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How was Planet Earth Born? | The 4.6 Billion Year History of our Solar System | Dhruv Rathee

Dhruv Rathee24:15

Transcription

नमस्कार दोस्तों! क्या आप इमेजिन कर सकते हो? यह धरती, जिस पर हम सभी इंसानों ने जन्म लिया [संगीत] है। यह धरती, जो घर है आंगनत प्रकार के जीवों [संगीत] का। यही धरती, आज से 400 करोड़ साल पहले एक उबलता हुआ लावे का गोला था। एक ऐसा गोला, जिस पर जिंदगी का कोई नामो-निशान तक नहीं था। ऐसे में, जाहिर सी बात है, सवाल उठता है—आखिर यह लावे का गोला हमारी आज की पृथ्वी में कैसे बदल गया? यह सारा पानी कहाँ से आया? हमारे चांद यानी मून की फॉर्मेशन कैसे हुई? इस सबका कनेक्शन है, दोस्तों, हमारे सूर्य और सोलर सिस्टम के जन्म से। आइए समझते हैं इन सभी चीजों को गहराई से, आज के इस वीडियो में [संगीत]।

आज से करीब 4.6 बिलियन इयर्स पहले, यानी 460 करोड़ साल पहले की बात है। हमारा सोलर सिस्टम एजिस्ट नहीं करता था। इसकी जगह था तो सिर्फ अंधकार, गहरी शांत और खाली स्पेस। इस स्पेस में घूम रहा था धूल और गैस से भरा हुआ एक बादल। इस बादल को हमने सोलर नेबुला का नाम दिया है। हिंदी में इसे निहारिका कहा जाता है। इसमें कई प्रकार की गैसेस मौजूद थीं, लेकिन मोस्टली हाइड्रोजन और हीलियम सबसे ज्यादा मात्रा में पाई जाती थीं। यह बादल शांति से करोड़ों-अरबों सालों से अंतरिक्ष के अंधेरे में घूम रहा था कि अचानक से एक दिन एक बड़ा धमाका होता है। नहीं, मैं बिग बैंग की बात नहीं कर रहा हूँ; मैं बात कर रहा हूँ सुपरनोवा की। यह धमाका इस बादल के अंदर नहीं होता, बल्कि इसके बगल में होता है। इसके पास मौजूद एक डाइंग स्टार एक्सप्लोड्स। इस ब्लो को हम सुपरनोवा बुलाते हैं, और अक्सर यह उन स्टार्स के साथ होता है जो अपनी लाइफ के एंड तक पहुँच चुके हैं। इस धमाके की शॉक वेव्स हमारे सोलर नेबुला पर पड़ती हैं, और इसके चलते ग्रेविटेशनल इंस्टेबिलिटी आ जाती है। इस बादल के कुछ एरियाज में गैस और डस्ट कंप्रेस करने लगता है। धीरे-धीरे यह पूरा नेबुला अंदर की ओर सिकुड़ने लगता है, और जो गैस और धूल थी, वो घूमने लग जाती है—गोल-गोल घूमने लग जाती है, एक रोटेटिंग डिस्क के रूप में। इस फ्लैट रोटेटिंग डिस्क को हम प्रोटो-प्लेनेटरी डिस्क का नाम देते हैं। प्रोटो का मतलब है—पहले, प्लेनेट के आने से पहले की डिस्क। स्क्रीन पर दिखाए गए इस एनिमेशन में आप देख सकते-सकते हैं कि यह डिस्क कैसी दिखती होगी। क्योंकि यह डिस्क चपटी हुई है, फ्लैट है, इससे हमें यह भी समझ में आता है कि हमारा सोलर सिस्टम एक फ्लैट सोलर सिस्टम क्यों है। इसकी बात मैंने पिछले वाले वीडियो में करी थी। हमारे सोलर सिस्टम के सारे प्लेनेट, जब सूरज के अराउंड गोल-गोल चक्कर लगाते हैं, वो ऑलमोस्ट एक ही प्लेन में रहते हैं। ऐसा नहीं है कि किसी प्लेनेट का ऑर्बिट ज्यादा ऊपर-नीचे हो एक दूसरे से।

