Transcription
एक ज़माने में दमिश्क शहर में एक रंगरेज़ था जिसका नाम अब्बू कासिम था और एक नाई का नाम अब्बू अब्दुल्लाह था। नाई और रंगरेज़ की दुकानें बिल्कुल पास-पास थीं और वे दोनों एक दूसरे के बहुत गहरे दोस्त थे।
अब्बू कासिम रंगरेज़ बहुत झूठा, मक्कार और धोखेबाज़ था। इसका ज़्यादा वक़्त बदमाशों की सोहबत में गुज़रता था। अपने कारोबार में भी वह अपने ग्राहकों को सुबह से शाम तक धोखा देता रहता था। इसके धोखा देने के बहुत से तरीक़े थे। मसलन, कपड़ा रंगने से पहले ही वह ग्राहकों से पैसे ले लेता था। इसके बाद वह उनको टालता रहता था।
वे बेचारे सुबह-शाम दुकान के चक्कर लगाते और यह उनसे तरह-तरह के बहाने करता। कभी कहता रंग नहीं मिला। कभी यह कहता कि बीवी की बीमारी की वजह से कपड़ा नहीं रंग सका। कभी अपनी बीमारी का बहाना करके टलता। कभी यह कहकर टलता कि मेहमान आ गए थे, इसलिए कोई काम न कर सका।
आख़िर में जब वे तंग आ जाते तो यह कहता कि भाई अगर रंग नहीं कर सकते तो हमारा कपड़ा ही वापस कर दो। इसके जवाब में वह मुँह बनाकर कहता, "क्या बताऊँ असल बात क्या है?" जब वे असल बात पूछते तो यह कहता कि असल बात यह है कि मैंने बहुत अच्छी तरह से रंगने के बाद जब इसे बाहर सूखने के लिए लटकाया तो वह चोरी हो गया। और फिर वह आहिस्ता से कहता, "चोर का तो मुझे पता है मगर पड़ोसी की बात है। कहूँ तो कैसे कहूँ कि हमारे पड़ोसी नाई ने चोरी की है। समझ में नहीं आता कि आपको कैसे मुज़ाहिरा दिखाऊँ।"
और इसके जवाब में उसके ग्राहक यही जवाब देते, "ख़ैर कोई बात नहीं। अब गया तो गया। हमें अल्लाह और देगा।" वे बेचारे चुपचाप अपना सर मातम लिए चले जाते, हालाँकि उनका कपड़ा भी गया और रंगाई के पैसे भी। जबकि सच्ची बात यह होती कि वह यह रुपया-पैसा खा-पीकर बराबर कर लेता और ग्राहकों के कपड़े भी डकार लेता।
बा-खुदा, तो लोग इससे लड़ाई-झगड़ा भी करते मगर वह अपनी हरकतों से कभी बाज़ न आता। वह तरह-तरह से लोगों को परेशान करता। इसके ग्राहक किसी से शिकायत भी न कर पाते। वे यह सोचते कि कपड़ा तो गया, अब कौन झगड़े में पड़े? फिर अगर क़ाज़ी के पास इसकी शिकायत भी करते तो सवाल यह था कि उनके पास कोई सबूत भी तो न था। क़ाज़ी तो सबूत माँगता था।
ग़रज़ इस तरह अब्बू कासिम रंगरेज़ बहुत दिनों तक अपना काम चलाता रहा। लोगों से पैसे लेता, उनके कपड़े बेचता और फिर सैर-तफ़रीह करता। मगर यह सिलसिला आख़िर कब तक चलता? कुछ दिनों के बाद शहर के एक-एक आदमी को मालूम हो गया कि अब्बू कासिम रंगरेज़ धोखेबाज़ है। वह लोगों के पैसे भी खा जाता है और उनके कपड़े भी बेच डालता है।
इसका नतीजा यह हुआ कि लोगों ने अपना काम लाना बंद कर दिया। इसका कारोबार ख़त्म हो गया और इसकी दुकान पर सन्नाटा छा गया। वह यहाँ तक बदनाम हो गया कि जब लोग किसी को धोखेबाज़ कहना चाहते तो यही कहते कि तुम अब्बू कासिम रंगरेज़ हो गए हो।
जब अब्बू कासिम रंगरेज़ इस हाल तक पहुँच गया तो फिर इसको फ़ाक़े की नौबत आ गई। अब वह अपने पड़ोसी अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की दुकान पर बैठने लगा। अब इसका काम यह था कि अगर कोई भूला-भटका ग्राहक कपड़े लेकर आता तो यह अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की दुकान से उठकर उसके पास जाता और उससे रंगाई का कपड़ा और पैसे ले लेता। इसके बाद बाज़ार में कपड़ा बेच देता और चंद रोज़ मज़े की ज़िंदगी गुज़ारता। अब जब वह आदमी अपना कपड़ा लेने आता तो यह हज्जाम की दुकान में छुप जाता।
इत्तेफ़ाक़ से एक रोज़ एक रईस आया। इसने भी अब्बू कासिम रंगरेज़ को कपड़े रंगने के लिए दिए। अब्बू कासिम ने हज्जाम की दुकान से निकलकर कपड़ा तो ले लिया मगर इसके साथ भी यही किया कि वह कपड़ा भी ले जाकर शहर में बेच दिया। इत्तेफ़ाक़ से यह आदमी शहर में बहुत असर रखता था। इसने क़ाज़ी से शिकायत की और पुलिस के आदमी को ले आया।
अब्बू कासिम रंगरेज़ ने जब पुलिस को देखा तो समझ गया कि आज इसकी शामत आई है। चुनाँचे वह चुपचाप हज्जाम की दुकान से निकल कर भागा। जब पुलिस वाले आए तो उन्होंने अब्बू कासिम को न पाया और दुकान का ताला तोड़ा। मगर उनको यह देखकर हैरत हुई कि दुकान में तमाम सामान टूटा-फूटा था। वह आदमी बहुत मायूस हुआ।
क़ाज़ी के आदमियों ने दुकान की कुंजी उस आदमी के हवाले की और पड़ोसी दुकानदारों से कहा कि अब्बू अब्दुल्लाह से कहना कि हमारा कपड़ा दे दे और अपनी कुंजी ले ले। यह कहकर वे चले गए। इसके बाद जब रंगरेज़ हज्जाम की दुकान में आया तो अब्बू अब्दुल्लाह ने पूछा, "मेरे भाई, तुम इन लोगों को इस तरह क्यों परेशान करते हो कि उनके कपड़े तक वापस नहीं करते?"
अब्बू कासिम रंगरेज़ ने कहा, "क्या बताऊँ, जब कपड़े रंगने के लिए आते हैं तो कोई न कोई उन्हें छुपा ले जाता है।" अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "यह तो बड़ी अजीब बात है कि हर एक के कपड़े चोरी हो जाते हैं। इस बाज़ार में सिवाय तेरे और किसी की दुकान में चोरी नहीं होती। मेरा तो ख़्याल है कि तू झूठ बोलता है। मुझे सच-सच बता कि मामला क्या है।"
यह सुनकर रंगरेज़ ने कहा, "भाई, सच तो यह है कि किसी ने यह कपड़े नहीं छुपाए।" हज्जाम ने कहा, "फिर वह कपड़े कहाँ गए?" रंगरेज़ ने कहा, "बात यह है कि मेरे पास रंगने का कोई सामान नहीं है। मेरे हालात बहुत ख़राब हैं।" इसने हज्जाम को सच-सच पूरी बात बता दी।
हज्जाम को रंगरेज़ पर बहुत रहम आया। इसने कहा, "कोई बात नहीं, तुम मेरे साथ रहो। जो मैं खाता हूँ वह खाओ। आख़िर मैं भी तो तुम्हारा पड़ोसी हूँ। मेरा फ़र्ज़ है कि मैं भी तुम्हारे काम आऊँ।"
अब्बू कासिम रंगरेज़ हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह के साथ रहता। एक दिन अब्बू अब्दुल्लाह ने इससे कहा, "मेरे भाई, ऐसा ख़राब ज़माना आ गया है कि मेरा कारोबार भी ख़राब हो रहा है। दुकान के आईने टूट गए हैं। मेरे पास इतना पैसा नहीं कि नए आईने लाऊँ। इसी तरह हम्माम में कोई सामान नहीं है। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूँ।"
रंगरेज़ ने कहा, "भाई, कारोबार का यही हाल है। बग़ैर पैसे के कोई काम नहीं होता। इसी वजह से मेरा काम ख़त्म हो गया। हालाँकि तुम्हारे मुक़ाबले का हज्जाम इस शहर में कोई और नहीं है। अगर तुम कहो तो मैं तुमको एक राय दूँ।" हज्जाम ने कहा, "अरे तुम तो मेरे बहुत अज़ीज़ दोस्त हो। तुमसे राय न लूँगा तो और किससे लूँगा?"
