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[संगीत] [प्रशंसा] [संगीत]
यह जो शरीर है यह जड़ है या चेतन? जड़ दिखता कैसा है? यह अविद्या है। यह अविद्या है। अच्छा, भला चलता फिरता, नाचता, गाता, खाता, पीता जीवित शरीर चेतन दिखता है, जबकि है जड़। इस अविद्या के कारण व्यक्ति को उसमें राग होता है। अविद्या के कारण यह राग, द्वेष, सारे क्लेश पैदा होते हैं। क्यों जी? योग दर्शन में पढ़ा ना आपने? अविद्या क्षेत्रम उत्तरे श्याम। अविद्या बाकी सारे क्लेश का कारण है। जब अविद्या है कि चलता फिरता, जीवित शरीर चेतन दिखता है, तो इस अविद्या के कारण उसको राग होता है। जब मृत्यु होती है शरीर की, मृत्यु हो गई। अब वो डेड बॉडी रखी है। अब व्यक्ति को ऐसा लगता है, यह तो जड़ है। डेड बॉडी कैसी दिखती है? जड़। और चलता फिरता व्यक्ति कैसा दिखता है? चेतन। जब व्यक्ति चलता फिरता है, तो उसमें आसक्ति होती है, राग होता है। और जब डेड बॉडी हो, तब राग होता है? जी नहीं, होता ना। अब उसको विद्या आ गई, समझ में आ गई। यह तो डेड बॉडी तो जड़ वस्तु है। तो जब वास्तविकता उसको पता चलती है, तत्व ज्ञान होता है, सच्ची विद्या समझ में आती है कि यह तो जड़ है, तब सारा राग खत्म हो जाता है। और ऐसा तो कोई कोई समझता है कि यह जीवित व्यक्ति जो चल रहा है, इसका शरीर जड़ है। यह तो कोई करोड़ों में एक आदि समझता है। वही राग से बच सकता है, नहीं तो नहीं बच पाएगा। अविद्या है तो राग। बोलो कितनी भारी अविद्या है।
हां दिनेश जी, बोलिए। क्या पूछ रहे हैं? माइक, माइक से बोलिए। आवाज नहीं आ रही। हां, हां, हां। यह पूर्ण सत्य है। 100% सत्य है। तो फिर जो यह आत्मा के का, आत्मा का और शरीर से संयोग, हां, यह जन्म, हां, यह जो हम, हां, हां, ठीक है। हां, हां। तो यह हम, हम जो यह आत्मा और शरीर का जो संयोग है, हां, इसके कारण हम जी रहे हैं। हां। तो यह शरीर जीवित है, चेतन नहीं। शरीर, लेकिन अंदर आत्मा चलता फिरता, अंदर आत्मा है। आत्मा तो चेतन है ना? आत्मा चेतन है। चेतन आत्मा के संयोग से यह शरीर जीवित है, चेतन नहीं है। हां, है। फिर भी जड़। फिजिकली जो शरीर जो हम देख पा रहे हैं, हां जी, हल फिरता, हां जी, तो उसमें चेतन तत्व भी तो है ना? है। हां। कौन है? चेतन आत्मा। और दिखता क्या है हमको? दिखता तो शरीर है। क्या आप शरीर को जड़ मानते हैं? शरीर तो जड़ ही है। मानते क्या है? है तो जड़। मानते क्या है? दिखता क्या है आपको? ऐसे व्यवहार में बस यही कह रहा हूं। यह कह रहा हूं। है तो जड़, दिखता चेतन। यही तो अविद्या है। [हंसी] है। आत्मा के कारण यह जड़ शरीर चेतन दिखता है। है नहीं चेतन। आत्मा के होने से यह चेतन नहीं हो जाता। शरीर जड़ है। जीवित, जीवित शरीर भी जड़ है। मृत शरीर भी जड़ है। दोनों स्थितियों में शरीर जड़ है। यह सत्य विद्या है। चलने मात्र से, गति मात्र से शरीर चेतन नहीं हो जाता। एक उदाहरण देता हूं आपको, बड़ा अच्छा समझ में आएगा। आपकी कार खड़ी है नीचे ग्राउंड फ्लोर पर खड़ी है, स्थिर। चल नहीं रही। खड़ी हुई कार जड़ है या चेतन? लालचंद जी? जड़ है ना। अब आप बैठ गए, उसको चला रहे हैं। 