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Shahzadi Or Gareeb Lakadhare Ka Anokha Qissa || Moral Stories in Urdu || Hindi Moral Stories

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प्यारे दोस्तों, आज की जो कहानी है बहुत ही खूबसूरत है। मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि इससे अच्छी और खूबसूरत कहानी आपने कभी नहीं सुनी होगी। मुल्क ए फारस के बादशाह ने अपनी चांद जैसी खूबसूरत शहजादी बेटी की शादी एक गरीब लकड़हारे के साथ क्यों करा दी? आखिर शहजादी ने ऐसा कौन सा गुनाह किया था जिसकी उसे इतनी बड़ी सजा मिली? फिर शादी के बाद शहजादी जुलेखा को एक खतरनाक जिन्न उठाकर ले गया। फिर उस जिन्न ने शहजादी के साथ जो किया जिसे सुनकर आप यकीनन हैरान रह जाएंगे। तो दोस्तों कहानी बहुत ही मजेदार और सबक सिखाने वाली है। तो आपसे गुजारिश है कि कहानी को आखिर तक जरूर सुनिए। तभी आपको पूरी कहानी समझ में आएगी।

प्यारे दोस्तों पुराने जमाने में मुल्क फॉरेस्ट एक बहुत बड़ा और खूबसूरत मुल्क था। इस पर शाही बादशाह की हुकूमत थी जो इंतहाई रहम दिल और लोगों के बारे में भलाई सोचने वाला बादशाह था। बादशाह की अपने मुल्क के गरीब लोगों से मोहब्बत और गरीबों से हमदर्दी के चर्चे दूर-दूर तक मशहूर थे। बादशाह की एक ही बेटी थी जिसका नाम शहजादी जुलेखा था। बाप की तरह बेटी भी गरीबों की खैर ख्वाह और नेक दिल थी और लोगों के मसाइल हल करने में बढ़-चढ़कर दिलचस्पी लेती थी। इसीलिए लोगों के दिलों में शहजादी के लिए बहुत ही इज्जत थी। शहजादी जुलेखा ने कई यतीम खाने बनवाए और यतीम बच्चों के पढ़ने के लिए स्कूल भी बनवाया और एक बहुत बड़ा हॉस्पिटल भी जहां लोगों का मुफ्त इलाज होता और लोग उसे दुआएं देते थे।

शहजादी जुलेखा नेक सीरत होने के अलावा इंतहाई खूबसूरत भी थी। यही वजह थी कि दूरदूर के कई शहजादे उससे शादी के ख्वाहिशमंद थे। लेकिन शहजादी को आज तक कोई रिश्ता पसंद ना आया। शहजादी जुलेखा सिर्फ जाहरी शक्लो सूरत चमकदमक और रोब दबदबे से मुतासिर होने वाली नहीं थी बल्कि उसने अपने नौकरों के जरिए तमाम उम्मीदवार शहजादों का खुफिया तौर पर किरदार पता किया मगर इनमें से अक्सर शहजादे शराबन नोशी और अय्याश थे और जो शहजादे शराबनशी से दूर थे वो इस कदर पत्थर दिल और बेरहम थे कि उनके मुल्क के गरीब लोग उनका नाम लेते हुए भी थरथराते थे चुनांचे कोई शहजादा भी अपने किरदार की बदौलत शहजादी को मुतासिर ना कर सका।

शहजादी जुलेखा बाग में आहिस्ता-आहिस्ता टहल रही थी। बादशाह सलामत उससे नाराज थे क्योंकि बुढ़ापे की वजह से उनके अंदर अब इस कदर तमन्ना बाकी ना रही कि अमूर सल्तनत ठीक तरीके से अंजाम दे सके। इसलिए वो चाहते थे कि शहजादी फॉरेस्ट के किसी शहजादे से शादी करके निजाम सल्तनत उसे सौंप दें। मगर शहजादी किसी भी शहजादे को कबूल करने से मुसलसल मना कर रही थी। इसलिए बादशाह सलामत उससे सख्त नाराज रहते थे क्योंकि बादशाह सलामत चाहते थे कि वह अपनी जिंदगी में ही इस फर्ज को अंजाम दें। मगर शहजादी जुलाखा की तबीयत में एक असर जिद का भी था। शहजादी जुलेखा बहुत जिद्दी भी थी। उसने बादशाह सलामत को साफ जवाब दे दिया कि फिलहाल उसका ज़हन किसी भी शहजादे को कबूल करने के लिए तैयार नहीं। मगर दिल ही दिल में शहजादी खुद भी परेशान रहती थी क्योंकि बादशाह सलामत की सेहत काफी मुतासिर हो गई थी और वह आए दिन बीमार रहने लगे थे।

शहजादी जुलेखा बाग में टहलते हुए सोचती रही लेकिन फैसले का कोई भी हल उसके ज़हन में ना आया। इस तरह टहलते टहलते ना जाने उसे कितनी देर गुजर गई कि अचानक उसके कानों में उसकी सहेली वजीरजादी हमीदा बेगम की आवाज पड़ी। शहजादी हुजूर तो ना जाने किन सोचों में गुम है। वजीरजादी हमीदा बेगम ने करीब आते हुए बड़ी बेतल्लुफी से कहा क्योंकि यह दोनों हम उम्र थी। यानी शहजादी जुलेखा और वजीरजादी हमीदा बेगम एक ही उम्र की थी। महल में भी दोनों ने इकट्ठे ही परवरिश पाई थी। इसलिए दोनों के दरमियान हद दर्जा बेतक्लुफी थी।

शहजादी जुलेखा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। हर कोई सोचता रहता है इसलिए जाहिर है हम भी कुछ ना कुछ सोच ही रहे थे। फकीरजादी हमीदा बेगम ने कहा वही तो हम जानना चाहते हैं कि आखिर आपकी सोचों का महावर कौन है। आखिर वो कौन सा खुशनसीब है जिसके ख्यालों में आप इस कदर मशरूफ हैं। शहजादी जुलेखा ने शोक नजरों से उसकी तरफ देखते हुए कहा क्या तुम वाकई जानना चाहती हो कि हम किसके बारे में सोच रहे थे। फजीरजादी हमीदा बेगम ने गहरी दिलचस्पी लेते हुए कहा हां यकीनन और मुझे इसका बेहद इश्तियाक है। शहजादी जुलेखा ने कहा तो सुनो हम अब्बा हुजूर के बारे में सोच रहे थे।

शहजादी जुलेखा ने यह बात कही तो एक लम्हे के लिए वजीरजादी हमीदा बेगम साकित और सहमी खड़ी रही जैसे वह बात को नहीं समझी हो और दूसरे ही लम्हे उसके मुंह से बेख्तियार कहे निकल गया और वो इस कदर मुस्कुराने लगी कि उसके पेट में बल पड़ गए शहजादी जुलेखा खुद भी बेतहाशा हंस रही थी| काफी देर तक दोनों हंसती रही फिर आहिस्ता-आहिस्ता संजीदा हो गई|

वजीरजादी हमीदा बेगम ने कहा शहजादी जुलेखा मैंने सुना है बादशाह सलामत आपसे काफी नाराज हैं। वो चाहते हैं कि आप जल्द शादी का फैसला करें। शहजादी जुलेखा ने जवाब दिया कि अब्बा हुजूर का फैसला बिल्कुल दुरुस्त है। लेकिन जब इंसान का ज़हन किसी को कबूल ना करे तो शादी जबरदस्ती का नाम तो नहीं। फजीरजादी हमीदा बेगम बोली शहजादी साहिबा आखिर आप इतनी मगरूर क्यों है? बड़े-बड़े रिश्ते तो आए हैं लेकिन आपने किसी भी शहजादे को कबूल नहीं किया। शहजादी जुलेखा बोली अक्सर शहजादे अय्याश और बदकिरदार थे और जो इस तरह नहीं थे वह अपने इलाके पर बेहद जुल्मो सितम ढते थे और हमें बदकिरदार और जालिम लोग बिल्कुल पसंद नहीं।

फजीरजादी हमीदा बेगम ने मुंह बनाते हुए कहा फिर आखिर कोई ना कोई फैसला तो आपको करना ही होगा। अब आसमान से तो कोई फरिश्ता नहीं आएगा जिससे आप शादी करें। शहजादी जुलेखा ने कहा फैसला तो हमने करना है और यही तो हम सोच रहे थे कि तुम आ गई। वजीरजादी हमीदा बेगम ने मुस्कुराहट भरे अंदाज में कहा मैंने भी तो आते ही यही पूछा था कि किसके बारे में सोच रही हैं लेकिन आपने मजाक में बात टाल दी शहजादी जुलेखा ने कहा हम जिसके बारे में सोच रहे थे बता नहीं सकते क्योंकि इस तरह हमारी शख्सियत के बारे में गलत तस्वीर फैलने का अंदेशा है फजीरजादी हमीदा बेगम ने उलझते हुए कहा गलत तस्वीर क्या मतलब मैं समझी नहीं शहजादी जुलेखा ने कहा मतलब यह कि हम जिसके बारे में सोच रहे हैं उसका ताल्लुक किसी शाही घराने से नहीं है बल्कि वह एक मामूली गरीब घराने का बेटा है।

हमीदा बेगम ने कहा शहजादी साहिबा पहेलियां मत बुझाएं। मुझे आपकी बातों से कुछ समझ नहीं आ रही है। शहजादी जुलेखा ने वजीरजादी हमीदा बेगम की तरफ सवालिया नजरों से देखते हुए कहा तुम्हें पता है कि पिछले दिनों अब्बा हुजूर के शाही चिड़िया घर का जंगला मुहाफिज की गलती की वजह से खुल गया था। और उसमें से चार बब्बर शेर निकल कर आबादी में घुस गए थे। और उन्होंने रियासत के कई अफराद को चीर फाड़ कर रख दिया था।

