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अभी कुछ ही समय पहले एक विद्यार्थी हमारे पास आते हैं और उन्होंने हमारा ध्यान एक विषय की तरफ आकर्षित कराया। उन्होंने कहा कि, "मैं अपनी कक्षा का, अपने विद्यालय का सबसे बेहतर विद्यार्थी होता था, लेकिन जैसे-जैसे मेरी आयु बढ़ी, मैं 11वीं कक्षा में और विशेष रूप से 12वीं कक्षा में जब आया, तो मेरे अंदर अश्लील विचार बहुत अधिक बढ़ गए।"
कई बार होता ऐसे था कि मैं पढ़ने के लिए बैठता तो गलत प्रकार के विचार की कहीं ना कहीं स्फर आने शुरू हो जाती। मैं उन्हें रोकने की कोशिश करता, लेकिन उसमें एक द्वंद बन जाता, एक टकराव बन जाता और मैं विचलित हो जाता, जिसकी वजह से मेरी पढ़ाई की गुणवत्ता कम हो जाती।
फिर कई बार होता ऐसे कि मेरी पूर्व की कुछ स्मृतियां, कुछ गलत चित्र आदि मैंने देखे हुए थे, गलत फिल्में मैंने देखी हुई थी या गलत क्रियाएं की हुई थी, वो मुझे याद आनी शुरू हो जाती। शुरुआत में तो मुझे थोड़ी सी परेशानी होती, लेकिन देखते ही देखते मैं उसमें सुख लेना शुरू कर देता और मैं उसके साथ जुड़ जाता। वह विचार फिर धीरे-धीरे अत्यधिक बढ़ने शुरू हो जाते और मेरा ध्यान पढ़ाई से बिल्कुल हट जाता, मेरा समय नष्ट होता।
फिर होते होते काम का वेग इतना तीव्र हो जाता कि मेरे सामर्थ्य से बाहर हो जाता। फिर अक्सर यह होता कि मैं गलत चीजें, गलत चित्र, गलत फिल्में इत्यादि देखना शुरू कर देता और पता ही ना चलता कि उसे देखते देखते घंटों का समय मेरा कब नष्ट हो जाता। कई बार होता यह कि गलत प्रकार की क्रियाएं, हस्तमैथुन आदि करने पर भी मैं विवश हो जाता और मैं गलत तरीके की क्रियाएं भी करना शुरू कर देता।
बात यहीं पर समाप्त नहीं होती थी, उसने मुझे कहा। फिर मुझे करने के बाद बड़ी गलानी होती, बड़ा रिग्रेट होता और मुझे यह भी लगता कि आज मैंने सुबह निर्धारित किया था कि मैं इतने प्रश्न पढ़ूंगा, इतना कुछ मैं याद करूंगा और मैंने इतना सारा अपना समय नष्ट कर दिया। मैंने गलत क्रिया की, मैंने अपने शरीर की हानि की। मैं पूरी तरह से गिल्ट में चला जाता और उसकी वजह से देखते ही देखते मेरा पूरा दिन नष्ट हो जाता और ऐसा ही चक्र फिर एक हफ्ते बाद, तीन-चार-पांच दिन बाद फिर से बन जाता, जिसकी वजह से मेरी गुणवत्ता पढ़ाई से बिल्कुल समाप्त हो गई और मेरी स्मृति के ऊपर, मेरी आंखों के ऊपर भी उसका प्रभाव पड़ा और मैं जहां एक बहुत बेहतर विद्यार्थी होता था, अब मैं एक सामान्य विद्यार्थी बनकर रह गया हूं।
यह समस्या छोटी नहीं है, क्योंकि यह जो युवा अवस्था है, इसमें एक ऊर्जा होती है जिस पर काबू करना सहज नहीं होता है। और यह जो ऊर्जा है, यह काम रूपी विचारों के स्तर पर ही सबसे अधिक रहती है। यहीं पर यह सबसे अधिक व्यक्ति को परेशान करती है।
