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VCD 717

ADHYATMIK VIDYALAYA OR AIVV41:59

Transcription

ओम शांति। आज का क्लास है 5 नवंबर 1967। रिकॉर्ड चला है धीरज धर मनुवा धीरज धर। रूहानी बच्चों ने गीत सुना कि सुख के दिन आवेंगे और दुख के बादल हट जावेंगे। कैसे हटेंगे सो बाप बैठे बच्चों को समझाते हैं।

कहते हैं बच्चे दुख के बादल हटाने हैं तो अशरीरी बनते जाओ। दुखों के पहाड़ गिरेंगे। अगर देह भान में होंगे, आत्मा अभिमान की शान में नहीं होंगे तो बहुत बहुत परेशान हो जावेंगे। इसलिए कहते हैं बच्चे अशरीरी बनते जाओ। बाप को याद करते रहो। शरीर को भूलने में ही टाइम लग जाता है।

[संगीत]

यह देह को भूलना कोई मासी का घर नहीं है। अपन को आत्मा समझते जाओ। हम रूहानी बाप के बच्चे अशरीरी हैं। यही बाप का डायरेक्शन है कि बच्चे अशरीरी बनते जाओ तो तुम्हारे सब दुख दूर हो जावेंगे और तुम सतो प्रधान बन जावेंगे। सतो प्रधान आत्मा कभी भी दुख भोग नहीं सकती। तुम्हारी कर्मातीत अवस्था हो जावेगी। यह मेहनत की बात है। जो समझाते हैं वह भी ऐसे ऐसे अशरीरी बनने का पुरुषार्थ जरूर करते होंगे। उनको भी वाणी से परे जाना है। तो जरूर यह अभ्यास करना आता होगा। फिर कोई आकर कहेंगे बाबा गुड मॉर्निंग तो फिर इनको नीचे उतर के गुड मॉर्निंग करना पड़ेगा। आवाज में आना पड़ेगा। यह तो पुरुषार्थ करते रहते हैं। वाणी से परे होने का क्योंकि इस पुरुषार्थ से ही पाप कटते जावेंगे। पाप कटते कटते आत्मा पावन बन जावेगी। इनको भी अभ्यास करना है ना। बाप श्रीमत देते हैं बच्चों। तो यह भी उसमें आ जाता है। इनको भी बाप कहते हैं। अशरीरी आए हो फिर अशरीरी होकर जाना है। अशरीरी बनने से ही पाप कटेंगे। इसको याद की यात्रा अथवा योगा अग्नि कहा जाता है। मुख्य यह पुरुषार्थ है। अपन को आत्मा समझ बाप को याद करते रहो। सतो प्रधान बनने के लिए पुरुषार्थ तो करना पड़ेगा। जब सतो प्रधान बनेंगे तो अशरीरी बन जावेंगे। वाणी से परे रहने का पुरुषार्थ करते रहेंगे। और इनको भी अभ्यास करना है। यह समझते हैं जैसे अशरीरी हो। बाप को मैं याद करूंगा। मुझे देखकर के बच्चे भी ऐसे करने लग पड़ेंगे। बाप समझाते रहते हैं। तुम्हारा कल्याण इसे एक बात में ही होना है। कौन सी एक बात? अपन को अशरीरी आत्मा समझो। सुबह को सवेरे तीन-4 बजे उठो। उठकर के स्नाना आदि कर यही ख्यालात रखना चाहिए कि हम अशरीरी हैं और हम आत्मा अपने बाप को याद करते हैं। बाप को याद करने से विकर्म विनाश होंगे। कर्मातीत अवस्था होगी। फिर जरूर दुख के बादल हटते जावेंगे। बाप जो कहते हैं वह करना चाहिए ना। मैं आत्मा हूं। शिव बाबा का बच्चा हूं। वास्तव में मैं अशरीरी हूं। फिर यहां पाठ बजाने के लिए यह शरीर लिया है। अभी चक्र पूरा किया। अभी हमको वापस जाना है। अपन को अशरीरी समझते आवाज से परे जाना है। अगर किसी को गुड मॉर्निंग करना पड़े तो गोया आवाज में उतरना पड़े। नहीं तो शांति में बैठना पड़े। बाबा अपन को आत्मा समझ बाप की याद में बैठे रहते हैं। हम भी अशरीरी हो बाप की याद में बैठ जावे। फिर क्लास में भी टाइम पर आना है। यहां भी देह अभिमान छोड़ अपन को आत्मा समझ बैठना है। बाबा समझाते तो बहुत अच्छा है। सिर्फ कहना नहीं है। कथनी को फिर करनी में भी लाना है। बाप कहते हैं बच्चे भूल जाते हैं। तूफान तो बहुत आवेंगे। मन को बाहर के तूफानों से हटाए। अपन को आत्मा समझो। आत्मा समझने से बुद्धि भटकेगी नहीं। याद में ही मेहनत है। तो यह मेहनत करनी है। सिर्फ कहने की बात नहीं है। अगर कोई से दिल लगाई फीमेल को देख क्रिमिनल आई गई तो यह कोई अशरीरी पना नहीं है। अशरीरी पने में का कोई की याद नहीं रहेगी। देह अभिमान में आने से यह आंखें धोखा देती हैं। फिर उनकी याद आती रहेगी। मंजिल बड़ी ऊंची है। यह बाबा समझाते भी हैं। और अभ्यास भी करते रहते हैं। शिव बाबा को तो अभ्यास नहीं करना है। इस दादा को करना है। पहले पहले तो अपन को आत्मा समझना है। बाबा ने कहा है तुम अशरीरी हो। शरीर का भान तोड़ना है। बाबा खुद कहते हैं बच्चों को भी सिखलावेंगे। ऐसे करो ऐसे बैठो। थक जाओ तो फिर लेट जाओ। अशरीरी समझ बाप को याद करते रहो। यह पुरुषार्थ करो। तुम ऐसे पुरुषार्थ करते नहीं हो। सिर्फ कथनी है। करनी नहीं है। बाबा समझते हैं कथनी में बहुत आते हैं। कथनी और करनी एक जैसी होनी चाहिए। अभ्यास पड़ जाने से तुम घड़ी घड़ी अशरीरी हो जावेंगे। यह टेव पड़ने में टाइम लगता है। घड़ी घड़ी में समझो मैं आत्मा हूं। बाकी बाप की याद में ही विघ्न पड़ते हैं। घड़ी घड़ी याद छूट जावेगी।