80 की स्पीड पर, की स्पीड पर। चलती हुई कार जड़ है या चेतन? देखो, दोनों स्थितियों में कार जड़ है। तो चलने से क्या चेतन हो गई? जी नहीं, हुई ना। बस तो यही पॉइंट समझने का है। कार खड़ी हो तो भी जड़ है, चल रही है तो भी जड़ है। चलने से वह चेतन नहीं होती, क्योंकि चलना यह चेतन का लक्षण नहीं है। गति करना यह चेतन का लक्षण नहीं है। गति चेतन में भी होती है, जड़ में भी होती है। दोनों में होती है। इसलिए चलने मात्र से कोई चीज चेतन मान लिया जाए, यह गलत है। न्याय दर्शन की भाषा में इसको हेत्वाभासा। अगर आप गति के कारण शरीर को चेतन कहोगे, तो गति के कारण पृथ्वी को भी चेतन कहना पड़ेगा। वह प्रमाण के विरुद्ध है। पृथ्वी तो जड़ है। इसलिए चलने मात्र से कोई वस्तु चेतन नहीं बन जाती। वह जड़ वस्तु जड़ ही रहती है। जैसे कार खड़ी हुई भी जड़ है, चलती हुई भी जड़ है। ऐसे शरीर, डेड बॉडी भी जड़ है और लिविंग बॉडी भी जड़ है। मृत शरीर, जीवित शरीर दोनों जड़ हैं। शरीर तो जड़ ही रहता है। उसको चेतन मानना यह भ्रांति है। यही अविद्या है। इसी का नाम अविवेक है।
हां, बोलिए दिनेश जी। स जी, म क्षमा करें। इस बॉडी के अंदर चेतन तत्व है तो पूरे के पूरे शरीर को जड़ कहना, हा, जबकि चेतन आत्मा अंदर मौजूद है। हम शरीर को कह रहे हैं, आत्मा को थोड़ी कह रहे हैं। हमने आत्मा को जड़ कब कहा? हम तो शरीर की बात कर रहे हैं। वो तो ठीक है। तो फिर हम गलत क्या कह रहे हैं? शरीर जड़ है। पूरा शरीर जड़ है, सर से पांव तक जड़ है। नहीं, मैं आप हल रहे चल रहे हैं, मैं हल रहा चल रहा हूं और हम इसको बॉडी को ही बता रहे हैं। वो सही कह रहा हूं। बॉडी तो जड़ ही है। दोनों तत्वों को अलग करना पड़ेगा ना? अच्छा, जब ड्राइवर कार चलाता है, जी। ड्राइवर जड़ है या चेतन? ड्राइवर चेतन की भूमिका अदा कर रहा है, चेतन है। अब वो चेतन होकर कार चला रहा है, जी। कार चल रही है, जी। ड्राइवर चेतन है, उसकी वजह से कार चल रही है। ओके। वो चलती हुई कार जड़ है या चेतन? वो तो जड़ ही है। जब चलती हुई कार जड़ है, जबकि चेतन ड्राइवर उसमें बैठा है, उसके बाद भी चलती हुई कार जड़ है। लालचंद जी, ध्यान से पकड़िए बात को। चेतन ड्राइवर कार के अंदर बैठा है और कार चल रही है, और फिर भी वह जड़ है। तो ऐसे ही चेतन आत्मा शरीर में बैठा है, वह शरीर को चला रहा है, फिर भी शरीर जड़ है। क्या दिक्कत है इसमें? दोनों के पैके, दोनों के पैक को हम जड़ बताएं, जबकि दोनों साथ। हां, दोनों साथ में तब भी जड़ बता रहे हैं। दोनों को जड़ नहीं बता रहे। यह पॉइंट आपसे छूट रहा है। आप इस पॉइंट को पकड़ नहीं पा रहे। हम दोनों को जड़ नहीं बता रहे। आत्मा को चेतन और शरीर को जड़ बता रहे हैं। यह कह रहे हैं। कार को जड़ कह रहे हैं। ड्राइवर को जड़ कब कहा हमने? ड्राइवर चेतन है। कार में बैठा है, कार को चला रहा है। कार जड़ है। तो आत्मा चेतन है, वो शरीर में बैठा है, शरीर को चला रहा है, शरीर जड़ है। हमने हमने चेतन आत्मा को जड़ कब कहा? बिल्कुल नहीं कहा है। हां, हां। यह टॉपिक अलग है। यह टॉपिक अलग है। दर्द आत्मा को होता है, यह ठीक है, पर यह वो टॉपिक नहीं है। टॉपिक बदल दिया आपने। आत्मा को दर्द होता है, क्यों होता है? क्योंकि वो चेतन है। उंगली कटने पर शरीर को दर्द नहीं