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Malika Aur Mina Parinde Ka Anokha Qissa || Moral Stories in Urdu & Hindi

VibeElevate1:08:35

Transcription

बहुत पुराने जमाने में बगदाद शहर पर एक सुल्तान सल्तनत का राज करता था, जो बहुत इंसाफ पसंद और रहम दिल था। इस शहर की आवाम इससे बहुत खुश थी। मगर इस सुल्तान का कोई औलाद ना थी। औलाद की फिक्र में वह हर वक्त उदास और परेशान रहता था। इसकी सुल्ताना भी औलाद ना होने की वजह से हर वक्त उदास और परेशान रहती थी।

सुल्तान ने हकीमों को बुलाकर सुल्ताना का अच्छा इलाज करवाया। मगर फिर भी औलाद ना हुई। बड़े-बड़े बुजुर्गों से दुआएं भी करवाईं। फकीरों को बहुत सदका दिया। मगर औलाद ना होना थी, सो ना हुई।

एक दिन सुल्तान इसी फिक्र में सर झुकाए अपने बाग में एक तालाब के किनारे बैठा था कि एक मेहा उड़ती हुई वहां से गुजरी। इसने इतना खूबसूरत बागा देखा तो सुल्तान को यूं उदास बैठे देखकर वह तालाब के पास दरख्त पर आ बैठी। कुछ देर खामोश बैठकर सुल्तान को देखती रही। फिर इसने सुल्तान से बात की और कहा, "सुल्तान साहब, आप क्यों उदास हैं?"

सुल्तान मेहा की मीठी आवाज सुनकर चौंक गया। मेहा की आवाज औरतों जैसी थी। इसलिए इसने इधर-उधर देखा कि शायद कोई दासी आई हो। मगर जब इसने आसपास कोई औरत ना देखी तो वह बहुत परेशान हुआ। मेहा ने सुल्तान को परेशान देखा तो हंसते हुए बोली, "सुल्तान साहब, मैं दरख्त के ऊपर हूं।"

और सुल्तान चौंक कर ऊपर देखने लगा। इसने ऊपर मेहा को बैठी देखा। मगर इसने इंसान की आवाज में बोलने वाली मेहा आज तक ना देखी थी। इसलिए वह हैरान रह गया कि दरख्त से किसकी आवाज आ रही है। "मैं मेना हूं। मैं बोल रही हूं सुल्तान साहब।" मेना ने एक बार फिर कहा।

और सुल्तान हैरत के मारे उठ खड़ा हो गया। इसने कहानियों में जरूर पढ़ा था कि दो परिंदे इंसान की बोली बोल सकते हैं। एक तोता और दूसरी मेना। मगर इसने आज तक इंसान की आवाज में बोलने वाली मेना ना देखी थी।

सुल्तान ने हैरत भरे अंदाज से सवाल किया, "तुम कौन हो और तुम कैसे इंसान की आवाज में बोल लेती हो?"

मेना ने कहा, "मैं मेना शहजादी हूं सुल्तान साहब और मेना रानी की अकेली बेटी हूं। मेरा नाम मेनार मेना है और मेरा घर जिन मुल्क में है। मैं दुनिया की सैर करने निकली हूं। आज मैं यहां से गुजरी तो इतना खूबसूरत बाग में आपको उदास देखकर रह ना सकी और यहां उतर कर आपसे आपकी उदासी का सबब पूछ बैठी।"

मेनार मेना ने अपनी मीठी आवाज में कहा। सुल्तान ने कहा, "बहुत मेहरबानी। मेनार मेना, तुम बहुत अच्छी मीना हो। बहुत ही अच्छी हो। तुम्हारी आवाज बहुत मीठी है। मुझे तुमसे मिलकर बहुत खुशी हुई है।" सुल्तान ने मसरत भरे अंदाज से कहा। एक परिंदे से बातें करके उसे सच में बहुत खुशी हो रही थी।

मेनार मेना ने अपना सवाल दोहराते हुए कहा, "मगर सुल्तान साहब, आपने बताया नहीं कि आप क्यों उदास हैं।"

सुल्तान ने दोबारा उदास होते हुए कहा, "यह बात मत पूछो प्यारी मेना, यह मेरे दिल का मर्ज है।"

मेना ने इसे समझाते हुए कहा, "सुल्तान साहब, मैं छोटा सा परिंदा जरूर हूं। मगर मेरे वालिद ने मुझे बड़े-बड़े समझदार मेन्हों से पढ़ाया है और फिर बहुत सी बातें ऐसी होती हैं जो सिर्फ हमें परिंदों को मालूम होती हैं।"

सुल्तान ने मेना को कम अल्फाज में बता दिया, "अच्छा प्यारी मेना, अगर तुम जोर देती हो तो मैं बताता हूं। बात सिर्फ यह है कि अल्लाह ने मुझे औलाद से दूर रखा है। औलाद के दुख में मैं हर वक्त परेशान रहता हूं। सोचता हूं मेरे मरने के बाद मेरा नाम चलाने वाला कोई ना होगा। मेरे तख्त पर गैर कब्जा कर लेंगे।"

मेना ने कहा, "मुझे बहुत अफसोस है सुल्तान साहब। मैंने अपने बड़ों से सुना है कि जिस इंसान की औलाद ना हो, अगर वह शाह फल खा ले तो अल्लाह उसे औलाद दे देता है।" मेना ने कुछ सोचते हुए कहा।

सुल्तान ने हैरान होते हुए पूछा, "यह शाह फल कौन सा फल है? मैं तो इस फल का नाम ही आज सुन रहा हूं।"

मेना ने इसे बताया, "यह फल तमाम दुनिया के फलों में सबसे ज्यादा कीमती फल होता है। इसलिए इसे शाह फल कहा जाता है और यह नायाब फल है।"

सुल्तान ने दोबारा उदास होते हुए कहा, "अगर यह नायाब है मेना, तो फिर इसके जिक्र से क्या फायदा? जो चीज मिलती ही ना, उसको ढूंढने का कोई फायदा नहीं है।"

मेना कहने लगी, "निराशा गुनाह है सुल्तान साहब। हर जमाने में एक शाह फल कहीं ना कहीं मौजूद होता है। जब वह शाक से टूट जाता है तो अल्लाह दुनिया के किसी हिस्से के किसी इलाके में एक और शाह फल पैदा कर देता है। इसलिए अगर सच्चाई से कोशिश की जाए तो शाह फल मिल सकता है।" मीना ने जवाब दिया।

सुल्तान ने ख्वाहिश भरे अंदाज से कहा, "मैं अपनी जान देकर भी शाह फल पाने के लिए तैयार हूं, अगर मुझे किसी तरह मालूम हो जाए कि शाह फल कहां मिल सकेगा।"

मेनार मेना ने सुल्तान को हौसला देते हुए कहा, "सुल्तान साहब, आप उदास ना हों। मैं वापस जिन मुल्क जाती हूं। हमारे वजीर आजम बहुत दानिश्वर और समझदार हैं। उन्हें जरूर शाह फल के बारे में इल्म होगा। मैं उनसे पूछकर आपको आकर बता दूंगी। इसके बाद इसे पाने का आप मंसूबा बनाएंगे।"

सुल्तान ने कहा, "अगर ऐसा हो जाए तो यकीन करो प्यारी मेना, मैं यह एहसान तमाम उम्र ना उतार सकूंगा।"

मीना ने कहा, "यह कोई एहसान नहीं सुल्तान साहब। मैं काफी दिन से आपके शहर की सैर कर रही हूं और मुझे हर जगह से यही मालूम हुआ है कि आप बहुत इंसाफ पसंद और रहम दिल हैं। इसलिए मुझे आपसे लगाव और हमदर्दी हो गई है। फिर आपका दुख दर्द दूर हो जाए तो मुझे बहुत खुशी होगी, क्योंकि मेरे मां-बाप ने हमेशा मुझे यही समझाया है कि किसी मुसीबत में फंसे के काम आना ही सबसे बड़ी नेकी है।" मेहा ने जवाब दिया।

सुल्तान ने खुश होते हुए कहा, "बहुत-बहुत शुक्रिया मेना। तुम मेरे लिए अल्लाह की रहमत बनकर आई हो।"

मीना ने कहा, "अच्छा सुल्तान साहब, अब मैं चलती हूं। मुझे जिन मुल्क आने-जाने में कम से कम एक हफ्ता लग जाएगा। इसलिए आप मेरा एक हफ्ता तक इंतजार करें। अल्लाह ने चाहा तो मैं कामयाब लौटूंगी।" मेहा ने कहा और फिर वह सुल्तान को सलाम करके तेजी से उड़ गई।

जब से मेनार मेना गई थी, सुल्तान इसकी वापसी के लिए एक-एक पल गिन रहा था। वह रोजाना बाग में आ जाता और शाम तक वहीं बैठा रहता। हालांकि मेहा इसे एक हफ्ता के बाद आने का कह कर गई थी, मगर सुल्तान को कैसे चैन आता। इसने दूसरे दिन से ही मेहा का इंतजार करना शुरू कर दिया। जैसे-तैसे करके एक हफ्ता बीत गया। अब तो सुल्तान और ज्यादा बेकरार रहने लगा। वह मेहा के बारे में किसी को बताना भी ना चाहता था। यहां तक कि यह बात सुल्ताना को भी ना बताई थी, क्योंकि बात ही ऐसी थी। इंसान की जबान बोलने वाली और सिर्फ रटे-रटाए बातें नहीं, बल्कि उलेमा जैसी गुफ्तगू करने वाली मेना और इसके बारे में कौन यकीन करता? क्योंकि ऐसी बातें सब ने कहानियों में तो पढ़ी हुई हैं, मगर आम दुनिया में ऐसी मेना कहीं दिखाई ना देती। ठीक है कि अल्लाह ने दो परिंदों, तोते और मेना को इंसान की जबान बोलने की कुदरत दी है। मगर यह दोनों परिंदे भी सिर्फ रटे-रटाए बातें कर सकते हैं। फिर तोते तो घरों में आम पाले जाते हैं, मगर मेना बहुत कम मिलती है।

खैर, एक हफ्ता के बाद एक दिन सुल्तान बाग में उसी तालाब के किनारे पत्थर की खूबसूरत बेंच पर बैठा था कि अचानक उसके कानों में आवाज आई, "मेनार मेना सुल्तान साहब को प्रणाम पेश करती है।"

सुल्तान की आवाज सुनकर सुल्तान अचानक अचल पड़ा। सुल्तान ने कहा, "तुम आ गई हो मेना? मैं बहुत बेकरारी से तुम्हारा इंतजार कर रहा था। कहां हो तुम? मेरे पास आओ।" सुल्तान ने खुशी से बेकाबू होते हुए कहा।

दूसरे ही पल मेना उड़ती हुई एक दरख्त से निकल आई और सुल्तान के हाथ पर आकर बैठ गई। सुल्तान ने इसे करीब से देखा तो और भी ज्यादा खुश हुआ, क्योंकि यह मेना दूसरी मेनों से कहीं ज्यादा खूबसूरत थी। इसकी चोंच सुनहरी और पंखों का रंग ऐसा था कि ऐसा लगता था जैसे पंखों पर सफेद रंग के मोती जड़े हुए हों।

सुल्तान ने खुशी से भरे अंदाज से मेना की पीठ पर हाथ फेरते हुए कहा, "तुम बहुत खूबसूरत हो प्यारी मेना। सच में तुम मेनार मेना हो।"

मेना ने खुश होते हुए जवाब दिया, "तारीफ का शुक्रिया सुल्तान साहब।"

सुल्तान ने मुतशका पूछा, "प्यारी मेना, बताओ क्या शाह फल के बारे में मालूम हुआ?"