अब इस प्रोटो-प्लेनेटरी डिस्क के बीचो-बीच प्रेशर और टेंपरेचर दोनों बढ़ते रहते हैं, जिसके चलते एक प्रोटोस्टार का जन्म होता है। प्रोटोस्टार यानी फिर से वही मतलब—कि स्टार के बनने से पहले जो चीज एजिस्ट करती थी। अब धीरे-धीरे यहाँ पर नेबुला का सारा मटेरियल बीच की ओर खींचा जाता गया। बढ़ती गर्मी और दबाव के कारण, पर एक पॉइंट ऑफ़ टाइम पर जाकर यह इतना ज्यादा कंसंट्रेटेड हो गया बीच में कि न्यूक्लियर फ्यूजन का रिएक्शन होने लगा। हाइड्रोजन गैस का फ्यूजन रिएक्शन है, जो लगभग 15 मिलियन डिग्री सेल्सियस पर होता है। इस रिएक्शन में हाइड्रोजन हीलियम में बदल जाता है। इसी फ्यूजन रिएक्शन की वजह से हमारे सूरज का जन्म होता है, और यही वो रिएक्शन है जो आज के दिन तक भी सूरज में हो रहा है, जिसकी वजह से धूप, गर्मी और रोशनी हमें मिलती है धरती पर। एक्चुअल रिएक्शन डिटेल में थोड़ा कॉम्प्लेक्टेड है। हीलियम में बदल रही है। उस वक्त, 4.6 बिलियन इयर्स पहले, हमारे सोलर नेबुला का ज्यादातर गैस और डस्ट सारा सूरज में जाकर इकट्ठा हो रहा था। यही कारण है कि आज के दिन भी हमारे पूरे सोलर सिस्टम का टोटल मास का लगभग 99.8% सिर्फ सूरज में मौजूद है। और बाकी जो 0.2% है, वो बेकार नहीं गया। उसी 0.2% से बनते हैं आठ प्लेनेट, सैकड़ों मून, हजारों कॉमेट्स और लाखों एस्टेरॉइड्स हमारे सोलर सिस्टम में। लेकिन सवाल यह है कि कैसे बनने शुरू हुए ये प्लेनेट? यह चीज भी बड़ी इंटरेस्टिंग है। जो वो घूमती हुई प्रोटो-प्लेनेटरी डिस्क थी, उसके अंदर छोटे-छोटे धूल के पार्टिकल्स आपस में टकराने लगे और चिपकने लगे एक दूसरे से। यह स्टैटिक या केमिकल बॉन्डिंग फोर्सेस की वजह से होने लगा। और शुरू में इससे छोटे-छोटे गुच्छे बनने लगे। लाखों सालों बाद, धीरे-धीरे गुच्छे और बड़े होने लगे, जब और धूल के पार्टिकल्स इनसे जाकर टकराए। धीरे-धीरे इनमें से कुछ इतने बड़े बन गए कि उनका साइज 1000 मीटर से लेकर कुछ किलोमीटर तक पहुँच गया। इन चीजों को हम प्लेनेट डेसिमल्स करके पुकारते हैं, यानी कि प्लेनेट का बहुत छोटा टाइनी वर्जन। जब ये प्लेनेट डेसिमल्स ग्रेविटी के प्रभाव से इकट्ठे होने लगे और साइज और मास में लगभग हमारे चांद जितने बड़े हो गए, तो हम इन्हें प्रोटोप्लैनेट करके पुकारने लगे। यह जो पूरे इकट्ठे होने का प्रोसेस है, इसे हम एक्रीशन कहते हैं। एस्ट्रोनॉमी की फील्ड में एक्रीशन की डेफिनेशन देखो: द कमिंग टुगेदर एंड कोहेसन ऑफ़ मैटर अंडर द इन्फ्लुएंस ऑफ़ ग्रेविटेशन टू फॉर्म लार्जर बॉडीज। मैटेरियल्स के एक्यूमुलेशन से लार्जर बॉडीज का निर्माण होना। एक्रीशन के इस प्रोसेस को सोवियत यूनियन के एस्ट्रोनॉमर विक्टर साफरान ने साल 1969 में पहली बार दुनिया के सामने रखा था। लेकिन शुरुआत में उनको किसी ने सीरियसली नहीं लिया। यह सिर्फ 1984 में जाकर ही था कि जब साफरान के काम को पढ़ा जाने लगा और उनके आइडियाज को साइंटिफिक कम्युनिटी द्वारा अपनाया जाने लगा। आज के दिन एक्रीशन का यह प्रोसेस साइंटिस्ट पूरे ब्रह्मांड में बार-बार देख चुके हैं होते हुए। टेलीस्कोप्स के जरिए एस्ट्रोनॉमर्स ने यह चीज होते हुए देखी है कि धूल के पार्टिकल्स काफी तेजी से इकट्ठे हो जाते हैं और सिर्फ चंद हजार सालों में यह 1 सेंटीमीटर तक के पार्टिकल्स बन जाते हैं। क्योंकि यह अलग-अलग स्टेजेस में