होता, क्योंकि वो जड़ है। जड़ वस्तु को दर्द नहीं होता। आपकी कार जब टकराती है ना, तो कार को दर्द होता है? फिर तो शरीर कट गया, तो शरीर को काहे का दर्द? वो तो जड़ है। कार भी जड़ है, टकराती है, कार टूट जाती है, पर दर्द नहीं होता, दुखी नहीं होती। कार जड़ वस्तु है, उसमें फीलिंग नहीं है, इसलिए वो दर्द को महसूस नहीं करती। महसूस तो चेतन करता है। जब कार टकराती है, तो ड्राइवर को दर्द होता है, कार के मालिक को दर्द होता है, कार को नहीं होता। शरीर अकेला नहीं खाता। [हंसी] है। आत्मा को भूख लगती है। आत्मा भोजन खाता है और वह शरीर में चला जाता है, बस। ना, शरीर अकेला नहीं खाता है। अकेला खाए तो डेड बॉडी भी खाए। डेड बॉडी खाना खाती है? नहीं खाती। वो आत्मा इसके साथ है, तब वह शरीर खाता है। तो इसलिए अकेला शरीर नहीं खाता है। आत्मा भूख आत्मा को लगती है। आत्मा को इच्छा होती है खाने की। फिर वह आत्मा खाता है, बस। आगे जाकर के उसका रास्ता बदल जाता है। भोजन का रास्ता, वह शरीर में चला जाता है, आत्मा में नहीं जाता। लेकिन जो शरीर में भोजन जाता है, उससे शक्ति बनती है और उस शक्ति की अनुभूति आत्मा को होती है। इसलिए आत्मा बार-बार भोजन खाता है कि मुझे शक्ति की कमी पड़ रही है, मुझे शक्ति चाहिए। भोजन लाओ। उसको पता है भोजन खाने से शक्ति मिलती है। इसलिए वो भोजन खाता है। भोजन आत्मा में नहीं जाता, वो शरीर में जाता है, पर शक्ति का अनुभव आत्मा को होता है। हां, मोटी भाषा में ऐसे बोलना चाहिए, मैं नहीं खाता, मैं भोजन शरी शर को खिलाता हूं। यह शब्द बहुत कमजोर हैं, पूरी बात को व्यक्त नहीं कर पाते। शब्दों की बहुत सीमा होती है। इसलिए हमको व्याख्या करनी पड़ती है, वरना सूत्र तो लिखा ही है। अब मुझे दो घंटे से क्यों व्याख्या करनी पड़ रही है? इतनी इतनी सारी बात शब्दों में, सूत्रों में इतने में क्लियर होती, तो मैं यह दो घंटे से क्यों व्याख्या कर रहा हूं? इसीलिए तो करना पड़ता है कि शब्द बहुत थोड़े होते हैं, उनमें शक्ति सीमित होती है। उसको समझाने के लिए बहुत लंबी व्याख्या करनी पड़ती है। वक्ता जिस अभिप्राय से जो बात कहता है, उसके वाक्य से वही अर्थ लेना चाहिए। इधर-उधर भटके, तो फिर छल, फिर छल का प्रयोग हो जाएगा। वक्ता जो कहना चाहता है, वही समझो। जो वो कहना चाहता है, ठीक है। तो बोलने के लिए जैसे मैंने बताया था, बोलने के लिए शब्द कुछ और होते हैं, वास्तविकता कुछ और होती है। भले ही हम यह कहते हैं, मैं खाता हूं, मैं पीता हूं, मैं सोता हूं, मैं जागता हूं, मैं बोलता हूं, मैं हंसता हूं। ऐसा हम बोलते, पर खाता ई आत्मा थोड़ी खाता है? आत्मा में भोजन नहीं जाता। फिर भी हम यही कहते हैं, मैं खाता हूं, मैं बोलता हूं, मैं हंसता हूं, मैं मैं सारे काम करता हूं। तो भाषा यह है। जी हां, हां, ठीक है। जीवित शरीर, उसमें ईश्वर का विज्ञान काम करता है, तो वो आत्मा को अच्छा लगता है। अच्छा लगता है, ठीक है। और डेड बॉडी आत्मा को अच्छी, अच्छी नहीं लगती। यह ठीक है। तो जीवित शरीर से तो वो आकर्षण, नहीं, नहीं, नहीं। जीवित शरीर अच्छा लगता है, जी। यह सत्य है, जी। मृत शरीर अच्छा नहीं लगता, जी। यह सत्य है, जी। पर मेरा टॉपिक यह