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Badshah Aur 2 Darvesho Ka Anokha Qissa || Moral Stories in Urdu & Hindi

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एक था खलीफा हारून रशीद का द्वार। जब बगदाद की गलियों में रात के साए छाए होते तो खलीफा का आदत थी कि कभी-कभी भेष बदलकर शहर में घूमते फिरते। मकसद यह होता कि पता चले कि शहरियों का क्या हाल है। खुश हैं या नाख?

एक मर्तबा किसी जगह उनकी मुलाकात दो कलंदरों से हुई और उनकी बाई आंख फूटी हुई थी। खलीफा को यह देखकर हिरत हुई और उन्होंने पूछा क्या वजह है कि तुम्हारी बाई आंख ही जाया हुई है? उन्होंने अपना-अपना हाल कुछ इस तरह सुनाया।

पहले कलंदर ने अपनी दास्तान यूं शुरू की। मैं एक सुल्तान का बेटा हूं। बाप ने मेरी तालीम पर बड़ी तवज्जो दी। हर किस्म के इल्म में मुझे कमाल हासिल हो गया। मेरी खुशखसती देखकर लोग दंग रह जाते थे। मैं बहुत से मलिक में मशहूर हुआ। कई सुल्तान ऐसे थे जिनके दरबारों में मेरा जिक्र रहता था। जब शाम के एक बादशाह ने मेरी तारीफ सुनी तो मुझसे मिलने की ख्वाहिश जाहिर की। बहुत से कीमती तोहफे मेरे बाप को भेजे। मेरे बाप ने भी छह बड़ी-बड़ी कश्तियों पर एक से एक कीमती सामान लादकर मुंह से कहा, शाम चले जाओ फला बादशाह से मिलो और अपनी तरफ से यह तोहफे उन्हें पेश करो।

हमने समंदर पार किया। साहिल पर पहुंचकर कश्तियों से सामान उतारा और उसे ऊंटों पर लादकर बादशाह के ममलक की तरफ रवाना हुए। हम वीराने में चले जा रहे थे कि एक तरफ से बड़ी गर्द उठती हुई दिखाई दी। फिर उस गर्द में से 50 घुड़सवार जो बड़े मंदे और पूरी तरह मुसल्लह थे नुमाया हुए। हम समझ गए कि वे डाकू हैं। हमने उन्हें बताया कि यह तोहफे हम फला बादशाह के पास ले जा रहे हैं। मगर डाकुओं ने हमारी एक ना सुनी और बोले हम किसी बादशाह को नहीं जानते। यह माल हमारे हवाले करो। उन्होंने हम पर हमला किया। मेरे बहुत से साथियों और नौकरों चाकरों को मार डाला। बाकी कुछ भाग गए। मैं भी जख्मी होकर एक तरफ भागा। डाकुओं ने किसी का पीछा ना किया। उन्हें तो बस गरज लूट मार से थी। सारा माल उठाकर चले बने।

मैं इस ममलक से वाकिफ ना था। दौड़कर एक पहाड़ पर चढ़ गया। रात एक घड़ी में गुजारी। सुबह को आगे रवाना हुआ। आखिर एक शहर में जा पहुंचा जो खूब आबाद था। बाहर का मौसम था। शहर में हर तरफ फूल खिले हुए थे और चिड़िया चहचहा रही थी। अच्छा मौसम था और मेरा बुरा हाल था। पैदल चल चल कर थक चुका था। समझ में ना आता था कि कहां जाऊं, क्या करूं। मेरा गुजर एक दर्जी की दुकान के पास से हुआ। मैंने दर्जी को सलाम किया। उसने सलाम का जवाब दिया। अपने पास बिठा लिया और हाल पूछा। मेरा किस्सा सुनकर बहुत अफसोस किया और बोला ऐ जवान अपना हाल किसी पर जाहिर ना करना। यहां का सुल्तान तुम्हारे बाप का जानी दुश्मन है। अगर उसे तुम्हारी खबर मिली तो बहुत बुरी तरह पेश आएगा। इसके बाद उसने मुझे खाना खिलाया। दुकान के साथ एक कोठरी थी। उसमें मुझे ठहराया। तीन रोज तक उसने मेरी खातिर की।

चौथे दिन मुझसे पूछने लगा तुम्हें कोई काम आता है? मैं चाहता हूं कि तुम काम करो और अपनी रोजी कमाओ। मैंने बताया कि मैं बड़ा आलिम फाजिल हूं। खुशखत हूं। हिसाब किताब रखना आता है। दर्जी बोला, "यह बातें यहां बेकार हैं। शहर के लोग सिर्फ माल खरीदते और बेचते हैं। उन्हें लिखने पढ़ने से कोई वास्ता नहीं। मैंने कहा, फिर मैं क्या करूं? कोई काम तो मुझे आता नहीं। दर्जी बोला, मजदूरी में क्या शर्म? अपनी कमर कस लो। मैं तुम्हें कुल्हाड़ी और रस्सी ले देता हूं। जंगल से लकड़ियां काट कर लाओ और बेचो। शायद किसी वक्त खुदा को तुम पर रहम आ जाए और निजात की कोई सूरत निकल आए। किसी को हरगिज यह ना बताना कि तुम फला ममलक के शहजादे हो। उसने मेरे लिए कुल्हाड़ी और रस्सी खरीदी और बाका लकड़हारों से मिला दिया। मैं उनके साथ जंगल में जाता। लकड़ियां काटता और सिर पर उठाकर शहर ले आता। उन्हें बेचता और जो रकम हाथ आती उसे खानेपीने पर खर्च करता।