होता हुआ देखा गया, इसलिए साइंटिस्ट अब सेफली कह सकते हैं: लाखों सालों बाद यही छोटे-छोटे पार्टिकल्स और बड़े होते रहते हैं और बाद में प्लेनेट बन जाते हैं। इसी प्रोसेस का एक और सबूत हमें मेटियोराइट्स में भी देखने को मिलता है। जो-जो मेटियोर्स धरती पर आकर गिरते हैं, साइंटिस्ट जब उन्हें स्टडी करते हैं और देखते हैं कि उनके अंदर कौन-कौन से मैटेरियल्स मौजूद हैं, तो एक चीज जो काफी पाई गई है मेटियोराइट्स में, वो है कोंड्रूल्स—धूल और चट्टान के छोटे-छोटे टुकड़े हैं, जो प्लेनेट बनने से पहले के समय से बचे हुए हैं। इनके अंदर यूरेनियम और हफनियम जैसे रेडियोएक्टिव एलिमेंट्स बंद होते हैं, जो साइंटिस्ट को उनकी उम्र पता करने में मदद करते हैं। वैसे एक इंटरेस्टिंग फैक्ट यहाँ पर यह भी है कि हमारी पृथ्वी पर पाया जाने वाला यूरेनियम हमारे सोलर सिस्टम से भी पुराना है। इसे 6 बिलियन इयर्स पुराना माना जाता है। इसका मतलब यह किसी सुपरनोवा में बना था। यही सारा मेज़रमेंट्स का डेटा कलेक्ट करके, धूल और प्लेनेट डेसिमल्स के कोलिज़न्स के कुछ सिमुलेशन्स साइंटिस्ट बना पाते हैं, और उन सिमुलेशन से हम एस्टिमेट करते हैं: बनने में टेंस ऑफ़ मिलियंस ऑफ़ इयर्स का समय लगा होगा।

अब हमारी धरती की बात करें, तो ये जो छोटे प्रोटो-प्लेनेट और प्लेनेट डेसिमल्स थे, इनके बीच अक्सर टकराव होते रहते थे, और ये टकराव कोई छोटे नहीं थे। बहुत जबरदस्त एनर्जी निकलती थी इनमें। इतनी गर्मी पैदा होती थी कि चट्टानें पिघल जाती थीं, और इनके ऊपर लावा के समुद्र बन जाते थे। जैसे-जैसे ये प्रोटो-प्लेनेट एक दूसरे से टकराते गए, इनका साइज बढ़ता गया। ग्रेविटी के कारण इन्होंने ओवर टाइम एक गोले की शेप लेनी शुरू कर दी—एक स्फेरिकल शेप। और ऐसे ही कुछ टकराव के बाद जन्म हुआ हमारी धरती का। ओवर मिलियंस ऑफ़ इयर्स, ग्रेविटी पुल रॉक्स टुगेदर टू फॉर्म द अर्थ, वन ऑफ़ एटलीस्ट 100 प्लेनेट्स सर्कलिंग द सन। यह जो समय था, जहाँ पर कांस्टेंटली बमबारी चलती रहती थी। हमारी धरती से आकर छोटे प्रोटो-प्लेनेट्स टकराते, तो कभी प्लेनेट डेसिमल्स टकराते। इस समय को हम हेडियन इऑन करके पुकारते हैं। इऑन शब्द का असली में मतलब है एक बहुत-बहुत इंडेफिनिटली लंबा समय, और हेडियन जो नाम है, यह अंडरवर्ल्ड के ग्रीक गॉड हेडीज़ से आया है। इस नाम को रखने के पीछे क्या कारण था? आप समझ सकते हो—उस वक्त नर्क जैसी हालत थी धरती पर। यह समय 4.6 बिलियन इयर्स पहले से लेकर 4 बिलियन इयर्स पहले तक चला। इस समय कुछ-कुछ ऑब्जेक्ट्स जो धरती से टकराए, वो 100 किलोमीटर बड़े थे, कुछ 200 किलोमीटर बड़े थे। तो जो भी चट्टानें उस वक्त धरती पर हुआ करती होंगी, वो सब पिघल जाती थीं और सब की सब लावा में बदलती रहती थीं—बार-बार। लेकिन अब कमाल की बात देखो दोस्तों! यही नर्क जैसा समय कारण था, जिसकी वजह से धरती पर पानी आया। कुछ कॉमेट्स और एस्टेरॉइड्स जो धरती से टकरा आते थे, उनमें काफी ज्यादा मात्रा मौजूद होती थी पानी की। अब आप पूछोगे: लेकिन उन एस्टेरॉइड्स और कॉमेट्स में पानी कहाँ से आया? इसके पीछे कारण है, दोस्तों, सोलर नेबुला—वो धूल का