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गुड मॉर्निंग फ्रेंड्स. आज हम डिस्कस करेंगे कंप्लीट ब्लड काउंट, सीबीसी, जिसे हम बोलते हैं. अब यह सीबीसी मोस्ट ऑफ द टाइम मैंने देखा है कि जब भी कोई रिपोर्ट देखता है तो उसमें सिर्फ हीमोग्लोबिन के बारे में देखता है, टोटल ल्यूकोसाइट काउंट या व्हाइट ब्लड सेल काउंट को देखता है, प्लेटलेट के ऊपर कमेंट करता है और ज्यादा से ज्यादा न्यूट्रोफिल और लिंफोसाइट्स के रेश्यो के ऊपर कमेंट करता है. बाकी डिटेल में कोई उसको देखता नहीं.
उसके अलावा बहुत सारे पैरामीटर होते हैं जो हमें डिजीज के बारे में ब्लू दे सकते हैं. उसके ऊपर कोई कमेंट नहीं करता. पर एग्जांपल, और इसमें भी लोग बहुत ही लिमिटेड इंटरप्रिटेशन करते हैं. हीमोग्लोबिन देख के सिर्फ एनीमिया के बारे में कमेंट करेंगे. बीबीसी अगर बड़े हैं तो ही इंफेक्शन है करके बोल देंगे. प्लेटलेट काउंट कम हो गया तो डेंगू करके बोल देंगे. इसके अलावा भी उसके बहुत सारे डिफरेंशियल हैं. उसके बारे में अपन क्या समझ सकते हैं. सिंबल बनाने की कोशिश कर रहा हूं और चाहूंगा कि मैक्सिमम इंफॉर्मेशन हम एक्सट्रैक्ट कर सकें सीबीसी से. उसके ऊपर आज डिस्कस करेंगे.
तो सबसे पहले समझते हैं टीएलसी, टोटल या फिर बीबीसी के बारे में. अब बीबीसी या फिर ल्यूकोसाइट जो होते हैं, ये बॉडी के डिफेंस सिस्टम का पार्ट है. एक तरह से इंफेक्शन से बॉडी को रोकने के, बॉडी को बचाने के लिए ये सेल्स, व्हाइट ब्लड सेल्स बॉडी में तैयार होते हैं. और इस कारण से जब भी बॉडी में इंफेक्शन होगा, ये इनका काउंट बढ़ जाएगा. हम देखते हैं कि फेरिंजाइटिस का अभी पेशेंट अगर है और उसका आपने अगर सीबीसी कराया तो उसमें बीबीसी काउंट बढ़ के आते हैं. तो बीबीसी काउंट अगर बहुत बढ़ के आया है, समझो 12,000 उसका अपर लिमिट है. उसका अगर 15,000 हुआ है, इसका मतलब ये ना जरूरी नहीं है कि बच्चे को या फिर पेशेंट को एडमिट करना पड़ेगा. ऐसा हो सकता है कि उसका जो इंफेक्शन है वो फेरिंजाइटिस में हो या यूरिनरी ट्रैक्ट में इंफेक्शन हो, जो लोक मेडिसिन से भी ठीक हो सकता है. तो बीबीसी काउंट बड़ा है मतलब एडमिट करके आईवी देने की जरूरत है, ऐसा नहीं है.
दूसरा, बीबीसी काउंट सिर्फ इंफेक्शन में नहीं बढ़ता. यह भी एक चीज हमको याद रखना है. क्योंकि अगर आप उस तरीके से सोचेंगे नहीं तो आप वो चीज को मिस कर देंगे. पर एग्जांपल, आपको लग रहा है कि बीबीसी काउंट बड़ा है, लेकिन बच्चों को फीवर ही नहीं है. तो आपने सोचना चाहिए कुछ नॉन-इंफेक्टिव कॉज तो नहीं है. उसके बारे में हमने सोचना चाहिए.
दूसरा, जब भी बॉडी में इन्फ्लेमेशन होगा. इंफेक्शन एक चीज होगी, एक चीज होगी इन्फ्लेमेशन. इन्फ्लेमेशन में भी बॉडी में बीबीसी काउंट बढ़ते हैं. इन्फ्लेमेशन पर एग्जांपल, रूमेटाइड आर्थराइटिस है, रूमेटाइड फीवर हुआ है, या फिर कोई और भी इन्फ्लेमेशन बॉडी में हुआ है. तो उसके कारण से भी बीबीसी काउंट बढ़ेगा. पर एग्जांपल, कहीं पर अगर घाव हो गया तो एक इंफेक्शन है. यूरिन ट्रैक इंफेक्शन हो गया, अपर रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट इंफेक्शन हो गया. और ऐसे किसी भी तरह के इंफेक्शन में आपका बीबीसी काउंट बढ़ सकता है. तो ये स्पेसिफिक भी नहीं है कि बीबीसी काउंट बढ़ाया मतलब कोई पर्टिकुलर इंफेक्शन हुआ है, ऐसा नहीं है. इसका मतलब ये जस्ट ये मतलब है कि बॉडी किसी इंफेक्शन से बचाने के लिए बीबीसी काउंट बढ़ा रही है. और बहुत बार बिना इंफेक्शन के भी बढ़ा सकती है. पर एग्जांपल, कोई अगर इन्फ्लेमेटरी डिजीज रहते हैं जिसमें ऑटोइम्यून डिजीज भी आते हैं. उसमें आपका बीबीसी काउंट हो सकता है. और बहुत रेयरली अगर यह काउंट बहुत ज्यादा है, पर एग्जांपल अगर किसी का बीबीसी काउंट 50,000 के करीब जा रहा है या 30,000 के ऊपर जा रहा है, तो आपने मैलिग्नेंसी भी सस्पेक्ट करनी चाहिए. तो इस प्रकार से बीबीसी काउंट हमको हेल्प.
एक चीज यहां पे जो उनको ध्यान रखना है कि कभी-कभी कुछ स्पेसिफिक इंफेक्शन में बीबीसी काउंट हमको हेल्प करता है. पर एग्जांपल, अगर बीबीसी काउंट आपका 25,000, 26,000 है और बच्चा है, तो आपने उसके वैक्सीनेशन की हिस्ट्री लेनी चाहिए. बहुत बार जो हॉपिंग कफ है, परटूसिस जो हम बोलते हैं, उसमें बीबीसी काउंट बढ़ा हुआ मिलता है. और ऐसे कंडीशन में बहुत बार ऐसे ही ट्रीटमेंट करें तो उसका रिस्पांस हमको मिल सकता है. तो कोई भी बच्चा है जो फीवर के साथ में आ रहा है, बीबीसी काउंट उसमें ज्यादा है, तो अपने ओपन का कंसीडर करना चाहिए.
अच्छा, करते हैं बीबीसी काउंट बहुत बार कम हो जाता है. 4,000 से अगर नीचे जाता है तो क्या करना है? तो क्या समझना है? बहुत बार लोग देखते ही नहीं है कि वैल्यू कम हुई है. अगर बीबीसी काउंट आपका लो जा रहा है, जो नॉर्मल रेंज है उसके भी नीचे जा रहा है, तो आपने वायरल सस्पेक्ट करना चाहिए. क्योंकि वायरल जो इंफेक्शंस होते हैं वो बॉडी के, बॉडी में जो बोन मैरो है, उसको प्रोडक्शन को हैंपर कर देते हैं. जिसके कारण से बीबीसी काउंट, प्लेटलेट काउंट सबको कम कर सकते हैं. तो लो डब्ल्यूबीसी काउंट मोस्ट ऑफ द टाइम आपका वायरल इंफेक्शन डिटेक्ट करता है. लेकिन अगर पेशेंट को कोई इंफेक्शन नहीं है और फिर भी उसका अगर बीबीसी काउंट कम है, तो आपने बोन मैरो का डिजीज सस्पेक्ट करना चाहिए. हो सकता है उसका बोन मैरो में जो बीबीसी का प्रोडक्शन है.
