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आज के इस वीडियो में मैं दो तथ्यों पर बात करने वाला हूँ: पहला, मौर्यों की उत्पत्ति, और दूसरा, अशोक के अभिलेखों में चाणक्य का उल्लेख।
मौर्यों की उत्पत्ति को लेकर विद्वानों और इतिहासकारों में मतभेद है। लेकिन अधिकतर लोग यह मानते हैं कि मौर्यों की उत्पत्ति चंद्रगुप्त मौर्य से हुई है और इसमें चाणक्य का सहयोग था। चाणक्य ना होते तो मौर्य वंश का उदय ही नहीं होता। चंद्रगुप्त मौर्य की माता का नाम मुरा बताया जाता है, जो कि सच नहीं है। लेकिन इस वीडियो में मैं आपको बताऊँगा कि मौर्य वंश का नाम मौर्य कैसे पड़ा, इनकी उत्पत्ति कैसे हुई, और इसके पीछे का इतिहास क्या है। सब कुछ आपको इस वीडियो में विस्तार से बताऊँगा। आप लोग इस वीडियो को पूरा देखो। वीडियो ज्यादा बड़ा नहीं है, छोटा सा ही वीडियो है, लेकिन जानकारी आपको बहुत ही महत्वपूर्ण मिलने वाली है। तो आइए, वीडियो की शुरुआत करते हैं। वीडियो की शुरुआत यहां से करेंगे।
पिपलीवन के मौर्य राजाओं ने सुना कि भगवान बुद्ध कुशी नारा में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए हैं। तब उन्होंने कुशी नारा के जो मल राजा थे, उनके यहाँ दूत के माध्यम से संदेश भेजा और संदेश में कहा कि भगवान बुद्ध भी क्षत्रिय थे, हम भी क्षत्रिय हैं; भगवान के शरीर का भाग पाने के हम भी अधिकारी हैं। यह उन्होंने कहा था। यह बात कब की है? भगवान बुद्ध की मृत्यु के समय की है। उनकी मृत्यु कहाँ हुई थी? कुशीनगर में हुई थी। तो उस समय जो कुशीनगर के मल राजा थे, उनके यहाँ पर पिपलीवन के मौर्य राजाओं ने संदेश भेजा था। पिपलीवन के मौर्य राजाओं को भगवान बुद्ध की चिता की राख प्रदान की गई थी। पिपलीवन के मौर्य राजाओं ने क्या किया था? अपनी राजधानी पिपलीवन में उसी राख के ऊपर अंगार स्तूप का निर्माण करवाया था। पिपलीवन के मौर्य राजा कपिलवस्तु के शाक्य से संबंधित थे तथा पिपलीवन के मौर्य राजा भगवान बुद्ध के समकालीन थे।
यहाँ से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि चंद्रगुप्त मौर्य से जो इतिहासकार कहते हैं कि मौर्य वंश का उदय हुआ, यह कहानी पूरी झूठी है। मौर्य वंश की जो चर्चा है, वह भगवान बुद्ध के समकालीन की गई है। पिपलीवन के मौर्यों के नाम से इसका विवरण बौद्ध ग्रंथों में भी मिलता है। यह आपको ध्यान रखना है। महावस्तु नामक ग्रंथ की टीका के अनुसार पिपलीवन के मौर्य राजा उसी कुल के थे जिस कुल में भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। यह बहुत ही महत्वपूर्ण तथ्य है। जिस कुल में भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, उसी कुल के पिपलीवन के मौर्य राजा थे। महावस्तु ग्रंथ की टीका आगे कहती है कि कौशल के राजा बिडुडब के द्वारा किए गए कपिलवस्तु पर आक्रमण के कारण पलायन करके पीपल के वृक्षों की बहुलता वाले वन में जाकर ये बस गए थे। कौन बस गए थे? कपिलवस्तु के शाक्य बस गए थे। क्यों बस गए थे? क्योंकि कौशल का एक राजा था, जिसका नाम था बिडुडब (ऐसे कई नाम और हैं, लेकिन बिडुडब मैंने यहाँ पर कहा है), और यह किसका पुत्र था? यह राजा प्रसेनजित का पुत्र था। इन्हीं पीपल के वृक्षों के कारण उस स्थान का नाम पिपलीवन पड़ा था। जो कपिलवस्तु के शाक्य इस स्थान पर बसे, वही मौर्य कहलाए। क्योंकि पिपलीवन में मोरों की संख्या अत्यधिक थी, उन्हीं मोरों के कारण इनका नाम मौर्य पड़ा था। यह आपको ध्यान रखना है। पिपलीवन को एक नगर के रूप में विकसित करने के लिए कपिलवस्तु के शाक्यों ने अपने आवासों को मोर की गर्दन के समान नीले रंग के पत्थरों से बनवाना शुरू किया था।