बना जो वो बादल था, जिसकी मैंने शुरू में बात करी थी। उसमें कुछ आइस क्रिस्टल्स भी होते थे और कुछ पानी। एक्चुअली में धरती पर खुद भी मौजूद था। जब इस इऑन युग से संबंधित माइक्रोस्कोपिक क्रिस्टल्स के भीतर फंसे हुए मिनरल्स की एनालिसिस करी, तो पता चला कि पृथ्वी पर भी लिक्विड वाटर मौजूद था। लेकिन ज्यादातर जो पानी की मात्रा बढ़ रही थी, उसके पीछे एक बड़ा कारण था: ये जो एस्टेरॉइड्स और कॉमेट्स धरती से आकर टकरा रहे थे। इसके अलावा एक दूसरा प्रोसेस भी हो रहा था। जब ये कोलिज़न्स होती थीं धरती के साथ, तो पानी भाप बनकर हवा में चला जाता था और समय-समय पर बरसने लगता था वापस धरती पर। इस हेडियन युग के खत्म होने तक हमारी पृथ्वी एक होमोजीनस बॉल बन चुकी थी। चारों तरफ मैग्मा ही मैग्मा था। लगभग एक समान रूप की लावा की लेयर बन गई थी धरती के चारों ओर। इसे ग्रेविटी ने साथ में बांधकर रखा था। और इसके बाद शुरू हुआ सिलसिला डिफरेंशिएशन का।

कि हमें यह कैसे पता चला कि उस समय पर सही में यह सब हुआ था? इसके पीछे कई सारी टेक्निक्स हैं, दोस्तों। एक है पुराने पत्थरों की रेडियोमेट्रिक डेटिंग करना, स्टडी करना; बिलियंस ऑफ़ साल पुरानी मिनरल्स को और देखना कि उनका कंपोज़िशन कैसा है। एक टेक्नीक है कंपैरेटिव प्लेनेटरी सिमुलेशन्स रन करना। जो गैसेस और एलिमेंट्स उस समय में मौजूद थे, उन सबका डेटा कंप्यूटर में इनपुट करना और मॉडल के थ्रू रन करके देखना कि वो मॉडल कैसे बिहेव करता है। कुछ इसी तरीके से हम डेटा साइंस की मदद से अपने प्लेनेट की हिस्ट्री बेहतर समझ पाए हैं। इसका इस्तेमाल ऑलमोस्ट हर एक इंडस्ट्री में किया जाता है: ऑटोमोबाइल, फाइनेंस, मीडिया, हेल्थ केयर। अगर आप अपने आप को इसमें अप-स्किल करना चाहते हो और इस डायनेमिक फील्ड में एंटर करना चाहते हो, तो आज के वीडियो के स्पॉन्सर्स scaler.com एक सलूशन ऑफर करते हैं। स्केलर एक ऑनलाइन टेक लर्निंग प्लेटफॉर्म है जो प्रोग्राम्स प्रोवाइड करता है सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग में। टॉप टेक कंपनीज के इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स यहाँ पर लर्नर्स को मेंटर करते हैं। स्केलर ने अब तक 15,000 लर्नर्स के करियर ट्रांसफॉर्मेशन में हेल्प की है, और आप उन स्टूडेंट्स की सक्सेस स्टोरीज़ इस सेक्शन में देख सकते हो। और 100 से भी ज्यादा कैपस्टोन प्रोजेक्ट्स का एक्सेस मिलता है, जो आपको इंडस्ट्री रेडी बनाने में हेल्प करेंगे। स्केलर ने Google सहित 200 से ज्यादा कंपनीज के साथ प्लेसमेंट पार्टनरशिप की है, जिसके थ्रू वो अपने लर्नर्स को प्लेसमेंट असिस्ट प्रोवाइड करते हैं। इनका एक ईज़ी ईएमआई ऑप्शन भी है, 2 साल के लिए 0% इंटरेस्ट के साथ। तो अगर आपको लगता है कि स्केलर आपके करियर को बूस्ट करने में आपकी मदद कर सकता है, तो इनकी वेबसाइट का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा। उसी लिंक का इस्तेमाल करके आप एक फ्री लाइव मास्टर क्लास के लिए साइन अप कर सकते हैं, जिसमें मल्टीपल टॉपिक्स पर मास्टर क्लासेस ऑर्गेनाइज होती हैं, और खुद ही से उसे ही उसकी वैल्यू जज कर सकते हैं।

