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[संगीत] [संगीत] देखिए संसार में एक नियम है कारण कार्य सिद्धांत। हां जी, क्या बोला? जो व्यक्ति इस बात को समझ लेगा कारण कार्य सिद्धांत, वो ऐसे अंधविश्वासों में, पाखंडों में नहीं फंसेगा। तो वह सिद्धांत समझ लीजिए।
कारण उसे कहते हैं जिसके बिना कोई कार्य ना हो सके। बोलिए, जिसके बिना कोई कार्य ना हो सके और उसके होने पर हो जाए, उसको कारण कहते हैं। जैसे अग्नि होने पर रोटी पकेगी। अग्नि ना होने पर रोटी नहीं पकेगी। तो अग्नि रोटी पकाने का कारण है। यह उदाहरण समझ में आया? आ गया। अग्नि है चूल्हे में, तो तो रोटी पक सकती है और गैस खत्म हो गया, अग्नि खत्म है, नहीं जल सकती, तो फिर रोटी नहीं पकेगी। तो जिसके होने से जो हो और ना होने से ना हो, उसको करण कहते हैं।
[गला साफ़ करने की आवाज़] ईंट, पत्थर, चूना, सीमेंट होने पर मकान बनेगा। ईंट, पत्थर, चूना, सीमेंट ना होने पर नहीं बनेगा। तो ईंट, पत्थर, चूना, सीमेंट को मकान बनाने का कारण मान लेंगे। यह बात ठीक है। तो संसार भर में जितना भी सत्य है, वह इस कारण सिद्धांत पर टिका हुआ है। वर्षा जब भी होगी, बादलों से होगी। बिना बादल के वर्षा हो सकती है? नहीं हो सकती। यदि बिना बादल के भी वर्षा हो जाए, तो फिर बादल को वर्षा का कारण नहीं माना जाएगा। अग्नि के बिना ही रोटी पक जाए, तो फिर अग्नि को कारण नहीं मानेंगे। इसलिए कारण की यह पहचान है कि उसके बिना कार्य नहीं होगा। अग्नि के होने पर रोटी पकेगी, ना होने पर नहीं पकेगी। इसलिए अग्नि कारण है।
अब वहां पर एक व्यक्ति रोटी बना रहा था जंगल में। अग्नि थी, तवा भी था, रोटी पक रही थी। पास में एक गधा खड़ा हुआ था। अरे चलो चलो चलो चलो। बड़ा जो व्यक्ति जंगल में खाना बना रहा था। ओम, जो व्यक्ति जंगल में खाना बना रहा था, अग्नि थी वहां, तवा भी था और उस पर रोटियां बना रहा था। पास में एक गधा भी खड़ा था। तो कोई व्यक्ति बाहर से बच्चा आया। उसने देखा कि यहां रोटियां बन रही हैं और गधा भी खड़ा हुआ है। ठीक है? फिर वो दूसरी जगह पर गया। वहां उसने देखा, भाई रोटियां तो बन रही हैं, अग्नि भी है, पर गधा नहीं खड़ा हुआ। यहां तो बिना ही गधे के रोटियां बन रही। तो एक जगह पर जब रोटी बन रही थी, तो उसने गधे को भी साथ में देखा। दूसरी जगह जब रोटी बन रही थी, तब गधा नहीं था। तो गधे को रोटी का कारण माने या नहीं माने? नहीं मानेंगे। उसके बिना भी काम हो रहा है। तो जिसके बिना काम हो जाए, इसका मतलब वह कारण नहीं है।
अब जो घटना आपने सुनाई आबू पर्वत की कि वहां पर एक सज्जन गए, सेठ जी और मंदिर पर गए। वहां रास्ता टूटा-फूटा था और वहां जाकर उन्होंने अपनी मन्नत मानी कि अगर मुझे संतान प्राप्ति हो गई हो जाए। ऐसे भगवान से प्रार्थना की, हे भगवान मुझे संतान प्राप्ति हो जाए और हो गई। तो जितने भी लोग संतान प्राप्ति वाले हैं, मान लो 100 आदमी वहां जाएं, तो क्या सबको संतान प्राप्ति हो जाएगी उस मंदिर में जाकर प्रार्थना करने से? नहीं भी हो सकती। तो यदि नहीं हुई, तो फिर कारण नहीं हुआ। अगर अग्नि के बिना भी रोटी पक जाए, तो अग्नि कारण नहीं है ना। अग्नि के होने पर रोटी बनती है, ना होने पर भी यदि बनती है। जैसे गधे का मैंने उदाहरण दिया। गधा खड़ा था, तब भी रोटी बन रही थी। गधा नहीं था, तब भी रोटी बन रही थी। तो इसका मतलब गधे का कारण रोटी पकाने में नहीं है। तो मंदिर में जाने पर भी संतान हो रही है और नहीं जा रहा, उसकी भी हो रही है। जिन-जिन की संतान हो रही है, क्या वो सारे के सारे वहां मंदिर में जा रहे हैं? तो उसके वहां जाए बिना भी तो हो रही है ना। तो इसका अर्थ क्या हुआ कि मंदिर में जाके प्रार्थना करने से संतान नहीं होती। वह उसका कारण नहीं है। उस सेठ जी को जो संतान प्राप्त हुई, उसका कारण कुछ और है। जैसे गधा रोटी पकाने में कारण नहीं है। उसका कारण तो अग्नि है। अग्नि सब जगह पर मिलेगी। जहां भी रोटियां बनेंगी, बिना अग्नि के रोटी नहीं पकेगी। यह नियम है। तो इससे पता चला कि अग्नि रोटी पकाने का कारण है। इसको बोलते हैं कारण कार्य सिद्धांत।
तो दुनिया भर में आप कहीं भी चले जाइए, कोई भी घटना देखिए, वहां कारण कार्य सिद्धांत को चेक करें। तो वृक्षों के चारों ओर धागा बांधने से, चक्कर लगाने से नौकरी मिलती है, बच्चे पैदा होते हैं, मुकदमा जीत जाता है व्यक्ति। क्या इसका मुकदमा जीतने से कोई कारण कार्य सिद्धांत है, कोई संबंध है? हां या ना? इसलिए झूठ है, पाखंड है, अंधविश्वास है। तो वृक्ष के चारों ओर चक्कर काटने से, किसी कब्र के मजार के चारों ओर चक्कर काटने से, मजार पर चादर चढ़ाने से आपकी नौकरी नहीं लगेगी। इसका उसके साथ कोई संबंध नहीं है। इसलिए वह सब झूठ है, भ्रांति है। ठीक है? हां। वो उसका कारण कुछ और है। वह कारण ढूंढो। जिसका उससे संबंध हो उस घटना से, वह कारण है।
एक व्यक्ति बंबई में घाटकोपर में चल रहा था। ठीक है? और दिल्ली में एक वृक्ष के ऊपर एक कौवा आकर बैठा। और जिस समय कौवा 12:00 बजे दोपहर में बैठा, उसी समय वो घाटकोपर वाला व्यक्ति सड़क पर चलते-चलते गिर के मर गया। उसको अटैक आ गया और वो मर गया। तो किसी ने कहा कि यह जो दिल्ली में वृक्ष पर कौवा आकर बैठा है ना, उसके कारण यह मरा है। मुंबई वाला। बताओ कोई अकल की बात है? दिल्ली में कौवा पेड़ पर बैठे और बंबई में आदमी सड़क पर चलता हुआ मर जाए। इन दो घटनाओं में क्या संबंध है? तो जिन दो घटनाओं में कोई संबंध नहीं है, वहां पर कारण कार्य संबंध सिद्धांत लागू नहीं होता।
तो ऐसी 50ों भ्रांतियां हैं। कोई बालाजी तिरुपति जा रहा है। वहां बाल कटवा के आ रहा है। उसकी मनोकामना पूरी हो गई। कितने लोग जाते हैं वहां, जाते हैं ना। वो अपने बाल कटवा के आते हैं और वो लोग करोड़ों रुपए का उससे बिजनेस करते हैं। जो भगत लोग वहां अपने बाल काट के दान कर आते हैं, वो मंदिर वाले उसको एक्सपोर्ट करते हैं और करोड़ों रुपए कमाते हैं। तो यह बहुत सारी भ्रांतियां हैं। कहीं किसी मंदिर में जाके कोई देवता आपकी बात नहीं सुनता। वो तो मट्टी का देवता है, जड़ देवता है। वो आपकी बात समझता ही नहीं। वो पूरी क्या करेगा? यह बालाजी तिरुपति के एक मंदिर के पंडित ने मुझे कही थी यह बात। यह सच्ची बात सुना रहा हूं। मैं खुद वहां गया था देखने। दर्शन-दर्शन करने मतलब विजिटिंग करने। घूमने गया था। देखने गया था। ऑब्जरवेशन कि मंदिर में होता क्या है? क्यों इतनी भीड़ लगती है? क्यों इतनी लाइन लगती है? वो अंधविश्वास और पाखंड है। तो मैंने वहां के पंडित जी से पूछा। मैंने कहा, पंडित जी, यहां आपके यहां बहुत लाइन लगती है, बहुत भीड़ आती है, खूब दान मिलता है। तो आपका यह देवता बालाजी क्या उनकी कामनाएं पूरी करता है? बोले, नहीं करता। तो मैंने कहा, फिर इतनी भीड़ क्यों आती है? तो पंडित जी ने कहा, जनता मूर्ख है। हम उसकी मूर्खता का लाभ उठा रहे हैं। यह बोला उसने, जनता मूर्ख है। हम उसकी मूर्खता का लाभ उठा रहे हैं। हमारा यह बालाजी मट्टी का देवता है। यह तो सुनता भी नहीं, समझता भी नहीं। यह क्या पूरी करेगा? तो मैंने कहा, फिर कैसे पूरी हो रही है? बहुत से लोगों की कामना पूरी होती है। बोले, हां होती है। फिर कैसे होती है? तो वहां के पंडित जी ने बताया। उस दिन वो थोड़ा मूड में थे। खुल के सारी बात बता दी। उन्होंने मुझे। मैंने कहा, फिर यह लोगों की कामना कैसे पूरी होती है? तो बोले, संसार मैथमेटिक्स में, गणित में एक नियम है, लॉ ऑफ प्रोबेबिलिटी। क्यों जी है ना? हां। प्रोबेबिलिटी का नियम है। संभावना का नियम। तो बोले, आपने मैथ्स पढ़ा है? मैंने कहा, हां, थोड़ा बहुत पढ़ा है। तो मैथ्स में एक नियम होता है, लॉ ऑफ प्रोबेबिलिटी। मैंने कहा, हां, होता है। यह तो मैं जानता हूं। बोले, क्या मतलब है इसका? मैंने, इसका मतलब यह है कि अगर 100 विद्यार्थी परीक्षा में बैठेंगे, तो 50 तो पास हो ही जाएंगे। क्यों लालचंद जी? 50 तो हो ही जाएंगे। यह संभावना है 50 की। कुछ तो पढ़ते ही हैं ना। सारे थोड़ी मूर्ख होते हैं। सारे अनपढ़ नहीं होते। सारे आलसी नहीं होते। कुछ तो पढ़ते ही हैं। तो 100 व्यक्ति परीक्षा देंगे, तो 50 तो पास हो जाएंगे। तो मान लो कोई ज्योतिषी उनको बताए कि तुम्हारा भविष्य बहुत अच्छा है, तुम पास हो जाओगे। वो तो 100 के 100 लोगों को कह देगा। तो क्या 100 के 100 फेल हो जाएंगे? मैंने कहा, नहीं। 100 के 100 फेल नहीं होंगे। 50-60 तो पास होंगे ही। तो बोले, वो 50-60 जो पास हुए, वो ज्योतिषी के कहने से पास हुए या अपनी पढ़ाई में मेहनत करने से पास हुए? बोलो जी। पढ़ाई में जो मेहनत की, जिसने, वो पास हो गया। जिसने नहीं की, वो फेल हो गया। तो 50-60 तो पास हो ही जाते हैं। यह है संभावना का नियम।
