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10 साल बाद मां को रेड सिग्नल पर मिला अपना खोया हुआ बेटा | Rula Dene Wali Kahani

STORIAN VOICE17:32

Transcription

एक अमीर घर की महिला वंशिका हर दिन अपने पति हरीश के साथ कार में बैठकर शहर की भीड़भाड़ वाली सड़कों से होकर कार्यालय जाती थी। बाकी लोगों की तरह यह यातायात उनके लिए आम था। लेकिन लाल बत्ती पर रुकते ही कुछ ऐसा होता था जो वंशिका के दिल को छू जाता था। जब उनकी गाड़ी यातायात या बत्ती पर रुकती तो छोटे-छोटे बच्चे उनकी गाड़ी को घेर लेते। कोई सामान बेचता, कोई भीख मांगता और उन्हीं में से एक था आर्यन। वह दस से बारह साल का मासूम सा बच्चा था। कभी वह गुब्बारे लेकर दौड़ता हुआ उनकी कार के पास आता। कभी उसके हाथ में किताबें होतीं तो कभी वह रंग बिरंगे फूल बेचता। उसकी मासूमियत और मीठी बातें वंशिका को बहुत अच्छी लगती थीं।

एक दिन वह उनकी गाड़ी के पास आकर बोला, "आंटी, गुब्बारा ले लीजिए। रंग बिरंगे गुब्बारे हैं।" वंशिका मुस्कुराई और बोली, "मैं इनका क्या करूंगी?" आर्यन बोला, "आंटी, अपने बच्चे को दे देना। आपके बच्चे खुश हो जाएंगे।" वंशिका हंसते हुए बोली, "अरे, मेरे बच्चे नहीं हैं।" आर्यन ने मासूमियत से सिर हिलाया और कहा, "आंटी, ले लो ना, सुबह से एक भी नहीं बिका है।" उसकी यह बात वंशिका के दिल में उतर गई। उन्होंने आर्यन से दो गुब्बारे खरीदे और उनकी कार आगे बढ़ गई।

कई दिन बाद फिर से उसी बत्ती पर वंशिका को आर्यन खड़ा हुआ दिखाई दिया। लेकिन इस बार उसके हाथों में किताबें थीं। वंशिका ने मुस्कुरा कर पूछा, "क्या बात है? आज गुब्बारे नहीं हैं?" आर्यन बड़ी मासूमियत से बोला, "आंटी, गुब्बारे फट जाते हैं जिससे काफी नुकसान हो जाता है। आज आप किताब ले लीजिए। बस बीस रुपये की ही तो है।" जरूरत न होने के बावजूद वंशिका ने किताब खरीद ली। धीरे-धीरे उन दोनों के बीच एक अजीब सा लगाव पैदा होने लगा और वंशिका को आर्यन बहुत अच्छा लगने लगा। हर बार वहां से गुजरते समय वंशिका उससे कुछ न कुछ खरीद लेती और चुपचाप उसकी हथेली पर पैसे रख देती जिससे आर्यन के चेहरे पर मुस्कान तैर जाती। उसकी मासूम मुस्कान वंशिका को किसी मरहम की तरह सुकून देती थी।

लेकिन अगले दिन जब वंशिका की कार बत्ती पर रुकी तो अचानक उसकी नज़र सड़क किनारे बिखरी हुई किताबों पर पड़ी। उसे तुरंत आर्यन का ख्याल आया। वंशिका बेचैन होकर शीशे के बाहर देखने लगी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर धड़क रहा था। तभी कुछ बच्चे भागते हुए उनकी गाड़ी के पास आए और बोले, "मैडम, आप आर्यन को ढूंढ रही हैं ना?" "हाँ, कहाँ है वह?" उन बच्चों ने कहा, "दीदी, उसका तो अभी थोड़ी देर पहले दुर्घटना हो गया है।" वंशिका की साँसें रुक सी गईं। "यह सब कैसे हुआ? उसकी हालत कैसी है?" बच्चा बोला, "दीदी, एक कार वाला उसे टक्कर मारकर भाग गया। उसका सिर फट गया था। लोग उसे अस्पताल लेकर गए थे। लेकिन हमने लोगों को बातें करते हुए सुना है कि उसका बचना बहुत मुश्किल है।" वंशिका के हाथ काँपने लगे। न जाने क्यों उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वंशिका के दिल में एक अजीब सी टीस उठी। लेकिन उसे ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि यह दर्द सिर्फ एक बच्चे का नहीं बल्कि यह हादसा उनकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई सामने लेकर आने वाला था। एक ऐसा खुलासा जिसे सुनकर वंशिका के बरसों पुराने घाव फिर से ताज़ा हो जाएँगे। क्योंकि वह मासूम बच्चा आर्यन कोई और नहीं बल्कि उन्हीं का खोया हुआ बेटा था जिसे पैदा होते ही एक मजबूरी ने उनसे छीन लिया था।

