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Allah Ki Taraf Se Azmaish Aur Imtihan ! || New Bayan 2024 || By Moulana Raza Saqib Mustafai

Shining kashmir Official27:14

Transcription

[संगीत] अल्लाह ताला बंदों को आजमाता है, परख करता है, इम्तिहान लेता है। तरह-तरह की नेमतों से उसे मालामाल करता है। कारोबार वसी हो जाता है। उसके लिए दौलत के अंबार लग जाते हैं। दुनियावी मालो असबाब उसके लिए जमा हो जाता है। मंसब मिलता है, ओदा मिलता है, इ्तदार मिलता है। शानो शौकत मिलती है। लोगों के दिलों में उसका घर बनता है। तो उसके ज़हन में यह बात आती है कि मेरे रब ने मुझे जो इज्जत दी है, मैं इसका इस्तेहकाक रखता था। और मैं अगर इस लायक ना होता तो मुझे क्यों नवाजा जाता? तो गोया मेरा रब मेरे ऊपर राजी है। और फिर जब महफिल नात में मेहमान खुसूसी भी बन गए तो फिर तो उनके नफ्स को और तस्कीन मिल गई। जब पीर साहब ने भी उनको ही अहमियत दी। तो फिर उन्हें लगा कि वाकई ही हमारा रब हम पर राजी ही है। तभी तो हमें मजहबी तबों के अंदर भी अहमियत मिल रही है।

हालांकि वो जानते हैं कि हमने ये दौलत कैसे हासिल की है। वो जानते हैं कि हमें सजदे की तौफीक नसीब नहीं है। वो जानते हैं कि आज इस महफिल में मेहमान खुसूसी से तो कल हम शराब खाने में थे। उन्हें पता है। लेकिन इसकी तरफ तवज्जो नहीं जाती। सोचते नहीं है बल्कि वो यह समझते हैं कि हमें ये जो इज्जत मिल रही है ये अल्लाह ताला की तरफ से हमारी किसी कुबूलियत की वजह से ये इज्जत है। हालांकि ये उनकी आजमाइश थी उनका इम्तिहान था।

दूसरी बात और जब अल्लाह उसको आजमाता है फदर रिज़्क को तंग करता है उसको आजमाइश की भटी में डालता है फकूल रबीन तो फिर वो चीख उठता है मेरे रब ने तो मुझे जलील करके रख लिया बीमारी आ जाए इब्तला में मु्तला हो तो वो कहता है कि मेरा रब मुझसे नाराज हो गया तो यह इंसान की कज फिक्री है ऐसा नहीं है किसी शख्स को दौलत का दिया जाना यह अल्लाह की रिजा की दलील नहीं है। और किसी शख्स को गुरबत के इम्तिहान में डाला जाना यह अल्लाह की नाराजगी की दलील नहीं है। हजरत इमाम राजी ने लिखा है कि मक्के से लेकर ताइफ तक 70 ऐसे नबियों की कब्रें हैं जिनकी वफात सिर्फ भूख की वजह से हुई। तकलीफों में, आजमाइशों में, इम्तिहानों में, इब्तलाओं में उसके बंदे रहे। मेरे और आपके आका मौला हुजूर खत्म मर्तबत के घर में कभी बराबर चूल्हा नहीं जलता था। कभी खाने के लिए कुछ मुयसर नहीं होता था। पानी पी के और खजूर खा के गुजारा होता था। तो ये तो कोई दलील नहीं है। अल्लाह की रिजा की दलील क्या है? नेकी की तौफीक मिल जाना। और अल्लाह की नाराजगी की दलील क्या है? किसी शख्स का गुनाह पे दर हो जाना। कोई बंदा गुनाह पर दर है और मासियत नाफरमानियां अल्लाह के हुक्मों को तोड़ना उसका मिजाज है तो समझो अल्लाह उससे नाराज है। और अगर किसी को अल्लाह ने सजदे की तौफीक दी है। किसी को अल्लाह ने अपने रास्ते में खुलूस के साथ खर्च करने की तौफीकात अता की है। हलाल हराम की तमीज उसको अता कर दी गई है। तो फिर समझ लो कि अल्लाह उस पर राज़ है। बाकी रही बात कि किसी को दौलत का ज्यादा दिया जाना, किसी को कम दिया जाना तो ये आजमाइश है।