मेना ने कहा, "जी हां सुल्तान साहब, मैं कामयाब लौट आई हूं। शाह फल इस वक्त एक ऐसे जजीरे में मौजूद है जिसके चारों तरफ खौफनाक मगरमच्छों का समंदर है। इस जजीरे में तमाम दरख्त आदमखोर हैं और इन आदमखोर दरख्तों के ऊपर ऐसे खौफनाक परिंदे रहते हैं जो हर बड़े से बड़े और छोटे से छोटे परिंदे को खा जाते हैं। शाह फल का पौधा इस जजीरे के बिल्कुल बीच में आदमखोर दरख्तों के बीच में मौजूद है।" मीनार मेना ने तफसील से बताते हुए कहा।

सुल्तान ने बहुत मायूसी की हालत में कहा, "ओह, यह तो सच में खतरनाक बात है। हम इस शाह फल को पा नहीं सकते, बल्कि हम तो क्या, दुनिया का कोई इंसान इसे पा नहीं सकता।" सुल्तान बेचारा बहुत मायूसी से सर पकड़ कर बैठ गया था।

मेना ने कहा, "सुल्तान साहब, आप तो बहुत जल्द मायूस हो जाते हैं। मुझे देखो, मैं एक छोटा सा परिंदा हूं, मगर मैं मायूस ना हुई, जबकि आप मुझसे ज्यादा ताकतवर भी हैं और दानिशवर भी। मायूसी से कोई मसला हल नहीं होता। हर मुश्किल का कोई ना कोई हल जरूर होता है। अगर आदमी परसकून जहन से सोचे और अल्लाह पर भरोसा करके और हौसला करके काम शुरू कर दे तो जरूर कोई ना कोई रास्ता निकल आता है।" मेन्हा ने इसे हौसला देते हुए कहा।

और सच में मेहा की इस बात से सुल्तान साहब को हौसला हो गया और वह दिल ही दिल में शर्मिंदा भी बहुत हुआ कि एक छोटा सा परिंदा तो इतना हौसला की बात कर रहा है और वह इंसान और मर्द होकर हौसला हार बैठा है।

सुल्तान ने कहा, "प्यारी मेना, तुम सच में बहादुर और दानिश्वर हो। तुमने मुझे हौसला दे दिया है। अब मैंने फैसला कर लिया है कि मैं हर कीमत पर शाह फल पाऊंगा, चाहे कुछ भी क्यों ना हो जाए। मुझे बताओ कि वह जजीरा कहां है?"

मेना ने कहा, "बहुत खूब सुल्तान साहब। मुझे आपके ख्यालात सुनकर बहुत खुशी हुई है। आपने फैसला कर लिया है तो अब मेरा फैसला भी सुन लीजिए कि मैं आपका साथ दूंगी हर कीमत पर, चाहे मेरी जान ही क्यों ना चली जाए और अल्लाह ने चाहा तो हम शाह फल पाने में कामयाब हो जाएंगे।" मेन्हा ने कहा।

और सुल्तान ने खुशी के मारे मेना को चूम लिया। "तुम कितनी अच्छी हो मेना! आओ, मैं तुम्हें सुल्ताना से मिलवाऊं। वह बहुत खुश होगी।" सुल्तान ने कहा।

मेना बोली, "जी हां, मैं महारानी से जरूर मिलूंगी।" और फिर सुल्तान इसे लेकर सुल्ताना के पास आ गया, जो पलंग पर उदास बैठी हुई थी। सुल्तान ने कमरे में दाखिल होते हुए कहा, "देखो प्यारी सुल्ताना, मैं किसे लेकर आया हूं।"

सुल्ताना सुल्तान के एहतराम के लिए उठ खड़ी हुई और जब इसने सुल्तान के हाथ पर इतनी खूबसूरत मेना को बैठी देखा तो वह हैरत के मारे अछल पड़ी और बोली, "अरे, इतनी खूबसूरत मेना! यह आपको कहां से मिल गई?" सुल्ताना ने मुतशका अंदाज से पूछा।

अचानक मेना ने मीठी आवाज में कहा, "मैं महारानी की खिदमत में प्रणाम पेश करती हूं।" और सुल्ताना भी हैरत के मारे बेहोश होने वाली बची। मेना को यूं इंसान की आवाज में बातें करते देखकर वह पागल होने लगी थी।

सुल्ताना की हैरत देखकर सुल्तान जोर से हंस दिया। सुल्तान ने सुल्ताना को समझाते हुए कहा, "प्यारी सुल्ताना, हैरान होने की जरूरत नहीं। यह प्यारी मेना है। सुल्तान की अकेली बेटी मेनार मेना है। बहुत दानिश्वर, बहुत हौसला वाली, बहुत बहादुर।"

सुल्ताना की निगाहें मेना पर जमी हुई थीं। मेना ने कहा, "सुल्तान साहब तो बेजा मेरी तारीफ कर रहे हैं। असल में तो तारीफ के काबिल आप हैं। महारानी, आप जैसी खूबसूरत औरत मैंने जिंदगी में कभी ना देखी।" मेहा ने सुताना की तारीफ करते हुए कहा और सुताना बरी तरह शर्मा गई। इसके शर्माने पर मेहा भी जोर से हंस पड़ी और इसके मीठे ठहाकों से कमरा गूंज उठा।

इसके साथ ही मेनार मेना उड़कर महारानी के कंधे पर जा बैठी और सुल्ताना बड़े प्यार से इसके पंखों पर हाथ फेरने लगी। सुल्ताना ने बड़े प्यार भरे अंदाज से कहा, "तुम इतनी खूबसूरत मेना हो कि जी चाहता है कि मैं भी तुम्हारी तरह हो जाऊं।" मेनार मेना वाकई सुल्ताना को बहुत पसंद आ गई थी। इतनी पसंद कि वह गम और दुख भूल गई थी। एक तो मेना इतनी खूबसूरत और प्यारी थी, दूसरी वह बातें बहुत प्यारी और दिलकश किया करती थी।

मेना ने हंसते हुए कहा, "अल्लाह ना करे महारानी कि आप मेरी तरह हों। आप इंसान हैं और मैं एक छोटा सा परिंदा।"

सुल्तान ने सुल्ताना को बताया कि "महारानी, अल्लाह ने हमारी दुआ सुन ली है। अब अल्लाह की रहमत से हम भी औलाद वाले हो जाएंगे।" सुल्ताना सुल्तान की बात सुनकर चौंक पड़ी। "अच्छा, वह कैसे? अल्लाह के लिए मुझे बताइए कि हमारी मन की ख्वाहिश कब पूरी होगी?" सुल्ताना ने मुतशका अंदाज से पूछा।

और सुल्तान ने मेनार मेना के साथ अपनी पहली और दूसरी मुलाकातों का हाल और शाह फल के बारे में तमाम मालूमात बता दीं। सुल्ताना ने मजबूत अंदाज से कहा, "ओह, शाह फल का पाना नामुमकिन है। मैं औलाद की खातिर आपको मौत के मुंह में ना जाने दूंगी।"

सुल्तान ने कहा, "नहीं महारानी, हमने फैसला कर लिया है कि हम शाह फल जरूर पाएंगे। हम तुम्हें अपने फैसले से आगाह करने के लिए आए हैं। कल हम और मेनार मेना शाह फल की तलाश के लिए जाएंगे।" सुल्तान ने सुल्ताना से बात करते हुए कहा।

महारानी ने भी फैसला खून अंदाज से कहा, "माफी हो सुल्तान साहब, आप चाहे मुझे मार डालें, मगर मैं आपको मौत के मुंह में ना जाने दूंगी। मैं औलाद के लिए शौहर की कुर्बानी ना दे सकती। यह मेरा फैसला है।"

सुल्तान ने गुस्से भरे अंदाज से कहा, "हम अपना फैसला नहीं बदल सकते।"

सुल्ताना ने मजबूत अंदाज से कहा, "तो फिर मुझे भी अपने साथ ले जाइए। यह मेरा भी आखिरी फैसला है।"

सुल्तान ने पहले से ज्यादा गुस्से भरे अंदाज से कहा, "नहीं, यह नामुमकिन है। शाह फल पाना बहुत जान खतरा का काम है। वहां आप ना जा सकती हैं।"

सुल्तान की बात सुनकर सुल्ताना अचानक रो पड़ी। सुल्ताना को रोते देखकर सुल्तान अपना गुस्सा भूल गया और इसके चेहरे पर भी परेशानी के निशानात दिखाई देने लगे। मीनार मेना, जो अब तक खामोश बैठी इन दोनों की बातें सुन रही थी, अचानक बोली, "सुल्तान साहब, आपने हमारी इतनी अच्छी सुल्ताना को रुला दिया है। हमें बहुत अफसोस हुआ है। इसलिए अब हमारा यह फैसला है कि जब तक सुल्ताना जी साथ ना जाएंगी, मैं भी ना जाऊंगी। आप अकेले बेशक चले जाएं।" मेनार मेना ने कहा।

सुल्तान ने इन दोनों के सामने हार मानते हुए कहा, "अरे अरे, तुम दोनों ने हमारे खिलाफ साजिश कर ली है। सुल्ताना को साथ ले जाने में कोई दिक्कत नहीं है। मगर प्यारी मेना, तुम जानती हो कि हमें रास्ते में हर कदम पर कितनी मुश्किलात का सामना करना पड़ेगा।"

मेनार मेना ने सुल्ताना की सिफारिश करते हुए कहा, "कोई बात नहीं सुल्तान साहब, अल्लाह सबको मुसीबतों से बचाने वाला है। हो सकता है महारानी की मौजूदगी कोई मसला हल कर दे।"

सुल्तान ने कहा, "अगर यह बात है तो फिर हमें भला क्या मुखालफत हो सकती है। महारानी, आप तैयारी करें। हम कल सुबह शाह फल की तलाश के लिए निकल जाएंगे।" मेनार मेन्हा ने सुल्ताना से बात करते हुए कहा।

"इस सिलसिले में मेरी एक तजवीज है कि महारानी मर्दों के कपड़ों में हमारे साथ चलें ताकि हम आसानी से सफर कर सकें। क्या ख्याल है महारानी?"

सुल्ताना ने कहा, "बहुत अच्छी तजवीज है मैनार मेना। हम तुम्हारी दानिशमंदी की तारीफ करते हैं। वाकई हमें मर्दों के कपड़ों में जाना चाहिए।" सुल्ताना मेन्हा की तजवीज पर बहुत खुश हुई।

सुल्तान ने भी मेन्हा की इस तजवीज की ताईद की। इसलिए इन दोनों ने सुबह जाने की तैयारी शुरू कर दी। सुल्तान और सुल्ताना दोनों दूसरे दिन बड़ी खामोशी से भेष बदलकर शहर से बाहर निकले। सिर्फ वजीर आजम को इनके बारे में इल्म था। मेना सुल्ताना के कंधे पर बैठी हुई थी। शहर से बाहर निकलकर वह तेजी से जजीरा अलखौफ की तरफ बढ़ते चले जा रहे थे। वह जजीरा जहां शाहफल था।

इलाका जजीरा अलखौफ में वाकया था और जजीरा अलखौफ दुनिया के सबसे उत्तरी कोने में था। वहां के लोग बहुत खूनखवार, जंगली और जालिम थे। जजीरा अलख खौफ का ख्याल भी इंसान को डरा देता था। मगर यह दोनों औलाद की खातिर वहां जाने के लिए भी तैयार हो गए थे। सुल्ताना इस वक्त मर्दों के कपड़ों में बिल्कुल ही जवान लग रही थी। वह दोनों एक जैसे कपड़ों में थे ताकि डाकू उन्हें अमीर समझकर लूट ना ले। मैनार मेना कभी इनसे आगे उड़कर हालात देख कर आती, कभी सुल्ताना के कंधे पर बैठकर मीठी-मीठी बातें करना शुरू कर देती।

चलते-चलते एक दिन वह एक ऊंचे पहाड़ के नीचे पहुंचकर रुक गए। यह पहाड़ दोनों तरफ आंखों की हद तक फैला हुआ था। ऐसा लगता था जैसे यह पहाड़ दुनिया के आखिरी कोनों तक ही फैलता चला गया हो। दूसरी तरफ पहाड़ की ऊंचाई बहुत थी और पहाड़ बिल्कुल सूखा और बंजर था। पूरे पहाड़ पर दरख्त तो दूर की बात, घास का एक तिनका तक दिखाई ना दे रहा था। फिर सबसे मुश्किल बात यह थी कि पहाड़ बिल्कुल किसी दीवार की तरह सीधा था। इसलिए इस पर चढ़ना करीब-करीब नामुमकिन था।

सुल्तान ने पहाड़ को देखते हुए परेशान अंदाज से कहा, "ओह, यह पहाड़ तो पार करना नामुमकिन है।"

सुल्ताना ने भी सुल्तान की हां में हां मिला दी, "हां, मालूम तो ऐसा ही होता है।"

मेनार मेना ने एतबार से भरे अंदाज से कहा, "दुनिया में कोई काम ऐसा नहीं जो नामुमकिन हो। माफी हो सुल्तान साहब, नामुमकिन का लफ्ज सिर्फ डरपोक इस्तेमाल करते हैं।"

सुल्तान ने कहा, "तुम ऐसा कह सकती हो मेनार मेना, क्योंकि अल्लाह ने तुम्हें दो पंख दिए हैं। तुम इन पंखों की मदद से उड़कर पहाड़ की दूसरी तरफ जा सकती हो। मगर हम ऐसा ना कर सकते, इसलिए मजबूर हैं।"

सुल्तान साहब को शायद मेहा की मजाक भरी बातों पर गुस्सा आ गया था। मेहा ने भी फौरन जवाब देते हुए कहा, "गुस्सा करने वाली बात नहीं सुल्तान साहब। अगर अल्लाह ने हमें पंख दिए हैं, तो सिर्फ इसलिए कि उसने हमें इतनी अकल ना दी जितनी इंसानों को। आपके पंख आपकी अकल है। इसे इस्तेमाल कीजिए। हर मुश्किल आसान हो जाएगी।"

सुल्ताना, जो जवाब देने के बजाय खामोशी से दोनों की बहस सुन रही थी, आखिर बोल पड़ी, "अरे भाई, बहस करने की क्या जरूरत है? इस पहाड़ को पार करने की कोई तजवीज सोची जाए।"

सुल्तान ने बड़ी जल्दी हार मानते हुए कहा, "भाई, मेरी समझ में तो कोई इलाज नहीं आता। यह पहाड़ तो बिल्कुल दीवार की तरह है और दीवार भी ऐसी कि जो सीधे आसमान तक चली गई हो। अब इसे कैसे पार किया जाए?"