अब अपने टॉपिक पर वापस आते हैं। आज के दिन हम सब जानते हैं कि मेनली तीन लेयर्स हैं धरती की: क्रस्ट, मेंटल और कोर। अब हेडियन इऑन के एंड तक आते-आते अर्थ का जो क्रस्ट था, वो ऑलरेडी बनना शुरू हो चुका था। लेकिन सही मायनों में जो तीन लेयर का सेपरेशन है, यह इसके अगले काल में ही देखने को मिलता है: द आर्कियन इऑन। आर्क शब्द आता है ग्रीक वर्ड अर्खे से, जिसका मतलब होता है बिगिनिंग। तो इस युग से बेसिकली हम कंसीडर करते हैं कि सही मायनों में धरती का जन्म होना शुरू हुआ। यह समय 4 बिलियन इयर्स पहले से लेकर 2.5 बिलियन इयर्स पहले तक चला। इस समय में हुआ क्या? कि धरती जो एक लावे के गोले की तरह थी, इसमें अलग-अलग एलिमेंट्स मौजूद थे। जो भारी एलिमेंट्स थे, जैसे कि आयरन और निकल, जो बाकी एलिमेंट्स के कंपैरिजन में ज्यादा डेंस थे, वो धीरे-धीरे इस मैग्मा के अंदर फ्लो करके धरती के सेंटर की ओर खींचने लगे। ठीक उसी तरीके से जैसे पानी रेत में से अपना रास्ता बनाता है। इसके पीछे सिंपल कारण था ग्रेविटेशन का फोर्स। जो भारी एलिमेंट्स हैं—आयरन और निकल—वो सेंटर की तरफ खींचते गए, और जो हल्के एलिमेंट्स हैं, वो धीरे-धीरे बहकर ऊपर की तरफ आते गए, जैसे कि सिलिकॉन, ऑक्सीजन, एलुमिनियम, सोडियम, पोटेशियम। यह अलग-अलग एलिमेंट्स का ऊपर और नीचे जाना समय के साथ-साथ बहुत ज्यादा बढ़ता गया, और धीरे-धीरे धरती के सेंटर में धरती का कोर बनने लगा। जब ये आयरन और निकल इकट्ठे फ्यूज होने लगे। हम सब जानते हैं कि धरती का कोर सबसे गर्म कंपोनेंट है धरती का। यहाँ का तापमान 6000 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है। आमतौर पर जो आयरन है, लोहा है, वो इस टेंपरेचर पर मेल्ट हो जाना चाहिए। लेकिन धरती के सेंटर में प्रेशर इतना ज्यादा होता है कि वो इस टेंपरेचर पर मेल्ट नहीं होता, बल्कि आयरन और निकल सॉलिड फॉर्म में धरती के कोर में मौजूद है, आज के दिन भी ऐसा ही है। और यह टेंपरेचर इतना ज्यादा होने के पीछे कारण सिर्फ ज्यादा प्रेशर और ग्रेविटेशनल फोर्स नहीं है; एक और कारण है मेंटल लेयर में हो रहा कांस्टेंट रेडियोएक्टिव डीके। यूरेनियम, थोरियम और पोटेशियम जैसे एलिमेंट्स मेंटल की लेयर में मौजूद हैं, जिनका कांस्टेंटली रेडियोएक्टिव डीके हो रहा है, और यह पृथ्वी की गर्मी का एक बड़ा मेन सोर्स है। मेंटल जो है, यह सबसे मोटी लेयर है—3000 किमी से ज्यादा मोटी है। आज के दिन यह लेयर सॉलिड है, लेकिन उस समय यह लेयर सॉलिड नहीं होती थी; यहाँ मैग्मा होता था। यहाँ हल्के एलिमेंट्स जब धीरे-धीरे ऊपर आ रहे थे, तो उनके ठंडे होने से इसके ऊपर की लेयर—क्रस्ट की फॉर्मेशन होने लगी। ऑक्सीजन का एलिमेंट इस क्रस्ट में सबसे ज्यादा एबंडेंट एलिमेंट था। क्रस्ट का जो मास था, 46% सिर्फ ऑक्सीजन से ही बनता था। अब यहाँ पर अगर इन एलिमेंट्स की डिटेल में जाएँ, तो बहुत लंबी डिस्कशन करी जा सकती है। जो अलग-अलग प्रकार के पत्थर आज के दिन क्रस्ट पर पाए जाते हैं—ग्रेनाइट, बेसाल्ट—क्रस्ट की गहरी लेयर्स में पाई जाने वाली मेटामॉर्फिक रॉक्स में एक कट ट्रांज़िशन दिखता है। जैसे-जैसे