अब जो अहले ईमान है, अल्लाह के बंदे हैं वो क्या करते हैं? जब दौलत ज्यादा मिलती है, इ्तेदार मिलता है, मंसब मिलता है तो फिर अल्लाह के शुक्र के दायरे में आ जाते हैं। और जब मुसीबत आती है, तकलीफ आती है, अज़यतों में मुब्तला होते हैं। तो फिर वो यह नहीं कहते कि हमारे रब ने हमें जलील कर दिया। बल्कि वो उस पर सब्र करते हैं और अल्लाह के हुजूर दुआएं करते हैं, इल्तजाएं करते हैं। के मालिक तूने जो जिस आजमाइश में हमें डाला हमें पूरा उतरने की तौफीक नसीब फरमा। हमारी सफेदपशी का भरम ना टूटे और हमें उस मुश्किल वक्त से बचाना कि जब हमारी ये गुरबत हमें कुफर तक ले जाए। और जब उनको दौलतमंदी दी जाती है तो वो डरते हैं कि अल्लाह ऐसा ना हो कि यह दौलत हमें फिरौन बना दे। यह दौलत हमें नमरूद बना दे। हमारे अंदर बुखल पैदा हो, तकब्बुर पैदा हो, हमारे अंदर गुरूर पैदा हो। तो वो इस हालत के अंदर अल्लाह ताला का शुक्र या दूसरी हालत में अल्लाह के हुजूर सब्र की तौफीक मांगते हैं और सब्र के साथ अपनी जिंदगी गुजारते हैं।

और आका करीम अल सलाम ने इरशाद फरमाया के कौन है जो मुझसे यह कलमात ले और उन पर खुद अमल करे और फिर आगे उन लोगों तक पहुंचाए जो इन चीजों पर अमल करें। तो बहुत सारे लोग झोलियां फैला के आगे बढ़ जाते। लेकिन इल्म के लिए जो हजरत अबू हुरैरा के सीने में थी उस वजह से उन्होंने पहल की और आगे बढ़ के अर्ज की हुजूर ये खैरात मेरी झोली में डाल दीजिए। मैं खुद भी अमल करूंगा और ऐसे लोगों तक पहुंचाऊंगा भी जो इन पर अमल पैरा हो। तो कहते हैं हुजूर ने मेरा हाथ पकड़ लिया और पांच चीजें गनवाई।

पहली बात मेरे हुजूर ने इरशाद फरमाई इकम तब नास अल्लाह की हराम कर चीजों से बच जाओ तुम लोगों में सबसे बड़े इबादत गुजार बन जाओगे नेकी करना बहुत अहम है लेकिन यहां जो तालीम दी गई वो गुनाह से बचने की है। एक शख्स रात को 100 नफल पढ़ लेता है। लेकिन सुबह उठकर किसी का हक गसब करता है। किसी को गाली देता है। झूठ बोलता है। कम तोलता है। कम नापता है। अल्लाह के अहकाम को तोड़ता है। और दूसरा शख्स सारी रात इशा की नमाज के बाद सोया रहा। और दिन को फजर के बाद उसने झूठ नहीं बोला। किसी को तंग नहीं किया। अल्लाह की मखलूक को जर नहीं पहुंचाया। तो शरीयत ऐसे शख्स को पसंद करती है जो अल्लाह की हराम करता चीजों से बच जाए। नेकी की तौफीक मिल जाए नफली इबादत मुयस्सर आ जाए तो बड़ी बात है। लेकिन उससे बड़ी बात यह है कि अल्लाह की हराम करदा चीजों से बचा जाए।