रंगरेज़ ने कहा, "मेरी राय यह है कि हम दोनों यह शहर छोड़कर कहीं और चले जाएँ और वहाँ अपना कारोबार शुरू करें। तुम जानते हो कि मेरे जैसा रंगरेज़ इस शहर में कोई नहीं है और तुम्हारा भी अपने काम में यही हाल है। मगर क्या करें कि इस शहर में हमारा कोई क़द्रदान नहीं है। मुझे यक़ीन है कि दूसरे शहर में जाकर हमारी तक़दीर के दरवाज़े खुल जाएँगे और हमारा कारोबार ज़रूर तरक़्क़ी करेगा। बस हमारे यहाँ से निकलने की देर है।"
इसके बाद अब्बू कासिम ने हज्जाम से सफ़र के बहुत से फ़ायदे बयान किए। हज्जाम पर बहुत असर हुआ और इसने तय कर लिया कि वह इस शहर को छोड़ दे। चुनाँचे इसने अपनी दुकान का सारा सामान बेचना शुरू कर दिया। जब सब सामान बिक गया और उसके हाथ कुछ रुपया-पैसा आ गया तो फिर दोनों ने सफ़र का दिन मुक़र्रर किया।
उस वक़्त रंगरेज़ ने हज्जाम से कहा, "मेरे भाई, हम लोग क़ुरआन-ए-पाक पर हाथ रखकर कहें कि हम में से जो आदमी भी रुपया कमाए तो दोनों मिलकर ख़र्च करेंगे और जब यहाँ वापस आएँगे तो जो कुछ बचेगा उसको दोनों आपस में बराबर बाँट लेंगे।" हज्जाम ने यह बात मान ली और क़ुरआन पर हाथ रखकर यह अहद किया।
अब यह दोनों बंदरगाह पर पहुँचे और एक जहाज़ पर सवार हो गए। इस जहाज़ पर कुल मिलाकर 140 मुसाफ़िर थे। इन दोनों की क़िस्मत अच्छी थी कि उनमें कोई हज्जाम नहीं था। रंगरेज़ ने कहा, "मेरे भाई, यह बड़ा अच्छा मौक़ा है। क्यों न अपनी क़िस्मत को यहीं आज़माएँ। तुम अपना उस्तरा और कैंची लेकर अपना काम शुरू कर दो।"
यह बात हज्जाम की भी समझ में आ गई। इसने अपना सामान लिया। एक आदमी ने जो हज्जाम को देखा तो कहा, "भाई, मेरे बाल बहुत बढ़ गए हैं। ज़रा मेरी हजामत बना दो।" हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह ने उसके बाल बनाए। इसने फ़ौरन पैसे निकालकर दे दिए। हज्जाम ने कहा, "हुज़ूर, मैं यह पैसे लेकर क्या करूँगा? मेरे पास खाने के लिए कुछ नहीं है। अगर कुछ खाने को दे दें तो अच्छा है। मेरा एक दोस्त भी है। हम दोनों खा-पीकर रात गुज़ार लेंगे।" उस आदमी ने फ़ौरन अब्बू अब्दुल्लाह को कुछ खाना दे दिया।
जब अब्बू अब्दुल्लाह खाना लाया तो रंगरेज़ अब्बू कासिम बहुत ख़ुश हुआ और फिर दोनों ने मिल-बैठकर खाना खाया। अब तो अब्बू अब्दुल्लाह यही काम करने लगा और इसका काम अच्छा-ख़ासा चल निकला और दोनों बहुत आराम से खाते-पीते। हज्जाम सुबह से शाम तक अपना काम करता। किसी से रोटी मिलती तो किसी से पनीर तो किसी से गोश्त और रंगरेज़ का तो यह हाल था कि दिन भर चादर तान कर सोता। बस खाने के लिए उठता और खाना खाकर फिर सो जाता।
अब्बू अब्दुल्लाह यानी हज्जाम लोगों से बहुत मोहब्बत से बात करता। अगर कोई उसे कुछ दे देता तो उसे क़बूल कर लेता। किसी से हुज्जत-बहस न करता। जहाज़ के सब मुसाफ़िर उससे मोहब्बत करने लगे और उसका ख़्याल रखते। एक रोज़ जहाज़ के कप्तान को भी अब्बू अब्दुल्लाह का हाल मालूम हुआ। वह भी बहुत ख़ुश हुआ। इसने अपने बाल बनवाए। अब तो हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह की कप्तान से भी दोस्ती हो गई।
अब्बू अब्दुल्लाह ने उसे अपनी और अपने दोस्त की परेशानी का हाल कह सुनाया। कप्तान बहुत अच्छा आदमी था। हज्जाम और रंगरेज़ की परेशानी का हाल सुनकर कप्तान पर बहुत असर हुआ और इसने कहा, "भाई, तुमको ज़्यादा फ़िक्र करने की ज़रूरत नहीं। रात को तुम दोनों मेरे साथ खाना खा लिया करो।"
उस रोज़ शाम को जब हज्जाम वापस रंगरेज़ के पास आया तो उसके पास खाने का बहुत सामान था। अब्बू कासिम इसे देखकर बहुत ख़ुश हुआ और बड़ी तेज़ी से उन पर झपटा। अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "अरे भाई, आज इसको खाने की ज़रूरत नहीं। खड़े रखो, यह फिर कभी काम आएगा। आज जहाज़ के कप्तान ने हम दोनों की दावत की है, इसलिए आज हम कप्तान के साथ खाना खाएँगे। इसने तुमको भी बुलाया है।"
रंगरेज़ अब्बू कासिम ने कहा, "भाई, कप्तान के पास तो तुम ही खाने के लिए जाओ। मेरी तो तबीयत ठीक नहीं, इसलिए मेरा तो अपनी जगह से हिलने का सवाल ही पैदा नहीं होता। मैं तो यही मामूली खाना खाऊँगा।" यह कहकर वह खाने पर टूट पड़ा। अब तो इसकी यह हालत थी कि वह जल्दी-जल्दी दोनों हाथों से खाने लगा। सच पूछो तो वह खा नहीं रहा था बल्कि निगल रहा था। इसके मुँह से लुक़मा निकल-निकल पड़ता था, मगर वह उसे फिर मुँह में ठूँस लेता था। इसकी दसों उँगलियाँ खाने में लथपथ हो रही थीं। ग़रज़ बड़े भोँडेपन से खा रहा था।
इतने में कप्तान का नौकर आया और इसने कहा, "आपको कप्तान साहब याद कर रहे हैं। उन्होंने आपको खाने पर बुलाया है।" अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने रंगरेज़ से कहा, "अगर तुम्हारा जी चाहे तो तुम भी चलो।" मगर अब्बू कासिम राज़ी न हुआ। इसने कहा, "मेरे अंदर इस वक़्त उठने की ताक़त नहीं है।"
हज्जाम बेचारा अकेला चला गया। वहाँ देखा तो सामने खाना लगा हुआ था और कप्तान खाने पर इसका इंतज़ार कर रहा था। दस्तरख़्वान पर तरह-तरह के खाने लगे हुए थे। कप्तान ने हज्जाम से पूछा, "अब्बू अब्दुल्लाह, तुम्हारा दोस्त नहीं आया जो तुम अकेले आ रहे हो?" अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "इसकी तबीयत ठीक नहीं है। इसे समुंदर की आबोहवा रास नहीं आई।" कप्तान ने कहा, "यह कोई बीमारी नहीं है। वह बहुत जल्द अच्छा हो जाएगा।"
फिर कप्तान ने हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह को बहुत अच्छी तरह खाना खिलाया और जब वह खाना खाने के बाद जाने लगा तो उसे एक बहुत बड़ी प्लेट भरकर दी और कहा कि यह खाना तुम्हारे दोस्त के लिए है। यह खाना लेकर अब्बू अब्दुल्लाह अपने दोस्त के पास आया और बोला, "मैंने तुमसे कहा था कि कप्तान के यहाँ खाने पर चलो। मगर तुमने मामूली खाना खाया। ख़ैर कोई बात नहीं। कप्तान ने तुम्हारे लिए भेड़ के कबाब भेजे हैं।"
इस प्लेट को देखते ही रंगरेज़ अब्बू कासिम कबाब पर टूट पड़ा। इसने जल्दी-जल्दी नज़दीक आदमी की तरह खाना शुरू कर दिया। जब कबाब ख़त्म हो गए तो फिर इसने बाक़ी चीज़ें ज़रा सी देर में हड़प कर डालीं और ज़ुबान से प्लेट साफ़ करके हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह के हवाले कर दी।
अब तो अब्बू अब्दुल्लाह का यह तरीक़ा था कि वह दिन भर मुसाफ़िरों के बाल बनाता और रात को कप्तान के साथ खाना खाता। मुसाफ़िरों से जो कुछ मिलता उसे रंगरेज़ अब्बू कासिम साफ़ कर डालता। रात को अब्बू अब्दुल्लाह कप्तान के पास से जो कुछ लाता उसे भी चट कर जाता और हर वक़्त अपने बिस्तर पर पड़ा रहता।
आख़िर 21 रोज़ के सफ़र के बाद जहाज़ किसी शहर के साहिल पर आ लगा। अब्बू कासिम और अब्बू अब्दुल्लाह दोनों कप्तान से रुख़सत हुए और जहाज़ से उतर कर शहर में दाख़िल हुए। शहर में जाकर उन्होंने सराय में कमरा लिया और दोनों मज़े में रहने लगे।
एक दिन अब्बू कासिम ने कहा, "मेरी तो तबीयत ख़राब है। मैं अभी कोई काम नहीं कर सकता। अलबत्ता तुम ज़रा अपने लिए काम ढूँढो। मुझे यक़ीन है कि यहाँ के लोग तुम्हारी हजामत को बहुत पसंद करेंगे।" चुनाँचे हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह अपना सामान लेकर निकल पड़ा। वह दिन भर शहर में घूमा। इसने बहुत से लोगों के बाल बनाए। इसका काम बहुत जल्द निकला और चंद रोज़ के अंदर इसके काम की शोहरत हर तरफ़ फैल गई।
अब तो वह तरह-तरह के खाने लेकर आता। जैसे ही खाना आता रंगरेज़ अब्बू कासिम इस पर टूट पड़ता। ज़रा सी देर में सब खा-पीकर बराबर कर देता। इस तरह 40 दिन गुज़र गए। अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम तमाम दिन काम करता और रुपया कमाता रहा। मगर रंगरेज़ बीमारी का बहाना करके घर में पड़ा रहता। बस सिर्फ़ खाने के लिए उठता मगर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम इसे कुछ न कहता और इसका बड़ा ख़्याल रखता।
40 दिन के बाद अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम बीमार हो गया। अब इसे उठा भी न जाता। इसने सराय के मालिक से कहा, "मेरे भाई, जब तक मैं बीमार हूँ मेरे दोस्त के लिए खाना ला दिया करो। मैं इसकी क़ीमत तुमको दे दूँगा।" चंद रोज़ के बाद अब्बू अब्दुल्लाह की हालत और ख़राब हो गई। वह इतना कमज़ोर हो गया कि मुर्दे की तरह पड़ा रहता।
उधर रंगरेज़ अब्बू कासिम ने यह हरकत की कि जब अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम बीमार पड़ रहा था और सो रहा था तो इसने सारे कमरे की तलाशी ली और उसे वहाँ जो रुपए-पैसे मिले उसे लेकर चुपचाप बाहर निकल गया और बाहर से इसने दरवाज़ा बंद कर दिया। उस वक़्त चौकीदार कहीं गया हुआ था, इसलिए इसने रंगरेज़ अब्बू कासिम को बाहर जाते हुए न देखा।
रंगरेज़ ने बाहर निकलकर पहला काम यह किया कि नानबाई की दुकान में जाकर बहुत डटकर खाना खाया और इसके बाद मज़े में शरबत पिया। इसे पैसे की तरफ़ से तो कोई फ़िक्र न थी क्योंकि इसने हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह के तमाम रुपए चुरा लिए थे। जब वह खाना खाकर निकला तो इसे ख़्याल आया कि इसके कपड़े बहुत ख़राब हैं, इसलिए अपने लिए बेहतरीन कपड़े ख़रीदे और उन्हें पहनकर सारे शहर की सैर की।
एक बात जो इसे ख़ास तौर पर नज़र आई वह यह थी कि शहर भर में इसे एक आदमी भी ऐसा नज़र न आया जो नीले या सफ़ेद रंग के अलावा किसी और रंग के कपड़े पहने हो। क्या औरतें क्या मर्द सब एक ही रंग के कपड़े पहने नज़र आते। अब्बू कासिम को इस बात पर बड़ी हैरत हुई। यह तो कपड़ों की बात थी। वहाँ तो यह हाल था कि शरबत भी नज़र आता तो वह भी नीला। ख़ुशबूएँ नज़र आतीं तो वह भी नीली। ग़रज़ जिस दुकान में जाए नीले के अलावा कोई और रंग नज़र न आता।
इसने सोचा कि रंगरेज़ की दुकान पर चलना चाहिए। चुनाँचे वह रंगरेज़ के यहाँ गया तो इसकी नाँद में नीला रंग घुला हुआ था। इसने अपनी जेब से एक रुमाल निकाला और बोला, "मेरे भाई, यह बताओ कि तुम इस रुमाल रंगने के कितने पैसे लोगे? इसके साथ ही बताओ कि किस रंग में रंगोगे?" उस रंगरेज़ ने कहा, "मैं इसके 20 दिरहम लूँगा और इसे नीले रंग में रँगूँगा।"
अब्बू कासिम ने कहा, "वाह, एक रुमाल के 20 दिरहम और वह भी नीला रंग। इसे तो ज़्यादा से ज़्यादा हमारे शहर के हिसाब से दो दिरहम में रंग देना चाहिए।" रंगरेज़ ने कहा, "अगर यह बात है तो भाई तुम अपने शहर में जाकर इसे दो दिरहम में रंगवाओ। यहाँ तो 20 दिरहम होंगे।"
अब्बू कासिम ने कहा, "अच्छा तो ख़ैर चलो मैं 20 दिरहम ही दूँगा मगर नीले के बजाय लाल रंग में रंगवा लूँगा।" रंगरेज़ ने कहा, "लाल से तुम्हारा क्या मतलब है? लाल तो कोई रंग नहीं है।" अब्बू कासिम ने कहा, "अच्छा लाल नहीं रंग सकते तो हरा रंग दो।" रंगरेज़ ने कहा, "हरा भी कोई रंग नहीं है।" अब्बू कासिम ने कहा, "तो फिर ज़र्द रंग से रंग दो।" रंगरेज़ ने इससे भी इंकार किया।
तब तो अब्बू कासिम की हैरत और बढ़ गई। इसने एक-एक करके बहुत से रंग गिनवाए। मगर हर बार रंगरेज़ ने यही कहा, "यह भी कोई रंग नहीं है।" और आख़िर में बोला, "बस यह नीला है।" अब तो अब्बू कासिम को यक़ीन हो गया कि यह रंगरेज़ और रंगों के बारे में नहीं जानता। इसलिए इसने पूछा, "क्या तुम्हारे शहर के दूसरे रंगरेज़ भी नहीं जानते कि कोई और रंग भी होता है?"