नहीं था। मेरा टॉपिक था कि जीवित शरीर चेतन दिखता है। यह टॉपिक था। आप फिर टॉपिक से बाहर चले गए। जीवित शरीर चेतन प्रतीत होता है, यह कह रहा था। और जड़ शरीर को चेतन मानना, यही तो अविद्या है। अच्छा लगना अलग बात है, चेतन हो जाना अलग बात है। हां, वो टॉपिक नहीं है। हां, अभी न्याय दर्शन में रगड़ लगाओ ना, जब समझ में आएगी गलतियां कैसे होती है, कहां-कहां गलतियां होती है। ना, शरीर को जड़ मानना, यह बुद्धि से मानना, वह बिल्कुल व्याज भी बात है कि जड़ ही है। हां, वो तो ठीक है। लेकिन जो आत्मा बिना का शरीर और जड़, डेड बॉडी, उसमें यह फर्क होता है कि अच्छा लगता है, एक अच्छा नहीं लगता। हां, यह तो ठीक है। इसके लिए उससे वैराग्य नहीं होता और उससे वैराग्य हो जाता है। सिर्फ इतना कारण नहीं है, सिर्फ इतनी बात नहीं है कि जीव शरीर अच्छा लगता है। इससे भारी बात यह है कि वह चेतन दिखता है, इसलिए अच्छा लगता है। यह और दूसरा विंडो है। इससे बड़ा बड़ा बिंदु यह है। जी, जी। शरीर अच्छा क्यों लग रहा है? चलो, उसका कारण बताओ। क्यों अच्छा लग रहा है? जीवी शरीर से सु, ईश्वर का काम चल रहा है, अंदर सुख मिलता है। उस। हां, देखा ना। अब आई ना थोड़ी बात निकल गई। वो सुख क्यों मिल रहा है आपको? आप उसको जड़ मान रहे हैं या चेतन मान रहे हैं? क्या मान रहे हैं? जीवित शरीर को आप उसको अंदर से अंदर गहराई में उतरेंगे, तो आपको पता चलेगा कि मैं उसको चेतन माने बैठा हूं। अंदर की बात यह है। और जो यह बात मैं नहीं कह रहा हूं, यह महर्षि पतंजलि जी कह रहे हैं। मैंने पहले ही आपसे कहा था, मैं अपनी बातें नहीं कहता हूं। अपनी तो ताले में बंद रखता हूं। ऋषियों की बात कहता हूं। यह ऋषि लोग कह रहे हैं कि जीवित अवस्था में व्यक्ति जीवित शरीर को चेतन मानता है, इसलिए उससे सुख की, इसलिए उससे सुख भी मिलता है, आकर्षण भी होता है और उसकी ओर अट्रैक्ट होता है। वह सारा इसीलिए होता है, जी। वह पहले चेतन मानता है, तब जाकर बाद में यह सब होता है। अंदर की जो मान्यता है, वह यह है, जी। चेतन मानने के कारण यह सारी क्रिया हो रही है। यह तो सारे उसके परिणाम हैं। वास्तविकता यह है कि उसको चेतन मानता है। अगर हम उसको बुद्धि पूर्वक जड़ मानेंगे, चाहे तो, हां, जड़ मानेंगे, आकर्षण नहीं होगा। बिल्कुल नहीं होगा। जैसे डेड बॉडी को आप जड़ मानते हैं, जी, उस आकर्षण होता है ना? नहीं होता ना? उसमें नहीं होगा। हां, तो जैसे जड़ वस्तु में, जड़ डेड बॉडी में आपको आकर्षण नहीं होता, ऐसे ही जीवित शरीर को भी यदि जड़ मान लेंगे, तो आकर्षण नहीं होगा। ना पड़ेगा। हां, इस पर मेहनत करनी पड़ेगी, धीरे-धीरे समझ में आएगा। जड़ शरीर के अ, जड़ शरीर में जो आकर्षण है, उसमें एक हिस्सा यह है कि व्यक्ति उसको चेतन मानता है, इसलिए आकर्षण होता है। 25-40% इस वजह से और भी कारण हैं। शरीर में जो व्यक्ति को जीवित शरीर में आकर्षण है, उसका और भी कारण है, जी। एक भारी कारण यह है कि वह उसको चेतन मानता है, इसलिए आकर्षण है। दूसरा कारण, जीवित शरीर को शुद्ध मानता है। क्या बोला? जीवित शरीर को शनता है। डेड बॉडी को अशुद्ध मानता है। ब, इसलिए दूर भागता है। दूर भागता है। छूता है, स्नान कर। डेड बॉडी को अशुद्ध मानता है, इसलिए दूर भागता है। और छू लिया, तो फिर स्नान करेगा। यह तो अशुद्ध है। पर जीवित शरीर भी तो वही है। वो भी तो अशुद्ध है। 