वंशिका ने जैसे ही यह सुना कि आर्यन का बचना मुश्किल है, वह घबराई हुई आवाज़ में बोली, "क्या तुम लोग मुझे उसके घर लेकर जा सकते हो?" बच्चे तुरंत बोले, "हाँ आंटी, वह तो हमारे घर के बिल्कुल पास में ही रहता है।" वंशिका ने हरीश की ओर देखा। उसकी आँखों में बेचैनी साफ़ झलक रही थी। वंशिका ने कहा, "हरीश, मुझे यहीं उतार दो। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा है। मुझे उसे देखने जाना ही होगा।" हरीश ने गहरी साँस ली और बोला, "ठीक है, तुम चली जाओ। मुझे तो दुकान खोलनी है। लेकिन जो भी हो, मुझे तुरंत फ़ोन करना।" हरीश ने उसे वहीं उतार दिया। वंशिका ने एक छोटे बच्चे को साथ लिया। वह ऑटो में बैठी और घबराए दिल के साथ उस गली की तरफ निकल पड़ी जहाँ आर्यन रहता था।

थोड़ी दूर आगे चलकर बच्चे ने ऑटो रुकवाया। लेकिन जैसे ही वंशिका नीचे उतरी तो अचानक उसकी नज़र एक बुजुर्ग महिला पर पड़ी। उसे देखते ही वंशिका सन्न रह गई। "यह... यह तो वही औरत है।" वह उस महिला को बहुत अच्छी तरह जानती थी। बुजुर्ग महिला भी वंशिका को देखते ही ठिठक गई और अगले ही पल फूट-फूट कर रोने लगी। वह काँपती आवाज़ में बोली, "मैं तेरे बेटे को बचा नहीं पाई।" वंशिका के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। "क्या वह मेरा बेटा आर्यन था?" बुजुर्ग महिला ने आँसू पोंछते हुए कहा, "हाँ, वही तेरा आर्यन था।" बस इतना सुनना था, वंशिका ने दहाड़ें मारकर रोना शुरू कर दिया। "मैं कितनी अभागन हूँ। बरसों बाद मेरा बच्चा मेरे सामने खड़ा था और मैं उसे पहचान भी न सकी।"

वंशिका रोते-रोते बोली, "वह कहाँ है? अब कैसी हालत है उसकी? मुझे उसे देखना है।" गली में वंशिका के रोने की आवाज़ सुनकर मोहल्ले की औरतें भी इकट्ठी होने लगीं। एक ने पूछा, "यह कौन है? यह इतनी बेचैन क्यों है?" आर्यन की दादी ने आँसू पोंछते हुए कहा, "अरे, यही तो उसकी असली माँ है।" यह सुनते ही गली में सन्नाटा छा गया। किसी को भी यकीन नहीं हो रहा था कि इतनी अमीर औरत का बच्चा इस हालत में कैसे जी रहा था। वंशिका रो-रो कर पुकार रही थी, "आर्यन! मेरा बच्चा आर्यन!" उसकी दर्द भरी पुकार से पूरा मोहल्ला गूँज रहा था।

