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सिंदूर की कीमत एपिसोड 341
आज की कहानी की शुरुआत होती है एक तूफानी रात से। हवाओं की सरसराहट और दिलों की धड़कनों के बीच विद्या अकेले अपने कमरे में बैठी होती है। उसके चेहरे पर चिंता साफ झलक रही है। उसी समय दरवाजे पर दस्तक होती है।
विद्या दरवाजा खोलती है और सामने खड़ा होता है रोहन। लेकिन उसका चेहरा पहले जैसा नहीं था। उसकी आंखों में एक रहस्यमय चमक थी।
"विद्या तुम इतनी रात को यहां सब ठीक है ना?" रोहन ने पूछा।
"मुझे तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है। बहुत कुछ ऐसा है जो तुम्हें जानना चाहिए।"
विद्या का चेहरा सख्त हो जाता है। वह पीछे हटती है और रोहन को अंदर आने देती है। दोनों आमने-सामने बैठते हैं।
"रोहन, जो कुछ भी अब तक हुआ वह सब एक दिखावा था। मुझे मजबूरी में यह सब करना पड़ा। लेकिन अब सच्चाई बताने का वक्त आ गया है।"
"विद्या, क्या मतलब? कौन सी सच्चाई रोहन?"
"मैंने तुमसे जो शादी की वह मेरी मर्जी नहीं थी। मेरे ऊपर बहुत बड़ा दबाव था। लेकिन अब मैं उस दबाव से आजाद हूं। अब मैं तुम्हें सब कुछ बता सकता हूं।"
विद्या की आंखों से आंसू बहने लगते हैं।
"विद्या, तुम्हारा मतलब है तुमने मेरी भावनाओं से खेला। मेरा भरोसा तोड़ा।"
"नहीं विद्या, मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मैं भी तुम्हें चाहता हूं। लेकिन सच्चाई यही है कि हमारे बीच जो कुछ था वो एक जाल था।"
इसी बीच कहानी में एंट्री होती है काव्या की।
"काव्या, अरे वाह क्या ड्रामा चल रहा है यहां। रोहन, तुमने जो कहा वह एकदम सही है। लेकिन तुमने यह नहीं बताया कि असली खेल किसने शुरू किया था।"
"विद्या, काव्या अब तुम क्या कहना चाहती हो?"
"मैं सिर्फ इतना कहूंगी कि इस खेल में हर कोई मोहरा है। लेकिन असली चाल चलने वाला कोई और है।"
"विद्या, कौन? साफ-साफ कहो।"
"वह इंसान जो तुम्हारे सबसे करीब है और जिसने तुम्हें कभी धोखा नहीं दिया वही इस पूरी कहानी का मास्टरमाइंड है।"
"विद्या, नहीं मैं यकीन नहीं कर सकती। तुम झूठ बोल रही हो।"
"रोहन, काव्या सच कह रही है विद्या। मैं भी अब यह मान चुका हूं।"
विद्या रोती है, चिल्लाती है। उसके सामने पूरी दुनिया जैसे उजड़ जाती है।
इस बीच कहानी फ्लैशबैक में जाती है। उन पलों को दिखाया जाता है जब रोहन और काव्या ने एक प्लान बनाया था।
"काव्या, हम उसे तबाह कर देंगे। लेकिन इस तरह कि उसे लगे कि सब कुछ किस्मत का खेल है।"
"रोहन, तुम्हारा प्लान खतरनाक है। लेकिन अगर सफल हुआ तो सब कुछ हमारे हाथ में होगा।"
फ्लैशबैक खत्म होता है और वर्तमान में विद्या चुपचाप रोहन को देख रही होती है।
"विद्या, मैंने तुम दोनों पर भरोसा किया और तुम दोनों ने मुझे बर्बाद कर दिया। लेकिन याद रखना अब मैं भी वह विद्या नहीं रही। अब मैं हर सवाल का जवाब लूंगी।"
कहानी आगे बढ़ती है। विद्या अकेले एक मंदिर में जाती है और वहां बैठकर अपनी तकदीर को कोसती है।
"हे भगवान अगर मेरी जिंदगी में यह सब लिखा था तो क्यों नहीं पहले से चेतावनी दी।"
तभी वहां एक बूढ़ी औरत आती है।
"बूढ़ी औरत, बिटिया हर तूफान के बाद सवेरा जरूर आता है। तुम हार मत मानो विद्या।"
"लेकिन जब अपनों से ही चोट मिलती है तो जीने की वजह ढूंढना मुश्किल हो जाता है।"
"बूढ़ी औरत, जो अपने होते हैं वह चोट नहीं देते। जिनसे चोट मिलती है वह अपने नहीं होते।"
विद्या की आंखों में एक नई चमक आ जाती है।
"विद्या, अब मैं चुप नहीं रहूंगी। अब मैं हर राज खोलूंगी और हर धोखेबाज को बेनकाब करूंगी।"
अगले दृश्य में विद्या रोहन और काव्या के सामने खड़ी होती है। लेकिन इस बार वह डरी हुई नहीं बल्कि आत्मविश्वास से भरी हुई होती है।
"विद्या, तुम दोनों ने मुझे तोड़ने की कोशिश की लेकिन मैं अब पहले से भी ज्यादा मजबूत हूं। तुम लोगों ने जो चाल चली थी अब वह तुम पर ही भारी पड़ेगी।"
"काव्या, तुम क्या करोगी? हमारे पास सबूत नहीं है।"
"विद्या, सबूत तुम ढूंढ रही हो। लेकिन गुनाह का बुरा वक्त अब शुरू हो चुका है।"
अंत में एक नया मोड़ आता है। एक अनजान कॉल।
"अगर सच जानना है तो कल रात 12:00 बजे पुराने हवेली में आना अकेले।"
विद्या फोन को देखती है और कहती है, "अब खेल असली शुरू।"