तो उन्होंने कहा कि हमारे यहां मान लो 100 व्यक्ति आए। हमारे मंदिर में सब अपनी-अपनी मनोकामना यहां रख के गए। मन्नत मान करके गए। किसी का बेटा परीक्षा देने वाला है। किसी का मुकदमा चल रहा है। किसी की नौकरी नहीं लग रही। किसी को शादी नहीं हो रही। अपनी-अपनी कामना रख के गए सब। तो वो घर जाके कुछ मेहनत भी करेंगे या नहीं? अपने कार्य की सिद्धि के लिए। मैंने कहा, हां करेंगे। तो क्या 100 के 100 फेल हो जाएंगे? मैंने कहा, नहीं। 100 तो फेल नहीं होंगे। 50-60 तो पास हो ही जाएंगे। उनका कार्य सिद्ध हो जाएगा। तो बोले, वो कैसे होगा? मैंने कहा, उनकी मेहनत से। बोले, हां, आप ठीक समझे। तो जो 100 व्यक्ति घर जाएंगे यहां मन्नत मानकर, वो काम करेंगे, मेहनत करेंगे, पुरुषार्थ करेंगे। 100 में से 50-60 का काम हो जाएगा। होगा तो वो उनकी मेहनत से और यश मिलेगा हमारे इस मट्टी के देवता को। यह जनता की मूर्खता है। ऐसा उसने बताया। कार्य सिद्धि किस कारण से हुई? मेहनत से। उन लोगों की मेहनत से। और यश किसको मिला? इस मट्टी के देवता को। बोले, यह जनता की मूर्खता है। इसका हम लाभ उठा रहे हैं। लोग समझते हैं हमारे मिट्टी के देवता के आशीर्वाद से कार्य सिद्ध हुआ। जबकि हुआ उनकी मेहनत से।
तो मान लो 100 में से 50-60 का कार्य सिद्ध हो गया, जो यहां मन्नत मानकर गए थे, तो वो 50 तो हमारे पक्के ग्राहक हो गए ना। वो तो आएंगे अगली बार और खूब दान चढ़ा के जाएंगे। मैंने कहा, वो तो पक्का आएंगे। फिर बोले, बात यहीं पर खत्म नहीं होती और आगे चलती है। मैंने कहा, और क्या चलती है? तो बोले, वो 50 लोग एक-एक व्यक्ति 10-10 लोगों में प्रचार करेगा कि बालाजी देवता बहुत अच्छा है, बड़ा-बड़ा आशीर्वाद देता है। वहां का आशीर्वाद सफल होता है। देखो, हम कहे थे, हमारा काम हो गया। तुम भी चलो। एक-एक व्यक्ति 10-10 में प्रचार करेगा, तो 500 तक हमारा प्रचार बढ़ गया। फिर वो दो-तीन को तो पकड़ के लाएगा साथ, जबरदस्ती। जो उनके क्लोज फ्रेंड्स होंगे, मित्र होंगे, निकट के, उनको प्रेशर मार के, जबरदस्ती पकड़ के लाएंगे। कहेंगे, देखो, एक बार तुम हमारे साथ चलो। बालाजी और तुम्हारा भाड़ा-किराया भी हम देंगे। बस एक बार तुम चलो हमारे साथ। तो जबरदस्ती एक-एक आदमी तीन-तीन को साथ पकड़ के लाएगा। जो 50 फेल हुए, वो तो हो गए। कोई बात नहीं। उसकी चिंता नहीं है। जो 50 पास हो गए, जिनका कार्य सिद्ध हुआ, वो एक-एक व्यक्ति 50 तीन-तीन को साथ लाएगा। तो 50 वो और तीन-तीन वो 150 और एक आदमी तीन को पकड़ के लाएगा, तो 50 आदमी कितनों को लाएंगे? 150 और हो गए। 50 और 150 कितने हुए? पिछले साल कितने आए? 100। अब की बार कितने आए? 200। ऐसे हमारी संख्या डबल होती है और दान भी मिलता है, संख्या भी बढ़ती जाती है। यह जनता की मूर्खता है। हम उसका लाभ उठा रहे हैं।
जो कहानी बालाजी तिरुपति की है, वही सारी दुनिया भर के सब मंदिरों की है। चाहे वो आबू पर्वत पे हो, चाहे दिल्ली में कन्वर्ट प्लेस का हनुमान मंदिर हो, चाहे कोई भी हो, चाहे बंबई का हो, कालका देवी मंदिर हो, कोई भी मंदिर हो। सभी मंदिरों की यही कहानी है। लॉ ऑफ प्रोबेबिलिटी, संभावना का नियम। मेरी बात आप समझ गए होंगे। तो इस कारण से लोगों की कामना पूरी होती है। होती है उनकी अपनी मेहनत से है। उन देवताओं के आशीर्वाद से कुछ नहीं होता।
महर्षि दयानंद जी का एक वाक्य याद आ गया। उन्होंने लिखा है कहीं सत्यार्थ प्रकाश में ऐसी कोई बात थी कि उसने कहा कि फलाने मंदिर में जाओ। उस देवता के आशीर्वाद से आपको संतान हो जाएगी। तो महर्षि दयानंद जी कहा, अच्छा, उस देवता के आशीर्वाद से संतान होती है। तो ये बिल्ली, गधी, कुत्ते की संतान कौन से देवता के आशीर्वाद से होती है? वो तो कहीं मंदिर में नहीं जाते। प्रार्थना कर रहे हैं वहां कोई संतान दो। [हंसी] बिल्ली, गधी, कुत्ते की संतान कौन से देवता के आशीर्वाद से होती है? उनकी तो बिना ही उसके हो रही है। तो इसका अर्थ है, वह कारण नहीं है। जिसके बिना ना हो, वह कारण है और जिसके बिना काम हो जाए और उसके होने पर भी हो जाए, ना होने पर भी हो जाए, तो वह कारण नहीं होता। तो बस यह नियम याद रखें, कारण कार्य सिद्धांत, तो आप कहीं भी भ्रांति में नहीं फसेंगे, अंधविश्वास में नहीं फसेंगे, पाखंड में नहीं फसेंगे। सब बात आपको क्लियर हो जाएगी। तो यह सारे पाखंड वाले कार्यक्रम हैं। मजार पर चादर चढ़ाओ, मजार के चक्कर काटो, वृक्ष के चारों ओर धागा बांधो। ये सब पाखंडवादी।
चलिए, अगला सूत्र देखें। तो यह हमारा 15वां हो गया था। अब 16वां सूत्र देखिए। बोलिए, न च एक चित्त तंत्रम वस्तु तद अप्रमाणकम तथा किम स्यात। एक और विचित्र पूर्व पक्षी। वो वो क्या कहता है? भूमिका में पूर्व पक्षी की बात है। पूर्व पक्षी का विचार ऐसा है कि जो वस्तु सामने दिख रही है, आपको सामने कुर्सी दिख रही है, बर्तन दिख रहे हैं। यह जो वस्तु आपको दिख रही है, इसका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। फिर क्यों दिख रही है? जब अस्तित्व नहीं है, तो तो वह पूर्व पक्षी कहता है कि आपने ऐसा विचार किया है कि सामने कुर्सी है, इसलिए आपको कुर्सी दिख रही है। आपने बर्तन का विचार किया, तो बर्तन दिख रहा है। आपने घड़ी का विचार किया, तो घड़ी दिख रही है। आप जैसा विचार करोगे, वस्तु वैसी दिखेगी। सिर्फ आपके विचार की बात, वस्तु की अपनी कोई सत्ता नहीं है। सिर्फ आपके विचार से यह सारी चीजें आपको दिख रही हैं। ऐसा उसका सिद्धांत है। तो इसका उत्तर इस सूत्र में, पूर्व पक्षी का उत्तर सिद्धांत पक्ष में इस सूत्र में दिया है।
नच एकित तंत्रम वस्तु। पूर्व पक्षी जी, आप जो यह कह रहे हैं कि यह सिर्फ हमने अपने मन में विचार कर लिया है कि सामने घड़ी है, तो घड़ी दिख रही है। पंखा है, तो पंखा दिख रहा है। हमारे विचार से वो वस्तु खड़ी हो रही है। उसका अपना अस्तित्व कुछ नहीं है। तो यदि यह बात ठीक हो, यदि यह बात सत्य हो कि सिर्फ हमारे विचार से ही वस्तु खड़ी होकर दिखती है हमको और वास्तव में उसकी अपनी कोई सत्ता नहीं है। यदि ऐसा हो, तो मान लो मैंने कुर्सी को देखा 10 सेकंड, तो मैं देखूंगा, तो अपना विचार करूंगा, तो कुर्सी दिखेगी। और मान लो मैंने अपनी नजर वहां से हटा ली, इधर दीवार को देखने लगा, तो मेरे विचार से वस्तु थी ना। अब मैंने वहां से विचार हटा लिया, तो अब बताओ वस्तु, कुर्सी वहां रहेगी या नहीं रहेगी? रहेगी। तो फिर मेरे विचार से कोई फर्क नहीं पड़ता। इसलिए तुम्हारी बात झूठ है। अगर मेरे विचार से वस्तु कल्पित होती है, तो मैं जब तक उसका विचार करूं, तब तक वस्तु रहनी चाहिए। जब मैं वो विचार छोड़ दूं और अपनी दृष्टि वहां से हटा लूं, इधर, तो वो वस्तु गायब हो जानी चाहिए। अगर मेरे विचार से बनी थी, तो ऐसा तो नहीं हो रहा।