दूसरी बात इरशाद की वसल्ला तक नास अल्लाह की तकसीम पे राजी हो जा लोगों में सबसे बड़ा गनी तू होगा दौलत की कसरत से बंदा गनी नहीं बनता कितने दौलतमंद हैं। नफ्स की कमी ही खत्म नहीं होती। तो गनी उस वक्त बंदा बनेगा जब अल्लाह की तकसीम पे राज़ हो गया। अल्लाह ने जिस हालत पे रखा उस हालत पे खुश है कि मेरे मालिक ने मुझे जो दे दिया यह मेरे लिए उसने मुनासिब जाना। तो बस मैं इस पे राजी हूं। मैं इस पर खुश हूं। और अगर इंसान यह नहीं चाहता और नहीं करता तो जहां भी होगा वो मुमन नहीं होगा।

फिर इरशाद फरमाया वसिन इला जिका मोमिना अपने हमसाए के साथ सुलक अच्छा कर तू कामिल मोमिन हो जाएगा जो आपका हमसाया है तो आपका साया शफकत का उस पर पड़ना चाहिए आपका हमसाया आपकी तरफ से सख्त धूप में अज़यत गवारा ना करे बल्कि आपके हमसाए के आप हमसाए ही करार पाए। तो आपके ईमान की कसौटी यह है। आपके मोमिन होने का मायार यह करार दिया गया कि आप अपने हमसाइयों के साथ कैसे हो।

चौथी चीज माफ़्स का मुस्लिमा अगर तुम कामिल मुसलमान बनना चाहते हो तो जो अपने लिए पसंद करते हो तमाम मखलूक के लिए वो पसंद करो। अब कोई शख्स यह मिजाज अपनी तबाह में रास कर ले तो मुआशरे के अंदर शर फसाद बदमनी किसी के हुकूक को गसब करना किसी से ज्यादती करना किसी का बुरा चाहना सब कुछ खत्म हो जाएगा और यह मुआशरा जन्नत नज़र बन जाएगा कि जो हम अपने लिए पसंद करते हैं वो हम अपने दोस्त के लिए भाई के लिए हमसाए के लिए अजीज के लिए रिश्तेदार के लिए पसंद करें।

और पांचवी बात व कस दे कल अबू हैरा ज्यादा हसा ना करो ज्यादा हंसने से दिल मर जाता है मुस्कुराना तो सुन्नत है मुस्कुराना हुजूर की आदत थी जिसकी तस्कीन से रोते हुए हंस पड़े उस तबस्सुम की आदत पे लाखों सलाम मुस्कुराने के बाद अगला मरहला देहक का आता है लेकिन देहक कभी-कभी हुजूर से साजिर हुआ और कह यह हुजूर अल सलाम से सादिर नहीं हुआ तो कह कहे से मना कर दिया गया। देहक कभी-कभी हो और तबस्सुम आपकी जिंदगी में शामिल हो। अल्लाह इस हदीसे पाक का नूर हमारी रूह में उतार दे और हमारे बातति में चरागाह करे।

कोरोना वायरस की वजह से पूरे मुल्क के अंदर लॉकडाउन है। तो इस मौके से भरपूर फायदा हासिल करके हमें जिक्रो फिक्र की तरफ आना चाहिए। कुरान मजीद की तिलावत कसरत नवाफल कजाशदा नमाजों की अदायगी और दीगर उमूर खैर बजा लाने चाहिए अपने मां-बाप की सोहबत में बैठना चाहिए उनकी दुआएं लेनी चाहिए अपने बच्चों के पास बैठे और बहुत सारे और उमूर जो हम अपनी मसूफियात के बायस पूरे नहीं कर पाते तो यह मौका है उनको पूरा करने का लेकिन इस मौके से नाजायज फायदा हासिल करते हुए बहुत सारे लोग अपने मकानों की छतों पे धाती तारों के जरिए पतंगे उड़ाने के शुगल में मशरूफ हैं। तो इस शुगल से खुदारा बाज आइए। यह मौका एक दूसरे की मदद करने का है। नुसरत और अयानत करने का है। ना यह कि मकानों की छतों पर खड़े होके आप खूनी खेल खेलें। और धाती डोर के जरिए से लोगों के गले कटे और लोगों को नुकसान हो। तो इससे खुदारा हमें खुद भी बाज आना चाहिए और अपने बच्चों को भी इससे रोकना चाहिए। उनकी हौसला शिकनी करनी चाहिए।