रंगरेज़ ने कहा, "यहाँ इस शहर में कुल मिलाकर 40 रंगरेज़ हैं। हमने अपनी एक अंजुमन बना ली है। हमारे अलावा कोई और आदमी इस काम को नहीं कर सकता। रंगने का काम तो ऐसा है कि हम में से कोई किसी को नहीं सिखाता। यह हमारा ख़ानदानी पेशा है। यह काम हमारे बाप-दादा से होता चला आ रहा है। और हमने नीले रंग के अलावा किसी और रंग का नाम नहीं सुना।"
जब अब्बू कासिम ने यह सुना तो इसने कहा, "अरे भाई, मैं भी रंगरेज़ हूँ। मैं तो तरह-तरह के रंगों से कपड़े रंग सकता हूँ। अगर तुम मुझे अपनी दुकान में नौकर रख लो, तो मैं तुमको सारे तरीक़े बता दूँगा। और तुम्हारे यहाँ रंग-बिरंगे कपड़े रँगूँगा।" उस रंगरेज़ ने जवाब दिया कि हमारे यहाँ परदेशियों को नौकर रखने की इजाज़त नहीं है।
अब्बू कासिम ने कहा, "अगर मैं अपने पैसे से ख़ुद ही अपनी दुकान खोलूँ तो कैसा रहेगा?" रंगरेज़ ने कहा, "यह नामुमकिन है। भला तुमको कौन दुकान खोलने देगा?" यह सुनकर रंगरेज़ अब्बू कासिम वहाँ से आगे बढ़ा और एक और रंगरेज़ की दुकान में दाख़िल हुआ। इसके बाद तीसरी दुकान में, ग़रज़ इसने शहर के तमाम रंगरेज़ों की दुकानें देख डालीं। मगर हर जगह इसे वही जवाब मिला। कोई भी इसे न तो काम देने के लिए तैयार हुआ और न इसे किसी ने यह इजाज़त दी कि वह अपनी दुकान ही खोल ले।
आख़िरकार वह रंगरेज़ों की अंजुमन के सेक्रेटरी के पास गया। इसने कहा, "भाई परदेसी माफ़ करना। हमारे यहाँ का क़ानून ही कुछ ऐसा है। तुमको न तो कोई रंगरेज़ नौकर रख सकता है और न तुमको दुकान खोलने की इजाज़त मिल सकती है।"
अब्बू कासिम को यह सुनकर बहुत ग़ुस्सा आया और वह सीधा बादशाह के महल में जा पहुँचा और बादशाह की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और बोला, "जहाँपनाह, मैं परदेसी हूँ और अपने देश में रंगरेज़ का काम करता था। मैं अलग-अलग 40 रंगों में कपड़े रंग सकता हूँ। मगर आपके यहाँ के रंगरेज़ न तो मुझे अपने यहाँ काम करने देते हैं और न इसकी इजाज़त देते हैं कि मैं अपनी एक दुकान खोलूँ। आपको यह सुनकर हैरत होगी कि दुनिया में तरह-तरह के रंग होते हैं। कोई हल्का, कोई गहरा। इस तरह सुनहरा, ज़र्द, गुलाबी, हरा, सुर्ख़, ग़रज़ कौन सा रंग है जिसमें मैं कपड़े न रंग सकूँ।"
जैसे ही बादशाह ने इतने बहुत सारे रंगों के बारे में सुना, वह उछल पड़ा। क्योंकि वह भी यही समझता था कि बस ले-देकर यही एक नीला रंग होता है। इसने ख़ुश होकर अब्बू कासिम से कहा, "अगर तुम वाक़ई सच कह रहे हो कि इतने बहुत से रंग होते हैं और तुम रंग-बिरंगे कपड़े रंग सकते हो तो तुमको परेशान होने की बिल्कुल ज़रूरत नहीं। मैं न सिर्फ़ तुमको दुकान खोलने की इजाज़त दूँगा बल्कि शाही ख़ज़ाने से तुमको इतने रुपए-पैसे दिलवाऊँगा कि तुम बहुत शानदार दुकान खोल सकोगे और अगर तुमको कोई रोकेगा तो उसे सख़्त सज़ा मिलेगी।"
यह कहकर बादशाह ने अपने मुलाज़िमों को हुक्म दिया, "इस आदमी के साथ जाओ और इसे अपने सारे शहर में घुमाओ। इसे जो दुकान पसंद आए इसे दिलवा दो। चाहे वह दुकान किसी की भी हो। उस दुकान में इसके कहने के मुताबिक़ रंगरेज़ी का सारा सामान लगा दो। इसके अलावा इसके साथ काम करने के लिए 40 ग़ुलाम दे दो ताकि यह अपना काम अच्छी तरह कर सके। और याद रखो अगर कोई मेरा हुक्म न मानेगा और इस रंगरेज़ को तकलीफ़ पहुँचाएगा तो इसे सख़्त से सख़्त सज़ा दी जाएगी।"
इसके बाद बादशाह ने अब्बू कासिम को बड़ा क़ीमती लिबास दिया और इसे 1000 दिरहम की थैली इनाम के तौर पर दी और कहा कि जब तक तुम्हारा काम न चले इस 1000 दिरहम से अपना काम चलाओ। यही नहीं बल्कि इसने इसके रहने के लिए एक बड़ा शानदार मकान और चंद ग़ुलाम घर का काम करने के लिए दिए और शाही अस्तबल से एक घोड़ा भी दिया।
अगले दिन इस घोड़े पर सवार होकर अब्बू कासिम बड़ी शान से दुकान देखने के लिए निकला। बादशाह के आदमी इसके साथ-साथ थे और जो कोई इसे देखता यही समझता कि कोई बहुत बड़ा आदमी आ रहा है। जब बाज़ार के बीचों-बीच पहुँचा तो इसे एक बहुत बड़ी दुकान नज़र आई। इसने कहा, "बस यह दुकान ठीक है मेरे लिए। दुकान ख़ाली करा दो।"
इसकी ज़ुबान से यह अल्फ़ाज़ निकले ही थे कि शाही मुलाज़िमों ने फ़ौरन उस दुकान के मालिक को दुकान के बाहर खड़ा कर दिया और इसका सारा सामान निकालकर बाहर फेंक दिया। वह बेचारा करता भी तो क्या करता इसलिए कि बादशाह के हुक्म को कौन टाल सकता था।
अब्बू कासिम ने बाहर खड़े होकर हुक्म देना शुरू कर दिया, "यह लाओ, वह लाओ, यहाँ रखो, वहाँ रखो।" ग़रज़ दिन भर में दुकान सज गई। जब बाक़ायदा दुकान लग गई तो अब्बू कासिम रंगरेज़ ने बादशाह को ख़बर दी कि अब हमारा काम तैयार है और कल से हमारा कारोबार शुरू हो जाएगा।
बादशाह बहुत ख़ुश हुआ और इसने अब्बू कासिम रंगरेज़ से कहा कि तुम अपना काम अच्छे से अच्छा करो और रुपए की तरफ़ से बिल्कुल फ़िक्र न करो। जितने रुपए की ज़रूरत होगी तुमको ख़ज़ाने से मिल जाएँगे। मगर मैं चाहता हूँ कि तुम जैसा कहते हो वैसे ही रंग-बिरंगे कपड़े रंगो।
बादशाह ने अब्बू कासिम को अपने कई कपड़े रंगने के लिए भेजे। उनमें सूती भी थे और रेशमी भी और ऊनी भी। अब्बू कासिम ने उन्हें मुख़्तलिफ़ रंगों में रंगने के बाद सड़क के किनारे सूखने के लिए डोर में लगा दिया। यह डोर इसने ख़ास तौर पर दुकान के सामने लगा दी थी, जहाँ धूप भी आती थी और हवा भी।
जैसे ही यह कपड़े दुकान के सामने लगे, तो वहाँ उन्हें देखने के लिए भीड़ इकट्ठी हो गई। यहाँ के लोगों ने इससे पहले इतने रंग कहाँ देखे थे? वे तो सिर्फ़ नीला रंग देखने के आदी थे। हर तरफ़ शोर मच गया कि बादशाह के रंगरेज़ ने बड़े ख़ूबसूरत रंगों में कपड़े रँगे हैं। हर एक जवान-बूढ़ा उन्हें देखने के लिए आ रहा था। दुकानदार अपनी दुकानें बंद करके आ रहे थे। औरतें और बच्चे अपने-अपने घरों से निकल कर आ रहे थे। बाज़ार में एक धूम सी मच गई थी। हर एक की ज़ुबान पर रंगरेज़ का नाम था।
फिर अब्बू कासिम लोगों को रंगों के नाम बताता। किसी से कहता यह अनार का रंग है। किसी का सुर्ख़, किसी का चंपई, किसी का बादामी, किसी का सुरमई और किसी का हरा। ग़रज़ वह एक-एक रंग को दिखाकर उसका नाम बताता। लोग हैरत से उन रंगों को देख रहे थे।
अभी लोग यह देख रहे थे कि अचानक शोर उठा। क्या देखते हैं कि बादशाह सलामत की सवारी आ रही है। आगे-पीछे ख़िदमतगार थे। बादशाह की सवारी अब्बू कासिम रंगरेज़ की दुकान के सामने आकर रुक गई। बादशाह ने जो इतने बहुत से रंगों के कपड़े रँगे देखे तो बहुत ख़ुश हुआ। इसने एक-एक रंग को ग़ौर से देखा। बादशाह के साथ जो लोग थे वे भी अब्बू कासिम की तारीफ़ कर रहे। यहाँ तक कि घोड़े भी इतने बहुत से रंग देखकर झूम रहे थे।
बादशाह ने अपने कपड़े ले लिए और अब्बू कासिम को लेकर महल आया। जब महल में औरतों ने इतने रंग-बिरंगे लिबास देखे तो बहुत ख़ुश हुईं और उन्होंने जल्दी-जल्दी उन कपड़ों से अपने लिबास सिलवाए। फिर बादशाह ने रंगरेज़ अब्बू कासिम को और बहुत से कपड़े रंगने के लिए दिए। चंद रोज़ के बाद शाही दरबार का हर आदमी रंग-बिरंगे कपड़े पहने नज़र आ रहा था।
शहर का हर आदमी चाहता था कि वह अपने कपड़े रंगरेज़ अब्बू कासिम की दुकान से रंगवाए। अब्बू कासिम की दुकान पर कपड़ों का ढेर लग गया। चंद रोज़ में यह नौबत आई कि अब्बू कासिम रंगरेज़ बहुत दौलतमंद हो गया। इसने बहुत सा रुपया कमाया। अब तो दूसरे रंगरेज़ों की दुकानों पर सन्नाटा छा गया। उनकी दुकानों पर कोई न जाता था।
नतीजा यह हुआ कि वे तमाम दुकानदार और उनकी अंजुमन के सदर इसके पास आए और कहने लगे, "अरे भाई, हमें अपनी दुकान में काम सिखाने के लिए रख लो। हम तुम्हारी हर ख़िदमत के देने वाले।" अब्बू कासिम रंगरेज़ ने उन लोगों को बहुत डाँटा और दुकान से बाहर निकाल दिया। वे बेचारे सर झुकाए हुए वहाँ से चले गए।