फजीरजादी हमीदा बेगम ने आगे खुद ही सारी तफसील बताते हुए कहा अरे हां और मुझे यह भी पता है कि बड़े-बड़े जंगजू सिपाही उन्हें जिंदा पकड़ने या मारने में नाकाम रहे और इस तरह मुल्क में कई रोज तक बहुत खौफ फैला रहा आखिरकार एक लकड़हारे अहमद ने अकेले उन्हें मार डाला और बादशाह सलामत ने लकड़हारे अहमद को दरबार में बुलाकर खुसूसी इनाम भी दिया था। शहजादी जुलेखा ने कहा तो सुनो यही अहमद हमें पसंद आया है।

फरजादी हमीदा बेगम ने चौंकते हुए कहा शहजादी साहिबा मुझे आपसे यह तवको हरगिज़ ना थी कि आप ऐसा अहमकाना फैसला करेंगी। आपको अपने वकार और शाही खानदान के मयार का ख्याल रखना चाहिए। आपको पता है कि बादशाह सलामत को यह बात मालूम होगी तो उन्हें कितना दुख पहुंचेगा। फज़रजादी हमीदा ने बुरी तरह नाराज होते हुए कहा और इसके साथ ही वह उठकर जाने लगी। शहजादी जुला खान ने उसे रोकने की कोशिश की। शहजादी उसके पीछे लपकते हुए कहा, अरे अरे हम तो यूं ही मजाका कर रहे थे तुमने वाकई सच समझ लिया लेकिन वो वाकई नाराज हो गई थी। इसीलिए शहजादी के रोकने के बावजूद वह तेजी से चली गई।

अहमद बेहद खूबसूरत और बहुत सी सलाहियतों का मालिक नौजवान था। लेकिन उसकी बदकिस्मती यह थी कि वह एक मामूली लकड़हारे के घर में पैदा हुआ। निजाबाजी, तीरंदाजी और तलवार के फन में माहिर था। घुड़सवारी में भी वो खासी महारत रखता था। वो अपनी गुफ्तगू में रखरखाव और अदब का इस तरह ख्याल रखता था जैसे शाही खानदान का फर्द हो। उसने तालीम तो हासिल ना की थी लेकिन अपनी मेहनत की बदौलत उसने अच्छी खासी इल्म हासिल कर लिया था। वो बचपन ही से तालीम का शदाई था। चुनांचे अहले दरबार के बच्चों को तालीम देने के लिए जो शाही मकतब बनाया गया था। अहमद बचपन में इस मकतब के एक कोने में छुपकर असातिजा को तालीम और तरबियत देते हुए देखता था और जो कुछ वह समझते वो उसे ज़हन नशीन करता रहता और आखिर एक रोज एक मुल्लिम को उस पर रहम आ गया और उसने उसका शौक देखते हुए उसे शाही दरबारियों के बच्चों के साथ इल्म हासिल करने की इजाजत दे दी। इस तरह कुछ अरसा उसे बाकायदा इल्म मिलता रहा। बाद में जब शाही दरबारियों के बच्चों ने अपने उस्तादों से इस बात का एतराज किया तो उसे मकतब छोड़ना पड़ा। ताम इस मुख्तसर अरसे में वो शाही अदब रखरखाव और गुफ्तगू का सलीका सीख गया था।

अहमद पर कुछ दिनों से अजीब सी बेचैनी तारी थी। वो खुद भी यह ना समझ सका कि यह कैसी बेचैनी है। इसी तरह रोज-बरोज उसकी तबीयत में बेचैनी बढ़ती चली गई और अहमद जो पहले खुश रहता था अब अफसरदा रहने लगा। उसके दोस्त भी सुरते हाल से खासे फिक्रमंद थे। अहमद फितरतन खुशमजाज आदमी था। लेकिन अब वह हर वक्त मुंह मोड़े उदास बैठा रहता।

अहमद ने बोझल दिल के साथ संदल की लकड़ियों के गट्ठे को सर पर रखा और शहरी आबादी की तरफ चल पड़ा। दूसरे लकड़हारे आम लकड़ियां बेचते थे क्योंकि संदल के दरख्त जंगल के सबसे घने हिस्से में थे और वहां तरह-तरह के जंगली दरिंदों से वास्ता पड़ता था। इसलिए दूसरे लकड़हारों की तो वहां जाते हुए जान निकलती थी। जबकि अहमद बचपन ही से इंतहाई दलेर और निडर था और खतरों से खेलना उसकी जिंदगी का हिस्सा था और वैसे भी वो शिकार का शौकीन था। इसलिए वह जंगल के सबसे घने हिस्से में चला जाता और वहां से संदल की लकड़ियां काट कर लाता। अगर कभी किसी दरिंदे से उसका पाला पड़ जाता तो या तो दरिंदा उसकी तलवार की भेंट चढ़ जाता या उसे दुम दबाकर भागना पड़ता। अहमद क्योंकि संदल की लकड़ियां बेचता था इसलिए उसके खरीदार उमरा, रईस और शाही दरबार से ताल्लुक रखने वाले अफराद थे।

अहमद का बाप बचपन ही में फौत हो गया था। वो अपनी बूढ़ी मां के साथ रहता था। वो दोनों देहाती आबादी में रहते थे। संदल की लकड़ियों से क्योंकि खांसी आमदनी हो जाती थी इसलिए उसने देहाती आबादी में छोटा सा पुख्ता मकान भी बनवा लिया था। जबकि उसके दोस्त सब लकड़हारे झोपड़ों में रहते थे।

अहमद शहरी आबादी में पहुंचकर शाही महल की तरफ चल पड़ा। शाही महल के करीब पहुंचकर उसने संदल की लकड़ियों का गट्ठा एक तरफ रखा और आराम करने के लिए बैठ गया। फिर देखते ही उसकी आंखें महल के बालाखाने की तरफ उठ गई। जहां शहजादी जुलेखा खड़ी साफ नजर आ रही थी। शहजादी जुलेखा उसकी तरफ देख रही थी। अहमद ने शहजादी जुलेखा को देखा और गहरी सांस ली। शहजादी की निगाहें उसके दिल में उतर गई। शहजादी ने भी उसकी तरफ आखिरी नजर देखते हुए गहरी सांस ली और वापस चली गई।

अहमद ने पहली मर्तबा शहजादी जुलेखा को उस वक्त देखा था जब वो चार बागी शेरों को खत्म करने के सिलसिले में बादशाह से इनाम हासिल कर रहा था और शाही महल में उसके लिए जियाफत का इंतजाम भी था। वहां से शहजादी जुलेखा ने उसे बुला लिया और उससे खुद इस मुकाबले का अहवाल सुना था। शहजादी उसकी तज़ गुफ्तगू से बेहद मुतासिर हुई थी और अहमद को महसूस हुआ था कि शहजादी अपने दिल में उसके लिए नरम गोशा रखती है क्योंकि अहमद के महल के सामने गुजरने का वक्त मखसूस था इसलिए शहजादी भी उसी वक्त बालाखाने पर आकर खड़ी हो जाती। इस तरह अब रोजाना उनका आमनासामना होने लगा।

अहमद ने ठंडी सांस लेकर लकड़ियों का गट्ठा उठाया और चल पड़ा ताकि उसे फरोख्त करके खानेपीने का सामान खरीदा जा सके। अगले रोज अहमद हस्बे मामूल जंगल के सबसे घने हिस्से में आ पहुंचा। उसने तीर कमान उतार कर एक तरफ रखा और कुल्हाड़ी उठाकर एक दरख्त की तरफ बढ़ा। जैसे ही उसने दरख्त के तने पर पहला वार किया। दरख्त से एक खौफनाक चीख निकली और उस जगह से खून बहना शुरू हो गया जहां कुल्हाड़ी का फल लगा था। अहमद हैरान रह गया। दरख्त से चीख का बरामद होना और तने से खून निकलना यह सब उसके लिए अजीब था। वो इस तरह हैरान परेशान खड़ा था कि अचानक उस तरफ से आवाज बुलंद हुई। नेक दिल अहमद क्या तुम इस कैद से मुझे निजात दिला सकते हो? दरख्त से कराहती हुई आवाज निकली।

क्या तुम दरख्त बोल रहे हो? दरख्त तो नहीं बोला करते। अहमद अभी हैरत में था। मैं दरख्त नहीं हूं। मैं एक जिन्न हूं। मरजान जिन्न। मुझे शाही जिन्नात ने सजा के तौर पर दरख्त बना दिया है। तुम अगर चाहो तो मुझे इससे निजात दिला सकते हो। मैं तुम्हारे इस एहसान का बदला कभी ना कभी उतार दूंगा। दरख्त से आवाज आई।

अच्छा तो तुम जिन्न हो लेकिन मैं तुम्हें कैसे निजात दिला सकता हूं? अहमद के लहजे में अभी तक हैरत थी। तुम यहां से शुमाल की तरफ चले जाओ। जंगल पार करने के बाद सेहरा-ए जुल्मात आएंगे। सेहरा-ए जुल्मात में हमारी बस्ती है। दरबान जिन्न पकड़ कर तुम्हें शाही जिन्नात के सामने पेश करेंगे। शाहहे जिन्नात का बेटा शहजादा हाशिम आजकल शदीद बीमार है और जिन्नात के शाही तबीब ने उसे भी जवाब दे दिया है। लेकिन मेरा दादा एक बहुत बड़ा नजूमी है। उसने मुझे बताया था। अगर यहां की शहजादी जुलेखा के ताज में लगा हुआ हीरा किसी मशरूब में घोलकर हाशिम को पिलाया जाए तो वह ठीक हो जाएगा। यह हीरा किसी बहुत बड़े बुजुर्ग ने बादशाह को दिया था। और उसकी शर्त यह है कि शहजादी रजामंदी से यह हीरा इस्तेमाल करने की इजाजत दे। अगर उसे चुराकर या जबरदस्ती हासिल करके घोल कर पिलाया जाए तो उसका कोई असर नहीं होगा।

