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सुनो जनक और सुनो तुम भी। यदि तुम यह मानते हो कि माया तुम्हें ठग रही है तो समझ लो कि तुम अभी तक माया को पहचान ही नहीं पाए। क्योंकि माया कभी किसी को ठगती नहीं। ठगता है केवल तुम्हारा अज्ञान। माया तो एक खेल है, एक व्यवस्था है, एक पर्दा है। लेकिन जो इस पर्दे को सत्य मान लेता है, वही हर जन्म में लुटता है।
अष्टावक्र कहते हैं कि माया से लड़ने वाला कभी मुक्त नहीं होता और जो माया से भागता है, वह भी उसी का गुलाम रहता है। मुक्ति केवल उसे मिलती है जो माया को समझ लेता है। और जब समझ आ जाती है तब माया स्वयं हार मान लेती है।
माया का अर्थ संसार नहीं है। यह बहुत बड़ी भूल है। संसार तो केवल दृश्य है। माया वह है जो तुम्हें यह विश्वास दिला दे कि यही दृश्य सत्य है। माया वह है जो तुम्हें शरीर कह दे, मन कह दे, नाम और पहचान में कैद कर दे। माया तुम्हें यह कहती है कि तुम अधूरे हो कि तुम्हें कुछ पाना है, कुछ बनना है, कहीं पहुंचना है। और जैसे ही तुमने यह मान लिया, उसी क्षण तुम ठग लिए गए। क्योंकि आत्मा कभी अधूरी नहीं होती। आत्मा कभी कुछ पाने नहीं जाती। आत्मा तो सदा पूर्ण है।
अष्टावक्र जनक से कहते हैं कि जनक तू जिस संसार को पकड़ने की कोशिश कर रहा है, वह तो सपना है और जो सपना पकड़ने की कोशिश करता है, वह जाग नहीं सकता। माया का सबसे बड़ा धोखा यही है कि वह स्वयं को बहुत ठोस दिखाती है। सुख ठोस लगता है, दुख ठोस लगता है, संबंध ठोस लगते हैं। हानि और लाभ ठोस लगते हैं। लेकिन जो देख रहा है, वह कभी ठोस नहीं होता। वह तो सदा अचल रहता है। वही आत्मा है।
माया को ठगने का पहला सूत्र यह है कि तुम यह देखना सीखो कि जो बदल रहा है वह तुम नहीं हो। शरीर बदल रहा है। मन बदल रहा है। भावनाएं बदल रही हैं। विचार बदल रहे हैं। बचपन गया, जवानी आई, जवानी जा रही है, बुढ़ापा आएगा। यदि तुम यह सब देख पा रहे हो तो स्पष्ट है कि तुम यह सब नहीं हो। फिर भी तुम इन्हीं को अपना सत्य मान लेते हो। यही माया का जाल है।
माया तुम्हें डर के माध्यम से बांधती है। मृत्यु का डर, असफलता का डर, अकेलेपन का डर, कुछ खो देने का डर। लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि जो डर रहा है वह मन है। आत्मा कभी डरती नहीं। आत्मा तो केवल देखती है। जब तुम डर को देखते हो तब डर कमजोर पड़ने लगता है। लेकिन जब तुम डर बन जाते हो तब माया जीत जाती है।
माया तुम्हें इच्छा के माध्यम से गुलाम बनाती है। इच्छा चाहे संसार की हो या मोक्ष की दोनों ही बंधन है। क्योंकि इच्छा का अर्थ है कि तुम अभी पूरे नहीं हो और आत्मा कभी अपूर्ण नहीं होती। अष्टावक्र बहुत स्पष्ट हैं। वे कहते हैं कि जब तक तुम्हारे भीतर कुछ भी चाह बाकी है तब तक तुम माया के राज्य में हो। जिस दिन भीतर से यह अनुभूति आ जाती है कि मुझे कुछ नहीं चाहिए, उसी दिन माया का सारा व्यापार बंद हो जाता है।
माया को ठगने का दूसरा सूत्र है साक्षी भाव। साक्षी बन जाना कोई साधना नहीं है। कोई अभ्यास नहीं है। कोई प्रयास नहीं है। यह केवल एक स्मरण है। स्मरण की मैं देखने वाला हूं। विचार आते हैं मैं उन्हें देखता हूं। भावनाएं उठती हैं। मैं उन्हें देखता हूं। सुख आता है मैं उसे देखता हूं। दुख आता है मैं उसे देखता हूं। मैं उसे देखता हूं। जो देख रहा है वही आत्मा है और जो देखा जा रहा है वही माया है। जिस दिन यह भेद स्पष्ट हो जाता है उसी दिन माया अपना असर खो देती है।
अष्टावक्र कहते हैं कि संसार को छोड़ना नहीं है। संसार से भागना नहीं है और संसार में डूबना भी नहीं है। यह तीनों ही अज्ञान है। संसार में रहते हुए उससे असंपृक्त रहना ही माया को ठगना है। जैसे कमल जल में रहता है, लेकिन जल उसे भिगोता नहीं, वैसे ही साधक संसार में रहता है। लेकिन संसार उसे बांध नहीं पाता।