24 घंटे हम कौन सी सांस लेते हैं? कौन सी वायु लेते हैं? ऑक्सीजन लेते और छोड़ते कौन सी है? कार्बन डाइऑक्साइड। बोलो, शुद्ध वायु लेते हैं, अशुद्ध वायु छोड़ते हैं। 24 घंटे तो जीवित शरीर भी तो अशुद्ध है ना? हां, बुद्धि से सोचना ही पड़ता है। तो वो उसको शुद्ध मानता है, इसलिए आकर्षित होता है, जी। जी, जी। अगर उसको अशुद्ध मान ले, जीवित शरीर को, जी, तो आकर्षण नहीं होगा। तो दो कारण हुए। दो कारण हो गए। जी, और भी है। और भी देखता हूं। एक तो जड़ शरीर को चेतन मानता है, इसलिए आकर्षण है। हां, बिल्कुल। दूसरा, अशुद्ध शरीर को शुद्ध मानता है, इसलिए आकर्षण है। जी। तीसरा कारण है, शरीर अनित्य है, को नित्य मानता है और उसको नित्य मानता है, इसलिए आकर्षण है। यह भी एक कारण है, जी। शरीर नित्य है या अनित्य है? अनित्य। अनित्य है। सदा नहीं जिएगा। पर व्यक्ति यह मानता है, यह सदा जिएगा, मैं भी जिऊंगा, यह भी जिएगा, दोनों सदा जिएंगे। इसलिए आकर्षण होता है। अगर समझ में आए, यह सदा नहीं जिएगा, कभी भी। लो, कल की गारंटी है। कल सुबह उठेंगे हम, कोई गारंटी नहीं है। फिर अगर यह समझ में आ जाए, इस शरीर की कल की कोई गारंटी नहीं है कि कल सुबह व्यक्ति सोकर उठेगा कि नहीं उठेगा। कोई गारंटी नहीं है। अगर यह समझ में आ जाए आपको, उस व्यक्ति में आकर्षण नहीं होगा। जीवित शरीर में भी आकर्षण नहीं होगा, गारंटी है। यह बात मैं नहीं कह रहा हूं, मेरी बात नहीं है। महर्षि पतंजलि जी की बात है। वह यह बात कह रहे हैं। इसको भी दोरा। अनित्य सूची दुखा नाद मस। इसमें सारी बात लिखी हुई है। हां, चार बात। यह तो पतंजलि महाराज की बात। मेरी थोड़ी। जी, जी। वो कह रहे हैं, शरीर अशुद्ध है, इसको शुद्ध मानते हो, यह अविद्या है। जी। शरीर अनित्य है, आप नित्य मानते हो, यह अविद्या है। जी। शरीर जड़ है, आप चेतन मानते हो, यह अविद्या है। और शरीर में बहुत सारे रोग भरे पड़े हैं, छिपे हुए हैं, जो दुख है। हां, वो दुखदायक भी है, जी। जीवित शरीर में बहुत सारे रोग हैं। अब वो रोग जो है, वो कल को जब प्रकट होंगे, तब यही व्यक्ति दुख देगा हमको। उसकी चिकित्सा करानी पड़ेगी, डॉक्टर को ढूंढना पड़ेगा, धक्के खाने पड़ेंगे, चक्कर काटने पड़ेंगे, पैसे लगाने पड़ेंगे। वो दुख कहां दिख रहा है? उसको पूरा सुख दिख रहा है। शरीर में तो यही तो अविद्या है। अगर यह सारी बात समझ में आ जाए, तो सारा आकर्षण खत्म हो जाएगा। स्वयं के शरीर से भी तो दुख निकलेगा। अपने से भी होगा, तो व्यक्ति अपने शरीर को भी कहा अनित्य माने बैठा? सही बात। अपने शरीर को भी नित्य मानता है, दूसरे का भी नित्य मानता है। अपने को भी मानता है, दूसरे को भी शुद्ध मानता है। अपने जड़ शरीर को चेतन मानता है, दूसरे के जड़ शरीर को चेतन मानता है। और अपने शरीर में, अपना शरीर दुखदायक है, उसको नहीं मानता। दुखदायक, सुखदायक माने बैठा है। और शरीर को शरीर नहीं मानता, रूप वाला मानता है, आत्मा मानता है। शरीर को आत्मा मानता है। यह बात भी है। तो कितने सारे कारण हैं जो अविद्या