[गला साफ़ करने की आवाज़] मैं उसको देखता हूं, विचार करता हूं, तो भी कुर्सी खड़ी है। और मैं नहीं देखता हूं, कोई विचार नहीं करता, तब भी खड़ी है। इससे क्या सिद्ध हुआ? वो मेरे विचार की कल्पना है या कुर्सी की अपनी वास्तविक सत्ता है? बस। तो यह उत्तर दिया। इस बात को सूत्र में कह रहे हैं, नच एकित तंत्रम वस्तु। जो भी वस्तु आपको टेबल, कुर्सी, स्कूटर, बर्तन, पुस्तक, जो भी दिख रहा है, वह कोई एक चित्त के आधीन नहीं है। चित्त तंत्रम, चित्त के आधीन नहीं है। अर्थात हमारे विचार के आधीन नहीं है। हम विचार करें और दिखने लगे और ना करें, तो ना दिखे, ऐसा नहीं है। तद अप्रमाणकाम। यदि मैं आंख से उस चीज को ना देखूं, तदाकिम स? तब क्या होगा? वस्तु रहेगी या नहीं रहेगी? यह ऑब्जेक्शन उठाया सिद्धांत ने। यदि मैं उस चीज को ना देखूं, तो वस्तु रहेगी या नहीं रहेगी? यदि रहेगी, तो इसका अर्थ हुआ कि मेरे विचार से वह वस्तु खड़ी नहीं हुई है। वो अपने अस्तित्व से खड़ी है। उसका अपना स्वतंत्र अस्तित्व है। और मान लीजिए दो व्यक्ति हैं। मैं और लालचंद जी। मैं उस कुर्सी को देखता हूं। लालचंद जी भी देखते हैं। दोनों देखते हैं। तो 10 सेकंड तक मैंने देखा। फिर मैंने वहां से अपनी नजर हटा ली। लेकिन लालचंद जी अभी भी देख रहे हैं। वो 1 मिनट तक देख रहे। मैंने 10 सेकंड देखा। जब मैंने 10 सेकंड देख के अपनी नजर वहां से हटा ली, तो अब बताओ कुर्सी का क्या होगा? कुर्सी रहेगी या नहीं रहेगी? यदि रहेगी, तो फिर वो अपनी सत्ता से खड़ी है ना कि मेरे विचार से। क्योंकि आपका नियम था, यदि मैं देखूंगा, तो रहेगी। अब मैं तो नहीं देख रहा, तो फिर वो नहीं रहनी चाहिए। जबकि लालचंद जी देख रहे हैं, तो वो है। तो मेरे देखने ना देखने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वस्तु है, तो है।
तो यह वैदिक सिद्धांत है। वस्तु अपने स्वरूप में जैसी है, वैसी ही रहेगी। आप उसको देखें, ना देखें, वैसी माने, ना माने, यह आपका सिर दर्द। यह आपकी समस्या है। वस्तु जैसी है, वो वैसी ही रहेगी। अब इस नियम से देखो, ईश्वर जैसा है, वो वैसा ही रहेगा। आप अपने मन से कुछ भी मानते रहो। आपके मानने से वो बदलेगा नहीं। ईश्वर जड़ है या चेतन? अब कोई जड़ वस्तु को ईश्वर माने, तो क्या वो ईश्वर बन जाएगी वस्तु? वो नहीं बनेगी। और ईश्वर चेतन है और उसको कोई जड़ माने, तो वो जड़ नहीं होगा। तो यह सिद्धांत है कि हमारे मानने या ना मानने से कोई फर्क नहीं पड़ता। वस्तु जैसी है, वो वैसी ही है।
तो बुद्धिमत्ता इस बात में है, जो वस्तु जैसी है, उसको ठीक-ठीक वैसा स्वीकार करो। इसमें समझदारी है। क्योंकि आप उसको ठीक-ठीक समझेंगे, ठीक-ठीक जानेंगे, तो आप उससे ठीक से लाभ उठा पाएंगे और उससे होने वाली हानि से बच पाएंगे। यदि आप वस्तु को ठीक-ठीक समझेंगे, तो उसके गुण-कर्म को ठीक-ठीक समझकर उससे लाभ भी ले सकते हैं। उससे होने वाली हानि से बच सकते हैं। जैसे मान लो अग्नि है, उदाहरण के लिए अग्नि। अग्नि गर्म है या ठंडी? गर्म है। अगर आप अग्नि को ठीक-ठीक समझेंगे कि अग्नि गर्म है, इससे हाथ दूर रखना चाहिए, नहीं तो जल जाएगा। अगर ठीक-ठीक जानेंगे, तो आप अग्नि से हाथ बचाकर रहेंगे। आपका हाथ दूर रहेगा, तो आपका हाथ बचा रहेगा। और आपने समझ लिया, ये तो ठंडी है, पानी की तरह ठंडी है, तो आप हाथ डालेंगे, आपका हाथ जलेगा। नुकसान उठाएंगे कि नहीं? इसलिए समझदारी इस बात में है, जो चीज जैसी है, वैसी जानो। ईश्वर जैसा है, वैसा जानो। तो आपका कल्याण होगा। आप ठीक काम करेंगे। ठीक लाभ उठाएंगे। अगर आप ईश्वर है कुछ और, आप समझते कुछ और हैं, मानते कुछ और हैं, फिर आप उस हिसाब से काम करेंगे, तो आपको नुकसान होगा। जैसे अग्नि को आपने ठीक नहीं समझा, तो उससे नुकसान उठाया। अग्नि गर्म है, उसको गर्म नहीं स्वीकार किया, तो उससे नुकसान उठाया। हाथ जला लिया।
इसी तरह से ईश्वर क्या हमारे पाप माफ कर देगा? हैं जी। और कितने लोग माने बैठे हैं कि भगवान हमारे पाप माफ कर देगा। मानते हैं या नहीं? गलत मानते हैं ना? अब ये सारे नुकसान उठाएंगे इस बात से। वो ये क्या समझ के बैठे हैं? भगवान तो हमारे पाप माफ कर ही देगा। तो क्यों ना कर लो? इसलिए धड़ाधड़ दिन-रात पाप करते हैं। क्योंकि उनके दिमाग में यह भ्रांति है। भगवान तो माफ कर ही देगा। फिर क्यों ना कर लें? इसलिए मां पाप कर रहे हैं। जबकि माफ करेगा नहीं ईश्वर। अब दंड भोगेंगे वो। तो इसलिए वैदिक सिद्धांत यह है, जो चीज जैसी हो, उसको वैसा जानो, वैसा मानो, वैसा लिखो, वैसा बोलो, वैसा आचरण करो। यह सत्य है। सत्य से ही कल्याण होता है। झूठ से नहीं। बोलिए।
हम ठीक है। हम ठीक है। प्राण प्रतिष्ठा होता है, किस तरह से चलता है? तो जो लोग मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा करते हैं, ऐसा वो दिखावा करते हैं कि आज हमने इसमें प्राण प्रतिष्ठा कर दी, अब यह देवता बन गया, ईश्वर बन गया, अब अब अब इसकी पूजा कर सकते हैं, इससे आशीर्वाद मिलेगा, आपका कल्याण हो जाएगा, ऐसा वो।
कहते हैं तो यह बात झूठ है। किसी व्यक्ति में यह शक्ति नहीं है कि वह जड़ मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर दे। किसी में भी नहीं है।
कैसे इस बात को समझेंगे? एक उदाहरण सुनिए। जो व्यक्ति यह दावा करता है कि मैं जड़ मूर्ति में प्राण प्रतिष्ठा कर सकता हूं और फिर मैं इसको चेतन कर दूंगा। जो ऐसा कहता है, मान लीजिए उसकी मां जो उससे 20-30 साल बड़ी है उम्र में, उसकी मृत्यु हो गई 80 साल की उम्र में। मां की 80 साल की उम्र में मृत्यु हो गई तो हम उससे कहेंगे, "अपनी माता जी के शरीर में अब वापस प्राण प्रतिष्ठा करो।" कर देगा? क्यों? अब क्या हुआ? अब कहां गई शक्ति आपकी? जिस मूर्ति में एक दिन भी प्राण नहीं चला, उसमें तो आप प्राण प्रतिष्ठा कर सकते हैं और मां के शरीर में 80 साल तक सांस चलती थी, 80 साल तक प्राण चलता रहा, उसमें तो आप कर नहीं पा रहे। तो मूर्ति में कैसे करेंगे? उसमें एक दिन भी नहीं चली सांस। तो मेरी बात समझ में आई? इसलिए ये सब पाखंड है, झूठ है, धोखा है, व्यापार है। इससे बचना चाहिए।
ठीक है। मैं मैं फिर वही बात कह रहा हूं। ये लोग नहीं सुधरेंगे। आप अपनी बात करो। आपको सुधरना है या नहीं? बस आप अपना-अपना समझ लो कि हां, यह पाखंड है। मुझे इसमें नहीं फंसना। आप उनको सुधारने जाएंगे तो वो नहीं सुधरेंगे। उल्टा आपसे झगड़ा कर लेंगे। तो झगड़ा नहीं करना। बस अपना बचाव करें। और अपने दो-चार लोगों में, दोस्तों में, मित्रों में बता दें, "भाई, यह बात ऐसी है।" उनको अगर समझ में आ जाए तो वह भी बच जाएंगे। नहीं आए तो ना सही। झगड़ा नहीं करना। जबरदस्ती नहीं करना। घर में ऐसा करते हैं ना तो उनको समझाओ। नहीं समझते तो छोड़ दो। झगड़ा नहीं करना। झगड़ा नहीं करना। चाहे घर हो, चाहे पड़ोस हो, चाहे दोस्त हो, मित्र हो, कोई भी हो। झगड़ा नहीं करना। कोई समझता हो तो समझाओ।
अब ये व्यापारी लोग बैठे हैं। ये अपना माल बेचते हैं। ग्राहक आते हैं दुकान पर। तो यह अपना माल दिखाते हैं। "देखो जी, यह वैरायटी है। यह कपड़ा है, यह कपड़ा, यह कपड़ा, यह कपड़ा।" 20 तरह की, 10 तरह की वैरायटी दिखाते हैं। अगर ग्राहक को पसंद आए तो वह खरीदेगा। हां या ना? और उसको पसंद नहीं आया तो क्या जबरदस्ती व्यापारी उसको कहेगा, "चल खरीद। जबरदस्ती है, तुझे ठोकूंगा। माल नहीं खरीदेगा तो जबरदस्ती थोपूंगा।" क्या ऐसे धंधा होता है? बोलिए। ऐसे होता है क्या? नहीं होता ना भाई। हमने अपना माल दिखाया, आपको समझ में आया तो ले, नहीं आया तो कोई बात नहीं। हमारा माल हमारे पास, तुम अपने घर, हम अपने घर। ऐसे होता है ना? तो आप अपनी बात दूसरे दोस्तों को बता दो कि भाई, हम यह मानते हैं, यह समझते हैं, यह सही है। प्रमाण तर्क से यह सिद्ध होता है। आपकी समझ में आए तो हमारा माल ले लो और नहीं आए तो कोई जबरदस्ती नहीं। थोपेंगे हम। जबरदस्ती नहीं थोपना। नहीं समझ में आए छोड़ दो। झगड़ा नहीं करना। ठीक है।
आगे चलें। तो यह बात थी। तयोर विभक्त पंथ अनच एक तंत्रम वस्तु। तो एक चित्त के विचार के अधीन नहीं है वस्तु। वस्तु उसका अपना अस्तित्व है। वह अपने अस्तित्व से खड़ी है। कोई उसको देखे ना देखे, वस्तु खड़ी रहेगी। कोई उसको जैसी वस्तु है वैसी मानो तो ठीक है। आप उल्टा-सीधा माने तो आपको नुकसान है। वस्तु का कुछ नहीं बिगड़ता। ईश्वर चेतन है। वह सबको देखता है। वह देख रहा है और सबका न्याय करेगा। यह सत्य है। आपको यह समझना हो और लाभ उठाना हो तो उठा लो। नहीं समझना तो ठीक है। उल्टा-सीधा करते रहो। फिर आगे डंडे खाने पड़ेंगे। ईश्वर तो छोड़ेगा नहीं। वह नहीं करेगा माफ किसी को भी। तो वस्तु जैसी है वैसी ही रहेगी। हमारे विचार से कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है। ठीक है जी।
तो ईश्वर, जीव, प्रकृति तीनों वस्तु मुख्य तीन पदार्थ हैं। तो जैसी ये तीन वस्तुएं हैं, उनको वैसा-वैसा समझें तो आपको लाभ होगा। अब अगला सूत्र देखते हैं। तो वस्तु की अपनी सत्ता सिद्ध हो गई। रेडियो, टीवी, कंप्यूटर, मोबाइल फोन, स्कूटर, कार, खाना-पीना, हर वस्तु अपने स्वरूप से है। जैसी है, वैसी है।