आप धीरे-धीरे मेंटल से ऊपर आते रहते हो क्रस्ट की ओर। क्योंकि मार्बल और स्लेट जैसे पत्थर जो होते हैं, ये बहुत हाई प्रेशर और टेंपरेचर के प्रभाव से बनते हैं, इसलिए ये क्रस्ट की गहरी लेयर्स में ही पाए जाते हैं। और अगर इन पर और भी ज्यादा हीट और प्रेशर लगाया जाए, तो ये फिर से मैग्मा में बदल जाते हैं। इसके अलावा ऊपरी लेयर्स में सेडिमेंट्री रॉक्स होती हैं, जैसे कि सैंडस्टोन। ये वो पत्थर जो वेदरिंग की वजह से कांस्टेंटली टूटते रहे और नए बनते रहे। जब इन पर धूप, हवा, पानी और बर्फ पड़ी। कोयले को भी यहाँ पर एक सेडिमेंट्री रॉक कंसीडर किया जाता है। एक ऐसी सेडिमेंट्री रॉक का उदाहरण है यह, जिस पर दोनों केमिकल और फिजिकल रिएक्शन्स देखने को मिले। तो कुल मिलाकर बात यही है कि लाखों-करोड़ों सालों तक यह डिफरेंशिएशन, अलग-अलग लेयर्स बनती रही। हम छोटी क्लासेस में अक्सर बच्चों को पढ़ाते हैं कि ये डिफरेंशिएशन कोर की है। लेकिन एक्चुअली में इसमें बहुत सारी डिफरेंशिएशन के बाद, अगर आप कभी जियोलॉजी को डिटेल में जाकर पढ़ोगे, तो आपको पता लगेगा कि एक्चुअली तीन नहीं, बल्कि पाँच और लेयर्स में इन्हें बाँटा जाता है। इनकी फिजिकल प्रॉपर्टीज़ को देखकर। ये लेयर्स हैं: लिथोस्फीयर, एस्थेनोस्फीयर, आउटर कोर और इनर कोर। लिथोस्फीयर सबसे ऊपर की लेयर है। इसे खुद दो हिस्सों में बाँटा जाता है: ओशनिक और कॉन्टिनेंटल। जो क्रस्ट ओशन्स के ऊपर मौजूद है और जो क्रस्ट कॉन्टिनेंट्स पर मौजूद है। इनमें भी अपने आप में बहुत बड़ा फर्क है। समुद्रों पर जो क्रस्ट की लेयर है, वो काफी पतली है—एवरेज मोटाई लगभग 100 किमी की है। लेकिन कॉन्टिनेंट्स पर मौजूद जो क्रस्ट की लेयर है, वो 280 किमी तक हो सकती है। यहीं पर हम बात करते हैं टेक्टोनिक प्लेट्स की। क्योंकि यह जो लेयर है, यह कंटीन्यूअस नहीं होती, बल्कि कई हिस्सों में टूटी हुई होती है। इन प्लेट्स की बाउंड्रीज़ जहाँ एक दूसरे से मिलती हैं, वहाँ पर वोल्केनो देखने को मिलते हैं। जब ये एक दूसरे से रब करती हैं, तब अर्थक्वेक्स आते हैं। इसके नीचे जो एस्थेनोस्फीयर की लेयर है, वो रिजिड नहीं है; वो कांस्टेंटली मूव करती रहती है। एक लुब्रिकेंट की तरह बनती है। एस्थेनोस्फीयर लेयर अनलाइक लिथोस्फीयर कंटीन्यूअस है; इसमें कोई टुकड़े नहीं हैं। एवरेज मोटाई लगभग 140 किमी की। इसके नीचे आते-आते लोअर मेंटल के ऊपरी भाग में एक ट्रांज़िशन ज़ोन देखने को मिलती है, जहाँ चट्टानें अधिक से अधिक डेंस हो जाती हैं। ऐसी चट्टानों के कुछ उदाहरण देखिए: ओलिवाइन, पेरिडोट, रिंगवुडाइट। ये हाई प्रेशर मिनरल्स मेंटल के अंदर बनते हैं, और जैसा आप देख सकते हो, दिख में बहुत ही सुंदर लगते हैं। आप सोचोगे: अगर ये मिनरल्स मेंटल के अंदर मिलते हैं, तो हम बाहर निकालकर इन्हें कैसे देख पाते हैं? एक्चुअली में हम इन्हें बाहर नहीं निकालते; नेचर धरती बाहर निकालती है। कई बार ऐसी वोल्केनिक इरप्शन्स होती हैं, जहाँ पर वोल्केनो से निकलने वाला मैग्मा मेंटल से आता है और अपने साथ यह हाई प्रेशर मिनरल्स लेकर आता है। दूसरा, कई बार क्या होता है? जब मेटियोराइट्स धरती पर आकर टकराते हैं, तो वो इतनी स्पीड से उनका टकराव होता [संगीत] है कि उस प्रेशर से भी ये मिनरल्स कई बार बन जाते हैं।

