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Gareeb Bunkar Ki Neki Aur Aur Rehmati Bhediya Jisne Badal Di Taqdeer | Islamic Moral Story |

Mr. MR Voice 45:26

Transcription

पुराने वक्तों की बात है। जब अरब के सहरा के उस पार जहां सूरज की किरणें जमीन को तांबे की तरह पिघलाने पर आमादा रहती थी। वहां एक पुरानी बस्ती आबाद थी जिसे वादी-ए- सर्राब कहा जाता था। यह बस्ती चारों तरफ से सुनहरे रेत के टीलों और नुकीली काली चट्टानों से घिरी हुई थी। यहां की हवाओं में एक अजीब सी उदासी और वीरानगी थी। मानो यह जगह किसी पुराने श्राप या भूली हुई दास्तान का बोझ अपने सीने पर उठाए बैठी हो।

इस बस्ती के बिल्कुल आखिरी छोर पर जहां इंसानी आबादी खत्म होती थी और खौफनाक जंगल शुरू होता था। वहां एक टूटा फूटा सा मिट्टी का मकान था। इसमें बाबा रहीम रहते थे। रहीम एक बूढ़े कमजोर और निहायत गरीब बुनकर थे। उनके चेहरे पर झुर्रियों का जाल था जो वक्त और हालात की सख्ती को बयां करता था। मगर उनकी आंखों में एक ऐसी रूहानी चमक थी जैसे कोई बुझता हुआ दिया आंधी में भी अपनी लौ बचाने की जिद पर अड़ा हो।

बाबा रहीम की पूरी कायनात उनका एक पुराना चरखा और एक फटी हुई चटाई थी। वो दिन भर सूत कातते थे। मगर वादी सर्राब के लोग अब रेशम और मखमल के दीवाने हो चुके थे। लिहाजा रहीम के खुरदुरे सूती कपड़ों का कोई खरीदार ना था। कई कई दिन गुजर जाते और रहीम के घर में चूल्हा ना जलता। वो सिर्फ खजूर और पानी पर गुजारा करते और अपनी तनहाई को अल्लाह की रजा मानकर खामोश रहते। उनकी जुबान पर कभी शिकवा ना आता। बस हर हाल में अल्हम्दुलिल्लाह की सदा होती।

वादी सर्राब से कुछ मील की दूरी पर एक ऊंची और डरावनी चट्टान के ऊपर एक आलीशान महल था। शीश ए जुल्म इस महल का मालिक नवाब हाशिम था। हाशिम एक ऐसा ताजीर था जिसका कारोबार इंसानी मजबूरियों का सौदा करना था। कहा जाता था कि हाशिम के पास कीमियागिरी यानी सोना बनाने का इल्म का एक ऐसा राज है जिसे उसने शैतानी ताकतों से हासिल किया है। उसका महल काले संगमरमर से बना था जिसकी दीवारों में ऐसे आईने जड़े थे जो इंसान की रूह का अक्स भी दिखा देते थे। हाशिम की क्रूरता के किस्से रेगिस्तान की हवाओं में सर की तरह घुले हुए थे। वो हर उस चीज का मालिक बनना चाहता था जो नायाब हो। चाहे वह जमीन हो, जानवर हो या किसी गरीब की इज्जत।

एक रात जब चांद बादलों के पीछे छिपा हुआ था और सहरा में एक भयानक तूफान उठा तो मंजर कयामत का सा हो गया। हवाएं ऐसे चीख रही थी जैसे सैकड़ों चुड़ैलें एक साथ रो रही हो। रेत के बवंडर ने वादी को अपनी चपेट में ले लिया था। बाबा रहीम अपने कांपते हुए झोपड़े के कोने में सिमटे तस्बीह फेर रहे थे। उनका दरवाजा हवा के थपेड़ों से बार-बार खड़क रहा था। आधी रात के करीब जब तूफान का जोर कुछ कम हुआ तो रहीम को अपने दरवाजे के बाहर एक भारी चीज के गिरने की आवाज सुनाई दी। साथ ही एक दर्दनाक कराह जो हवा की साजिशों के बीच भी साफ सुनी जा सकती थी।

रहीम जो अपनी जान से ज्यादा दूसरों के दर्द को महसूस करते थे ने बिस्मिल्लाह कहकर कांपते हाथों से दरवाजा खोला। बाहर का मंजर दिल दहला देने वाला था। रेत के ढेर पर एक विशालकाय जानवर पड़ा था। वो कोई मामूली कुत्ता या लोमड़ी नहीं बल्कि एक स्याह भेड़िया था। रेगिस्तान का वो दरिंदा जिसे लोग मौत का हरकारा मानते थे। भेड़िए का जिस्म जख्मों से चूर था। ऐसा लगता था जैसे वह किसी बड़ी जंग से बचकर आया हो या किसी ऊंची जगह से गिरा हो। उसके काले रेशमी बालों पर खून जमा हुआ था और उसकी सांसे उखड़ रही थी।

रहीम एक पल के लिए सहम गए। बचपन से उन्होंने सुना था कि स्याह भेड़िया मनहूसियत लाता है और यह शैतान का साथी होता है। लेकिन जब उनकी नजर उस जानवर की आंखों पर पड़ी तो वह ठिठक गए। उस भेड़िए की आंखें खूंखार नहीं थी। वो सुनहरी थी मगर उनमें एक अजीब सी बेबसी और इल्म था जैसे वह रहीम से रहम की भीख मांग रही हो। बाबा रहीम का दिल पसीज गया। उन्होंने सोचा यह भी तो उसी परवरदिगार की मखलूक है जिसने मुझे बनाया है। अगर मैं इसे मरने के लिए छोड़ दूं तो कयामत के दिन अपने रब को क्या मुंह दिखाऊंगा?

अपनी बुढ़ापे की कमजोरी को दरकिनार करते हुए रहीम ने पूरी ताकत लगाकर उस भारीभरकम जानवर को घसीटा और अपनी झोपड़ी के अंदर ले आए। उन्होंने अपनी एकमात्र चादर उस पर डाल दी। पानी गर्म किया और अपनी पगड़ी का कपड़ा फाड़कर उसके गहरे जख्मों को साफ किया। भेड़िया दर्द से गुर्राया नहीं बल्कि उसने रहीम के हाथ को अपनी खुरदुरी जुबान से चाटा। मानो वो उनका शुक्रिया अदा कर रहा हो। रहीम के पास खाने को सिर्फ एक सूखी रोटी का टुकड़ा और थोड़ा सा बकरी का दूध बचा था जो उन्होंने अगली सुबह के लिए बचा रखा था। बिना एक पल सोचे उन्होंने रोटी को दूध में भिगोया और उस जख्मी जानवर के मुंह के पास रख दिया। खुद भूखे पेट उस सारी रात उस अजनबी मेहमान के सिराहाने बैठे रहे। उसकी सलामती की दुआएं मांगते हुए।

अगले कुछ दिन और रातें बाबा रहीम और उस भेड़िए के दरमियान एक खामोश रिश्ते की बुनियाद बन गए। रहीम ने उसका नाम सुल्तान रख दिया। सुल्तान की रिकवरी किसी मोजिजे से कम ना थी। जिस जहर और चोट से कोई इंसान हफ्तों ना संभल पाता सुल्तान ने चंद दिनों में उस पर काबू पा लिया। गांव में धीरे-धीरे कान्हा फूंसी शुरू हो गई। सुना है उस पागल बुड्ढे रहीम ने अपनी मौत को घर में पनाह दी है। एक पड़ोसी ने दूसरे से कहा स्याह भेड़िया खुदा की पनाह यह जरूर कोई आफत लाएगा। दूसरे ने जवाब दिया हाशिम नवाब को पता चला तो वह रहीम की खाल खिंचवा देगा क्योंकि नवाब ने ऐलान किया है कि वादी का हर नायाब जानवर उसकी मिल्कियत है।

