, कोई इंसान कितना मोटिवेटेड फील करता है किसी काम करने को लेकर, वो इस पर डिपेंड करता है कि उस इंसान की एक्सपेक्टेशन क्या है रिजल्ट को लेकर।
वो काम करने से जो रिजल्ट आएगा, अगर उसे पाने के चांसेस कम हैं, तो लोगों में मोटिवेशन भी कम होगी।
उदाहरण से समझाता हूं। मान लो, आपका स्कूल या कॉलेज आपसे कहे कि आपकी क्लास में जिस भी बंदे की फर्स्ट रैंक आती है, उसे ₹ लाख का इनाम मिलेगा।
तो क्या आपके अंदर मोटिवेशन आएगी मन लगाकर पढ़ाई करने की? क्या आप काम करेंगे उस फर्स्ट रैंक को पाने के लिए?
अब अगर आप एक ऐसे स्टूडेंट हैं, जो वैसे ही अच्छे मार्क्स लाते हैं क्लास में और आपको पता है कि आप टॉप 10 में ही रहते हैं हमेशा क्लास में, तो आपको पता है कि आपका चांस बहुत हाई है इस प्राइज मनी जीतने का।
ऐसा है तो आप मन लगाकर पढ़ाई करेंगे, आज से ही काम करने लग जाएंगे फर्स्ट रैंक लाने के लिए।
लेकिन अगर आप एक ऐसे स्टूडेंट हैं, जो क्लास में हमेशा पीछे रहते हैं, आपके मार्क्स हमेशा अच्छे नहीं आते, बॉटम पर ही रैंक करते हैं।
आपको पता है कि आपसे ज्यादा नर पढ़ाकू और बच्चे हैं क्लास में, तो आपका चांस वो प्राइज मनी जीतने का बहुत कम है।
इसलिए आपकी पढ़ने की मोटिवेशन भी कम ही होगी। तो यहां पर एक सीधा-सीधा रिलेशन है आपकी मोटिवेशन का रिजल्ट की एक्सपेक्टेंसी से।
याद रखना इस चीज को। अब बात करते हैं सेकंड थ्योरी की। दूसरी थ्योरी का नाम है नीड थ्योरी।
इसे बनाया गया था 1960 में फेमस साइकोलॉजिस्ट डेविड मेकलेले के द्वारा। इनका कहना है कि लोगों की तीन तरीके की नीड्स होती हैं।
तीन तरीके की जरूरतें होती हैं लोगों के अंदर। नीड फॉर अचीवमेंट, नीड फॉर अफिलिएशन। अफिलिएशन का मतलब हो गया, जैसे सोशल रिलेशनशिप्स की आपकी जरूरत है।
और तीसरा नीड फॉर पावर। और डिपेंडिंग अपॉन आपकी पर्सनालिटी क्या है, आपकी सबसे स्ट्रांगेस्ट नीड आपके ऊपर डिपेंड करती है, वो क्या होगी।
अब आपको अगर एक ऐसा काम दिया जाए, जो आपकी साइकोलॉजिकल नीड से मैच करता हो, तो आपके अंदर मोटिवेशन ज्यादा होगी।
वह काम करने की। फिर से उदाहरण से समझते हैं। हमारे जो पॉलिटिशियन हैं, नेता लोग हैं, क्या लगता है उनके अंदर जो नीड है, जरूरत है, वो किस चीज की सबसे ज्यादा है?