एक दिन मैं जंगल में गया तो काम की लकड़ियां ढूंढते-ढूंढते दूसरे लकड़हारों से बहुत दूर जा निकला। देखा कि एक जगह बड़ा सा गढ़ा है जिसमें दरख्त है। मैं गढ़े में उतरा और एक मोटे दरख्त की जड़ के पास से मिट्टी खोदने लगा। सोचा कि इसे काटूं तो कई दिन यहीं से लकड़ियां ले जाता रहूंगा। खोदते-खोदते मेरी कुल्हाड़ी किसी चीज से टकराई और ठन की आवाज आई। मैंने मिट्टी हटाई तो लकड़ी के एक चौकोर तख्ते में पीतल का कंधा नजर आया। कंधा पकड़ कर तख्ता उठाया तो एक जीना दिखाई दिया। सीढ़ियां उतर कर नीचे गया तो देखा कि एक आलीशान महल में पहुंच चुका हूं। अधर-उधर घूम रहा था कि एक बहुत खूबसूरत औरत सामने आ गई। मुझे देखकर उसकी आंखें खुली की खुली रह गई और बोली, "तुम कौन हो? आदमी या जिन?" मैंने जवाब दिया, "मैं आदमी हूं।" उसने कहा, "मैं यहां 10 साल से हूं। इस मुद्दत में किसी आदमी को नहीं देखा। तुम यहां कैसे आ गए? मैंने अपना हाल सुनाया और पूछा कि तुम कौन हो और यहां क्यों रहती हो? वह रो पड़ी और कहने लगी, मैं आफिरफत मूस नामी सुल्तान की बेटी हूं जो जजीरा इनोस पर हुकूमत करता है। उसने मेरी शादी मेरे चचेरे भाई से की थी। मगर शादी की पहली रात को जर्जिस नामी देव जो जादू भी जानता है मुझे उठा ले गया और इस महल में कैद कर दिया। इस बात को 10 साल हो चुके हैं। यहां महल में हर किस्म का सामान मौजूद है। हर 10वें दिन जजेजिस यहां आता है और रात भर यहां रहकर चला जाता है। यह कोने में जो गोला पड़ा है जिस पर जादू के हुरूफ लिखे हुए हैं उसे बुलाने के लिए है। अगर किसी वजह से मैं उसे बुलाना चाहूं तो गोले पर हाथ फेरते ही वह आ जाएगा। उसे मेरे पास से गए 4 दिन हुए हैं और आने में 5 दिन बाकी हैं। क्या यह मुमकिन है कि तुम पांच दिन मेरे पास रहो। छठे दिन चले जाओ। मैं आदमियों से बात करने को तरस गई हूं। मैंने कहा, मेरे लिए इससे ज्यादा खुशी की बात क्या हो सकती है? यह सुनकर उसके चेहरे का खुल उठा और मुझे हाथ पकड़ कर हवा में ले गई। मैं नहा धोकर ताजा दम हुआ। उसने मुझे शरबत पिलाया जिसमें शक्कर के साथ मशक मिला हुआ था। कहा कि तुम थके हुए हो थोड़ी देर सो लो। मैं बिस्तर पर लेटा तो नींद आ गई। जब आंख खुली तो देखा कि वह मेरे पांव दबा रही है। उसने महसूस किया कि मैं जाग गया हूं तो कहने लगी मैं यहां जमीन के नीचे बने इस महल में 10 साल से अकेली थी। किसी आदमी से मिलने की उम्मीद ना थी। खुदा का शुक्र है कि तुम किसी तरह मुंह तक पहुंच गए। हम बड़ी देर तक बातें करते रहे। रात भर हम बड़े खुश रहे। दिन में सवा।

अगली रात उसने कहा, यहां मेरे पास बड़ी उम्दा पुरानी शराब है। आओ हम दोनों पीते हैं। मैंने जवाब दिया जल्दी लाओ हम जश्न मनाएंगे। शराब पीकर मुझे नशा हो गया और जोश में आकर मैंने कहा मैं तुम्हें यहां से निकाल कर ले जाऊंगा। वह बोली बेसिर पैर ना बनो। नौ दिन तुम्हारे हैं और एक दिन देव का। मैं बदमस्त हो चुका था। अकड़ कर कहने लगा देव की ईसी की तैसी। मैं अभी यह जादू का गोला तोड़ देता हूं। देव को आने दो। मैं उसे मार डालूंगा। मेरे सामने वह देव क्या चीज है? मेरी बातें सुनकर उसके का रंग उड़ गया। घबराकर मेरे आगे हाथ जोड़े और कहने लगी तुम्हें खुदा का वास्ता यह मत करना वरना पछताओगे। मैंने उसकी एक ना सुनी और गोले को जोर से लात मारी। जरा सी देर में हर तरफ अंधेरा छा गया। यूं लगा जैसे बादल गरज रहे हो और बिजली चमक रही हो। जमीन हिलने लगी। डर के मारे मेरा नशा उतर गया। मैंने पूछा यह क्या हो रहा है? वह बोली देव आ पहुंचा। मैंने तुम्हें खबरदार किया था कि गोले को ना छोड़ना मगर तुम बाझ ना आए। अगर अपनी जान बचाना चाहते हो तो फौरन उसी रास्ते से भाग जाओ जिससे आए थे। कहां तो मैं बहादुर बना हुआ था और कहां खौफ के मारे कुछ होश ना रहा। अपनी कुल्हाड़ी और जूते वहीं भूल कर भागा। जीने के आखिर में पहुंचकर बाहर निकलने से पहले मैंने मड़कर देखा और देखतेदेखते जमीन फटी और काला कलोदेव नुमाया हुआ और बोला क्या हुआ मुझे किस लिए बुलाया है औरत ने कहा मैंने नहीं बुलाया तबीयत घबरा रही थी जरा सी शराब पी तो सर चकराया और गोले पर गिर पड़ी देव ने कहा तो झूठ बोल रही है यह कहकर अधर-अधर देखने लगा उसकी नजर मेरे जूतों और कुल्हाड़ी पर पड़ी गुस्से में आकर बोला कोई आदमी यहां आया था। कुल्हाड़ी उसकी है और जूते भी। सच बता कौन तुझसे आकर मिला? औरत ने कहा, मैंने ना तो जूते देखे हैं ना कुल्हाड़ी। जरूर तूने अपने पास इन चीजों को लेकर आया है। देव ने कहा, यह नामुमकिन है। मैं तुझे सजा देकर रहूंगा। यह कहकर उसने औरत को एक जूतों से बांध दिया और मारने पीटने लगा। यह देखकर मैं खौफ से कांप उठा। गिरता पड़ता बाहर पहुंचा। तख्ता अपनी जगह पर वापस रखा और ऊपर मिट्टी डाल दी और घर का रास्ता लिया।