लेकिन रहीम को दुनिया की बातों की परवाह ना थी। सुल्तान अब पूरी तरह स्वस्थ हो चुका था। वो अब रहीम के पीछेछे साए की तरह चलता। जब रहीम नमाज पढ़ते तो सुल्तान उनके पास अदब से बैठ जाता। जब वह चरखा काटते तो वह उनके पैरों के पास सोता। रहीम को बरसों बाद अपनी तनहाई दूर होती महसूस हुई। उन्हें सुल्तान में एक बेटा, एक दोस्त और एक मुहाफिज नजर आने लगा।

मगर फितरत को बदला नहीं जा सकता। सुल्तान एक शिकारी था। पालतू जानवर नहीं। एक सुबह रहीम जब सोकर उठे तो सुल्तान गायब था। रहीम घबरा गए। वो नंगे पैर बस्ती की गलियों और सेहरा के किनारों पर उसे ढूंढते रहे। सुल्तान सुल्तान की आवाजें लगाते रहे। लेकिन सुल्तान कहीं ना था। रहीम का दिल बैठ गया। उन्हें लगा कि शायद उनकी फकीरी और भूख से तंग आकर वो जानवर अपनी दुनिया में लौट गया।

उदासी के आलम में रहीम अपनी झोपड़ी के बाहर बैठे थे। सूरज ढल रहा था। तभी क्षितिज पर एक काला धब्बा नजर आया। वह सुल्तान था। वह हवा की रफ्तार से दौड़ता हुआ आ रहा था। जब सुल्तान करीब आया तो रहीम ने देखा कि उसके मुंह में कुछ दबा हुआ है। सुल्तान ने रहीम के कदमों में वो चीज गिरा दी और पीछे हटकर अपनी दुम हिलाने लगा।

रहीम ने झुक कर देखा। वो एक नीलम का बड़ा सा टुकड़ा था। गहरा नीला, इतना चमकदार कि उसमें शाम का अंधेरा भी रोशन हो जाए। यह कोई मामूली पत्थर नहीं था। यह खालिस बेशकीमती रत्न था जो शायद बादशाहों के ताज की ज़ीनत बनने के लायक था। रहीम हक्के बक्के रह गए। या खुदा यह क्या है? सुल्तान तुम यह कहां से लाए? सुल्तान ने कोई जवाब ना दिया। बस अपनी गहरी सुनहरी आंखों से रहीम को देखता रहा। जैसे कह रहा हो। यह आपकी नेकी का सिला है।

रहीम कांप उठे। वह जानते थे कि इतना कीमती पत्थर या तो किसी बादशाह के खजाने का हिस्सा हो सकता है या फिर नवाब हाशिम के तिलिस्मी महल का। डर ने उनके दिल में घर कर लिया। उन्होंने उस नीलम को एक पुराने कपड़े में लपेटा और अपनी झोपड़ी के कच्चे फर्श को खोदकर उसे गाड़ दिया। बेटा रहीम ने सुल्तान के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा। यह दौलत नहीं आफत है। हम गरीब भले हैं मगर चोर नहीं। अगर किसी को पता चला तो हमारी खैर नहीं।

लेकिन सुल्तान नहीं रुका। यह तो बस शुरुआत थी। अगली सुबह सुल्तान फिर गायब हुआ और शाम को लौटा। इस बार उसके मुंह में सोने का एक कंगन था जिस पर प्राचीन लिपि में कुछ खुदा हुआ था। तीसरे दिन वो एक छोटी थैली लाया जिसमें खुशबूदार अंबर भरा था। रहीम अब दहशत में थे। उनका झोपड़ा जो कभी खाली और वीरान था। अब जमीन के नीचे दबे हुए एक छोटे से खजाने का रक्षक बन गया था। वो सोना और जवाहरात रहीम के लिए आग के अंगारों जैसे थे। वो उन्हें छूने से भी डरते थे। वो सुल्तान को रोकने की कोशिश करते, उसे समझाते, कभी-कभी डांटते भी। मत जाओ सुल्तान। यह हराम की कमाई हमें नहीं चाहिए।

लेकिन सुल्तान जैसे किसी मिशन पर था। उसे रहीम की गरीबी और फाकाकशी बर्दाश्त नहीं थी। वो उस बूढ़े इंसान को वह सब देना चाहता था जिससे दुनिया ने उसे महरूम रखा था।

उधर शीश जुल्म महल में नवाब हाशिम अपने खास कक्ष में बैठा था। उसके सामने एक बड़ा सा जादुई कटोरा रखा था जिसमें पानी भरा था। हाशिम उस पानी में अक्स देख रहा था। उसके माथे पर पसीने की बूंदे थी और आंखों में गुस्सा। नामुमकिन हाशिम गुर्राया। मेरा खजाना गार सुलेमानी का वो हिस्सा जहां तक जिन्नात भी नहीं जा सकते। वहां से कोई चीजें चुरा रहा है।

हाशिम ने अपने सबसे वफादार और क्रूर सिपाह सालार बिलाल हबशी को बुलाया। बिलाल एक विशालकाय आदमी था जिसकी एक आंख नहीं थी और हाथ में हमेशा एक भारी लोहे का गुर्जर रहता था। बिलाल हाशिम ने कड़कती आवाज में कहा रेगिस्तान की खाक छान मारो। कोई है कोई है जो उस पुरानी वर्जित गुफा तक पहुंच रहा है। मुझे वो चोर चाहिए और वो चाहिए जो उस चोर की मदद कर रहा है। जो भी हो उसे मेरे कदमों में जिंदा लाओ। बिलाल ने सिर झुकाया और महल से निकल पड़ा।

वादी सर्राब में अब रहीम का बदलाव छिप ना सका। हालांकि रहीम ने दौलत खर्च नहीं की थी लेकिन उनके चेहरे पर एक अजीब सा खौफ और सुल्तान की सेहतमंद काया ने लोगों को शक में डाल दिया था। एक दिन बाजार में जब रहीम थोड़ा सा अनाज उधार मांगने गए तो एक दुकानदार ने ताना मारा। अरे रहीम बाबा सुना है तुम्हारे घर में जिन्नात का साया है? तुम्हारा वो भेड़िया रात को चमकते पत्थरों के साथ देखा गया है। रहीम का रंग सफेद पड़ गया। वो बिना कुछ लिए उल्टे पांव घर लौट आए।

उस रात रहीम ने तय कर लिया। अब और नहीं। उन्होंने सुल्तान से कहा जो कोने में बैठा अपने पंजों को साफ कर रहा था। कल हम यह जगह छोड़ देंगे। हम कहीं दूर चले जाएंगे जहां यह श्रापित सोना और नवाब का साया हम तक ना पहुंच सके। रहीम ने अपनी पोटली बांधी। वो निकलने ही वाले थे कि अचानक बाहर घोड़ों की टापों की आवाज गूंजी। मशालों की रोशनी से उनका अंधेरा झोपड़ा जगमगा उठा। दरवाजा खोलो। ए बूढ़े जादूगर। बिलाल हबशी की भारी आवाज ने रात की खामोशी को चीर दिया।