अब इससे अंदर कोर की लेयर पर आएँ, तो वहाँ जो आउटर कोर की लेयर है, वहाँ गर्मी के कारण आयरन चर्न करता रहता है, जिसकी वजह से इलेक्ट्रिकल करंट पैदा होते हैं। क्योंकि हम सब जानते हैं, लोहा बहुत ही अच्छा कंडक्टर है इलेक्ट्रिसिटी का। और इन इलेक्ट्रिक करंट से अपनी एक मैग्नेटिक फील्ड बनती है। यह मैग्नेटिक फील्ड एक बहुत बड़ा कारण है, जिसकी वजह से धरती पर लाइफ सस्टेन कर पाती है। क्योंकि इसी मैग्नेटिक फील्ड की वजह से सूरज से आने वाले बहुत ही हानिकारक चार्ज्ड पार्टिकल्स हम पर नहीं गिर पाते। सोलर विंड से हमें प्रोटेक्शन मिलती है, और एक एटमॉस्फेयर बनी रह पाती है। आउटर कोर और इनर कोर की लेयर में सबसे बड़ा डिफरेंस यही है कि आउटर कोर जो है वो लिक्विड है, और इनर कोर सॉलिड है। लेकिन यहाँ एक इंटरेस्टिंग फैक्ट है: जैसे-जैसे आउटर कोर का लिक्विड ठंडा हो रहा है, वो धीरे-धीरे सॉलिड में कन्वर्ट हो रहा है, और इनर कोर की लेयर इसी कारण से हर साल लगभग 1 मिलीमीटर बढ़ती रहती है।

अब इस पूरी कहानी में एक सवाल यह आता है कि चांद कहाँ से आ गया? धरती ने तो जन्म ले लिया, लेकिन मून कहाँ से आया धरती के पास? इसका जवाब भी, दोस्तों, हेडियन इऑन में ही छुपा है। साइंटिस्ट ने कई थ्योरी सोची थीं कि क्या कारण हो सकता है चांद होने के पीछे। एक थी कैप्चर थ्योरी—कि यह एक ऐसा प्लेनेटरी ऑब्जेक्ट था जो धरती के नज़दीक आया और धरती के ग्रेविटेशनल फोर्स ने इसे कैप्चर कर लिया। इसे कैप्चर थ्योरी कहते हैं। दूसरी एक थ्योरी है को-फॉर्मेशन थ्योरी—कि चांद और पृथ्वी एक ही साथ फॉर्म हुए थे। जब धरती की फॉर्मेशन हो रही थी, अलग-अलग डस्ट पार्टिकल्स इकट्ठे हो रहे थे, तो चांद भी वहीं पर फॉर्म हो रहा था। तीसरी है एक फिज़न थ्योरी—कि धरती से ही टूटकर एक हिस्सा चांद बन गया। लेकिन असलियत पता है क्या? इनमें से कोई भी थ्योरी सच नहीं थी। आज के दिन ज्यादातर साइंटिस्ट का मानना है कि धरती से एक और प्लेनेट आकर टकराया था, और इस टकराव की वजह से चांद की फॉर्मेशन हुई थी। इसे कहा जाता है जाइंट इम्पैक्ट हाइपोथेसिस। इसके अनुसार, लगभग 4.5 बिलियन इयर्स पहले, जब अर्थ की फॉर्मेशन हो ही रही थी, तब एक और प्रोटो-प्लेनेट एजिस्ट करता था। उसका नाम हमने रखा है थिया। यह करीब मार्स के साइज़ का प्लेनेट था। सोलर सिस्टम फॉर्म होने के करीब 100 मिलियन साल बाद यह प्लेनेट आकर धरती से टकरा जाता है। इस वक्त धरती सिर्फ एक लावा की गेंद थी; यह वाला प्लेनेट भी वही था। तो इस टकराव से होता क्या है? दोनों प्लेनेट का कोर एक दूसरे में अब्ज़ॉर्ब हो जाता है। इसी बीच एक बड़ा टुकड़ा टूटकर बाहर निकल जाता है, जो चांद बनता है। अर्थ का जो टोटल मास है, उसका करीब 30% मास हमारे आयरन रिच कोर का है। लेकिन मून के केस में यह सिर्फ 1.6% टू 1.8% ही है। इसका मतलब यह है कि ज्यादातर जो मेटल्स थे उस दूसरे प्लेनेट में, वो एक्चुअली में आज धरती पर ही मिल गए हैं, और धरती का ही हिस्सा बन गए हैं। और चांद जो