सुल्ताना ने कुछ सोचते हुए कहा, "आखिर हम यहां तक आ गए हैं और मेना के मुताबिकत इस पहाड़ की दूसरी तरफ जजीरा अल खौफ है, जहां जजीरे में शाह फल मौजूद है। तो अब हम वापस तो ना जा सकते सुल्तान साहब।"

सुल्तान ने कुछ देर सोचने के बाद कहा, "भाई, ऐसा करें। यही पहाड़ के नीचे खमे लगाकर आराम करें और भरपूर अच्छी तरह और सुकून से सोएं। शायद इस तरह कोई युक्तिता समझ में आ जाए।" और सुल्ताना, जो काफी देर से घोड़े पर सवार होने की वजह से कुछ थक सी गई थी, फौरन इस तजवीज पर राजी हो गई। इसलिए सुल्तान साहब ने घोड़े की पीठ पर बंधा खमे उतारा और फिर सुल्ताना की मदद से इसे लगाने में मशगूल हो गया।

इधर मेनार मेना, जो सुल्तान से बहस के बाद खामोश थी, उन्हें खमे लगाने में मशगूल देखकर उड़ती हुई पहाड़ की तरफ चली गई और पहाड़ के साथ-साथ उड़ती रही कि शायद कोई ऐसी जगह दिखाई दे जहां से सुल्तान और सुल्ताना पहाड़ को पार कर सकें। मगर पहाड़ तो वाकई किसी दीवार की तरह सीधा और साफ था। इसमें कहीं भी कोई मामूली सा चीर तक ना था। मगर मेना ने हिम्मत ना हारी और मुसलसल उड़ती चली गई।

करीब 2 घंटे तक मुसलसल उड़ने के बाद मेना थक सी गई थी और आखिर आराम करने के लिए वह पहाड़ के नीचे उतर कर बैठ गई। जैसे ही वह बैठी, उसे नींद सी आ गई, क्योंकि वह मुसलसल उड़ने की वजह से बहुत थक गई थी। न जाने कितनी देर तक वह सोती रही। फिर अचानक इसकी आंख खुल गई और वह चौंक कर इधर-उधर देखने लगी। मगर दूसरे ही पल वह हैरत के मारे अचल पड़ी। इसने अपने आप को पहाड़ के नीचे के बजाय सुनहरी रंग के खूबसूरत पिंजरे में मौजूद पाया। यह पिंजरा एक बहुत खूबसूरत बाग में दरख्त से लटक रहा था। बाग में इसे कोई भी इंसान या परिंदा तक दिखाई

ना दे रहा था। मैनार मेना अपने आप को पिंजरे में बंद देखकर बहुत परेशान हुई। मगर अब क्या हो सकता था? वह तो बंद हो चुकी थी। अब तो वह सोच रही थी कि इसे बंद करने वाला कौन है और वह वक्त कहां मौजूद है क्योंकि पहाड़ के पास तो कहीं भी इसे ऐसा बाग [संगीत] दिखाई ना आया था, इसलिए वह सोच रही थी कि वह कहां पहुंच गई है।

अभी वह इसी सोच में डूबी थी कि [संगीत] अचानक इसे दूर से किसी के हंसने की आवाज सुनाई दी। यह किसी औरत की हंसी थी। बहुत खूबसूरत हंसी। ऐसा लगता था जैसे कोई चश्मा चल रहा हो। पेना ने सोचा इसे बंद करने वाली यही हंसने [संगीत] वाली औरत ही हो सकती है।

हंसी की आवाज एक बार फिर सुनाई दी। मगर इस बार आवाज मर्द की थी। यूं लगता था जैसे वहां एक मर्द और औरत किसी बात पर बैठे हंस रहे हो। मीनार में हैरत भरे अंदाज से पिंजरे में बैठी इधर देख रही थी जहां से यह आवाजें आ रही थी। मगर वहां कोई आदमी दिखाई ना दे रहा था।

अभी वह सोच ही रही थी कि अचानक वह हैरत के मारे अचल पड़ी क्योंकि इसने सामने दरख्तों [संगीत] के झुंड में सुल्तान और सुल्ताना को देख लिया। वह दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े हंसते खेलते और खुशी के मारे अछलते [संगीत] कूदते इधर आ रहे थे, जहां मेनार मेन्हा पिंजरे में बंद थी।

मेनार मेन्हा को जब यह मालूम हुआ कि इसे बंद करने वाले सुल्तान और सुल्ताना है तो इसे बहुत गुस्सा आया। इसने सोच लिया कि वह इन दोनों से खूब लड़ेगी। इसलिए जब वह दोनों पास आए तो मेनार मेन्हा ने गुस्से [संगीत] के मारे मुंह फेर लिया। मगर इन दोनों ने इसकी तरफ तवज्जो ही ना दी और हंसते खेलते आगे बढ़ते चले गए।

अब तो मेनार मेना को और [संगीत] ज्यादा गुस्सा आ गया। इसने दोनों को पुकारते हुए कहा, "सुल्तान साहब और महारानी मुझसे आखिर क्या गलती हो गई है?" मगर वह दोनों इस [संगीत] तरह आगे बढ़ते चले गए जैसे उन्होंने कोई बात ही ना सुनी हो।

जिस पहाड़ के नीचे सुल्तान और सुल्ताना खेमे लगाए मौजूद थे, उसी पहाड़ की चोटी पर एक मशहूर साहिर का महल भी था जो इसने बादल के अंदर छुपा रखा था। इसलिए आमतौर पर वह महल किसी को भी दिखाई ना [संगीत] देता था। इस साहिर का नाम जाफर असहिर था। यूं तो यह साहिर बहुत [संगीत] रहम दिल और हमदर्द था। किसी इंसान को बिल्कुल तंग ना करता था। मगर साल में वह तीन दिन एक खास काम करता था। और इस काम के दौरान इसे इंसान का गोश्त खाना और इंसान का खून पीना पड़ता था। इसलिए साल के इन तीन दिनों के लिए वह एक दो इंसानों को पकड़ कर ले आता था। इसके वह दिन करीब आ रहे थे और इस वक्त [संगीत] जाफर और साहिर अपने महल के खास कमरे में बैठा यही सोच रहा था कि वह जाकर एक दो इंसान पकड़ ले आए कि अचानक उसके कमरे के कोने में पड़े हुए उल्लू की मूर्ति की आंखें [संगीत] एकदम जिंदा हो गई और इनमें से रोशनी की लहरें निकल कर कमरे में फैल गई।

जाफर असिर चौंक कर इसकी तरफ देखने लगा। दूसरे ही पल इसने अपने दोनों हाथों को आसमान की तरफ उठाया और फिर जैसे ही इसने हाथों को जोर से झटका, अचानक कमरे की दीवार रोशन हो गई और इस दीवार पर एक खमे दिखाई दे रहा था और खयमे में सुल्तान और सुल्ताना बैठे बातें [संगीत] में मशगूल थे। इन इंसानों को इस तरह पहाड़ के नीचे मौजूद पाकर जाफर असहिर खुशी से अचल पड़ा। इंसान खुद चलकर उसके पास पहुंच गए थे और इसे उन्हें पकड़ कर ले आने की भी [संगीत] जरूरत ना पड़ी थी।

इसने हाथ को एक बार फिर झटका और अब मंजर और ज्यादा साफ दिखाई देने लगा। इसके साथ-साथ अब सुल्तान और सुल्ताना की शक्ल ज्यादा करीब से दिखाई आने लगी थी। जाफर अ साहिर सुल्ताना की खूबसूरती से बहुत मुतासिर हुआ। इसने इतनी खूबसूरत लड़की पहले कभी [संगीत] ना देखी थी। सुल्ताना क्योंकि इस वक्त खेमे के अंदर सुल्तान के साथ अकेली मौजूद थी, इसलिए वह मर्दों के कपड़ों के बजाय अपने असली कपड़ों में थी। सुल्तान के चेहरे पर फिक्र के निशानात दिखाई दे रहे थे। मगर सुल्ताना परसकून थी। उन्हें मेनार मेन्हा के जाने का इल्म हो गया था। [संगीत] इसलिए सुल्ताना को यकीन हो गया था कि दानिश्वर मेनार मेना जरूर कोई ना कोई रास्ता ढूंढकर वापस आएगी।

जाफर असहिर ने जब सुल्ताना को देखा तो तेजी से उठ खड़ा हुआ। इसने अपना दाया हाथ तेजी से गोलाई में घुमाया। दूसरे पल कमरे की दीवार फटी और छोटा सा सुनहरी रंग का कछुआ टूटी हुई दीवार से निकल कर उसके सामने आ गया। कछुए ने इंसान की आवाज में पूछा, "कछुआ हाजिर है मालिक, हुक्म दीजिए।" इसका अंदाज बहुत एहतराम [संगीत] भरा था।

जाफर असहिर ने सख्त आवाज से कहा, "कछुए पहाड़ के नीचे दो इंसान मौजूद हैं। इनमें एक औरत है और एक मर्द है। इन दोनों को फौरन महल में ले आने का बंदोबस्त करो।" कछुए ने कहा, "ठीक है मालिक, सुनहरी कछुआ अभी जाकर उन्हें ले आता है।" मगर हुजूर, कछुआ कुछ कहते रुक गया।

जाफर अस साहिर ने हैरत भरे अंदाज से कहा, "बोलो, बोलो, रुक क्यों गए?" आज तुमने पहली बार मगर का लफ्ज इस्तेमाल [संगीत] किया है। कछुए ने कहा, "हुजूर, जहां तक मेरे इल्म का ताल्लुक है, इन दोनों इंसानों के साथ एक मेन्हा भी है। इंसान की जुबान में बोलने वाली मेन्हा बहुत दानिश्वर, बहुत चालाक और चालू और मेरा इल्म बता रहा है कि वह मेन्हा हमारे लिए मुसीबत का सबब बन सकती है।" सुनहरे कछुए ने [संगीत] फिक्रमंद अंदाज से कहा।

साहिर ने कहा, "ओह, यह बात है। हम अभी मालूम करते हैं।" और इसने अपनी दोनों उंगलियों को इस तरह खोल लिया कि इनके बीच काफी फासिला पैदा हो गया। वह इन उंगलियों के [संगीत] बीच तवज्जो से देखने लगा और फिर इसने मेनार मेन्हा को पहाड़ के नीचे एक पत्थर पर बैठी देखा। मेनार मेन्हा की आंखें [संगीत] बंद थी और वह कुछ पल इसे तवज्जो से देखता रहा। पहले इसके चेहरे पर फिक्र के निशानात उभर आए। फिर आहिस्ता-आहिस्ता वह मुस्कुराने लगा। इसने उंगलियां [संगीत] बंद की और हाथ की मुट्ठी बनाकर इसके ऊपर कुछ पढ़कर फूंक मारी। फिर इसने जैसे ही मुट्ठी खोली, इसकी मुट्ठी से सुनहरी रंग की एक शहद की मक्खियों का झुंड निकल कर कमरे में उड़ने लगा। यहां तक कि इन मक्खियों से कमरा भर गया।