तीसरा, उसमें अगर हम देखें तो बीबीसी काउंट कम होने का और एक कारण होता है. अगर न्यूबॉर्न में अगर यह है, तो सीवियर सेप्सिस एक कारण हो सकता है. तो जब भी न्यूबॉर्न में बीबीसी काउंट कम हो जाता है, तो हम थोड़े से वरीड हो जाते हैं. क्योंकि नॉर्मली अगर हम नॉर्मल अकाउंट भी देखें न्यूबॉर्न का, तो 20,000 तक जा सकता है. नॉर्मली भी उसका मतलब इंफेक्शन रहे ऐसा जरूरी नहीं है. लेकिन अगर कम हो जाता है, 4,000 के नीचे जाता है, तो हमने उसमें सेप्सिस सस्पेक्ट करना चाहिए. वो भी सीवियर सेप्सिस सस्पेक्ट करना चाहिए. उसको नजरअंदाज नहीं करना चाहिए. क्योंकि बहुत बार वो इग्नोर होता है. उस टाइम पर अगर आपने एक्ट नहीं किया तो फिर बाद में बच्चा बहुत ही क्रिटिकल कंडीशन में आता है और फिर एंटीबायोटिक का असर आने को जितना समय लगता है, उतना देर बच्चा स्टेबल नहीं रह पाता और बहुत ज्यादा क्रिटिकल हो जाता है.
इसके अलावा, ऐसा नहीं है कि हर बार लोग बीबीसी इंडिकेट करेगा. बहुत बार जो आईयूजीआर बेबी है, उसमें एक केस वो रह सकता है जिसमें बिना इंफेक्शन के भी बीबीसी काउंट कम होता है. लेकिन ऐसे क्रिटिकल कंडीशन में बेटर है पेशेंट को एडमिट कर लो. उसका कल्चर भेज दो. एंटीबायोटिक शुरू कर दो. कल्चर नेगेटिव आता है, सबसे पहले बच्चा ठीक रहता है, उसके बीबीसी अकाउंट बढ़ जाते हैं, तो आप उसको कभी भी बंद कर सकते हैं.
अभी अंदर जो रीजन है जिसमें बीबीसी काउंट बढ़ सकते हैं, वो है स्प्लेनिक. अगर ऑपरेशन हुआ, स्प्लीन को अगर हटा दिया है, तो बीबीसी काउंट बढ़ सकता है. तो जब भी सेल्स जो सर्कुलेशन में होते हैं, उनमें से जो ओल्ड सेल्स हैं, उसको रिमूव करने का काम स्प्लीन करता है. अगर स्प्लीन का सर्जरी करना पड़ा किसी कारण से, स्प्लीन अगर हटा दिया गया है, तो ये जो ओल्ड सेल्स को रिमूव करने का फंक्शन है, वो हैंपर हो जाता है. जिसके कारण से आप देखेंगे कि जो बीबीसी काउंट है, प्लेटलेट काउंट है, उनका बहुत ज्यादा नंबर बढ़ जाता है.
इसके अलावा, जो बीबीसी काउंट्स हैं, वो हम देखते हैं कि कुछ इम्यूनो डेफिशिएंसी है या फिर जो एचआईवी एड्स है, उसमें बीबीसी काउंट कम हो सकता है. तो आपको सिर्फ रिपोर्ट नहीं देखनी है. आपको ओवरऑल पिक्चर देखना है. आपको पेशेंट देखना है, उसकी प्रीवियस हिस्ट्री समझनी है. क्या उसको बार-बार इंफेक्शन हो रहा है? या फिर अभी रिसेंटली फीवर में से हुआ है? घर में और किसी को कुछ इंफेक्शन है की ये सारी चीजें हमको समझनी है.
जब बीबीसी काउंट बढ़ा होता है, तो उसके साथ में हम देखते हैं कि न्यूट्रोफिल्स के रेश्यो क्या हैं और लिंफोसाइट्स कैसे हैं. अब मोस्ट ऑफ द टाइम 80% न्यूट्रोफिल्स रहते थे और जो 20% 30% जो है, वो लिंफोसाइट्स रहते थे. कभी-कभी हम देखते हैं कि न्यूट्रोफिल्स बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं और लिंफोसाइट्स कम हो जाते हैं उस प्रोपोर्शन में. तो ये मोस्ट ऑफ द टाइम जो है, वो इंफेक्शन को रिस्पांस रहता है. मोस्ट ऑफ द टाइम ये बैक्टीरिया इंफेक्शन या फिर फंगल इंफेक्शन रहता है. लिंफोसाइट जब बढ़ते हैं, तो ये मोस्टली वायरल के कारण रहता है. लेकिन जैसा मैंने बोला था कि परटूसिस या हॉपिंग कफ में अगर टीएलसी काउंट आपका बहुत ज्यादा बढ़ा है और आपका लिंफोसाइट्स का कंपोनेंट ज्यादा है, तो ऐसे कंडीशन में आपने हॉपिंग कफ सस्पेक्ट करना चाहिए. उसमें एज़िथ्रोमाइसिन का रोल ज्यादा है.
इसके अलावा, अगर हम देखें कि एंटीक फीवर जो होता है, मतलब जो टाइफाइड होता है, वो उसमें भी आपके न्यूट्रोफिल्स थोड़े से कम हो जाते हैं और लिंफोसाइट्स का परसेंटेज ज्यादा होता है. तो जो भी क्रॉनिक इंफेक्शन चलते हैं, स्लो इंफेक्शन है, ज्यादा दिन के लिए रहते हैं, उसमें लिंफोसाइट्स का अकाउंट बढ़ने लगता है धीरे-धीरे और न्यूट्रोफिल्स का अकाउंट कम होने लगता है. और अगर बहुत ही ज्यादा डिस्प्रापोर्शनेटली लिंफोसाइट आपके बढ़े हुए हैं, तो आपने सीएलएल सस्पेक्ट करना चाहिए. तो टीएलसी अकाउंट बहुत ज्यादा है और लिंफोसाइट का परसेंटेज ज्यादा है, तो आपने सस्पेक्ट करना चाहिए.
जब हम रेड ब्लड सेल्स की तरफ जाते हैं, तो मोस्ट ऑफ द टाइम उसके अलावा हमको और कुछ चीजें देखनी चाहिए जो हमको डायग्नोसिस में हेल्प कर सकती है. तो हीमोग्लोबिन के साथ में आप देखोगे तो कई किसी रिपोर्ट में पीसीबी लिखा रहता है, कहीं किसी रिपोर्ट में हेमेटोक्रिट करके लिखा आता है. एचसीटीटी मीनिंग एक ही है. मतलब अगर आप ब्लड को अगर ईडीटीए में लेते हैं ताकि वो प्लॉट ना हो और उसको अगर सेंट्रीफ्यूज करें, तो जो भी उसके सेल्स हैं वो बेस में आ जाएंगे और ऊपर में आपका प्लाज्मा सेपरेट हो जाएगा. जो प्लाज्मा के नीचे का रेड पोर्शन है, उसको हम हेमेटोक्रिट बोलते हैं. उसके ऊपर की जो लेयर रहती है, रेड सेल्स के ऊपर, उसमें प्लेटलेट और बीबीसी रहते थे. लेकिन जो सबसे नीचे का रेड पोर्शन जो रहता है, उसको हम बोलते हैं हेमेटोक्रिट. मतलब अगर किसी का ब्लड ले, तो उसमें जो आरबीसी का कंपोनेंट है, हीमोग्लोबिन का कंपोनेंट है, वो कितना है. और इसी को वॉल्यूम भी बोलते हैं. वॉल्यूम इसलिए क्योंकि आपने सबको सेंट्रीफ्यूज करके एक जगह पर जमा करने के बाद देखना चाहते हैं कि उसका वॉल्यूम कितना है.