रहीम का दिल जोर से धड़कने लगा। उन्होंने सुल्तान की तरफ देखा। सुल्तान अब वो मासूम जानवर नहीं लग रहा था। उसके बाल खड़े हो गए थे और उसके गले से एक गहरी भयानक गुर्राहट निकल रही थी। वो रहीम के आगे ढाल बनकर खड़ा हो गया। दरवाजा एक जोरदार ठोकर से टूट कर गिर पड़ा। बिलाल हबशी और उसके चार सशस्त्र सैनिक अंदर दाखिल हुए। तो यह है वो शैतान। बिलाल ने सुल्तान को देखते ही कहा। उसकी आंखों में लालच चमक उठा। नवाब साहब खुश होंगे। एक नायाब स्याह भेड़िया जो खजानों का रास्ता जानता है।

इसे हाथ मत लगाना। बाबा रहीम जिनमें ना जाने कहां से इतनी हिम्मत आ गई थी। चिल्लाए और सुल्तान के सामने आ गए। यह कोई शैतान नहीं मेरा बच्चा है। इसे जाने दो। बिलाल हंसा। एक क्रूर हंसी। हटो बुड्ढे। उसने रहीम को धक्का दिया। रहीम जो पहले ही कमजोर थे, दीवार से जा टकराए और उनके सिर से खून बहने लगा।

यह देखते ही सुल्तान का सब्र टूट गया। वो बिजली की रफ्तार से बिलाल पर झपटा। मगर बिलाल तैयार था। उसने एक भारी जाल सुल्तान के ऊपर फेंक दिया। यह जाल मामूली रस्सियों का नहीं बल्कि धातु के तारों का बना था। जिस पर नवाब का काला जादू किया गया था। सुल्तान ने संघर्ष किया। उसने जाल को काटने की कोशिश की। मगर जितना वह हिलता जाल उतना ही कसता जाता।

रहीम जमीन पर पड़े पड़े धुंधली आंखों से यह मंजर देख रहे थे। नहीं सुल्तान। बिलाल ने जकड़े हुए सुल्तान को अपने सैनिकों को सौंपा और रहीम की तरफ बढ़ा। उसने रहीम की दाढ़ी पकड़ कर उनका चेहरा ऊपर उठाया। तुम भी हमारे साथ चलोगे बुड्ढे बिलाल ने कहा, नवाब साहब जानना चाहेंगे कि एक मामूली फकीर ने इस जंगली जानवर को पालतू कैसे बनाया? और वो खजाना कहां है जो यह रोज लाता था? सैनिकों ने रहीम की झोपड़ी को तहस-नहस कर दिया। जमीन खोदकर वह पोटली निकाल ली जिसमें नीलम और सोना था।

उस रात वादी सर्राब के लोगों ने देखा कि कैसे एक जख्मी बूढ़े और एक जंजीरों में जकड़े भेड़िए को शीश जुल्म की तरफ घसीटते हुए ले जाया जा रहा था। वो काफिला जिसमें अब उम्मीद कम और खौफ ज्यादा था।

शीश जुल्म के विशालकाय लोहे के दरवाजों के सामने आ रुका। यह दरवाजे इतने ऊंचे थे कि इंसान को अपनी हैसियत छींटी जैसी महसूस हो। दरवाजों पर पीतल की बड़ी-बड़ी कीलें जड़ी थी और उन पर अजगरों की आकृतियां उभरी हुई थी। मानो आने वाले हर शख्स को निगलने के लिए तैयार हो। जैसे ही दरवाजे एक डरावनी चरमराहट भरी आवाज के साथ खुले अंदर से सर्द हवा का एक झोंका आया। रेगिस्तान की तपती गर्मी के बीच यह ठंडक राहत देने वाली नहीं बल्कि हड्डियों में सेन पैदा करने वाली थी। यह मौत की ठंडक थी।

बिलाल हबशी ने रहीम की रस्सी को जोर से झटका दिया। चल बुड्ढे तेरी किस्मत का फैसला नवाब हाशिम खुद करेंगे। रहीम लड़खड़ाए। उनके नंगे पांव महल के काले संगमरमर के फर्श पर पड़े। वो फर्श इतना साफ और चमकदार था कि रहीम को उसमें अपना ही खून से लथपथ चेहरा और उलझी हुई दाढ़ी साफ दिखाई दे रही थी। सुल्तान को लोहे के एक पिंजरे में डाल दिया गया था। जिसे चार पहरेदार पहियों पर धकेल रहे थे। सुल्तान पिंजरे की सलाखों को अपने मजबूत जबड़ों से जकड़े हुए था। उसकी नजरें एक पल के लिए भी बिलाल हबशी से नहीं हट रही थी।

महल के अंदर का नजारा किसी भी इंसान के होश उड़ाने के लिए काफी था। दीवारों पर हजारों आईने जड़े थे। हर आकार और हर किस्म के आईने। कुछ आईने इंसान को लंबा दिखाते, कुछ छोटा और कुछ उसकी शक्ल को इतना बदसूरत बना देते कि देखने वाले को खुद से घिना जाए। इसे दालान ए अक्स कहा जाता था। यहां चलने वाला शख्स कभी अकेला महसूस नहीं कर सकता था क्योंकि उसके अपने ही हजारों विकृत रूप उसे घूर रहे होते थे।

आखिरकार वे मुख्य दरबार में पहुंचे। यहां रोशनी का इंतजाम मशालों से नहीं बल्कि छत से लटके हुए अजीबोगरीब नीले पत्थरों से था जो एक मध्यम और रहस्यमई रोशनी दे रहे थे। सामने एक ऊंचे तख्त पर नवाब हाशिम बैठा था। हाशिम की उम्र का अंदाजा लगाना मुश्किल था। उसके बाल स्याह काले थे मगर चेहरे की रंगत बिल्कुल मुर्दा जैसी पीली। उसने गहरे हरे रंग का रेशमी चोगा पहन रखा था और उसकी उंगलियों में दर्जनों अंगूठियां थी। सबसे खौफनाक उसकी आंखें थी। एक आंख सामान्य थी। मगर दूसरी आंख की जगह एक सफेद पत्थर जड़ा हुआ था। जो बेजान होकर भी सब कुछ देख रहा मालूम होता था।

बिलाल ने रहीम को धकेल कर जमीन पर गिरा दिया और सुल्तान का पिंजरा तख्त के करीब खड़ा कर दिया। हुजूर-ए-आला बिलाल ने झुक कर सलाम किया। यह रहा वह फकीर और यह रहा वो शैतानी जानवर जो आपके खजाने में सेंध लगा रहा था। उसने रहीम की झोपड़ी से बरामद की हुई पोटली हाशिम के कदमों में उलट दी। नीलम सोने के सिक्के और अंबर के टुकड़े फर्श पर बिखर गए। उनकी खनक सन्नाटे में गूंज उठी।

हाशिम ने उन कीमती जवाहरातों की तरफ देखा तक नहीं। उसकी वह पत्थर वाली आंख सीधे सुल्तान पर टिकी थी। एक अजीब सी खामोशी छा गई। हाशिम धीरे से अपने तख्त से नीचे उतरा। उसके चलने की कोई आवाज नहीं थी जैसे वह हवा में तैर रहा हो। वो सुल्तान के पिंजरे के पास आया। सुल्तान ने एक भयानक दहाड़ मारी और सलाखों पर झपटा। लेकिन हाशिम जरा भी पीछे नहीं हटा। उसने अपनी छड़ी उठाई और सुल्तान के माथे के बीचोंबीच इशारा किया। हैरतंगेज। हाशिम ने फुसफुसाते हुए कहा। उसकी आवाज में रेशम जैसी नरमी और सांप जैसा जर था। बिलाल तुम बेवकूफ हो। तुमने जिसे सिर्फ एक भेड़िया समझा वो मुहाफिज अजल है।