जाफर साहिर ने मक्खियों से बात करके कहा, "सुनहरी मक्खियों, क्या तुम मेरा हुक्म मानोगी?" मक्खियों ने भनभनाते हुए अंदाज से जवाब दिया, "हम तुम्हारी गुलाम है मालिक। हमें हुक्म [संगीत] करो।"

जाफर अस साहिर ने सुनहरी मक्खियों को हुक्म देते हुए कहा, "तो सुनो सुनहरी मक्खियों, पहाड़ के नीचे एक पत्थर पर एक मेन सोई हुई है। तुम पहले जाकर इसे डंक मारकर बेहोश कर दो और फिर इसे उठाकर बाग में ले आओ।" सुनहरी मक्खी ने जवाब दिया, "आपके हुक्म का पालन होगा मालिक।" और इसके साथ ही इनका झुंड तेजी से टूटी हुई दीवार से बाहर निकल गया।

जाफर असिर ने कछुए से बात करके कहा, "अब जाओ कछुए, इन इंसानों को ले आओ। मेन्हा की फिक्र ना करो, मेन्हा को यह सुनहरी मक्खियां ले आएंगी। मैं इसे बाग में सुनहरे पिंजरे में बंद कर दूंगा।" कछुए ने कहा, "हां मेरे मालिक, मैं इन मक्खियों की ताकत को जानता हूं। अब मुझे मेन्हा की तरफ से कोई फिक्र नहीं है।" सुनहरे कछुए ने एहतराम भरे अंदाज से कहा। इसके साथ ही कछुआ अचानक अपनी जगह से गायब हो गया और टूटी हुई दीवार दोबारा जड़ गई।

जाफर असहिर सुनहरी कछुए के [संगीत] जाते ही कमरे से बाहर निकला और फिर तेजी-तेजी कदम उठाता हुआ एक गलियारे में आगे बढ़ता चला गया जहां गलियारा खत्म होता था, वहां एक बहुत बड़ा दरवाजा था जिसके सामने एक हबशी की मूर्ति बनी हुई थी। मूर्ति के हाथ में एक बहुत बड़ा नेजा था। यह मूर्ति काले रंग के पत्थर से बनाया गया था मगर जैसे ही जाफर असहिर मूर्ति के पास पहुंचा, मूर्ति में हलचल हुई और इसने हाथ में पकड़ा हुआ नेजा नीचे कर लिया। इसके साथ ही दरवाजा खुद ब खुद खुल गया।

जाफर अ साहिर तेजी से दरवाजे की दूसरी तरफ निकल गया। यहां एक बहुत बड़ा और बहुत खूबसूरत बाग था। इतना खूबसूरत कि आज तक बड़े से बड़े सुल्तान ने भी इतना खूबसूरत बाघ का ख्याल भी ना किया होगा। जाफर असिर बाग में चलता हुआ इसके बीच में बनी हुई मेहराबदार जगह में [संगीत] पहुंच गया। मेहराबदार जगह के बीच में सुनहरी रंग का खूबसूरत पिंजरा मौजूद था। जाफर अस साहिर ने पिंजरा उठाया और दिल ही दिल में एक मंत्र पढ़कर इसके पर फूंक दी और फिर पिंजरे को लेकर बाग में आ गया। यहां एक दरख्त की शाख के साथ इसने पिंजरा लटका दिया। पिंजरे का दरवाजा खुला हुआ था।

अभी इसे वहां पहुंचे कुछ ही पल गुजरे होंगे कि दूर से मक्खियों की भनभनाहट [संगीत] सुनाई दी और इसने आसमान में लाखों की तादाद में मक्खियां बेहोश मेन्हा को उठाए उड़ती चली आ रही थी। जब वह पिंजरे के पास पहुंची तो जाफर साहिर ने, जो पिंजरे के पास खड़ा था, हाथ उठाकर खास इशारा किया। दूसरे ही पल मक्खियां मेन्हा को उठाए [संगीत] हुए पिंजरे के खुले दरवाजे से अंदर दाखिल हो गई। तो जाफर असहिर ने आगे बढ़कर अपने हाथ से पिंजरे का दरवाजा [संगीत] बंद कर दिया। इसके साथ ही इसने जोर से ठहाका लगाया। "अब यह चालाक मेन्हा मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।" जाफर साहिर ने कहा और दोबारा मेहराबदार जगह की तरफ बढ़ गया की तरफ।

अभी वह मेहराबदार [संगीत] जगह में ना पहुंचा था कि अचानक एक तेज आवाज सुनाई दी और इसने हवा में सुनहरी कछुए को उड़ते हुए देखा। कछुए की पीठ [संगीत] पर सुल्तान और सुल्ताना बेहोशी की हालत में पड़े थे। सुनहरी कछुआ तेजी से नीचे आया और सुल्तान और सुल्ताना को उठाकर [संगीत] मेहराबदार जगह के सामने आया और फिर जमीन पर उतर गया। कछुए की आवाज सुनाई दी, "ले लीजिए मालिक, दोनों इंसान हाजिर हैं।"

जाफर साहिर आगे बढ़ा और तख्त के पास आकर इसने अपने दोनों हाथों को इन दोनों की तरफ बढ़ाते हुए जोर-जोर से एक मंत्र पढ़ना शुरू कर दिया। इसके मंत्र पढ़ते ही इन दोनों के चेहरे तरफ लाल रंग का धुएं जैसा छा गया। धुआं पल-पल गाढ़ा होता चला गया। अचानक जाफर अ साहिर ने मंत्र रोक दिया और दूसरे [संगीत] ही पल धुआं तेजी से छटने लगा। जब धुआं खत्म हो गया तो इन दोनों को एक साथ होश आ गया। वह अपनी जगह से उठकर बैठ गए। इनके चेहरों पर एक पल के लिए हैरत के निशानात उभरे। मगर फिर दूसरे ही पल जैसे ही इनकी निगाहें सामने खड़े [संगीत] जाफर असहिर पर पड़ी। इसने जोरदार ठहाका मारा और कहा, "इंसानों बोलो, क्या तुम मेरा हुक्म मानोगे?" इन दोनों ने बहुत एहतराम भरे अंदाज से कहा, "हां मालिक, हम तुम्हारे गुलाम हैं। तुम जो चाहो हमारे साथ सुलूक करो।" ऐसा लगता था जैसे वह अपने होश में ना हो।

साहिर ने कहा, "ठीक है, तो फिर कुर्बानी के दिन तक तुम आजाद हो। खूब घूमो फिरो, खाओ पियो, हंसो, बोलो, मजा करो। मगर तुम बाग से बाहर ना निकल सकोगे और ना मेरे जादू से आजाद हो सकोगे।" जाफर असहिर ने कहा। इन दोनों सुल्ताना और सुल्तान ने पहले की तरह धीमे लहजे में जवाब दिया, "हम तुम्हारे हुक्म का पालन करेंगे मालिक।"

जाफर असहिर ने उन्हें हुक्म देते हुए कहा, "और सुनो, तुम दोनों मेन्हा की बात ना सुनोगे।" इन दोनों ने जवाब दिया, "हम मेन्हा की बात ना सुनेंगे।" जाफर असिर ने कहा, "ठीक है।" और फिर वह तेजी से चलता हुआ बाग से बाहर निकल गया।

इसके बाहर निकलते ही सुल्तान साहब और सुल्ताना दोनों सुनहरी कछुए की पीठ से नीचे उतर आए। जैसे ही वह नीचे उतरे, सुनहरी कछुआ गायब हो गया। सुल्तान और सुल्ताना एक दूसरे का हाथ पकड़े अचलते [संगीत] कूदते और दरख्तों के झुंड की तरफ बढ़ते चले गए। वह दोनों यूं हंस खेल रहे थे जैसे उन्हें किसी किस्म की [संगीत] फिक्र ना हो। वह किसी की कजैद में ना हो बल्कि अपने निजी बाग में घूम फिर रहे हो। ऐसा इसलिए हुआ था कि इनके दिमाग जाफर असिर ने जादू के जोर से अपने कब्जे में ले लिए थे। इसलिए उन्हें किसी बात का भी एहसास ना था।

वह कुछ देर यूं ही बैठकर बातें करते रहते। फिर दरख्तों के किसी और झुंड की तरफ निकल जाते। एक बार वह मेना के पिंजरे के पास से भी गुजरे। मेनार मेन्हा इस वक्त होश में आ चुकी थी। मगर इन दोनों ने इसकी तरफ तवज्जो तक ना दी और हंसतेखेलते आगे बढ़ते [संगीत] चले गए। मेनार मेन्हा ने सुल्तान और सुल्ताना को पुकारा। मगर उन्होंने इसकी बात ना सुनी और आगे बढ़ते चले गए।

अब तो मेनार मेन्हा बहुत हैरान हुई क्योंकि वह कम से कम सुल्तान और सुल्ताना से यह उम्मीद तो ना [संगीत] कर सकती थी कि इसे कैद करके इसकी बात ही ना सुनेंगे। इसलिए मेनार मेन्हा अब इस बारे में सोचने लगी कि आखिर यह सब क्या चक्कर है? वह पहाड़ के नीचे से इस बाग में लटके हुए पिंजरे में कैसे आ गई? बाग किसका है? और सुल्तान और सुल्ताना को क्या हो गया है।

अभी वह बैठी सोच ही रही थी कि अचानक मेनार [संगीत] मेना ने देखा कि एक बहुत बदसूरत सा आदमी बाग के अंदर दाखिल हुआ। वह तेजी-तेजी कदम उठाता सीधा इसके पिंजरे [संगीत] की तरफ आया और पास आकर तवज्जो से मेनार मेना को देखने लगा। मेनार मेन्हा भी इस [संगीत] बदसूरत आदमी को तवज्जो से देख रही थी।

जाफर असिर ने बहुत सख्त लहजे में मेनार मेन्हा से बात करते हुए कहा, "होश में आ गई हो तुम। मुझे मालूम हुआ है कि तुम बहुत दानिश्वर [संगीत] और बहुत चालाक हो। मगर याद रखो, तुम इस वक्त दुनिया के सबसे बड़े साहिर जाफर साहिर के कब्जे में हो। मेरे सामने तुम्हारी कोई चालाकी नहीं चल सकती।" आने वाला जो जाफर असिर था, बहुत सख्त लहजे में मेनार मेन्हा से बात करते हुए कहा।

मेनार मेन्हा ने डरे बगैर बड़े संजीदा लहजे में कहा, "तुम जाफर असिर हो।" जाफर असिर ने सीना पर हाथ मारते हुए बहुत फक्र भरे लहजे में कहा, "हां, मेरा नाम जाफर असिर है, साहिरों का शहंशाह।" मिनार मिना ने इस बार बड़े एहतराम भरे लहजे में कहा, [संगीत] "तुम्हें किसने कहा है कि मैं चालाक हूं? मैं तो एक सीधी सादी मेना हूं, एक छोटा सा तुच्छ परिंदा। मेरी भला तुम्हारे जैसे अजीम और ताकतवर [संगीत] साहिर के सामने क्या औकात हो सकती है?" और इसका जवाब सुनकर जाफर असिर का सीना फक्र से कुछ [संगीत] और भूल गया और इसने कहा, "ओह, तुम वाकई दानिश्वर हो जो हमारी तारीफ कर रही हो। जो हमारी तारीफ करे, हम इसे पसंद करते हैं। अगर तुम यह वादा करो कि हमें कोई नुकसान पहुंचाने के बारे में ना सोचोगी, तो हम तुम्हें पिंजरे से आजाद करके अपने साथ रखने के लिए तैयार हैं।" जाफर साहिर ने खुश होकर कहा।