51 1967 की वाणी का दूसरा पेज। आज बाबा खास इस बात पर ध्यान दे रहे हैं। कर्मातीत अवस्था तो पिछाड़ी में ही होगी। क्यों? हम अभी से इतना तीखा पुरुषार्थ करें।

[संगीत]

अपन को पक्का पक्का आत्मा समझ के बैठे। फिर भी कर्मातीत अवस्था पिछाड़ी में क्यों बनेगी? क्योंकि पिछाड़ी में ही 63 जन्मों का हिसाब किताब सबका चुक्त होना है। जिनका बहुत पुरुषार्थ होगा वो पहले पहले कर्मातीत अवस्था को पा सकेंगे। बहुत मेहनत करने से पिछाड़ी में कर्मातीत अवस्था होनी है। तो घड़ी घड़ी अभ्यास करते रहो। कर्मातीत अवस्था होगी तो ऊंच पद पाएंगे। सिर्फ कहने से नहीं पावेंगे। इसे कोई आसन लगाने, आठ योग आदि करने की भी दरकार नहीं है। हम आत्मा शरीरी हैं। पीछे इस शरीर में प्रवेश किया है। अभी हमको वापस जाना है। अभी हमको कोई दूसरे के शरीर में प्रवेश नहीं करना है। पहले घर वापस जाना है। तो घर को याद करना पड़े। बाबा समझाते तो हैं परंतु यहां से बाहर निकलते ही भूल जाते हैं। बाबा जो कहते हैं वह करते नहीं है। देह अभिमान में आने से कर्मेंद्रियां बहुत धोखा देती रहेंगी। सेकंड में कुछ ना कुछ विकर्म कर लेते हैं। जैसे सेकंड में जीवन मुक्ति वैसे माया सेकंड में गटर में डाल देती है। इसलिए बाबा कहते हैं बहुत ऊंच मंजिल है। अपन को बाहर के ख्यालात से हटाए बाप को याद करना है। फिर गुड मॉर्निंग करने की आवाज नहीं निकलेगा। लाचारी हालत में आवाज में आए फिर चढ़ जावेंगे। रिसोंड करने के लिए तो नीचे आना पड़ता है। आवाज में आना पड़े। आवाज इस दुनिया की बात है। ऐसे अगर बच्चे अभ्यास करते रहेंगे तो जरूर कुछ ना कुछ कल्याण होता जावेगा। कर्मेंद्रियां वशीभूत होती जावेंगी। इसको ही कर्मातीत अवस्था कहा जाता है। बाकी शरीर निर्वाह के लिए कर्म तो करना पड़ता है। अगर बच्चों के पास पैसा बहुत है कमाई करने की दरकार नहीं है तो और ही सौभाग्यशाली पद्मा पदम भाग्यशाली हैं। कहेंगे इन्होंने पूर्व जन्मों में ऐसे अच्छे कर्म किए हैं जो इस जन्म में निर्बंधन बने हैं। तो देखना है इस एक जन्म के लिए हमारे पास धन काफी है। तो अब हम कर्मातीत अवस्था में बैठ जावे। इस अवस्था में बैठे-बैठे शरीर छूट जावे तो फिर अंत मते सुगति हो जावेगी। बाप को याद करते घर चले जावेंगे। अभी तो घर जाना है ना। अभी शरीर नहीं लेना है। पहले घर जाना है। ऐसे ऐसे