रहीम ने कांपती आवाज में कहा सरकार यह बेजुबान जानवर है। इसने कुछ नहीं किया। जो सजा देनी है मुझे दीजिए। इसे छोड़ दीजिए। हाशिम ने मुड़कर पहली बार रहीम की तरफ देखा। उसकी नजर में हिकारत थी। खामोश रह दो टके के बुनकर। तुझे अंदाजा भी है कि तूने अपनी फटी हुई चटाई पर किसे पनाह दी थी।

हाशिम फिर से सुल्तान की तरफ मुड़ा और गौर से देखने लगा। सदियों से सदियों से मैं इस नस्ल को ढूंढ रहा हूं। कबीला ए जरीन सुनहरा कबीला के वफादार। कहानियां कहती थी कि वह सब मर चुके हैं। लेकिन यह यह जिंदा है। हाशिम ने पिंजरे के करीब जाकर सुल्तान की आंखों में झांका और एक अजीब सी भाषा में कुछ बुदबुदाया। यह शब्द सुनकर सुल्तान एकदम शांत हो गया। मगर उसकी आंखों का रंग बदलने लगा। सुनहरी से गहरा लाल फिर वापस सुनहरी।

देखा बिलाल हाशिम हंसा एक सूखी और क्रूर हंसी। यह जानवर उस छिपे हुए शहर शहर मदफून का रास्ता जानता है। वो शहर जो रेगिस्तान की रेत के नीचे कहीं खो गया है। जहां हजरत सुलेमान के वक्त की किताब-ए हिकमत और बेशुमार दौलत छिपी है। वो नीलम और सोना जो यह लाया था वो उसी शहर की मिट्टी है। रहीम को कुछ समझ नहीं आ रहा था। शहर मदफून कबीला जरीन वह तो बस इतना जानते थे कि सुल्तान उनका बेटा है।

मुझे वह शहर चाहिए। हाशिम ने अचानक चिल्लाकर कहा। उसकी आवाज से दरबार के आईने थरथरा उठे और यह जानवर मुझे वहां ले जाएगा। उसने बिलाल को हुक्म दिया। इस बूढ़े को काल कोठरी फरामोशी में डाल दो। और इस भेड़िए को शीश महल के तहखाने में ले जाओ। मैं इसके दिमाग को तोडूंगा। जब तक यह मेरे इशारों पर नाचने वाला गुलाम नहीं बन जाता। इसे सोने मत देना, खाने मत देना।

नहीं, रहीम चीख पड़े। वो घिसटते हुए हाशिम के पैरों की तरफ बढ़े। आप ऐसा नहीं कर सकते। वो मर जाएगा। खुदा के लिए रहम खाइए। बिलाल ने बेरहमी से रहीम को ठोकर मारी। दो सैनिकों ने रहीम को बाजुओं से पकड़ा और घसीटते हुए दरबार से बाहर ले जाने लगे। रहीम ने मुड़कर देखा। सुल्तान पिंजरे की सलाखों को अपने दांतों से काट रहा था। उसकी आंखों से बेबसी और गुस्सा बह रहा था। वो रहीम को जाते हुए देख रहा था और पहली बार उसने एक ऐसी आवाज निकाली जो दहाड़ नहीं बल्कि एक करुण पुकार थी जैसे कोई बच्चा अपने पिता से बिछड़ते वक्त रोता है।

सुल्तान रहीम की आवाज गलियारों में गूंजती रही और फिर एक भारी लोहे का दरवाजा बंद होने के साथ सब कुछ अंधेरे में डूब गया।

रहीम को जिस काल कोठरी में फेंका गया वो जमीन के भी नीचे थी। यहां की दीवारों से पानी रिस रहा था और हवा में सड़न की बदबू थी। यहां रोशनी की एक किरण भी नहीं पहुंच सकती थी। रहीम जमीन पर गिर पड़े। उनका शरीर दर्द से टूट रहा था मगर दिल का दर्द उससे कहीं ज्यादा गहरा था। या अल्लाह मेरे बच्चे की हिफाजत करना। उन्होंने अंधेरे में सिसकते हुए दुआ मांगी।

तभी अंधेरे के कोने से एक कमजोर खड़खड़ाती हुई आवाज आई। आंसू बचा कर रखो। ए अजनबी यहां पानी बहुत कीमती है और रोने से प्यास जल्दी लगती है। रहीम चौंक गए। कहा कौन है वहां? अंधेरे में दो चमकती हुई आंखें दिखाई दी। माचिस की एक तीली जली और पल भर की रोशनी में रहीम ने देखा कि कोने में एक हड्डियों का ढांचा जैसा इंसान बैठा है। उसके बाल और दाढ़ी जमीन को छू रहे थे और उसके कपड़ों की जगह सिर्फ चिथड़े बचे थे।

मेरा नाम हकीम जुबैर है। उस कैदी ने कहा मैं कभी इस रियासत का शाही इतिहासकार था और तुम तुम वो हो जो उस स्याह मुहाफिज को साथ लाए हो। है ना? रहीम हैरान रह गए। आप आप सुल्तान के बारे में जानते हैं।

हकीम जुबैर ने एक सूखी हंसी-हंसी जो खांसी में बदल गई। जानता हूं मैंने अपनी पूरी जिंदगी उन किमदंतियों को पढ़ने में गुजार दी जिनके पीछे हाशिम पागल है। करीब आओ मेरे पास वक्त कम है। रहीम घिसट कर उस बूढ़े हकीम के पास गए। सुनो जुबैर ने धीमी आवाज में कहा जैसे दीवारों के भी कान हो। वो जानवर सिर्फ एक भेड़िया नहीं है। बहुत पहले जब इंसानों और जिन्नात के बीच समझौता हुआ था तो एक कबीला था। जरीन उन्हें रेगिस्तान के सबसे गहरे राजों की हिफाजत सौंपी गई थी। जब दुश्मनों ने उन पर हमला किया तो उनके जादूगरों ने अपनी रूहों को भेड़ियों के जिस्म में मुंतकिल कर दिया ताकि वह हमेशा अपने खजाने और इल्म की रक्षा कर सकें।

सकें। तुम्हारा सुल्तान उस कबीले का आखिरी शहजादा हो सकता है।

रहीम का सिर चकरा गया। शहजादा रूह, लेकिन वो तो वो तो मेरे हाथ से रोटी खाता है। मेरे पैरों में सोता है। मोहब्बत किसी भी जादू से बड़ी ताकत है मेरे दोस्त।

जुबैर ने रहीम के हाथ पर अपना ठंडा हाथ रखा। हाशिम उसे तोड़ना चाहता है। वो आईना-ए ततखीर का इस्तेमाल करेगा। अगर उसने सुल्तान की रूह को काबू कर लिया तो वह उस शहर के दरवाजे खोल देगा और फिर कयामत आएगी। हाशिम को सिर्फ सोना नहीं चाहिए। उसे आबे हयात चाहिए जो शहर मदफून में बहता है।

मैं क्या कर सकता हूं? रहीम रो पड़े। मैं एक मामूली बूढ़ा हूं।

तुम मामूली नहीं हो। जुबैर की आंखों में एक अजीब चमक थी। सुल्तान ने तुम्हें चुना। हजारों सालों में उसने किसी इंसान पर भरोसा नहीं किया सिवाय तुम्हारे। तुम्हारे अंदर कुछ है। शायद तुम्हारी सादगी, तुम्हारी बेगर्ज नेकी जो उस जानवर की रूह को छू गई। तुम्हें उसे बचाना होगा।

लेकिन कैसे? हम यहां कैद हैं?