अब इन वस्तुओं के साथ आत्मा का जो संबंध होता है, वह चित्त के माध्यम से होता है। क्योंकि आत्मा बेचारा अल्पशक्तिमान है। सीधा तो देख नहीं सकता वस्तुओं को। ना खा सकता, ना पी सकता, ना सीधा डायरेक्ट आत्मा नहीं कर पाता। उसको शरीर की, मन की, इंद्रियों की, बुद्धि की इन चीजों की जरूरत पड़ती है। तो जो शास्त्रों में बताया कि हमारी जो संसार के पदार्थों से जो लाभ लेने की पद्धति है, वह पद्धति यह है कि आत्मा मन को आदेश देता है कि मुझे भोजन खाना है। अब मन फिर खाने के लिए पहले आंख को आदेश देता है, "देखो थाली में क्या है? क्या भोजन है?" पहले देखो। फिर आंख को आदेश देता है मन। फिर आंख देखती है क्या-क्या भोजन है थाली में। पता लग गया देख के, वह सूचना आंख से मन में आई, मन से आत्मा के पास गई, फिर उसने देखा, "अच्छा, ये ये वस्तु है, ये अपने अनुकूल है, अनुकूल है।" तो फिर उसने हाथ को आदेश दिया, "भाई उठाओ, मुंह में डालो।" उसका आदेश जो भी चलता है, मन के थ्रू चलता है। मन के माध्यम से पहले मन के माध्यम से आंख से देखा वस्तुएं, फिर मन के माध्यम से हाथ को आदेश दिया, "उठाओ भाई रोटी उठाओ, यह दाल है, यह सब्जी है, यह लड्डू है। उठाओ और मुंह में डालो।" तो फिर मन हाथ को आदेश देता है, हाथ वस्तु उठाता है और फिर मुंह में डालता है। इस तरह से कार्यक्रम होता है। तो इस बात को इस सूत्र में बता रहे हैं। इस तरह से यह कार्यक्रम चलता है। खाना-पीना, लेना-देना, व्यवहार, जो भी।
सूत्र 17 बोलिए। तद उपराग अपेक्षित्वात। चित्तस्य वस्तु ज्ञात अज्ञातम। आत्मा का जब भोजन आदि वस्तुओं से संबंध होता है, तो वह चित्त के माध्यम से संबंध होता है। जैसे अभी बताया, आत्मा चित्त को आदेश देता है। चित्त फिर इंद्रियों को आदेश देता है। फिर इंद्रियां काम करती हैं। तो चित्त के बिना नहीं हो सकता। चित्त बीच में एक मीडिएटर है। एक माध्यम है बीच में। इधर आत्मा, इधर इंद्रिय, बीच में चित्त। चित्त या मन एक ही बात है। हां। फिर से देखिए। इधर आत्मा, बीच में मन, फिर इंद्रिय, फिर इंद्रिय आगे जो भी करना है करेगी। हाथ, आंख, नाक, कान, सारी इंद्रियां फिर बाद में काम करती हैं। इधर आत्मा है, बीच में मन है। फिर आगे इंद्रियां। और मन जो है, उसकी परिभाषा न्याय दर्शन में लिखी है। मन एक समय में एक ही काम कर सकता है। दो-तीन-चार इकट्ठे नहीं। मन के सहयोग से इंद्रियां काम करती हैं। आंख देखती है, कान सुनता है, वाणी बोलती है, हाथ वस्तु को उठाता है, लेनदेन करता है। यह सारे काम इंद्रियों से होते हैं, पर मन के सहयोग के बिना नहीं होते। और मन एक समय में एक ही काम करता है। इसलिए वह एक समय में एक इंद्रिय को प्रेरित करेगा। पर उसकी स्पीड बहुत तेज है। मन की गति बहुत तेज है। वह फटाफट-फटाफट अलग-अलग इंद्रियों से काम लेता है। इतनी तेजी से लेता है, हमें पता भी नहीं चलता। तू इतनी जल्दी-जल्दी काम करता है। कई बार तो भ्रांति हो जाती है। हमें लगता है कई काम एक साथ हो रहे हैं। जैसे आपने टीवी में डांस देखा होगा। कुछ डांसर होते हैं जो डांस करते हैं। उनके हाथ भी हिलते हैं। यह हाथ भी हिलता है, कमर भी हिलती है, गर्दन भी हिलती है, सर भी हिलता है, पांव भी हिलता है। गीत गाना भी सुनते हैं। तबले की ताल भी सुनते हैं। सारे काम एक साथ हो रहे हैं। ऐसा लगता है। पर वो एक साथ नहीं हो रहे। बारी-बारी से हो रहे हैं। मन एक समय में एक काम करता है। उसकी स्पीड इतनी तेज है, हमें पता नहीं चलता कि कब कौन सा काम किया। कौन सा काम पहले किया, कौन सा बाद में किया। बहुत स्पीड से काम करता है।
तो अब यह कह रहे हैं, ज्ञात अज्ञातम। जिस वस्तु का चित्त जिस वस्तु के साथ चित्त का संबंध होगा, वह वस्तु ज्ञात होगी। और जिसके साथ चित्त का संबंध नहीं रहेगा, वह अज्ञात हो जाएगी। इतनी बात समझ में आई? क्योंकि इंद्रियां तो बहुत सारी हैं। आंख, नाक, कान, पांच इंद्रियां हैं। पांच ज्ञानेंद्रियां हैं। पांच कर्मेंद्रियां हैं। और मन बारी-बारी से सबके साथ जुड़ता है। तो जिसके साथ जुड़ेगा, उसका ज्ञान होगा। जिससे कनेक्शन कट जाएगा, उसका ज्ञान नहीं होगा। अज्ञात हो जाएगी वह वस्तु।
एक बात और है। इसमें समझने की वह यह है क्योंकि चित्त एक जड़ पदार्थ है। वह सत्व, रज, तम से मिलकर बना है। इसलिए उसमें चेंजेस आते रहते हैं। जैसे मान लीजिए उदाहरण दे मोटा सा, आपको कोई अच्छा समाचार मिला, खुशी का। तो उससे सुनने से आपके शरीर में कुछ अलग-अलग रासायनिक परिवर्तन होते हैं। आपकी जो शरीर की ग्रंथियां हैं, वह कुछ अच्छा सिक्रेशन करती हैं। कुछ अच्छे द्रव छोड़ती हैं, जो स्वास्थ्य के लिए लाभकारी हैं। और जब कोई खराब समाचार सुन लिया, नुकसान वाला, तो वो ग्रंथियां फिर अब दूसरे तरह से रिएक्ट करती हैं। फिर उससे कुछ दूसरे केमिकल छूटते हैं, जिससे कि नुकसान होता है। इसी कारण टेंशन करने वाले लोगों को डायबिटीज का रोग हो जाता है। वो कुछ शरीर में ग्रंथियां अलग तरह से काम करती हैं। उनमें भौतिक परिवर्तन होता है और किसी को एसिडिटी हो जाती है, किसी को डायबिटीज हो जाती है, किसी को और कोई समस्या आ जाती है। कोई डिप्रेशन में चला जाता है। ऐसी-ऐसी बातें सुनकर, ऐसी-ऐसी बातें सोच-सोच कर, उसको फिर शरीर पर भी प्रभाव पड़ता है। ऐसा होता है या नहीं? होता है ना? तो यह सब उन चीजों में होता है जो भौतिक पदार्थ वाली है, जो सत्व, तम से बनी है, जड़ पदार्थ वाली है, उन पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है। खराब समाचार सुनने का। तो मन भी तो चित्त भी तो भौतिक पदार्थ है। तो वह भी प्रकृति से बना है, सत्व, तम से बना है। तो जब किसी इंद्रिय से अच्छा दृश्य दिखता है, तो चित्त की स्थिति बदल जाती है। उसमें सत्वगुण भर जाता है। जब कोई अच्छा समाचार सुनने को मिले, कोई अच्छी बात देखने को मिले, अच्छा दृश्य देखने को मिले, तो चित्त में भी परिवर्तन होता है। उस समय सतोगुण उभर जाता है। रजोगुण, तमोगुण दब जाता है। और जब खराब दृश्य देखता है, खराब बातें सुनता है, घाटे वाली, नुकसान वाली, तब रजोगुण, तमोगुण भर जाता है और सतगुण दब जाता है। यह परिवर्तन होते हैं। ठीक है? चित्त भौतिक पदार्थ है। सत्व, रज, तम से बना है। उसमें सत्व,रज,तम तीन प्रकार के परमाणु हैं। तो इस इस प्रकार से जो-जो वस्तुओं को का समाचार चित्त को प्राप्त होता है। और वह फिर इंद्रियों से प्राप्त करके आत्मा तक पहुंचाता है। तो इस प्रक्रिया में उसमें तरह-तरह के परिवर्तन होते रहते हैं। इसको बोलते हैं परिणामी। क्या बोलेंगे? चित्त परिणामी है। इसमें परिणाम होता है, चेंज होता है, परिवर्तन होता है। इसमें तीन पार्टिकल्स हैं। इस कारण से। तो यह बात भी इस सूत्र में बताई गई।
तो अब सूत्र का पूरा सार सुनिए। तद उपराग अपेक्षित। जब आत्मा का किसी बाह्य पदार्थ से संबंध होता है, तो चित्त का भी उसमें सहयोग लेना आवश्यक होता है। इस कारण से जिस वस्तु से आत्मा का संबंध होता है, वह वस्तु चित्त के माध्यम से आत्मा तक आती है। तो चित्त को उसकी जानकारी मिलती है। और जिस वस्तु से संबंध टूट जाता है आत्मा का, तो चित्त का भी वह संबंध उस वस्तु से टूट जाता है। वह वस्तु अज्ञात हो जाती है। तो ज्ञात-अज्ञात होती रहती है। जिस वस्तु को चित्त से देखेंगे, उसका ज्ञान होगा। जिसको नहीं देखेंगे, उसका नहीं होगा। और जिसको देखेंगे, उसके अनुसार उसमें चित्त में परिवर्तन भी होगा। चित्त परिणामी है। उसमें चेंजेस आते रहते हैं। कभी सतोगुण उभरता है, कभी रजोगुण उभरता है, कभी तमोगुण उभरता है। ठीक हो गया? यह इस सूत्र का सार है।
आगे चलूं। चलिए अगला सूत्र देखिए। बोलिए। सदा ज्ञाता चित्तवत्तय। तत प्रभो पुरुषस्य अपरिणामित्वा। 18वां सूत्र है ये। इसमें बता रहे हैं, सदा ज्ञाता चित्तवृत्त। चित्त की वृत्तियां आत्मा को सदा ज्ञात रहती हैं। उसको 24 घंटे आत्मा को चित्त की जानकारी होती रहती है। आत्मा चित्त के माध्यम से अलग-अलग वस्तुओं को देखता है। अलग-अलग चीजों को, शब्दों को सुनता है। अलग-अलग इंद्रियों से अलग-अलग कार्य लेता है। तो जिससे कनेक्ट होता है, उसकी जानकारी होती है। जिससे कनेक्शन कट जाता है, तो चित्त को उसकी जानकारी नहीं होती। चित्त की तो यह स्थिति है। लेकिन आत्मा की क्या स्थिति है? आत्मा तो 24 घंटे चित्त से कनेक्टेड रहता है। वह डिस्कनेक्ट नहीं होता। उसकी तो दौड़ चित्त तक है। बस वह 24 घंटे चित्त को देखता रहता है। आगे चित्त का कनेक्शन जिससे भी हो, आत्मा का कनेक्शन चित्त से 24 घंटे रहता है।