तुम शाही जिन्नात से कहना कि तुम उसके बेटे का इलाज करना चाहते हो। जब वह इजाजत दे दे तो तुम बादशाह या शहजादी को तमाम सुरते हाल बता देना। वो दोनों निहायत ही रहम दिल है। और मुझे यकीन है कि वह तुम्हें यह हीरा ले जाने की इजाजत दे देंगे। जब हाशिम ठीक हो जाएगा तो शाही जिन्नात तुमसे इनाम मांगने को कहेंगे। तुम उनसे कहना कि मरजान जिन्न को जो दरख्त की कगद की सजा दी गई है वह खत्म कर दी जाए। शाही जिन्नात मेरी सजा खत्म कर देगा। फिर तुम जाकर यह हीरा वापस अपने बादशाह को दे देना। यह सब दरख्त से मरजान की आवाज आई।

अह हेमद ने उलझते हुए लहजे में पूछा। मैं तुम्हारी मदद करने के लिए तैयार हूं। लेकिन मुमकिन है कि बादशाह सलामत यह हीरा मुझे ना दें। क्योंकि मैं एक लकड़हारा हूं और अपनी बेटी के ताज से हीरा निकालना वह अपने लिए बेइज्जती समझेंगे। जब तुम उन्हें सुरते हाल बताओगे कि तुम किसी मुसीबत ज्यादा की मदद कर रहे हो तो मुझे यकीन है कि वह तुम्हें इंकार नहीं करेंगे। बहरहाल तुम कोशिश तो करके देखो आगे मेरा मुकद्दर जो होगा देखा जाएगा। दरख्त से एक बार फिर आवाज आई और कुछ सोचते हुए अहमद ने फैसला कुन अंदाज में सर हिलाया और तीर कमान और कुल्हाड़ी कांधे पर लटकाए हुए वो सेहरा ए जुलमात की तरफ चल पड़ा।

जंगल उबूर करके सहरा तक पहुंचने में उसे शाम हो गई। यह सहरा बिल्कुल वीरान था और उनमें दूर-दूर तक किसी जी रूह का निशान दिखाई नहीं देता था। जैसे ही अहमद अंधेरे सहरा में पहुंचा, अचानक तेज आंधी के झक्कड़ चलने लगे और आंधी की रफ्तार बढ़ती ही चली गई। चारों तरफ से धूल और गर्द की वजह से अहमद को कुछ दिखाई ना दे रहा था। जब गर्द छटी और उसकी आंखें देखने के काबिल हुई तो उसने देखा कि वह एक बहुत बड़े कैलानुमा महल के सामने खड़ा है। जबकि उसके दोनों बाजुओं को दो खौफनाक बड़े-बड़े जिन्हों ने पकड़ रखा था। फिर वह उसे तकरीबन घसीटते हुए महल के अंदर ले गए।

महल में एक बहुत खूबसूरत और बहुत बड़ा दरबार सजा हुआ था। जहां सैकड़ों जिन्नात कुर्सियों पर बैठे हुए थे। जबकि सामने शाही तख्त पर नूरानी शक्ल वाला बूढ़ा जिन्न बैठा हुआ था। अहमद ने जिन्न भूतों की कहानियां सुन रखी थी। लेकिन इस मखलूक से उसका वास्ता कभी नहीं पड़ा था। इतनी तवील और इस कदर खौफनाक जैसी मखलूक देखकर वो हैरान रह गया।

बूढ़े जिन्न ने कड़कदार लहजे में कहा, आदमजाद, तुमने हमारी आबादी में आने की जुर्रत कैसे की? बूढ़ा जिन्न जो सरदार जिन्नात था उसकी कड़क आवाज सुनकर अहमद का सर चकराने लगा। इतनी गरजदार आवाज कि उसके कान के पर्दे फटे जा रहे थे। मगर अहमद ने अपने आप को संभाला और बोला जिन्नात के अजीम बादशाह आपकी खिदमत में एक मामूली आदमजाद का सलाम कबूल हो। अहमद ने झुककर कोरनिश बजाते हुए कहा अगर शाह मोहतरम नाराज ना हो तो यह आदमजाद कुछ अर्ज करने की इजाजत चाहता है।

शाही जिन्नात का लहजा इस बार पहले से नरम था। जिन्नात ने कहा कहो क्या कहना चाहते हो? अहमद ने जो उसकी ताजीम की थी उसकी वजह से शाही जिन्नात उससे खसा मुतासिर नजर आता था। अहमद ने प्यार भरे लहजे में कहा, "मैंने सुना है कि हुजूर का बेटा बीमार है और शाही तबीब उसका इलाज करने में नाकाम हो चुके हैं। अगर हुजूर इजाजत दें, तो बंदा इस मर्ज का कोई ना कोई इलाज ढूंढ निकालेगा। अगर तुम हमारे बेटे का इलाज ढूंढ लाए तो तुम्हें मुंह मांगा इनाम दिया जाएगा। शाही जिन्नात ने खुश होते हुए कहा और फिर अहमद की ख्वाहिश पर उसे खास जिन्न के कमरे में ले जाया गया। जहां एक बड़े पलंग पर एक नौजवान जिन्न पड़ा हापंप रहा था। उसके सारे जिस्म पर सुर्ख दाने निकले हुए थे और उन दानों की वजह से उसके जिस्म में बेपनाह जलन हो रही थी।

अगली सुबह अहमद ने शाही जिन्नात से दो दिन की मोहलत मांगकर इजाजत तलब की और वापस अपनी रियासत की तरफ रवाना हो गया। शाम हुई तो शहजादी जुलेखा हस्बे मामूल महल के बालाखाने में जा खड़ी हुई। लकड़हारा अहमद रोजाना यहां से गुजरता था और जब तक वो रोजाना उसे एक नजर ना देख लेती उसे चैन नहीं आता था। यह भोला भाला और मासूम सा लकड़हारा उसे बहुत अच्छा लगता था। अहमद के बारे में उसने खुफिया तौर पर बहुत कुछ पता कर लिया था कि वह बेहतरीन तीरंदाज, नेजाबाज और नेक भी है। घुड़सवारी में भी आगे है और कुछ अरसे तक वह शाही मकतब में भी पढ़ता रहा था। उसे फरी तौर पर अहमद से खासी दिलचस्पी हो गई थी।

काफी देर इंतजार के बावजूद अहमद जाहिर ना हुआ तो शहजादी जुलेखा इंतहाए बेचैन हो गई। शाम के साए गहरे हो गए मगर अहमद वहां से ना गुजरा। शहजादी की बेचैनी इस तरह इंतहा बढ़ती जा रही थी। रात आहिस्ताआहिस्ता गहरी होने लगी और शहजादी मायूस अंदाज में वापस मुड़ गई। बड़ी मुश्किल से वह सीढ़ियां नीचे उतर कर आई। कनीज उसके लिए खाना लेकर आई लेकिन उसने वापस भेज दिया। उसने ख्वाबगाह में पहुंचकर दरवाजा बंद किया और बिस्तर पर लेट गई। मगर नींद उससे कोसों दूर थी। उसका दिल बुरी तरह घबरा रहा था कि हो ना हो अहमद किसी मुसीबत में फंस गया होगा। लेकिन वह अपनी इस परेशानी का इजहार किसी के सामने भी ना कर सकती थी। उसका दिल डूबने लगा और वह आहिस्ता-आहिस्ता सिसकियां लेकर रोने लगी। इसी तरह तमाम रात उसे नींद ना आई।

सुबह कनीज उसके लिए नाश्ता लेकर आई तो उसने नाश्ता भी वापस भिजवा दिया। बादशाह सलामत को खबर मिली तो वह दौड़ते हुए आए। देखा तो शहजादी को खासा तेज बुखार था। शाही तबीब को बुलाया गया और उसने शहजादी के लिए कुछ दवाएं और शरबत वगैरह दे दिए। वजीरजादी हमीदा बेगम को शहजादी की हालत की खबर मिली तो वह भी मौजूद हुई। शाम तक शहजादी की बीमारी में कोई कमी ना हुई।

वजीरजादी हमीदा बेगम ने कहा आखिर बताएं तो सही आपको एकदम क्या हो गया है? कल तक तो आप बिल्कुल ठीक थी। लेकिन शहजादी खामोश रही। मेरी प्यारी शहजादी, मेरी दोस्त, मेरी बहन आखिर मुझे तो बताओ हम बचपन से कितने अच्छे दोस्त हैं? शायद आप कल की बात से नाराज हैं। अब नाराजगी खत्म करें। वजीरजादी हमीदा बेगम ने शहजादी को मनाते हुए कहा, "आप जिसको भी पसंद करेंगी, मैं आपका साथ दूंगी।" शहजादी ने बेचैनी के अंदाज में कहा, "तुम सिर्फ मुझे ठीक करने के लिए दिलासा दे रही हो।" जब मैं तंदुरुस्त हो जाऊंगी, तो तुम अपनी बात से मुकर जाओगी। हमीदा बेगम ने शहजादी की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा, लो मैं वादा करती हूं। और शहजादी ने उसके हाथ में अपना हाथ दे दिया।

इतने में दरवाजे पर आहट महसूस हुई और बादशाह सलामत अंदर दाखिल हुए। बादशाह सलामत ने बड़ी नरमी से पूछा, शहजादी बेटी अब तबीयत कैसी है? शहजादी जुलेखा ने कहा, "अब्बा हुजूर, पहले से कुछ ज्यादा ठीक महसूस कर रही हूं।" बेटी, अभी-अभी हमारे सामने एक अजीब मसला पेश हुआ है और हम इस सिलसिले में आपसे मशवरा करने आए हैं। शहजादी ने चौंकते हुए पूछा, "जी हुजूर, क्या मसला है? एक लकड़हारा जिसका नाम अहमद है जिसने चार बब्बर शेरों को मारकर हमसे इनाम हासिल किया था। वह अब भी दरबार में आया है। उसने हमें यह कहानी सुनाई है कि शाह ए जिन्नात का बेटा हाशिम बीमार है। अगर शहजादी के ताज में जरा हुआ दरबारी हीरा किसी मशरूम में घोलकर उस जिन्न को पिलाया जाए तो वह ठीक हो जाएगा। वो लकड़हारा हमसे यह हीरा मांग रहा है और साथ ही वादा कर रहा है कि वह उसे जरूर वापस कर देगा। लेकिन हम उसे अपनी शान के खिलाफ समझते हैं कि अपनी बेटी के ताज को बेरौनक करें अगरचे थोड़े अरसे के लिए ही क्यों ना हो।