है, वो इस टकराव के मलबे से निकला है। यहाँ भी आप सोचोगे: लेकिन यह सब हमें पता कैसे चल पाया? असल में बात क्या है? कि जब पहली बार नासा ने अपोलो मिशन्स भेजे थे मून पर, तो वो अपने साथ बहुत सारी चांद की मिट्टी लेकर आए। चांद के मेंटल से जो सैंपल्स मिले, बेसाल्ट रॉक्स के, वो धरती पर पाए जाने वाली बेसाल्ट रॉक्स से काफी सिमिलर थे। चांद पर पाए जाने वाले पत्थरों में जो ऑक्सीजन आइसोटोप और बाकी एलिमेंट्स थे, वो पृथ्वी की चट्टानों में मिल रहे ऑक्सीजन और बाकी एलिमेंट्स से भी बहुत मिलते-जुलते थे। तो इस पर्सपेक्टिव से देखा जाए, वो जो तीन रिजेक्टेड थ्योरी थीं, उनमें फिज़न थ्योरी सबसे करीब पहुँची थी। चांद असल में धरती का ही हिस्सा था, लेकिन ऐसा नहीं था कि धरती अपने आप ही अचानक से एक दिन टूट गई और चांद निकल गया हो। धरती का हिस्सा तभी टूटा जब एक और प्लेनेट इससे आकर बहुत ही भयानक तरीके से टकराया। स्क्रीन पर आप देख सकते हैं इसी चीज का नासा के सुपर कंप्यूटर द्वारा बनाया गया एक सिमुलेशन। लेकिन कमाल की बात पता है क्या है? अगर यह टकराव नहीं होता, तो आज हम यहाँ जिंदा भी नहीं होते। क्योंकि इसी टकराव की वजह से धरती के एक्सिस पर एक बहुत बड़ा गहरा प्रभाव पड़ा। हमें 23.5 डिग्री का रोटेशनल टिल्ट देखने को मिला। इसकी वजह से, बिना इस रोटेशनल टिल्ट के, हमें गर्मी से सर्दियाँ, सर्दी से गर्मियाँ—ये सीज़न्स ही नहीं देखने को मिलते। क्लाइमेटिक वेरिएशन्स इतनी ज्यादा हो जातीं कि लाइफ को अडेप्ट कर पाना बहुत मुश्किल होता। दूसरा, बिना चांद के हमें टाइड्स नहीं देखने को मिलते—लो टाइड, हाई टाइड। ये जो वेरिएशन्स आती हैं, इन्हीं वेरिएशन्स की वजह से लिविंग ऑर्गेनिज़्म्स, मसलन पानी से, जमीन पर आ पाए।

अब धरती पर और आर्कियन इऑन में वापस आएँ, तो कई और चीजें ऐसी हुईं जिसकी वजह से लाइफ को शुरू होने का मौका मिल पाया। तीन मेन लेयर्स की सेपरेशन के बाद स्टेबिलिटी बढ़ने लगी। वोल्केनिक एक्टिविटी देखने को मिली—ज्वालामुखी फटे, जिसमें बड़ी मात्रा में वाटर वेपर, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और अमोनिया जैसी गैसेस ऊपर हवा में गईं। ये वास्तव में गैसेस का बहुत ही खराब मिश्रण है, क्योंकि इसमें ऑक्सीजन की बहुत कमी है। लेकिन समय के साथ-साथ, जैसे-जैसे पृथ्वी धीरे-धीरे ठंडी होती गई, वाटर वेपर ने कंडेंस करना शुरू कर दिया। यह कंडेंस्ड वाटर वेपर पृथ्वी पर बारिश के रूप में बरसने लगा, और लाखों-करोड़ों साल बाद जाकर हमें सरफेस पर विशाल महासागर देखने को मिले। ओशन्स के बनने के पीछे एक और कारण मैं आपको पहले ही वीडियो में बता चुका हूँ—कांस्टेंटली एस्टेरॉइड्स और कॉमेट्स का जो इम्पैक्ट हो रहा था,

यही कारण है कि आज तक हम कभी किसी एलियन लाइफ को नहीं ढूंढ पाए। स्केलर का लिंक नीचे डिस्क्रिप्शन में मिल जाएगा।

अगर यह वीडियो पसंद आया दोस्तों तो यह वाला भी जरूर पसंद आएगा जिसमें मैंने बात करी है धरती पर एवोल्यूशन की। आखिर इंसानों का एवोल्यूशन कैसे हुआ हम कौन से जानवरों से निकल कर आए? यहां क्लिक करके देख सकते हैं।

बहुत-बहुत धन्यवाद [संगीत]