तो मान लीजिए 17 घंटे तो आप जागते हैं। दिन में तो 17 घंटे काम करते रहते हैं। जिस-जिस वस्तु से, जो-जो जानकारी चित्त में आती है। जिस-जिस इंद्रिय के माध्यम से, जिस-जिस वस्तु की, जिस-जिस इंद्रिय के माध्यम से जानकारी चित्त में आती है, वह वस्तु की जानकारी आत्मा को 17 घंटे होती रहती है। अब 7 घंटे व्यक्ति सो गया। रात को। सोने पर भी आत्मा का कनेक्शन चित्त से चालू रहता है। आत्मा का कनेक्शन 24 घंटे चालू रहता है। बाहर की चीजों से 17 घंटे चालू रहता है। सात घंटे हम सो जाते हैं। बंद कर देते हैं। बाह्य जानकारी बंद हो जाती है। पर चित्त की आंतरिक जानकारी फिर भी चालू रहती है। सोते समय आप सुख का अनुभव करते हैं। कभी दुख का अनुभव करते हैं। जब अच्छी नींद आती है, तो सुबह उठकर बोलते हैं, "वाह मजा आ गया। आज तो बढ़िया नींद आई।" ऐसा कभी-कभी बोलते हैं कि "आज तो बहुत मजा आया। बढ़िया नींद आई।" इसका मतलब रात को 7 घंटे सोते समय आपने सुख का अनुभव किया है। यदि अनुभूति ना की होती सुख की, तो सुबह उठकर यह कैसे बोलते कि "आज तो बहुत अच्छा बढ़िया नींद आई।" अब कैसे बोलते यह बात? जो व्यक्ति यह बात बोलता है, "आज तो बहुत बढ़िया नींद आई।" इसका मतलब सोते समय उसने सुख का अनुभव किया है। इससे सिद्ध हुआ कि सोते समय भी आपका चित्त से कनेक्शन चालू था। बाहर से इंद्रियों का कट गया। इसलिए बाहर की जानकारी बंद हो गई। लेकिन अंदर चित्त के साथ कनेक्शन चालू था आत्मा का। उसकी जानकारी हो रही है।
कभी-कभी अच्छी नींद नहीं आती। मच्छर काटते हैं। रात को गर्मी का मौसम है। लाइट चली गई। पंखा बंद हो गया और मच्छर काटते हैं। फिर सुबह उठकर कहते हैं, "साहब, आज मजा नहीं आया। आज मजा नहीं आया। आज सुख नहीं मिला। आज तो बस ऐसे ही दुखी-परेशान होते रहे। ऐसे ही करवट बदलते रहे। अच्छी नींद नहीं आई।" उस दिन आपने रात को सोते समय दुख का अनुभव किया। तो सुबह उठकर बोलते हैं कि "आज मजा नहीं आया। आज अच्छी नींद नहीं आई।" तो इसका अर्थ क्या हुआ कि आत्मा का तो 24 घंटे चित्त से कनेक्शन चालू रहता है। चाहे वह जागता हो, चाहे स्वप्न देखता हो, चाहे सोता हो। सपने भी देखते हैं हम रात को देखते हैं ना। स्वप्न देखते हैं, तब भी तो मन में वह संस्कार जाग रहे हैं, जो स्वप्न के रूप में आपको दिखाई दे रहे हैं। तो आत्मा का चित्त के साथ तब भी कनेक्शन चालू है। चाहे स्वप्न अवस्था हो, तब भी चालू है। निद्रा अवस्था हो, तब भी चालू है। जागृत अवस्था हो, तब भी चालू है। 24 घंटे चालू है। इसलिए कह रहे हैं, सदा ज्ञाता चित्तवृत्त। आत्मा को 24 घंटे उसकी जानकारी होती रहती है। चित्त की। उसका सीधा कनेक्शन चित्त के साथ रहता है।
तत प्रभो पुरुषस्य। पुरुष आत्मा। वह चित्त का प्रभु है, स्वामी है, मालिक है। जैसे आपकी कार के मालिक आप हैं। 24 घंटे कार आपके पास है। आप जब चाहे यूज़ करो, जिधर मर्जी चलाओ। वो आपकी संपत्ति है। आपने खरीदी है, पेमेंट की है। कार खरीदी है। अब तो कार अब आपकी सेवक है। आप जिधर मर्जी चलाओ उसको। तो हमने भी ईश्वर को पेमेंट की है और चित्त खरीद लिया लिया है। वैसे है तो भाड़े पर खरीदा तो नहीं है। भाड़े पर है यह। कुछ लोग अपनी कार खरीद ले लेते हैं। कुछ टैक्सी में बैठते हैं। वो भाड़ा देकर अपना काम कर लेते हैं। इतने पैसे नहीं है जेब में खरीद सके। तो भाड़ा देकर टैक्सी में अपना काम चलाते हैं। तो हमने ईश्वर को भाड़ा दे रखा है। ईश्वर ने हमको टैक्सी, चित्त वाली टैक्सी भाड़े पर दे रखी है। कौन सा भाड़ा दिया था? कर्मों का। हमने कुछ कर्म किए और ईश्वर ने हम हमको कर्मों के आधार पर चित्त दे दिया, बुद्धि दे दी, शरीर दे दिया, इंद्रियां दे दी। ये सब हमने भाड़े पर ले रखी है टैक्सी। उसमें ये बहुत सारे काम अवयव हैं जो काम करते हैं। तो जब हमने चित्त को भाड़े पर ईश्वर से ले लिया, तो अब तो हम टैक्सी में बैठ गए, तो जिधर हम चाहेंगे टैक्सी उधर ही चलेगी ना। उतनी देर के लिए तो हम उसके अधिकारी बन गए। जितनी देर तक हमने भाड़ा दे रखा है। तो एक प्रकार से हमने चित्त, इंद्रियां, मन, शरीर, यह सब भगवान से भाड़ा देकर ले रखा है। और अब यह हमारी इच्छा अनुसार काम करते हैं। तो आत्मा अपनी इच्छा अनुसार चित्त से काम लेता रहता है। इस अर्थ में उसको तत्प्रभोह, उसका प्रयोग करने का अधिकारी, ऐसा शब्द बोला गया। तो पुरुष उस चित्त का अधिकारी है। वह 24 घंटे अपनी इच्छा से चित्त से काम लेता रहता है। चाहे स्वप्नावस्था करे, चाहे वो निद्रा अवस्था करे, चाहे वह जागृत अवस्था करे, जो भी करे, उसको पूरा अधिकार है। पूरी छूट दी हुई है ईश्वर ने।
और क्योंकि पुरुष अपरिणामी है। क्या बोला? पुरुष अपरिणामी। देखिए सूत्र में लिखा है, अपरिणामित्वा। पुरुष अपरिणामी है। उसमें कोई परिणाम नहीं होता। कोई चेंज नहीं आता। क्यों नहीं आता? क्योंकि आत्मा पार्टिकल लेस है। उसमें टुकड़े नहीं है। अवयव नहीं है। चित्त पार्टिकल वाला था। तीन पार्टिकल्स थे। सत्व, रज,तम। इसलिए उसमें चेंज आता था। कभी सत्व प्रधान, कभी रजोगुण प्रधान, कभी तमोगुण प्रधान। तो चित्त में तो चेंज आता रहता था। पर आत्मा में तो पार्टिकल ही नहीं है। इसलिए उसमें कोई परिवर्तन नहीं आता। वह सदा एक जैसा रहता है। अच्छी सूचना मिले, अच्छा समाचार मिले तो सुखी होता है। खराब समाचार मिले तो दुखी होता है। सुखी-दुखी तो होता है। उसके बावजूद भी उसमें कोई फिजिकल चेंज नहीं आता। कोई भौतिक परिवर्तन नहीं होता, क्योंकि उसमें पार्टिकल्स नहीं है। बड़ी विचित्र बात है। सुखी हो रहा है। आत्मा दुखी हो रहा है। फिर भी कोई चेंज नहीं आ रहा। बस इतना ही चेंज है। कभी सुखी फील गुड फीलिंग, कभी बैड फीलिंग, कभी सुख की अनुभूति, कभी दुख की अनुभूति। बस ये अनुभूतियां ही बदलती हैं। आत्मा का मूल स्वरूप नहीं बदलता। वह वैसा ही रहता है। तो यह अपरिणामी शब्द से पता चल रहा है।
तो सार क्या निकला पूरे सूत्र का कि आत्मा चेतन है। 24 घंटे उसका चित्त के साथ संबंध रहता है। और 24 घंटे उसको चित्त की जानकारी होती रहती है। वह अपरिणामी है। पार्टिकल लेस है। उसमें किसी तरह का कोई भौतिक परिवर्तन, घटना, बढ़ना, कटना, जुड़ना, गलना, सड़ना, ऐसी कोई विकृति नहीं आती। यह आत्मा की बात हुई। चित्त में तो यह सब होता है, क्योंकि परमाणुओं का प्रभाव पड़ता रहता है, तो घटनाओं का प्रभाव पड़ता रहता है। उसमें ऊंच-नीचा होता रहता है। आत्मा में कुछ नहीं होता। ठीक है जी। हां।
बोलिए। जैसे आपकी कार को डेंट पड़ता है। कोई ठोक दे कार को, उस पर डेंट पड़ता है ना? तो चित्त में भी प्रभाव, प्रभाव पड़ता है। आपको कोई खराब समाचार सुना दे कि आपके बारे में वो ऐसा कह रहा था। देखना आपका तवा गर्म हो जाएगा। गुस्सा आ जाएगा आपको। आपका गुस्सा आ जाएगा। दिमाग गर्म हो जाएगा। ब्लड प्रेशर बढ़ जाएगा। हाथ-पैर कांपने लगेंगे। अब पता नहीं कैसे क्या बोलने लगेंगे। देखो परिवर्तन जड़ वस्तु पर हो रहा है कि नहीं? जैसे शरीर जड़ है, उस
पर परिवर्तन हो रहा है। मन भी जड़ है, उस पर भी होगा। ठीक है। हां, नहीं है। उसमें थोड़ा सत्वगुण है। बिना सत्व के कोई वस्तु बनती नहीं। कोई भी वस्तु तीन प्रकार के परमाणुओं से मिलकर बनी है। शराब हो, अंडा हो, मांस हो, महत तत्व से लेकर पूरी सृष्टि के सारे पदार्थ, हर वस्तु में तीनों गुण हैं। शराब में भी है सतगुण। 5%, 8%, 10%, 20% उसमें रजोगुण है। और 70% तमोगुण है। मोटी भाषा बता रहा हूं, समझने के लिए। तमोगुण प्रधान है वो। तो मान लो 70% उसमें तमोगुण है। 15-20% उसमें रजोगुण है और 10% सत्वगुण है शराब में। तो 10% तो है ना। एक आदमी पहली बार पिएगा तो अच्छा नहीं लगेगा। कड़वी लगेगी, खराब लगेगी, बेसवाद लगेगी। फिर धीरे-धीरे वो रोज पीने का अभ्यास कर लेगा, प्रैक्टिस कर लेगा। और जब धीरे-धीरे प्रैक्टिस हो जाएगी तो वह उस 10% सत्वगुण से सुख लेना सीख जाएगा। यद्यपि उसमें 70% तमोगुण है। वह अपने अभ्यास से उस तमोगुण के प्रभाव को दबा लेगा। रजोगुण के 20% प्रभाव को भी दबा लेगा। वो जो सत सत है 10%, उसको जगा लेगा और उसको पी के ऐसा मस्त हो जाएगा। कहते वाह, अब दुनिया रंगीन दिखती है। दारू पी के दुनिया उसको रंगीन दिखती है। तो ऐसे वह अभ्यास करके उसका सुख लेना सीख जाता है। वही बात अफीम में, वही भांग में, वही धतूरे में, वही जितनी नशीली चीजें हैं, सब में यही बात है। थोड़ा 5-10% तो सत्वगुण होता ही है, हर वस्तु में तीन के समिश्रण के बिना कोई वस्तु नहीं बनती। ठीक है।