माया तुम्हें कर्ता बनाकर बांधती है। वह कहती है तू कर रहा है, तू भोग रहा है, तू जिम्मेदार है। और जैसे ही तुमने स्वयं को कर्ता माना, अहंकार पैदा हुआ और अहंकार के साथ ही बंधन। अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मा कभी कुछ करती नहीं। सब कुछ शरीर और मन के स्तर पर होता है। आत्मा तो केवल साक्षी है। यह जान लेना ही परम ठगी है। माया के साथ की गई सबसे बड़ी ठगी।
माया तुम्हें भविष्य में ले जाकर ठगती है। वह कहती है कल सुख मिलेगा, कल शांति मिलेगी, कल सफलता मिलेगी, कल मोक्ष मिलेगा और तुम वर्तमान को खो देते हो। लेकिन आत्मा केवल वर्तमान में है। जो भविष्य में जी रहा है, वह माया का गुलाम है। जो अभी मैं ठहर गया, वही मुक्त है।
अष्टावक्र कहते हैं कि जनक तू जिस सत्य की खोज कर रहा है, वह कहीं दूर नहीं है। वह तेरे भीतर है। लेकिन तू बाहर देख रहा है इसलिए चूक रहा है। जैसे आंख स्वयं को नहीं देख सकती। वैसे ही आत्मा को देखने के लिए भीतर मुड़ना पड़ता है। यह भीतर मुड़ना ही ध्यान है और ध्यान कोई करना नहीं है। ध्यान तो केवल होना है।
माया को ठगने का सबसे गहरा सूत्र यह है कि तुम कुछ बनने की इच्छा छोड़ दो। साधक बनने की भी नहीं, ज्ञानी बनने की भी नहीं, मुक्त बनने की भी नहीं। क्योंकि बनना ही बंधन है। आत्मा कभी कुछ नहीं बनती। वह तो सदा वही रहती है। जब यह चाह गिर जाती है कि मुझे कुछ बनना है। उसी क्षण आत्मा प्रकट हो जाती है।
अष्टावक्र कहते हैं कि जब तू मौन में बैठता है तब आत्मा स्वयं बोलने लगती है। यह मौन केवल वाणी का नहीं मन का मौन है। जब विचारों की हलचल शांत हो जाती है तब जो शेष बचता है वही तू है। वही आत्मा है। वही ब्रह्म है। और जनक याद रखना माया को हराने का कोई युद्ध नहीं है। माया को जीतने का कोई प्रयास नहीं है। माया केवल अज्ञान से जीवित रहती है। जैसे ही ज्ञान का प्रकाश आता है, माया स्वयं विलीन हो जाती है। जैसे अंधकार को हटाना नहीं पड़ता। केवल दीप जलाना पड़ता है। तू दीप जला तू देखना सीख तू साक्षी में ठहर और फिर देख माया कैसे स्वयं हार मान लेती है।
सुनो जनक अब बात और सूक्ष्म होने वाली है। क्योंकि जो माया संसार में लोगों को ठगती है वह तो साधारण है। असली खतरा उस माया से है जो साधकों को ठगती है। जो ध्यान करने वालों को ठगती है। जो ज्ञान की बातें करने वालों को ठगती है। अष्टावक्र कहते हैं कि जिसने संसार छोड़ दिया, लेकिन स्वयं को ज्ञानी मान लिया, वह पहले से भी अधिक गहरे बंधन में चला गया। क्योंकि अब उसका अहंकार साधारण नहीं रहा, वह आध्यात्मिक हो गया। माया का सबसे खतरनाक रूप यही है कि वह तुम्हें यह विश्वास दिला दे कि अब मैं जान गया, अब मैं अलग हूं। अब मैं साधारण लोगों जैसा नहीं हूं। जैसे ही यह भाव भीतर उठता है, उसी क्षण समझ लेना कि माया ने नया जाल बिछा दिया है।
अष्टावक्र बहुत कठोर है इस बिंदु पर। वे कहते हैं कि जो स्वयं को ज्ञानी मानता है, वह भी अज्ञान में है। क्योंकि आत्मा कभी स्वयं को ज्ञानी नहीं कहती। ज्ञानी होने का भाव मन का होता है। आत्मा का नहीं।
माया तुम्हें साधना के माध्यम से भी ठगती है। वह कहती है और करो और बैठो और जपो और त्यागो और संयम रखो। प्रारंभ में यह ठीक है क्योंकि बिखरे हुए मन को एक दिशा चाहिए। लेकिन अगर तुम जीवन भर करने में ही फंसे रह गए तो तुम चूक जाओगे। अष्टावक्र कहते हैं कि साधना का अंतिम उद्देश्य साधना से मुक्त होना है। जिस दिन साधना भी छूट जाती है उसी दिन आत्मा प्रकट होती है।