बादशाह सलामत ने शहजादी से कहा अब्बा हुजूर अगर आप बुरा महसूस ना करें तो लकड़हारे को हमारे पास भेज दें। हम खुद उससे बात करना चाहते हैं। अगर वह सच बोल रहा है तो हमें पता चल जाएगा और हम उसे यह हीरा दे देंगे। लेकिन अगर वह झूठ बोल रहा है तो तब भी हमें अंदाजा हो जाएगा और शाही कानून के मुताबिक उसे सजा दी जाएगी। शहजादी जुला खान ने कहा तो बादशाह सलामत ने उसकी बात मान ली। चुनांचे थोड़ी ही देर में अहमद को अंदर बुला लिया गया।

अहमद इंतहाई अक्लमंद था। शहजादी के चेहरे का तासुर देखते ही वो सारी कैफियत भांप गया। शहजादी ने कहा, अहमद, हमने सुना है कि तुम झूठ बोलने में माहिर हो गए हो। अगर तुम्हें हीरा चाहिए था, तो तुम हमसे वैसे ही मांग सकते थे। इसके लिए कहानी बनाने की क्या जरूरत थी? अहमद ने कहा नहीं शहजादी हुजूर मैंने झूठ नहीं बोला और इसके साथ ही उसने दरख्त काटने से लेकर शाही जिन्नात से मिलने तक के तमाम वाक्यात तफसील से बता दिए। शहजादी ने महसूस कर लिया कि अहमद ठीक कह रहा है।

शहजादी ने कहा हम तुम्हें हीरा नहीं बल्कि हीरे समेत पूरा ताज तुम्हें इनाम में दे रहे हैं। क्योंकि उस दिन सिर्फ अब्बा हुजूर ने इनाम दिया था। हमने नहीं इसीलिए आज हम इनाम दे रहे हैं। और इसके साथ ही उसने बिस्तर के एक कोने में रखा हुआ ताज उठाकर अहमद की तरफ बढ़ा दिया। अहमद ने झुकते हुए कहा शहजादी हुजूर मैं खुद को इस इनायत के काबिल नहीं समझता। मेरे ख्याल में मेरी इतनी हैसियत नहीं। शहजादी ने कहा हमने सुना है कि आप तलवार के बहुत माहिर हैं। और हम अब्बा हुजूर से कहकर आपको अपना मुहाफिज मुकर्रर करना चाहते हैं। इस लिहाज से आपकी अहमियत शाही मुहाफिज की है। यह ताज रख लीजिए। यह हमारी तरफ से पेश किया गया मुआवजा है और उसके बेपनाह इसरार पर अहमद ने काफी इजहार तशक्कुर के बाद यह ताज ले लिया।

इसके बाद वो शहजादी से इजाजत लेकर रुखसत हुआ। वो जल्द से जल्द शाही जिन्नात तक पहुंचना चाहता था ताकि हाशिम का इलाज करके मरजान जिन्न को दरख्त की कैद से आजाद करा सके। अहमद एक दिन का सफर करने के बाद सहरा के उस हिस्से तक पहुंच गया जहां जिन्नात की बस्ती थी। पहले की तरह तेज आंधी चली और जब आंधी खत्म हुई तो अहमद शाही जिन्नात के महल के सामने खड़ा था। उसे महल के अंदर ले जाया गया जहां हाशिम अपनी जिंदगी की आखिरी सांसे ले रहा था। शाही जिन्नात सर झुकाए मायूस बैठे थे और पूरे महल पर सोगवार फिजा तारी थी।

अहमद ने एक दरबारी के जरिए प्याला मंगवाया। फिर उसमें एक शेर ताजा मशरूब डालकर उसने हीरा उसमें काफी देर घोला और उसे शहजादा हाशिम को पिला दिया। कुछ ही देर गुजरी थी कि हाशिम के जिस्म से एकदम सुर्ख दाने गायब होना शुरू हो गए। चंद लम्हों में उसके जिस्म से तमाम दाने गायब हो गए। उसने कराना भी बंद कर दिया था। फिर चंद लम्हों बाद ही उसने अपनी आंखें खोल दी। वो हैरत से अपने जिस्म को देख रहा था जैसे उसे एकदम तंदुरुस्त होने पर हैरत हो रही हो। फिर जब उसे अहमद के बारे में बताया गया तो वह बेहद खुश हुआ।

पूरे महल में जश्न की तैयारी की गई और शाही जिन्नात और हाशिम ने उसे इस खुशी में हीरे जवाहरात का बहुत बड़ा खजाना दे दिया। शाही जिन्नात ने कहा ऐ आदमजाद यह खजाना हमने अपनी खुशी से दिया है। लेकिन हम चाहते हैं कि तुम अपनी तरफ से भी कोई चीज मांगो। हम तुम्हारी ख्वाहिश जरूर पूरी करेंगे। अहमद ने प्यार भरे अंदाज में कहा, हुजूर, मुझे किसी चीज का लालच नहीं। मैं सिर्फ इतनी दरख्वास्त करूंगा कि आपने अपनी बस्ती के जिन्न मरजान को जो दरख्त में कैद की सजा दी है आप उसे माफ कर दें और उसे इस कैद से निजात दिला दें।

ठीक है हम ना सिर्फ उसकी सजा माफ करते हैं बल्कि तुम्हारी सिफारिश से आज से वह हमारे दरबार का अहम तरीन रुक्न होगा। शाही जिन्नात ने गरजदार आवाज के साथ कहा। इसके साथ ही उसने कुछ पढ़कर हवा में फूंक मारी तो बादल का एक टुकड़ा पैदा हुआ और उड़ता हुआ चला गया। थोड़ी देर बाद जब यह बादल का टुकड़ा वापस आया तो उस पर मरजान जिन्न बैठा हुआ था। मरजान ने सबसे पहले शाही जिन्नात और अहमद को झुक कर सलाम किया और फिर वो अहमद के सामने रुकू के बल झुकता चला गया। अहमद मैं तुम्हारे एहसान का सिला कभी ना कभी जरूर दूंगा। तुमने वाकई मेरी बहुत मदद की। मरजान जिन्न ने उसके सामने शुक्र भरे अंदाज में कहा और फिर शाही जिन्नात से इजाजत लेकर वो उसे उसके घर तक छोड़ने के लिए आया। उसने अहमद को अपनी पुश्त पर सवार कर रखा था। जबकि वह खजाना भी उसके साथ था जो उसे जिन्नात और हाशिम ने इनाम के तौर पर दिया था।

मरजान जिन्न ने उसे उसके घर के बाहर उतार दिया। अहमद मैं तुम्हें एक अंगूठी देता हूं। यह इंतहाई कीमती अंगूठी है। यह मेरे दादा ने मुझे दी थी। इसकी खासियत यह है कि जब कभी तुम किसी मुहिम पर जाना चाहो तो अपनी आंखें बंद करके इस अंगूठी को हुक्म दे देना। यह तुम्हें वहां पहुंचा देगी। इसके अलावा जब किसी मुश्किल में गिरफ्तार हो जाओ तो इस अंगूठी को किसी चीज पर रगड़ देना। मुझे फौरन खबर मिल जाएगी और मैं वहां पहुंच जाऊंगा। मरजान जिन्न ने कहा और अहमद बेहद खुश हुआ। उसने मरजान के सामने ही यह तिलिस्मी अंगूठी अपनी उंगली में पहन ली। इसके बाद मरजान जिन्न उससे इजाजत लेकर अपनी बस्ती की तरफ उड़ गया।

अहमद ने शाही जिन्नात से मिलने वाले खजाने से अपनी बस्ती में एक खूबसूरत महल तामीर करवाया। जो कुशादा और खूबसूरती में किसी तरह भी बादशाह के महल से कम ना था। अब अहमद ने इरादा किया कि जाकर बादशाह सलामत का शुक्रिया अदा करें। जिसके जवाब में हीरा देने से उसे यह सब इनामो इकराम मिला और उसका इरादा था कि बादशाह सलामत को अपने महल में दावत दे। उसने एक आला नस्ल का घोड़ा भी खरीद लिया था और लकड़ियां काट कर बेचने का पेशा उसने बंद कर दिया था।

जैसे ही अहमद शहरी आबादी में पहुंचा, वो यह देखकर हैरान रह गया कि हर शख्स इंतहाई परेशान और गमजदा था। उसने एक दो अफराद को रोक कर उनसे पूछने की कोशिश भी की लेकिन किसी आदमी ने भी उसकी बात का जवाब ना दिया। उसे महसूस हो रहा था जैसे शहर पर कोई आफत टूट पड़ी हो। जब अहमद शाही महल में पहुंचा तो उसे यह बुरी खबर मिली कि शहजादी को किसी ने अगवा कर लिया है। यह खबर अहमद पर बिजली बनकर गिरी। बादशाह सलामत की हालत बहुत खराब थी और वह गम से बुरी तरह निढाल थे। इसलिए शाही तबीब किसी को भी उनसे मिलने की इजाजत नहीं दे रहे थे।