मुझे बार-बार उस औरत का ख्याल आता था और जब यह सोचता था कि मेरी बेवकूफी से उस पर मुसीबत आई तो मेरे आंसू बहने लगते। कभी पुराना जमाना याद आ जाता। जब मैं ऐशो आराम से शाही महल में रहता था। किस्मत का खेल की शहजादे से लकड़हारा बन गया। इन्हीं ख्यालों में उलझा गम में डूबा हुआ अपने ठिकाने पर पहुंचा। दर्जी मुझे देखते ही उठ खड़ा हुआ और कहने लगा तुम कल ना आए तो मैं बहुत परेशान हुआ। रात को ठीक तरह सो भी ना सका। सोचता था कि कहीं वीराने में शेर या भेड़िए ने तुम्हें चीर फाड़ के खा ना लिया हो। खुदा का लाख-लाख शुक्र है कि तुम जिंदा सलामत हो। मैंने उसकी मोहब्बत का शुक्रिया अदा किया। अपनी कोठरी में जाकर लेट गया और अपनी हमाकत और जादू के गोले को लात मारने पर खुद को बुरा भला कहता रहा।

ज्यादा देर ना गुजरी थी कि दर्जी मेरे पास आया और बोला अरे मियां बाहर आओ। कोई बूढ़ा ईरानी तुम्हें तलाश कर रहा है। उसके पास तुम्हारी कुल्हाड़ी और तुम्हारे जूते हैं। उन्हें लेकर वह लकड़हारों के पास आया था और कहता था कि सुबह को जब वह फज्र की अजान सुनकर बाहर आया तो यह चीजें एक तरफ पड़ी मिले। मालूम नहीं किसकी है। चाहता हूं कि इस बिछड़े को लौटा दूं। लकड़हारों ने तुम्हारी कुल्हाड़ी पहचान ली और जूते भी और बूढ़े को मेरे पास भेज दिया। यह कहकर दर्जी तो चला गया। मुझे इतना डर लगा कि होश उड़ ना रहे। जी चाहता था कि उठकर कहीं भाग जाऊं। इतने में कोठरी का फर्श फटा और एक बूढ़ा व नुमाया हुआ। और देखते ही देखते देव बन गया जिसे मैंने जमीन के नीचे वाकई महल में देखा था। देव ने कहा मैंने औरत से बहुत पूछा कि यह कुल्हाड़ी और जूते किसके हैं? मार खाने के बावजूद उसने कुछ ना बताया। मैंने कहा कि अगर मैं इस कुल्हाड़ी और जूतों के मालिक को अभी ढूंढ कर ना लाया तो अपना नाम बदल डालूंगा। मैं झरजिस हूं। मेरे सामने किसी की चाल नहीं चल सकती। मैं कुछ कहने भी ना पाया था कि वह मुझे दबोच कर जमीन में समा गया। मुझे होश ना रहा।

जब होश आया तो मैंने देखा कि मैं वही महल में हूं। औरत सत से बंधी हुई है और उसके बदन से खून बह रहा है। यह देखकर मेरे आंसू निकल आए। देव ने चिंगुल खींच कर कहा ए बदजात औरत यही वह जवान है जो तेरे पास से उठकर गया था। औरत ने कहा मैं इसे बिल्कुल नहीं जानती। कस्म लो जो पहले कभी देखा भी हो। यह सुनकर देव नाराज हुआ और कहने लगा तो झूठ बोलने से बाज नहीं आ रही। अगर तो इसे नहीं जानती तो यह तलवार ले और इसका सर उड़ा दे। देव ने वह रस्सियां खोल दी जिनसे वह बंधी हुई थी और उसे एक तलवार थमा दी। वह मेरे पास आकर खड़ी हो गई। मैंने इशारे से कहा, "मुझे माफ कर दो।" उसने भी इशारे में जवाब दिया कि यह सब खराबी तुम्हारी वजह से हुई। औरत ने तलवार फेंक दी और बोली, मैं ऐसे आदमी को कैसे कत्ल करूं जिसे जानती तक नहीं और जिसने मुझे कोई तकलीफ ना पहुंचाई। किसी मजहब में बेगुनाह को कत्ल करने की इजाजत नहीं। देव ने कहा, हां, अपने यार को क्यों कत्ल करेगी? तो भी आदमी है और वह भी आदमी। आदमी आदमी को चाहता है। मैं ठहरा देव। मैं तुझे कब पसंद आ सकता हूं? फिर वह मेरी तरफ मुड़ा। ए आदमी तू भी इस औरत को नहीं पहचानते? मैंने कहा मैं क्या जानू यह कौन है? पहली दफा इसे देख रहा हूं। देव ने कहा अगर ऐसा है तो यह तलवार उठा और इसकी गर्दन उड़ा दे। फिर मैं तुझे छोड़ दूंगा और तुझ पर कोई सख्ती ना करूंगा। मुझे यकीन आ जाएगा कि तू इसे नहीं जानता। मैंने कहा बहुत अच्छा। खुशी-खुशी तलवार लेकर आगे बढ़ा। तलवार से वार करना चाहता था कि लड़की ने इशारे से कहा, "मैंने तेरा क्या बिगाड़ा है? जो तू बदला लेना चाहता है। इशारे को समझकर मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैंने तलवार फेंक दी और बोला, "ए बहादुर देव, यह कहां का इंसाफ है कि इसी औरत को जान से मार दूं जिसे जानता भी नहीं।" आखिर वह भी तो मेरी जान लेने को तैयार ना थी।