वैसे भी उलमा ने कहा कि यह जो पतंग कटती है तो बच्चे उसको लूटने के लिए दौड़ते हैं उसके पीछे। तो अमूमी तौर पर हमारे यहां यह कहा भी जाता है कि मैं पतंगे लूट रहा हूं या लूट के लाया हूं। तो शरन वो उसकी मिल्क नहीं थी। तो वह कैसे उसको अपने पास रख सकता है? तो यह ऐसा गुनाह है जिसको गुनाह नहीं समझा जाता। और बचपन में मासूम ज़हन पर लूट मार का तसवुर इससे उभरता है। और आज वो पतंग लूट के लाया है। तो कल बड़ा होकर बड़ा लुटेरा बनेगा। तो यह मां-बाप को सोचना चाहिए कि पतंग लूटने का अमल लूटने की एक मशक है और बच्चा इसको कोई बुराई नहीं समझ रहा और इसको गुनाह नहीं समझ रहा। हालांकि यह माले लुकता है। और अगर किसी ने पतंग लूट ली या डोर लूट ली तो हमारे फका ने लिखा है कि छ माह तक उसका ऐलान करे मालिक के ना मिलने की सूरत के अंदर उसको सदका करे। वह खुद फिर भी नहीं रख सकता है। क्योंकि यह माल लुता के हुक्म के अंदर है। तोमी तौर पर हम बच्चे को भी शाबाश देते हैं। उसको बड़ा दलेर करार देते हैं कि उसने इतनी पतंगे लूटी आज उसका यह कमाल है। तो मियां यह बच्चों के नफसियात के अंदर लूट मार के तसवुर को रासे करने का एक जरिया है। पतंग। इस नुक्त नजर की तरफ शायद कभी किसी की तवज्जो ना गई हो। तो इस पे भी गौर करने की जरूरत है। मैं तो यह बात कहा करता हूं के चलती हुई टरााली से या ट्रक से जो बच्चा गन्ना लूटता है तो इसको बच्चे की बहादुरी और फनकारी समझा जाता है। लेकिन आज जिसने गन्ना लूटा है तो कल वो मुल्क लूटने लगेगा। कल वो और कुछ भी लूटेगा। तो ये क्योंकि जब बुराइयां शुरू होती है तो बड़े पैमाने से शुरू नहीं होती। छोटे पैमाने से शुरू होती है। तो पतंग लूटने का तसवुर लूट मार की तरफ ले जाने वाला है। और दूसरा यह कातिल डोर कितने लोगों की जिंदगी का चिराग बुझा देती है और क्या गुजरती है उन मां-बाप के ऊपर जिनका लखते जिगर जिनका बेटा उनके हाथों के अंदर दम तोड़ जाता है और गला कट गया एक डोर से और ऐसे वाक्यात हम कितने सुनते हैं तो मैं गुजारिश करूंगा कि इस खूनी खेल से बाज रहा जाए अखलाकियात भी इजाजत नहीं देते हमारा मुल्की कानून भी इसकी इजाजत नहीं देता और पंजाब पुलिस भी इस पर एक्शन कर रही है। उनके साथ ताुन कीजिए और अपने गिर्दोपेश के माहौल की उन्हें खबर भी कीजिए। खुद भी बचिए। अपनी औलादों को बच्चों को भी इससे महफूज़ रखिए। अल्लाह आपकी हिफाजत करे। व्सलाम वालेकुम व रहमतुल्लाह व बरकात।