वजीरजादी हमीदा बेगम को जब अहमद की आमद का पता चला तो उसने फौरन अहमद को अपने पास बुला लिया। अहमद ने बेचैन लहजे में पूछा वजीरजादी आखिर यह क्या हुआ? शहजादी को कैसे अगवा किया गया? हमीदा बेगम ने कहा, "हम बहुत सी सहेलियां बाग में खेल रही थी कि अचानक एक बहुत बड़ा जिन्न नमूदार हुआ। उसके सर पर लंबे-लंबे बाल थे। पांव और हाथों में उसने बड़े-बड़े सोने के कड़े पहने हुए थे। जबकि कानों में उसने सोने के बाले पहन रखे थे। हमारी तो उसे देखते ही चीख निकल गई। उसने गौता लगाकर शहजादी को पकड़ा और मगरिब की तरफ उड़ गया। शहजादी बेचारी दहशत के मारे चीखती रही लेकिन उस पर कोई असर ना हुआ। हम रोते हुए बादशाह सलामत के पास आई और उस वक्त से बादशाह सलामत को गशी के दौरे पड़ रहे हैं।

वजीरजादी हमीदा बेगम ने सारी तफसील बताई। अहमद ने इंतहाई परेशान लहजे में कहा, "यह तो बहुत बुरा हुआ। आप बादशाह सलामत को तसल्ली दें। मैं इस मुहिम पर आज ही रवाना होता हूं। इंशा अल्लाह शहजादी साहिबा को आजाद करा कर ही वापस आऊंगा। अहमद ने हमीदा बेगम को तसल्ली देते हुए कहा और वहां से इजाजत लेकर महल से बाहर आ गया।

इसी शाम बादशाह ने ऐलान कर दिया कि जो शख्स भी शहजादी जुलेखा को आजाद करा कर लाएगा शहजादी की शादी उसी के साथ कर दी जाएगी। अहमद ने घोड़े का रुख जंगल के शुमाली हिस्से की तरफ कर लिया। जहां एक इंतहाई नेक बुजुर्ग रहते थे। अहमद को यकीन था कि वह इस मुश्किल में कोई ना कोई हल जरूर बताएंगे। उसने घोड़े को ऐड लगाई और घोड़ा इंतहाई तेज रफ्तार से फासला तय करने लगा।

शहजादे की कैद में आए शहजादी जुलेखा को दूसरा रोज था और रो-रो कर वो बुरी तरह हलकान हो गई थी। साहिर जालिम जादूगर ने उसे एक महीने तक सोचने की मोहलत दी थी। उसके बाद उसने कहा था कि वह एक मखसूस जादू के जरिए जिन्नरीद से इजाजत लेकर उससे जबरदस्ती शादी कर लेगा। मक्कार साहिर किसी काम से घर से चला गया था और शहजादी उसकी कैद से निकलने का कोई ना कोई हल सोच रही थी।

महल में उसे घूमने फिरने की मुकम्मल आजादी थी। हत्ता कि महल से बाहर जाने पर भी उस पर कोई पाबंदी नहीं थी। वो कई बार महल से बाहर गई। यह महल वादी काफ में वाक था जिसके चारों तरफ बिल्कुल सीधे पहाड़ खड़े थे और वह कोई परिंदा तो थी नहीं कि उड़कर दूसरी तरफ चली जाती? इसलिए उसे आजादी से वह कोई फायदा हासिल ना कर सकती थी क्योंकि चारों तरफ बुलंद पहाड़ों ने किसी कगीले की ऊंची दीवारों की तरह उसे महसूर कर रखा था।

शहजादी जुलेखा ने एक बार फिर महल में चक्कर लगाना शुरू कर दिया। महल का एक कमरा बंद था और शहजादी सोच रही थी कि इस कमरे में कोई ना कोई राज जरूर है लेकिन क्या राज था वो यह जान ना सकी। महल के सहन के ऐन दरमियान में एक छोटा सा मुजस्समा था जिसका सर ऊपर आसमान की तरफ था और जिसकी आंखों में से हर वक्त सुर्ख शुएं निकलती रहती थी। शहजादी का ख्याल था कि जब वादी काफ में किसी खतरे की आमद होगी तो यह शंए तेज हो जाएंगी। इस तरह उसे खतरे की पेशगी खबर मिल जाएगी। लेकिन शहजादी जुलाखा ने उन सब में एक बात बड़ी अजीब सी महसूस की थी कि यह अपने अंदर आतिशी सलाहियत रखती थी और जब ऊपर उड़ने वाला कोई परिंदा उन हवाओं की जद में आता था तो वह फौरन जलकर राख हो जाता था वो एक छोटा सा मुजस्समा था और उसे आसानी से उठाया भी जा सकता था उसके सर में भी घूमने की सलाहियत थी यानी सर के कप से पकड़ कर उसे जिस तरफ भी घुमाया जाता यह आसानी से घूम सकता था कई बार तो शहजादी ने सोचा कि मौका पाकर कर इस मुजस्समे के सर को साहिर के जिस्म पर डाल दे। शायद इससे उसकी मौत वाक हो जाए। लेकिन फिर उसे अपना यह इरादा तर्क करना पड़ा कि जब जिस्म था ही छलावा और धोखा तो यह उसे क्यों नुकसान पहुंचा सकता था।

उन्हीं सोचों में गुम शहजादी महल से बाहर निकल आई। यह वादी एक खूबसूरत वादी थी। इसमें हर तरफ तालाब, झरने और खूबसूरत आबशारे थी। चारों तरफ हरेभरे दरख्त थे। लेकिन शहजादी को उनसे कोई दिलचस्पी ना थी। वो इंतहाई परेशानी के आलम में एक तालाब के किनारे पर जाकर बैठ गई। अचानक तालाब से मेंढक की टरटर महसूस हुई तो यूं हो रहा था जैसे वो इंसानी आवाज में बोल रहे हो।

क्योंकि तुम्हें मालूम है कि साहिर ने इफ को क्यों कैद कर रखा है। एक मेंढक ने टराते हुए कहा, हां मैं जानता हूं कि शाह जिन्नात बेऔलाद है और वह बेहद बूढ़ा हो चुका है। उसके मरने के बाद इफ जिन्नात की बादशाहत का उम्मीदवार है। जबकि साहिर तो खुद परस्तान का बादशाह बनना चाहता है। इसलिए उसने इफ को कैद कर रखा है। क्योंकि इफ सिर्फ दो है। वो जादू नहीं जानता जबकि साहिर जिन्न होने के साथ-साथ जादूगर भी है। दूसरे मेंढक ने जवाब दिया, क्या तुम्हें यह पता है कि इफरीद को किस तरह आजाद किया जा सकता है? हां, मैं जानता हूं कि वह जादू के कमरे में है और इस वक्त तक आजाद नहीं हो सकता जब तक कि मुजस्समे की शंए उस कमरे के दरवाजे पर ना डाली जाए क्योंकि कमरे में जो ताला लगा है, यह जादू का ताला है और आम तरह से नहीं टूट सकता। उसे सिर्फ मुजस्समे की हवाओं से ही तोड़ा जा सकता है। दूसरे मेंढक ने जवाब दिया, वैसे अगर शहजादी हिम्मत करे तो इफरीद को आजाद कर सकती है। इसमें उसका अपना भी फायदा है। पहला मेंढक टराया और उसके बाद दोनों खामोश हो गए।

शहजादी के सामने बंद कमरे का राज जाहिर हो चुका था। वो तेजी से वापस महल की तरफ दौड़ी ताकि साहिर के आने से पहले वो इफ को आजाद कर दे। और दूसरी तरफ अहमद इंतहाई घने जंगल में झोपड़ी के नजदीक पहुंचकर उसने अपना घोड़ा रोक लिया। झोपड़ी के बाहर घोड़ा बांधकर वह अंदर दाखिल हो गया। अंदर एक सफेद रेश बुजुर्ग मुसल्ले पर इबादत में

मशरूफ थे। अहमद एक कोने में फर्श पर बैठ गया। थोड़ी देर में बुजुर्ग इबादत से फारग होकर अहमद की तरफ मुतवज्जा हुए।

"आओ बेटे," अहमद, हमें पता है कि तुम किस लिए आए हो?" बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा।

"जी बाबा, मैं इंतहाई परेशान हूं। शहजादी जुलेखा अगवा हो गई हैं। शहजादी के अगवा [संगीत] ने मुझे हिला कर रख दिया है। आप मुझे बताएं कि किस जिन्न ने उसे अगवा किया है और वह कहां रहता है। मैं उसका हर तरह से खात्मा कर सकता हूं," अहमद ने बेताबी से कहा।

"अहमद बेटे, शहजादी जुलेखा [संगीत] को साहिर जालिम जादूगर ने अगवा किया है। यह जिन्न होने के साथ-साथ बहुत बड़ा जादूगर भी है। इसलिए उसका खात्मा आसान नहीं। यह वादी काफ में रहता है और शहजादी को अगवा करके वहीं अपने महल में ले गया है। उसने शहजादी को एक महीने की मोहलत दी है। उसके बाद वह किसी जादू के जरिए इफ से इजाजत लेकर शहजादी से जबरदस्ती शादी कर लेगा। साहिर से मुकाबला करने से पहले तुम्हें जंगल हलेनाक में जाना होगा। वहां एक बूढ़ी पुजारन जंगल से बाहर घर में रहती है। वो दो तिलिस्म पैदा करेगी और तुम्हें दोनों को सर करना होगा। पहला तिलिस्म यह होगा कि खौफनाक सांपों के दरमियान तुम्हें सुनहरे ताज वाले सांप को मारना होगा। उसे मारने के लिए तुम्हें बेपनाह फुर्ती दिखाना होगी। वरना सांप तुम्हें डस लेंगे और तुम्हारा जिस्म [संगीत] एक लम्हे में राख बन जाएगा। इसके बाद कबूतरों का एक गोल तुम्हारे सर पर चक्कर लगाएगा। और इस गोल के तीन चक्कर पूरे करने से पहले तुम्हें स्याह कबूतर को शिकार करना होगा। इसके लिए यह शर्त है कि वह तुम्हारे पहले ही तीर से शिकार हो जाए। अगर वह शिकार ना हुआ या कबूतरों ने तीन चक्कर पूरे कर लिए तो तुम खुद ब खुद पत्थर के बन जाओगे। अगर तुमने इसका काम पूरा कर दिया तो वह तुम्हें इनाम में एक मनका देगी। यह मनका लेकर तुम वादी काफ में चले जाना। तुमने इधर-उधर देखे बगैर सीधा महल में दाखिल होना है। और जब साहिर तुम्हारे सामने आए तो यह मनका उसके जिस्म पर मार देना। जो ही मनका उसके जिस्म से छुएगा उसकी जादुई सलाहियत साफ हो जाएगी। और वो आम सा जिन्न रह जाएगा। फिर तुम अपनी [संगीत] बहादुरी से मुकाबला करके उसका खात्मा कर सकते हो। यह जो तुम्हारी तवज्जो हटाने के लिए मुख्तलिफ हरबे इस्तेमाल करेगा। लेकिन तुमने वादी में दाखिल होकर सीधा महल में जाना है। अगर तुमने इधर-उधर देखा तो साहिर तुम पर वार करने में कामयाब हो जाएगा। इसलिए तुम्हें बेहद [संगीत] मुस्तैद रहने की जरूरत होगी," बुजुर्ग बाबा ने तमाम तफसील बताते हुए कहा।