पावर की। उन सबको गद्दी पर बैठना है। उनके अंदर नीड फॉर पावर सबसे ज्यादा है।
तो उस नीड से रिलेटेड अगर उन्हें काम दिया जाएगा करने को, तो वो दौड़कर वो काम करेंगे। उनकी मोटिवेशन बिल्कुल हाई होगी।
लेकिन अगर दूसरी तरफ उन्हें काम दिया जाए कि जनता के लिए काम कर लो थोड़ा यहां पर, तो वो नीड उनके अंदर है नहीं।
तो उस काम को लेकर वो प्रोक्रेस्टिनेट जरूर करेंगे। तो ऐसे ही आपको अपने अंदर की नीड को समझना है।
आपके अंदर क्या साइकोलॉजिकल जरूरतें हैं? अगर आपके अंदर भी नीड ऑफ अचीवमेंट है, तो आप अपनी जॉब में ऊपर उठना चाहेंगे।
और ऐसे केस में, अगर आपको जॉब प्रमोशन मिल रही है और उसके लिए आपको कुछ काम करना है, तो वह काम करने के लिए आपके अंदर मोटिवेशन सबसे ज्यादा होगी।
आप अपनी नीड्स को समझिए और अपने काम को उस पर्सपेक्टिव से देखिए। एक और उदाहरण दूं।
अगर आपके अंदर नीड फॉर अफिलिएशन ज्यादा है, मतलब आप बाकी लोगों से दोस्ती बनाने को बहुत रिस्पेक्ट देते हैं।
आपके लिए बाकी लोगों से दोस्ती बनाए रखना, बाकी लोगों का रिस्पेक्ट, बाकी लोगों का अप्रूवल हाई प्रायोरिटी है।
तो जो काम टीम वर्क रिलेटेड होगा, वो आप ज्यादा अच्छे से करेंगे। अब तीसरी थ्योरी यहां पर आती है कूमेट प्रोस्पेक्ट थ्योरी।
इसे बनाया गया था साल 1992 में एमस टवर्सकी और डेनियल कनमैन के द्वारा। ये थ्योरी मेनली दो चीजों के बारे में बात करती है।
पहला है लॉस एवर्जन। मतलब अगर सेम मैग्निटिया घाटा हो रहा है, उसके ज्यादा मायने हैं। और उससे रिलेटेड मोटिवेशन ज्यादा इंपॉर्टेंट है आपके लिए।
लॉस ऑफ अ पर्टिकुलर मैग्निटिया लिया था। अभी थोड़ी देर पहले, अगर मैं आपसे कहूं, एक्सरसाइज कर लो, फिट रहोगे, आपकी मसल्स बन जाएंगी।
तो आपके अंदर जो मोटिवेशन आएगी, ये बात सुनकर, वो थोड़ी सी होगी। लेकिन अगर मैं आपसे कहूं, एक्सरसाइज कर लो, आपके जो टेस्ट रिजल्ट्स हैं, वो दिखा रहे हैं कि आपको जल्दी डायबिटीज हो सकता है।
अगर एक्सरसाइज नहीं करोगे, तो डॉक्टर ने कहा है अगले एक साल में आपको कभी भी हार्ट अटैक हो सकता है।
और एक्सरसाइज करोगे, तो ये आप होने से रोक सकते हो। आपकी मोटिवेशन कितनी ज्यादा होगी पिछले एग्जांपल के कंपैरिजन में?
सिमिलरली, एक और एग्जांपल दूं। अगर मैं आपसे कहूं, ये काम कर लो, आपको जॉब में प्रमोशन मिल जाएगा।
या फिर मैं आपसे कहूं, ये काम कर लो, नहीं तो आपको जॉब से निकाल दिया जाएगा। कौन से केस में आपके अंदर ज्यादा मोटिवेशन आएगी?
ज्यादातर लोगों की सोच यही होती है कि कुछ एक्स्ट्रा मिले ना मिले, चलता है। लेकिन नुकसान नहीं होना चाहिए। जो है, उसे नहीं खोना।
हमें दूसरी चीज, जिसके बारे में थ्योरी बात करती है, वो ये है कि जब हम यहां पर गेन और लॉस की बात करते हैं, ये सब रिलेटिव है।
अलग-अलग लोगों के लिए रेफरेंस पॉइंट अलग-अलग है। अगर कोई लड़का झुग्गी झोपड़ियों में रहता है, वो एक जॉब इंटरव्यू की तैयारी करने लग रहा है।
मन लगाकर, अगर उसे जॉब मिल गई, तो उसकी जिंदगी बदल जाएगी। दूसरी तरफ, एक और लड़का है, जो एक लैंडलॉर्ड का बेटा है।
ऑलरेडी कंफर्टेबल तरीके से रहने लग रहा है। वो पैसे की कोई कमी नहीं है और वो भी सेम जॉब इंटरव्यू के लिए तैयारी कर रहे हैं।
उसे ये जॉब मिल गई, तो ज्यादा फर्क नहीं होगा उसकी जिंदगी में। आप खुद ही सोच कर देखिए, दोनों में से कौन ज्यादा मोटिवेटेड फील करेगा अपना काम करने को।
अब आते हैं हम चौथी और आखिरी थ्योरी पर, जिसका नाम है हाइपरबॉलिक डिस्काउंटिंग। इसका बेसिकली मतलब है, जो रिवार्ड्स हमें इमीडिएट मिलने लग रहे हैं, हम उनके लिए ज्यादा काम करना चाहेंगे।
एज कंपेयर्ड टू जो रिवार्ड्स हमें एक लंबे समय बाद मिलेंगे। इसको लेकर एक हिंदी में कहावत भी है, जो आपने सुनी होगी, "नौ नकद, ना तेरा उधार।"
फ्यूचर किसने देखा है? जो चीज अभी आपके पास है, उसे जकड़ लो, उसे क्लेंज कर लो। इसके कंट्रास्ट में, कुछ ऐसी भी स्टेटमेंट्स आपने सुनी होंगी कि "डोंट बी शॉर्ट साइटेड, लुक एट द लार्जर पिक्चर।"
हैव अ विजन। थिंक ऑफ द फ्यूचर। लॉन्ग टर्म के बारे में सोचना एक अच्छी चीज है, लेकिन हमारा दिमाग क्या है ना?