साथ ही आप यह भी समझ लें कि कोई दूसरे प्रकार का विचार होता है, कोई आप बैठे हैं, पढ़ रहे हैं, पास्ट की कोई घटना है, आपको याद आ गई, आप तुरंत वहां से मन को हटा कर के पढ़ाई में लगा सकते हैं। लेकिन यह जो काम रूपी विचार होते हैं, यह आपकी वृत्ति, आपके स्टेट ऑफ माइंड को चेंज कर देते हैं। जहां आपकी पढ़ने की वृत्ति बनी हुई थी, वहां आपकी वृत्ति बिल्कुल बदल जाती है और आप कोशिश करके भी पढ़ाई में फिर पूरा दिन वो गुणवत्ता नहीं ला पाते हैं।
यही बात उस हमारे बंधु ने भी हमें कही। हमने उन्हें कुछ सुझाव दिए, वह हम आपके साथ भी सांझा करते हैं अपनी इस बात को कि किस तरीके से हम अपने इन विचारों को रोक सकते हैं। मैं इस विषय को कुछ अलग-अलग भागों में बाटूंगी। हमारी बात है, उसे मैं एक दृष्टांत से कहता हूं।
एक बार एक गुरु होते हैं और उनके एक शिष्य होते हैं। जो शिष्य हैं, वह बड़े ही पढ़ने में बेहतर और बड़े ही मेधावी थे। वह गुरुकुल के सबसे बेहतर विद्यार्थी थे।
वह गुरु और उनके वो मेधावी जो शिष्य हैं, साथ-साथ चले आगे जा रहे होते हैं। वो एक जंगल से होकर के आगे जा रहे थे। अचानक से मौसम बिगड़ता है, बारिश-तूफान आना शुरू हो जाता है। उन्हें एक आगे नदी पार करनी थी। वो नदी के किनारे पर जाते हैं तो सामने देखते हैं कि एक नवयुवती, एक लड़की वहां पर खड़ी हुई थी और वह कहती है कि, "मैं इस नदी को पार मुझे करना है और मैं अगर पार नहीं करती हूं तो इधर तो बड़ा संकट है, उधर तो हमारे घर हैं, व्यवस्था है, लेकिन यहां तो मुझे वन्य जीव नहीं छोड़ेंगे।" तो उसे पार करना था उस नदी को।
और जो शिष्य था, जो विद्यार्थी था, वह आयु में कम था और शरीर में दुबला-पतला था, तो उसका उतना सामर्थ्य नहीं था कि वह उस लड़की को अपने कंधे पर उठा कर के नदी पार करा दे। तो गुरु ने उस लड़की को कंधे पर उठाया और नदी को पार करवा दिया। दूसरे पार ले जाकर के छोड़ा। लड़की ने गुरु के चरण स्पर्श किए और वो वहां से चली गई।
अब विद्यार्थी के मन में उस लड़की के प्रति काम जनित विचार आ जाते हैं और बहुत तीव्र विचार आ जाते हैं। वह गुरुकुल आ जाता है और वह उन्हीं विचारों में डूबा रहता है। उसकी पढ़ाई में उसका जो स्तर था, वह गिरता चला जाता है। उसका पढ़ाई में ध्यान नहीं लगता है। उसकी स्मृति बेहतर नहीं रहती है।
जब गुरु देखते हैं कि स्थिति इसकी ठीक नहीं है, तो एक दिन उसे बुलाते हैं और पूछते हैं कि, "बात क्या है? क्यों तुम पहले जिस प्रकार से थे, जैसे मेधावी थे, सबसे उत्तम थे, अब ऐसी स्थिति क्यों नहीं है?" जब गुरु आज्ञा करते हैं, तो वह सकुचाता हुआ बताता है कि, "मेरे मन में उस लड़की के प्रति काम जनित विचार आ गए हैं और मुझे ऐसा लग रहा है कि अगर उस नदी के किनारे मैं उस लड़की को उठाता, मैं उसे स्पर्श करता, तो मुझे कितना सुख होता!"