को उत्पन्न, जो अविद्या के कारण हमको उसमें आकर्षण पैदा करते हैं। तो जिसको यह बात समझ में आती है, उसके पास सच्ची विद्या आई, तत्व ज्ञान उसको हुआ। तो जिसको तत्व ज्ञान होगा, उसकी अविद्या खत्म। जिसकी अविद्या खत्म, उसका राग भी खत्म। फिर उसको कोई राग नहीं होता। हां, वो सारी सारी तत्व ज्ञान उसको हो जाता है। शरीर दुखदायक है, शरीर अशुद्ध है, शरीर अनित्य है, शरीर जड़ है, शरीर आत्मा से अलग चीज है। यह सारा तत्व ज्ञान होने पर उसको कहीं भी आकर्षण नहीं रहता। सारा राग खत्म हो जाता है। बस। सांख्य दर्शन, योग दर्शन, न्याय दर्शन, सारे दर्शन यही बात कहना चाहते हैं। सबका एक ही सूर कि अविद्या का नाश करो, विद्या की वृद्धि करो। यह सारी अविद्या है, जो बार-बार जन्म दिलाती है। इसी के रहने पर अगला जन्म होगा और यह हट जाएगी, तो मोक्ष हो जाएगा।
स्वामी जी, जो शत्रु होता है और एक मित्र होता है, तो शत्रु का तो शरीर और आत्मा दोनों से हमको नफरत होती है, राग नहीं होता। वहां द्वेष होता है। हां, क्योंकि दुख वहां मिला ना। जहां दुख मिलता है, वहां द्वेष होता है। हां। और जो मित्र है, उसमें सुख मिलता है। मित्र से सुख मिलता है, इसलिए राग होता है। शत्रु से दुख मिलता है, उसमें द्वेष होता है। और यह दोनों खतरनाक हैं। राग भी और द्वेष भी। दोनों बंधन डालने वाले। इन दोनों का इलाज एक ही है, वैराग। वैराग कैसे होता है? वो तत्व ज्ञान से होता है। इसलिए कह रहे हैं, तत्व ज्ञान प्राप्त करो। 100 बीमारी का एक ही इलाज, तत्व ज्ञान। बस। जिसको तत्व ज्ञान हो गया, उसकी सारी अविद्या कट जाएगी। अविद्या कट गई, तो सारे शत्रु भाग जाएंगे। राग, द्वेष सब खत्म हो जाएगा। तो शत्रु तो नहीं होने चाहिए। लेकिन मित्र तो होने चाहिए। ऐसा संगठन। हां, मित्र होने चाहिए, बिल्कुल होने चाहिए। पर उसमें अविद्या नहीं होनी चाहिए। वो कहां से लाएंगे? मित्र में नहीं, खुद में। अच्छा, स्वयं में। स्वयं में मित्र तो रखना चाहिए। जी, जी। जिसको आपने मित्र बनाया, जी, अच्छी बात है। मौके पर वह सहायता देगा। हां, आप उसको सहायता देंगे, वह आपको सहायता करेगा। यहां तक ठीक है। हां, संगम सद मिलकर चलो, मिलकर बोलो, लक्ष्य की प्राप्ति करो। जी, तो यह तो ठीक है। लेकिन उस मित्र के बारे में यह समझना कि यह मित्र जीवित रहेगा, हां, यह अविद्या। यह तो वहां भी बचना पड़ेगा आपको अविद्या से। मित्र को भी यह मत मान लेना, यह हमेशा जिएगा और सब कुछ ठीक करेगा। और यह भी मत मान लेना कि हमेशा सुख देगा। यह भी मत मान लेना। यह भी अविद्या है। आप देखो, कितनी गहरी गहरी, बहुत बारीकी से सोचना पड़ता है। बारीकी से है। हां, माइक ले लो। जो शत्रु है, हा, उसके के बारे में क्या कह रहे हैं? माइक से बोलिए। मैंने कहा मित्र होने चाहिए। हा, अगर समझो उसकी जगह पर शत्रु हो, हा, तो जन्म मरण चक्कर में रहना पड़ेगा। अगर शत्रु है, तो वह अपनी तरफ से शत्रु है, तो कोई दिक्कत नहीं है। हमारा मोक्ष हो जाएगा। यदि हम उससे शत्रुता करेंगे, तो हमारा मोक्ष नहीं होगा। हमको शत्रुता नहीं करनी है। हमको, हमको दुश्मनी खत्म करनी है। हमको अपना द्वेष समाप्त करना है। हमारा द्वेष खत्म हो गया, हमारा मोक्ष हो