"इस मुहिम में काफी मुश्किलात तो है लेकिन अल्लाह ताला कासाज है इंशा्लाह मैं कामयाब लौटूंगा," अहमद ने पुरज्म लहजे में कहा और बुजुर्ग बाबा से दुआएं लेकर वह झोपड़ी से बाहर आ गया। घोड़े को खोलकर उसने चरने के लिए छोड़ दिया था ताकि वापसी पर आकर उसे लेता जाए। फिर उसने आंखें बंद करके मरजान की दी हुई अंगूठी को हुक्म दिया कि उसे जंगल हॉलेनाक के बाहर बूढ़ी पुजारण की कयामगाह तक पहुंचा दे।

पैरों के नीचे जमीन महसूस होते ही अहमद ने आंखें खोल दी। वो एक घर के बाहर खड़ा था। जबकि कुछ फासले पर उसे घना जंगल नजर आ रहा था। अचानक अहमद को सांप की तेज फूंकार सुनाई दी। उसने चौंक कर नीचे देखा। दूसरे ही लम्हे [संगीत] उसका रंग जर्द पड़ गया। जमीन से उबलउबल कर सांप बाहर निकल रहे थे और उन्होंने अहमद को चारों तरफ से घेर लिया। उनसे थोड़े फासले पर उसे सुनहरे ताज वाला सांप भी नजर आ रहा था। यह एक खूबसूरत सांप था जिसके सर पर छोटा सा सोने का ताज था। सांपों की फूंकार तेज हो गई। अहमद ने जल्दी से तलवार निकाल ली। वो उन सांपों से बचता [संगीत] हुआ बिजली की तेजी से सुनहरे सांप की तरफ बढ़ा। अचानक एक सांप ने तेज रफ्तार से अपना फन उठाया और अहमद के संभलने से पहले ही उसे डस लिया। अहमद बुरी तरह चकराया लेकिन इससे पहले [संगीत] कि वो गिरता उसे मरजान झिन्न की चीखती हुई आवाज सुनाई दी।

"अहमद, अपने आप को संभालो। जल्दी से सुनहरे सांप का खात्मा कर दो। वरना सांप के जर से चंद [संगीत] लम्हों में तुम मर जाओगे।"

अहमद ने अपने डूबते हुए जहन को संभाला और लड़खड़ाता हुआ सुनहरे सांप की तरफ बढ़ा और अपने जिस्म की आखिरी ताकत लगाते हुए उसने सुनहरे सांप के सर पर तलवार का वार किया और सांप का फन कट गया और दूर जा गिरा। एक लम्हे के लिए चारों तरफ धुआं छा गया। जब धुआं कम हुआ तो तमाम सांप गायब हो चुके थे। इतने में मरजान जिन्न नमूदार हुआ। उसने हाथ [संगीत] में एक प्याला उठाया हुआ था जिसमें स्याह रंग का कोई शरबत था।

"इसे जल्दी से पी लो वरना सांप का जहर तुम पर असर कर जाएगा," मरजान ने तेज लहजे में कहा और अहमद ने जल्दी से उसके हाथ से प्याला [संगीत] लेकर मशरूब पी लिया।

"मरजान जिन्न, अगर तुम बुरे वक्त मुझे ना पुकारते तो मैं चकरा कर गिर जाता और कब का खत्म हो चुका होता," अहमद ने एहसान भरे लहजे में कहा और मरजान जिन्न ने खुश होकर अपने बड़े-बड़े नुकीले दांत निकाल कर दिखा दिए।

"यह तो मेरा फर्ज था। अब तुम अगले मरहले के लिए तैयार हो जाओ। मैं जा रहा हूं," मरजान जिन्न ने कहा और इसके साथ ही वह गायब हो गया।

इतने में अहमद को ऊपर परिंदों के परों की फड़फड़ाहट महसूस हुई। उसने देखा तो ऊपर कबूतरों का एक दल उड़ रहा था जिसमें स्याह कबूतर भी शामिल था। अहमद ने फौरन कमान सीधी की और तीर का रुख कबूतरों की तरफ कर दिया। इतने में गोल ने एक चक्कर काट लिया था। अब वो दूसरा चक्कर काटने लगा था। कबूतरों की रफ्तार इंतहाई तेज थी और उड़ते हुए गोल में से स्याह रंग के कबूतर को निशाना बनाना इंतहाई मुश्किल था। इतने में गोल दूसरा चक्कर काट कर वापस आने लगा। [संगीत] अहमद जानता था कि जो ही कबूतरों ने तीसरा चक्कर पूरा किया वो खुद ब खुद पत्थर का बन जाएगा। उसे जो कुछ भी करना था उन्हीं चंद लम्हों में करना था। उसने उड़ते हुए गोल की बुलंदी और [संगीत] उनकी रफ्तार का अंदाजा किया और उसी अंदाजे की बिना पर उसने खुदा का नाम लेकर तीर छोड़ दिया।

"वो मारा!" अहमद खुशी से चीख पड़ा क्योंकि तीर सीधा [संगीत] कबूतर के सीने में पैवस्त हो गया था और वह फड़फड़ाता हुआ नीचे आ गिरा। एक बार फिर चारों तरफ अंधेरा छा गया। जब अंधेरा छटा तो बूढ़ी लाघर और कुबड़ी पुजारन वहां खड़ी थी। उसके बालों की सफेद [संगीत] लठ जमीन को छू रही थी।

"लड़ा रे, तुम फौरन सामने वाले जंगल में जाकर नीले हाथी की सूंड काट कर ले आओ। उसकी सूंड जड़ से कटी होनी चाहिए। अगर तुम सूंड लाने में नाकाम रहे तो मैं तुम्हें कत्ल कर दूंगी," बूढ़ी पुजारण ने चीखते हुए कहा और इसके साथ ही वह गायब हो गई।

अहमद ने तलवार और तीर कमान संभाली और जंगल की तरफ रवाना हो गया।

दूसरी तरफ शहजादी जुलेखा तेजी से महल में दाखिल हुई। उसने सहन में रखे हुए मुजस्समे को बाजुओं में भरकर उसे उठाया क्योंकि मुजस्समा छोटा सा था। इसलिए उसे उठाने में शहजादी को कोई दिक्कत पेश ना आई। शहजादी मुजस्समे को उठाए तेजी से बंद कमरे की तरफ चल पड़ी। शहजादी ने मुजस्समे की आंखों से निकलने वाली हवाओं का रुख दरवाजे की तरफ कर दिया। एक धमाका हुआ और दरवाजा गायब हो गया। इतने में कमरे से एक स्याह रंग का झिन्न दनदनाता हुआ बाहर निकला और शहजादी के सामने झुक गया।

"शहजादी जुलेखा, मैं इफत आपसे वादा करता हूं [संगीत] कि आपका यह एहसान कभी ना कभी जरूर उतारूंगा," इफ ने गरजती हुई आवाज में कहा और इसके साथ ही उसने बाजू फैलाए और बाहर [संगीत] की तरफ उड़ने लगा। लेकिन उसी लम्हे साहिर जालिम जादूगर बिजली की तेजी से कहीं से नमूदार हुआ और इफ से टकरा गया। उनके टकराने से यूं महसूस हुआ जैसे दो पहाड़ आपस में टकराए हो। फिर उनके दरमियान फिजा में खौफनाक जंग छिड़ गई। वो उड़ते हुए आते और एक दूसरे से [संगीत] बुरी तरह टकरा जाते। दोनों अपने खौफनाक सींग मारकर एक दूसरे का जिस्म [संगीत] छलनी कर रहे थे। फिर इसी तरह वो फिजा में लड़ते हुए नजरों से ओझल हो गए। लेकिन शहजादी इंतहाई खौफजदा हो गई थी कि जब भी साहिर वापस आएगा वो उससे बदतर इंतकाम लेगा। वो दिल ही दिल में अपने बचाव की दुआएं मांगने लगी उसे और कुछ तो समझ ना आया। वो महल से निकल कर उस तालाब [संगीत] की तरफ बढ़ गई जहां उसने दो मेंढकों की गुफ्तगू सुनी थी।

जैसे ही शहजादी तालाब के नजदीक पहुंची वहीं मेंढक फिर टकराने लगे। उनकी आवाज अब इंसानी थी। शहजादी तालाब के किनारे बैठकर गौर से उनकी बातें सुनने लगी।

"रोकी, तुम जानते हो कि साहिर और इफ की लड़ाई का क्या अंजाम होगा?" एक मेंढक टरराया।

"हां गौरी, यह दोनों एक दूसरे को बुरी तरह जख्मी कर देंगे और इसी तरह फिजा में लड़ते लड़ते कोहे काफ की सरहद [संगीत] के करीब पहुंच जाएंगे और वहां से साहिर को वापस पलटना पड़ेगा क्योंकि सरहद के करीब इफ का [संगीत] दोस्त कबीला रहता है।" दूसरे मेंढक ने जवाब दिया।