हां जी, बोलिए। हम हां, हो गई दुखी तो होगी, पर आत्मा में कोई भार घट जाता हो, कोई उसका उसमें कोई गलना शुरू हो जाता हो, कोई सड़ना शुरू हो जाता हो। ऐसा कोई परिवर्तन उसमें नहीं होगा। क्योंकि उसमें ये गलने-सड़ने वाली पॉसिबिलिटी है ही नहीं। यह गलना, सड़ना, बिगड़ना, सुधरना यह जो पॉसिबिलिटी होती है, यह जड़ पदार्थों में होती है, जिसमें पार्टिकल्स हों। तो आत्मा में पार्टिकल नहीं है। इसलिए अपरिणामी। उसमें घटना, बढ़ना, गलना, सड़ना, कटना, जुड़ना ऐसा कुछ नहीं। पर चित्त में यह सब होता है, क्योंकि उसमें पार्टिकल्स हैं। इसलिए उसकी स्थितियां बदलती रहती हैं। कभी कोई गुण भर जाएगा, कभी कोई गुण। वो परिस्थिति के अनुसार हैं। हां, दुखी तो होगा। यह तो पक्की बात है। उसकी फीलिंग उसका अपना गुण है। खराब समाचार मिला तो दुखी होगा। अच्छा समाचार मिला तो खुश होगा। खुश होगा, दुखी होगा। बस इससे आगे कुछ नहीं होगा। इतना ही होगा। हां।
ऐसा ऐसा भी हो सकता है। वो एक सीमा तक हो सकता है। जिस आत्मा का तत्व ज्ञान जितना अधिक होगा। क्या बोला? उतना-उतना वो मन को कंट्रोल कर लेगा और दुखी नहीं होगा। खराब सूचना मिलने पर भी दुख ही नहीं होगा। वह उसको कंट्रोल कर लेगा। मानसिक दुखों को आत्मा पूरा-पूरा कंट्रोल कर सकता है, अपने तत्व ज्ञान के आधार पर। जैसे आम आदमी को छोटी सी बात पर गुस्सा आ जाता है, उसका मन खराब हो जाता है, मूड खराब हो जाता है। तो जो योगाभ्यासी है, तत्व ज्ञानी है, वैरागी व्यक्ति है, उसको छोटी-मोटी बात सुना दो, उसको कोई असर नहीं होगा। वह उसको कंट्रोल कर लेगा। उसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। एक सीमा तक कोई फर्क नहीं पड़ेगा। और जिसका जितना ज्यादा तत्व ज्ञान ऊंचा-ऊंचा होता जाएगा, वो उतना-उतना ज्यादा कंट्रोल कर लेगा। चलो, मानसिक को तो कर भी लेगा। पर शरीर की एक सीमा है। शरीर को 100% कंट्रोल नहीं कर पाएगा। मानसिक कर लेगा।
जैसे उदाहरण के लिए, किसी ने आपके ऊपर बहुत ज्यादा झूठा आरोप लगा दिया। बहुत भयंकर आरोप लगा दिया और आपके विरोध में चिट्ठी लिख-लिख के देश भर में डाल दी, 200-500 घरों तक पहुंचा दी और आपका तत्व ज्ञान बहुत ऊंचा है तो आपको उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वो कहेगा, ठीक है, पागल आदमी, मूर्ख आदमी, बिना बात झूठे आरोप लगाता, लगाने दो। मेरा क्या बिगड़ रहा है? इसके कहने से मैं वैसा थोड़ी हो जाऊंगा, मैं तो जैसा हूं वैसा ही हूं। यह आरोप लगाता, लगाने दो। इसके लगाने से मेरी आत्मा का या मेरा कुछ नहीं बिगड़ता। बस इतनी बात है कि यह जितने लोगों को झूठ बोलेगा और मेरे बारे में भ्रांति फैलाएगा तो वह कोई 200-500 लोग मेरे विरुद्ध हो जाएंगे। बस इतना ही तो होगा। इससे ज्यादा क्या होगा? मेरी आत्मा का कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यह तो अपने ज्ञान विज्ञान से, तत्व ज्ञान से वो इस प्रभाव को रोक लेगा। आम आदमी नहीं रोक पाएगा। वो कहेगा, क्यों? मेरे बारे में ऐसी बात फैलाता है। यह तो भयंकर दुष्ट आदमी है। इसको तो ठोकूंगा मैं। यह 500 को बताता है, मैं 5000 को बताऊंगा। वो पूरा बदल लेगा तो उसका दिमाग डिस्टर्ब हो जाएगा। पर जो तत्वज्ञानी है, वो कोई चिंता नहीं करता। वो कहता है, कोई बात नहीं, बोलने दो।
यह संसार। यहां श्री रामचंद्र जी पे झूठे आरोप लगाए गए। लोगों ने कहा, इसने धोबी के कहने पर अपनी पत्नी को घर से निकाल दिया। बताओ, यह सच्चा है या झूठा आरोप है? झूठा है ना? तो श्री राम जी को भी नहीं छोड़ा लोगों ने। इतने बड़े अच्छे राजा थे, इतने बलवान, बुद्धिमान, वेदों के विद्वान थे, नीतिमान थे, मर्यादा पुरुषोत्तम थे। उनको भी नहीं छोड़ा। उन पर भी झूठे आरोप लगे। फिर श्री कृष्ण जी पे आरोप लगे। उनको बता दिया, यह गोपियों के साथ खेलते हैं, माखन चोर हैं। ऐसे-ऐसे झूठे आरोप लगाए। क्या श्री कृष्ण जी ऐसे थे? नहीं थे। तो उसने विचार किया, श्री कृष्ण जी इतने महान पुरुष थे, उनको भी नहीं छोड़ते लोग। राम जी को नहीं छोड़ते, कृष्ण जी को नहीं छोड़ते। सबको बदनाम करते हैं। यह तो झूठे आरोप लगाते हैं। फिर उसने सोचा, ईश्वर। देखो, ईश्वर सारी दुनिया का मालिक है, सबका राजा है। क्या ईश्वर घोटाले करता है? क्या ईश्वर अन्याय करता है? यह जनता तो ईश्वर को भी नहीं छोड़ती, जो सर्वशक्तिमान है, सर्वथा निर्दोष है। जिस ईश्वर ने आज तक एक दिन भी किसी पे इतना भी अन्याय नहीं किया, उसको नहीं लोग छोड़ते। उसको खूब गाली देते हैं। हे भगवान, तेरा सत्यानाश हो। तूने मेरा बेटा मार दिया। जब बेटे का एक्सीडेंट होता है, तो लोग भगवान को गालियां देते हैं। और इतना गुस्सा आता है, किसी दिन मेरे हाथ में आ गया तो हड्डी-पसली तोड़ दूंगा। इतना गुस्सा आता है भगवान पे। और ऐसे-ऐसे झूठे आरोप लगाते हैं। मेरा बेटा मार दिया। मेरा मुकदमा फेल करवा दिया। मुझे मुकदमा हरवा दिया। ऐसा कर दिया, वैसा। जितने भी नुकसान होते हैं, सारे ईश्वर के सर पे। चाहे दोष अपना हो, किसी दूसरे का हो, पर लगाएंगे ईश्वर पर।
तो तत्व ज्ञानी व्यक्ति क्या सोचता है? वो यह सोचता है, यह दुनिया इतनी नालायक है, इतनी दुष्ट है, इतने मूर्ख लोग हैं जो राम जी को नहीं छोड़ते, कृष्ण जी को नहीं छोड़ते, सर्वशक्तिमान, सर्वज्ञ, सर्वथा निर्दोष ईश्वर को भी नहीं छोड़ते, तो मैं तो कौन से खेत की मूली हूं? तो मुझे कौन छोड़ेगा? मेरे ऊपर भी आरोप लगेंगे ही। लगेंगे तो लगा दिए। क्या फर्क पड़ता है? इससे मेरी आत्मा का कोई 10% हिस्सा कट नहीं गया। मेरा कोई 20% नुकसान नहीं हो गया आत्मा का। आत्मा 100% सुरक्षित है। यूं का यूं। तुम कितने भी आरोप लगाओ, उससे कुछ नहीं होने वाला। थोड़े से लोगों को भ्रांति होगी। बस इतना ही होगा। इसका वो समाधान निकाल लेता है। क्या समाधान है? यह समाधान है कि जितने लोगों को इस व्यक्ति ने मेरे बारे में विरुद्ध भड़काया, झूठे आरोप लगाए, इन 500 लोगों को बहका दिया, तो वह देखेगा, 500 में से बुद्धिमान कौन है? समझदार कितने लोग हैं? दो-तीन-चार समझदार लोग 500 में से छांट लेगा। आपको भी टेक्निक बता रहा हूं। आपकी भी टेंशन दूर हो जाएगी। आप सीख लो। तो वह 500 में से चार-पांच आदमी ढूंढ लेगा जो समझदार हैं, बुद्धिमान हैं और उनके सामने अपना स्पष्टीकरण सुना देगा कि यह जो पत्र में, इस चिट्ठी में जो मुझ पर झूठा आरोप लगाया गया है, यह सब गलत है। यह सब मिथ्यारोप है। मैं ऐसा व्यक्ति नहीं हूं जैसा मुझ पर आरोप लगाया गया है। और आप यदि परीक्षण करना चाहते हो तो परीक्षण कर लो। मेरी ओर से खुली छूट है। जाओ, ढूंढ लो प्रमाण, ढूंढ लाओ। सारी परीक्षा कर लो प्रमाणों से। अगर मैं दोषी पाया गया, जो आरोप मुझ पर लगाए गए, अगर मैं ऐसा सच में दोषी बन निकला प्रमाण परीक्षा करने पर, तो मैं सबके सामने घोषणा करता हूं। मैं सबके सामने दंड लूंगा। चौराहे पर जनता के सामने तुम मुझे दंड देना। मैं दंड स्वीकार करूंगा। और अगर मैं दोषी सिद्ध नहीं हुआ, निर्दोष पाया गया, तो यह जो बकवास कर रहा है, उल्टी-सीधी, थोड़ा इसको भी ठीक-ठाक कर देना। इसको भी समझा देना कि बदतमीज, ऐसे झूठे आरोप नहीं लगाने चाहिए। फिर आप चाहो तो उसको दंड दे देना। नहीं दो तो कम से कम इतना तो ब्रेक लगा देना कि आगे ऐसे बदतमीजी आगे ना करें।