हमारे दिमाग में मोटिवेशन तब ज्यादा आती है, जब हम ऐसी चीजों पर काम करें, जो हमें जल्दी मिले।
अब ये जो चार थ्योरी हैं दोस्तों, इन चारों थ्योरी को साल 2006 में कंबाइन कर दिया गया और एक मेटा थ्योरी बनाई गई।
डॉक्टर पियर स्टील और डॉक्टर कॉर्निलियस कोनिक के द्वारा। इस कंबाइंड थ्योरी को नाम दिया जाता है टेंपोरल मोटिवेशन थ्योरी।
इस कंबाइंड थ्योरी के अनुसार, आपके अंदर काम करने की मोटिवेशन कब आएगी? कोई मोटिवेशन वीडियो देखने से नहीं आएगी।
आपके अंदर काम करने की मोटिवेशन तब आएगी, जब आपका पर्सनल नीड जो है, वो उस काम और उस काम के रिवॉर्ड से मैच करता हो।
जब आपके अंदर एक्सपेक्टेशन हो कि आप एक्चुअली में यह काम कर सकते हो और रिवॉर्ड जीत सकते हो।
जब आपके काम करने के बाद आपको रिवॉर्ड मिलेगा, वो आपकी रेफरेंस लाइन से कहीं ज्यादा ऊपर हो।
उस रिवॉर्ड के आपके लिए कुछ मायने हो और फाइनली, रिवॉर्ड जल्दी से जल्दी आए, ज्यादा देर में ना आए।
अगर इन चारों फैक्टर्स पे आप टिक मार्क लगा दोगे, तो आप प्रोक्रेस्टिनेट नहीं करोगे।
इसको एक मैथमेटिकल फार्मूला में भी रिप्रेजेंट किया जा सकता है। मोटिवेशन इक्वल्स टू एक्सपेक्टेंसी मल्टीप्ला बाय वैल्यू डिवाइडेड बाय 1 प्लस इंपल्सिवनेस मल्टीप्ला बाय डिले।
अब अगर आप प्रोक्रेस्टिनेशन और मोटिवेशन से एक लेवल और ऊपर उठकर अपनी जिंदगी से टाइम वेस्टेज को पूरी तरीके से खत्म करना चाहते हैं, तो इसको लेकर मैंने एक डिटेल्स कोर्स बनाया।
पूरे 2 घंटे का। इसमें मैंने टाइम मैनेजमेंट, प्रोडक्टिविटी और जिंदगी में हैप्पीनेस की ऐसी प्रैक्टिकल टिप्स बताई हैं, जिसे मैं खुद की जिंदगी में अप्लाई करता हूं।
जिसकी वजह से मैं इतना सब कर पाता हूं। हर दिन एक शॉर्ट्स डालना, मेन चैनल पे रेगुलर वीडियोस, ब्लॉग चैनल्स, ट्रेवल।
आप में से जिन लोगों ने कोर्स को जॉइन अभी तक नहीं किया है, आप जाकर कर सकते हैं। इसका लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा।
और अब टॉपिक पर वापस आते हैं। अब बात क्या है कि कुछ साइंटिस्ट ने इस कंबाइंड थ्योरी को क्रिटिसाइज किया।
ये कहते हुए कि इस थ्योरी में सारी चीजें कवर नहीं होती। जैसे कि साइकोलॉजिस्ट टिम फाय चिल और जे आर फेरारी इसके अगेंस्ट रहे हैं इस थ्योरी के।
उनका कहना है कि अगर हर चीज इतनी रैशनल है मोटिवेशन को लेकर, इस मोटिवेशन के फॉर्मूले में अगर हम यूट्यूब देखेंगे और पढ़ाई लिखाई करने की मोटिवेशन देखेंगे, तो ओबवियसली यूट्यूब उन्हें मिलने लग रही है।
तो इन दोनों साइकोलॉजिस्ट ने आर्गू किया कि इन सारे फैक्टर्स के अलावा एक और भी फैक्टर है, जो कंट्रीब्यूट करता है प्रोक्रेस्टिनेशन में।
और ये फैक्टर है फियर ऑफ फेलियर। हमें फेल होने से डर लगता है और इसलिए हम प्रोक्रेस्टिनेट करते हैं।