आर्यन और वंशिका की इस सच्चाई को समझने के लिए हमें समय में थोड़ा पीछे जाना पड़ेगा। साल दो हज़ार पंद्रह में जब वंशिका सिर्फ उन्नीस साल की थी तब उसे विजय नाम के लड़के से प्यार हो गया। वे दोनों शादी करना चाहते थे। लेकिन वंशिका का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था। लाख कोशिशों के बाद भी जब घरवाले नहीं माने तो आखिरकार एक दिन वंशिका ने अजय के साथ भागकर शादी कर ली। वे दोनों उसी शहर में एक छोटा सा किराए का घर लेकर रहने लगे। लेकिन वंशिका के इस कदम से उसके परिवार ने वंशिका से हर रिश्ता तोड़ लिया। एक साल बाद वंशिका ने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया जिसका नाम उन्होंने आर्यन रखा। उसी दौरान वंशिका को एक ऐसी सच्चाई पता चली जिसने उसकी हँसती खेलती ज़िंदगी को तबाह कर दिया। किसी ने उसे बताया कि उसका पति अजय एक खतरनाक गिरोह से जुड़ा हुआ है। वह पैसों के लिए लोगों को मारने से भी पीछे नहीं हटता था। वंशिका ने उसे बहुत समझाया कि यह रास्ता ठीक नहीं है। "जिन लोगों के लिए तुम यह सब करते हो देखना, एक दिन यही लोग तुम्हें भी मरवा देंगे और हमारी ज़िंदगी तबाह हो जाएगी।" वंशिका के समझाने के बाद भी अजय नहीं बदला और फिर वही हुआ जिससे वंशिका हमेशा डरती थी। एक दिन अजय के दुश्मनों ने उसकी जान ले ली। अजय की मौत के बाद वंशिका टूट गई। अब उसके पास न तो घर था न कोई सहारा। वह मायके भी नहीं जा सकती थी। अगर उसके पास कुछ था तो उसका बेटा आर्यन था। अब वंशिका के जीने का आर्यन ही एक सहारा था।

लेकिन उसी दौरान वंशिका के माता-पिता को भी अजय की मौत की खबर मिल गई थी। वे लोग वंशिका के पास आए और बोले, "बेटी, जो हुआ सो हुआ, लेकिन तू अभी जवान है, हम तेरी दूसरी शादी करा देंगे, पर उसके लिए एक शर्त है, तुझे इस बच्चे को भूलना होगा।" यह बात सुनकर वंशिका सन्न रह गई। वह हकलाते हुए बोली, "मैं अपने बच्चे को कैसे छोड़ दूँ?" उसके घर वालों ने उसे समझाया कि अगर यह बच्चा तेरे साथ रहेगा तो फिर कौन तुझसे शादी करेगा? इसी दौरान अजय के माता-पिता भी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने भी वंशिका को समझाया कि, "बेटी, तू दूसरी शादी कर ले। आर्यन को तो हम पाल लेंगे। यह हमारा भी तो बच्चा है।" बहुत सोचने समझने के बाद नम आँखों से वंशिका ने अपना मासूम आर्यन उसके दादा-दादी को सौंप दिया और अपने माता-पिता के साथ चली गई।

वंशिका के माता-पिता ने अपनी बेटी के अतीत को भुलाने के लिए हरीश नाम के लड़के से उसका रिश्ता तय कर दिया। लड़का अच्छा और संस्कारी था। इसलिए कुछ मुलाकातों और बातचीत के बाद परिवार वालों ने हरीश और वंशिका का रिश्ता तय कर दिया। लेकिन इस रिश्ते की नींव एक बहुत बड़ी सच्चाई को छिपा कर रखी गई थी। हरीश से वंशिका का अतीत छिपाया गया। उसे बताया गया था कि वंशिका अविवाहित है। कुछ दिनों बाद उन दोनों की धूमधाम से शादी हो गई। शादी के बाद वंशिका मुंबई आ गई। हरीश मुंबई में ही रहता था। वंशिका की सुंदरता और उसकी शालीनता से वह इतना प्रभावित हुआ था कि शादी के बाद वह हर किसी से यही कहता था, "मैंने दुनिया की सबसे अच्छी लड़की से शादी की है।" हरीश की हिल रोड बाज़ार में मोबाइल की बड़ी दुकान थी जिसे चलाने के लिए कर्मचारी रखे हुए थे। उसका काम इतना अच्छा चलता था कि घर में कभी पैसों की कमी महसूस नहीं होती थी। धीरे-धीरे वंशिका भी दुकान पर उसका हाथ बँटाने लगी। वे दोनों साथ में काम करते, एक साथ बैठकर चाय पीते। वंशिका हरीश के साथ हँसी-खुशी ज़िंदगी गुज़ार रही थी।