चंद रोज़ बाद तो यह आलम हो गया कि शहर में जो कोई नज़र आता वह अब्बू कासिम रंगरेज़ के रँगे हुए कपड़े पहने होता। उधर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम का हाल सुनिए। जब रंगरेज़ इसे सराय में बीमार छोड़कर चला आया तो वह तीन दिन और तीन रात उसी तरह पड़ा रहा। सराय के चौकीदार ने जो इस तरह दरवाज़ा बंद देखा और यह देखा कि न कोई अंदर जाता है और न बाहर आता है तो पहले वह यही समझा कि शायद दोनों चुपचाप किराया अदा किए बग़ैर वहाँ से सरक गए हैं या फिर कोई हादसा पेश आया है।
इसने जो दरवाज़ा खोला तो क्या देखता है कि हज्जाम बिल्कुल बेदम पड़ा है। इसने हज्जाम से पूछा, "मेरे भाई, बताओ तुम्हारा क्या हाल है? क्या तकलीफ़ है? और हाँ, तुम्हारा दोस्त कहाँ है? मुझे वह भी कई दिन से दिखाई नहीं दिया।" हज्जाम ने कहा, "अल्लाह बेहतर जानता है कि वह कहाँ है। मुझे तो ख़ुद कई रोज़ से अपनी ख़बर नहीं है। इस वक़्त बस ज़रा सा होश आया है। मुझे बड़ी भूख और प्यास लग रही है। मेरे पैसे उधर थैली में रखे हुए हैं। उसमें से लेकर मेरे लिए खाने-पीने के लिए कुछ ला दो जिससे बदन में कुछ ताक़त आए।"
चौकीदार ने कमरे में हर तरफ़ वह थैली तलाशी ली। मगर जब कहीं न मिली तो वह समझ गया कि ज़रूर यह हज्जाम के दोस्त की हरकत है। वही इसके रुपए चुराकर ग़ायब हो गया है। इसने अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम से कहा, "परेशान होने की ज़रूरत नहीं है। हर एक की अच्छाई, नेकी और बुराई को ख़ुदा देखता है। अब मैं ख़ुद तुम्हारी देखभाल करूँगा।" इसने जल्दी-जल्दी शोरबा पकाया और हज्जाम को उठाकर अपने हाथों से पिलाया और फिर इसे कपड़े ओढ़ाकर अच्छी तरह लिटा दिया।
इस तरह चौकीदार ने अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की दो महीने तक बड़ी मेहनत और ज़िम्मेदारी से देखभाल की। दवा-इलाज किया। तब जाकर वह ठीक हुआ और चलने-फिरने के क़ाबिल हुआ। वह चौकीदार से बोला, "जब भी अल्लाह ने मुझे इस क़ाबिल किया कि मैं तुम्हारी इस नेकी का बदला चुकाने की कोशिश करूँगा। तुमने इस बीमारी में जिस तरह मेरी देखभाल की मैं इसे कभी नहीं भूल सकता।" चौकीदार ने कहा, "तुम बिल्कुल फ़िक्र मत करो मेरे भाई। ख़ुदा का शुक्र अदा करो कि उसने तुमको इस क़ाबिल किया कि तुम चल-फिर सको। यह सब कुछ अल्लाह की मेहरबानी है।"
अब नाई हज्जाम अब्बू अब्दुल्लाह ने अपनी हजामत का सामान उठाया और इसने सोचा कि अपने काम पर निकलना चाहिए। जब वह शहर की सड़कों पर काम की तलाश में घूम-फिर रहा था तो इसे बीचों-बीच चौराहे पर रंगरेज़ अब्बू कासिम की दुकान नज़र आई। वहाँ बहुत भीड़ लगी हुई थी जो रँगे हुए कपड़ों को देखने के लिए वहाँ जमा थी।
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने लोगों से पूछा, "यहाँ कैसी भीड़ है?" एक आदमी ने जवाब दिया, "तुमको मालूम नहीं? अरे भाई, यह शाही रंगरेज़ अब्बू कासिम की दुकान है। यही तो वह शख़्स है कि जो न जाने कितने रंगों में कपड़े रंगता है। वरना इससे पहले तो हम सिर्फ़ एक नीला रंग ही जानते थे। तुम भी देखो।"
यह सुनकर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम बहुत ख़ुश हुआ। आख़िरकार इसके दोस्त की क़िस्मत चमक ही गई। इसने बिला वजह इसके ऊपर शक किया। दरअसल वह उसी काम की वजह से इसे छोड़कर चला आया होगा और अब बेचारे को काम की वजह से फ़ुर्सत न मिलती होगी वरना वह ज़रूर मेरे पास आता। ग़ालिबन इसने मेरी थैली इसलिए उठाई थी कि इसे अपने कारोबार में रुपए की ज़रूरत होगी।
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम यह सोच-सोच कर और ख़ुश हो रहा था कि अब अब्बू कासिम रंगरेज़ मेरी मदद करेगा और मुझे देखकर बहुत ख़ुश होगा। यह सोचकर वह बड़ी तेज़ी से भीड़ को चीरता हुआ दुकान के अंदर दाख़िल हुआ। देखता क्या है कि सामने एक तख़्त पर क़ालीन बिछा हुआ है और पीछे तकिये लगे हैं और रंगरेज़ अब्बू कासिम इस पर शानदार लिबास पहने टाँग फैलाए लेटा हुआ है और दोनों तरफ़ चार-चार ख़िदमतगार खड़े हैं और अंदर 10-10 आदमी रंगाई का काम कर रहे हैं।
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम थोड़ी देर चुपचाप खड़ा मुस्कुराता रहा। इसने सोचा कि अब्बू कासिम रंगरेज़ की नज़र ख़ुद ही पड़ेगी तो बड़ा मज़ा आएगा। वह मुझे देखते ही नंगे पाँव दौड़ पड़ेगा और गले लग जाएगा। वह अभी सोच ही रहा था कि रंगरेज़ अब्बू कासिम की नज़र इस पर पड़ी। इसने जैसे ही अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को देखा तो चीख़ पड़ा, "अबे चोर कहीं के, तुझसे कितनी मर्तबा कहा है कि मेरी दुकान में क़दम मत रखना। तो फिर आ गया अपनी मनहूस सूरत लेकर। अरे कोई है इसे ले जाओ और इसे धक्के देकर दुकान से बाहर निकाल दो।"
जैसे ही इसने कहा इसके आदमियों ने धक्का देकर अब्बू अब्दुल्लाह को निकाल दिया। फिर अब्बू कासिम रंगरेज़ छड़ी लेकर इस पर पड़ गया और इसे इतना पीटा कि इसकी हालत ख़राब हो गई। अब्बू कासिम ने इसे ज़ोर से डाँटा, "अब अगर फिर मैंने तुमको यहाँ देखा तो बादशाह के सुपुर्द कर दूँगा जो तुमको फाँसी के तख़्ते पर लटका देगा। बस तेरी ख़ैर इसी में है कि यहाँ से निकल जा और अपनी सूरत मत दिखाना।"
बेचारा नाई मार खाकर वहाँ से निकला। इतनी बड़ी धोखेबाज़ी वह सोच भी न सकता था। इसका दिल टूट गया था। वह रोता हुआ चला जा रहा था और बच्चे इसके पीछे-पीछे तालियाँ बजा रहे थे। इस तरह वह सराय में दाख़िल हुआ और अपने कमरे में जाकर लेट गया। इसके बदन में ज़ख़्मों की वजह से सख़्त दर्द था। मगर इससे ज़्यादा इसे इस बात की तकलीफ़ थी कि इसके दोस्त ने इसे धोखा दिया है। इस तरह इसने सारी रात करवटें लेकर गुज़ारी।
जब सुबह को वह उठा तो वह सराय के बाहर निकला। बाहर निकलकर इसने सोचा कि हम्माम में जाकर इसे ग़ुस्ल करना चाहिए ताकि बदन पर जमा हुआ ख़ून धुल जाए। उधर एक बात यह थी कि बीमारी से अच्छा होने के बाद वह नहाया भी न था। इसने एक राहगीर से पूछा, "मेरे भाई, मुझे हम्माम का रास्ता बता दो।" उस आदमी ने कहा, "हम्माम? कैसा हम्माम? हमने तो हम्माम का नाम कभी नहीं सुना।"
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "अरे भाई, हम्माम वही हम्माम जहाँ हम ग़ुस्ल करते हैं। शहर के तमाम लोग जहाँ जाकर नहाते हैं। मैं भी इस वक़्त हम्माम में नहाना चाहता हूँ।" उस आदमी ने कहा, "हम लोग नहीं जानते कि हम्माम को क्या कहते हैं। जहाँ तक नहाने का ताल्लुक़ है, सब लोग समुंदर के किनारे जाकर नहाते हैं। यहाँ तक कि हमारे शहर का बादशाह भी समुंदर के पानी से नहाता है।"
जब अब्बू अब्दुल्लाह नाई को यह बात मालूम हुई कि वाक़ई यहाँ शहर के लोग हम्माम के बारे में कुछ नहीं जानते, तो वह सीधा बादशाह के महल पर पहुँचा और उसने दरबान से कहा, "मैं बादशाह से एक बहुत ज़रूरी काम के सिलसिले में मिलना चाहता हूँ।" ज़रा सी देर में एक आदमी निकला और इसे बादशाह की ख़िदमत में ले गया।
अब्बू अब्दुल्लाह ने पहले तो बादशाह को बड़े अदब से झुक कर सलाम किया और इसके बाद बोला, "जहाँपनाह, मैं आपके शहर में नया हूँ। मेरा पेशा हज्जाम का है मगर मैं इसके साथ-साथ और कामों से भी वाक़िफ़ हूँ। मसलन, हम्माम के सारे काम कर सकता हूँ। जैसे हम्माम के लिए पानी भरना, इसके लिए ख़ुशबू तैयार करना और नहाने के लिए बदन की मालिश करना। हालाँकि हमारे मुल्क में काम मुख़्तलिफ़ लोग करते हैं और वे लोग ज़िंदगी भर यही काम करते रहते हैं। आज मैं चाहता था कि आपके शहर के हम्माम में जाकर नहाऊँ। तब मैंने लोगों से पूछा यहाँ का हम्माम कहाँ है? मगर जहाँपनाह, मुझे यह सुनकर सख़्त हैरत हुई कि आपके शहर के लोग हम्माम के लफ़्ज़ से भी वाक़िफ़ नहीं। आपका शहर इतना अच्छा और ख़ूबसूरत है कि यहाँ हम्माम का इंतज़ाम हो जाए तो फिर यहाँ चार चाँद लग जाएँ। सच है कि नहाने का असल मज़ा तो हम्माम ही में आता है और जब आदमी हम्माम से निकल कर बाहर आता है तो इसे मालूम होता है कि इसका जिस्म कितना तरोताज़ा है।"
बादशाह ने जब यह सुना तो बोला, "अरे भाई, यह तो बताओ कि हम्माम होता क्या है? हमने तो तुम्हारी ज़ुबान से पहली बार ही यह लफ़्ज़ सुना है।" अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने फिर बादशाह को बताया कि हम्माम कैसे बनता है? अंदर क्या-क्या होता है? इसे गर्म रखने का कैसे इंतज़ाम किया जाता है? और फिर कैसे वहाँ लोगों के जिस्म में मालिश की जाती है और उन्हें नहलाया जाता है।