देव मेरी बात सुनकर आपस से बाहर हो गया और कहने लगा तुम दोनों में यारी है। आपस में मिले हुए हो। मैं अभी तुम्हारे किए का मजा चखाता हूं। उसने तलवार उठा ली और औरत पर वार किया। औरत का एक हाथ काट कर गिर पड़ा। फिर दूसरा वार करके दूसरा हाथ काट डाला। दोनों पांव भी काट दिए और आखिर में इसका सर तन से जुदा कर दिया। जल्लाद का यह काम करने के बाद देव मुझसे मुखातिब हुआ। हमारे मजहब में है कि अगर बीवी किसी से यारी करे तो इसे मार डालते हैं। जिस दिन इस औरत की शादी थी, मैं इसे उठाकर यहां ले आया था। वह मेरे सिवा किसी को ना जानती थी। मैं आदमी की सूरत अख्तियार करके उसके पास आता जाता था। मुझे शक हुआ कि यह औरत खराब है। इसलिए मैंने इसे मार डाला। तेरे बारे में मुझे ठीक मालूम नहीं कि तू इस किस से सिर्फ एक बार मिला था और वह भी जरा सी देर को या कई बार मिल चुका है। तुझे मैं सजा जरूर दूंगा। मांग क्या चाहता है? यह सुनकर मेरी जान में जान आ गई और मैंने कहा, "मैं क्या मांगू?" देव बोला, "यह बता कि मैं जादू से तुझे कुत्ता बना दूं या गधा या बंदर।" मेरा ख्याल था कि वह मुझे माफ कर देगा। मैं उसकी खुशामद करने लगा और कहा कि खुदा के वास्ते मुझे माफ कर दो। देव कहने लगा ज्यादा बातें मत बना। मैं बड़ी आसानी से तुझे कत्ल कर सकता हूं। मैंने तुझे जान की अमन दी। बोल क्या बनेगा? मैंने हाथ जोड़कर माफी मांगी। रोने और गड़गड़ाने लगा। देव ने कहा, या तो मैं तुझे मार डालूंगा और अगर कत्ल ना किया तो भी माफ हरगिज़ ना करूंगा। जादू करके सजा दूंगा। यह कहकर उसने झपटा मारा और मुझे लेकर उड़ गया और इतनी ऊंचाई पर जा पहुंचा कि दुनिया गोल जतनी नजर आने लगी। उड़ते-उड़ते वह एक पहाड़ पर जा उतरा। थोड़ी सी मिट्टी उठाई और आहिस्ता-आहिस्ता कुछ पढ़कर उस मिट्टी पर फूंक मारा। मिट्टी मुझ पर छिड़क दी और हुकुम दिया आदमी की सूरत छोड़कर बंदर बन जा। मैं उसी दम बूढ़ा बंदर बन गया। देव मुझे सजा देकर रखस्त हुआ। मैं अपनी बदसूरत और किस्मत की खराबी पर रोता रहा। मगर सब्र के सिवा चारा क्या था।

मैं पहाड़ से उतरा तो एक बहुत बड़ा जंगल आया। जंगल में महीना भर चलता रहा। जंगली फल खाकर और नदी नालों का पानी पीकर गुजारा करता। कोई महीना बाद देखा कि एक समंदर के किनारे जा पहुंचा हूं। वहां आए मुझे दो-ती घंटे होंगे कि एक जहाज नजर आया जो अधर ही आ रहा था। मैं एक चट्टान के पीछे छिप गया। जहाज किनारे पर आकर रुका और चंद मल्लाह उतर कर पानी की तलाश में निकल गए। मौका पाकर मैं जहाज पर जा चढ़ा। किसी कोने में छिपना चाहता था कि मुसाफिरों की नजर मुझ पर पड़ गई। एक मुसाफिर ने कहा यह मनहूस कहां से आ गया? इसे निकालो। कैप्टन बोला इसे मार डालना चाहिए। एक और मुसाफिर ने तलवार खींच ली और कहने लगा लो मैं इसे मार देता हूं। मैंने दौड़कर कैप्टन का दामन पकड़ लिया और रोने लगा। मेरे आंसू बहते देखकर कैप्टन को मुझ पर तरस आ गया। उसने कहा या रो इस बंदर ने मुझसे पनाह मांगी। मैंने इसे पनाह दी। अब तुम में से कोई ना इस पर हमला करे ना इसे सताए। कैप्टन ने मुझसे अच्छा सुलूक किया। वह जो कहता मैं समझ जाता। जब उसने देखा कि मैं अकलमंद हूं तो वह खासतौर पर मेरा ख्याल रखने लगा। 50 दिन तक हम सफर करते रहे।

आखिर एक रोज बड़े शहर के सामने पहुंचकर लंगर डाला। वह शहर इतना बड़ा था कि उसमें रहने वालों की गिनती खुदा ही को मालूम होगी। जहाज लंगर अंदाज हुआ तो वहां के सुल्तान के चंद अफसर हमसे मिलने आए और तमाम 100 घरों को सही सलामत लौट आने पर मुबारकबाद दी। कहने लगे हमारा सुल्तान तुम्हारे खैरो आफियत से वापस आ जाने पर खुश है। उसने एक कागज तुम्हारे पास भेजा है। तुम में से हर कोई इस पर दो-तीन सतरें लिखे। बात यह है कि सुल्तान का एक बहुत खुशनसीब वजीर था। वह भूत हो गया है। सुल्तान ने कसम खाई है कि वह इस शख्स को वजीर बनाएगा जो इतना ही अच्छा खुशनवीसी हो। यह कहकर उन्होंने 10 फुट लंबा और 1 फुट चौड़ा कागज जहाज पर मौजूद आदमियों को दिया ताकि जिसे लिखना आता था वह दो-तीन सतरें इस पर लिख दे। इससे पहले कि उनमें से कोई कागज की तरफ हाथ बढ़ाता, मैंने लपक कर कागज छीन लिया। लोग डर गए और समझे कि शायद मैं इसे फाड़ डालूंगा और मुझे धमकी देने लगे। मैंने इशारे से कहा कि मैं लिखूंगा। कैप्टन ने कहा, "इसे लिखने दो। अगर इसने कोई गड़बड़ की तो इसे समंदर में फेंकवा दूंगा। अगर अच्छी तरह लिखा तो अपना बेटा बना लूंगा। मैंने इससे ज्यादा समझदार बंदर आज तक नहीं देखा। मैंने कलम पकड़ा और दब्बात में दबोक लिखने की जितनी नराली तौर थी उनमें शायरी लिखी और कागज लौटा दिया। उसके बाद उन सब ने भी जिन्हें लिखना आता था कागज पर कुछ ना कुछ लिखा। कागज लेकर अफसर सुल्तान के पास गए। सुल्तान ने कागज पर नजर डाली तो मेरा लिखा हुआ सबसे ज्यादा पसंद आया। सुल्तान ने कहा जिसने यह सरें लिखी हैं इसे खच्चर पर बिठा। ढोल बजाए के साथ यहां लाओ। उम्दा कपड़े पहनाओ और मेरे सामने पेश करो।