मेनार मिना ने कहा, "साहिरों के शहंशाह, तुम कैसी बातें कर रहे हो? मुझ जैसे तुच्छ से परिंदे तुम जैसे अजीम और ताकतवर साहिर का भला क्या बिगाड़ सकता है? मैं अगर तुम्हारे नुकसान के बारे में सोचूं भी तो यह मेरी गलती होगी। मैं सोच कर भी तुम्हारा क्या बिगाड़ सकती हूं। फिर मुझे तुम्हारा यह बाग बहुत पसंद आया है। इतना खूबसूरत बाग मैंने पूरी दुनिया में कहीं ना देखा। फिर तुम्हारी [संगीत] मेहरबानी और रहमदली।" मैनार मेना ने बड़े एहतराम भरे लहजे में जाफर असिर को समझाते हुए कहा।

जाफर असिर ने कहा, "वो वाकई, मैं भी बेजा सुनहरी कछुए की बातों में आ गया था। भला एक तुच्छ मेना मेरा क्या बिगाड़ सकती है? अगर मेरी दोस्ती का दम भरेगी तो मजे करेगी, वरना एक पल में गर्दन मरोड़ कर रख दूंगा।" जाफर असिर ने कहा और इसके साथ ही इसने पिंजरे का दरवाजा खोलकर मेन्हा को बाहर निकाल दिया और इसे अपने कंधे पर बिठाते हुए कहा, "देखो मेन्हा, मैंने तुम्हें कैसे आजाद कर दिया है। मगर याद रखना कि अगर तुमने इस बाग से निकलने की कोशिश की तो जलकर राख हो जाओगी।"

मेनार मेन्हा ने कहा, "बहुत-बहुत शुक्रिया जाफर असिर। मैं तुम्हारे काम आऊंगी, तुम्हें फायदेमंद नसीहतें दूंगी। मैं भी मेन्हा रानी की अकेली बेटी, मेन्हा शहजादी हूं। मेरा पूरा नाम मेनार मेन्हा है। मैंने बड़े-बड़े उलेमा से इल्म हासिल किया है।" मेनार मेन्हा ने जवाब दिया।

जाफर साहिर ने मुस्कुराते हुए कहा, "ओह, बहुत खूब। यह तो और भी अच्छा हुआ। तुम जरूर मुझे नसीहत देना। अच्छा, तुम यह तो बताओ कि यह दो इंसान क्यों पहाड़ के पास आए हैं?" मेनार में समझ गई कि जाफर साहिर इसकी आजमाइश लेना चाहता है। इसलिए इसने साफ-साफ [संगीत] बता दिया कि सुल्तान और सुल्ताना औलाद के लिए शाह फल लेने निकले हैं। "मैं इनके साथ हूं। हम यहां पहाड़ के सामने आकर रुक गए क्योंकि पहाड़ को पार करने की कोई [संगीत] चाल दिखाई ना देती थी। मैं यह देखने के लिए उड़ती रही मगर थक कर बैठ गई और फिर मुझे थकावट [संगीत] की वजह से नींद आ गई। जब मेरी आंख खुली तो मैंने अपने आप को पिंजरे में कैद पाया।" मेनार मेन्हा ने तफसील बताई।

साहिर ने कहा, "ठीक है। देखो मेनार मेन्हा, मुझे तुम्हारी सच्चाई पसंद [संगीत] आई है। आज से तीन दिन बाद मुझे दो इंसानों की कुर्बानी देनी है ताकि मेरी [संगीत] ताकत कायम रहे। मैंने सुल्तान और सुल्ताना को इसलिए उठाया था कि मैं इनकी कुर्बानी [संगीत] दे सकूं। मगर तुम्हारी सुल्ताना मुझे पसंद आ गई है। इसलिए मैं इसे कुर्बान ना करूंगा, बल्कि इससे शादी करूंगा। सुल्तान को जरूर मैं कुर्बान कर दूंगा। इसके अलावा मुझे आज एक और इंसान का भी बंदोबस्त करना पड़ेगा। इसलिए किसी दूसरे इंसान का बंदोबस्त करने के लिए आज मुझे दुनिया में जाना पड़ेगा।" जाफर साहिर ने जवाब दिया। [संगीत]

मैनार मिनहा ने कहा, "दुनिया में जाने की क्या जरूरत है? तुम ताकतवर साहिर हो। यहीं से मंत्र पढ़कर किसी इंसान को पकड़ लो।" साहिर ने कहा, "नहीं मैनार में। मैं ताकतवर जरूर हूं। मगर इस रिस्म के लिए मुझे खुद जाना पड़ेगा। क्योंकि कुर्बानी देते वक्त इस बात का ख्याल रखना पड़ता है कि जिस इंसान की कुर्बानी दी जाए वह दोष रहित हो। और एक बार कुर्बानी के लिए चुनने के बाद फिर इसे बदला नहीं जा सकता। और दोष वाले इंसान को कुर्बानी देने का मतलब यह होगा कि एक साल के लिए मेरा तमाम जादू खत्म हो जाएगा।" जाफर असिर ने मेन्हा को तफसील बताते हुए कहा।

है ने कहा, "यह बात है। मगर तुमने मुझे अभी बताया है कि तुम सुल्ताना से शादी करोगे। तुम्हारा ख्याल है कि सुल्ताना तुमसे शादी पर राजी हो जाएगी?" मेन ने कहा। साहिर ने कहा, "ओहो, मुझे क्या जरूरत है कि मैं इसे राजी करूं। मैं ताकतवर साहिर हूं। मैं इसका दिमाग काबू में कर लूंगा और फिर जो मैं कहूंगा, वह वही करेगी, जिस तरह अब मैंने इन दोनों का दिमाग काबू में कर रखा है।" जाफर असहिर ने [संगीत] मजाका भरे अंदाज में कहा।

फिर कुछ सोच कर कहने लगा, "मगर यह भी सोचता हूं कि जब इसे मालूम होगा कि इसका शौहर मैंने मार डाला है, तो फिर वह मुझसे नफरत करने लगेगी और फिर मेरा जादू [संगीत] इसका जिस्म और दिमाग तो काबू में कर सकता है, मगर इसकी नफरत को मोहब्बत [संगीत] में नहीं बदल सकता।" जाफर साहिर ने धीमे लहजे में कहा। ऐसा महसूस होता था जैसे मीनार मीना के सामने वह हार मान रहा हो।

मेना ने कहा, "अरे मालिक, ऐसी कोई बात नहीं। [संगीत] अगर आप इजाजत दें तो मैं सुल्ताना की नफरत को मोहब्बत में बदल देने की कोशिश करूं। मैं आपको यकीन दिलाती हूं कि मैं इसे आपसे मोहब्बत करने पर मजबूर कर दूंगी।" मेनार मेन्हा ने फौरन अपनी खिदमतें पेश कर दी।

साहिर ने [संगीत] मजाक भरे लहजे में कहा, "तुम क्या कर सकती हो?" मैनार मेन्हा बोली, "यह आप मुझ पर छोड़ दी। आप देखेंगे कि मैं सुल्ताना को आपकी ज्योतियां चाटने पर मजबूर कर दूंगी।" मेनार मेन्हा ने फैसला [संगीत] लहजे में कहा।

जाफरस साहिर ने कहा, "अच्छा, ठीक है। हम देखते हैं कि तुम [संगीत] क्या कर सकती हो। मैं तुम्हें एक महीने की मुहालत देता हूं। एक महीने के अंदर अगर तुम कामयाब हो गई तो ठीक, वरना ठीक। एक महीना बाद मैं सुल्ताना से जबरन [संगीत] शादी कर लूंगा और शादी वाले दिन तुम्हारे कबाब बनाकर खा जाऊंगा।" मेनार मेना ने हंसते हुए कहा, "अगर मैं कामयाब हो गई तो फिर आप क्या इनाम देंगे?"

जाफर साहिर ने कहा, "जो तुम मांगोगी, मैं दूंगा।" मेनार मेना ने इसे छेड़ते [संगीत] हुए कहा, "आप अब जादू देवता की कसम खाकर कहते हैं कि जो मैं मांगूंगी, आप देंगे।"

जाफर साहिर ने कहा, "हां, जादू देवता [संगीत] की कसम खाकर कहता हूं कि अगर तुम इस शहजादी को मुझसे मोहब्बत करने पर तैयार करने में कामयाब हो गई, तो तुम जो मांगोगी [संगीत] मैं दूंगा।" जाफर असिर ने जोश में आकर कसम खा ली।

मेनार मेन्हा ने कहा, "ठीक है, अब आप बेफिक्र रहें। मैं आज से ही अपना काम शुरू कर [संगीत] दूंगी। मगर मगर..." मेनार मेन्हा कुछ कहते कहते रुक गई।

जाफर अस साहिर ने चौंक कर कहा, "मगर क्या?" मेनार मेन्हा ने बड़े मायूस लहजे में कहा, "मगर मैं कर भी क्या सकती हूं? आपने तो इन दोनों के दिमाग काबू में कर रखे हैं। अब तो वह मेरी बात भी ना सुन सकते।"

साहिर ने कहा, "तो फिर मैं क्या करूं? इनके दिमाग पर कब्जा खत्म कर दूं? मगर फिर वह भागने की मंसूबाबंदी करना शुरू कर देंगे।" जाफर अस साहिर ने कुछ

सोचते हुए, मेना ने कहा, "कमाल है! तुम इतना बड़ा और अज़ीम साहिर होकर दो तुच्छ से इंसानों से डर रहे हो। तुम ऐसा करो कि बाग़ के बाहर जादू का घेरा कायम कर दो और इन्हें आज़ाद छोड़ दो। यह ज़िंदगी भर बाग़ से बाहर न निकल सकेंगे। और फिर यह सुल्तान तो बिल्कुल अहमक सा जवान है। इसमें अक्ल नाम की कोई चीज़ नहीं।" मेनार मेन्हा ने जाफर अस साहिर को समझाते हुए कहा।

साहिर ने कहा, "ठीक है। मैं क्यों इन इंसानों से डरने लगा? मैंने तो सिर्फ़ गैर-ज़रूरी मसाइल से बचने के लिए इनका दिमाग़ क़ाबू में कर लिया था। लो, मैं इनका दिमाग़ खोल दूँगा।" जाफर असहिर ने कहा और फिर उसने दोनों हाथ ऊँचे किए और मुँह ही मुँह में कुछ पढ़ने लगा। काफ़ी देर पढ़ने के बाद उसने गोलाई की सूरत में दोनों हाथों को हवा में घुमाना शुरू कर दिया। जैसे ही उसने हाथों को हवा में घुमाया, सारे बाग़ में लाल रंग का धुएँ जैसा छा गया और इस धुएँ में बाग़ और जाफर असहिर भी छिप गया।

जाफर असहिर की आवाज़ सुनाई दी, "अच्छा, मेनार मेना, मैं जा रहा हूँ। मैंने बाग़ के चारों तरफ़ घेरा कायम कर दिया है और सुल्तान और सुल्ताना के दिमाग़ आज़ाद कर दिए हैं। अब मैं तीसरे दिन वापस आ जाऊँगा, जब मुझे सुल्तान की क़ुर्बानी देनी होगी। तुम अपनी कोशिश आज से शुरू कर दो।" जाफर साहिर ने कहा और फिर मेन्हा को यूँ महसूस हुआ जैसे जाफर साहिर भी धुआँ बनकर लाल रंग के धुएँ में मिल गया हो।

मेन्हा उड़कर पास के दरख़्त की शाख़ पर बैठ गई और धुआँ छँटने का इंतज़ार करने लगी। थोड़ी देर बाद धुआँ छँट गया तो मेन्हा ने देखा कि थोड़ी दूर एक झुंड के नीचे सुल्तान और सुल्ताना दोनों बेहोश पड़े हैं। मेन्हा उड़कर उस दरख़्त की सबसे निचली शाख़ पर बैठ गई और दोनों के होश में आने का इंतज़ार करने लगी।

धुआँ छँटा और सबसे पहले सुल्ताना होश में आ गई। मेन्हा दरख़्त पर ख़ामोशी से बैठी उन्हें देखती रही। सुल्ताना ने होश में आते ही सुल्तान को भी झिंझोड़ कर जगाया, "मालिक, उठिए! मालिक, उठिए! देखिए, हम कहाँ हैं?" सुल्ताना ने सुल्तान को झिंझोड़ते हुए हैरत भरे अंदाज़ में इधर-उधर देखते हुए कहा और फिर सुल्तान भी उठकर बैठ गया और वह भी बहुत हैरान था।

अभी वे हैरत भरे अंदाज़ में इधर-उधर देख रहे थे कि मेन्हा बोल पड़ी, "सुल्तान साहब और महारानी, मेनार मेन्हा का प्रणाम क़बूल कीजिए।" मेन्हा की आवाज़ सुनकर वे दोनों हैरत से अचल पड़े और इसके साथ ही मेन्हा उड़ती हुई सुल्ताना के कंधे पर आकर बैठ गई और सुल्ताना बड़े प्यार से उस पर हाथ फेरने लगी।

सुल्तान ने हैरत भरे लहजे में सवाल किया, "मेन्हा, हम कहाँ हैं? यह बाग़ किसका है? हम तो पहाड़ के नीचे खेमे के अंदर मौजूद थे, फिर यहाँ कैसे पहुँच गए?"