हकीम जुबैर ने अपनी फटी हुई आस्तीन के अंदर से एक जंग लगी हुई अजीब आकार की धातु की चाबी निकाली। मैंने 10 साल, 10 साल लगाए हैं इस ताले का सांचा बनाने में। अपनी रोटियों से बचाए हुए आटे और पानी से। मैं तो अब चल नहीं सकता। मेरे पैर बेकार हो चुके हैं। लेकिन तुम, तुम जा सकते हो। उसने वो चाबी रहीम की हथेली पर रख दी। महल के नीचे एक पुरानी सुरंग है जो गंदे पानी के निकास के लिए थी। अब बंद पड़ी है। वो सीधा शीश महल के तहखाने में निकलती है जहां सुल्तान कैद है। जाओ, इससे पहले कि हाशिम उसकी याददाश्त मिटा दे।

रहीम ने उस चाबी को मुट्ठी में भेजा। एक पल पहले तक वो मौत का इंतजार कर रहे थे। अब उनके कंधों पर एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ गई थी।

उसी वक्त ऊपर महल के तहखाने में सुल्तान एक जादुई घेरे के बीच में जकड़ा हुआ था। उसके चारों तरफ आईने रखे थे। हाशिम उसके सामने खड़ा था। हाथ में एक काला क्रिस्टल लिए।

मेरी आंखों में देखो। हाशिम ने आदेश दिया।

सुल्तान ने अपनी आंखें बंद कर ली। वो रहीम का चेहरा याद करने की कोशिश कर रहा था। वो बूढ़ा चेहरा, वो झुर्रियां, वो प्यार भरी थपकी। वही याद उसे हाशिम के काले जादू से बचा रही थी। लेकिन हाशिम का मंत्र तेज होता जा रहा था। सुल्तान के दिमाग में एक असहनीय दर्द उठा। उसे लगा जैसे उसकी यादें धुंधली हो रही हैं। रहीम का चेहरा धुएं में घुलने लगा।

हाशिम मुस्कुराया। हां, भूलो सब भूल जाओ। सिर्फ मेरे हुक्म को याद रखो।

तभी तहखाने की दीवार के पीछे एक पत्थर अपनी जगह से खिसका। अंधेरे में से बाबा रहीम की आंखें झांक रही थीं। उन्होंने वह मंजर देखा और उनका दिल दहल गया। उनका बेटा, उनका सुल्तान दर्द से तड़प रहा था।

रहीम ने अपने कांपते हाथों में हकीम की दी हुई चाबी पकड़ी और खुद से कहा, "डरना मत रहीम। आज एक बाप का इम्तिहान है।"

दीवार की दरारों से रिसती हुई ठंडी हवा और सड़न की बू के बीच रहीम का दिल किसी हथौड़े की तरह सीने में बज रहा था। वह सुरंग जिसे हकीम जुबैर ने रास्ता बताया था, असल में महज एक संकरी नाली थी जो सालों से इस्तेमाल नहीं हुई थी। उसमें कीचड़, चूहों और अंधेरे का राज था। रहीम को घुटनों के बल रेंगना पड़ा। उनके बूढ़े घुटने छिल गए थे। हथेलियों में कंकड़ चुभ रहे थे। लेकिन तहखाने से आती सुल्तान की दर्दनाक चीखों ने उन्हें रुकने नहीं दिया। हर चीख रहीम की रूह पर एक कोड़े की तरह बरसी थी।

कुछ ही पलों में रहीम एक जालीदार झरोखे के पीछे पहुंचे। यहां से वह शीश महल के तहखाने का पूरा मंजर देख सकते थे। अंदर का नजारा किसी भी डरावने ख्वाब से बदतर था। कमरे के बीचोंबीच फर्श पर काले और लाल रंग से एक सयाह सितारा बना हुआ था। सुल्तान को उसके केंद्र में जंजीरों से जकड़ा गया था। वो विशाल भेड़िया जो कभी रेगिस्तान की शान था, अब जमीन पर गिरा हुआ था। उसके मुंह से झाग निकल रहा था और उसकी सुनहरी आंखें अब पथरा गई थीं, मानो वो किसी गहरी नींद और भयानक हकीकत के बीच फंसा हो।

नवाब हाशिम उसके सामने खड़ा था। उसके हाथ में वह काला क्रिस्टल था जो अब एक मनहूस बैंगनी रोशनी से धड़क रहा था। हाशिम के चारों तरफ सात बड़े आईने रखे थे। यह आम आईने नहीं थे। इनमें सुल्तान का अक्स दिखाई दे रहा था। लेकिन वो अक्स भेड़िया नहीं बल्कि एक इंसान का था। एक धुंधला साया जो जंजीरों में तड़प रहा था।

"तेरी यादें मेरी हैं," हाशिम एक अजीब सी लड़खड़ाती आवाज में मंत्र पढ़ रहा था। "तेरा वजूद मेरा है। एक कबीला-ए-जरीन के वारिस। अपनी पुरानी वफादारी भूल जा और अपने नए आका को पहचान।"

हाशिम ने क्रिस्टल को सुल्तान की आंखों के करीब किया। सुल्तान का जिस्म अकड़ गया। उसे लगा जैसे हजारों बिच्छू उसके दिमाग में डंक मार रहे हों। उसकी यादों में रहीम का चेहरा धुंधला होने लगा। वह प्यार, वो हाथों का स्पर्श, वो रोटी का स्वाद, सब कुछ जैसे काले धुएं में विलीन हो रहा था। उसकी जगह सिर्फ हाशिम की वो एक पथरीली आंख और हुक्म की तामील करने की मजबूरी ले रही थी।

रहीम ने झरोखे से यह देखा और उनकी आंखों में आंसू आ गए। "नहीं, मेरा बच्चा मुझे भूल रहा है," उन्होंने सिसकते हुए सोचा।

लेकिन रोने का वक्त नहीं था। रहीम ने देखा कि झरोखे का ताला जंग खाया हुआ है। हकीम की दी हुई अजीबोगरीब चाबी शायद यहां काम ना आए क्योंकि यह दरवाजा अंदर से बंद नहीं था बल्कि पत्थरों की चिनाई में फंसा था। रहीम ने अपनी पूरी जान लगाकर उस लोहे की जाली को धक्का दिया। बुढ़ापे की कमजोर हड्डियों में ना जाने कहां से एक बाप की ताकत आ गई। छर्र! जंग लगी जाली एक तेज आवाज के साथ अपनी जगह से हिल गई और पत्थर के फर्श पर जा गिरी।

आवाज गूंज उठी। हाशिम का मंत्र बीच में टूट गया। वो चौंका और उसने गुस्से से मुड़कर देखा। धूल और अंधेरे के बीच से फटे हुए कपड़ों और खून से लथपथ माथे के साथ बाबा रहीम बाहर निकले। उनके हाथ खाली थे। जिस्म कांप रहा था। मगर उनकी आंखों में एक ऐसी आग थी जो हाशिम के काले जादू से भी ज्यादा तेज थी।

"उसे छोड़ दे शैतान!" रहीम की आवाज तहखाने में गूंजी। यह आवाज किसी योद्धा की नहीं एक फकीर की थी। मगर इसमें इतनी रूहानियत थी कि शीशे के आईने भी एक पल के लिए थरथरा गए।

हाशिम पहले तो हैरान हुआ। फिर उसके चेहरे पर एक क्रूर मुस्कान फैल गई। "तू वो मामूली बुनकर? तू यहां तक कैसे पहुंचा? खैर, अच्छा हुआ। अब तेरा जानवर तुझे मरते हुए देखेगा और यही उसकी आखिरी इंसानी याद होगी।"