जाएगा। दुनिया में 50 लोग हमारे दुश्मन हों, कोई चिंता नहीं है। हां, उससे कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि हम पर हमारा अधिकार है। हमारा अधिकार हम पर है, दूसरे पर तो है ही नहीं। वह कुछ भी सोचे, कुछ भी करे, वह हमारे कंट्रोल में थोड़ी है। इसलिए वह मोक्ष में बाधक नहीं है। यदि हम द्वेष करते हैं, तो वह बाधक है। अगर द्वेष करते हैं, तो अविद्या है। अविद्या है, तो जन्म मिलेगा, मोक्ष नहीं होगा। थोड़ा बहुत, थोड़ा बहुत द्वेष हो, तो भी मोक्ष नहीं होगा। वो जो, वो जो थोड़ा बहुत द्वेष है ना, उसका कारण क्या? अविद्या। अविद्या से ही तो द्वेष होता है ना? क्यों जी? राग भी उसी से, द्वेष भी। दोनों अविद्या से। यदि थोड़ा बहुत भी द्वेष है, तो मतलब थोड़ी बहुत अविद्या बची है, अभी पूरी नहीं मरी है। उस थोड़े बहुत द्वेष को खत्म करने के लिए अविद्या को भी पूरा नष्ट करना पड़ेगा। थोड़ा बहुत जो बची है विद्या, उसका नाश करना पड़ेगा। थोड़ा बहुत राग बचा है, तब भी मोक्ष नहीं होगा। उसका नाश करने के लिए भी कारण अविद्या है। राग थोड़ा बहुत जो राग बचा, उसका कारण भी थोड़ी बहुत अविद्या है। उस थोड़ी बहुत का भी नाश करना है। जीरो पर नहीं आई अभी अविद्या। जब जीरो पर आएगी, तब मोक्ष होगा। इसलिए ना किसी से राग कर सकते, ना द्वेष कर सकते। बोलिए, हो गया। आप बोलिए। माइक, माइक दीजिए। इनको दीजिए। हेलो जी। नमस्ते स्वामी। नमस्ते जी। आप बता रहे जैसे शरीर जड़ है। समाधि तो जड़ से ही लगनी है। हां, ठीक है। ना तो साधन के तौर पर यूज करेंगे। जड़ नहीं होगा तो आत्मा कहां से समाधि लगाए? हमने ये कब कहा कि शरीर फेंक दो, ले में, गली में, नाली में फेंक दो? यह कब कहा है? नहीं, वो नहीं। हमने शरीर फेंकने को नहीं बोला है। हमने बोला शरीर जड़ है, इसको जड़ मानो और यूज करो। आपकी कार जड़ है, आप यूज नहीं कर रहे क्या? नहीं। निराकार साकार में बैठा है, तो सारे सूक्ष्म शरीर काम करेंगे, तब काम बनेगा। टॉपिक बदलते जा रहे हैं, फटाफट फटाफट। कभी जड़ की बात कर रहे हैं, कभी समाधि की बात कर रहे हैं, कभी साकार की बात कर रहे हैं। टॉपिक मत बदलो। एक बात पकड़ो। हमने यह कहा था, शरीर जड़ है। हां। इसको जड़ मानना चाहिए या नहीं? नहीं मानना चाहिए? मानना चाहिए। तो फिर मेरी बात ही तो बोल रहे हो आप। अलग क्या है? कुछ भी नहीं। लेकिन आपकी शंका यह होनी चाहिए कि यह शरीर जड़ है, क्या यह समाधि प्राप्त करने में सहयोगी है? यह पूछना चाहिए आपको। यह पूछो, मैं उत्तर देता हूं। अच्छा, तो सहयोग तो इसी जड़ का ही लेना पड़ेगा। हां, मेरा उत्तर है, बिल्कुल सहयोगी है। शरीर जड़ है, इसका सहयोग ले। रोटी जड़ है, उसका सहयोग ले रहे हैं कि नहीं? हां, ले रहे हैं। कार जड़ है, उसका सहयोग ले रहे हैं या नहीं? 