जब शाही अफसरों ने यह बात सुनी तो मुस्कुराने लगे। सुल्तान को गुस्सा आ गया और बुरा भड़क कर बोला, "तुम सब नमक हराम हो। मैंने तुम्हें हुकुम दिया है और तुम दांत निकाल कर हंस रहे हो। अफसरों ने जवाब दिया, हुजूर, हमारे हंसने की एक खास वजह है। सुल्तान ने पूछा, वह क्या? अफसरों ने कहा, फरमाते हैं कि जिस आदमी ने यह सरें लिखी हैं, इसे हाजिर करो। वाक्या यह है कि लिखने वाला आदमी नहीं एक बंदर है और जहाज के कैप्टन ने इसे पाला हुआ है। सुल्तान यह सुनकर बहुत हैरान हुआ और बोला, "मैं कैप्टन से यह बंदर खरीद लूंगा।" उसने जहाज की तरफ अपना एक खास आदमी भेजा और खच्चर, कीमती लिबास और ढोल बजाए साथ कर दिए और कहा यह कपड़े पहनाकर बंदर को मेरे पास ले आओ। सुल्तान का आदमी जहाज पर आया। कैप्टन से मुझे खरीदा। मुझे कपड़े पहनाए और खच्चर पर बिठा दिया। इस तरह खच्चर पर सवार मैं शहर में से गुजरा। मेरे आगे ढोल बजाए बज रहे थे। हर तरफ लोग जमा हो गए और मुझ पर हंसने और फकरे कसने लगे। जो ही मैं सुल्तान के सामने पहुंचा। मैंने तीन मर्तबा जमीन चूमी। सुल्तान ने बैठने को कहा। मैं घुटनों के बल अदब से बैठ गया। मेरी तमीजदारी देखकर दरबारी दंग रह गए। खुद सुल्तान भी बहुत मुतासिर हुआ। सुल्तान ने कहा कि खाना लाया जाए। दस्तरखवान बिछ गया और तरह-तरह के उम्दा सलान छन दिए गए। सुल्तान ने इशारे से कहा कि खाना खाओ। मैं उठा और दोबारा उसके सामने जमीन चूमी। मैंने बड़े सलीके से खाना खाया। खाने से फारग होकर अच्छी तरह हाथ धोए और कलम दो हाथ लेकर चंद अशार लिखे और दूर जा बैठा। सुल्तान ने जब अशार पढ़े तो हैरान रह गया। कहने लगा कमाल है बंदर और इतना खुशनगार इसके अलावा इसे इतने अच्छे-अच्छे अशार याद हैं। फिर सुल्तान के सामने शतरंज की बसाट रखी गई। सुल्तान ने पूछा ऐ बंदर तू मेरे साथ शतरंज खेलेगा। मैंने सर हिलाकर इशारे से आमादगी जाहिर की। हमने दो बाजियां खेली और मैंने दोनों मर्तबा सुल्तान को आसानी से हरा दिया। अब तो सुल्तान के होश उड़ गए। इतनी देर में मैंने दो अशार और लिखे और सुल्तान को पेश किए। सुल्तान की हैरानी और खुशी बढ़ती चली गई। उसने बूढ़े मुलाजिम से कहा, शहजादी लैला बिंति युसुफ से कहो कि यहां आए और इस अजीबोगरीब बंदर की हरकत देखे जो लाखों इंसानों से ज्यादा अकलमंद है। बूढ़ा मुलाजिम शहजादी को बुला लाया। जैसे ही शहजादी की नजर मुझ पर

पड़ी, उसने मुंह छुपा लिया और बोली, "अब्बा जान, आपको यह क्या सूझी? मुझे गैर मर्द के सामने कर दिया?" सुल्तान हैरान होकर कहने लगा, "ऐ लैला बिंत यूसुफ, यहां इस छोटे लड़के और बूढ़े मुलाजिम के सिवा, जिसने बचपन से तुम्हारा ख्याल रखा है, और कोई नहीं। मैं तुम्हारा बाप हूं। गैर यहां कौन है जिससे तुम मुंह छुपा रही हो?"

शहजादी ने जवाब दिया, "अब्बा हुजूर, यह बंदर नहीं, एक नौजवान शहजादा है। उसके बाप का नाम इस्माइल है। इस पर जज नामी देव ने जादू किया है। जिसे आप बंदर समझ रहे हैं, वह आलिम फाजिल नौजवान है।" यह बातें सुनकर सुल्तान की हैरानी की इंतहा ना रही। उसने मेरी तरफ देखा और कहा, "मेरी बेटी ने जो कहा, क्या वह सच है?" मैंने सर हिलाकर कहा कि हां और रोने लगा।

सुल्तान ने बेटी से पूछा, "यह तुम्हें कैसे मालूम हुआ कि इस पर जादू किया गया है?" शहजादी ने जवाब दिया, "अब्बा जान, जब मैं छोटी थी, तो मेरे पास एक बूढ़ी जादूगरनी मुलाजिम थी। वह जादू में बड़ी माहिर थी। उसने मुझे भी जादू सिखा दिया और इतनी अच्छी तरह सिखाया कि शायद ही कोई मुझसे मुकाबला कर सके। मुझे 170 जादू याद हैं। उनमें सबसे मामूली यह है कि अगर चाहूं तो शहर की एक-एक ईंट कोहे काफ के पीछे फेंक आऊं और शहर को समंदर बना दूं और शहरियों को मछलियां।"

सुल्तान यह सुनकर बोला, "बेटी, मेरी जान की कसम, इस शहजादे पर से जादू उतार दो ताकि मैं इसे अपना वजीर बना लूं। यह नौजवान बहुत अक्लमंद और बा अदब है।" शहजादी ने कहा, "आपका हुकुम सर आंखों पर।" उसने एक चीरी मंगवाई जिस पर इब्री में कुछ लिखा हुआ था। चीरी की नोक से अपने गिर्द दायरा खींचा। दायरे में जादू के लफ्ज और अजीबोगरीब नाम लिखे। उसके बाद कोई मंत्र पढ़ा जिसमें कुछ तो समझ में आया और कुछ समझ से बाहर था।

जरा सी देर में हमारे चारों तरफ अंधेरा छा गया और वहीं देव जिसे मैंने जमीन के नीचे वाकई महल में देखा था, हमारे सामने आ खड़ा हुआ। उसकी आंखों में शोले नाच रहे थे। हम इसे देखकर सहम गए। शहजादी बोली, "मैं तुझे ना खुशामदीद कहती हूं ना सलाम करती हूं।" देव ने शेर की सूरत अख्तियार ली और दहाड़ कर कहा, "ऐ धोखाबाज लड़की, मेरे और तुम्हारे दरमियान जो वादा था, तुम उसके से मुकर गई। क्या हमने तय ना किया था कि हम एक दूसरे से ना लड़ेंगे?"