फिर इसने कहा, "जहाँपनाह, मैं अल्फ़ाज़ के ज़रिए महज़ ज़ुबान से हम्माम की अहमियत और इसकी हक़ीक़त के बारे में और कुछ नहीं समझा सकता इसलिए कि इसे तो सिर्फ़ देखकर ही समझा जा सकता है। अलबत्ता मैं इतना ज़रूर कहना चाहता हूँ कि आपका शहर हम्माम खुल जाने के बाद ही एक शानदार शहर कहलाया जा सकता है।"
यह सुनकर बादशाह बहुत ख़ुश हुआ और बोला, "मुझे तुम्हारी बातों से इत्मीनान हुआ। मैं अपने शहर में तुम्हारा इस्तक़बाल करता हूँ।" यह कहकर इसने हुक्म दिया कि जितनी जल्दी हो सके फ़ौरन हम्माम बनाओ। "तुमने जो हम्माम के बारे में बातें बताई हैं, उसके बाद तो मेरा जी चाहता है कि मैं जल्द से जल्द उसमें नहाने का लुत्फ़ उठाऊँ।"
बादशाह इतना ख़ुश हुआ कि इसने अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को बहुत नाम व निशान दिए। एक घोड़ा दिया। बहुत से नौकर-चाकर दिए। इसके रहने के लिए एक शानदार मकान दिया और अपने आदमियों को हुक्म दिया कि अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को जो जगह पसंद आए वहाँ इसके कहने के मुताबिक़ फ़ौरन इमारत बना दी जाए और उसके बनाने में जितने ख़र्च की ज़रूरत हो वह ख़ज़ाने से लिया जाए।
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने घोड़े पर बैठकर नौकरों के साथ सारे शहर की सैर की। आख़िर इसे एक ख़ाली जगह पसंद आ गई। इसने हुक्म दिया कि यहाँ पर हम्माम बनाया जाए। इसके बाद अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की हिदायत के मुताबिक़ नक़्शा तैयार किया गया और चंद रोज़ के अंदर बहुत से कारीगरों ने मिलकर इसकी हिदायत के मुताबिक़
इमारत बनाकर खड़ी कर दी। इसके बाद अबू अब्दुल्लाह ने इसे बहुत खूबसूरत तरीके से सजाया। इसमें रंग-बिरंगे फीते लगाए। नहाने की जगह को बहुत आरामदेह बनाया। इसने बेहतरीन किस्म के लिए का इंतजाम किया। बेहतरीन खुशबुओं हासिल की और जिस्म की सफाई के लिए और बहुत से मसाले तैयार किए।
गरज, देखते-देखते एक ऐसा शानदार हम्मामा बनकर तैयार हो गया कि इसकी मिसाल मुश्किल ही से मिल सकती है। इसके बाद इसने चंद नौकरों को जिस्म पर मालिश करने के तरीके सिखाए। इसने खुद अपने जिस्म पर मालिश करवा के चंद रोज के अंदर इनको इस काम में अच्छा खासा माहिर कर दिया।
अब इसने हम्माम के बकायदा खुलने का ऐलान कर दिया। उस दिन हम्माम बहुत अच्छी तरह गर्म किया गया। वहां तरह-तरह की खुशबुएं जलाई गई ताकि हवा साफ हो और हम्माम के अंदर हर तरफ खुशबू फैल जाए। हम्माम के सहन में इसने एक फव्वारा लगाया था। इससे जब पानी गिरता था तो इससे इतनी अच्छी आवाज पैदा होती थी जैसे कोई बाजा बजा रहा हो।
पहले रोज अब्बू अब्दुल्लाह ने इतना एहतमाम किया कि हम्माम की शान बस देखने के लायक थी। अबू अब्दुल्लाह ने बादशाह को पहले ही दावत दे दी थी। जैसे ही वह हम्माम में अपने वजीर और दरबारियों के साथ दाखिल हुआ, इसे ऐसा लगा जैसे वह जन्नत में दाखिल हो गया है। इसकी खुशी की कोई हद ना रही। सजावट को देखकर तो इसकी आंखों में चकाचौंध सी हो गई। जबकि इसकी नाक में खुशबू पहुंची तो इसे ऐसा लगा कि सारा दिमाग महकने लगा हो। और इसके कानों में फव्वारे की आवाज ऐसे मालूम हुई जैसे कोई धीमे सुरों में बाजा बजा रहा हो।
इसके बाद अब्बू अब्दुल्लाह ने कहा, "अगर बादशाह सलामत मुनासिब समझे तो मेरी ख्वाहिश है कि बादशाह सलामत पहले गसल करें। इसके बाद फिर वजीर और अमीरों की बारी आएगी।"
अब बादशाह को अंदर ले गए। वहां उनके कपड़े उतार कर उनके जिस्म को लियो में लपेटा गया। फिर और दूसरे कमरों में ले गए जो ज्यादा गर्म था। बादशाह के जिस्म से पसीना निकला। अब्बू अब्दुल्लाह और इसके नौकरों ने फिर एक तीसरे कमरे में ले जाकर बहुत अच्छी तरह बादशाह के जिस्म का पसीना पोंछा। जब जिस्म का पसीना बहुत अच्छी तरह साफ हो गया तब अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने मालिश की।
जब बादशाह के जिस्म की मालिश हो चुकी तो इसके बाद गर्म पानी से नहलाया गया। इस मौके पर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने बेहतरीन मसालों और साबुन से उनके जिस्म को साफ किया। चुनांचे इस तरह नहलाने से उनके जिस्म का मैल भी निकल गया और उनकी खाल फिर नर्म हो गई और बादशाह सलामत को अपना बदन बड़ा हल्का-हल्का सा लगा। जाहिर है कि बादशाह सलामत इससे पहले कहां इस तरह नहाए होंगे।
इसके बादशाह को गुलाब के पानी से एक बार फिर गुस्सल करवाया गया। उनके नाखून साफ किए गए और आखिर में अब्बू अब्दुल्लाह ने खुद अपने हाथ से मुख्तलिफ मसालों से बादशाह का सर धोया और इसका मैल साफ किया। इसके बादशाह को दूसरे कमरे में ले गए। यह कमरा बेहतरीन किस्म की खुशबूओं और इत से बसा हुआ था। वहां बादशाह के जिस्म को तोलिए से बहुत अच्छी तरह खुश किया गया और फिर एक नया शाही लिबास बड़े एहतमाम के साथ पहनाया गया।
बादशाह को ऐसा लगा कि जैसे इसका जिस्म हल्का हो गया हो। इसने अपने आप को बहुत तरोताजा महसूस किया। ऐसा लगा कि बरसों की गंदगी दूर हो गई। इसके बाद तो गोया इसके बदन में नई ताकत सी आ गई और बेसाख्ता इसने कहा, "मेरे खुदा, तेरा हजार शुक्र है कि आज अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की बदौलत मुझे हम्माम के देखने और यहां पर नहाने का मौका मिला। अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने सच कहा था कि वाकई बगैर हम्माम के कोई शहर शानदार नहीं कहलाया जा सकता।"
यह कहकर बादशाह ने उसी वक्त 1000 दीनार अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को इनाम के तौर पर दिए। इसके बाद अब्बू अब्दुल्लाह ने बादशाह को एक अलग कमरे में नाश्ता कराया और मेवों का बेहतरीन शरबत पिलाया। बादशाह ने कहा, "तुम हर एक से नहाने की कीमत हजार दीनार लेना।"
अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "जहांपनाह, आप तो बादशाह हैं। मगर आपकी रैया में अमीर भी हैं और गरीब भी। मैं चाहता हूं कि हम्माम के जरिए हर एक आदमी की खिदमत करूं। इसलिए मैं आपसे इतनी इजाजत चाहता हूं कि इसकी कोई कीमत ना मुकर्रर की जाए। जो शख्स भी अपने हालात के मुताबिक जितना दे सके, मैं इसे हंसी-खुशी कबूल करना चाहता हूं। हजार दीनार तो बहुत होते हैं और यह रकम तो इनाम है जो मुझे हुजूर की तरफ से मिले हैं। मैं इस इनाम पर जिंदगी भर फक्र करूंगा।"
वजीर और अमीर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की बातों से बहुत खुश हुए और उन्होंने कहा, "बादशाह सलामत, अब्बू अब्दुल्लाह बिल्कुल ठीक कह रहा है। भला सबके पास इतनी दौलत कहां है जो आपके पास है और हम समझते हैं कि अब्बू अब्दुल्लाह की बात मान ली जाए।"
बादशाह ने कहा, "हां, मैं अब्बू अब्दुल्लाह की बात मानता हूं। मगर अब्बू अब्दुल्लाह बहुत मामूली आदमी है और इसने हमारे शहर के लिए हम्माम बनाकर बहुत बड़ा काम किया है। इसलिए मैं समझता हूं कि आज के दिन वजीर और अमीरों को 100-100 दीनार देना चाहिए। इसके बाद जिसका जो जी चाहे वह दे।" सब लोगों को यह बात पसंद आई और उसी वक्त सब नहाने के लिए तैयार हो गए।
उस रोज हर एक नहाया और इसने अब्बू अब्दुल्लाह को बादशाह के कहने के मुताबिक 100-100 दीनार दिए। उस रोज बादशाह के साथ 40 वजीर और अमीर आए थे। इसलिए एक दिन में ही उनसे 4000 दीनार मिले। बादशाह के 1000 दीनार इसके अलावा थे। साथ ही साथ अबू अब्दुल्लाह की खिदमत के लिए 10 सफेद गुलाम, 10 हबशी गुलाम और 10 कनीज़ भी दी। बादशाह ने पहले भी बेशुमार गुलाम और कनीज़ इसे दी थी।
जब अब्बू अब्दुल्लाह को इतने बहुत से गुलाम और कनीज़ और उनके साथ-साथ इतनी बहुत सी दौलत मिली तो इसने बादशाह के कदमों को बूसा दिया। "जहांपनाह, आपने जो मुझे इज्जत और दौलत दी उसके लिए मैं आपका शुक्रिया अदा करना चाहता हूं। मगर मैं पूछना चाहता हूं कि मैं मामूली हैसियत का आदमी गुलामों की फौज रखकर क्या करूंगा?"