तो जो तत्वज्ञानी व्यक्ति होगा, वह ऐसे बोल देगा। तो वह जो पांच आदमी होंगे समझदार, वह इतने सेंटेंस से ही समझ जाएंगे कि हां, यह सच्चा है। समझ जाएंगे या नहीं? समझ जाएंगे ना? अगर यह दोषी होता, अपराधी होता तो ऐसे थोड़ी बोलता, मैं चौराहे पर दंड लूंगा, सबके सामने दंड लूंगा। तब ऐसे थोड़ी बोलता ये। पर यह तो खुल के बोल रहा है, मैं कोई अपराधी नहीं हूं। जाओ, परीक्षा कर लो। मेरा चैलेंज है। इसका मतलब यह वास्तव में निर्दोष है। यह सही कह रहा है। तो पांच आदमी तो इतना बोलने से ही समझ जाएंगे। और अगर फिर भी पांच में से किसी एक को शंका रह भी गई, तो वह थोड़ी परीक्षा भी कर लेगा। कर लो भाई। और जब हमने दोष किया ही नहीं, तो हमें डर काहेगा? टेंशन काहेगी? कर लो परीक्षा। और वो परीक्षा भी कराएगा। तब उसको भी यही सिद्ध होगा कि यह निर्दोष है। इसने कोई गलती की नहीं। तो पांच लोग समझ जाएंगे हमारी सच्चाई को। अब वह पांच लोग बाकी पांचों को समझा देंगे। बस हमारा काम पूरा हो गया। हमको इतना ही करना है। जो बुद्धिमान है, उसको समझा दो कि यह झूठा आरोप है। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया। वो पांच समझ गए तो आगे सबको समझा देंगे। बातें ऐसे फैलती रहती हैं। जैसे वह झूठी बात फैल गई, तो यह सच्ची भी फैल जाएगी। वह आगे फैला देंगे। बात। हमारा उद्देश्य पूरा हो गया। ऐसे तत्वज्ञानी व्यक्ति ऐसे झूठे आरोपों के प्रभाव को रोक लेता है और उसको मैनेज कर लेता है। कोई चिंता नहीं करता। मस्त रहता है। टेंशन फ्री।
तो मानसिक को तो रोक लेगा, पर शारीरिक को एक सीमा तक रोक पाएगा। मान लीजिए, जब आपका शरीर ठीक है, स्वस्थ है, रोगी नहीं है, बुखार नहीं है, नॉर्मल टेंपरेचर है तो आप सारा काम ठीक-ठाक कर लेते हैं। मान लो आपको 102 फारेनहाइट डिग्री का बुखार आ जाए। अब थोड़ा फर्क पड़ेगा। हां जी। 102 के बुखार में पड़ेगा ना फर्क। अब आपका दिमाग, शरीर उतना काम नहीं करेगा जितना सामान्य रूप से रोज करता है। चेंज आएगा। फिर टेंपरेचर और बढ़ेगा। 103, 104। फिर और स्थिति बिगड़ेगी। 104 डिग्री फारेनहाइट के बुखार में आम आदमी तो उसकी हालत खराब हो जाएगी। वो संभल नहीं पाएगा। बेहोश जैसा हो जाएगा या लेट जाएगा। बिस्तर पर बुरी तरह से परेशान होगा। जो तत्व ज्ञानी योगी व्यक्ति होगा, वह इतना दुखी नहीं होगा। वह कम दुखी होगा। वह 102 डिग्री फारेनहाइट तक बुखार को रोक लेगा। उससे प्रभावित नहीं होगा। उससे ऊपर बुखार बढ़ेगा तब उसको प्रभाव बढ़ेगा। आम आदमी तो 102 पे ही हालत खराब हो जाएगी। तो हमारे गुरु जी कहते थे कि मैं जब मुझे 102 का बुखार आता है, तब तक मैं ठीक रहता हूं। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। इस बुखार का शरीर पर, मेरे मानसिक स्थिति पर कोई असर नहीं होता। मैं यहां तक कंट्रोल कर लेता हूं 102 तक। फिर जब 104 हो जाता है, फिर मेरे कंट्रोल में स्थिति नहीं रहती। फिर वह थोड़ा मुझे प्रभावित करता है। स्थिति बदलती है। तो यह है तत्वज्ञानी व्यक्ति का स्तर। उसकी स्थिति। ऐसे वह इन प्रभावों को रोक लेता है। तो औरों से तो बहुत ही अच्छा जी रहा है। बढ़िया जी लेता है। ठीक हो गया। और कोई शंका बोलिए।
काना कंट्रोल कर लिया। ठीक बात है। उनमें योग की पूरी योग्यता तो नहीं थी। ऊंचा वैराग्य नहीं था। लेकिन एक जो अंदर स्किल था, जो योग्यता थी, जितना भी ज्ञान था उनका और जितना वह कार्य करते थे, जिस देशभक्ति की भावना से करते थे, सरदार वल्लभ भाई पटेल जिस भावना से कार्य करते थे, देश की रक्षा करेंगे, परोपकार करेंगे और इतने सारे 47-48 लोग हैं जिनको जिनके ऊपर इंपॉर्टेंट केस चल रहा है, तो उनकी कीमत ज्यादा थी या पत्नी की कीमत ज्यादा थी? तो जिसकी ज्यादा थी, वह तो गई वापस। वह तो आने वाली नहीं। और अगर मैं इस समय भाग जाऊं तो इन 48 लोगों का नुकसान हो जाएगा। तो हानि-लाभ को देखकर उन्होंने अपने मन की स्थिति को मजबूत कर लिया कि पत्नी का तो चलो अवसान हो ही गया। उसका तो खाली अंतिम संस्कार करना है। वो तो मैं नहीं करूंगा। कोई और कभी वो भी कर लेगा। पर यह काम मैंने छोड़ दिया तो इनका नुकसान हो जाएगा 48 लोगों का। तो यह सोचकर उन्होंने बुद्धिमत्ता से काम लिया और अपने मन पर कंट्रोल कर लिया। उस घटना से वह विचलित नहीं हुए, प्रभावित नहीं हुए और वह काम में पूरा ध्यान लगाया और वह मुकदमा जीत गए। तो ऐसा दूसरे लोग भी कर लेते हैं। यह बाकी लोग कोई जीरो पर नहीं खड़े हैं। उनमें भी ज्ञान होता है। तत्व ज्ञान होता है। कुछ-कुछ वैराग्य भी होता है। कुछ देशभक्ति की भावना होती है। उसके कारण उनमें जोश आता है, उत्साह आता है। और वह हानि-लाभ की तुलना करके जो लाभ पक्ष वाला है, जो पक्ष लाभ अधिक वाला पक्ष है, वह उसको प्राथमिकता देते हैं और बाकी दूसरे पक्ष को गौण कर देते हैं। दूसरे लोग भी करते हैं अपनी-अपनी योग्यता अनुसार। तो सरदार पटेल जी ने किया, ठीक किया, बिल्कुल अच्छा किया और वह अपने कार्य में सफल हो गए। जी हां, उनकी भी बात हुई थी। योगी जी, सीएम योगी उत्तर प्रदेश वाले, उनके भी पिताजी का अवसान हुआ, उनको भी सूचना मिली, उन्होंने को कोई फर्क नहीं पड़ा। उनका तो वैसे ही सन्यासी हैं और ज्ञान-विज्ञान है उनके पास। तो अच्छी बात है। तो बात यही कह रहे हैं कि जिसके पास ज्ञान-विज्ञान, ज्ञान जितना अच्छा होगा, जितना अधिक होगा, जितनी निष्कामता होगी, परोपकार की भावना होगी, जितना तत्व ज्ञान ऊंचा होगा, उतना ही वह इन परिस्थितियों से लड़ लेगा और प्रभावित नहीं होगा, परेशान नहीं होगा, दुखी नहीं होगा और जीत जाएगा। तो, यह बात यहां पर बताई जा रही है। ठीक है।
और कोई प्रश्न है? हां, बोलिए। आपका प्रश्न है कि चित्त आत्मा के साथ दूसरे जन्म में भी रहता है या नहीं? मेरा उत्तर है, रहता है। यही चित्त जो हमारे पास है, मन अगले जन्म में यह हमारे साथ जाएगा। करोड़ों जन्मों तक हमारे साथ चलेगा। आत्मा के साथ कब तक चलेगा? जब तक मुक्ति नहीं हो जाए। जब तक हमारी मुक्ति नहीं हो जाए। यही मन करोड़ों जन्मों तक हमारे साथ चलेगा। मुक्ति तक पहुंचा के ही छोड़ेगा। या तो मुक्ति हो जाए, तब हमसे अलग होगा। और या फिर बीच में प्रलय आ गई और मुक्ति नहीं हो पाई। प्रलय का समय आ गया, तभी अलग हो जाएगा। यदि प्रलय भी नहीं आई, मुक्ति भी नहीं आई, तो तब तक हमारे साथ करोड़ों जन्मों तक यही मन चलता रहेगा। हां, इसमें घिसावट होगी। थोड़ी-थोड़ी होगी। बहुत थोड़ी होगी। जैसे कार की उम्र कितनी मानते हैं? 20 साल। 15 साल, 20 साल। उसके बाद तो यह खराब हो जाती है। फिर लोग इसको छोड़ के नहीं ले लेते। तो कार की उम्र कितनी है? 15-20 साल। तो इसमें घिसावट तेजी से होती है। शरीर की उम्र है 70-80-100 साल। इसकी घिसावट तेजी से होती है। तो 100 साल में यह खत्म हो जाता है। कार 15-20 साल में खत्म हो जाती है। पर किसी वस्तु की उम्र 4 अरब 32 करोड़ वर्ष हो, तो उसमें घिसावट की दर कितनी स्लो होगी? कितनी धीरे होगी? बहुत धीरे-धीरे, धीरे-धीरे घिसेगा। वो करोड़ों साल तक वही का वही चलने वाला है। तो मन की आयु 4 अरब 32 करोड़ वर्ष। मन, इंद्रियां, बुद्धि, यह जितना सूक्ष्म शरीर है, इनकी आयु इतनी लंबी है। इसलिए इसमें घिसावट की दर भी बहुत कम है। धीरे-धीरे होगी। जी, और बोलिए।