कुरान मजीद का उस सुलूब बयान देखिए। कितना दिल आवेज और खूबसूरत और मजब इस्लाम की खूबसूरती देखिए। गरीबों को, यतीमों को, लाचारों को, अपाहज और कमजोरों को, बेवगान और अरामिला और मसाकीन को मदद करना, उनकी अयानत करना, उनको खाना देना। यह तो सारे लोग कहते हैं। लेकिन कुरान ने कितनी खूबसूरती के साथ हमें बताया कि मसला खाने का नहीं है। मसला उनको इज्जत देने का है। अगर तुम उनको खाना देते हो और तजलील भी करते हो तो तुम अल्लाह की रिजा कभी नहीं पा सकते। अल्लाह की रजा तुम्हें तब नसीब होगी जब तुम उनकी इज्जत नफ्स का ख्याल रखोगे। उनकी तजलील नहीं करोगे। तुम उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर और अखबारों पर डाल के उनकी तजलील का सबब जरिया नहीं बनोगे तो फिर तुम्हारा रब तुमसे राजी है। तो बात खाना देने की नहीं है। कुरान कहता है तुम उनकी खिदमत करो। उनको खाना खिलाओ लेकिन इस चीज का तुम्हें पहले ख्याल होना चाहिए कि तुम उनकी इज्जत नफ्स को मजरू ना होने देना। तस मेरे हुजूर ने फरमाया जिस शख्स ने सदका किया और इतने मखफी अंदाज में किया कि जो दाएं हाथ ने खर्च किया बाएं हाथ को उसका पता ही ना चला कयामत के दिन जब कोई साया नहीं होगा अल्लाह ऐसे शख्स को अपने अर्श का ठंडा साया नसीब फरमाएगा कितनी बड़ी बात है। कुरान ने हमें सिर व इलानिया दोनों तरीके बताए हैं। ऐलानिया भी खर्च कर सकते हो, मखफी भी खर्च कर सकते हो। लेकिन ऐलानिया खर्च तुम तब करोगे जब किसी की इज्जत नफ्स का मसला नहीं हो। आप मस्जिद के लिए फंड मांग रहे हैं। कोई बात नहीं। यहां तो कोई ऐसा शख्स नहीं है। लेकिन किसी एक शख्स को दे रहे हैं तो फिर आपको इस बात का ख्याल करना होगा। उस वक्त फिर मखफी करना तुम्हारे लिए जरूरी है। इसी तरह अगर तुम तरगीब के लिए कर रहे हो तो कोई बात नहीं है। लेकिन उसमें भी तुम यह ख्याल रखो के तरगीब में भी किसी का दिल ना दुखने पाए। किसी की तस्वीर ना आने पाए। तरगीब दिलाने के बहुत सारे तरीके हैं। लेकिन तरगीब दिलाने से कब अपने दिल से सवाल कर लो। तरगीब के पीछे छुपी हुई कहीं रियाकारी तो नहीं है। क्योंकि रियाकारी जो है यह काले पत्थर पर काले रंग की चींटी चले तो उसकी चाल से भी ज्यादा बारीक है। तो ये बड़ी बारीक चाल है। तो बाज़कात बंदा कहता है मैं तो तरगीब के लिए कर रहा हूं। लेकिन उसके पीछे उसका नफ़्स खड़ा होता है। और उसके नफ़्स पे यह शाख होता है कि वो बगैर तशहीर के करे। तो वह तरगीब का नाम ले के अपनी उस रियाकारी के ऊपर तरगीब का पर्दा डालना चाहता है। लेकिन होती रियाकारी ही है। तो यह अपने आप से पूछे बंदे को पता होता है कि मैं कहां खड़ा हूं। इकबाल ने कहा था कि मुल्ला से ना पूछ अपने दिल से पूछ। तो बंदे को पता होता है कि यह तरगीब है या इसके पीछे छुपी हुई रियाकारी है और रियाकारी थोड़ी सी भी अल्लाह को काबिल कबूल नहीं है। हजरत अबू अमा अल बाली रदी अल्लाह ताला फरमाते हैं के मैंने हुजूर से पूछा कि एक शख्स जिहाद करता है और अपनी जान वार देता है। और उसका मकसद अल्लाह के दीन को सर बुलंद करना है। लेकिन उसके ज़हन में यह भी है कि चलो मेरी बहादुरी के झंडे भी लग जाएंगे। तो क्या उसको इस अमल का सिला मिलेगा? तो मेरे हुजूर ने इरशाद फरमाया फला श उसे कोई अजर नहीं मिलेगा। अल्लाह सिर्फ उसी अमल को कबूल करता है जो महज उसके लिए किया जाए। तेरे अमल में अखलास हो तो इसका जर कुछ और है। हुर खयाम से गुजर बादा जाम से गुजर। जो महज उसकी रिजा के लिए अमल किया जाए वही अमल है। हजरत मुआज बिन जबल रदी अल्लाह ताला हुजूर के रोजे अनवर के पास बैठ के रो रहे थे। हजरत उमर गुजरे तो रुक गए। कहा मुआज रो रहे हो? कहा के साहिबे मजार का एक फरमान याद आया जिसने मुझे रुला दिया। तो कहा वो क्या फरमान था? कहा एक दिन हुजूर ने कहा था थोड़ी सी रयाब भी शर्क है। थोड़ी सी रियाबी शर्क है। तो जरूर रुकिए। आप तरगीब का नाम ले रहे हैं कि मैं तरगीब देने के लिए कर रहा हूं। लेकिन जरा एक लम्हे के लिए रुक के अपने आप से सवाल कर लीजिए। तरगीब के पर्दों के पीछे छुपी हुई कहीं रिया तो नहीं है। अगर रिया कहीं छुपी है तो अमल जाया हो गया। अमल बर्बाद हो गया। कीती कतरी पई खू मोहम्मद ते सिक्का बन जदा सब कुछ बर्बाद हो गया। इसलिए महज उसकी रिजा के लिए तरगीब भी अगर आपकी नियत है तो उससे कब अच्छी तरह अपने आप को जांच लें कि हम खड़े कहां हैं। अल्लाहू अकबर।