50 चीजें जड़ है, आप सबका सहयोग ले रहे हैं। शरीर भी जड़ है, उसका भी लो। कौन मना कर रहा है? बिल्कुल लो। जड़ है, पर अशुद्ध है, अनित्य है, दुखदायक है। समाधि प्राप्त करने का साधन भी है। हम क्या बोला? समाधि प्राप्त करने का साधन भी है। बस साधन के रूप में जितना लाभ देता हो, उतना ले लो। बाकी जो गड़बड़ है, उसको साइड में रखो। गड़बड़ को साइड में रखो। जितना लाभकारी हो, उतना लाभ ले लो। तो इसका नाम तत्व ज्ञान है। तो यह तत्व ज्ञान आपके अंदर वैराग्य को उत्पन्न करेगा। वैराग्य बना रहेगा, तो आप समाधि तक भी पहुंच जाएंगे, मोक्ष भी हो जाएगा, सब काम हो जाएगा। जैसा है, वैसा माने। हां, बोलिए। हां, जड़ होते हुए भी शरीर समाधि को प्राप्त कराने का साधन है। है जी। हां। वेद में लिखा है, वेद में लिखा है, शरीरा आदि अनित्य पदार्थों का सहयोग लेवे और समाधि लगाकर मोक्ष को प्राप्त करें। यह वहां तक पहुंचाने वाले साधन हैं। इसलिए इसकी जरूरत है। इसकी जरूरत है। इसका प्रयोग करें। इसको स्वस्थ रखें। घी, दूध, मक्खन, मलाई खाएं। शरीर को व्यायाम करके बलवान बनाएं। इसकी शक्ति को बढ़ाएं, क्योंकि इसके बिना हम मोक्ष तक नहीं पहुंच पाएंगे, समाधि तक नहीं पहुंच पाएंगे, विद्या नहीं पढ़ पाएंगे, परोपकार नहीं कर पाएंगे। यह वहां तक पहुंचाने का साधन है। साधन होते हुए भी उसके माइनस पॉइंट्स मत भूल जाना। यह कहना चाह रहे हैं। जो प्लस पॉइंट्स हैं, उनको प्लस मानो। जो माइनस है, उसको माइनस मानो। आप स्टील के गिलास में पानी पीते हैं? क्या कांच के गिलास में पानी पीते हैं? दोनों में पीते हैं ना? पर जितनी सावधानी से आप कांच का गिलास यूज करते हैं, उतनी सावधानी से स्टील का गिलास नहीं करते। फर्क है। आप समझते हैं, यह कांच का गिलास है, टूट सकता है। ध्यान से उठाओ। हाथ से छूटा, तो टूट जाएगा। यानी आप उस गिलास का प्लस पॉइंट भी जानते हैं कि गिलास में पानी डालकर पी सकते हैं और उसका माइनस पॉइंट भी जानते हैं कि अगर छूट गया, तो टूट भी जाएगा। दोनों जानते हैं और दोनों समझ कर के व्यवहार करते हैं। क्या कांच के गिलास से आपका व्यवहार ठीक नहीं चल रहा? चल रहा है। तो जैसे कांच के गिलास के प्लस माइनस दोनों पॉइंट्स जानते हैं और दोनों को समझ के ठीक व्यवहार करते हैं, तो ऐसे ही शरीर में कुछ प्लस पॉइंट्स हैं, कुछ माइनस पॉइंट्स हैं। दोनों को समझो और इससे लाभ उठाओ। जब गिलास से लाभ उठा सकते हैं, शरीर से भी उठा सकते हैं। शरीर के प्लस पॉइंट्स ये हैं, यह हमको मोक्ष तक पहुंचा देगा, समाधि तक पहुंचा देगा। यह प्लस पॉइंट्स है। इस शरीर की सहायता से हम विद्या पढ़ लेंगे, परोपकार कर लेंगे, समाधि भी लगा लेंगे। ज्ञान, कर्म, उपासना, तीनों करने में, कराने में यह हमारा सहयोगी है। यह प्लस पॉइंट्स है। और इसके माइनस पॉइंट्स क्या है? यह अशुद्ध है, दुखदायक भी है, रोग रोग वाला भी है और जड़ भी है और अनित्य भी है। यह इसके माइनस पॉइंट्स है। तो माइनस भी दिमाग में रखें, प्लस भी रखें और लाभ उठाए। कोई समस्या नहीं। ऐसे करना चाहिए। हां, बोलिए। माइक, माइक पीछे दीजिए। उनको। हेलो जी। अच्छा स्वामी जी, आपने जो बताया कि मृत्यु के समय अगर अविद्या नहीं रहती है, मृत्यु के समय, मृत्यु के समय अगर अविद्या नहीं रहती है, ठीक है। तो मोक्ष हो जाता है और दूसरा जन्म नहीं होता है। ठीक है। तो इस जन्म के अंदर जो अच्छे बुरे कर्म किए, उसके फल का क्या? उसका फल मुक्ति से लौटकर भोग, मुक्ति से वापस आएंगे ना? मुक्ति के बाद दूसरा जन्म होगा, वापस आएंगे, मिलेंगे। हां, फिर भोग। ठीक है। हां, और बोलिए। जिसको पूछना है। इनको दीजिए।