"अगर शहजादी इस तालाब में नहा ले तो साहिर के अताब से बच जाएगी क्योंकि यह उसके लिए मुकद्दस तालाब है वरना वो शहजादी से बहुत बड़ा इंतकाम लेगा," पहले मेंढक ने डराते हुए कहा।

"हां गौरी, शहजादी को फौरन इस तालाब में नहा लेना चाहिए। वैसे भी अहमद लकड़हारा शहजादी की मदद को निकल खड़ा हुआ है। इसलिए शहजादी के निजात के दिन करीब है," दूसरे मेंढक ने डरते हुए जवाब दिया और फिर दोनों खामोश हो गए।

उनकी बातें सुनकर शहजादी के दिल को कदर इत्मीनान हासिल हुआ। वो फौरन कपड़ों समेत [संगीत] तालाब में कूद गई। तालाब का पानी खासा ठंडा था इसलिए शहजादी को बेहद राहत महसूस हुई।

कुछ देर बाद शहजादी नहा धोकर अभी तालाब से बाहर निकली ही थी कि फिजा गालियों की खौफनाक ढाड़ से गूंज उठी। साहिर चीखता चिल्लाता और दहाड़ता हुआ जमीन पर उतर रहा था। उसके पूरे जिस्म से खून रिस रहा था।

"अगर तुम मुकद्दस तालाब में नहाई ना होती तो मैं अभी तुम्हारा हश्र कर देता। तुम खुशकिस्मत हो कि मेरे हिसाब से बच गई हो," साहिर ने गुर्राते हुए कहा और तालाब में कूद गया। जब वह बाहर निकला तो उसके जिस्म से सारे जख्म गायब हो चुके थे और वह पूरी तरह तंदुरुस्त हो चुका था। शहजादी जुलेखा तालाब के पानी की इस पुर असर तासीर से हैरान रह गई।

"[संगीत] अगर मैं एक माह का वादा ना कर चुका होता तो मैं देखता कि तुम कैसे मुझसे शादी नहीं करती," साहिर ने चिघाड़ते हुए कहा उसकी आंखों से अभी तक घस्से की वजह से शोले निकल रहे थे।

"मैंने तुम्हें घूमने फिरने की जो आजादी दे रखी थी वह आज से खत्म। तुम एक माह तक महल के कमरे में कैद रहोगी," मक्कार साहिर ने गुस्सीले लहजे में कहा। इसके साथ ही उसने हाथ झटका तो शहजादी हवा में उड़ते हुए [संगीत] महल के कमरे में जा गिरी और इसके साथ ही कमरे का दरवाजा बंद हो गया। शहजादी दोनों हाथों से चेहरा छुपा कर झारू कतार रोने लगी।

इधर दूसरी तरफ अहमद जंगल में पहुंच कर रुक गया। उसने हाथ में तलवार [संगीत] थामी हुई थी और वह चाको चौबंद था। उसे नीले हाथी की आमद का इंतजार था ताकि उसकी सूंड काट सके। इतने में दरख्तों [संगीत] के पीछे से जोरदार चिंघाड़ की आवाज सुनाई दी और अहमद तन कर खड़ा हो गया। दरख्तों के टूटने की कड़कड़ाहट आई और उसे दूर से एक नीले रंग का हाथी दनदनाता हुआ साफ नजर आने लगा। वो इतना बड़ा था और इस कदर तेज [संगीत] रफ्तार से दौड़ रहा था कि अहमद का जिस्म एक लम्हे में पसीने में डूब गया। मरता क्या ना करता। उसे हाथी का मुकाबला तो करना ही था। वरना अगर वह भाग जाता तो बूढ़ी पुजारन तो उसे वैसे ही हलाक कर डालती। चुनांचे वह तलवार उठाकर अपने औसान संभालने की कोशिश करने लगा। हाथी चिंघाड़ता और दनदनाता हुआ उसकी तरफ बढ़ा। एक लम्हे के लिए उसकी तलवार वाला हाथ कांप गया और अगले ही लम्हे उसे यूं लगा जैसे हाथी उसे कुचलता [संगीत] हुआ निकल जाएगा। लेकिन ऐन उसी लम्हे जब उसे हाथी की टक्कर लगनी थी। किसी गैबी ताकत [संगीत] ने एक लम्हे के लिए उसे ऊपर उठा लिया था। और जब उसने होश संभाला तो वह ऊपर दरख्त के एक बड़े से तने पर बैठा था और उसके साथ मरजान जिन्न में बैठा उसे गुस्सीली नजरों से घूर रहा था।

"तुम में इतनी अकल तो होनी चाहिए कि सामने खड़े होकर किसी हाथी का मुकाबला नहीं कर सकोगे। तुम्हें चाहिए था कि किसी दरख्त पर बैठकर नीले हाथी के गुजरने का इंतजार करते और दरख्त के ऊपर बैठकर उसकी सूंड पर वार करते। अगर मैं तुम्हें ऊपर ना उठाता तो अब तक तुम्हारे जिस्म के कई टुकड़े हो चुके होते," मरजान जिन्न ने जोशीले लहजे में कहा।

"अगर वो मुझे दरख्त पर बैठा हुआ महसूस करता तो दरख्त को जड़ से उखाड़ सकता था। फिर मेरा क्या बनता?" अहमद ने मुस्कुराते हुए कहा।

"यह अंगूठी जो मैंने तुम्हें दी है, तुम्हें हवा में भी उड़ा सकती है। इस तरह जब खतरा महसूस करते, तो इस अंगूठी को हुक्म देते, यह तुम्हें [संगीत] ऊपर हवा में उठा लेती," मरजान जिन्न के लहजे में बदस्तूर गुस्सा था।

"प्यारे मरजान जिन्न, गुस्सा थूक दो और कोई तरकीब सोचो जिससे नीले हाथी की सूंड काटी जा सके," अहमद ने उलझते हुए कहा।

"तुम इसी टहनी पर बैठे रहो, मैं नीले हाथी को पकड़ कर ले आता हूं। जो ही वह तुम्हारे नीचे से गुजरने लगे तलवार का एक भरपूर वार उसकी सूंठ पर कर देना," मरजान जिन्न ने तजवीज पेश की और अहमद [संगीत] ने सर हिला दिया। फिर मरजान जिन्न उसकी नजरों से ओझल हो गया।

अहमद तलवार संभाले टहनी पर चुस्त होकर बैठ गया। थोड़ी देर में उसे हाथी के कदमों की धमक सुनाई दी। ऐसे महसूस होता था कि कोई असली ताकत उसे जबरदस्ती धकेल रही हो। जब हाथी टहनी के नीचे आया तो अहमद ने तलवार का जोरदार वार उसकी सूंड की जड़ पर किया और नीले हाथी की सूंड कट कर दूर जा गिरी। नीले हाथी ने खौफनाक चिंघाड़ मारी और दहाड़ता दरख्त गिराता हुआ नजरों से ओझल हो गया।

अहमद जल्दी से दरख्त से नीचे उतरा और नीले हाथी की सूंड उठाने लगा। इतने में मरजान जिन्न भी नमूदार हो गया।

"मेरा हाथ थाम लो और आंखें बंद कर लो," मरजान जिन्न ने खुद ही सूंड उठाते हुए कहा और अहमद ने आंखें बंद कर ली। जब उसे अपने पैरों के नीचे जमीन महसूस हुई तो उसने आंखें खोल दी। मरजान जिन्न सूंड उठाए उसके साथ खड़ा था।

"अच्छा अब मुझे इजाजत दो। शाह जिन्नात के दरबार में हाजिरी का वक्त हो गया है। अब बाकी का काम तुम्हें खुद करना होगा," मरजान जिन्न ने कहा।

"शुक्रिया मरजान, तुमने मेरी बेहद मदद की," अहमद ने जिन्न का शुक्रिया अदा किया और जिन्न गायब हो गया।

एंड उसी लम्हे वही बूढ़ी पुजारण घर से नमूदार [संगीत] हुई। नीले हाथी की सूंठ देखते ही उसने किलकारी मारी और कहा, "शुक्रिया अहमद लकड़हारे, मुझे मालूम है कि तुम साहिर के खात्मे के लिए निकले हो। मैं तुम्हें इंतहाई कीमती मनका इनाम में देती हूं। जब तुम यह मनका साहिर के जिस्म [संगीत] से लगाओगे तो उसका जादू का खात्मा हो जाएगा। और तुम अक्लमंदी इस्तेमाल करके उसका खात्मा कर सकते हो," बूढ़ी पुजारण ने कहा और इसके साथ ही उसने एक सुर्ख मनका अहमद की तरफ बढ़ा दिया।

अहमद ने मनका ले लिया और तिलिस्मी अंगूठी को वादी काफ में पहुंचाने का हुक्म देकर आंखें बंद कर ली।

मक्कार साहिर महल के कमरे में शराबन नोशी में मशरूफ था कि वो अचानक चौंक पड़ा। एक स्याह रंग का गोला सा जमीन से बरामद हुआ और उसने तेजी से खौफनाक रीच की शक्ल इख्तियार कर ली।

"हरीश, तुमने हमारे सुकून में क्यों खलल डाला है? तुम्हें जुर्रत कैसे हुई?" साहिर ने डरते हुए कहा।

"मेरे आका, एक खतरा तेजी से आपकी तरफ आ रहा है," हरीश ने गुर्राते हुए लेकिन कड़े अंदाज में जवाब दिया।

"कौन सा खतरा? जल्दी बताओ," साहिर ने चौंकते हुए पूछा।

"आं, उसे आईना-ए सामरी पर देख सकते हैं," हरीश ने जवाब दिया। इसके साथ ही वह गायब हो गया।