इसके अलावा, आरबीसी कितने हैं ब्लड में, यह भी एक पैरामीटर हमको देखना जरूरी है. अब हीमोग्लोबिन कब कम होगा? एनीमिया में. अगर आरबीसी आपके बन नहीं रहे हैं, ना किसी भी कारण से. एनीमिया के बहुत सारे टाइप्स हैं. उसको हम किसी दिन अलग से सेपरेट डिस्कस करेंगे. टाइप्स ऑफ एनीमिया और उसको कैसे डिवाइड करना है, कैसे याद करना है. पर ओवरऑल परसेंटेज में अगर आप देखोगे कि किसी कारण से ब्लड बन ही नहीं रहा, पर एग्जांपल न्यूट्रिशनल एनीमिया, आयरन डेफिशिएंसी हो गया, या फिर आपकी विटामिन बी12 या फिर फोलिक एसिड की डेफिशिएंसी के कारण एनीमिया हो गया, या फिर आपका बोन मैरो फेलियर के कारण, या फिर आपके ब्लड सेल्स टूट रहे हैं, आरबीसी टूट रहे हैं जिसके कारण ये हो गया, या किसी का एक्सीडेंट हो गया और ब्लड बह गया. तो ऐसे किसी भी कंडीशन में अगर हीमोग्लोबिन कम होता है, तो आपका हीमोग्लोबिन भी कम होगा और जो पीसीबी, हेमेटोक्रिट है, वो भी कम होगा.
अब ये जो हेमेटोक्रिट है, ये इंडिकेट करता है कि टोटल आपका जो आरबीसी का और हीमोग्लोबिन का परसेंटेज है, वो कितना कम हुआ. कभी ये बढ़ सकता है. पर एग्जांपल, कोई पेशेंट अगर डिहाइड्रेटेड है या बहुत ज्यादा स्वेटिंग हो गया या फिर पानी नहीं मिला पीने के लिए, तो ऐसे कंडीशन में जो ब्लड में का प्लाज्मा का कंपोनेंट है, वो कम हो जाता है. दूसरा, हमने डेंगू के चैप्टर में समझा था कि जो ब्लड वेसल के अंदर का ब्लड है, उसके अंदर कैपिलरी लीक हो जाता है, जिसके कारण से जो प्लाज्मा है, वो वेसल को छोड़कर पेरिफेरी में पेट में जाकर बैठ जाता है, चेस्ट में जाकर बैठ जाता है. जिसके कारण से इंट्रावास्कुलर वॉल्यूम कम हो जाता है, जिसके कारण से भी आपका हेमेटोक्रिट बढ़ जाता है. ठीक है. तीसरा, हमने सोचा कि बर्न हो गया, बर्न में भी फ्लूइड लॉस हो गया, जिसके कारण से हेमेटोक्रिट बढ़ गया. तो ऐसे या तो प्लाज्मा कम होगा या फिर सच में बढ़ेगा.
पर एग्जांपल, न्यूबॉर्न. न्यूबॉर्न का हीमोग्लोबिन एडल्ट्स के हीमोग्लोबिन से ज्यादा हो जाए, क्योंकि उसको वहां के ब्लड में से ऑक्सीजन खींचना होता है. तो हेमेटोक्रिट न्यूबॉर्न का हमेशा ज्यादा रहेगा. हार्मोन बनाता है और ज्यादा रेड ब्लड सेल्स बना पाए. तो इंक्रीज प्रोडक्शन में हम पीसीबी का ज्यादा रहेगा. जो हाई एल्टीट्यूड में रहने वाले लोग हैं, हिमालय में रहते हैं, तो वहां पर वैसे ही ऑक्सीजन का वो उनको परसेंटेज कम मिलता है. तो जिसके कारण से उनको ज्यादा एरिथ्रोपोइटिन सीक्रेट करके जो हीमोग्लोबिन है, ज्यादा बनाना पड़ता है ताकि उनका शरीर अच्छे से काम कर सके. तीसरा, जो क्रॉनिक कॉपर पेशेंट हैं, बहुत दिनों से जिनको अस्थमा है या फिर जिनको ब्रोंकियल आर्टेराइटिस है, ऐसे पेशेंट भी अपना हीमोग्लोबिन बढ़ा लेते हैं, क्योंकि उनको ऑक्सीजन खींचने के लिए कैरिंग कैपेसिटी बढ़ाने के लिए हीमोग्लोबिन की जरूरत होती है.
इसके अलावा, कुछ पेशेंट को एरिथ्रोपोइटिन दे दे किसी और कारण से, एनीमिया के लिए नहीं, लेकिन किसी और कारण के लिए अगर कोई टीम दिया है, तो भी आपका रेट बढ़ता है. बहुत से लोग जो स्टेरॉइड्स लेते हैं, जो मसल्स बनाने के लिए, बॉडी बनाने के लिए, उनके लिए भी.
अब हमको कैसे पता चलेगा कि यह हेमेटोक्रिट प्लाज्मा कम होने के कारण बढ़ा है या फिर सच में इसका हीमोग्लोबिन या आरबीसी बढ़ गए हैं? तो वो देखने के लिए हमको आरबीसी काउंट देखना है. ठीक है. तो अगर आपका आरबीसी काउंट बढ़ा है और हेमेटोक्रिट भी बढ़ा है, मतलब ये इंक्रीज प्रोडक्शन ऑफ आरबीसी है. है ना. तो ये एरिथ्रोपोइटिन ज्यादा सीक्रेट होने के कारण या फिर न्यूबॉर्न पीरियड में आईयूजीआर होने के कारण या फिर हाई एल्टीट्यूड के कारण हुआ है. लेकिन अगर समझो आपका हेमेटोक्रिट तो बढ़ा है, लेकिन आरबीसी काउंट नॉर्मल है. इसका मतलब है कि जो आपने वॉल्यूम ब्लड लिया है, उसमें प्लाज्मा का परसेंटेज कम है. मतलब इसमें पेशेंट को डिहाइड्रेशन ज्यादा हुआ है. तो इस प्रकार से ये दो पैरामीटर देख कर आपने कारण समझ सकते हैं.
और कम होने का कारण हमने समझा था कि मोस्टली एनीमिया के कारण, ब्लड लॉस जो किसी भी कारण से हो सकता है, ब्लड लॉस या फिर डिक्रीजिंग प्रोडक्शन के कारण हो सकता है. और अब ये इंक्रीज हीमोग्लोबिन जब रहता है, तो उसके लिए एक सेपरेट एंटिटी भी उन्होंने दी है, उसको बोलते हैं पॉलीसिथीमिया वेरा. तो जो रेड ब्लड सेल्स जब बढ़ जाते हैं, जिसके में हमने बोला देखा था कि हेमेटोक्रिट भी बढ़ेगा और आरबीसी काउंट भी बढ़ेगा, उसको बोलते हैं पॉलीसिथीमिया. ये टोटली डिफरेंट कंडीशन होती है. इसको आप अलग तरह से अप्रोच करेंगे. आज इसको यहां पर डिस्कस नहीं करते. आज सीबीसी के बारे में डिस्कस करेंगे.
अब जब हमने देखा कि एनीमिया है पेशेंट को, तो उसको कौन से कारण से एनीमिया हुआ है? क्या हम सिर्फ सीबीसी का रिपोर्ट देख के इसको समझ सकते हैं? तो उसके लिए ये दो कंपोनेंट को हम समझेंगे. तो इसका मतलब क्या है? एमसीवी, मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम. मतलब जो आरबीसी के सेल्स होते हैं, उसको कॉर्पसल्स बोलते हैं. याद रखने के लिए हम मीन सेलुलर वॉल्यूम भी कह सकते हैं, लेकिन इसका एक्चुअल जो शॉर्ट फॉर्म है, ये मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम है. और दूसरा है हीमोग्लोबिन कंसंट्रेशन. इसका क्या मतलब है? तो जो सेल्स हैं, आरबीसी हैं, उसका साइज क्या है? उसके ऊपर आप उसको क्लासिफाई कर सकते हैं. जब सेल्स छोटे हैं, तो आपका वॉल्यूम कम रहेगा. जब ये सेल्स नॉर्मल हैं, तो आपका वॉल्यूम नॉर्मल रहेगा. और अगर ये सेल का साइज अगर बढ़ गया है, तो आपका मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम ज्यादा आएगा.