शहजादी ने जवाब दिया, "ए खबीस, मुझे क्या पड़ी थी जो तुझसे कोई वादा करती?" देव ने कहा, "अच्छा ले, मैं आया।" शेर अभी हमला ना करने पाया था कि शहजादी ने अपना एक बाल तोड़ा और उस पर जादू पढ़ा। फौरन वह बाल तेज तलवार बन गया। तलवार से शहजादी ने शेर के दो टुकड़े कर दिए। शेर का आधा धड़ बिच्छू बन गया। शहजादी जमीन पर लौट कर अजदाहा बनी और बिच्छू की तरफ छलांग मारी।

दोनों में सख्त लड़ाई हुई। जब बिच्छू ने देखा कि शिकस्त होने वाली है तो गीदड़ बनकर उड़ गया। अजदहा उकड़ू हुई। बड़ी देर तक दोनों लड़ते रहे। आखिर बिल्ली ने महसूस किया कि वह जीत ना सकती और अनार में तब्दील होकर उछली और महल के चिकने फर्श पर गिरी। अनार गिरते ही टूट गया और उसके दाने हर तरफ बिखर गए। भेड़िया झरझरी लेकर मुर्गा बना और दौड़कर उन दानों को चुगने लगा। कोई दाना बाकी ना छोड़ा।

इत्तेफाक से एक दाना लुढ़क कर हौज के किनारे जा पहुंचा था। वह मुर्गे को नजर ना आया। मुर्गा शोर मचाने, फड़फड़ाने और चोंच से हमारी तरफ इशारे करने लगा। मगर हम इसका मतलब बिल्कुल ना समझे। वह इतनी जोर से चीखा कि हम डर गए। ऐसा लगता था कि उसके शोर मचाने से महल गिर पड़ेगा। मुर्गा महल में चक्कर लगाने लगा। अचानक उसे वह दाना नजर आ गया जो बचा हुआ था। वह इसे चुगने के लिए दौड़ा। वह दाना मछली में तब्दील होकर हौज में जा गिरा। मुर्गा मगरमच्छ बनकर हौज में जा कूदा।

दोनों हमारी नजर से गायब हो गए। हमने रोने और चीखने चिल्लाने की आवाजें सुनी और कांपने लगे। फिर देव अपनी असली शक्ल में बाहर आया। उसका जिस्म शोले में लिपटा हुआ था। मुंह खोलकर फूंक मारता तो आग की लपटें निकलती। उसके नथुनों से आग निकलती थी। महल में हर तरफ धुएं ही धुएं छा गया। खौफ के मारे हमारा बुरा हाल था। सोचते थे कि हौज में कूद जाएंगे ताकि जल के मरने से बचें।

सुल्तान ने घबरा कर कहा, "काश इस बंदर की खातिर शहजादी को इस मुसीबत में ना डालता। यह देव बड़ा जबर है। मेरी बेटी इस पर कैसे गालिब आएगी? यह बंदर बड़ा मनहूस है। हमने इसके साथ नेकी करनी चाही और वह बंदर से आदमी ना बन सका। इसके बदले हमने यह आफत मोल ली।" मैं क्या कहता? अभी बंदर बना हुआ था और बोलना मेरे बस में ना था।

इतने में देव शोले से बाहर आया। उसके बदन से चिंगारियां उड़ रही थी। शहजादी के जिस्म से भी चिंगारियां निकल रही थी। मगर उनसे हमें कोई नुकसान ना पहुंचता था। तभी देव की एक चिंगारी मेरी बाईं आंख में लगी और मैं काना हो गया। साथ ही एक चिंगारी सुल्तान के चेहरे पर आ गई। सुल्तान का आधा मुंह और ठोड़ी झुलस गई और नीचे के दांत झड़ गए। एक चिंगारी जाकर बूढ़े मुलाजिम के सीने पर लगी और वह फौरन जलकर मर गया।

हमें यकीन आ गया कि हम भी जल मर जाएंगे। इस दहशत के आलम में हमने किसी को कहते सुना, "अल्लाहु अकबर।" यह आवाज शहजादी की थी। उसने देव को जला डाला था और वह राख का ढेर होकर रह गया था। शहजादी ने हमारे पास आकर कहा, "प्याले में पानी लाओ।" छोटा लड़का दौड़कर पानी लाया। शहजादी ने पानी पर कुछ पढ़ा और जो हमारी समझ में ना आया, उसने प्याले का पानी मुझ पर छिड़का और कहने लगी, "मैं तुझे खुदा और उसकी आजमाइश का वास्ता देती हूं कि अपनी असली शक्ल में आजा।"