महावस्तु ग्रंथ की टीका के अनुसार पिपलीवन के मौर्य राजा मगध के मौर्य राजाओं के पूर्वज थे और मगध के राजा चंद्रगुप्त पिपलीवन के मौर्य राजा के पुत्र थे। यह बात आपको अच्छे से ध्यान में रखनी है। मगध के जो मौर्य राजा थे, जिनका इतिहास हम पढ़ते हैं, वे किसके वंशज थे? पिपलीवन के मौर्यों के वंशज थे। और पिपलीवन के मौर्य कौन थे? कपिलवस्तु के शाक्य थे। इसी कारण सम्राट अशोक स्वयं को बुद्ध का वंशज बताते हैं। जो इतिहासकार यह कहते हैं कि राजा अशोक ने धर्म परिवर्तन करके बौद्ध धर्म को स्वीकार किया था, यह तथ्य पूरी तरह से झूठा है। क्योंकि जो कपिलवस्तु के शाक्य थे, वही पिपलीवन में बसे, वही मौर्य कहलाए, उन्हीं मौर्यों ने मगध पर शासन किया। कौशल के राजा बिडुडब ने कपिलवस्तु को अपने अहंकार में नष्ट कर दिया था। क्योंकि राजा बिडुडब की माँ वासवदत्ता थी, जिसे कौशल के राजा प्रसेनजित ने अपनी पटरानी बनाया था। राजा प्रसेनजित को जब यह मालूम हुआ कि वासवदत्ता शाक्य की पुत्री नहीं, बल्कि एक दासी की पुत्री है, तो उसने वासवदत्ता को पद से हटा दिया था। वासवदत्ता ने इसकी शिकायत भगवान बुद्ध से की। भगवान बुद्ध ने क्या किया? कौशल के राजा प्रसेनजित को समझाया कि महा नाम की दासी के गर्भ से उत्पन्न हुई यह लड़की, महा नाम की पुत्री तथा शाक्य राजकुमारी है। भगवान बुद्ध की इस बात को कौशल के राजा प्रसेनजित ने स्वीकार किया और वासवदत्ता को फिर से पटरानी बनाया। परंतु वासवदत्ता के पुत्र राजा बिडुडब ने इसे अपनी माता का अपमान समझा। उसने राजा प्रसेनजित को गद्दी से हटाकर स्वयं को कौशल का राजा घोषित किया था। कौशल का राजा बनने के बाद बिडुडब ने क्या किया? कपिलवस्तु के शाक्यों पर आक्रमण किया। इस आक्रमण में अधिकतर शाक्यों की हत्या कर दी गई थी। कुछ शाक्यों को जीवित छोड़ दिया गया था। जिन शाक्यों को जीवित छोड़ दिया था, वही शाक्य पिपलीवन में जाकर बस गए थे। वही शाक्य बाद में पिपलीवन के मौर्य के नाम से इतिहास में जाने गए। और आजकल हम क्या पढ़ते हैं? कि मौर्य वंश का उदय कब हुआ? चंद्रगुप्त मौर्य के समय में हुआ। चाणक्य ने इसमें सहयोग किया। चाणक्य नहीं होते तो मौर्य वंश का उदय नहीं होता। चाणक्य ने एक शूद्र जाति के लड़के को मगध का राजा बनाया। यह कहानी आप लोगों ने बचपन से सुनी होगी। आसान भाषा में मिल जाती है। यह कहानी टीवी सीरियल में भी यही दिखाया जाता है। लेकिन वास्तव में यह कहानी सच नहीं है। जिनके वंशज मगध के राजा चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार और अशोक जैसे महान राजा हुए, वे पिपलीवन के मौर्य राजा थे। उन्हीं के वंशज कौन थे? चंद्रगुप्त मौर्य, बिंदुसार और अशोक।
प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेनसांग अपने भारत यात्रा विवरण में पिपलीवन के स्तूप के बारे में लिखते हैं। जब तथागत को महापरिनिर्वाण प्राप्त हुआ और उनका शरीर अवशेष बाँट दिया गया, उस समय कुछ ब्राह्मण लोग, जिन्हें कुछ नहीं मिला था, श्मशान में गए और चिता की कुछ बची हुई राख एकत्र कर ले आए। उन ब्राह्मणों ने उस राख पर एक स्तूप बनवाकर पूजा की। कैंब्रिज हिस्ट्री ऑफ़ इंडिया के पृष्ठ नंबर 191 और 42 के अनुसार मौर्य शब्द की उत्पत्ति भगवान बुद्ध के समकालीन हुई थी। मौर्य शब्द का उल्लेख शक राजा रुद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में भी आया है। अगर अभिलेखों की बात करें तो जूनागढ़ अभिलेख में मौर्य शब्द का उल्लेख मिलता है। मोरय शब्द से ही मुराई, मुराव, मुरिया, मोरिया, मौर्य, मोरे, मोर, मोरा, मयूर और अंत में मोर शब्द आया है। परंतु मूल शब्द मोरय को ही माना जाता है। यह आपको ध्यान रखना है। तो यहाँ से आप लोग यह