अब ये सब वैल्यूज याद रखने की जरूरत है कि नहीं? क्योंकि जो भी सीबीसी का रिपोर्ट होता है, उसके राइट हैंड साइड में मोस्ट ऑफ द टाइम आप देखोगे तो उसके नॉर्मल वैल्यूज दिए हुए होते हैं. तो उसको मगध करने की जरूरत नहीं है. किसी भी चीज को मगध करने की जरूरत नहीं. सब रिपोर्ट्स में दिया हुआ होता है. तो आपको आरबीसी का साइज पता चल जाता है. तो जस्ट आपको एमसीवी देखने की जरूरत नहीं है. आप मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम देखो. उसमें से आपको आइडिया आ जाएगा कि जो उसके आरबीसी हैं, वो छोटे हैं, नॉर्मल हैं या नॉर्मल से बड़े. और वो हमको डायग्नोसिस दे सकता है. तो हम उसको बोलेंगे कि माइक्रोसाइटिक, छोटे-छोटे सेल्स हैं. अगर वो नॉर्मल है, और अगर उनका साइज बड़ा है, तो हम उसको बोलेंगे कि ये इसके जो सेल्स हैं, ये मैक्रोसाइटिक. मतलब बड़े सेल्स. प्रकार का एनीमिया हम डील कर रहे हैं.
तो अगर हीमोग्लोबिन कम है, तो हमको एमसीवी देखना है. या मीन कॉर्पस्कुलर हीमोग्लोबिन कंसंट्रेशन. मतलब उसके अंदर एवरेज कितना परसेंट हीमोग्लोबिन है. उसके हिसाब से उन्होंने उसको हीमोग्लोबिन कंसंट्रेशन के हिसाब से उसको डिवाइड किया है. तो किसी सेल का अगर मीन कॉर्पस्कुलर हीमोग्लोबिन कंसंट्रेशन कम है, मतलब हर सेल में जो हीमोग्लोबिन भरा हुआ होना चाहिए, वो कम है. और अगर एमसीएचसी ज्यादा है, तो मतलब जितना सेल का साइज है, उस हिसाब से जो हीमोग्लोबिन है, वो ज्यादा है. है ना. और अगर नॉर्मल है ये वैल्यूज, तो मतलब नॉर्मल है. सेल में जितना परसेंटेज हमेशा नॉर्मली रहता है, उतना ही है. तो ये दोनों पैरामीटर देख के हमको डिसाइड करना है.
जब एमसीएचसी मतलब हर सेल में का हीमोग्लोबिन कम है, तो उसको हम बोलेंगे हाइपोक्रोमिया. क्रोमिया मतलब कलर. हाइपोक्रोमिया मतलब उसका कलर थोड़ा सा फेड दिख रहा है. है ना. और जो दूसरा है, वो अगर वो एमसीएचसी ज्यादा है, तो उसको बोलेंगे हम हाइपरक्रोमिया. तो अगर सेल का साइज छोटा है, मतलब आपका एमसीवी भी कम है और सेल में का हीमोग्लोबिन भी कम हो रहा है, मतलब एमसीएचसी भी लो है. तो उसको हम कहेंगे माइक्रोक़िटिक हाइपोक्रोमिक. ठीक है. तो जो भी सेल का साइज भी हम सीबीसी में समझ सकते हैं और उसके अंदर का हीमोग्लोबिन कितना है, मतलब वो दिखने में कैसे फेड है या फिर बहुत ज्यादा रेड है, वो भी हम ये पैरामीटर को देख के समझ सकते हैं. तो इनके हिसाब से आप बहुत बार जो एनीमिया का क्लासिफिकेशन कर सकते हैं.
उसमें भी मिलेगा. और अगर ये साइज बढ़ गया, एमसीवी बढ़ गया, तो कौन से कंडीशन में मिलेंगे? तो जनरली ये जो बी12 डेफिशिएंसी है, या फिर फोलिक एसिड डेफिशिएंसी है, या फिर एप्लास्टिक एनीमिया है, जिसमें बोन मैरो में प्रॉब्लम आ रहा है, वैसे कंडीशन में हमको ये चीज मिलेगी. साथ में हमको जब लिवर डिजीज या फिर अल्कोहल के पेशेंट मिलते हैं, उसमें भी ये मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम बढ़ा हुआ मिलता है. वो बड़े सेल्स होते हैं.
और मीन कॉर्पस्कुलर हीमोग्लोबिन कंसंट्रेशन कब-कब मिलेंगे? जब भी जब आपका हीमोग्लोबिन का प्रोडक्शन हैंपर होगा, कोई भी कंडीशन हो, उसमें आपको ये मीन कॉर्पस्कुलर हीमोग्लोबिन कंसंट्रेशन कम मिलेगा. तो अगर हम देखें कि उसके पैरामीटर क्या है, अगर पेशेंट को एनीमिया होता है, तो एमसीवी देखेंगे. उसके हिसाब से हम उसको डिजीज को क्लासिफाई कर सकते हैं कि वो देखेंगे. पर एग्जांपल.
तो अगर मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम कम है, मतलब माइक्रोसाइटिक है. लेकिन मीन कॉर्पस्कुलर हीमोग्लोबिन कंसंट्रेशन नॉर्मल है. और कभी-कभी ये भी रहा, तो आपको थैलेसीमिया सस्पेक्ट करना चाहिए. तो अगर किसी को फैमिली हिस्ट्री थैलेसीमिया की या फिर फैमिली हिस्ट्री ऑफ ब्लड ट्रांसफ्यूजन की, तो ऐसे कंडीशन में आपने थैलेसीमिया देख लेना चाहिए. और किसी भी पेशेंट को थैलेसीमिया लेबल करने के पहले उसका आयरन स्टडीज हमने कर लेना चाहिए. तो ये कंडीशन में आपके आयरन स्टडीज नॉर्मल रहेंगे. फिर फेरिटिन लेवल वगैरह नॉर्मल आएगा. आयरन डेफिशिएंसी में आपका फेरिटिन लेवल बहुत कम रहेगा.
इसके अलावा, अगर दोनों भी नॉर्मल है, लेकिन एनीमिया है, तो मोस्ट ऑफ द टाइम या फिर बहुत दिनों से कोई बीमार है, तो ऐसे कंडीशन में जो इन्फ्लेमेटरी डिजीज रहते हैं. इसके अलावा, अगर आपका एमसीवी कम हो गया, एमसीएच कम हो गया, लेकिन एमसीएचसी बढ़ गया है, मतलब करना चाहिए सोचना चाहिए. ऑस्मोटिक फ्रैजिलिटी टेस्ट आप इसके लिए कर सकते हैं. उसको अगर आप अच्छे पैथोलॉजिस्ट के पास में भेजेंगे, तो वो बताएगा.
अब ये तो हमने समझा वॉल्यूम कम हो गया तो क्या रहेगा. मतलब इसके सेल्स बड़े हुए. जो आरबीसी हैं, वो बड़े-बड़े हैं. तो ऐसे कंडीशन में आपने जैसे बी12 फोलिक एसिड डेफिशिएंसी समझना चाहिए, जिसका नाम भी मेगालोब्लास्टिक एनीमिया है, या फिर एप्लास्टिक एनीमिया है, जिसमें बोन मैरो का फंक्शन कम हुआ है, किसी भी कारण से. एप्लास्टिक एनीमिया से बोलिए या फिर ड्रग डोज के कारण बोलिए, किसी मेडिसिन के कारण अगर बोन मैरो सरप्राइज हुआ है, तो ऐसे कंडीशन में जो आपको सेल्स मिलेंगे, वो मेगालोब्लास्ट मिलेंगे, मतलब बड़े-बड़े सेल्स मिलेंगे. और अगर आप स्मीयर देखोगे, तो आपको वो पैथोलॉजिस्ट बताएगा कि सेल्स आरबीसी नॉर्मल. तो ऐसे कंडीशन में काफी सारे एनीमिया को डायग्नोस कर सकते हैं.