और फिर मेन्हा ने अब तक के तमाम हाल उन्हें तफ़सील से सुनाए कि किस तरह उसने जाफर अस साहिर को मीठी बातों से बहलाया, फ़रेबाया और उनके दिमाग़ जादू से आज़ाद करवाए हैं और किस तरह वह उस पर भरोसा करने लगा है।

जब मेना ने बताया कि तीन दिन बाद जाफर असहिर सुल्तान को क़ुर्बानी चढ़ाने का इरादा रखता है तो सुल्ताना बुरी तरह रो पड़ी। सुल्तान ने बेचैनी से कहा, "अरे अरे! तुम क्यों रो पड़ीं? महारानी, अभी तो मैं ज़िंदा हूँ।"

सुल्ताना ने पहले की तरह रोते हुए कहा, "मगर वह साहिर तो बहुत ताक़तवर है।"

मेना ने उसे हौसला देते हुए कहा, "महारानी, आप घबराती क्यों हैं? मैंने जाफर अस साहिर को चारा डाल दिया है। अब जैसे ही वह चारा चबाएगा, मेरे जाल में फँस जाएगा।"

सुल्ताना ने कहा, "यह सब बातें हैं। वह बहुत धूर्त है। हम उसके पंजों में फँसे हुए हैं। मेरी तो जान निकल रही है।"

सुल्तान ने बहुत ऐतबार भरे लहजे में कहा, "अरे महारानी, आप बेजा घबरा गईं। क्या आप हमें डरपोक समझती हैं कि हम यूँ ही आसानी से उसके हाथ चढ़ जाएँगे? हम इसे टक्कर देंगे और इस ज़ालिम साहिर की ईंट से ईंट बजा देंगे।"

मेनार मेना ने हिमायत करते हुए कहा, "और मैं आपके साथ हूँ। आप देखेंगे कि मैं जाफर अस साहिर को ऐसी हार दूँगी कि इसकी सात पीढ़ियाँ भी माफ़ी माँगेंगी।"

सुल्ताना ने भी पूरे ऐतबार भरे लहजे में कहा, "अब वाक़ई मुझे हौसला हो गया है। मैं भी आपके साथ हूँ। अब रोने-धोने से कुछ नहीं होता। हौसला कीजिए तो यह जाफर असहिर आपके सामने हाथ जोड़ सकता है।" मेन्हा ने ख़ुशी से कहा।

सुल्तान ने कुछ सोचते हुए कहा, "अब हमारे पास सिर्फ़ तीन दिन हैं। इन तीन दिनों में हमें जाफर असहिर को हराना है।"

मेन्हा ने ऐतबार भरे लहजे में कहा, "तरकीब सोचने की कोई ज़रूरत नहीं है। अगर आप मुझ पर भरोसा करें तो मैं इस जाफर अस साहिर को ऐसी दर्दनाक सज़ा दूँगी कि पूरी दुनिया तक याद करे।"

सुल्तान ने कहा, "क्या तुम्हारे पास कोई तरकीब है?"

मेन्हा बोली, "मेरे पास बहुत कामयाब तरकीब है, मगर शर्त यह है कि आप मुझ पर भरोसा करते हुए मेरा साथ दें।"

और फिर उसके ज़ोर देने पर इन दोनों ने वादा कर लिया कि उसका कहना मान लेंगे क्योंकि अब तक उन्होंने देखा था कि मेनार मेन्हा बहुत दानिश्वर साबित हुई है। साहिर के क़ब्ज़े से उसने उनके दिमाग़ आज़ाद करवाए हैं, वरना वे अजनबीयत में ही मर जाते।

मेनार मेन्हा ने उन्हें समझाते हुए कहा, "तो फिर आप निश्चिंत रहें। तीन दिन बाद जब जाफर अस साहिर आपको क़ुर्बानी चढ़ाए तो उस वक़्त आप मेरा कारनामा देखेंगे। सिर्फ़ महारानी से गुज़ारिश है कि वह जाफर अस साहिर से ऐसा पेश आएँ जैसे वह उन्हें पसंद करने लगी हों।"

सुल्ताना ने कहा, "यह मुझसे नहीं हो सकता कि इस ज़ालिम साहिर की तारीफ़ करूँ और दूसरी बात यह कि ऐसा न हो कि तुम्हारी तरकीब नाकाम हो जाए और ख़ुदा न करे, सुल्तान साहब को कुछ हो जाए।"

मेनार मेना ने हँसते हुए महारानी से कहा, "अरे महारानी, आप मुझ तुच्छ परिंदे पर यक़ीन कीजिए, फिर आप देखती जाइए कि क्या होता है।"

और फिर फ़ैसला हो गया कि जो कुछ मेनार मेन्हा कहेगी, वैसे ही किया जाएगा।

यह काफ़ी बड़ा हॉल था। इसमें एक बहुत बड़ा तख़्त बिछा हुआ था, असली सोने का तख़्त। उस पर बड़े शाही अंदाज़ में जाफर असहिर बैठा हुआ था। इंसान की हड्डियों का बना हुआ ताज उसके सर पर रखा था और वह एक इंसान के कंकाल को खड़ा करके उसके सर पर हाथ रखे हुए था। उसके चारों तरफ़ ढेर सारी बुरी रूहें थीं, अलग-अलग जानवरों के रूप में। मेनार मेना भी तख़्त के साथ एक सोने के बने हुए झूले पर बैठी हुई थी। उसने जाफर असहिर को यक़ीन दिलाया था कि उसने सुल्ताना को उससे मोहब्बत करने पर राज़ी कर लिया है। इसलिए जाफर असहिर बहुत ख़ुश था।

तख़्त के सामने एक जवान का सर कटा हुआ रखा था और उसकी लाश फ़र्श पर पड़ी हुई थी। एक जल्लाद हाथ में ख़ौफ़नाक कुल्हाड़ी लिए खड़ा था। जाफर असहिर ने हुक्म दिया, "इसको हटाओ और सुल्तान और सुल्ताना को लाया जाए।"

फिर पल भर में उस जवान का सर और धड़ हटा दिया गया। कुछ बुरी रूहें सुल्तान और सुल्ताना को वहाँ ले आईं। जाफर अस साहिर ने बड़े फ़ख़्र भरे लहजे में कहा, "इस सुल्तान को क़ुर्बानी चढ़ा दो।" और जल्लाद ने सुल्तान को गर्दन से पकड़ कर उसका सर लकड़ी पर झुका दिया। सुल्ताना यह मंज़र देखकर डर और हैरत से मूर्ति बनी खड़ी थी, जबकि मेनार मेन्हा की आँखें ख़ुशी से चमक रही थीं। वह तेज़ी से उड़ी और सुल्ताना के कंधे पर आकर बैठ गई। मेना ने उसके कानों में सरगोशी करते हुए कहा, "महारानी, हौसला कीजिए। सुल्तान साहब को कुछ न होगा।"

उसी पल जाफर असहिर ने सख़्त लहजे में कहा, "क्यों महारानी, क्या आप हमसे मोहब्बत करती हैं और हमसे शादी के लिए तैयार हैं?"

सुल्ताना का जी चाहा कि जवाब में जाफर असहिर को जी भरकर गालियाँ दे, मगर मेनार मेना ने उससे कह दिया था कि अगर इस वक़्त उसने मना किया तो सुल्तान की जान बचना मुश्किल हो जाएगी। इसलिए उसने अपने आप को सँभाला और हाँ कर दी। और उसके हाँ कहते ही जाफर असहिर ख़ुशी से अचल पड़ा, "ख़ूब, बहुत ख़ूब! देखो सुल्ताना, तुम हाँ भरकर फँस गई हो। अब तुम चाहो भी तो मना न कर सकती हो।"

और इसके साथ ही उसने जल्लाद को इशारा किया और जल्लाद ने अपनी ख़ौफ़नाक कुल्हाड़ी हवा में ऊँची की। दूसरे ही पल हॉल एक ख़ौफ़नाक चीख़ से गूँज उठा। साथ ही बुरी रूहों ने ठहाका लगाया। बुरी रूहों के ज़ोरदार ठहाकों से यूँ महसूस हुआ जैसे छत उड़ जाएगी। ठहाकों की गूँज में मेनार मेन्हा की फड़फड़ाहट भी शामिल थी। मेनार मेन्हा के पंखों की फड़फड़ाहट में गूँजने वाली ख़ौफ़नाक चीख़ जल्लाद की थी।

ज्यों ही जल्लाद ने कुल्हाड़ी ऊँची की, मेना तेज़ी से उड़ी और अपनी तेज़ चोंच जल्लाद की आँख में चुभो दी। ख़ौफ़नाक चीख़ ऊँची हुई और कुल्हाड़ी छूट कर नीचे गिर पड़ी। सुल्ताना ने जल्दी से आगे बढ़कर उस कुल्हाड़ी से जल्लाद की गर्दन से जिस्म अलग कर दिया। यह सारा प्लान मेना सुल्ताना को पहले बता चुकी थी। यह सब कुछ इतनी तेज़ी से हुआ था कि सब ख़ामोश होकर रह गए।

जाफर असहिर को होश आया। वह ग़ुस्से से काँप रहा था। उसने कहा, "बदतमीज़ मेन्हा, तुमने अपनी मौत को और भी दर्दनाक बना लिया है। अब तुम दोनों को मेरे ग़ुस्से से कोई न बचा सकता।" जाफर असहिर ने ग़ुस्से से काँपते हुए कहा।

मेन्हा ने जल्दी से कहा, "जनाब, आप पहले मेरी पूरी बात सुन लें। बेशक, इसके बाद जो सज़ा भी मुझे देंगे, वह क़बूल होगी।"

जाफर असहिर ने कहा, "जल्दी बोलो। क्या कहना चाहते हो? मेरे पास वक़्त नहीं है। इसके बाद दर्दनाक तकलीफ़ के लिए तैयार हो जाओ।"

मेना ने कहा, "पहले आप सुल्तान की टाँग से कपड़ा हटाकर तो देखें।"

जाफर अस साहिर ने पूछा, "क्या है वहाँ?"

फिर जल्दी से सुल्तान की टाँग से कपड़ा हटाया गया तो वहाँ काफ़ी बड़ा ज़ख़्म था। साहिर ने पूछा, "यह क्या है?"

मेना ने कहा, "जनाब, सुल्तान इस ज़ख़्म की वजह से दोष वाला हो चुका है। अगर इसकी क़ुर्बानी हो जाती तो एक साल के लिए आपका जादू चला जाता और आप किसी काम के न रहते। मेरी अचानक इस पर नज़र पड़ गई थी जिसकी वजह से मुझे जल्लाद को अंधा करना पड़ा।" मेन्हा ने साहिर को तफ़सील बताते हुए कहा। (मेन्हा दिल में सोच रही थी कि यह तो अच्छा हुआ कि एक दिन पहले ही सुल्तान को सुल्ताना के हाथों ज़ख़्म ही करवा दिया था, मगर यह बात वह साहिर से न कह सकती थी।)

जाफर असहिर ने नरम लहजे में कहा, "ओह, अच्छा! वाक़ई ज़ख़्म तो है, मगर सुल्ताना ने जल्लाद को क्यों मार डाला?"

सुल्ताना ने जवाब दिया, "मैं आपकी होने वाली बीवी हूँ। आपसे मोहब्बत करने लगी हूँ। मुझे डर था कि कहीं जल्लाद अंधा होने के बावजूद सुल्तान को न मार दे, जिसकी वजह से आपका जादू चला जाए और आप एक आम से इंसान बनकर रह जाएँ।"

साहिर ने कहा, "ओह, अच्छा! ठीक है, सुल्ताना, तुमने अच्छा किया है। अब इसका क्या करें?"