जान गए होंगे कि मौर्यों की उत्पत्ति कैसे हुई। मौर्य कोई और नहीं थे, बल्कि कपिलवस्तु के ही शाक्य थे। कौशल के राजा बिडुडब ने जब कपिलवस्तु पर आक्रमण किया, तो उस आक्रमण में कई लोग मारे गए थे और जिस जगह पर अपने लोग मारे जाएँ, वहाँ रहना उचित नहीं होता है। इसीलिए ये लोग कपिलवस्तु को छोड़कर पिपलीवन में जाकर बस गए थे। कुछ लोग कपिलवस्तु में भी रहे, लेकिन कुछ लोग कपिलवस्तु से जाकर पिपलीवन में बस गए थे। जो पिपलीवन में बसे, वही मौर्य कहलाए। क्योंकि पिपलीवन में मोरों की संख्या अत्यधिक थी, उन्हीं मोरों के कारण ये मौर्य कहलाए। तो यह बात आप समझ गए होंगे।
अब थोड़ी सी बात करते हैं अशोक के अभिलेखों में चाणक्य का उल्लेख। क्योंकि कुछ लोग यह बात करते हैं कि चाणक्य का उल्लेख अशोक के अभिलेखों में किया गया है। तो मैं अशोक का एक अभिलेख आपको दिखाना चाहता हूँ, जो ब्रह्मगिरी का है। उसी में लोग यह कहते हैं कि इसमें चाणक्य का उल्लेख किया गया है। राजा अशोक का ब्रह्मगिरी शिलालेख आधुनिक कर्नाटक के चित्रदुर्ग जिले में है। इस शिलालेख की भाषा प्राकृत है और लिपि धम्म लिपि है। ब्रह्मगिरी शिलालेख के मूल लेख पर सबसे पहले बात करते हैं और यहाँ मैं आपको बता देता हूँ कि मूल लेख को मैंने हिंदी में लिखा हुआ है ताकि आप लोग उसे पढ़ सकें और इसका अनुवाद मैं आपको करके बताऊँगा कि क्या लिखा हुआ है। वह मैं आपको अच्छे से, एक-एक लाइन में क्या लिखा है, वह मैं आपको समझा दूँगा। पहली लाइन में लिखा है: 'से हे वंग देवांग पिए'। दूसरी लाइन में लिखा हुआ है: 'आ...' (इसके बाद कुछ अक्षर मिटे हुए हैं, इसीलिए यह डॉट डॉट डॉट आगे लगा हुआ है) 'माता पिती सु सुसु सिता विए' (इसके बाद फिर कुछ अक्षर मिटे हुए हैं, इसके बाद ये डॉट डॉट डॉट लगा हुआ है)। तो इसको आप यहाँ पर ध्यान रखें, मैं बार-बार नहीं बोलूँगा। 'गरु पाण सु दहित व्यंग सच' यह दूसरी लाइन में लिखा हुआ है। 'वत वियंग से इमे धम्म गुणा पतित विया हेमे अंत वासना' यह तीसरी लाइन में लिखा हुआ है। चौथी लाइन में लिखा हुआ है: 'अचर अचायर हंग पतित विय'। अगली लाइन में लिखा हुआ है: 'साशा पुराणा पकति दिस बसे चा स...' (इसके बाद कुछ अक्षर मिटे हुए हैं) 'हे वंग इस कट बए' (इसके बाद फिर कुछ अक्षर मिटे हुए हैं) आगे लिखा है: 'चपड़ लिखित लिपि करेड'। यह लिखा हुआ है। राजा अशोक का ब्रह्मगिरी शिलालेख का मूल लेख यह है। आप लोग खुद पढ़ सकते हो। इसका हिंदी अनुवाद क्या होगा, वह मैं आपको करके यहीं पर बताता हूँ। पहली लाइन में लिखा है: 'सो देवों के प्रिय इस प्रकार कहते हैं कि माता-पिता की सेवा करनी चाहिए।' इस प्रकार गुरुओं का सम्मान करना चाहिए, प्राणियों के प्रति दया की भावना रखनी चाहिए, सच बोलना चाहिए। सो यही धम्म गुण परिवर्तित होने योग्य है। इसी प्रकार सीमा के पास रहने वाले जो अंत्यवासी (शब्द का यहाँ पर प्रयोग किया गया है, तो अंत्यवासियों का मतलब होता है जो सीमा के पास रहते हैं) हैं, उनके द्वारा आचार्य आदरणीय हैं और उनके संबंधियों के प्रति अच्छा व्यवहार करना चाहिए। यही पुराणी प्रथा है। यहाँ पर हम आपको सरल भाषा में समझाने के लिए यह कहते हैं कि प्रथा है। वैसे पकति शब्द का प्रयोग यहाँ पर सम्राट अशोक ने किया है। यह दीर्घ आयु के लिए है। इसी प्रकार उसे करना चाहिए। यह चपड़ लिपिकार के द्वारा लिखा गया है। नीचे की लाइन में क्या लिखा है? 'चपड़ लिखित लिपि करण'। आपको यहाँ पर ध्यान रखना है इस बात का। इसमें किसी भी चाणक्य का कोई उल्लेख नहीं है। चपड़ एक लेखक थे, उनका यहाँ पर उल्लेख किया गया है। चाणक्य का उल्लेख नहीं किया गया है। तो उम्मीद है आपको यह बात समझ में आई होगी। [संगीत]