अभ्यास करते रहेंगे तो फायदा बहुत होगा। और तुम्हारे दुख दूर हो जावेंगे। बाप आए हैं धीरज देने के लिए। तुमको अशरीरी पना सिखलाने के लिए आए हैं। अपन को आत्मा समझ बाप को याद करने से कर्मेंद्रियों पर विजय पावेंगे। और कोई उपाय नहीं है। बाकी सिर्फ कथनी होगी। करेंगे कुछ भी नहीं। तो इतना प्योर नहीं बन सकेंगे। माला का दाना भी नहीं बन सकेंगे तो पुरुषार्थ करके विजय माला में पिरोना है। बच्चों को दिल में लगता है बाबा तो ठीक कहते हैं। और जो कहते हैं वह करना चाहिए। बाकी कोई से आंख लगाना, बायोस्कोप देखना यह सब व्यर्थ टाइम गवाना है। बाप कहते हैं अशरीरी बन मुझे याद करो। अगर बाप का फरमान नहीं मानते हैं तो गोया नास्तिक ठहरे। बाप रोज बच्चों को संभालते रहते हैं। आज थोड़ा जोर से समझाते हैं। पुरुषार्थ बहुत करना है। ऊंच मंजिल समझ के डरना नहीं है। पार निर्वाण जाना भी जरूरी है। क्योंकि इस समय सभी की वानप्रस्थ अवस्था है। कर्मातीत अवस्था में आगे पीछे जाना जरूर है। अगर पुरुषार्थ नहीं करेंगे तो पद बहुत कम हो जावेगा। बहुत बच्चे हैं जो जरा भी याद नहीं करते हैं यथार्थ रीति अपन को आत्मा समझ बाप को याद करना है। शरीर का भान मिटता जाए। इसी पुरुषार्थ में मेहनत है। कितना सहज थोड़े ही डबल सिर ताज बनेंगे। कौन सा डबल ताज? हम यहां है जिम्मेवारी का ताज। और वहां होगा स्थूल ताज। जितनी जितनी यज्ञ की जिम्मेवारी उठावेंगे माना जितनी जास्ती ईश्वरीय सेवा करेंगे उतना वहां बड़े ताजधारी राजा बनेंगे। दूसरा ताज कौन सा है? पवित्रता का ताज पवित्रता धारण करनी पड़े जो यहां पवित्र बनेंगे उनको देवताओं का ताज दिखाया जाता है। सर के चारों ओर पवित्रता दिखाई गई है। नरसी नारायण बनने के लिए कर्मातीत अवस्था चाहिए। और कुछ भी याद ना पड़े। सर्प का भ्रमरी का दृष्टांत अभी का है। बाप ने समझाया है वह सन्यासियों ने कापी किया है। वह कोई ब्राह्मण नहीं है। ब्राह्मण ब्राह्मणियां तो तुम हो। तो तुम्हारे लिए सर्प का दृष्टांत है। कैसे कचुल त्यागता है कि तुम्हारी देह अभिमान की कचुल है। वो सांप भी अपने जीवन में तीन चार बार कचुल त्यागते हैं। तुम्हारी जो बुद्धि रूपी आत्मा है वह भी शूटिंग पीरियड में तीन चार आयाम करती है। फिर प्रैक्टिकल में भी देह भान त्याग करके निरोगी कंचन काया बनाने में तीन चार आयाम है।