लेकिन किस्मत का खेल देखिए, जब वंशिका की दुनिया संभल ही रही थी, तभी अचानक उसके छोड़े हुए बच्चे आर्यन की ज़िंदगी में फिर से तूफ़ान आ गया। उन दिनों आर्यन के दादा का अचानक देहांत हो गया। उनके जाते ही घर के हालात खराब होने लगे। आर्यन की चाची रोज़ झगड़ा करने लगी और ताने मारने लगी कि, "इस बच्चे की माँ तो इसे छोड़कर भाग गई है। अब हम ही क्यों पालें? इसे अनाथ आश्रम दे दो। कुछ तो बोझ कम होगा।" लेकिन आर्यन की दादी किसी चट्टान की तरह अडिग थी। वह कहती थी, "यह तो मेरा अजय है। यह मेरे बेटे की आखिरी निशानी है। मैं इसे कहीं नहीं जाने दूँगी।" आर्यन को लेकर रोज़-रोज़ झगड़ा होने लगा। एक दिन आर्यन की बड़ी बुआ वहाँ आईं। उन्होंने देखा परिवार में हर तरफ तनाव ही तनाव है। बुआ ने दादी से कहा, "माँ जी, अगर घर में इतना झगड़ा हो रहा है तो आप आर्यन को मुझे दे दो। मेरे दो बेटे हैं। मैं इसे भी अपने साथ मुंबई ले जाऊँगी।" दादी ने तुरंत 'ना' में सिर हिलाया और कहा, "नहीं, मैं किसी पर भरोसा नहीं कर सकती। जब तक मैं ज़िंदा हूँ, यह मेरे साथ ही रहेगा।" बुआ ने समझाया कि, "ठीक है माँ जी, आप भी मेरे साथ चलिए।" इस तरह आर्यन अपनी दादी के साथ मुंबई आ गया।

समय बीतता गया। आर्यन अब दस साल का हो चुका था। वह थोड़ा शरारती हो गया था और दुनिया को अपने ढंग से समझने की कोशिश कर रहा था। एक दिन उसने देखा उसकी उम्र के बच्चे रोज़ पैसे लेकर घर लौटते हैं। आर्यन ने उनसे पूछा, "तुम पैसे कहाँ से लाते हो?" बच्चों ने हँसते हुए कहा, "हम मुंबई की सड़कों पर लाल बत्ती से गुज़रने वाली गाड़ियों के पास जाते हैं और लोगों से माँग लेते हैं।" आर्यन के मन में भी पैसे कमाने की इच्छा हुई। वह बोला, "कल मैं भी तुम्हारे साथ चलूँगा।" लेकिन उसकी दादी ने उसे सख्ती से मना कर दिया कि, "बेटा, भीख माँगना बहुत बुरी बात है।" आर्यन ने नटखट मुस्कान के साथ कहा, "दादी, मैं भीख थोड़े ही माँगूँगा। मैं तो गुब्बारे बेचूँगा।" दादी चाहकर भी उसे रोक न सकी। और यूँ आर्यन ने कुछ गुब्बारे खरीदे और लाल बत्ती पर बेचने जाने लगा। कभी फूल, कभी गुब्बारे, कभी किताबें, जो भी उसे सही लगता वह उसी को बेच देता। लेकिन उसी दौरान अनजानी राहों से उसकी असली माँ वंशिका उसकी ज़िंदगी में आ चुकी थी। वे दोनों रोज़ एक दूसरे के सामने होते थे। वंशिका के दिल में उसे देखते ही ममता उमड़ पड़ती थी। लेकिन वह इसे इत्तेफ़ाक समझती रही। वे दोनों पास होकर भी एक दूसरे से अनजान थे। वंशिका मन ही मन अपने बेटे को हर रोज़ याद करती थी। लेकिन उसके माता-पिता ने उसे सख्ती से मना कर रखा था कि, "कभी गलती से भी आर्यन का नाम मत लेना। क्योंकि अगर किसी को पता चल गया तो तेरी ज़िंदगी खराब हो जाएगी।" इसलिए वह चुप रहती थी। अपने आँसुओं को छुपाती थी और अगर वह कभी मायके जाती तो बस उसे इतना ही पता चलता था कि आर्यन अपनी बुआ के साथ मुंबई चला गया है। कितना अजीब इत्तेफ़ाक था। माँ और बेटा एक ही शहर में थे। एक ही सड़क पर खड़े थे और एक दूसरे के साथ बातें भी करते थे। लेकिन यादें बहुत धुंधली हो चुकी थीं। वंशिका ने कई बार उससे नाम पूछा था। उसके घर वालों के बारे में भी पूछा था और आर्यन ने उसे बताया था कि, "मैं अपनी दादी के साथ रहता हूँ।" मगर वह यह नहीं जानती थी कि यह दादी वही हैं जिन्होंने उसके बेटे को पाल-पोस कर बड़ा किया था।