ये चीज इन्होंने साल 2012 में कही थी। बाकी सारे फैक्टर्स को अगर हम भूल भी जाएं, तो भी कुछ लोग मोटिवेटेड नहीं होते अपना काम करने को।
क्योंकि उन्हें डर लगता है कि वो फेल हो जाएंगे काम करने में। इसलिए वो सोचते हैं कि इसे करना छोड़ो, हम कोई और चीज करने लग जाते हैं।
अब इसका नतीजा क्या निकलता है? यहां पर दोस्तों, क्या सॉल्यूशन है प्रोक्रेस्टिनेशन का? कैसे हम काम को ना टाले?
सॉल्यूशन इन सारी थ्योरी में ही रखा है। और ऐसा भी नहीं है कि ये जो नई थ्योरी काउंटर में बताई जा रही है, ये कोई पुरानी थ्योरी के अगेंस्ट हो।
एक्चुअली में प्रोक्रेस्टिनेशन के पीछे ये सारी वजहें हो सकती हैं। कई बार लो एक्सपेक्टेशन होना, कई बार हमारा नीड का मैच ना करना या फिर कई बार यह फियर ऑफ फेलियर होना।
अब बात यही है दोस्तों कि अगर आप इन सारी कॉसेस को समझ जाते हो और अपने अंदर झांक कर पहचान पाते हो कि आप जब प्रोक्रेस्टिनेट करते हो, आप जब काम को टालते हो, किन कारणों की वजह से टालते हो, तो आप अपने लिए सॉल्यूशन भी बना सकते हैं खुद का।
तो सबसे पहले अपने दिमाग को क्लियर कीजिए। एक खाली पेपर और पेन लीजिए और अपने आप से बात करिए।
पूछिए अपने आप से कि क्यों आप प्रोक्रेस्टिनेट कर रहे। पेपर पर लिखिए। जब आप कॉज लिखेंगे, तब आपको उसका सलूशन मिल पाएगा।
प्रॉब्लम पहचानने से ही आधा सलूशन तो ऑलरेडी कंप्लीट हो गया। अगर आप अपनी जॉब में काम को टालने लग रहे हैं, यह सोचकर कि कौन सी बड़ी चीज है, कोई इतना बड़ा काम तो मैं करने नहीं लग रहा हूं।
तो मोटिवेशन अंदर से आ नहीं रही है। तो लॉस ऑफ वर्जन को याद रखिए। अपने आप को बताइए, अगर यह काम नहीं करेंगे, तो आपको जॉब से निकाल दिया जा सकता है।
और फिर सोच कर देखिए, क्या-क्या हो सकता है आपके साथ। अगर आप जॉब से हो गए।
तो अगर आपके अंदर मोटिवेशन इसलिए नहीं है क्योंकि आप पढ़ाई करते हैं और आपको पता है कि आप टॉप रैंक पर तो आ ही नहीं सकते।
तो कुछ ऐसी चीज जाकर करिए, जहां पर आप कॉन्फिडेंट हैं कि उस फील्ड ऑफ स्टडी में आप अच्छा परफॉर्म कर सकते हैं।
या यह चीज आपको बहुत पसंद है, इसलिए आप यहां पर ज्यादा अच्छा रिजल्ट लाएंगे। अगर आप कोई बहुत बड़े एग्जाम की तैयारी करने लग रहे हैं और जो रिवॉर्ड है, वो काफी दूर है आपसे।
एक-दो साल बाद जाकर आपको रिवॉर्ड मिलेगा उसका। तो आप क्या कीजिए? उस प्रोसेस को छोटी-छोटी स्टेप्स में डिवाइड कर दीजिए।
हर छोटी स्टेप के बाद एक छोटा रिवॉर्ड दीजिए अपने आप को। इससे क्या होगा? जो इमीडिएट रिवॉर्ड मिल पाएगा आपको।
अगर आप अपनी जिंदगी में कोई बड़ा डिसीजन लेने से डर रहे हैं, आपको डर है कि फेल हो गए तो क्या हो जाएगा?