हाशिम ने अपना हाथ हवा में उठाया। एक अदृश्य ताकत ने रहीम को हवा में उठा लिया और दूर दीवार पर दे मारा। आ! रहीम के मुंह से खून का फव्वारा छूट गया। वो जमीन पर गिरे। पसलियां टूटने का दर्द असहनीय था।

हाशिम हंसा। "देख ए जानवर, तेरा यह बाप कितना कमजोर है। इसे बचाने वाला कोई नहीं।"

सुल्तान ने अपनी धुंधली आंखों से रहीम को गिरते देखा। खून की बू... वो जानी पहचानी बू... हाशिम फिर से सुल्तान की तरफ मुड़ा। "अब देख मेरी आंखों में।"

लेकिन रहीम ने हार नहीं मानी थी। जमीन पर रेंगते हुए उनकी नजर पास ही पड़ी एक भारी मशाल पर पड़ी जो दीवार पर जल रही थी। दर्द से कराहते हुए रहीम ने एक पत्थर उठाया और पूरी ताकत से उस मशाल के स्टैंड पर दे मारा। जलती हुई मशाल सीधी नीचे गिरी। मगर फर्श पर नहीं बल्कि उन सात आईनों में से सबसे बड़े आईने पर जो ठीक सुल्तान के सामने रखा था।

छपाक! तेल और आग का भबका उठा। गर्म तेल आईने पर फैला और आग की लपटों ने कांच को अपनी चपेट में ले लिया। लेकिन यह साधारण कांच नहीं था। जैसे ही आग ने उस तिलिस्मी आईने को छुआ, एक भयानक चीख सुनाई दी। इंसानी नहीं बल्कि रूहानी चीख। आईना गर्मी बर्दाश्त नहीं कर सका और एक जोरदार धमाके के साथ फट गया। कड़क कांच के हजारों टुकड़े हवा में बिखर गए।

आईने के टूटते ही वो काला जादू जो सुल्तान को जकड़े हुए था, झटके से टूट गया। जैसे किसी ने भारी पर्दा हटा दिया हो। सुल्तान का दिमाग साफ हो गया। रहीम का चेहरा, उनकी वो ममता, वो सब यादें एक बांट की तरह वापस आ गई।

हाशिम चीखा क्योंकि आईने के टूटने से निकली एक जादुई लहर ने उसे पीछे धकेल दिया था। "नहीं!"

धुएं और आग के बीच सुल्तान खड़ा हुआ। अब उसकी आंखों में वो बेबसी नहीं थी। वो सयाह भेड़िया अब अपने असली रूप में था। उसका कद अचानक बढ़ गया। उसके बाल कांटों की तरह खड़े हो गए और उसके अंदर से एक ऐसी दहाड़ निकली जिसने महल की बुनियाद हिला दी।

हाशिम संभलने की कोशिश कर रहा था। लेकिन सुल्तान ने उसे मौका नहीं दिया। वो बिजली की रफ्तार से झपटा। हाशिम ने अपने बचाव के लिए हाथ आगे किया। लेकिन सुल्तान के पंजे ने उसकी बाह को चीर दिया। जादूगर दर्द से बिलबिला उठा और अपना क्रिस्टल गिरा दिया।

"सुल्तान, भागो!" रहीम ने खांसते हुए चिल्लाया।

सुल्तान हाशिम को मार सकता था। उसे खत्म कर सकता था। लेकिन उसने अपने पिता की आवाज सुनी। वो पलटा और एक ही छलांग में रहीम के पास पहुंचा। उसने अपनी मजबूत गर्दन झुका दी, इशारा करते हुए कि रहीम उस पर सवार हो जाए या उसे पकड़ ले। रहीम ने सुल्तान की गर्दन के घने बालों को कसकर पकड़ लिया।

"चलो मेरे शेर, चलो यहां से।"

सुल्तान ने दौड़ना शुरू किया। वो तहखाने के दरवाजे को तोड़ता हुआ बाहर निकला। गलियारों में अफरातफरी मच गई थी। सायरन बज रहे थे। "पकड़ो, जाने ना पाएं!" बिलाल हबशी की आवाज कहीं ऊपर से आ रही थी।

सुल्तान, जिसकी रफ्तार हवा से बातें कर रही थी, सीढ़ियां चढ़ता हुआ महल के मुख्य प्रांगण में आ गया। यहां दर्जनों सैनिक तलवारें और भाले लिए खड़े थे। "इन्हें यहीं घेर लो!" सैनिकों ने घेरा तंग कर दिया।

रहीम ने सुल्तान की पीठ पर खुद को संभाला। "हम गिर गए हैं, सुल्तान।"

सुल्तान रुका। उसने चारों तरफ देखा। सैनिकों की तलवारें चमक रही थीं। लेकिन सुल्तान की आंखों में डर नहीं बल्कि एक अजीब सी चमक थी। उसने अपने अगले पंजे जमीन पर जोर से मारे। अचानक फर्श के पत्थर हिलने लगे। सुल्तान ने एक गहरी गूंजदार आवाज निकाली। एक पुराना मंत्र जो शायद उसकी नस्ल की यादों में बसा था। जमीन से धूल का एक बवंडर उठा जिसने सैनिकों की आंखों में धूल झोंक दी।

"यही मौका है।" सुल्तान ने उस बवंडर का फायदा उठाया और महल की सबसे ऊंची दीवार-ए-फना की तरफ दौड़ा। यह दीवार सीधी खाई में खुलती थी।

"वहां नहीं, वहां खाई है!" रहीम चिल्लाए।

लेकिन सुल्तान नहीं रुका। वो दीवार की मुंडेर पर चढ़ा। नीचे हजारों फीट गहरी खाई थी। जहां घना अंधेरा और नुकीली चट्टानें थीं। पीछे सैनिकों के तीर और बिलाल हबशी का गुस्सा था। आगे मौत की खाई।

सुल्तान ने एक पल के लिए पीछे मुड़कर देखा। बिलाल हबशी अपनी गधा लेकर दौड़ता आ रहा था। "रुक जाओ। कूदोगे तो हड्डी भी नहीं मिलेगी।"

सुल्तान ने रहीम की तरफ देखा। उसकी सुनहरी आंखों में एक भरोसा था। मानो कह रहा हो, "मुझ पर यकीन करो बाबा।" और फिर उसने छलांग लगा दी। हवा रहीम के कानों में सीटी बजा रही थी। उनका पेट अंदर की तरफ खींच गया। उन्हें लगा यह अंत है। वो गिर रहे थे, गिरते जा रहे थे अंधेरे की गोद में।

लेकिन तभी कुछ अद्भुत हुआ। गिरते हुए सुल्तान के जिस्म से एक नीली रोशनी निकली। उसके पैरों के नीचे हवा ठोस हो गई। वह सीधे नीचे नहीं गिरा बल्कि हवा की लहरों पर फिसलने लगा जैसे कोई अदृश्य ढलान हो। यह उड़ना नहीं था, लेकिन यह गिरना भी नहीं था। यह कबीला-ए-जरीन का वो खोया हुआ हुनर था - हवा पैमाई। वे दोनों एक पंख की तरह लहराते हुए खाई के उस पार रेगिस्तान की नरम रेत पर जा गिरे।

धम! रेत उड़ी। रहीम लुढ़कते हुए दूर जा गिरे। सुल्तान भी हाफता हुआ जमीन पर लेट गया। वो दोनों जिंदा थे।

ऊपर गिले की दीवार पर खड़ा बिलाल हबशी और नवाब हाशिम। हाशिम का चेहरा गुस्से से लाल हो गया था। लेकिन उसकी आंखों में एक चमक भी थी। "हवा पैमाई! मैंने सही पहचाना था। यह वही है। यह शहर मदफून की कुंजी है।"