लेकिन आज वंशिका जब आर्यन को तलाश करते हुए उसके घर पहुँची और दादी को सामने खड़े देखा तो उसकी आँखें खुली की खुली रह गईं और बरसों पुरानी यादें फिर से ताज़ा हो गईं। उसके दिल में ममता की टीस उठी। "क्या सच में वह मेरा बेटा आर्यन था?" दादी ने काँपती आवाज़ में कहा, "हाँ बेटी, यही तेरा आर्यन है। लेकिन आज उसका दुर्घटना हो गया है।" वंशिका चीख पड़ी, "कहाँ है वह? मुझे अभी उसे देखने जाना है।" दादी ने बताया कि उसे अस्पताल लेकर गए हैं। उसकी बुआ भी उसकी हालत के बारे में कुछ नहीं जानतीं। उन्हें बस इतना ही पता चला था कि उसे बहुत गंभीर चोटें आई हैं। पास खड़ी औरतों में से एक ने उसका हाथ पकड़ा और बोली, "चल बहन, हम तुझे अस्पताल लेकर चलते हैं।" वंशिका तुरंत उनके साथ चल पड़ी।

जैसे ही वंशिका अस्पताल पहुँची तो आर्यन की बुआ उसे देखते ही फूट-फूट कर रोने लगीं। उन्होंने बताया, "डॉक्टर कह रहे हैं कि आर्यन के बचने की उम्मीद बहुत कम है।" वंशिका काँपती हुई आवाज़ में बोली, "ऐसा मत कहिए। दुआ कीजिए कि वह मुझे छोड़कर न जाए।" इसी तरह छह घंटे बीत गए। वंशिका को हर मिनट किसी पहाड़ की तरह भारी लग रहा था। गहन चिकित्सा इकाई का दरवाज़ा बंद था। अंदर आर्यन ज़िंदगी के लिए जंग लड़ रहा था। इसी बीच वंशिका का फ़ोन लगातार बज रहा था। उसका पति हरीश काफ़ी देर से फ़ोन कर रहा था। आखिरकार वंशिका ने फ़ोन उठाया और काँपती आवाज़ में कहा, "हरीश, उस बच्चे के बचने की कोई उम्मीद नहीं है। मुझे माफ़ करना, मैं आज नहीं आ पाऊँगी।" हरीश हैरान था। उसने पूछा, "क्या तुम अस्पताल पहुँच गई हो? और यह कैसी बात कर रही हो तुम? उसके माँ-बाप हैं न वहाँ पर? वे लोग सब संभाल लेंगे।" अब वंशिका उसे कैसे बताती कि जिस लड़के को वह पराया समझ रहा है, वह वंशिका का अपना बेटा है जिसे उसने आज तक दुनिया से छुपाए रखा था। उसने बस इतना कहा, "हरीश, मैं अभी फ़ोन पर बात नहीं कर सकती।" इसके बाद वंशिका ने फ़ोन बंद कर दिया।