अब एक और पैरामीटर होता है, जो बहुत से लोग देखते ही नहीं है, वो आरडीडब्ल्यू. आरडीडब्ल्यू इसका लॉन्ग फॉर्म है, रेड सेल डिस्ट्रीब्यूशन विड्थ. मतलब अगर हम आरबीसी को देखें, तो उसके साइज में कितना वेरिएशन है. तो जो साइज की वेरिएशंस होते हैं, उसको.
एंडीसोसाइटोसिस बोलते हैं, मतलब साइज बहुत छोटे-बड़े यूनिफॉर्म नहीं है। तो जब भी आपका आरडीडब्ल्यू बड़ा हुआ है, अगेन वैल्यू याद रखने की जरूरत नहीं है, वो आपके सीबीसी के रिपोर्ट में नॉर्मल वैल्यूज दिए हुए होते हैं। तो अगर आरडीडब्ल्यू बड़ा हुआ है, मतलब आपके साइज जो रेड ब्लड सेल से, उसके साइज में बहुत ज्यादा वेरिएशन है, तो आपने इसका पीबी (Peripheral Blood) देखना चाहिए कि इसके आरबीसी कैसे दिख रहे हैं। तो पैथोलॉजी उसको रिक्वेस्ट करना है कि सर आप इसका पीबी रिपोर्ट करो, है ना? तो पीबी में आप देखोगे कि अलग-अलग साइज के मिलेंगे। तो कौन सी कंडीशन में ये सब मिल सकते हैं? या फिर न्यूट्रिशनल लाइन में लेक, फोलेट एसिड या फिर डिफिशिएंसी है, या फिर बहुत बार जो पेरिफेरल डिस्ट्रक्शन होते हैं, जिसमें पर एग्जांपल [संगीत] एक चीज और यहां पर मैं क्लियर करना चाहूंगा कि बहुत बार क्या होता है, हीमोग्लोबिन नॉर्मल रहता है। हीमोग्लोबिन की वैल्यू जो है, रेंज में है, 10 से ज्यादा है, लेकिन जो एमसी, एमएचसी वो कम है। इसका क्या मतलब हुआ? यह माइक्रोसाइटिक हाइपोक्रोमिक है, लेकिन एनीमिया नहीं है। तो ऐसे कंडीशन में बच्चों को एनीमिया नहीं है, लेकिन उसको आयरन डिफिशिएंसी है। आप उसको आयरन दो, है ना? तो अगर आप आयरन सप्लीमेंट करेंगे, तो बाकी जो प्रॉब्लम है आयरन डिफिशिएंसी के, पर एग्जांपल भूख ना लगना, कंसंट्रेशन का कमी होना, या फिर पीका, कुछ भी पकड़ के बच्चे जो मुंह में डालते हैं, तो वो कंडीशन में इंप्रूवमेंट होगा। हाई सेकेंडरी में आप उसको आयरन सप्लीमेंट ले सकते हैं, आयरन रिच डाइट दे सकते हैं, जो बच्चे को हेल्प करेगा। तो एक जो हमने समझा था कि आयरन देखा था, आरडीडब्ल्यू बड़ा हुआ मिलेगा आपको आयरन डिफिशिएंसी में, बी12 में हुआ मिलेगा। जब भी आरडीडब्ल्यू बड़ा है, रिक्वेस्ट के रिक्वेस्ट पर पीबी।
अब और एक कॉन्सेप्ट यहीं पर क्लियर करना चाहूंगा, वह है रेटिकुलोसाइट्स काउंट का। अब बहुत बार इसको रेटिक काउंट करके भी भेजते हैं। इसको परसेंटेज में रिपोर्ट कर देते हैं कि रेटिक काउंट 2% है, 3% है, 4% है। तो ये इसका क्या सिग्निफिकेंस है? रेटिकुलोसाइट्स जो हैं, वो इमैच्योर आरबीसी हैं। अब बोन मैरो में आरबीसी मैच्योर होते हैं और मैच्योर होने के बाद में वो ब्लड में आते हैं। बोन मैरो से, लेकिन किसी कारण से अगर समझो, जो ऑलरेडी एक्जिस्टिंग आरबीसी हैं, वो कम पड़ रहे हैं, तो बॉडी क्या सिग्नल भेजती है कि बहुत ज्यादा डिमांड है आरबीसी भेजो, आरबीसी भेजो। तो बोन मैरो में से जो इमैच्योर आरबीसी, जो भी पूरे पकने के हैं, पूरे बनने के, वो भी ब्लड में आना शुरू हो जाता है। नॉर्मली इनका परसेंटेज 2% से ज्यादा नहीं रहता। लेकिन अगर किसी कारण से डिमांड बढ़ गया है और बोन मैरो इमैच्योर रेटिकुलोसाइट्स काउंट को अगर ब्लड में भेज रहा है, तो इसका परसेंटेज 6%, 10% तक के भी जा सकता है। तो ऐसे कौन सी कंडीशन है जिसमें ब्लड को ज्यादा आरबीसी की जरूरत होती है? मतलब जो है वो ऑलरेडी है, लेकिन वो टूट रहे हैं। पर एग्जांपल, आपका हीमोलिटिक एनीमिया है। हीमोलिटिक एनीमिया है। अगर आपके आरबीसी इस ऑलरेडी टूट रहे हैं, तो जो रेटिकुलोसाइट्स काउंट है, वो बढ़ जाएगा। बोन मैरो ज्यादा इमैच्योर सेल्स भेजेगा, क्योंकि उसको मैच्योर करने का उतना समय नहीं मिल रहा। तो बोल रहा है कि आप निकालो, आगे चलकर कम करो और कम करते-करते मैच्योर हो। तो अगले एक-दो दिन में वो रेटिकुलोसाइट जो होते हैं, वो आरबीसी में कन्वर्ट हो जाते हैं। यह कॉन्सेप्ट बड़े हुए हैं। इसका मतलब है कि बोन मैरो को इमेज पढ़ रहे हैं, क्योंकि ब्लड में आरबीसी डिमांड पूरी नहीं हो रही है। कि जो ब्लड में ऑलरेडी सेल्स हैं, वो प्रीमेच्योर डिस्टर्ब हो रहे हैं, जैसे कि एनीमिया, या फिर कहीं से छोटा थोड़ा-थोड़ा ब्लड जा रहा है, जिसके कारण से ब्लड कम हो रहा है। पर एग्जांपल, किसी को बहुत क्रॉनिक ब्लीडिंग पाइल्स होते हैं, जो रोज ब्लड होते हैं, जिसके कारण से हीमोग्लोबिन कम हो रहा है और जिसके कारण से आपका रेटिकुलर सीड्स काउंट बढ़ रहा है। या फिर बहुत बार यह रेटिकुलर सीड्स काउंट आपको इंडिकेट भी करता है कि आपका बोन मैरो काम कर रहा है या नहीं। पर एग्जांपल, जो नॉर्मली 2% रहता है, वो भी नहीं आ रहा। क्यों नहीं आ रहा? क्योंकि बोन मैरो से आरबीसी ही नहीं बन रहे। तो यह भी रिस्पांस बन गया। और बहुत बार अगर आयरन डिफिशिएंसी एनीमिया है, तो आप देखोगे जैसा हमने समझा कि इसमें रेटिक काउंट कम रहेगा, लेकिन जैसे ही आप आयरन एडिक्वेट डोज में दोगे, तो उसके लिए ब्लड में डेट मेंस, वो इंडिकेट करेगा कि बोन मैरो का रिस्पांस आ गया है। अभी तो फिलहाल यह मैच्योर भेज रहा है, लेकिन धीरे-धीरे वो पूरा आरबीसी को मैच्योर कर लेगा, जो प्रॉब्लम है, वो सॉल्व हो जाएगा। बहुत जब कोई एनीमिया का