बादशाह ने कहा, "मैंने यह हुक्म इसलिए दिया कि मैं सोच रहा था कि एक दिन जब तुम अपने मुल्क वापस जाओगे तो अपनी दौलत और इतने गुलाम लेकर जाओगे कि फिर तुमको उम्र भर कुछ करने की जरूरत ना होगी और मैं चाहता हूं कि तुम अपने मुल्क में बहुत बड़े आदमियों की तरह जिंदगी गुजारो ताकि लोग कह सकें कि परदेश में इसका इतना ख्याल रखा गया।"
अबू अब्दुल्लाह ने कहा, "बादशाह सलामत, मैं बहुत मामूली आदमी हूं। यह मेरे लिए फक्र की बात है कि आपने मेरी इतनी इज्जत बढ़ाई और मेरे काम की इतनी ज्यादा कद्र की। मैं आपकी यह मोहब्बत और कद्रदानी कभी नहीं भूल सकता। मैं जब भी अपने मुल्क में जाऊंगा तो अपने वतन के लोगों के साथ सीधी-सादी जिंदगी गुजारूंगा और मामूली खाना खाऊंगा। ऐसी सूरत में मेरे लिए कहां तक मुनासिब है कि मैं गुलामों और कनीज़ को अपने यहां रखूं। यह मेरी सारी दौलत खा जाएंगे।"
बादशाह यह सुनकर बहुत हंसा और बोला, "वाकई तुम सच कहते हो। मुझे पहले इस बात का ख्याल नहीं आया। अच्छा, इसका एक तरीका यह है कि तुम इन गुलामों और कनीज़ को 100 दीनार फिकस के हिसाब से मेरे हाथ बेच दो। इसकी कीमत शाही खजाने से अदा कर दी जाएगी।"
अबू अब्दुल्ला हज्जाम ने यह तमाम गुलाम और कनीज़ बादशाह के हवाले कर दी। अब जो इनको गिना गया तो उनकी तादाद कुल मिलाकर 150 निकली। बादशाह ने उनके बदले में अब्बू अब्दुल्लाह को 15,000 दीनार शाही खजाने से दिलवाए। अब तो अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम बहुत खुश हुआ। इसने बादशाह का शुक्रिया अदा किया कि इनके खाने-पिलाने से इसकी जान बची। वरना तो यह गुलाम इसकी सारी दौलत खा-पीकर बराबर कर देते। बादशाह इस बात को सोच-सोच कर बहुत हंसा।
अब बादशाह महल में चला गया और अब्बू अब्दुल्लाह अपने घर वापस आया। यहां पहुंचकर इसने पहला काम तो यह किया कि इसने अपने दिन भर की कमाई अच्छी तरह से बोरों में बंद करके एक कमरे में रख दी।
अगले दिन अब्बू अब्दुल्ला हज्जाम ने सारे शहर में ऐलान करवा दिया कि जो अल्लाह का बंदा नहाना चाहे वह मुफ्त नहा सकता है। तीन दिन तक किसी से कुछ ना लिया जाएगा। इस ऐलान का नतीजा यह हुआ कि तीन दिन हम्माम में भीड़ लगी रही। मुफ्त नहाने की वजह से जिसको देखो वह भागा चला आ रहा है। हर किस्म के आदमी नहाने आए और वह नहाकर खुशख घर गए।
चौथे दिन अब अब्बू अब्दुल्लाह बकायदा अपनी गद्दी पर बैठ गया। और अब नहाने के सिलसिले में इसने यही किया कि जो इसने बादशाह से कहा था कि हर एक अपनी हैसियत के मुताबिक जो चाहे दे। मगर इसके बावजूद लोगों ने जी खोलकर इसे रुपया दिया कि शाम तक इसका संदूक भर गया।
अर मलका ने जब बादशाह से हम्माम की तारीफ सुनी तो वह बहुत खुश हुई और इसने बादशाह से कहा कि मैं हम्माम में नहाना चाहती हूं। क्या मेरे नहाने का इंतजाम हो सकता है? बादशाह ने यह पैगाम अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को भेजा। अब्बू अब्दुल्लाह ने मलका के नहाने के लिए जुम्मे का दिन मुकर्रर कर दिया और इस दिन मलका की खिदमत औरतों के सुपुर्द कर दी। जुम्मे के दिन जब मलका हजरत में आई तो वह बड़े एहतमाम से नहाई। मलका बहुत खुश हुई और उन्होंने भी बादशाह की तरह 1000 दीनार इनाम के तौर पर दिए और अब मलका का यह मामूल हो गया कि वह हर जुमे को हम्माम में गुस्सल करने आती।
फिर अबू अब्दुल्लाह ने इंतजाम कर दिया कि शाम के वक्त सिर्फ औरतें हम्माम में गुस्सल करें। इस तरह अब्बू अब्दुल्लाह ने बहुत रुपया कमाया। बड़ी इज्जत हासिल की। मगर इसके मिजाज मिलने-जुलने और बातचीत करने में कोई फर्क ना आया। वह लोगों से उसी मोहब्बत से बात करता था। इसके हम्माम में गरीबों से कुछ नहीं लिया जाता था। वह मुफ्त में नहाते थे।
एक रोज एक जहाज का कप्तान आया। इसके रुपए कहीं गिर गए थे। अबू अब्दुल्लाह ने इसके हम्माम में गुस्ल करने का कोई मुआवजा नहीं लिया और इसके साथ बड़ी मोहब्बत से पेश आया। अबू अब्दुल्लाह ने इसे खाना खिलाया और बेहतरीन शरबत पिलाया।
एक रोज होते-होते यह खबर अब्बू कासिम रंगरेज को मालूम हो गई कि शहर में कोई हम्माम खुला है जिसे देखो हम्माम की तारीफ कर रहा है। अबू कासिम ने सोचा कि वह भी वहां जाकर नहाए। चुनांचे वह भी घोड़े पर सवार होकर हम्माम पहुंचा। इसके आगे-पीछे गुलाम थे। जब वह वहां पहुंचा तो इसने देखा कि हम्माम के सामने एक भीड़ लगी हुई है। इसे दूरी से खुशबू आई और बहुत खुश हुआ।
जैसे ही वह हम्माम में दाखिल हुआ, क्या देखता है कि इसका दोस्त हज्जाम सामने बैठा हुआ है और इसके सामने रुपयों का ढेर है। पहले तो इसे पहचानने में अब्बू कासिम को दिक्कत हुई। इसलिए कि अब्बू अब्दुल्लाह के गालों के गड्ढे भर गए थे और वह बहुत तंदुरुस्त हो गया था और इसे लिबास और सूरत-शक्ल को देखकर ही अंदाजा हो रहा था कि अब वह खुशहाल जिंदगी गुजार रहा है। अबू कासिम इसे देखकर जल गया। मगर इसने चेहरा ऐसा बनाया कि जैसे बहुत खुश हुआ हो और हंसकर बोला, "अच्छा तो दोस्त के साथ यह दोस्त का सुलूक है। तुमको तो यह बात मालूम हो गई होगी कि मैं शाहीर रंगरेज हो गया हूं और मेरी गिनती शहर के दौलतमंद लोगों में होने लगी है और तुम फिर भी कभी मुझे देखने नहीं आए। तुमको कभी यह ख्याल नहीं हुआ कि हमारा दोस्त अब्बू कासिम रंगरेज शाही दरबार में है। मैंने अपने मुलाजिमों को सराय में तुम्हें ढूंढने के लिए भेजा। मगर वहां भी तुम्हारा कुछ पता नहीं चला। इसके बाद शहर भर में ढूंढा मगर तुम्हारा कहीं कोई निशान ना मिला।"
अब्बू अब्दुल्ला हज्जाम ने बहुत उदास होकर कहा, "ए अब्बू कासिम, तुम भूल गए कि तुमने मेरे साथ क्या सुलूक किया था। तुमने अपने नौकरों से चोर, डाकू और खुदा जाने मुझे क्या-क्या कह कर निकालवा दिया था। मुझे तुम्हारे आदमियों ने धक्का देकर जमीन पर गिरा दिया और इतना मारा कि मेरे सारे जिस्म पर जख्म हो गए।"
अब्बू कासिम रंगरेज ने बड़ी हैरत से कहा, "यह तुम क्या कह रहे हो? क्या तुम ही वह आदमी थे जिसको मैंने मारा था?"