कुछ देर बाद एक डॉक्टर बाहर आया। उसके चेहरे से थकान और चिंता झलक रही थी। वंशिका ने डॉक्टर से पूछा, "डॉक्टर साहब, मेरा बेटा कैसा है अब?" डॉक्टर ने कहा, "अगर मरीज़ को बहत्तर घंटे में होश आ गया, तो वह धीरे-धीरे ठीक हो सकता है। वरना कुछ कहना मुश्किल है।" वे तीन दिन वंशिका के लिए तीन साल के बराबर थे। और फिर तीसरे दिन शाम को डॉक्टर ने मुस्कुराते हुए कहा, "लड़के को होश आ गया है। अब आप लोग मिल सकते हैं।" यह खबर सुनते ही वे सब एक दूसरे को गले लगाकर रो पड़े। वंशिका दौड़ती हुई अंदर गई। आर्यन की आँखें आधी खुली थीं। वह धीमी आवाज़ में बोला, "आंटी, आप आ गईं?" वंशिका ने उसे प्यार भरी नज़रों से देखा। वह उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोली, "बेटा, मैं आंटी नहीं हूँ। मैं तुम्हारी माँ हूँ।" उसने आर्यन को सीने से लगा लिया और बरसों का दर्द, इंतज़ार और प्यार सब आँसुओं में बह गया।

डॉक्टर ने वंशिका को समझाया कि बच्चे के साथ ज़्यादा बात न करें। इसे अभी आराम करने दो। पिछले तीन दिनों से वंशिका ने हरीश को फ़ोन नहीं किया था। उसका मोबाइल भी बंद था। उधर हरीश वंशिका की चिंता में परेशान था। आखिर वह भी आर्यन के घर पहुँच गया और वहाँ हरीश को वंशिका की असल सच्चाई का पता चल गया। वह तुरंत अस्पताल पहुँचा। उसने गुस्से से बोला, "तुम लोगों ने मेरे साथ धोखा किया है। आज से हमारा रिश्ता यहीं पर खत्म होता है।" वंशिका चुपचाप सब सुनती रही। भला उसके पास अब बचा ही क्या था सिवाय आर्यन के। और अब वंशिका आर्यन को दोबारा नहीं खोना चाहती थी।

एक हफ़्ते बाद आर्यन घर आ गया। वंशिका उसकी देखभाल करती रही। जब उसने हरीश को फ़ोन किया तो उसने फ़ोन ही नहीं उठाया। लेकिन दस दिन बाद अचानक हरीश अपने घर वालों के साथ आर्यन के घर पहुँचा। वंशिका उन्हें देखकर रो पड़ी। उसकी सास ने उसे गले लगाया और बोली, "बेटी, मत रो, चलो घर चलते हैं।" यह सुनते ही वंशिका घबरा कर पीछे हट गई। "मैं अपने बेटे को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगी।" सास मुस्कुराई, "किसने कहा है तुम उसे छोड़कर जाओ, बल्कि तुम्हारा बेटा, उसकी दादी, हम सब साथ चलेंगे।" हरीश बहुत देर बाद आगे आकर बोला, "चलो वंशिका, मैं भी तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।" और इस तरह जो परिवार टूट चुका था, वह फिर से एक हो गया। उस वक्त वंशिका दो महीने की गर्भवती थी। समय आने पर उसने एक प्यारे से बेटे को जन्म दिया। कुछ साल बाद उनकी एक बेटी हुई। अब वंशिका, आर्यन और उसके छोटे भाई-बहन सब एक साथ एक खुशहाल ज़िंदगी गुज़ार रहे हैं।

यह कहानी हमें सिखाती है कि ज़िंदगी में चाहे कितना भी प्यार क्यों न मिले, माँ-बाप से बढ़कर कोई सहारा नहीं होता। माँ की ममता और बाप की मेहनत के बिना किसी भी रिश्ते का अस्तित्व अधूरा रहता है। इसलिए ऐसा कदम मत उठाओ जो तुम्हारे सुख के बदले तुम्हारे माता-पिता की आँखों में ज़िंदगी भर के लिए आँसू लिख दे। दोस्तों, अगर कहानी पसंद आई हो तो इसे पसंद करें और साझा करें। ऐसी ही दिलचस्प कहानियों के लिए हमारे चैनल को सदस्यता ज़रूर लें। यह कहानी पूरी तरह काल्पनिक है। यह सिर्फ और सिर्फ मनोरंजन और सीख के उद्देश्य से बनाई गई है। किसी भी असल घटना या व्यक्ति से इसका कोई संबंध नहीं है।