पेशेंट होता है, खास करके न्यूबॉर्न में और उसमें आयरन डिफिशिएंसी हीमोग्लोबिन अगर कम है, पर एग्जांपल हुआ है और आपको डिसीजन लेना है कि इसको आप ब्लड देना चाहते हैं या नहीं देना चाहते, तो आप उसका रेटिक काउंट देख लीजिए। अगर आपके आयरन के सप्लीमेंट के साथ उसका रेटिक काउंट बढ़ गया है, मतलब बोन मैरो अच्छे से काम कर रहा है, यह आपका हीमोग्लोबिन बढ़ा देगा, आप उसको वेट कर सकते हो। लेकिन अगर रेटिकल्स काउंट अभी भी 2% के नीचे, आपने आयरन दे दिया, सब दिया, सब दे दिया, तो आपको पता है कि यह कोई आगे चलकर हीमोग्लोबिन बढ़ाने वाला नहीं है। आप उसमें ब्लड ट्रांसफ्यूजन दे देंगे। तो यह रेटिकुलर साइट्स काउंट बहुत इंपॉर्टेंट है। इसको आपको समझना है। पर एग्जांपल, हम जॉन्डिस में देखते हैं, जॉन्डिस के पेशेंट में रेटिकुलोसाइट्स काउंट भेजते हैं, क्योंकि वह इनडायरेक्ट मार्कर है कि पेरिफेरी आपके जो आरबीसी हैं, वो टूट रहे हैं। तो आपको ऐसे कंडीशन में रेटिकुलोसाइट्स अकाउंट अगर ज्यादा है, तो आपको ज्यादा जॉन्डिस एक्सपेक्ट करना है। तो उसमें हो रहा है, मतलब आपका बोन मैरो काम नहीं कर रहा है।
अभी हम प्लेटलेट काउंट के बारे में समझेंगे। प्लेटलेट काउंट बहुत बार लोग जब भी प्लेटलेट काउंट लो देखते हैं, तो बोलते हैं कि यह इसको डेंगू है। डेंगू एक कारण नहीं है। डेंगू बहुत सारे कारणों में का एक कारण है, प्लेटलेट कम होने का। तो प्लेटलेट के बारे में डिटेल में समझते हैं। सबसे पहले समझ लेते हैं कि प्लेटलेट जो है, वो बनते हैं बोन मैरो में, बनते हैं। सर्कुलेशन में आते हैं। उसके बाद जो पेरिफेरल सर्कुलेशन है, उसमें रहते हैं और उसके बाद में वो जाके डिस्ट्रॉय होते हैं। स्प्लीन में। यह रोज के प्लेटलेट बढ़ाने चाहिए। अगर प्लेटलेट बन नहीं रहे हैं, तो ये इनका लाइफ स्पैन छोटा होता है। ये सात दिन से ज्यादा नहीं रहते, जबकि हम देखते हैं कि हमारे आरबीसी 60 दिन तक के रह सकते हैं, ना 60 से 120 दिन तक के रहते हैं। तो यह जब भी किसी कारण से इनका प्रोडक्शन अगर कम हो जाए, वायरल इंफेक्शन के कारण या बोन मैरो के डिजीज के कारण, तो इनके प्लेटलेट काउंट कम हो जाते हैं। जब भी वो डिजीज बढ़ जाएंगे, तो आपको यह समझना है कि प्लेटलेट का जो काउंट है, उसके प्रोडक्शन के ऊपर बहुत ज्यादा डिपेंड करता है। तो समझते हैं कि प्लेटलेट काउंट अगर बढ़ गए, प्लेटलेट ज्यादा है, तो इसका क्या मतलब है? तो इसको कहते हैं थ्रोम्बोसाइटोसिस। बनाने में प्लेटलेट का कम है, इसलिए जो भी टर्मिनोलॉजी थ्रोम्बो का, उसमें नाम आएगा। इंक्रीज प्लेटलेट काउंट। तो प्लेटलेट काउंट कब बढ़ेंगे? जैसा हमने समझा था कि बोन मैरो में ज्यादा बन रहे हैं, या फिर डिस्ट्रक्शन उसका कम हो रहा है। तो ऐसे कंडीशन में हमारे जो प्लेटलेट काउंट बढ़ जाएंगे। इसके दो कारण हैं। जो एक एरिथ्रोपोइटिन नाम का एक हार्मोन होता है, जो किडनी से सीक्रेट होता है और जो बोन मैरो को स्टिम्युलेट करता है आरबीसी बनाने के लिए। उसके कुछ एक्शंस जो प्लेटलेट बनाने वाले सेल्स हैं, उसके ऊपर भी होता है, जिसके कारण से बहुत ज्यादा प्लेटलेट बनने शुरू हो जाते हैं। तो जिस-जिस कंडीशन में ये एरिथ्रोपोइटिन बढ़ेगा, उस कंडीशन में हमारा प्लेटलेट काउंट भी बढ़ेगा। पर एग्जांपल, अगर किसी को क्रॉनिक एनीमिया है, तो उसमें लेवल ज्यादा रहेगा। अगर कोई हाई एल्टीट्यूड में है, तो उसमें लेवल ज्यादा रहेगा और एरिथ्रोपोइटिन का लेवल इसके प्लेटलेट भी बढ़ा देगा। अगर कोई इंजेक्शन ले रहा है, पर एग्जांपल, जो एनीमिया ऑफ क्रॉनिक डिजीज में आप समझोगे कि रीनल डिजीज का पेशेंट है, उसको आप ब्लड ट्रांसफ्यूजन नहीं देना चाहते, क्योंकि आगे चलकर उसको किडनी ट्रांसप्लांट लगने वाला है और अगर आप किसी डोनर का ब्लड दे रहे हैं, तो उसका सेंसिटाइजेशन होता है। तो आप उसको इंजेक्शन दे रहे हैं, लेकिन साथ-साथ प्लेटलेट काउंट को भी बढ़ाएगा। ठीक है? दूसरा, अगर कोई बोन मैरो हाइपर फंक्शन कर रहा है, या फिर डिसऑर्डर्स हैं, तो एडिशन में भी आपके प्लेटलेट काउंट बढ़ जाते हैं। पॉलीसैथेमिया वेरा, अगेन माइनर प्रोलीफेरस है, उसमें आपका प्लेटलेट काउंट ज्यादा मिलेगा। तीसरा, हमने समझा था कि अगर प्लेटलेट डिस्ट्रक्शन कम हो रहा है। पर एग्जांपल, हमने समझा था कि डब्ल्यूबीसी, प्लेटलेट्स जाके जो पुराने होते हैं, वो स्प्लीन में डिस्ट्रॉय होते हैं। अगर आपने स्प्लीन निकालना पड़ा किसी कारण से पेशेंट का, तो उनका प्लेटलेट काउंट बढ़ जाएगा, क्योंकि जो पुराने प्लेटलेट्स हैं, वो जल्दी डिस्ट्रॉय नहीं होंगे। वो सर्कुलेशन में ज्यादा रहेंगे, जिसके कारण से इनका काउंट बढ़ के आएगा। तो इस प्रकार, अगर समझो कि किसी का हीमोग्लोबिन का कंसंट्रेशन कम है, उसको आरडीडब्ल्यू उसके बढ़े हुए हैं और उसके प्लेटलेट काउंट बढ़े हुए हैं, तो इसका डायग्नोसिस आयरन डिफिशिएंसी का वोट देकर बता सकते हैं। उसका आयरन स्टडीज भेजिए, बढ़ के आएगा। आयरन डिफिशिएंसी आएगी, आप उसको एडिक्वेटली ट्रीट कर सकेंगे, कॉन्फिडेंटली ट्रीट कर सकें। इसके अलावा एक चीज जो हमको समझनी है कि जैसे इंफेक्शन और इन्फ्लेमेशन में आपका डब्ल्यूबीसी