तो कहा के कल्ला बल्ला तून यतीम तुम्हारा मसला यह है कि तुम यतीम की तकरीम नहीं करते हो इज्जत नहीं देते हुजूर अल सलातो सलाम ने फरमाया कि मोमिन का मामला भी बड़ा अजीब है कि उसे अगर तकलीफ होती है तो उस पर वो सबर करता है या उसे खुशी मिलती है तो उस पर वो शुक्र करता है तो दोनों सूरतों में अल्लाह उसको अजर अता करता है और यह सिर्फ शान मोमिन की ही है कि वो मुसीबत पर सबर करे बल्कि बल्कि फरमाया कि मोमिन के पांव में कांटा भी चुभता है तो उसका भी उसको अजर दिया जाता है। उसके दर्जे बुलंद होते हैं। उसके गुनाह माफ कर दिए जाते हैं। उसकी खताओं से दरगुजर कर लिया जाता है। लेकिन यह मशरूत है उस तकलीफ को सब्र के साथ बर्दाश्त करने से। अगर वह वावेला करता है, नाशुक्री के कलमात कहता है तो तकलीफ तो खत्म नहीं होती लेकिन अजर जाहिल कर दिया जाता है। तो इसलिए हमें हर सूरत के अंदर सब्र के दामन को मजबूती से थामने की तल्लकीन की गई है और अहले ईमान को यह भी सबक दिया गया कि जब उन्हें कोई भी मुसीबत पहुंचती है तो वह कहते हैं इन्नाल्लाह व इन्ना इज कि हम उसी के हैं और उसी के हुजूर पलट के जाना है। तो यह वह अमल है कि जो उनकी तबीयत के अंदर ठहराव पैदा करता है और उनकी जिंदगियों के अंदर अल्लाह ताला जल शानू पर जो यकीन है उसका पता देता है। अगर मुसीबत को अल्लाह की तरफ से समझ के मान के सब्र किया जाए। उसको मकदूद समझा जाए। उस पर वावेला ना किया जाए। अल्लाह की नाफरमानी का कोई कलमा ना बोला जाए। अपने अकीदे में तजलजुल ना आने दिया जाए। अपने रवयों की खूबसूरती को जायल ना होने दिया जाए। तो इसका मतलब है कि वो शख्स मोमिन है। उसका यकीन है कि यह अल्लाह की तरफ से है। तो फिर उसके यकीन के सिलेले के अंदर अल्लाह उसको फिर हिदायत कलब का चरागा नसीब करता है। और फरमाया व्ला कुल शलीम और अल्लाह हर शय को जानने वाला है। उसे पता है के किसी पर मुसीबत नाजिल क्यों करनी है। और इस मुसीबत से उसका इम्तिहान लेना मकसूद है। उसके दर्जों को बुलंद करना मकसूद है। उसके गुनाहों को माफ करना मकसूद है। उसको किसी आजमाइश में डाल के उसको मजीद कुंदन बनाना मकसूद है या उसका क्या मकसूद है? उसको सजा देना मकसूद है। ये उसे पता है। तुम्हारा रब तुम्हारी तरफ आने वाली जो तकलीफें हैं उनके अंदर हजार बिनहा हिकमतों से वाकिफ है। यहां यह बात भी समझने के काबिल है के जो शख्स मुसीबत के आने पर सब्र और इस्तकामत के साथ उससे निपटता है और अल्लाह पर जो उसका यकीन है उसमें तजलजुल पैदा नहीं होने देता। कुल कुल ए महबूब फरमा दीजिए जो कुछ है वह तुम्हारे रब की तरफ से यह उसका ख्याल और फिक्र है कि यह मेरे अल्लाह की तरफ से