मेरे जिस्म को झटका सा लगा और मैं दोबारा इंसान बन गया। मगर मेरी बाईं आंख जाया हो चुकी थी। अभी मैं सोच ही रहा था कि लोग मुझे काना कहेंगे कि मैंने शहजादी की आवाज सुनी, "अब्बा जान, आग, आग। अब मैं जिंदा नहीं रह सकती। मुझे देवों से लड़ने की मशक्कत ना थी। अगर वह इंसान होता, तो मैं इसे कब का ठिकाने लगा चुकी होती। जब तक अनार ना फटा था, और मैंने अनार के दाने ना चुगे थे, मैं बिल्कुल ना थकी थी। बदकिस्मती से जिस दाने में देव की जान थी उसे ना देख सकी। यह मुझसे चूक हुई। अगर मैं इसे भी चुग लेती और देव फौरन मर जाता। मजबूर होकर मुझे इसके से मजीद लड़ना पड़ा। हम दोनों में जमीन पर, जमीन के नीचे, हवा में, पानी में जबरदस्त जंग हुई। आखिर उसने मुझ पर आग का दरवाजा खोल दिया। जिस पर आग का दरवाजा खोल दिया जाए, उसका जिंदा बचना मुश्किल हो जाता है। किस्मत ने मेरी मदद की और मैंने इसे जला दिया। अब मुझे भी मुर्दा समझो। अब मैं तुम लोगों को खुदा के सुपुर्द करती हूं।"

वह यह कह ही रही थी कि एक काली चिंगारी उसके चेहरे की तरफ बढ़ी और आन की आन में वह भी देव की तरह राख के ढेर में तब्दील हो गई। मुझे जितना गम हुआ वह बयान से बाहर है। मैंने दिल में सोचा, काश मैंने इस खूबसूरत शहजादी को ना देखा होता। काश इसके बदले मुझे मौत आ जाती। उसने मेरे साथ भलाई की और खुद जलकर राख हो गई। जो खुदा की मर्जी।

जब सुल्तान ने देखा कि उसकी बेटी राख का ढेर हो गई है तो अपनी रुई जैसी दाढ़ी नोच ली। मुंह पीटने लगा और कपड़े फाड़ डाले। मैं भी आंसू बहाने लगा। हमारे रोने चिल्लाने की आवाज सुनकर महल के लोग दौड़े आए। देखा कि सुल्तान की बुरी हालत है और राख के दो ढेर लगे हुए हैं। वे कुछ ना समझ सके। जब सुल्तान की तबीयत संभली और उसने अपनी बेटी और देव के जल मरने का माजरा बयान किया तो महल में शोर मच गया और तमाम मर्द और औरतें, छोटे-बड़े रोने लगे।

सात दिन तक मातम होता रहा। फिर सुल्तान ने हुकुम दिया कि बेटी की राख पर आलीशान गुंबद बनाया जाए। देव की राख हवा में उड़ा दी गई। उसके बाद सुल्तान ऐसा बीमार हुआ कि मरते-मरते बचा। एक महीना गुजर गया। तब कहीं उसकी सेहत बहाल हुई और दाढ़ी दोबारा निकली आई। उसने मुझे मुखातिब किया और कहा, "ऐ नौजवान, जब तक तुम ना आया था, हम मजे की जिंदगी गुजार रहे थे। काश मैंने तेरी सूरत ना देखी होती। काश वह मनहूस दिन ना आता जब मेरी प्यारी बेटी तेरी खातिर जल मर गई। हमने तुझ पर रहम खाया और तेरी वजह से बर्बाद हुए। मेरी बेटी जान से गई जो 100 मर्दों के बराबर थी। मेरा मुंह झुलस गया और दाढ़ी जली और दांत झड़ गए। मेरा वफादार बूढ़ा मुलाजिम मर गया। मगर मैं तुझे इल्जाम ना दूंगा। जो मेरे या तेरे साथ हुआ वह खुदा की तरफ से है। अब तू इस शहर से दफा हो जा। जो होना था वह हो चुका। किस्मत के लिखे को कौन टाल सकता है? चल दूर हो। अगर दोबारा यहां नजर आया तो मैं तुझे कत्ल कर दूंगा।"

मैं क्या करता? मैंने सर पर उस्तरा फिराया, दाढ़ी मुंडवा दी और वहां से रवाना हो गया। दिल में यही कहता था कि जान बची सो लाखों पाए। मगर समझ में ना आता था कि जाऊं तो कहां जाऊं। जो वाक्यात पेश आए थे वे दिन रात आंखों के सामने आते रहते थे। डाकुओं का मेरे काफिले को लूटना, मेरा जिंदा बचकर अजनबी शहर में पहुंचना, दर्जी का मुझ पर रहम खाना, लकड़हारा बन जाना, जमीन के नीचे महल में औरत से मिलना, औरत का मेरी बेवकूफी से कत्ल होना, देव का मुझे बंदर बना देना, बंदर से फिर इंसान बनना, शहजादी का मेरी खातिर जान देना, गरज यही सोच कर गमजदा रहता, काला लिबास पहने मुमालिक मुमालिक, शहरों-शहरों घूमता फिरता बगदाद आ पहुंचा। इरादा है कि खलीफा को अपना किस्सा सुनाऊं। शायद वह मुझ पर मेहरबान हो जाए। तो यह है मेरी कहानी।

खलीफा हारून रशीद ने इसकी दिलकश और हैरतअंगेज कहानी सुनी तो दूसरे कलंदर से कहने लगे, "हां भाई, तुम्हारी बाईं आंख कैसे जाया हुई?" दूसरे कलंदर ने अपना वाकया इस तरह सुनाया। मेरा बाप सुल्तान था। उसका नाम यूसुफ था। मेरा नाम जैन है। जब बाप का इंतकाल हुआ तो उसकी जगह मैं सुल्तान बना। मैंने रईया के साथ अच्छा सुलूक किया। जहां तक मुमकिन हुआ इंसाफ से काम लिया। मेरा ममलक समंदर के किनारे था। मैं समंदर को देखता तो जी चाहता था कि समंदर की सैर करूं। समंदर में बहुत से जजीरे थे। मेरे पास 50 तिजारती जहाज और 150 जंगी जहाज थे। 50 छोटी कश्तियां सैर व तफरीह के लिए थी।

सैर करने का इतना शौक बढ़ा कि कुछ ना पूछिए। सोचा कि कम से कम एक महीना समंदर में घूमना और जजीरों को देखना चाहिए। जिनमें से बाका उसके आसपास और बाका कहीं दूरदराज वाक थे। मैंने एक बड़े जहाज को तैयार रहने का हुकुम दिया। महीना भर का खाने-पीने का सामान उस पर लादा और सफर पर रवाना हो गया। 20 दिन आराम से गुजर गए। 21वें दिन अचानक आंधी चलने लगी। हर तरफ बड़ी-बड़ी मौजें उठती नजर आती थी। जबरदस्त आंधी और लहरों के सामने जहाज का क्या बस चल सकता था? कुछ मालूम ना होता था कि हम किधर चले जा रहे हैं। बचने की उम्मीद ना रही। मैं दिल ही दिल में खुद को बुरा भला कहता था कि यह मैंने क्या किया। आराम से हुकूमत कर रहा था। सोचे समझे बगैर साहिल पर निकल पड़ने की क्या जरूरत थी? अपनी जान खतरे में डाली। अब देखिए वतन वापस पहुंचना नसीब होगा या नहीं।