काउंट बनता है, वह ऐसा ही प्लेटलेट भी एक्यूट फेज रिएक्टेंट है। मतलब जब भी बॉडी में कोई इन्फ्लेमेशन या इंफेक्शन आता है, तो बॉडी प्लेटलेट का अकाउंट बढ़ा देती है। तो वन ऑफ द रीजन फॉर इंक्रीज प्लेटलेट काउंट जो हम देखें, वो क्रॉनिक इंफेक्शन या क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन है। ना? तो हमने देखा था कि जो भी क्रॉनिक इन्फ्लेमेटरी डिजीज है, जिसमें मैं कुछ जैसे रूमेटाइड आर्थराइटिस, काउंट आपके ज्यादा रह सकते हैं। और अगर उसके प्लेटलेट काउंट कम हुए हैं, तो वह अलग आदित्य में जा रहा है, जैसे माइक्रोफाई का एक्शन करें, उसके कॉम्प्लिकेशंस हैं। तो उसमें हम जनरल प्लेटलेट काउंट। अगेन, इसको जब प्लेटलेट काउंट कम होते हैं, तो इसको हम बोलते हैं थ्रोम्बोसाइटोपेनिया। और जैसा हमने समझा था कि बोन मैरो में प्लेटलेट बनते हैं और बाहर अगर वो जाते हैं, तो उसको स्प्लीन में डिस्ट्रॉय होता है। यह नॉर्मल चीज है। लेकिन किसी कारण से अगर आपके प्लेटलेट बन ही नहीं रहे, जो बोन मैरो वो कम नहीं कर रहा। क्यों कम नहीं कर रहा? क्योंकि एप्लास्टिक एनीमिया है, या फिर बोन मैरो होने वाले ड्रग्स। ये पर एग्जांपल, आप किसी चीज के लिए, किसी की उम्र के लिए दे रहे हो, तो आपके प्लेटलेट काउंट कम होंगे। या फिर बोन मैरो इंफिल्ट्रेट हो चुके हैं। बोन मैरो को इंफिल्ट्रेट पहुंच चुके हैं। वहां पे वाउचर डिजीज के कारण इनफिल्ट्रेटर्स हैं, या फिर कोई मैलिनेंसी बोन मैरो में जाके बैठी हुई है, जिसके कारण से बोन मैरो काम नहीं कर रहा है, तो आपका जो थ्रोम्बोसाइटोपेनिया मिलेगा और ये क्यों हुआ? क्योंकि प्रोडक्शन ही उसका कम हुआ। अब अगर प्लेटलेट ज्यादा डिस्ट्रॉय हो रहे। अब डिस्ट्रॉय हो रहा है, तो कुछ एंटीबॉडीज बॉडी में बने हुए हैं, जो प्लेटलेट को डिस्ट्रॉय कर रहे हैं। और एग्जांपल लिया है, या होम्योपैथिक थ्रोम्बोसाइटोपेनिया, जिसमें कुछ प्लेटलेट काउंट बनते हैं, जो डिस्ट्रॉय करते हैं। या किसी पेशेंट को बार-बार प्लेटलेट देना पड़ा है और उसके बॉडी में अभी प्लेटलेट के एंटीबॉडीज तैयार हो गए, जो उसको प्लेटलेट को डिस्ट्रॉय कर रहे हैं। यह टीटीपी में थ्रोम्बोटिक थ्रोम्बोसाइटोपेनिक परपुरा है, या फिर नियोनेटल इम्यून थ्रोम्बोसाइटोपेनिया है। जैसे मदर के बॉडी में कुछ एंटीबॉडीज हैं, जो प्लेसेंटा को क्रॉस करके न्यूबॉर्न के बॉडी में आए हैं और उसके प्लेटलेट को डिस्ट्रॉय कर रहे हैं। तो उसके प्लेटलेट आपको कम मिलेंगे और उसके हिसाब से आपको आपको डायग्नोसिस सस्पेक्ट करना पड़ेगा। अब इसको कैसे समझना? उसके लिए भी एक पैरामीटर है, उसको समझेंगे। सबसे पहले कॉसेस समझ लेते हैं। फिर वैस्कुलाइटिस। वैस्कुलाइटिस मतलब आपके कोई वैस्कुलाइटिस के जो डिजीज हैं, पर एग्जांपल, हेमोलाइटिक यूरिमिक सिंड्रोम है, हेल्प सिंड्रोम जो प्रेगनेंसी में होता है, या डेंगू है, उसमें वैस्कुलाइटिस के कारण प्लेटलेट डिस्ट्रॉय होते हैं। मतलब जो वेसल हैं, छोटे-छोटे वेल्स हैं, उसके इन्फ्लेमेशन के कारण आपके प्लेटलेट लॉस होते हैं। अब ये जो पैथोलॉजी है, ये ओवरलैप कर सकती है। मतलब एक ही डिसीजन में दो तरह से प्लेटलेट भी डिस्ट्रॉय हो सकते हैं। पर एग्जांपल, अगर इंक्रीज कंजप्शन है, मतलब जो प्लेटलेट है, वो बहुत ज्यादा यूज हो रहा है, जिसके कारण से उनका कम काउंट कम हो जाए। पर एग्जांपल, डीआईसी है। डीआईसी में क्या होता है कि ब्लड वेसल के अंदर ही प्लॉट बनने चालू हो जाते हैं। डीआईसी प्रोसेस के कारण, तो प्लॉट बनने में प्लेटलेट यूटिलाइज हो जाता है, इसलिए प्लेटलेट का काउंट कम हो जाता है। और हेल्प सिंड्रोम में भी कभी-कभी ऐसा होता है। उसमें कंजप्टिव को आप लोग बैठे भी रहता है और साथ में आपके जो वैस्कुलर भी कंपोनेंट रहता है। और चौथा कंपोनेंट जो हम समझे कि जो स्प्लीन है, वो बहुत ज्यादा प्लेटलेट को अगर डिस्ट्रैक्ट कर रहा है, तो इसके कारण से भी प्लेटलेट काउंट आपका ड्रॉप हो जाएगा।
इसका प्लेटलेट का वॉल्यूम। जैसा हमने समझा था कि हमने उसको देखा था कि आरडीडब्ल्यू रहता है, रेड सेल डिस्ट्रीब्यूशन वेटर है। वैसे प्लेटलेट डिस्ट्रीब्यूशन वेटर है और जैसा हम मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम देखते थे, एमसी देखते थे, वैसे मीन प्लेटलेट वॉल्यूम रहता है। इसको देख के आप ये अंदाज़ लगा सकते हैं कि ये डिक्रीज प्रोडक्शन के कारण प्लेटलेट कम हुए हैं या फिर इंक्रीज डिस्ट्रक्शन के कारण प्लेटलेट कम हुए हैं। एक और कॉन्सेप्ट जो हमको समझना है, वो है मीन प्लेटलेट वॉल्यूम के बारे में। तो मीन प्लेटलेट वॉल्यूम मतलब प्लेटलेट के साइज कैसे हैं? जैसा हमने समझा था कि बोन मैरो प्लेटलेट है। उनके कम होने का कारण या तो डिक्रीज प्रोडक्शन है या फिर इंक्रीज डिस्ट्रक्शन है। तो एक मीन प्लेटलेट वॉल्यूम बहुत से सीबीसी के रिपोर्ट में हमको मिलता है। तो अगर यह मिलता है, तो इससे हम अंदाज़ लगा सकते हैं कि प्लेटलेट वन कम रहे या डिस्ट्रॉय ज्यादा हो रहा है। अगेन, वैल्यूज याद रखने की जरूरत नहीं है, वो स्ट्रिप में आपको मिल जाएंगे। तो इसके अलावा एक प्लेटलेट डिस्ट्रीब्यूशन डिस्ट्रीब्यूशन