गुरु उसकी स्थिति को समझते हैं और कहते हैं कि, "बेटा, मैं तो उस लड़की को उस किनारे पर ही छोड़ कर के आ गया था, लेकिन तुम अभी तक उस लड़की को अपने कंधे पर ढो रहे हो।" बात उस विद्यार्थी को लग जाती है कि, "बात तो ठीक है, मैं अभी तक उस लड़की को कंधे पर ढो रहा हूं, हालांकि मैंने उसे नहीं उठाया, लेकिन कंधे पर गुरु नहीं, मैं ढो रहा हूं।" तब गुरु उसे कहते हैं कि, "मातृवत परदारेषु, परद्रव्येषु लोष्टवत, आत्मवत सर्वभूतेषु, यः पश्यति सः पंडितः।" कि पढ़ लेना कुछ पुस्तकों को यह विद्वता नहीं है। विद्वता है कि दूसरे की स्त्री को मातृवत परदारेषु यानी कि दूसरे की स्त्री को माता के समान जो व्यक्ति देखता है, वही पंडित है, वही समझदार है, वही विद्वान है।
जब तक विवाह ना हो, तब तक प्रत्येक स्त्री के प्रति अगर माता और बहन की दृष्टि व्यक्ति रखे, तो उसके इन काम जनित विचारों पर पूरा अंकुश लग जाएगा। क्योंकि फिर यह भी नहीं होगा कि इस स्त्री को तो मैं मातृवत देखता हूं, उसको नहीं देखता जो मैंने पहले मेरे दिमाग में बैठी हुई है, उसको तो मैं भोग दृष्टि से देखता हूं। ऐसा आप कर ही नहीं पाएंगे। अगर आप एक स्त्री को ऐसे देखते हैं, तो समस्त स्त्रियों के प्रति ये भाव बनेगा आपका। यह कैसे होगा? यह अभ्यास से होगा। जैसे ही मन आपको भटकाए, तुरंत इस बात को याद करें कि जब तक विवाह ना हो, मातृवत, बहन के समान अगर समान आयु की है, मातृवत यदि आयु में अधिक है। इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा। अपने प्रति कठोर होना पड़ेगा। इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है।
यही बात गुरु उस शिष्य से कहते हैं। शिष्य की बात समझ में आती है और वह अपने विचारों पर ध्यान देना शुरू करता है। देखते ही देखते पुनः उसके दिमाग से सारी चीजें निकलती हैं और वह पुनः मेधावी छात्र हो जाता है। तो यह दृष्टि में बदलाव करना होगा, पहली बात।
दूसरी बात यहां पर समझें कि जो आपके मनोरंजन के साधन हैं, उनको बदलो। जैसे कि आप कोई भी ऐसी नई फिल्में देखते हैं, कोई भी ऐसी अंग्रेजी फिल्में देखते हैं या कोई भी ऐसी चीजें आप देखते हैं जहां पर गलत प्रकार के शब्दों का, अश्लील बातों का और गलत प्रकार के चित्र आपके सामने आ रहे हैं, वह मनोरंजन आपको फंसा लेगा, भटका देगा। क्योंकि पता नहीं चलता है कि किस एक चित्र और किस एक विचार का आलंबन लेकर के पूर्ववत विचार आपके विकसित होकर के आपको दबा लेंगे, पता नहीं चलेगा। तो आप अपने मनोरंजन के साधन को बदलो और सुसंग में आ जाओ।
गलत प्रकार के मित्र हैं, आज छोड़ो, आज उनके नंबर ब्लॉक करो। आप कहेंगे कि, "ऐसा तो नहीं होता है।" ऐसा नहीं होता है तो परिवर्तन भी नहीं होता है, सीधी सी बात है। कठोर निर्णयों के बिना जीवन में प्रगति हो ही नहीं सकती है। अपने प्रति कठोर बनना पड़ता है आपको।
आपको मनोरंजन ही करना है, आप रामायण देखें, आप महाभारत धारावाहिक बना हुआ है, वह देखें, उपनिषद गंगा बहुत ही अद्भुत है, वह देखें। धार्मिक से हट के अगर आप हमसे कहेंगे तो मालगुडी डेज के नाम से एक बड़ा अच्छा आता है, तहरीर के नाम से एक बहुत अच्छे सीरियल्स आपको YouTube आदि पर प्राप्त हो जाएंगे। ये हमने भी देखे और हमें भी बड़े प्रिय लगते हैं। तो ऐसी चीजें देखी जा सकती हैं। कुछ ऐसी फिल्में भी होती हैं, पुरानी फिल्में हैं जिनमें एक शिक्षा है, आप वो चीजें देखें जो कि आपके मन पर एक सकारात्मक प्रभाव ही लेकर के आएंगी। कुछ गलत नहीं होगा उनमें। संबंध दिखाए जाते थे, उनमें आपसी प्रेम दिखाया जाता था, उसमें मर्यादा दिखाई जाती थी, मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं होता था। तो मनोरंजन भी ऐसे स्थान से करें जो कि आपको नुकसान ना पहुंचाए, दूसरी बात।
तीसरे स्थान पर आप समझें कि आपको कुछ यौगिक अभ्यास आपके लिए सहायक हो सकते हैं। क्या अभ्यास होंगे?