तो यह याद रखिए कि फेलियर से भी ज्यादा बुरी चीज पता है क्या होती है? कभी ट्राई भी ना करना।
हम लोग फेलियर से इसलिए डरते हैं क्योंकि हमारे अंदर ईगो है। हमें यह डर है कि अगर हम फेल हो गए, तो बाकी लोग हमारे बारे में क्या कहेंगे।
मैं फिल्म मेकर बनना चाहता था, मुंबई गया, ट्राई किया फिल्म मेकर बनने की, लेकिन बन नहीं पाया। मेरे दोस्त क्या कहेंगे?
गया था मुंबई फिल्म मेकर बनने, बन गया, निकल गया सारा शौक। मैंने पहले ही कहा था ना, नौकरी छोड़ने की बेवकूफी मत करना।
लेकिन सुननी तो थी नहीं। तुझे ऐसी स्टेटमेंट्स का डर रहता है। बहुत से लोगों को इस चीज के लिए ये समझना जरूरी है कि हमारी ईगो सबसे यूजलेस चीज है जिंदगी में।
अगर हम इसी डर में जीते रहे कि बाकी लोग क्या कहेंगे हमारे बारे में, बाकी लोगों की एक्सपेक्टेशन पर ही जिंदगी बनाते रहे, तो बाद में जाकर बहुत रिग्रेट होए।
और वीडियो में पहले मैंने रिग्रेट्स की बात करी थी कि बाद में जब बूढ़े हो जाओगे, तो क्या-क्या रिग्रेट्स लोगों को होते हैं।
ये भी आपको फेस करने पड़ेंगे। उसे याद रख लेना। गिलो विच और मेडवे ने 1995 में एक टेंपोरल थ्योरी ऑफ रिग्रेट बनाई थी।
इस थ्योरी के अनुसार, एक्शंस मे प्रोड्यूस ग्रेटर रिग्रेट इन द शॉर्ट टर्म, बट इन एक्शन विल जनरेट मोर रिग्रेट इन द लॉन्ग रन।
अगर आप आज कुछ कर लेते हो, हो सकता है आप कुछ ऐसा कर जाओ, जिसकी वजह से आपको बहुत रिग्रेट सहना पड़े शॉर्ट टर्म में।
लेकिन कुछ ना करना ज्यादा रिग्रेट देगा आपको लॉन्ग टर्म में। अगर आप अपनी जॉब छोड़कर अपने सपने के पीछे भागते हो और फेल हो जाते हो, तो आपको कम रिग्रेट होगा।
एज कंपेयर्ड टू अगर आप अपनी जॉब कभी छोड़ते ही नहीं और कभी ट्राई करते ही नहीं। अब इन सब चीजों के बाद आखिरी चीज जो बची प्रोक्रेस्टिनेशन और आपके बीच में, वो है डिस्ट्रक्शंस।
सोशल मीडिया, आपका फोन। ये लास्ट चीज है जिसकी मैं बात करने लग रहा हूं। क्योंकि अगर बाकी सारी जो मोटिवेशंस मैंने आपको बताई, वो पॉइंट्स अगर क्लियर हैं, तो आप डिस्ट्रैक्टर ही कभी डिस्ट्रैक्टिंग।
आप सोशल मीडिया जैसी चीजों से डिस्ट्रैक्टर देख लो। जिसमें मैंने बात करी है सोशल मीडिया एडिक्शन से साइंटिफिकली कैसे बचना है।
बहुत-बहुत धन्यवाद। [संगीत] [संगीत]