मेना ने जाफर असहिर से बात करते हुए कहा, "अब हम बाग़ वाले कमरे में सुल्तान को ले जाएँ। इसकी पट्टी करें। जब सुल्तान ठीक हो जाएगा, फिर इसकी क़ुर्बानी चढ़ाएँगे। अब किसी और की क़ुर्बानी भी न कर सकते क्योंकि सुल्तान इस क़ुर्बानी के लिए नामज़द हो चुका है।"

जाफर असहिर ने कहा, "ठीक है। अब तुम और सुल्ताना इस सुल्तान को बाग़ वाले कमरे में ले जाओ।"

इतना कहकर जाफर साहिर ने हवा में हाथ हिलाकर झटका दिया तो तमाम बुरी रूहें वगैरह ग़ायब हो गईं। इसके बाद वह ख़ुद भी ग़ायब हो गया। सुल्ताना और मेना सुल्तान को उठाए कमरे में आ गईं।

सुल्ताना बहुत परेशान थी। जो कुछ हुआ था, इतनी तेज़ी से हुआ था कि उसके होश अब तक काम न कर रहे थे।

मेना ने कहा, "हौसला रखें, महारानी, मैं अभी आई।" मेना यह कहकर बाहर निकल गई। थोड़ी देर बाद वापस आई तो उसकी चोंच में किसी जड़ी-बूटी के पत्ते थे। "यह सूरज-बूटी के पत्ते हैं। उन्हें रगड़कर इनका लेप बनाकर सुल्तान की टाँग पर बाँध दें।" मेना ने सुल्ताना से कहा।

सुल्ताना ने जल्दी से पत्ते लेकर उन्हें पत्थर से गोदकर लेप बनाकर सुल्तान की टाँग पर बाँध दिया। मेना ने सुल्ताना से कहा, "शाम तक यह ज़ख़्म ठीक हो जाएगा।"

सुल्ताना ने परेशानी से मेना से पूछा, "अब क्या होगा? सुल्तान साहब कब तक होश में आ जाएँगे?"

मेना ने कहा, "सुल्तान साहब को कुछ न होगा। बस कुछ ही देर में सुल्तान साहब को होश आ जाएगा।" मेना ने सुल्ताना को तसल्ली देते हुए कहा, "अब मैं जो कहती हूँ, तुम वैसे ही करती जाओ। हौसला न हारना। अब हम सबकी ज़िंदगी तुम्हारे हाथ में है।" मेना ने सुल्ताना को समझाते हुए कहा और सुल्ताना ठंडी साँस लेकर रह गई।

अब यह बातें हो ही रही थीं कि अचानक एक धमाका सा हुआ और धुएँ का बादल पैदा हुआ जिसमें से लाल रंग का एक बौना ज़ाहिर हुआ। बौने के मुँह से निकला, "सुल्ताना की ख़िदमत में लाल बौना प्रणाम करता है।"

सुल्ताना ने पूछा, "क्या बात है?" वह हैरत से बौने की तरफ़ देख रही थी।

बौने ने कहा, "आपको जाफर असहिर याद कर रहा है और इसी वक़्त आपको अपने कमरे में बुलाया है।"

सुल्ताना ने बौने को जवाब दिया, "ठीक है, तुम जाओ, हम आते हैं।" यह सुनकर बौना ग़ायब हो गया।

सुल्ताना ने मेन्हा की तरफ़ देखा। मेन्हा उड़कर सुल्ताना के कंधे पर आ बैठी और उसके कानों में सरगोशी करने लगी।

जाफर असहिर एक सजे हुए कमरे में बड़ी सी मसनद पर तकिया लगाए बैठा था। उसके हाथ में शराब का एक गिलास था जिसको वह आहिस्ता-आहिस्ता पी रहा था। अचानक उसने चौंक कर एक हाथ हवा में लहराते हुए झटका दिया तो सामने दीवार रौशन हो गई और एक मंज़र दिखाई आने लगा जिसमें सुल्ताना सुल्तान की टाँग पर दवा का लेप लगा रही थी। कुछ देर देखने के बाद हाथ को झटका देकर उसने लहराया तो वह मंज़र ग़ायब हो गया।

फिर एक मंत्र पढ़कर ज़मीन की तरफ़ झटका दिया तो एक धमाका सा हुआ और धुएँ का एक बादल प्रकट हुआ। इसमें से लाल रंग का एक बौना निकला और बोला, "क्या हुक्म है, मालिक?"

जाफर असहिर ने कहा, "लाल बौना, सुल्ताना के पास जाओ और मेरा पैग़ाम दो कि हम उसे याद कर रहे हैं। फ़ौरन हमारे पास आओ।" जाफर असहिर ने बौने से बात करते हुए कहा, "जो हुक्म मेरे मालिक।" इतना कहकर लाल बौना वहाँ से ग़ायब हो गया।

"दासी सुल्ताना जाफर अस साहिर की ख़िदमत में नमस्कार पेश करती है।" अचानक दरवाज़े से सुल्ताना की मीठी आवाज़ सुनाई दी। साहिर चौंक कर दरवाज़े की तरफ़ देखने लगा। वहाँ से सुल्ताना एहतराम भरे अंदाज़ में सलाम करते हुए अंदर दाख़िल हो रही थी।

उसने कहा, "आओ आओ, महारानी, हम आपको ही याद कर रहे थे। हमारे पास आकर बैठो।" जाफर अस साहिर ने ख़ुश होते हुए सुल्ताना से कहा और सुल्ताना साहिर के पास ही मसनद पर बैठ गई।

उसने कहा, "सुल्ताना, हम बहुत ख़ुश हैं कि दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत औरत हमारी बीवी बनेगी। हमने फ़ैसला किया है कि सुल्तान के ठीक होते ही इसकी क़ुर्बानी देकर आपसे शादी कर लेंगे।"

सुल्ताना ने कहा, "ठीक है, हुज़ूर। जैसा आप कहेंगे, वैसे ही होगा। मेरी ख़ुशनसीबी होगी कि आप जैसे बड़े साहिर मेरे शौहर होंगे।" सुल्ताना ने कहा और साहिर का सीना फ़ख़्र से और चौड़ा हो गया।

सुल्ताना ने जाफर असहिर के हाथ से गिलास ले लिया और दोबारा भरकर उसके हाथ में दे दिया जिसे जाफर अस साहिर ने एक ही घूँट में ख़ाली कर दिया। सुल्ताना ने गिलास दोबारा भर दिया। यह सब करने को सुल्ताना का दिल तो न चाह रहा था, मगर वह यह करने पर मजबूर थी और मेनार मेन्हा ने भी उसे ऐसा ही करने को कहा था।

सुल्ताना ने कहा, "मुझे आपसे शादी करने में कोई ऐतराज़ नहीं। मगर," सुल्ताना ने बात अधूरी छोड़ दी।

"मगर क्या?" जाफर असहिर चौंक कर सीधा होकर बैठ गया। "तुम मुझसे वादा कर चुकी हो और तुम इससे मुकर न सकती, वरना मर जाओगी।" जाफर असहिर ने ग़ुस्से से सुल्ताना से कहा।

सुल्ताना ने कहा, "नहीं। मैं इनकार नहीं कर रही हूँ। मैं आपसे वादा कर चुकी हूँ और आप ही से शादी करूँगी। मगर एक मसला है, वह यह कि मेरी औलाद न होगी और न सुल्तान मुझे औलाद दे सका। इसीलिए मैं अब उससे नफ़रत करती हूँ और आपसे शादी करना चाहती हूँ। आपको नहीं पता कि मुझे बच्चों की कितनी ख़्वाहिश है।" सुल्ताना ने कहा।

जाफर असहिर बोला, "हम, यह सब तो ठीक है। अगर मुझसे भी औलाद न हुई तो?" जाफर असहिर ने सुल्ताना से पूछा।

सुल्ताना बोली, "मुझे एक बुज़ुर्ग ने बताया था, अगर मैं शाह फल को खा लूँ तो मैं माँ बन सकती हूँ। तो आप मुझे शाह फल लाकर देंगे न?" सुल्ताना ने प्यार भरे लहजे में पूछा।

जाफर असहिर ने कहा, "अच्छा, एक मिनट ठहरो।" यह कहकर जाफर असहिर ने मंत्र पढ़ते हुए हवा में हाथ लहराते हुए दीवार की तरफ़ झटका दिया, तो अचानक दीवार फट गई और इसमें एक सुनहरी कछुआ प्रकट हुआ और बोला, "क्या हुक्म है मेरे मालिक?"

जाफर असहिर बोला, "सुनहरी कछुए, शाह फल हासिल करने का तरीक़ा बताओ।"

सुनहरी कछुए के मुँह से आवाज़ निकली, "मालिक, शाह फल आदमख़ोर मगरमच्छों का समंदर पार करने के बाद आदमख़ोर जंगल में मौजूद है जिसमें ख़ूँख़ार परिंदे भी रहते हैं जो हर जानवर को पल भर में मार डालते हैं। शाह फल को कोई बहादुर इंसान ही हासिल कर सकता है।" सुनहरी कछुए ने तफ़सील से जवाब दिया।

साहिर ने पूछा, "तो फिर इसे कौन लाएगा?"

कछुए ने कहा, "इसे सिर्फ़ सुल्तान ही ला सकता है, अगर वह चाहे तो।"

जाफर असहिर ने कहा, "नहीं, हम सुल्तान को इस मिशन पर न भेज सकते। इसकी हमने क़ुर्बानी देनी है। अगर इसे कुछ हो गया तो? सुनहरी कछुए, शाह फल हासिल करने का कोई तरीक़ा बताओ।"

सुनहरी कछुए ने कहा, "मालिक, आप अपने गले का हार सुल्तान के गले में डाल दें तो उस पर कोई जादू असर न करेगा और आदमख़ोर मगरमच्छ भी इसे कुछ न कहेंगे।" सुनहरे कछुए ने जवाब दिया।

साहिर ने कहा, "नहीं, हम अपना हार किसी को न दे सकते। हार उतारने से हम आम इंसान बनकर रह जाएँगे।" जाफर असहिर ने कहा।

सुल्ताना ने यह सुनकर प्यार भरे लहजे में कहा, "कुछ देर की बात है। जब सुल्तान शाह फल लेकर आ जाएगा तो आप अपना हार वापस ले लें और फिर सुल्तान की क़ुर्बानी दे दें।" और फिर उसने अपना हाथ साहिर के कंधे पर रख दिया।

साहिर ने कहा, "ओह, अच्छा! ठीक है। हम अपना हार सुल्तान को दे देंगे। मगर आदमख़ोर जंगल और परिंदों से सुल्तान अपना बचाव कैसे करेगा?" साहिर ने सुनहरी कछुए से पूछा।

उसने कहा, "मालिक, जब रात की काली स्याही सफ़ेदी में बदल रही हो तो उस वक़्त थोड़ी देर के लिए आदमख़ोर दरख़्त और परिंदे सो जाते हैं और सूरज की पहली किरण के साथ ही सब जाग जाते हैं। यही वह पल है जब शाह फल हासिल किया जा सकता है।" सुनहरी कछुए ने तफ़सील से जवाब दिया।

जाफर असहिर ने कहा, "ठीक है, तुम कल सुबह होने से पहले सुल्तान को अपनी पीठ पर बिठाकर समंदर पार करोगे। मेरे हार की वजह से मगरमच्छ तुम दोनों को कुछ न कहेंगे और जंगल से शाह फल ले आओ।"

कछुआ बोला, "बहुत बेहतर, मेरे मालिक। आप बाग़ से अपना जादुई घेरा ख़त्म कर दें। मैं सुबह सुल्तान को लेकर रवाना हो जाऊँगा।" इतना कहकर सुनहरी कछुआ ग़ायब हो गया।

जाफर असहिर ने अपने गले से हार उतार कर सुल्ताना को दे दिया और कहा, "इसे सुल्तान को दे दो और इसे कल सुबह सुनहरी कछुए के साथ रवाना कर दो। अब तुम जाओ, मैं आराम करूँगा।"

सुल्ताना ने जाफर असहिर से हार लिया और शराब का गिलास भरकर जाफर असहिर के हाथ में दे दिया और फिर वह कमरे से बाहर निकल आई।

सुल्ताना जब अपने कमरे में दाख़िल हुई तो देखा कि सुल्तान को होश आ चुका था और वह मेनार मेना से बातें कर रहे थे। सुल्तान ने सुल्ताना को देखा तो बोला, "आओ आओ, महारानी।"

सुल्ताना ने पूछा, "अब आप कैसे हैं? मैं बहुत परेशान हूँ। आपका ज़ख़्म कैसा है?"