साहिर ने मुंह ही मुंह में कुछ पढ़कर दीवार पर फूंक मारी। तो दीवार का वो हिस्सा किसी आईने की तरह रोशन हो गया और दूसरे लम्हे साहिर बुरी तरह चौंक पड़ा। वादी में एक अजनबी नौजवान खड़ा था जो महल की तरफ आंखें उठाकर देख रहा था। फिर वह आहिस्ताआहिस्ता महल की तरफ बढ़ने लगा। [संगीत]

साहिर ने एक बार फिर मुंह ही मुंह में कुछ पढ़कर जमीन पर फूंक मारी तो जमीन से एक छोटी सी बोनी [संगीत] बरामद हुई।

"काला चिन्ह, यह बताओ कि यह नौजवान कौन है और यहां क्या करने आया है?" साहिर ने कहा।

"आका, यह एक लकड़हारा है। इसका नाम अहमद है। यह इंतहाई बहादुर, अकलमंद और दलेर [संगीत] आदमजाद है। यह शहजादी जुलेखा को आपकी कैद से छुड़ाने आया है," काला जिन्न ने जवाब दिया।

"मगर यह कैसे हमारा मुकाबला करेगा? एक आदमजाद किसी जिन्न का मुकाबला नहीं कर सकता," साहिर ने हैरत भरे लहजे में कहां।

"खा, इसके पास मरजान जिन्न की दी हुई अंगूठी और बूढ़ी पुजारण का दिया हुआ मन का है इसलिए यह आपको नुकसान पहुंचा सकता है। यह अंगूठियां और मन के हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। हम जिन्न होने के साथ-साथ जादूगर भी हैं। अलबत्ता तुम ऐसा करो, उसके हुक्म में शहजादी जुलेखा का रूप धार कर पहुंच जाओ। इतने में मैं इसका कोई ना कोई हल निकालता हूं," साहिर ने उसे हुक्म देते हुए कहा और काला झिन्न गायब हो गया।

जो ही अहमद को अपने पैरों के नीचे जमीन महसूस हुई, उसने आंखें खोल दी। वो एक वादी में खड़ा था जिसके चारों तरफ पहाड़ थे। वादी निहायत वसी और काफी खूबसूरत थी। दूर फासले पर एक बहुत बड़ा महल नजर आ रहा था। अहमद काफी देर तक तो आंखें फाड़ कर उस वादी को देखता रहा। फिर आहिस्ता-आहिस्ता वह महल की तरफ बढ़ने लगा। अचानक उसे अपने पीछे कुछ खटका महसूस हुआ। उसने पीछे देखने [संगीत] का इरादा किया। लेकिन फौरन ही उसे बुजुर्ग बाबा की नसीहत याद आ गई। जिन्होंने उसे समझाया था कि वह इधर-उधर ना देखे बल्कि सीधा महल की तरफ बढ़ता जाए। इसीलिए उसने सर को झटका और आगे की तरफ बढ़ने लगा।

अचानक उसे अपने अकब से शहजादी जुलेखा की लतीफ और मीठी आवाज सुनाई दी। "अहमद, इधर मेरी तरफ आओ।" आवाज में इस कदर कशिश थी कि ना चाहते हुए भी अहमद की निगाहें पीछे मुड़ गई। जहां शहजादी जुलेखा पहाड़ियों से नीचे उतर रही थी। लेकिन यूं लग रहा था गोया वो हवा में तैरते हुए नीचे उतर रही हो और अहमद सब कुछ भूलकर उसे [संगीत] देखने में मग्न हो गया।

एंड उसी लम्हे जोरदार चटा की आवाज आई और दूसरे ही लम्हे अहमद एक पिंजरे में कैद था। शहजादी जुलेखा किलकारी मारते हुए गायब हो गई और अहमद समझ गया कि उसे बाकायदा मंसूबे [संगीत] के तहत फसाया गया है। अब उसके सामने पिंजरे की रस्सी थामे साहिर खड़ा था। इंतहाई खौफनाक और बदसूरत जिसके चेहरे पर लंबीलंबी बदहयत मूछें थी। सर पर लंबे-लंबे बालों की छोटी थी। दो नुकीले दांत बाहर निकले हुए थे। कानों में सोने [संगीत] के बाले थे। जबकि हाथों और पैरों में सोने के कड़े थे। वो पांव से नंगा था। जबकि उसका पूरा जिस्म इंतहाई सुर्ख रंग का था। जैसे उसके जिस्म पर [संगीत] बाकायदा रोगन किया गया हो।

"हे आदमजाद बौना तो देखो। मक्खी से भी ज्यादा हकीर साबित हुआ," साहिर ने कहका [संगीत] लगाते हुए कहा और पिंजरे को घसीटने लगा।

अहमद के ज़हन में फौरन ही एक तरकीब आई। फिर जो ही पिंजरा [संगीत] साहिर के करीब हुआ, अहमद ने लिबास की जेब से मनका निकाला और पिंजरे से हाथ [संगीत] निकालकर उस मनके को साहिर के जिस्म से पूरी कवत से रगड़ दिया। साहिर को जोरदार झटका लगा और वो उछल कर दूर जा गिरा। इसके साथ ही पिंजरा गायब हो गया। अब वो जमीन पर आजाद खड़ा था। उसने इंतहाई फुर्ती से लिबास के अंदर छुपी हुई तलवार निकाल ली।

"हो यार आदमजाद बौने, तुमने मेरा जादू खत्म कर दिया लेकिन तुम मुझसे बच कर जाओगे कहां?" साहिर ने चीखते हुए कहा और इसके साथ ही वो अहमद [संगीत] पर झपट पड़ा लेकिन अहमद गौता लगाकर एक तरफ निकल गया। साहिर एक बार फिर झपटा और अहमद ने फिर से तलवार का वार कर दिया जिससे साहिर का एक हाथ कट कर दूर जा गिरा। उसने चिंघाड़ मारी और जुनूनी अंदाज में अहमद पर झपटा। इस मर्तबा अहमद को गौता लगाने का मौका ही ना मिला। साहिर जोन उसके सर पर पहुंच गया था। अहमद जल्दी से नीचे बैठ गया। साहिर तेजी से उस पर झुका। एंड उसी लम्हे अहमद ने तेजी से तलवार सीधी सर से ऊपर खड़ी कर ली और तलवार तेजी से साहिर के पेट में घुसती चली गई। उसने खौफनाक चिंघाड़ मारी और उसके पेट से खून फव्वारे की तरह उबलने लगा। मक्कार साहिर जो गुस्से से पागल हो चुका था वो पूरी शिद्दत से मुंह के बल गिर गया और तलवार जो अभी तक उसके पेट में घुसी हुई थी गिरने की वजह से उसके जिस्म को चीरते हुए पुश्त की तरफ से बाहर निकल आई। साहिर के मुंह से इतनी खौफनाक चिंघाड़ निकली कि उससे [संगीत] पूरी वादी लरज उठी। फिर अहमद ने उसे उठने का मौका ही ना दिया और बड़े-बड़े पत्थर उठा कर उसने साहिर के सर पर मारना शुरू कर दिए। चंद लम्हों में साहिर का सर फट गया। यहां तक कि साहिर साकित हो गया और उसकी रोती हुई आवाज आसमान में गूंजी।

"मैं जादूगर जो लाफहानी था, अहमद ने चालाकी से मेरा खात्मा कर दिया।"

इसके साथ ही एक बार फिर धमाका हुआ और साहिर का महल गायब हो गया। जब धूल छटी तो शहजादी जुलेखा [संगीत] वादी में खड़ी हैरत से पलकें झपक रही थी। अहमद को देखते ही वह बेतहाशा दौड़ती हुई उसके पास आ गई। और जब अहमद ने [संगीत] उसे सारे वाक्य की तफसील बताई तो वह बेहद खुश हुई। फिर अहमद ने शहजादी का हाथ थाम कर उसे आंखें बंद करने को कहा और हाथ में पहनी हुई अंगूठी को हुक्म दिया कि उन्हें शाही महल में पहुंचा दिया जाए।

चंद ही लम्हों बाद वो शाही महल के दरबार में मौजूद थे। पैरों तले जमीन महसूस होते ही दोनों ने आंखें खोल दी। जब बादशाह सलामत को उनकी आमद की खबर मिली तो वह दौड़ते हुए [संगीत] आए और अहमद को गले लगा लिया। पूरे मुल्क में अहमद की बहादुरी और अकलमंदी के चर्चे होने लगे।

अब बादशाह को अपने ऐलान के मुताबिक वादा पूरा करना था। चुनांचे शहजादी जुलेखा और अहमद की शादी कर दी गई। शहजादी जुलेखा और अहमद खुश थे। बेहद खुश। बादशाह सलामत क्योंकि बूढ़े हो चुके थे। इसलिए उन्होंने ताज और तख्त [संगीत] अहमद के हवाले कर दिया। लेकिन इस मुल्क का एक अजीब और गरीब कानून था कि अगर कभी शाही खानदान से बाहर का कोई मर्द हुकूमत संभाले तो वह उस वक्त तक ताज नहीं पहन सकता था। जब तक कि शाही खानदान की किसी औरत से शादी ना कर ले और उनके यहां औलाद पैदा ना हो। और जब शाही खानदान की औरत से उसकी औलाद पैदा [संगीत] होगी तो वो शाही खानदान का बाकायदा फर्द तसवुर किया जाएगा और शाही ताज भी पहन सकेगा। चुनांचे अहमद अब हुकूमत तो कर रहा था लेकिन अभी वो शाही ताज [संगीत] नहीं पहन सकता था। इसलिए वो मुल्क में बेताज शहजादा मशहूर हो गया।

फिर एक साल बाद अल्लाह ताला ने उन्हें एक खूबसूरत और चांद सा बेटा अता किया। चुनांचे अब शहजादा अहमद की बाकायदा ताजपशी की गई क्योंकि वह शाही खानदान का फर्द बन गया था। लेकिन वजीरजादी हमीदा बेगम [संगीत] अब भी उसे छेड़ने के लिए बेताज शहजादा ही कहती थी और इसी तरह खुशी-खुशी सब महल में रहने लगे।

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