Transcription
झाल और जनाब क्या हाल है मेरे फलक मकानों में चर्चा था बराबर उसका और उसका कुसूर माफ सर झुका था बराबर जिसका जिसका परिचय इश्क पे आने की वजह थी उसकी धीमे शाहीन मोहम्मद जगह थी उसकी गुफ़्तगू में रंग ले जाने में नूर था उसका हम मकान न भिक्षु और था उसका या वजह से खड़े रहने की आदत उसकी उसकी बस मोहम्मद को देखना थी इबादत उसकी उसकी रुके जलवायु नबी में कुमार था उसका का सरेखा सामने खुदा में शुमार था उसका झालू उसे उसके बुरे खुशगवार आती थी मीणा अजुन उसकी आसमां से पार जाती थी सफा तारीफ इश्क में कमाल कहते थे न भूलिए दो जहां उसको बिल्कुल कहते थे