[संगीत]

तो सन्यासियों को वास्तव में कापी नहीं करना चाहिए। जो चोरी से दूसरों की बात को कापी करते हैं उनको सजा मिलती है। कछुए का मिसाल भी वो नहीं दे सकते। तुमको शरीर निर्वार्थ कर्म करके फिर याद की यात्रा में कछुए की मिसल अंतर्मुख होकर के बैठना है। सर्प मिसल तुम्हारी पुरानी खाल छूट जावेगी। अभी अशरीरी बनना है। हम आए थे पहले पहले तो आत्मा अशरीरी थी। फिर हम नहीं 84 जन्म लिए। भांति भांति के शरीरों के संबंध में आए। चक्र तो याद आता है ना। अभी हम बाप को भी याद करते हैं। चक्र को भी याद करते हैं। इसी को कहेंगे ज्ञान और योग। इसमें याद का चार्ट बढ़ाना चाहिए। अपनी डायरी रखनी है। कितना समय हम याद में बैठे। अपना कम चार्ट देखकर के लज्जा आनी चाहिए। भक्ति भी हमेशा सवेरे सवेरे करते हैं। कहते भी हैं राम सिमर प्रभात मोरे मन आत्मा को कहते हैं अब राम को सुमिरन करना है। अर्थात याद करना है। इससे ही विकर्म विनाश होंगे। अभी बच्चे आते हैं बाबा के पास गुड मॉर्निंग करने तो बाबा ना तो नहीं करेंगे। अच्छा भला आवे परंतु समझते हैं बाबा याद में बैठे हैं। बाबा को नीचे वाणी में आना पड़ेगा। फिर आत्मा समझ बैठ जाना पड़ेगा। कहेंगे गुड मॉर्निंग। और क्या कहेंगे? भले गुड मॉर्निंग करके जावे।

5 11 67 की वाणी का तीसरा पेज। वास्तव में गुड मॉर्निंग भी क्या करना है? क्यों ना अपन को आत्मा समझे और सामने वाली आत्मा को आत्मा के रूप में देख के बैठ जावे। बच्चे भी याद में बैठ जावे तो और ही मदद मिलेगी। इससे क्या साबित हुआ? हम आपस में एक दूसरे से मिले तो ओम शांति। गुड मॉर्निंग। करना चाहिए या नहीं करना चाहिए? हैं नहीं करना चाहिए। फिर क्या करना चाहिए? अपन को आत्मा समझ गुड मॉर्निंग करने वाले को भी आत्मिक रूप में देख के शांत ही रहना चाहिए। फिर ऐसे नहीं क्लास में नहीं आना है। कोई नाराज हो जावे बाबा गुड मॉर्निंग का रिसोंड भी नहीं देते हैं। नहीं क्लास में भी आना है। बाप भी बच्चों को श्रीमत देते हैं श्रेष्ठ बनने के लिए। तमो प्रधान से सतो प्रधान बनना है। सतो प्रधान प्योर आत्मा को और तमो प्रधान पतित आत्मा को कहा जाता है। अगर गुड मॉर्निंग का जवाब वाणी से नहीं मिलता है। इशारे से मिल जाता है और कोई नाराज हो जाता है कि वाणी से हमको जवाब नहीं दिया तो तमो प्रधान आत्मा कहेंगे या सतो प्रधान कहेंगे।