माया तुम्हें तुलना के माध्यम से बांधती है। तुम दूसरे साधकों को देखते हो। दूसरे ध्यानियों को देखते हो और भीतर ही भीतर तुलना शुरू हो जाती है। कोई आगे है, कोई पीछे है। लेकिन आत्मा में ना आगे है ना पीछे। तुलना केवल अहंकार करता है और जहां अहंकार है वहां माया जीवित है।
माया तुम्हें अनुभवों से ठगती है। ध्यान में प्रकाश दिखा, ऊर्जा चली, शरीर हल्का हुआ, आनंद आया और तुम समझ बैठे कि यही आत्मा है। अष्टावक्र कहते हैं, जो भी अनुभव किया जा सकता है, वह आत्मा नहीं है। क्योंकि आत्मा अनुभव करने वाला है। अनुभव नहीं। अनुभव आते हैं और जाते हैं। आत्मा सदा रहती है। जो अनुभवों में उलझ गया वह साक्षी से हट गया।
माया तुम्हें सुख के माध्यम से भी बांधती है। वह कहती है यह ध्यान अच्छा है। यह शांति अच्छी है। यह आनंद अच्छा है। और तुम उस आनंद को पकड़ना चाहते हो। लेकिन जो पकड़ा जा सकता है, वह खो भी सकता है। आत्मा को पकड़ा नहीं जा सकता। आत्मा तो केवल होने में प्रकट होती है। जिस दिन तुम आनंद को पकड़ना छोड़ देते हो उसी दिन असली आनंद उतरता है।
अष्टावक्र कहते हैं कि जनक ध्यान रखना माया केवल दुख में नहीं होती सुख में भी होती है। जो दुख में फंसा है वह भी बंधा है और जो सुख में फंसा है वह भी बंधा है। बंधन का कारण सुख या दुख नहीं है। बंधन का कारण है तादात्म। जब तुम कहते हो मैं दुखी हूं या मैं सुखी हूं तो तुम बंधा हो। हूं तब तुम मन बन गए। लेकिन जब तुम कहते हो दुख है, सुख है तब तुम साक्षी में हो।
माया तुम्हें पहचान के माध्यम से ठगती है। कोई स्वयं को भक्त मानता है। कोई योगी, कोई ज्ञानी, कोई साधक। लेकिन आत्मा की कोई पहचान नहीं होती। पहचान मन की होती है। आत्मा तो नाम रूप से परे है। जिस दिन तुम अपनी पहचान को भी देखना सीख लेते हो, उसी दिन माया कमजोर पड़ जाती है।
माया तुम्हें समय के माध्यम से बांधती है। वह कहती है अभी नहीं धीरे-धीरे एक दिन भविष्य में लेकिन आत्मा समय से परे है। आत्मा केवल अभी में है। जो अभी में नहीं है वह आत्मा में नहीं है। अष्टावक्र कहते हैं कि मुक्ति भविष्य की घटना नहीं है। मुक्ति अभी की पहचान है।
माया तुम्हें सुधार के माध्यम से भी ठगती है। वह कहती है अपने दोष सुधारो। अपने विकार हटाओ। पहले शुद्ध बनो। लेकिन अष्टावक्र कहते हैं कि आत्मा कभी अशुद्ध थी ही नहीं। सुधार मन को चाहिए आत्मा को नहीं। जब तुम स्वयं को अशुद्ध मानते हो तब तुम माया की बात मान लेते हो। आत्मा को पहचानते ही यह झूठ गिर जाता है।
माया को ठगने का सबसे गहरा उपाय यह है कि तुम कुछ भी पकड़ो मत। ना संसार, ना त्याग, ना ज्ञान, ना अनुभव, ना आनंद, जो पकड़ता है वही बनता है। और जो छोड़ देता है वही मुक्त होता है। लेकिन यह छोड़ना प्रयास से नहीं होता। यह छोड़ना समझ से होता है।
अष्टावक्र कहते हैं कि जनक तू जितना सरल होता जाएगा उतना ही सत्य के निकट आएगा। जटिलता मन की है। आत्मा अत्यंत सरल है। इतनी सरल कि मन उसे स्वीकार ही नहीं कर पाता। क्योंकि मन को कुछ करना है, कुछ पाना है। आत्मा में कुछ करना नहीं, कुछ पाना नहीं, केवल होना है।
और जनक अंतिम ठगी यह है कि तू स्वयं को साधक समझता है। जिस दिन यह भाव भी गिर जाएगा कि मैं साधक हूं, उसी दिन साध्य प्रकट हो जाएगा। क्योंकि साधक और साध्य के बीच का अंतर ही माया है। जब यह अंतर मिटता है तब केवल आत्मा बचती है।
अष्टावक्र कहते हैं चुप रहो देखो और कुछ मत करो और यह कुछ मत करो आलस्य नहीं है। यह परम जागरूकता है। जब कुछ भी करने की इच्छा गिर जाती है, तब जो शेष रहता है, वही ब्रह्म है। और जनक जब तू यह देख लेता है कि माया तुझे ठग नहीं रही थी। तू स्वयं ही अपने को ठग रहा था। उसी क्षण सारा खेल समाप्त हो जाता है क्योंकि अब ठगने वाला ही नहीं बचता। अब ना माया बचती है ना बंधन ना साधक ना साधना वस्तु बचता है। शुद्ध मौन साक्षी।