होता है, वैसे प्लेटलेट डिस्ट्रीब्यूशन वेटर होता है। तो अगर यह दिखता है कि उसके साइज में कितना वेरिएशन, प्लेट छोटे-बड़े कितने हैं, तो वो इंडिकेट कर रहा है कि वो आपके प्लेटलेट जो हैं, वो इमैच्योर ब्लड में ज्यादा आ रहे हैं। मतलब जो इमैच्योर प्लेटलेट्स होते हैं, वो बोन मैरो में जब प्लेटलेट मैच्योर होते हैं, तो स्टार्टिंग में उनका साइज बड़ा रहता है। जैसे-जैसे वो मैच्योर होते हैं, उनका साइज कम-कम होते आता है। अगर आपके मीन प्लेटलेट वॉल्यूम ज्यादा है, मतलब ब्लड में प्लेटलेट की डिमांड ज्यादा है। वो बोल रहा है कि ज्यादा प्लेटलेट भेजो। प्लेटलेट कम हो रहे हैं और प्लेटलेट कम क्यों हो रहे हैं? क्योंकि उसका पेरिफेरल डिस्ट्रक्शन ज्यादा हो रहा है। तो अगर आपका मीन प्लेटलेट वॉल्यूम बढ़ रहा है, मतलब आपके जो प्लेटलेट्स हैं, उसकी डिमांड ज्यादा है। बॉडी को प्लेटलेट ज्यादा है और रिटायर है और जो है, वो प्लेटलेट पेरिफेरी में डिस्ट्रॉय हो रहे हैं। तो अगर आपका मीन प्लेटलेट वॉल्यूम बढ़ा हुआ है और आपके प्लेटलेट काउंट कम हो रहे हैं, मतलब आपके प्लेटलेट पेरिफेरी में डिस्ट्रॉय हो रहा है। क्यों हो रहा है? क्योंकि आपके इसमें एंटीबॉडीज हैं, टॉक्सिंस हैं, और कुछ ऐसे इंफेक्शन हैं जो प्लेटलेट को डिस्ट्रॉय कर रहे हैं। ठीक है? लेकिन अगर आपका मीन प्लेटलेट वॉल्यूम बढ़ा हुआ है और प्लेटलेट काउंट बढ़ गया है, मतलब आपका बोन मैरो ज्यादा प्लेटलेट प्रोड्यूस कर रहा है। उसको ज्यादा प्लेटलेट बढ़ाने के ऑर्डर्स मिल रहे हैं। क्यों मिल रहे हैं? या तो कुछ एंडोक्राइन म्यूटेशन है, या फिर उसको थ्रोम्बोपोइटिन के इंजेक्शन से लगे, जिसके कारण से उसका मीन प्लेटलेट वॉल्यूम भी बढ़ा है और थ्रोम्बोसाइटोसिस के कारण से उसके प्लेटलेट काउंट भी बढ़े हुए हैं। तो इंक्रीज मीन प्लेटलेट वॉल्यूम इंडिकेट करता है कि बोन मैरो हाइपर फंक्शन कर रहा है। मतलब बोन मैरो आपका नॉर्मल है। तो एक चीज पक्की है कि इसका बोन मैरो अच्छे से काम कर रहा है। तो इसका मतलब है कि इसका बोन मैरो काम नहीं कर रहा। इसका बोन मैरो सरप्राइज हो गया है, जिसके कारण से प्लेटलेट नहीं बन रहे। तो आप उसको समझ सकते हैं कि यह एप्लास्टिक एनीमिया में ऐसा कंडीशन हो सकता है, या किसी ड्रग्स के कारण बोन मैरो सप्रेश भी हो गया, तो भी उसके मीन प्लेट वॉल्यूम कम होंगे। तो अगर आपका मीन प्लेट वॉल्यूम कम है, आपके प्लेटलेट कम हैं, तो जैसा हमने समझा, बोन मैरो फेलियर है। पहले बार के कारण कुछ भी रह सकता है, ये एप्लास्टिक एनीमिया है, या ड्रग्स रह सकता है। अगर आपका मीन प्लेटलेट वॉल्यूम कम हुआ है, लेकिन प्लेटलेट नॉर्मल है, तो आपने इसको क्रॉनिक किडनी डिजीज के बारे में सोचना चाहिए। तो क्रॉनिक किडनी डिजीज जो रहता है, उसमें आपका मीन प्लेटेड वॉल्यूम कम होगा, लेकिन प्लेटलेट्स नॉर्मल रहेंगे। अगर मीन प्लेटलेट वॉल्यूम कम हुआ है और आपके प्लेटलेट बड़े हैं, तो ये इंफेक्शन भी हो सकता है, इन्फ्लेमेशन भी हो सकता है, और कैंसर भी हो सकता है। तो जो इंफेक्शन पैरामीटर है, वो हर तरह से काम करता है। वो आपके प्लेटलेट को डिस्ट्रॉय भी कर सकता है, जिसके कारण से आपके प्लेटलेट कम हो गए। वो बोन मैरो को सप्रेश भी कर सकता है। पर एग्जांपल, कोई अगर वायरल इंफेक्शन है, तो बहुत बार बोन मैरो को सप्रेश करके आपका जो प्लेटलेट काउंट है, उसको कम कर देता है। तो ऐसे कंडीशन में आपका मीन प्लेट वॉल्यूम कम रहेगा। अगर वो आपके प्लेटलेट को डिस्ट्रॉय कर रहा है, तो आप मीन प्लेट वॉल्यूम ज्यादा रहेगा। और अगर समझो, प्लेटलेट काउंट नॉर्मल भी है, या फिर कभी-कभी प्लेटलेट काउंट बढ़ भी गया है, तो भी वो इंफेक्शन रह सकता है। तो इंफेक्शन हर तरीके से प्रेजेंट कर सकता है।
इसके अलावा अगर हम देखेंगे, तो सीबीसी में हमको बहुत कम रहता है, लेकिन किसी-किसी चीज में बहुत ज्यादा बढ़ जाते हैं। परसेंटेज बहुत ज्यादा बढ़ा हुआ मिलता है। तो ऐसे इसमें सारे एलर्जिक कंडीशन हमको सस्पेक्ट करना है। तो एलर्जिक कंडीशन [संगीत] एस्केरिस के इंफेक्शंस हो गए। इसमें आपका बॉडी का जो है, एलर्जिक रिस्पांस रहता है, वो पैरासाइट को, जिसके कारण से आपकी ईोसिनोफिल काउंट बढ़े हुए मिलते हैं। फिर जो बेसोफिल, कुछ मैलिनेंसीज हैं, स्पेसिफिक अगर वो ईोसिनोफिल के प्रोजेक्टर को अगर वो स्टिम्युलेट कर रहा है, तो आपकी ईोसिनोफिल के काउंट बढ़ेंगे। मोस्ट ऑफ द टाइम एलर्जी, क्रॉनिक डिजीज या फिर इसके टाइप्स से बढ़ते हैं। लेड पॉइजनिंग में थोड़े से बढ़ सकते हैं। तो बेसोफिल्स मोस्ट ऑफ द टाइम्स बहुत ज्यादा बड़े नहीं रहते। इसका बहुत ज्यादा सिग्निफिकेंट कंट्रीब्यूशन आप डायग्नोसिस में नहीं रहता। पर मोनोसाइट्स बहुत ज्यादा बड़े हैं, मोनोसाइटोसिस, जिसके बोलते हैं, तो ऐसे कंडीशन में क्रॉनिक डिजीज आपको सस्पेक्ट करने हैं। क्रॉनिक वायरल डिजीज है, क्रॉनिक बैक्टीरियल डिजीज है, पर एग्जांपल, जिसमें अगर स्पेसिफिकेशन मिलता है, तो ऐसे कंडीशन में आपके ये काउंट्स बढ़े हुए मिलेंगे। तो इस प्रकार से अगर हम सीबीसी को ध्यान से देखें, तो हम बहुत सारे कंडीशन को डायग्नोस कर सकते हैं।