हाशिम ने बिलाल की तरफ देखा। "पूरा लश्कर तैयार करो। मेरे शिकारी कुत्ते, मेरे बाज और मेरे काले जादूगर सबको बुलाओ। वो रेगिस्तान में कहीं भी छिप जाए, मैं उन्हें ढूंढ निकालूंगा। अब खेल सिर्फ सोने का नहीं है। अब जंग आबे हयात की है।"

नीचे रेगिस्तान में रहीम ने मुश्किल से उठकर सुल्तान को गले लगा लिया। "शुक्र है मालिक का। शुक्र है।"

सुल्तान ने रहीम के आंसू छांटे। लेकिन उसने जल्दी ही रहीम की आस्तीन पकड़ी और खींचने लगा। वो कह रहा था कि रुकने का वक्त नहीं है। रहीम ने उठकर देखा। उनके सामने सेहरा-ए-बेकराराम फैला था। वह अपने घर वापस नहीं जा सकते थे। वादी-ए-सर्राब अब उनके लिए महफूज नहीं थी।

"हमें कहां जाना है, बेटे?" रहीम ने पूछा।

सुल्तान ने अपना मुंह उत्तर दिशा की तरफ किया। जहां तारों के नीचे एक धुंधला पुराना पहाड़ नजर आ रहा था। कोहे काफ की परछाइयां। वो दिशा जहां किम वदंतियों के मुताबिक मौत का सन्नाटा बसता है।

रहीम समझ गए। उनकी पुरानी जिंदगी खत्म हो चुकी थी। अब एक नया अनजान और खतरनाक सफर शुरू हुआ था। एक बूढ़ा बुनकर और एक जादुई भेड़िया पूरी सल्तनत के खिलाफ।

रात की सर्द हवा ने रहीम के फटे कपड़ों को हिला दिया। उन्होंने एक बार पीछे मुड़कर अपने वतन को देखा। फिर अपनी लाठी उठाई और सुल्तान के साथ अंधेरे रेगिस्तान में कदम बढ़ा दिए। मगर उन्हें मालूम नहीं था कि रेगिस्तान में सिर्फ हाशिम के सिपाही उनका पीछा नहीं कर रहे थे। रेत के नीचे कोई और भी जाग चुका था। सुल्तान की उस जादुई दहाड़ ने सिर्फ सैनिकों को नहीं डराया था, बल्कि जमीन के नीचे सोई हुई किसी तीसरी ताकत को भी नींद से जगा दिया था।

रेगिस्तान का सीना अचानक फटने लगा। जिस रेत पर रहीम और सुल्तान खड़े थे, वो पानी की तरह खौलने लगी। एक गहरी गूंजती हुई आवाज आई जैसे जमीन के अंदर कोई विशालकाय चक्की चल रही हो।

"यह क्या हो रहा है?" रहीम ने घबराकर सुल्तान की अयाल पकड़ ली।

अचानक रेत के बड़े-बड़े टीले अपनी जगह से खिसकने लगे और उनके बीच से विशालकाय आकृतियां उभरने लगीं। यह रेगिस्तानी आसिब थे - रेत और हवा से बने जिन्नात जो सदियों से शहर मदफून की सरहदों की हिफाजत कर रहे थे। उनकी आंखें अंगारों की तरह दहक रही थीं और उनके जिस्म आंधी की तरह लहरा रहे थे।

सुल्तान ने उन्हें देखकर हमला नहीं किया बल्कि अपना सिर झुकाकर एक अजीब सी आवाज निकाली। एक पुरानी जुबान जो शायद इन रूहानी पहरेदारों के लिए पासवर्ड थी।

मगर पीछे से नवाब हाशिम का लश्कर आ पहुंचा था। हाशिम ने जब इन रेत के राक्षसों को देखा तो वह डरा नहीं बल्कि उसकी हवस और बढ़ गई। "देखो बिलाल, यह पहरेदार साबित करते हैं कि हम खजाने के बिल्कुल करीब हैं। हमला करो! इन रेतीले भूतों को अपने काले जादू से बांध लो।"

हाशिम ने अपना बैंगनी क्रिस्टल हवा में उठाया और एक शैतानी मंत्र पढ़ा। क्रिस्टल से निकली काली किरणों ने रेत के जिन्नात को जकड़ लिया। रेगिस्तान में एक भयानक जंग छिड़ गई। एक तरफ हाशिम के काले जादूगर और सिपाही थे। दूसरी तरफ रेत के वह तूफानी राक्षस और इनके बीच में फंसे थे बाबा रहीम और सुल्तान।

"हमें निकलना होगा, बाबा।" सुल्तान की आंखों ने इशारा किया। सुल्तान ने रहीम को अपनी पीठ पर बिठाया और उस अराजकता के बीच से बिजली की तरह दौड़ा। वो सीधे उस दिशा में भागा जहां दो पहाड़ एक दूसरे से मिलते थे। दर्रा-ए-फना।

हाशिम ने उन्हें भागते देख लिया। "उसे मत जाने दो। वो चाबी है। वो कुत्ता ही दरवाजा खोलेगा।" हाशिम अपने सबसे तेज घोड़े पर सवार होकर उनके पीछे लपका। बिलाल हबशी और कुछ चुनिंदा सिपाही भी उसके साथ थे। बाकी सेना रेत के राक्षसों से उलझ कर रह गई।

रहीम और सुल्तान जब दर्रे के आखिरी छोर पर पहुंचे तो वहां रास्ता बंद था। सामने एक विशाल सपाट चट्टान खड़ी थी जिस पर हजारों साल पुरानी इबारतें खुदी हुई थीं। यह बाबे-हिकमत था। शहर मदफून का प्रवेश द्वार।

सुल्तान चट्टान के सामने रुक गया। वो हाफ रहा था। उसके पैरों से खून रिस रहा था। रहीम नीचे उतरे और उन्होंने अपनी फटी हुई चादर से सुल्तान के जख्म पोंछे। "अब हम कहां जाएंगे, बेटा? आगे रास्ता बंद है, पीछे मौत है।" रहीम ने कांपती आवाज में कहा।

तभी हाशिम वहां आ पहुंचा। उसके चेहरे पर जीत की क्रूर मुस्कान थी। "भागने का खेल खत्म हुआ, फकीर।" हाशिम घोड़े से उतरा। उसके हाथ में एक खंजर था और दूसरे हाथ में वह काला क्रिस्टल। "अब यह जानवर वो दरवाजा खोलेगा या फिर तेरी गर्दन मेरे खंजर के नीचे होगी।"

सुल्तान गुर्राया और रहीम के आगे खड़ा हो गया। हाशिम ने चट्टान की तरफ इशारा किया। "सुना है कि कबीला-ए-जरीन का खून ही इस ताले को खोल सकता है। ए जानवर, अगर तू अपने इस बूढ़े बाप को जिंदा देखना चाहता है तो अपना खून इस चट्टान पर गिरा।"

रहीम चिल्लाए। "नहीं, सुल्तान मत करना! यह दुनिया को तबाह कर देगा।"

लेकिन बिलाल हबशी ने पीछे से आकर रहीम को पकड़ लिया और उनकी गर्दन पर तलवार रख दी। "फैसला तेरा है, भेड़िए।"