तो फिर उस मुसीबत को टालने वाला भी वही है। तो अगर यह उसका अकीदा पुख्ता था तो फिर वो मालिक की दहलीज छोड़ के मालिक की चौखट छोड़ के किसी और दहलीज पर नहीं जाएगा। किसी और चौखट पर नहीं जाएगा। वो उस मुसीबत को दूर करने वाला मुसरे हकीकी अल्लाह को ही जानता होगा और उसी के हुजूर दुआएं करेगा, इल्तजाएं करेगा। किसी शर्क का इरखाब नहीं कर सकता है और वो मालिक की दहलीज से कभी रूह गिर्दानी नहीं कर सकता। बल्कि इस तकलीफ के आने से वो अपने रब के साथ और ज्यादा जुड़ जाएगा। और अगर वो सबर करे तो यह उसका एक मर्तबा है कि वो हौसले के साथ उस तकलीफ को बर्दाश्त करे। और दूसरा मर्तबा जो इससे बढ़कर है कि उस पे अल्लाह की रिजा के सांचे में अपने आप को ढाल ले कि जे सोना मेरे दुख विच राजी मैं सुख न चूल्हे डावा अगर वो इस बात पे राजी है तो कोई बात नहीं है। मैं इस पर राजी हूं क्योंकि मेरे रब की ये रजा है। तो ये दोनों चीजों का मिल जाना या दोनों में से किसी एक का मिल जाना ये अल्लाह की तरफ से उसको दिया गया इनाम है जो इस मुश्किल हालात में उसको हासिल होता है। अब वह किस कैफियत में है? अल्लाह ताला उसको खूब जानता है। कि वह इस पे सबर कर रहा है या उसका अंदर डोल रहा है। उसका अकीदा कमजोर था और वो कमजोरी के बायस जो है वो तजलजुल का तजबुब का शिकार हो गया। तो यह तुम्हारा रब खूब जानता है। तो तुम्हारे सीने के अंदर छुपी हुई कैफियत तुम्हारे जाता है। सवाल का दरवाजा खोल देता है। अल्लाह उसके लिए मोहताजी का दरवाजा खोल देता है। हालात सख्त भी हो अगर काबिल बर्दाश्त हो तो उनको बर्दाश्त करना चाहिए ताकि सवाल की हालत ना पड़े। इंसान मखमसे की हालत में हो मजबूर हो जाए तो वो एक अलग बात है। मखमसे की हालत में सवाल जायज हो जाता है। लेकिन अगर हालत मखमसे की ना हो तो फिर सवाल नहीं करना। थोड़ी सी मुश्किल आई और अनाज बटते हुए देखा तो खुद भी सवाली बनके जाके खड़े हो गए। जबकि हमारे घर के अंदर इतना कुछ मौजूद था कि हम गुजर कर सकते थे। लेकिन मुफ्त का माल है लिहाजा कोई हरज नहीं है। तो फिर आहिस्ताआहिस्ता इंसान इसका आदि बन जाता है। अल्लाह उस वक्त से बचाए कि हम मोहताज हो और हमें अमलन उस जगह पे आना पड़े। अल्लाह सबको महफूज़ फरमाए। लेकिन अगर हालात कुछ तल्ख भी हो तो फिर भी अगर आप देखें अपने आप को कि क्या हम ऐसी जगह पर तो नहीं है कि हम सवाल करने जाएं तो बाहर एक माहौल देख कर के तो लपक पड़ना तो इससे आपकी तबाह के अंदर सवाल की आदत पैदा होगी। तो इसलिए जो मांगना शुरू कर देता है फिर उसके लिए मोहताजी का दरवाजा बंद नहीं होता। इला यह कि कोई सख्त मजबूर हो जाए तो शरीयत उसको उसकी इजाजत देती है।