अब्बू, अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "जी हां, वह मैं ही था जिसको तुमने ना सिर्फ मारा था बल्कि चोर, डाकू और खुदा जाने क्या-क्या कहा था।"
अब्बू कासिम रंगरेज ने कहा, "अरे भाई, मुझे माफ करना। दरअसल, मैं तुमको पहचान ना सका। बात यह थी कि एक आदमी ने मेरी दुकान में चोरी की थी और मैं उसी को समझा था। मगर वह तो बड़ा दुबला-पतला, सूखा सा था। मैं सोच ही ना सकता था कि तुम हो सकते हो।" रंगरेज ने अफसोस के साथ अपने हाथ मलते हुए कहा, "कि मुझसे इतनी बड़ी गलती हुई कि मैं अपने दोस्त को ना पहचान सका। अल्लाह मुझे माफ करे। मगर इसमें तुम्हारी भी गलती थी कि तुमने अपना नाम भी नहीं बताया। फिर उस रोज मैं अपने काम की वजह से बड़ा परेशान था। मगर इन तमाम बातों के बावजूद तुमको खुदा का वास्ता देता हूं कि मुझे माफ करना और इस वाक्य को भूल जाना। शायद हमारी तकदीर में यही लिखा था।"
अबू अब्दुल्लाह हज्जाम को जैसे इत्मीनान हो गया। इसने कहा, "खुदा तुम्हें माफ करे। तकदीर को कौन बदल सकता है? आओ अब हम इस बात को अपने दिमाग से निकाल दें और पहले जैसे हो जाएं। अब तुम पहला काम यह करो कि जाकर हम्माम में नहाओ।"
अब्बू कासिम रंगज ने पूछा, "अच्छा, यह तो बताओ कि यह दिन देखना तुमको कैसे नसीब हुआ।"
अब्बू अब्दुल्लाह ने अपनी बीमारी से लेकर अब तक के तमाम हालात सुनाए कि किस तरह बादशाह ने इस पर मेहरबानी की और इतना शानदार हम्माम बनाने में मदद दी और इसे रहने के लिए शानदार मकान दिया।
अब्बू कासिम ने कहा, "मुझे बड़ी खुशी हो रही है कि बादशाह ने तुम्हारी इस तरह मदद की जैसे मुझे कपड़े रंगने की दुकान खोलने में मदद दी और अब मैं बादशाह से कहूंगा कि तुम मेरे दोस्त हो ताकि वह और भी तुम्हारा ख्याल रखे। यह तो तुम जानते हो कि बादशाह से मेरे बहुत ताल्लुकात हैं।"
अबू अब्दुल्लाह ने कहा, "भाई, इसकी जरूरत नहीं है क्योंकि बादशाह को खुद मेरा ख्याल है। अच्छा, तुम अंदर जाओ और कपड़े उतार कर बदन पर मालिश करवाकर अच्छी तरह नहाओ।" यह कहकर वह इसे अंदर ले गया और इसने बड़े शानदार तरीके से नहलाया। इसके बदन की मालिश की। बड़े खुशबूदार मसाले से इसका बदन साफ किया। जब वह नहा चुका तो इसे फिर नाश्ता कराया और फलों और मेवों का शरबत पिलाया। सच तो यह है कि अब्बू अब्दुल्ला हज्जाम अपने दोस्त को दोबारा देखकर इतना खुश हुआ कि इसने इसके साथ वही सलूक किया जो बादशाह के साथ किया था।
जब अब्बू कासिम रंगरेज हम्माम से जाने लगा तो इसने अब्बू अब्दुल्लाह को कुछ देने के लिए अपनी जेब में हाथ डाला। मगर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने हाथ पकड़ लिया और कहा, "अच्छा तो तुम मुझे नहाने की कीमत दोगे। अरे भाई, हमारे ताल्लुकात तो ऐसे हैं कि जिनमें लेनदेन का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। यूं समझो कि यह हम्माम तो तुम्हारा है। जब जी चाहे आओ और शौक से नहाओ।"
अब्बू कासिम ने कहा, "अच्छा, यह बात है। तो मैं भी इस काम में तुम्हारी मदद करूंगा। यानी मैं एक ऐसा मसाला तैयार करूंगा जिससे एक मर्तबा रगड़ने से बदन का मैल फौरन छूट जाता है और फिर जब बदन पर पानी डाला जाता है तो इसे खुशबू आती है।" यह कहकर इसने नौकर को भेजकर कुछ सामान मंगवाया और अपने हाथ से इसे पीसकर और बहुत बारीक कपड़े से छानकर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को दिया और कहा, "देखो, याद रखो इसका इस्तेमाल हर आदमी पर मत करना। सिर्फ बादशाह, उसके वजीर और अमीरों पर करना। वरना बिला वजह तुम्हारा खर्च बढ़ जाएगा। यह मेरा खानदानी नुस्खा है और इसे मैंने इससे पहले कभी किसी को नहीं बताया था।"
यह कहकर अब्बू कासिम रंगरेज हम्माम से निकल कर सीधा बादशाह के महल में पहुंचा और जब बादशाह के सामने गया तो बड़े अदब से सलामी देने के बाद बोला, "बादशाह सलामत, मैं इस वक्त आपको होशियार करने के लिए हाजिर हुआ हूं।"
बादशाह ने कहा, "किससे होशियार रहने की जरूरत है और क्यों?"
अब्बू कासिम रंगरेज ने कहा, "खुदा का शुक्र है कि आप आज तक अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम से बचे रहे क्योंकि यह आदमी आपका और आपके मुल्क का बहुत बड़ा दुश्मन है। खुदा इसके हाथों से आपको हमेशा बचाए रखे।"
बादशाह ने कहा, "खैर तो है, आखिर बात क्या है? वह ऐसा कौन सा काम कर रहा है और कैसे?"
अब्बू कासिम रंगरेज ने कहा, "जहांपनाह, वह जहर के जरिए अपना काम करना चाहता है। इसने ऐसा मसाला तैयार किया है जिसे वह आप पर और आपके वजीर पर इस्तेमाल करना चाहता है। इससे सारा बदन जलने लगता है और वह कहता है कि इसके रगड़ने से बदन का मैल छूट जाता है और जब बदन पर पानी डाला जाता है तो इससे खुशबू आती है और वह इसलिए यह कर रहा है कि दरअसल वह जासूस है और वह सिर्फ आपको मारने के लिए यहां आया है। मैं आपसे इसलिए यह कह रहा हूं कि मेरे ऊपर आपके बहुत एहसानात हैं।"
बादशाह यह सुनते ही कांप उठा। इसे ऐसा लगा कि जैसे इसका बदन सचमुच जल रहा है और इसे बहुत गुस्सा आया। इसने कहा, "देखो, इसका जिक्र किसी से मत करना। मैं अभी खुद अपने वजीर के साथ हम्माम जा रहा हूं। और अपने सामने इसका तजुर्बा करूंगा।"
जैसे ही बादशाह हम्माम में दाखिल हुआ, अब्बू अब्दुल्लाह ने इसका इस्तकबाल किया और कहा, "हुजूर, अंदर हम्माम में चले।"
बादशाह ने कहा, "पहले हमारे वजीर को गुस्सल करवाओ।"
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "जहांपनाह, मुझे एक ऐसा पाउडर मिला है जिसके रगड़ने से बदन का तमाम मैल छूट जाता है और जब बदन पर गर्म पानी डाला जाता है तो इससे बड़ी खुशबू आती है।"
बादशाह ने कहा, "इसे पहले वजीर के पांवों पर जरा सा लगाना। फिर इसके बाद बदन पर मलना।"
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम वजीर को हम्माम के अंदर ले गया। और जब इस पाउडर को जरा सा इसके पांव पर लगाया तो उस जगह ऐसी जलन हुई कि वजीर चीख उठा और इसने अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम का हाथ पकड़ लिया। यह आवाज सुनकर बादशाह फौरन हम्माम के अंदर दाखिल हो गया और इसने सिपाहियों को हुक्म दिया कि अबू अब्दुल्लाह हज्जाम को गिरफ्तार कर लो। फौरन वजीर ने जल्दी-जल्दी कपड़े पहने और फिर बादशाह अबू अब्दुल्लाह को गिरफ्तार करके महल में लाया और इसने हुक्म दे दिया कि हम्माम को फौरन बंद कर दिया जाए।
इसके बादशाह ने जहाज के कप्तान को हुक्म दिया कि अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को एक चूने के बोरे में बंद करके समुंदर के अंदर डाल दो या उस बोरे के अंदर जलकर मर जाए। कप्तान ने कहा, "बादशाह के हुक्म पर अमल किया जाएगा।"
इत्तेफाक से यह कप्तान वही था जिसकी अब्बू अब्दुल्लाह ने अपने हम्माम में बड़ी खातिरदारी की थी और इससे कोई मुआवजा नहीं लिया था। यह कप्तान इसे एक कश्ती में लेकर पास के एक छोटे से जजीरे में ले गया, जहां वह इत्मीनान से बातें कर सके। कप्तान ने कहा, "मेरे भाई, मैं वही आदमी हूं जिसके साथ तुम बड़ी मोहब्बत से पेश आए थे और तुमने अपने हम्माम में मेरी बड़ी खातिरदारी की थी। अब वक्त आ गया है कि मैं उसका बदला चुकाऊं। अब तुम असल बात मुझे बताओ कि तुमने ऐसा कौन सा जुर्म किया है कि बादशाह तुमसे इतना नाराज हो गया है और इसने इतनी बड़ी सजा का हुक्म दिया है।"
अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "मैं अपने पैदा करने वाले अल्लाह की कसम खाकर कहता हूं कि मैं बेखसूर हूं और मैंने ऐसा कोई काम नहीं किया कि बादशाह मुझे ऐसी सजा दे।"
कप्तान ने कहा, "तब फिर इसमें तुम्हारे दुश्मनों का हाथ होगा। इसलिए कि कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो किसी को तरक्की करते देखकर खुश नहीं होते। वह दिन-रात इसे खत्म करने में लगे रहते हैं। मगर भाई, जिसे अल्लाह रखे उसे कौन छुए? तुम डरो मत और इत्मीनान के साथ इस जजीरे में रहो। अपना वक्त मछली पकड़ने में गुजारो। फिर जैसे ही कोई जहाज तुम्हारे वतन जाएगा, मैं तुमको वहां पहुंचा दूंगा। और अब मैं जा रहा हूं और ऐसी कोई तरकीब करूंगा जिससे लोगों को मालूम हो कि मैंने बादशाह की हिदायत के मुताबिक तुमको डुबो दिया।"
कप्तान ने यह कहकर अबू अब्दुल्लाह को मछली पकड़ने का एक जाल भी दिया और खुद वापस आ गया। फिर एक चूने से भरा हुआ बोरा लिए महल के पास से निकला और धारे में ले जाकर इसने बोरे को पानी में ले जाकर डाल दिया। इत्तेफाक से बादशाह भी खिड़की में खड़ा देख रहा था। बादशाह ने वहां से जो हाथ हिलाया तो इसकी उंगली से अंगूठी निकल कर समुंदर में जा पड़ी। यह अंगूठी यूं तो सोने की थी और इसमें हीरे का कीमती नग लदा हुआ था। मगर इस अंगूठी में एक जादुई बात यह थी कि जो कोई इसे पहनता, गोया इसके हाथ में ताकत रहती और कोई दुश्मन इसकी हुकूमत को खत्म ना कर सकता था। और अगर खास तरीके से इशारा कर दे तो उस आदमी का सर अलग जा पड़ता।
जैसे ही अंगूठी बादशाह की उंगली से निकली, बादशाह को ऐसा लगा कि जैसे इसके हाथ से सारी ताकत निकल गई। मगर वह कर भी क्या सकता था। समुंदर में उस वक्त बड़ी जबरदस्त लहरें उठ रही थीं। वह समझ गया कि अब अंगूठी मिलने का तो कोई सवाल ही पैदा नहीं होता। मगर इसने किसी से कुछ ना कहा।
अधर चूने से भरे बोरे के समुंदर में डालने के बाद कप्तान अब्बू अब्दुल्लाह के पास गया और इससे बोला, "मेरे भाई, मैं अभी आता हूं। इतने में तुम मछली पकड़ो। मेरा एक काम यह भी है कि शाही बावर्ची खाने के लिए मछली पकड़ूं। इसलिए तुम जाल डालकर मछली पकड़ो। जब शाही बावर्ची खाने के लड़के आए तो उनको मछली दे देना।"