ये ठीक नहीं है। जब पर वैराग्य हो जाता है और आत्मा परमात्मा की अनुभूति करता है। असंप्रज्ञात समाधि हो जाती है। उस समय भी चित्त का आत्मा के साथ संबंध रहता है। वह कट ऑफ नहीं होता है। अलग नहीं होता है। क्योंकि ईश्वर ने उसको चित्त दिया ही इसलिए कि वह अपने काम करें। चाहे समाधि का काम हो, चाहे संसार का व्यवहार हो, कोई भी हो। चित्त के बिना वह कर नहीं सकता। ईश्वर की अनुभूति भी चित्त के बिना नहीं कर सकता। वह साधन है। जब तक आत्मा बंधन में है, शरीर धारी है, तब तक उसके सारे काम चित्त के थ्रू होंगे। उसके बिना डायरेक्ट नहीं होंगे। जब मुक्ति में जाएगा, अब चित्त उससे अलग हो जाएगा। ऐसा लिखा है शास्त्र में। जब चित्त उससे अलग होगा, तब उसकी मुक्ति हो जाएगी। फिर मुक्ति में चित्त भी नहीं चाहिए। इंद्रियां, यह भौतिक इंद्रियां, कुछ नहीं चाहिए। स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, वहां कुछ नहीं चाहिए। वहां तीनों शरीरों से आत्मा का संबंध कट जाएगा। फिर आत्मा की अपनी 24 शक्तियां हैं, जो सत्यार्थ प्रकाश के नौवें समुल्लास में लिखी हैं। वो उसकी स्वाभाविक हैं। 24 शक्तियां। वो आत्मा के साथ रहेंगी, मुक्ति में भी और आज भी। वह तो स्वाभाविक है। कभी भी नहीं हटेंगी। चाहे बंधन हो, चाहे मुक्ति हो। वह 24 शक्तियां उसके साथ चलेंगी मोक्ष में। पर वह बहुत थोड़ी सी है, बहुत कमजोर है। इतनी शक्तियों से आत्मा का काम नहीं चलता। उसको हर समय कुछ बाहर का काम करना हो, कोई भी काम करना हो तो उसको कुछ बाहर की सहायता चाहिए। एक्सटर्नल सपोर्ट चाहिए बाह्य पदार्थों की। तब वह होश में आता है, तब वह काम करता है। तो जब आत्मा बंधन में आता है, तो शरीर आदि-आदि, मन, इंद्रियां, बुद्धि, यह भौतिक पदार्थों की सहायता से वो करता है, जो भी करता है। चाहे समाधि लगानी हो, चाहे ईश्वर की अनुभूति करनी हो, तो भी वह साधन चाहिए। जब मुक्ति में जाएगा, तब यह भौतिक साधन तो छूट जाएंगे। वहां ईश्वर की शक्ति मिलेगी। उसकी सपोर्ट मिलेगी। तब उसकी शक्ति से वह सारे काम कर लेगा मुक्ति में। बंधन में प्रकृति की सहायता से और ईश्वर की सहायता से, दोनों की सहायता लेनी पड़ती है यहां। और मोक्ष में केवल ईश्वर की। प्रकृति कट हो जाती है पूरी तरह से। फिर वो ईश्वर की शक्ति से सारे काम करता है। देखना, सुनना, घूमना, फिरना, बातें करना, आपस में चर्चाएं करना। मुक्त आत्माएं भी आपस में बातें करती हैं। जैसे आप और हम बात करते हैं ना, आप और हम दोनों बंधन अवस्था में हैं, तो हम दोनों बात कर रहे हैं। ऐसे ही दो आत्मा मुक्ति में हो, तो वह दोनों आपस में बात कर सकती हैं। मित्र बनाने की जरूरत ही नहीं। वहां शत्रु होता ही नहीं। कोई, सारे ही मित्र होते हैं वहां। [हंसी] मुक्ति में शत्रु कोई नहीं होता। सारे मित्र होते हैं। चाहे तो साथ-साथ रह सकते हैं। वहां पर कोई, कोई बंधन नहीं है। बंधन तो यहां पर है। मुक्ति तो मुक्ति है। फ्रीडम है। फुल फ्रीडम है। जाओ, घूमो, फिरो, गप्पे मारो, देखो, सुनो, दुनिया के नजारे देखो। पूरी छूट। तो वहां बातें करते हैं लोग। एक ने पूछा, जी, क्या बात करते हैं? मैंने कहा, जैसे हम बात करते हैं ऐसे। वो भी बात करते हैं। हम क्या बात करते हैं? हम यह बात करते हैं, भाई ताजमहल देख कर आए। लाल किला देख के आए दिल्ली-आगरा में। बहुत अच्छा लगा। हम यही तो बातें करते हैं ना। कोई स्विट्जरलैंड चला गया, कोई इंग्लैंड चला गया, कोई जापान घूम आया। फिर आकर बताता है ना, मैं क्या-क्या देख कर आया। यही तो बातें करते हैं। तो जैसे हम यहां पर बातें करते हैं कि मैं लंदन होकर आया, मैं स्विट्जरलैंड होकर आया, मैं दुबई घूम कर आया। तो वो मुक्त आत्माएं भी आपस में बात करती हैं। वो पूछते हैं, हां लालचंद जी, कहां घूम आए? तो लालचंद जी ने कहा, मैं अभी शनि ग्रह के छल्ले देख के आ रहा हूं। बहुत बढ़िया है। आपने नहीं देखे। तो दूसरे ने कहा, प्रफुल जी ने कहा, नहीं, मैंने तो नहीं देखे। अरे, आपने देखे नहीं, जाओ, देख कर आओ। बहुत बढ़िया है। अब जाओ, देखो। वो देखेंगे, जाके। यहां टैक्स थोड़ी लगता है मुफ्ति में। ना किराया लगता है, ना पासपोर्ट चाहिए, ना वीजा चाहिए, ना कोई टैक्स लगता है। कुछ नहीं। फ्री में घूमना है। ईश्वर की शक्ति मिली हुई है। तो यह बताएंगे, मैं शनि ग्रह के छल्ले देखकर आया। प्रफुल जी कहते हैं, मैं भी देखकर आता हूं। यह भी जाएंगे, घुमाएंगे, देख आएंगे। फिर यह पूछेंगे, आपने क्या देखा? यह कहेंगे, मैं हिंद महासागर में गया था नीचे। मछलियां देखकर आए। आ हा, कैसी बढ़िया-बढ़िया मछलियां। कैसे-कैसे कलर, कैसे-कैसे डिजाइन, लाल, पीली, चमकीली हैं। गोल्डन, कैसी बढ़िया-बढ़िया मछलियां थी। एक मछली तो ऐसी थी, लाइट मारती थी चारों तरफ। ऐसे बहुत मजा आया देखकर। फिर प्रफुल जी कहेंगे, लाल लालचंद जी, आपने वो नहीं देखा हिंद महासागर? बोले, नहीं देखा। तो जाओ ना, देख कर आओ। यहां कौन सा टैक्स लग रहा है? ये जाएंगे, वो हिंद महासागर देख आएंगे। बस ऐसी-ऐसी बातें करते हैं, घूम कर आए, देख कर आए, ऐसी बातें करते हैं। वो करते होंगे। बाकी वही चल के देखेंगे ना। सारी बातें। सारी बातें यहां समझ में नहीं आती। [हंसी] मुक्ति में आत्मा आराम करता है या नहीं करता? दोनों वहीं चलते हैं ना। वहीं देखेंगे। घूमेंगे, थक जाएंगे। बोर हो जाएंगे तो आराम भी कर लेंगे। थोड़ा दो-चार साल आराम कर लेंगे। फिर 5-10 साल घूम लेंगे। फिर जब थक जाएंगे, बोर हो जाएंगे। फिर आराम कर लेंगे। यह तो वहीं जाकर पता लगेगा। सृष्टि यही रहेगी। अनुभूति में अंतर आएगा। हां, यहां तो अभी शरीर है, तो इसके बंधन में है हम। तो इसके हिसाब से सोना पड़ता है, जागना पड़ता है, व्यायाम करना पड़ता है। यहां बहुत झंझट है। तो मुक्ति में सारा झंझट खत्म। वहां शरीर तो होगा नहीं। ना कोई नहलाना, ना धुलाना, ना खिलाना, ना पिलाना, ना कुछ। कोई समस्या नहीं। तो वहां तो 24 घंटे फ्री रहेंगे। खूब घूमो, फिरो, देखो। ईश्वर का आनंद लो और दुनिया के नजारे देखो। राग-द्वेष कुछ नहीं। कुछ नहीं। क्योंकि इन सब का कारण अविद्या है। राग, द्वेष, काम, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, द्वेष, आसक्ति, अभिमान। ये सब चीजों का मूल कारण अविद्या है। वो हम यहीं पर ही पत्ता काट के गए। अविद्या को यहीं खत्म कर दिया। तो मोक्ष में ना अविद्या है, ना राग, द्वेष, काम, क्रोध, कुछ नहीं। कोई अभिमान नहीं, कोई छोटा नहीं, कोई बड़ा नहीं। सब बराबर हैं। मुक्त आत्माएं जितनी भी हैं, सब बराबर हैं। एक जैसी हैं। वह अपने ओरिजिनल स्वरूप में है मुक्ति में और ओरिजिनल स्वरूप सबका एक जैसा है। इसलिए वहां कोई किसी को छोटा नहीं मानता, कोई बड़ा नहीं मानता। सब बराबर होते हैं। खूब आनंद लेते हैं। सत्यार्थ प्रकाश में लिखा है। वहां कोई छोटा-बड़ा नहीं होता। जैसे यहां कोई प्रधान है, कोई मंत्री है, कोई उप-प्रधान है, कोई कोषाध्यक्ष है। यहां तो पोस्ट ऊंची-नीची होती है ना। वहां ऐसा ऊंच-नीचा कुछ नहीं है। सब बराबर है। हैं जी। हां, स्त्री-पुरुष तो शरीर का नाम है। शरीर वहां है ही नहीं। सब आत्माएं एक जैसी हैं। ठीक है जी।
हां, बोलिए। आखरी सवाल। लेकिन उसको अनुभव कंटीन्यूअस रहता है? दो देखिए, मुक्ति का जो आनंद है, वो ईश्वर का ही आनंद है। ईश्वर से अलग तो कोई चीज है नहीं। ठीक है ना? संसार का मालिक, राजा ईश्वर है। और मुक्ति में भी वही आनंद देगा। समाधि में भी वही देगा। तो ईश्वर एक ही है। मुक्ति में जो हमें आनंद मिलेगा, वो ईश्वर का ही मिलेगा। और जो समाधि में हम बैठकर ईश्वर से आनंद लेते हैं, असंप्रज्ञात समाधि में, वो ईश्वर का ही आनंद है। यानी मुक्ति वाला आनंद और ईश्वर वाला समाधि वाला आनंद एक ही है। उसमें कोई अंतर नहीं है। बस फर्क इतना है कि अभी शरीर है, तब शरीर नहीं होगा। आनंद सेम आनंद वही होगा। तो योगी व्यक्ति असंप्रज्ञात समाधि में मुक्ति जैसा अनुभव कर लेता है। प्रमाण चाहिए तो योग दर्शन, पहला चैप्टर, 19वां सूत्र है। वहां पर पढ़ा है। पढ़ लीजिए। लिखा है वहां पर। योग दर्शन, पहला पाद, 19वां सूत्र है। भव प्रत्ययो विदेह प्रकृति लयाना। यह सूत्र है। इसके व्यास भाष्य में लिखा है कि वह समाधि वाले योगी मुक्ति जैसा अनुभव करते हैं। तो मुक्ति वाला आनंद और समाधि वाला आनंद, ईश्वर का आनंद एक ही है। तो वह तो यही अनुभव कर लेते हैं। और इसी आनंद से जो उनके संस्कार बनते हैं, उसी संस्कार के कारण वह अविद्या आदि सारे क्लेशों का नाश करते हैं। और इसका नाश करके फिर पूरी तरह से शरीर छोड़ के मुक्त हो जाते हैं। बस फिर मुक्ति में फिर कोई समस्या नहीं। पर शरीर है, तब तक समस्या है। एक घंटा समाधि लगाएंगे, दो घंटा लगाएंगे, फिर थक जाएंगे। फिर वापस आना पड़ेगा। व्यवहार में तो आएंगे, तो वह स्थिति थोड़ी कम हो जाएगी, बदल जाएगी। इस झंझट से बचने के लिए वह फिर पूरी तरह मोक्ष में जाते हैं कि वहां शांति रहेगी। 24 घंटे आनंद रहेगा। इसलिए वो फिर मोक्ष में चले जाते हैं। आपको यहां इस पुस्तक में नहीं मिला होगा। मुक्ति जैसा मिला। मिल गया ना? हां। एक 19 में मिल गया ना? हां। तो इस तरह से मुक्ति का आनंद वो यहीं बैठ के अनुभव कर लेते हैं। समय समाप्त हुआ। जी, पाठ को विराम देते हैं। बाकी सूचना श्री लालचंद जी बताएंगे। एक बार तालियों की गड़गड़ाहट के साथ पूज्य स्वामी जी महाराज का कोटि-कोटि धन्यवाद है।