तीसरी बात मेरे और आपके आका मौला ने जो कसम करके कही माकासा माल सदका कि सदके से बंदे का माल कम नहीं होता। आपका अकाउंटेंट कहता है कि अगर इतने पैसे इतनों से निकाल दिए गए तो बाकी इतने बचेंगे। कैलकुलेटर का हिसाब भी यही है। लेकिन मेरे महबूब फरमाते हैं कि मैं जमाना देता हूं कि सदके से माल कम नहीं होता। तो इसलिए तुम राहे खुदा में खर्च करोगे तो मेरा रब कह रहा है खैर। यह तुम्हारे लिए बेहतर है। तुम्हें लगता है कि इतने कम हो जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं है। तुम्हारा माल सदके से घटता नहीं है। सदके से तुम्हारा माल बढ़ता है। और अल्लाह ताला जल शानू एक का 10 गुना अता करता है। 70 गुना अता करता है। 700 गुना अता करता है। फरमाया अल्लाह चाहे तो इससे भी ज्यादा अता कर दे। और फिर फरमाया इन तदुल्लाह करन हसना अगर तुम अल्लाह की राह में कर्जे हसना दो तो वह दुगना करके देगा। अच्छा यह कैसा अल्लाह का अंदाज बयां है कि खुद माल देके खुद कह रहा है मुझे कर्जा दो और फिर खुद कहता है मैं दुगना दूंगा दिया हुआ किसने है उसी ने और कहता है कि जो मैंने तुम्हें दिया है उससे मुझे दो और मैं फिर उसको अपने दिए हुए माल से दिए गए माल को दुगना करके तुम्हें लुटाऊंगा अल्लाहू अकबर और फिर फरमाया और तुम्हें बखश भी दूंगा व्ला शुक हलीम वो शुक्रगुजार भी है और इल्म वाला भी है। अल्लाहू अकबर वो बुरबार भी है। वो तुम्हारा शुक्रगुजार भी होगा। तुम्हें दुगना करके भी देगा। तुम्हारी मगफत भी कर देगा और तुम्हारे माल में कमी भी नहीं आने देगा। और यह बेहतर भी तुम्हारे लिए होगा। यह तुम्हारी आजमाइश थी। तुम्हारा माल तुम्हें देकर तुमसे मांगा। और जिसके लिए मांगा उसको अल्लाह डायरेक्ट भी तो दे सकता था। लेकिन कहा कि उसकी आजमाइश है कि उसको गुरबत की भट्टी में डाला गया। तुम्हारी आजमाइश यह है तुम्हें फरावानी दी गई। आप देखिए कि वो आजमाइश में पूरा निकलता है। तुम आजमाइश में पूरे निकलते हो। दोनों आजमाइश में पूरे निकलते हैं या फिर तुम नामुमराद और नाकाम हो जाते हो। अल्लाहू अकबर। अल्लाह जल्ला शानू पूरे आलम के ऊपर फैली हुई वबा को दूर फरमाए। बिलखसूस उम्मते मुस्लिम की खैर करे और मेरे वतन पाकिस्तान को अमन का नूर का रहमत का गवारा बनाए और यहां निजाम रसूल की बहारें पैदा करे अल्लाह हमें मुआशी बोहरानों से निकाल के मशत का इस्तेहकाम अता करे और एक दूसरे के लिए जज्बा एहसास जज्बा हमदर्दी और राहे खुदा में खर्च करने का जज्बा फरामा हमारा मकसूद करे