चुनांचे अबू अब्दुल्ला हज्जाम ने मछली पकड़ने के लिए जाल डाला। जैसे ही इसने जाल डाला, इसमें से मछलियां निकली। इसने फिर जाल डाला, फिर मछलियां निकली। जरा सी देर में वहां मछलियों का ढेर लग गया। अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने बहुत दिनों से मछलियां नहीं खाई थीं। इसने सोचा कि आज मछली खाना चाहिए। यह सोचकर इसने उन मछलियों में से एक बड़ी सी मछली निकाली और चाकू से इसे काटा। जैसे ही काटा, इससे एक दमकती हुई अंगूठी निकली। यह अंगूठी वहीं थी जो बादशाह की उंगली से गिरी थी। अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को कुछ पता नहीं था कि यह किसकी अंगूठी है और कैसी है। इसने जल्दी से इसे अपनी उंगली में पहन लिया।
जरा सी देर में शाही बावर्ची खाने से दो लड़के आए और अब्बू अब्दुल्लाह से बोले, "ए मछुए, जरा यह तो बताओ कि कप्तान किधर गया? हम इसे बहुत देर से ढूंढ रहे हैं। वह शाही बावर्ची खाने के लिए मछलियां दिया करता है। वह आज कहीं नजर नहीं आ रहा।"
अब्बू अब्दुल्लाह ने बड़ी तेजी से हाथ उठाकर कहा तो इसका कहना था कि उन दोनों लड़कों के सर कट कर गिर पड़े। अंगूठी से किरण सी निकली और उन दोनों का खात्मा हो गया। अब्बू अब्दुल्लाह घबरा गया। इसकी समझ में ना आया कि यह क्या माजरा है। इन्हें किसने मारा है। वह घबरा गया कि जरूर यह किसी जिन का काम है। वरना अभी तो यह अच्छे-खासे थे और मुझसे बातें कर रहे थे।
अभी वह यह सोच ही रहा था कि इतने में कप्तान भी आ गया। इसने जो दो लाशें देखीं और अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम के हाथ में चमकती हुई अंगूठी देखी तो वह समझ गया क्योंकि वह उस अंगूठी की खासियत से वाकिफ था। इसने अब्बू अब्दुल्लाह से कहा, "अपना हाथ मत हिलाना वरना मेरी खैरियत नहीं है। मेरा सर भी बदन से अलग हो जाएगा।"
अब्बू अब्दुल्लाह ने जो यह सुना तो सन्नाटे में आ गया और अपनी जगह खड़ा का खड़ा रह गया। कप्तान ने कहा, "किसी की किस्मत के बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता। अभी जरा देर पहले तुमको बादशाह ने मौत का हुक्म दिया था और तुम कमजोर थे और अब बादशाह से भी ज्यादा ताकतवर हो। मुझे यह बताओ कि तुमको यह अंगूठी कैसे मिली। फिर मैं तुमको इसकी करामात बताऊंगा।"
अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने फिर इसे सारी बात बता दी। और कप्तान ने उस अंगूठी की तासीर बयान की। फिर कप्तान ने कहा, "अब तुमको कोई खतरा नहीं है। तुम बादशाह की खिदमत में हाजिर हो सकते हो। जरा सी देर में अपने दुश्मनों को खत्म कर सकते हो। यहां तक कि बादशाह को भी।" यह कहकर कप्तान ने इसे कश्ती में बिठाकर शहर के किनारे पहुंचाया और इसे लेकर महल की तरफ पहुंचा।
उस वक्त बादशाह ने दरबार तलब किया था। वहां फौज के सिपाही, दरबारी, वजीर, अमीर, गरज सभी जमा थे। बादशाह के चेहरे से परेशानी जाहिर हो रही थी। बादशाह ने अंगूठी के बारे में किसी से कुछ नहीं कहा था और ना उस अंगूठी को तलाश करने की कोशिश की थी। जैसे ही इसने अब्बू अब्दुल्लाह को देखा, वह कांप उठा और वह समझा कि यकीनन यह मेरे खिलाफ साजिश है और अबू अब्दुल्लाह हज्जाम मुझे मारने के लिए आया है। इसने चीख कर कहा, "बदमाश, तुम कैसे जिंदा बच गए? मैंने तो तुमको अपने समुंदर में डलवा दिया था।"
हज्जाम ने कहा, "खुदा जिसको चाहे जिंदा रखे और जिसे चाहे मार डाले। जहज्जम ने सारी बात का हिस्सा सुनाया और बताया कि किस तरह यह अंगूठी इसके हाथ आई और किस तरह इस अंगूठी की वजह से अनजाने में इससे शाही बावर्ची खाने के दो लड़के मर गए। फिर इसने अपनी उंगली से अंगूठी उतारी और बादशाह के हाथ में देते हुए कहा, 'मैं यह अंगूठी आपको वापस करने आया हूं। आपके मेरे ऊपर बहुत एहसानात हैं और मैं यह साबित करना चाहता हूं कि मैं आपका दुश्मन नहीं हूं। अगर मैं दुश्मन होता तो फिर इस अंगूठी की मदद से इसी वक्त आपको मार सकता था। मगर मैं यह जरूर जानना चाहता हूं कि बादशाह सलामत अचानक मुझसे क्यों नाराज हो गए और मुझे मारने का हुक्म क्यों दिया और अब भी अगर बादशाह का यह ख्याल है कि मैं मुजरिम हूं तो मुझे इसी वक्त मार डालें, मुझे कोई शिकायत ना होगी।'"
बादशाह ने वह अंगूठी तो जल्दी से अपनी उंगली में पहन ली और अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को बढ़कर सीने से लगा लिया और बोला, "मेरे भाई, मुझे माफ करना। मुझे तुमको समझने में गलती हुई। मैं जानता हूं कि तुम्हारी जगह कोई और आदमी होता तो वह यह अंगूठी वापस ना करता। जहां तक इस असल मामले का ताल्लुक है, वह यह है कि हमारे यहां के रंगरेज अब्बू कासिम ने यह बताया था कि तुम फिरंगियों के जासूस हो और यहां मुझे मारने के लिए आए हो।" यह कहकर बादशाह ने अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम को असल बात बता दी।
अबू अब्दुल्लाह हज्जाम की आंखों में आंसू आ गए और इसने कहा, "जहांपनाह, मुझे नहीं मालूम कि वह फिरंगी बादशाह कौन है और ना मैं किसी का जासूस हूं। अलबत्ता यह जरूर है कि अब्बू कासिम मेरा दोस्त है और हमारी दुकानें दमिश्क में पास-पास थीं और हम दोनों यहां रोजगार की तलाश में आए थे। हम यहां सराय में ठहरे थे।" यह कहकर अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने बादशाह को शुरू से आखिर तक सारी कस्सा सुनाया और कहा, "अब मेरी दरख्वास्त है कि सराय के चौकीदार और मेरे यहां हम्माम के मुलाजिमों को बुलाया जाए। सराय में मेरे साथ अब्बू कासिम ने जो सुलूक किया था, वह तो चौकीदार बताएगा। मगर हम्माम में अब्बू कासिम रंगरेज ने जो पाउडर मुझे दिया, उसका हाल मेरे हम्माम के नौकर बताएंगे।"
बादशाह को अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की बात का यकीन आ गया। मगर दरबार में हर एक को मुतमइन करने के लिए इसने चौकीदार को और हम्माम के नौकरों को बुलाया और उन्होंने भी वही बात बताई जो अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कही थी। बादशाह ने हुक्म दिया कि इसी वक्त अब्बू कासिम रंगरेज को कैद करके मेरे सामने लाया जाए। दो सिपाही अब्बू कासिम की दुकान पर गए। जब वह वहां ना मिला तो इसके घर पहुंचे। वहां वह इत्मीनान से पड़ा हुआ था और खुश हो रहा था कि इसने कितनी चालाकी से अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम का खात्मा किया। सिपाहियों ने इसे गिरफ्तार किया और कोड़े मारते और घसीटते हुए इसे बादशाह के सामने लाए। इसने जो देखा कि वहां अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम बादशाह के पास बैठा हुआ है और हम्माम के मुलाजिम और सराय का चौकीदार खड़ा है, तो समझ गया कि इसकी खैरियत नहीं है।
बादशाह ने इसकी तरफ बड़े गुस्से से देखा और कहा, "इनको पहचानते हो कि यह तुम्हारा दोस्त है जिसने तुम्हारे ऊपर बहुत एहसानात किए हैं तो मैंने अपने खर्चे से यहां लाया। तुम्हारा ख्याल रखा। मगर तुम इसे सराय के अंदर बीमार छोड़कर और इसका रुपया चुराकर चले गए। और जब वह तुम्हारी दुकान पर पहुंचा तो तुमने इसे मार-मार कर निकाल दिया और इसे मारने की साजिश की। अगर अल्लाह इसे ना बचाता तो बेचारा कब का मर चुका होता।" चौकीदार और मुलाजिम चिल्लाए, "खुदा गवाह है कि हमने भी इसे ऐसा ही पाया जैसा कि जहांपनाह फरमाया है।"
बादशाह ने कहा, "अब तुम अपना जुर्म मानो या ना मानो, मगर तुमको इसकी पूरी-पूरी सजा मिलेगी। तुम्हारे साथ कोई रियायत ना की जाएगी।" यह कहकर बादशाह ने हुक्म दिया कि ले जाओ इसे चूने के बोरे में बंद करके समुंदर में डाल दो। दरअसल, इस सजा का मुस्तहिक यही है।
अब अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "जहांपनाह, मैं आपसे अर्ज करता हूं कि अब्बू कासिम रंगरेज ने अब तक मेरे साथ जो कुछ किया, उसके लिए मैंने इसे माफ किया।"
बादशाह ने कहा, "तुमने तो इसे माफ कर दिया। मगर मैं इसे माफ नहीं कर सकता। इतने बुरे आदमी को जिंदा रहने का कोई हक्का नहीं है। तुमने जितनी बार इसके साथ नेकी की, इसने उतनी ही बार तुम्हारे साथ बुराई की है।"
इसके बादशाह के सिपाही इसे फिर घसीटते हुए ले गए और बादशाह के हुक्म के मुताबिक इसे समुंदर के अंदर डुबोक मर गया।
अब बादशाह ने अबू अब्दुल्लाह हज्जाम से कहा, "तुम मुझसे मांगो। क्या मांगते हो? तुम्हारी हर मांग पूरी की जाएगी।"
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "बादशाह सलामत, मैं सिर्फ इतना चाहता हूं कि मुझे मेरे मुल्क पहुंचा दिया जाए।" बादशाह तो यह चाहता था कि इसे अपना वजीर बना ले। मगर अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ने कहा, "मुझे अपने वतन और अपने दोस्तों और अजीज रिश्तेदारों की याद आ रही है। इसीलिए मुझे इजाजत दीजिए।"
बादशाह ने अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम की ख्वाहिश पूरी की और इसे बहुत माल और दौलत देकर एक खास जहाज से रुखसत किया। फिर अबू अब्दुल्लाह दमिश्क पहुंचा।
जब अबू अब्दुल्लाह हज्जाम का जहाज दमिश्क के साहिल पर पहुंचा तो लोग देखते क्या हैं कि वहां एक बोरा भी बहता हुआ आया है। अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने नौकरों से कहा कि इसे खोल कर देखो इसमें क्या है? जब बोरा खोला गया तो इसमें अब्बू कासिम रंगरेज की लाश थी जो आखिरकार अपने वतन में पहुंच गई थी। अबू अब्दुल्लाह हज्जाम ने अपने दोस्त की लाश को अपने हाथों से दफन किया और इसके पर लिख दिया, "अब्बू कासिम यहां दफन है जिसने मरने के बाद भी अपने दोस्त अब्बू अब्दुल्लाह का साथ ना छोड़ा। तुम्हारी नेकियां जिंदा, तुम्हारी खूबियां बाकी।"
अब्बू अब्दुल्लाह हज्जाम ऐशो-आराम की जिंदगी गुजारता रहा। अब भी वह उसी तरह साफ-सुथरी जिंदगी गुजारता, लोगों के काम आता और हर एक से मोहब्बत करता। जब वह मर गया तो इसकी लाश को भी लोगों ने इसकी वसीयत के मुताबिक अब्बू कासिम रंगरेज की कब्र के पास दफन कर दिया। हम्म।