[संगीत]

यहां मनुष्य को धन आदि बहुत होता है। तो कितना अहंकार आता है। धन बहुत है तो समझते हम स्वर्ग में बैठे हैं। परंतु हैं तो नरकवासी। यहां कोई भी अपन को स्वर्गवासी कह नहीं सकता। इस कलयुगी दुनिया में फिर स्वर्ग कहां से आया? मनुष्य समझते हैं कलयुग में अर्जुन 4000 वर्ष पड़े हैं। बिल्कुल ही अज्ञान अधियारी में है। कुंभकरण की नींद में सोए पड़े हैं। जब भंभोर को आग लगेगी तब जागेंगे। परंतु फिर टू लेट हो जावेंगे। क्यों उस समय टू लेट क्यों हो जावेंगे उसी समय वो भी पुरुषार्थ कर लेंगे लास्ट में आके फास्ट नहीं चले जावेंगे टू लेट क्यों हो जावेंगे क्योंकि पढ़ाई तो पढ़ने का मौका ही नहीं मिला बमोर को आग लगेगी तो भगदड़ मच जावेगी। पढ़ाई तो शांति में होती है। अभी पढ़ाई पढ़ने का मौका है। फिर पढ़ाई पढ़ने का मौका नहीं मिलेगा। बाप की पहचान भी नहीं कर सकेंगे। टू लेट हो जावेंगे। यह भी होना है। फिर क्या होगा? देरी से जागेंगे और विनाश को पालेंगे। ऊंच पद पाए नहीं सकते। क्योंकि ज्ञान तो बुद्धि में है नहीं। अभी यह तुमको ज्ञान रत्न मिलते हैं जिससे तुम्हारा 21 जन्मों के लिए भंडारा भर जाता है। इन ज्ञान रत्नों को अलाउद्दीन का कार खजाना कहा जाता है। तुम जानते हो अभी हम स्वर्ग की बादशाही ले रहे हैं। परंतु सिर्फ कहने मात्र से तो राजाई नहीं मिल जावेगी। मेहनत करनी पड़े। मेहनत करने के लिए भी टाइम चाहिए। अभी तो यहां एकांत का बहुत अच्छा स्थान है। ऐसा अभ्यास फिर बाहर में कर नहीं सकेंगे। सात दिन की भट्टी का अभ्यास यहां तुम बहुत अच्छा कर सकते हो। तो यहां तुम टाइम वेस्ट मत करो। टाइम की संभाल करना सीखो। बाकी क्रिमिनल लाई रखना, 22 को उपाधि देखना, यह तो नीचे गिरने की निशानी है। बायोस्कोप देखने वालों की चढ़ती कला तो हो नहीं सकती। कहेंगे तुम मेहनत कहां करते हो तो अभी अपन को आत्मा समझ बैठो आत्मा है ही बाप का बच्चा मुख्य बात है अपन को आत्मा समझ अशरीरी हो बैठ जाओ मैं देह नहीं हूं आत्मा हूं पहले आत्मा को पक्का निश्चय करो। ऐसा नहीं करेंगे तो आंखें धोखा देती रहेंग। बहिर्मुखता में आते जावेंगे। अंतर्मुखता को पा नहीं सकेंगे। कहां भी रहो? यह अंतर्मुखता का अभ्यास कर सकते हो। ऐसे भी नहीं है कि यहां रहने से ही अभ्यास होगा। यहां तो सात रोज की भठी में आकर के यह सीखना है और उस भट्टी की जो ऊंची स्टेज है उसको सदा याद रखना है। बाप अभी भी सिखाए रहे हैं। यूं तो रोज समझाते रहते हैं। फिर आज जोर से समझाते बच्चे अपन पर रहम करो। जब तुम पवित्र थे तो तुम्हारे में कितनी शक्ति थी? आत्मा पवित्र थी। तो कोई के संग के रंग में नहीं आना चाहती थी। आत्मा अपवित्र बनी तो विभिचार दोष में आते रहते हैं। शक्ति क्षीण होती जाती है। पहले तुम्हारे में कितना सुख था। तुम ऐसे लक्ष्मी नारायण मुफिक थे। अभी फिर बनना है। बाबा युक्तियां बतलाते रहते हैं। तो वह युक्तियां करनी पड़े। अभी तुम अजामिल जैसे पापात्म हो। सब अजामिल है। 84 जन्म लिए हैं तो अजामिल ठहरे। यह बहुत जन्मों के भी अंत का जन्म है। अभी भक्ति पूरी की है। पाप भी पूरे किए हैं। ऐसे नहीं भक्ति करने से पाप कटते हैं। कुछ भी नहीं। यह अभ्यास तो बाप के सिवाय कोई सिखला ही नहीं सकता। भक्ति करतेकरते नीचे ही उतरते आए हैं। नीचे उतरते अत एकदम पट में आकर के गिरे हैं। जिसने भक्ति की वो आज आमिल बन पड़े। अजामिल कोई दूसरा नहीं होता है। तुम सबसे ज्यादा अजामिल हो। और बंदर भी सबसे बड़े तुम हो। सेना भी देखो तुम्हारे लिए है। तो बाप समझाते हैं बच्चे अभी गफलत मत करो। मुफ्त में अपना समय बर्बाद करेंगे। तो बाबा वार्निंग देते हैं। अभी क्रिमिनल आई नहीं रखनी है। यह आंखें बहुत धोखेबाज हैं। तब तो सूरदास का मिसाल देते हैं। ऐसा कोई ने किया नहीं है। यह तो एक कथा बनाई दी है। नाम है बाकी ऐसे कौन बैठा अपनी आंखें निकालेंगे ये सब भक्ति मार्ग के गपोड़े हैं। रामायण, भागवत आदि ये जो भी है वह सब भक्ति मार्ग के शास्त्र है और सब गिरने गिराने के हैं। एक गीता ही है जिससे तुम ऊपर चढ़ते हो। परंतु उस गीता को भी खंडन कर दिया है। कहां शिव बाबा जो पतित पावन और कहां श्री कृष्ण जो पूरे 84 जन्म लेने वाला मनुष्य कितनी बड़ी भूल है। 84 जन्म वाला ही पतित अजामिल कहेंगे। बाबा बच्चों को समझाते रहते हैं अभी अशरीरी बनो। कर्मातीत हो जाओ तो जन्म मरण के चक्र से छूट जावेंगे। यहां तो सब आय करके नहीं बैठेंगे।