सबसे पहली बात, जैसे ही आपको पढ़ते काम के वेग सताने लगते हैं, तो आप सीधे बैठ जाएं और आपको गहरी सांस नासिका से लेनी है और मुंह से छोड़नी है। फिर नासिका से लेनी है और मुंह से छोड़नी है। इसे बिल्कुल धीमा कर दें और इस तरीके से यह श्वसन करें। इससे आप तुरंत रिलैक्स करेंगे, अच्छा अनुभव करेंगे, पहली बात।
दूसरी बात, अपनी सांसों पर ध्यान लगाना। इसे मैं ध्यान नहीं कहता हूं, इसे कहता हूं धारणा। कहीं पर भी मन को लगा देना, अटका देना। जैसे एक बच्चा होता है, वह इधर-उधर भाग रहा है, तोड़फोड़ कर रहा है, तो माता उसे एक खिलौना दे देती है, अब वह उसके साथ ही खेलता रहेगा, उसे वह चीज मिल गई। इसी तरीके से मन को अगर किसी एक वस्तु के साथ बांध दें तो वह रुकता है। तो सांसों के साथ आती-जाती सांस को देख ध्यान लगाएं। किस तरीके से सांस नासिका के माध्यम से प्रवेश करती हुई अंदर जा रही है, किस तरीके से बाहर आ रही है, उसकी तरफ ध्यान लगाना और उसको ही निरंतर देखना। इस विधि से भी आपका मन तुरंत ठहरने लगेगा, रुकने लगेगा। यह दूसरा अभ्यास है। पहले आपको पहला करना है, वह जो हमने श्वसन बताया। दूसरे में सामान्य श्वसन, गहरा श्वसन, पूरा गहरा और उस पर ही ध्यान लगाना, उस पर ही मन को टिकाना, दूसरा हुआ।
तीसरा अभ्यास एक और यह है जो यौगिक साधनाओं में कहा गया है कि सांस को पूरा अंदर भरें। सांस को अंदर भर के अंदर ही आप रोक लें और अंदर सांस को रोक के अपनी नासिका के अग्र भाग पर दृष्टि बनाएं और लगाए रखें, देखते रहें, देखते रहें, देखते रहें। इस तरीके की स्थिति में जब तक आप सांस को अंदर रोके रख सकें, उतनी देर तक नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि बनी रहे। उसके बाद आंखें बंद और सांस पूरा बाहर आप छोड़ दें। एक विधि आपकी यह है जो कि प्रमाणित है कि इससे मन रुकता है, कुंभक। और जब नासिकाग्र दृष्टि का एक साथ अभ्यास करते हैं तो बड़ा अच्छा लाभ मिलता है। ध्यान यह रखना है कि जो सांस को अंदर लेकर के हो किया, वह लंबा होना चाहिए, जितना लंबा उसे कर सकें, उतना लंबा उसे रखना है।
बस इतना आप करते हैं, यह कुछ कठोर निर्णय लेते हैं, मनोरंजन के अपने स्तर को सुधारते हैं और सुसंग को सुधारते हैं, गलत मित्रों को छोड़ते हैं, जो हमने चीजें कहीं उन पर ध्यान देते हैं, तो आपको निश्चित रूप से जो पढ़ते हुए गलत विचार आते हैं, वह समाप्त होंगे और आपकी एकाग्रता अत्यधिक बढ़ेगी, आपकी स्मृति भी बढ़ेगी और आपको बड़े अच्छे लाभ देखने को मिलेंगे।
अपेक्षा है कि यह विषय आपको समझ आया होगा और इससे आप लाभ भी निश्चित रूप से लेंगे। तो आज के लिए आपके लिए यही मार्गदर्शन था। भविष्य में अन्य महत्त्वपूर्ण विषयों पर मार्गदर्शन होता रहेगा। सभी के लिए प्रार्थना, सभी के लिए मंगल कामना। आज के लिए इतना ही। ओम नमः शिवाय।