सुल्तान की आंखों में आंसू आ गए। उसने एक नजर रहीम को देखा। फिर धीरे से चट्टान की तरफ बढ़ा। उसने अपना पंजा उठाया और चट्टान की धारदार नोक पर मार दिया। लाल गाढ़ा खून चट्टान की लकीरों में भरने लगा। जैसे ही खून ने पत्थर को छुआ, जमीन जोर से हिलने लगी। वो चट्टान धीरे-धीरे एक भारी आवाज के साथ दो हिस्सों में फटने लगी। एक तेज सुनहरी रोशनी अंदर से फूटी। इतनी तेज कि सबको अपनी आंखें बंद करनी पड़ी।

दरवाजा खुल चुका था। सामने जो मंजर था, उसने हाशिम की सांसे रोक दी। वहां सोने के पहाड़ नहीं थे, ना हीरे जवाहरात के ढेर। वहां एक नहर बह रही थी। दूधिया रंग के पानी की नहर जिसके किनारे हरेभरे बगीचे थे जो रेगिस्तान के बीचोंबीच नामुमकिन लग रहे थे। हवा में मस्क और गुलाब की खुशबू थी। यह आबे हयात का चश्मा था। वह पानी जो बंजर जमीन को सोना और बीमार को शिफा दे सकता था।

"पानी... हाशिम बड़बड़ाया। "सिर्फ पानी? मेरा सोना कहां है? मेरी अमृता कहां है?"

तभी पानी के बीच से एक आकृति उभरी। यह कोई इंसान नहीं बल्कि नूर से बना एक वजूद था। "निगहबान-ए-शहर।" निगहबान की आवाज तक गरज जैसी थी। "किसने बाबे-हिकमत को खटखटाया है?"

हाशिम ने आगे बढ़कर अहंकार से कहा, "मैं नवाब हाशिम, इस जमीन का मालिक। यह खजाना मेरा है। मैंने इसे फतह किया है।"

निगहबान ने रहीम की तरफ देखा जो जमीन पर गिरे हुए थे और फिर सुल्तान की तरफ। "यह दरवाजा खून से नहीं बल्कि कुर्बानी की नियत से खुलता है। इस मुहाफिज ने अपने प्यार को बचाने के लिए खून दिया और तुमने, तुमने क्या दिया, हाशिम?"

"मैंने ताकत दी। मैंने जादू दिया!" हाशिम चिल्लाया और नहर की तरफ दौड़ा। "मैं यह पानी पीकर अमर हो जाऊंगा।"

हाशिम ने जैसे ही उस पवित्र पानी में हाथ डाला, पानी उबलने लगा। "बदनियत के लिए यह पानी झर है," निगहबान ने चेतावनी दी। मगर हाशिम का लालच उसकी अक्ल पर पर्दा डाल चुका था। उसने पानी का एक चुल्लू भरकर पी लिया।

एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। हाशिम हंसा। "मैं... मैं महसूस कर रहा हूं ताकत।" लेकिन अगले ही पल उसकी हंसी एक भयानक चीख में बदल गई। उसका शरीर पत्थर का होने लगा। उसके पैर, उसका पेट, उसका सीना सब सटी पत्थर में तब्दील हो रहे थे। "नहीं! यह क्या हो रहा है? बिलाल, मेरी मदद करो!"

बिलाल हबशी और बाकी सिपाही खौफ के मारे पीछे हट गए। देखते ही देखते नवाब हाशिम, जो पूरी दुनिया का मालिक बनना चाहता था, रेगिस्तान के मुहाने पर एक पत्थर का बुत बनकर रह गया। उसकी हवस ने उसे उसी चीज में बदल दिया था जिसका वो सबसे ज्यादा शौकीन था - बेजान दौलत।

निगेबान अब रहीम की तरफ मुड़ा। "ए पाक दिल इंसान, तुम्हारे सब्र और इस जानवर की वफादारी ने हमें जीत लिया है। मांगो क्या मांगते हो?"

सोने के पहाड़ या दुनिया की बादशाही। रहीम ने कांपते हुए हाथ जोड़े। उन्होंने ना तो पानी की तरफ देखा ना सोने की तरफ। उन्होंने सिर्फ सुल्तान के सिर पर हाथ रखा।

"ए रूहानी बादशाह," रहीम ने भीगी आंखों से कहा। "मुझे ना सोना चाहिए ना जवानी। अगर आप कुछ देना ही चाहते हैं तो मेरे इस बेटे सुल्तान को वह जिंदगी दे दीजिए जिसका यह हकदार है। इसे इस श्राप से आजाद कर दीजिए और मेरे वतन वादी-ए-सर्राब की प्यास बुझा दीजिए। मेरे लोग बूंदबूंद को तरसते हैं।"

निगेबान मुस्कुराया। एक ऐसी मुस्कान जिससे पूरी गुफा रोशन हो गई। "तुमने अपने लिए कुछ नहीं मांगा। यही वो दौलत है जो सदियों से यहां महफूज़ थी।"

कनात! निगहबान ने हाथ उठाया। वो नहर जो गुफा में बह रही थी, उसका रुख मुड़ गया। पानी तेज रफ्तार से चट्टानों को चीरता हुआ बाहर रेगिस्तान की तरफ बह निकला। "जाओ रहीम, जब तुम अपने गांव पहुंचोगे तो वहां रेत नहीं, हरियाली तुम्हारा स्वागत करेगी।"

"और रही बात तुम्हारे साथी की," निगेबान ने सुल्तान की तरफ एक रोशनी फेंकी। सुल्तान का भेड़िया रूप पिघलने लगा। लेकिन वो इंसान नहीं बना। उसके जिस्म पर एक नूरानी कवच आ गया और उसके पंख निकल आए। वो अब सिर्फ एक भेड़िया नहीं बल्कि सेहरा का फरिश्ता बन गया था। उसे इंसान बनने की जरूरत नहीं थी क्योंकि उसकी रूह इंसानों से कहीं ज्यादा पाक थी। "यह हमेशा तुम्हारे साथ रहेगा, परछाई बनकर।" निगेबान ने कहा और फिर वो रोशनी, वो शहर और वह दरवाजा धीरे-धीरे रेत में विलीन हो गए।

जब बाबा रहीम और सुल्तान वापस वादी-ए-सर्रा पहुंचे तो वह अपनी आंखों पर यकीन नहीं कर पाए। वह सूखी बंजर बस्ती अब एक जन्नत बन चुकी थी। हर तरफ नहरें बह रही थीं। खजूर के पेड़ फलों से लदे थे और खेतों में सोना नहीं बल्कि अनाज उग रहा था। हाशिम का जुल्म उसके पत्थर बनने के साथ ही खत्म हो गया था। लोग अब रहीम को बाबा नहीं बल्कि वली छछड़ ढम कहते थे।

लेकिन रहीम ने महल में रहना कबूल नहीं किया। वह अपनी उसी पुरानी कुटिया में रहे सुल्तान के साथ। हर शाम जब सूरज ढलता तो लोग देखते कि एक बूढ़ा आदमी अपनी झोपड़ी के बाहर बैठा तस्बीह पढ़ रहा है और उसके पैरों के पास एक विशालकाय चमकदार भेड़िया बैठा है जिसकी आंखें आज भी रेगिस्तान की हिफाजत कर रही हैं।

रहीम ने दुनिया को सिखा दिया कि सबसे बड़ा जादू काला इल्म नहीं बल्कि वो सफेद नियत है जो एक जानवर को भी बेटा और एक फकीर को भी बादशाह बना देती। हेड बनाकर भी रूह का भिखारी रखता है और उसका अंजाम सिवाय तबाही के कुछ नहीं होता। वहीं सब्र, नेकी और निस्वार्थ मोहब्बत वह दौलत है जो वीराने को भी गुलशन में बदल देती है और इंसान को फकीरी में भी बादशाही का सुकून बख्शती है।