[संगीत]

फिर तो बहुत मकान आदि बनाने पड़े। तुम बच्चे आकर के रहते हो इसलिए यह हाल आदि बनाने पड़ते हैं। बुद्धि में चलता है। यह बनाना है। फिर भी याद की यात्रा में जरूर रहना है। रात का अभ्यास बढ़ाओ। अमृत बेला 2 बजे को कहा जाता है। भक्त लोग भी रात को 2:00 बजे उठते हैं। अभी तो बाप कहते हैं मामेम याद करो तो विकर्म विनाश हो जाए। अपन को आत्मा समझो। इतना ऊंच पद पाने के लिए मेहनत करो। पहले पहले यह अभ्यास करो। तो हम आत्मा शरीरी हैं। अपन को आत्मा निश्चय करेंगे तो बाप आप ही याद आवेगा। याद की यात्रा से ही बेड़ा पार होना है। तुम उस तरफ चले जावेंगे। पहले निर्वाण धाम में जाकर के फिर यहां आकर के राज्य करेंगे। पहले राजाई का मालिक बनने के लिए अशरीरी होने का अभ्यास करो। बाबा आज बच्चों को बहुत सावधानी दे रहे हैं। परंतु बच्चे मेहनत करते नहीं है। इसलिए बच्चों पर बहुत तरस पड़ता है। यह बच्चे ऊंच पद कैसे पा सकेंगे? अच्छा। ओम शांति।

[संगीत]