सुल्तान ने जवाब दिया, "अब मैं बिल्कुल ठीक हूँ और ज़ख़्म भी न होने के बराबर है। मुझे मेना ने सारी तफ़सील बता दी है और जाफर असहिर ने तुमसे क्या कहा है?" सुल्तान ने सुल्ताना से पूछा तो सुल्ताना ने सारी बातें इन दोनों को बता दीं।

"आप फ़िक्र न करें, महारानी। अल्लाह हमारा मददगार और हामी होगा।" मेनार मेना ने कहा और उन्हें बताने लगी कि आपके जाने के बाद नींद में ख़्वाब में जिन मुल्क के एक बुज़ुर्ग आए थे और मैंने उनसे मदद की दरख़्वास्त की थी तो उन्होंने बताया था कि अगर जाफर असहिर के गले से हार उतार लिया जाए तो वह एक आम इंसान बनकर रह जाएगा और सोने में उसके सर के साथ जो खोपड़ियाँ हैं, इनको हबशी के काले मूर्ति के हाथ में जो नेज़ा है और इस नेज़े से एक साथ तीन खोपड़ियों को तोड़ दिया जाए तो जाफर अस साहिर मर जाएगा। मेना ने सुल्ताना को तफ़सील से बताया।

सुल्ताना ने कहा, "हार मेरे पास है। इसे मैं ले आई हूँ।" सुल्ताना ने आगे बढ़कर वह हार सुल्तान के गले में डाल दिया और बोली, "आप कल सुबह जंगल में जाने के लिए तैयार रहें।" यह सुनकर सुल्तान ने सर हिलाया।

अगले दिन सुल्तान सुनहरी कछुए के साथ रवाना हुआ। सुनहरी कछुआ और सुल्तान समंदर के किनारे खड़े थे। कछुए ने कहा, "सुल्तान साहब, आप जल्दी से मेरी पीठ पर सवार हो जाइए क्योंकि सुबह होने में कुछ ही देर बाक़ी है। हमें समंदर भी पार करना है।" सुनहरी कछुए ने सुल्तान से कहा और सुल्तान जल्दी से कछुए की पीठ पर सवार हो गया और सुनहरी कछुए ने समंदर में गोता लगाया और तेज़ी से तैरने लगा।

क़रीब 10 मिनट के बाद दूसरा किनारा आ गया। कछुए ने कहा, "मैं यहीं किनारे पर आपका इंतज़ार करूँगा। आप जल्दी से जंगल में घुस जाइए क्योंकि सुबह होने में कुछ ही वक़्त बाक़ी है। उस वक़्त आदमख़ोर दरख़्त और परिंदे सो रहे हैं। कुछ ही देर में वे जाग जाएँगे।" कछुए ने सुल्तान से कहा।

यह सुनकर सुल्तान छलाँग लगाकर कछुए की पीठ से उतरा और जंगल की तरफ़ रवाना हो गया।

जंगल में दाख़िल होते ही सुल्तान ने अपनी तलवार म्यान से निकालकर हाथ में पकड़ी और शाह फल को ढूँढना शुरू कर दिया। काफ़ी देर ढूँढने के बावजूद भी सुल्तान को वह फल न मिला तो सुल्तान परेशान हो गया क्योंकि बस अब सुबह होने वाली थी और सूरज की पहली किरण के साथ ही सारा जंगल जाग उठता।

अचानक सुल्तान पीछे मुड़ा तो उसकी नज़र एक बड़े दरख़्त के नीचे पौधे पर पड़ी जिसका रंग सफ़ेद था। अँधेरे में वह दिखाई न दे रहा था। उस पर सिर्फ़ एक ही फल था और उसकी चार पत्तियाँ थीं। सुल्तान समझ गया कि यही शाह फल है। सुल्तान ने जल्दी से शाह फल को तलवार से अलग किया और जेब में रख लिया और किनारे की तरफ़ दौड़ लगा दी।

अचानक सुल्तान को शाख़ों की सरसराहट की आवाज़ें सुनाई देने लगीं और हल्की-हल्की परिंदों की कहीं-कहीं से आवाज़ें भी आने लगीं। सुल्तान समझ गया कि सुबह हो चुकी है और सारा जंगल जाग रहा है। सुल्तान के पीछे आदमख़ोर दरख़्तों की शाख़ें झपट रही थीं और परिंदे भी दरख़्तों से उड़ चुके थे। सुल्तान पूरी ताक़त से भाग रहा था और शाख़ें सुल्तान को अपनी लपेट में लेने की कोशिश कर रही थीं, जिन्हें सुल्तान अपनी तलवार से काटता हुआ आगे की तरफ़ भागता जा रहा था।

समंदर के किनारे खड़ा सुनहरी कछुआ ज़ोर-ज़ोर से सुल्तान को जल्दी आने का कह रहा था और ख़ूँख़ार परिंदे भी समंदर के किनारे पहुँच चुके थे।

सुनहरी कछुए ने चीख़ कर सुल्तान से कहा, "जल्दी करो और मेरी पीठ पर सवार हो जाओ।" सुल्तान ने दूर से ही छलाँग लगाई और कछुए पर सवार हो गया। सुल्तान के सवार होते ही कछुए ने पानी में गोता लगाया और परिंदे पानी के ऊपर ही शोर मचाते रह गए।

कुछ देर तैरने के बाद समंदर का दूसरा किनारा आ गया। समंदर से निकलकर सुनहरी कछुआ और सुल्तान जाफर असहिर के अंदर पहुँच गए। कछुए ने कहा, "सुल्तान साहब, अब आप मेरी पीठ से उतर जाइए और सीधा सुल्ताना के कमरे में जाकर इसे शाह फल दे दें। अभी जाफर असहिर सो रहा होगा। जब वह जागेगा तो मैं इसे सारी तफ़सील बता दूँगा।" सुल्तान यह सुनकर कछुए की पीठ से नीचे उतर आया। इसके बाद सुनहरी कछुआ ग़ायब हो गया।

मेनार मेना ने सुल्तान को देखते ही शोर मचा दिया, "सुल्तान साहब आ गए! सुल्तान साहब आ गए!" सुल्ताना भी मेन्हा का शोर सुनकर चौंकी और देखा कि सुल्तान दरवाज़े से अंदर दाख़िल हो रहे थे। सुल्तान को देखकर सुल्ताना एकदम ख़ुश हो गई और भागकर सुल्तान के पास आ गई। "शुक्र है आप आ गए। मैं तो सोच-सोच कर ही मरने वाली हो गई थी।" सुल्ताना ने ख़ुश होते हुए कहा।

मेना ने सुल्तान को बताया कि यह तो इसी वक़्त से रोती भी रही है और साथ-साथ दुआएँ भी करती रही है। "अब आपको देखकर ख़ुश हुई है।" सुल्तान मुस्कुरा पड़ा और जेब से शाह फल निकालकर सुल्ताना को दिया और कहा, "इसे फ़ौरन खा लो।" सुल्ताना ने शाह फल सुल्तान से लिया। इसे तवज्जो से देखा। फिर फ़ौरन ही इसे खा लिया। इसके बाद सब हँस पड़े।

"अब जल्दी से चलें। हबशी के काले मूर्ति से नेज़ा भी हासिल करना है।" मेना ने कहा।

सुल्ताना ने जल्दी से कहा, "हाँ हाँ, सुल्तान साहब, जल्दी चलिए। जाफर अस साहिर अभी नशे में सो रहा होगा, वरना फिर वह जाग जाएगा। चलो, आओ जल्दी।" सुल्तान ने कहा और बाहर की तरफ़ चल दिया। सुल्ताना भी उसके पीछे चल दी। मेनार मेना सुल्ताना के कंधे पर बैठी थी।

भंडार घर के पास पहुँचकर सुल्तान ने सुल्ताना को रुक जाने का इशारा किया और फ़ौरन भंडार घर में दाख़िल हो गया। भंडार घर में दाख़िल होते ही सुल्तान की नज़र हबशी के काले मूर्ति पर पड़ी जो बिल्कुल साकित खड़ा था। सुल्तान के गले में जाफर अस साहिर का हार मौजूद होने की वजह से हबशी का काला मूर्ति बिल्कुल ख़ामोश खड़ा था। सुल्तान दबे पाँव आगे बढ़ा और बिल्कुल ख़ामोशी से उसके हाथ से नेज़ा ले लिया। फिर इसी तरह ख़ामोशी से वापस हो लिया।

बाहर आकर सुल्तान ने सुल्ताना से पूछा कि जाफर अस साहिर का कमरा कहाँ है? सुल्ताना ने सुल्तान को अपने पीछे आने का इशारा किया। तीन कमरे छोड़कर सुल्ताना ने कमरे की तरफ़ इशारा किया। फिर वे तीनों उस कमरे में दाख़िल हो गए।

कमरे में एक बड़ी सी मसनद पर जाफर अस साहिर सोया हुआ था। मसनद पर शराब की बोतल और गिलास भी पड़ा था। सुल्तान आहिस्ता से आगे बढ़ा और नेज़े को ज़ोर से जाफर असहिर के सर के ऊपर मौजूद तीन खोपड़ियों के आर-पार कर दिया। नेज़ा लगते ही खोपड़ियाँ टुकड़े-टुकड़े हो गईं। खोपड़ियों के टूटते ही अचानक अँधेरा छा गया। बिजली कड़कने लगी और तेज़ आँधी चलने लगी।

जब अँधेरा छँटा तो देखा कि वे तीनों एक पहाड़ी के पास खड़े थे। अचानक आसमान से एक रोती हुई आवाज़ आई, "मेरा नाम जाफर असहिर था। मुझे सोते में सुल्तान ने मार डाला।" इसके बाद आवाज़ आना बंद हो गई।

सुल्तान ने मुँह में हाथ डालकर सीटी मारी तो दूर घास चरते हुए उनके घोड़े हिनहिनाने लगे और दौड़ते हुए उनके पास आ गए और सुल्तान के जिस्म से अपना मुँह रगड़ने लगे।

"तुम्हारा बहुत-बहुत शुक्रिया, मेनार मेना। कामयाबी का सेहरा तो तुम्हारे सर जाता है, जिसकी वजह से हम कामयाब हुए।" सुल्तान ने मेनार मेना से बात करते हुए कहा।

मेना ने कहा, "शुक्रिया मेरा नहीं, अपनी महारानी का अदा कीजिए जिसने जाफर अस साहिर को अहमक बनाए रखा।" और फिर सब हँस पड़े। "अब मैं अपने शहर जाती हूँ। काफ़ी दिन हो गए घर से निकले। अब मुझे इजाज़त दीजिए, मेरे माँ-बाप मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।" मेन्हा ने उनसे कहा।

सुल्ताना ने मेन्हा से कहा, "मेनार मेन्हा, अब तुम हमारे पास आती-जाती रहना। तुम्हारे बग़ैर अब मन न लगेगा।"

मेनार मेन्हा ने कहा, "क्यों नहीं, क्यों नहीं! मैं आपके बच्चों से भी मिलने आती रहूँगी।"

सुल्तान ने हैरान होकर मेन्हा से पूछा, "बच्चों से तेरा क्या मतलब है?"

मेनार मेन्हा ने कहा, "मुझे बुज़ुर्ग बाबा ने बताया था कि सुल्तान के यहाँ दो जुड़वाँ बच्चे पैदा होंगे - एक बेटा और एक बेटी। मैंने तो इनके नाम तक सोच लिए हैं।" मेना ने सुल्तान को बताया।

सुल्तान ने पूछा, "कौन से नाम सोचे हैं तुमने?"

मेना ने कहा, "बेटे का नाम हीरामन शहज़ादा और बेटी का नाम मेनार शहज़ादी होगा।"

सुल्तान ने सुल्ताना की तरफ़ देखा जो गर्दन झुकाए शर्म से लाल गुलाब हो रही थी। यह देखकर सुल्तान ने बड़ा सा ठहाका लगाया और मेनार मेन्हा भी सरली हँसी-हँसते हुए सुल्ताना के कंधे से उड़ गई। उसके पीछे सुल्तान और सुल्ताना भी अपने-अपने घोड़ों पर सवार होकर अपनी सल्तनत की तरफ़ रवाना हो गए।