तीन दिन बाद तूफान थमा और हम एक जजीरे पर पहुंचे। वहां उतर कर हमने दो-तीन दिन आराम किया। ताजा दम होकर आगे चले। पता ना था कि हम कहां हैं। 20 दिन और गुजर गए। महज अंदाजे से वतन की तरफ चले जा रहे थे। एकाएक फिर तूफान ने हमें आ लिया। कैप्टन ने कहा कि वह रास्ता बिल्कुल भूल गया है। जब तूफान का जोर टूटा तो उसने एक मल्लाह को हुकुम दिया कि सबसे बड़े मस्तूल पर चढ़कर चारों तरफ नजर दौड़ाए। शायद सुराग मिले कि कहां जा पहुंचे हैं। मल्लाह ने मस्तूल पर चढ़कर इधर-उधर देखा और पुकार कर कहा, "कैप्टन साहब, एक तरफ तो कोई बहुत बड़ी मछली नजर आ रही है और दूसरी तरफ दूर परे कोई पहाड़ है जो कभी काला मालूम होता है और कभी सफेद।"

जब कैप्टन ने यह बात सुनी तो अपनी पगड़ी उतार फेंक दी। दाढ़ी नोचने लगा और भरी हुई आवाज में बोला, "तबाही की खबर सबको पहुंचा दो क्योंकि हम में से कोई ना बचेगा।" यह कहकर वह रोने लगा। हम भी रो पड़े। जब घबराहट जरा कम हुई तो मैंने कैप्टन से पूछा, "आखिर मस्तूल पर चढ़े मल्लाह ने ऐसा क्या देखा कि तुम्हें हमारी तबाही का यकीन हो गया?" कैप्टन ने कहा, "बार-बार तूफान आने से हम सही रास्ते से भटक कर एक खौफनाक पहाड़ के पास आ पहुंचे। इसका नाम कोहे मैग्नेटिज है। कुछ देर में समंदर की धार हमें खींच कर पहाड़ तक ले जाएगी। पहाड़ के साए में पहुंचते ही जहाज की तमाम कीलें उखड़ कर पहाड़ में चिपक जाएंगी। जहाज के तख्ते जुड़े ना रह सकेंगे और मौजों में बहते-बहते न जाने कहां जा पहुंचेंगे। यह भी हो सकता है कि पहाड़ से टकरा के पाश-पाश हो जाए। मैग्नेटिज में खुदा ने यह भेद रखा है कि लोहे की बनी हर चीज को अपनी तरफ खींचता है। सदियों जहाज इसी नीचे समंदर में कोहे मैग्नेटिज की वजह से तबाह हो चुके हैं। इस पहाड़ पर इतना लोहा जमा है कि खुदा के सिवा किसी को इसकी मिकदार मालूम नहीं। पहाड़ के करीब पीतल का एक गुंबद है जो 10 हाथ पर खड़ा है। गुंबद के ऊपर पीतल का एक घोड़ा है और पीतल ही का एक सवार है। सवार के हाथ में निशान है और सीने पर एक तख्ता लटक रहा है जिस पर तिलिस्मी जबान में कुछ लिखा हुआ है। सुल्तान सलामत, मैंने सुना है कि इस सवार की वजह से यह सारी आफत आती है। जब तक यह सवार अपनी जगह से ना गिरेगा, निजात की कोई सूरत नहीं।"

यह कहकर कैप्टन झरझर रोने लगा। हमें भी यकीन हो गया कि अब वतन लौटना नसीब ना होगा और हम सब यहीं कहीं डूब मर जाएंगे। हम आपस में गले मिले। इस उम्मीद पर एक दूसरे को वसीयत करने लगे कि शायद कोई खुशकिस्मत बच-बचाकर वतन जा पहुंचे और हमारी बातें रिश्तेदारों और जानने वालों को बता दें। उस रात हम में से किसी को नींद ना आई। सुबह होते ही पानी की धार हमें खींच कर कोहे मैग्नेटिज के पास ले गई। बस वहां पहुंचने की देर थी कि तमाम कीलें और लोहे का सामान खींच कर पहाड़ से जा चिपटा। जहाज के तख्ते अलग हो गए। हम समंदर में जा पड़े। किसी को किसी की खबर ना रही। ना मालूम कौन डूबा, कौन तैर कर साहिल पर पहुंचा। हवा भी तेज चल रही थी। समंदर में तूफानी थी।

इत्तेफाक से एक तख्ता मेरे हाथ आ गया। मैं इसे लपेट गया। हवा और मौजों ने तख्ते को साहिल पर ला फेंका। मैंने देखा कि पहाड़ पर सीढ़ियां बनी हुई हैं जिन पर चढ़कर ऊपर जाना मुमकिन है। मैंने सीढ़ियों पर चढ़ना चाहा। हवा बड़े शोर-शराबे से चल रही थी। सीढ़ियों पर कदम जमाना मुश्किल था। डरता था कि जिस तरह झक्कड़ चल रहे हैं, कहीं उनकी लपेट में आकर नीचे ना जाऊं। मैंने गड़गड़ा कर दुआ मांगी कि ऐ खुदा, तेरे सिवा मुझे बचाने वाला कोई नहीं। मेरा बानी कर। शायद वह वक्त दुआ के कबूल होने का था। कुछ देर में तूफानी हवा थम गई और मैं आसानी से सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जा पहुंचा। वहां से गुंबद तक जाना आसान था। गुंबद के साए में जाकर मैंने खुदा का शुक्र अदा किया कि जिंदा सलामत हूं। क्या पता किसी दिन यहां से वतन वापस जाना भी मुमकिन हो जाए। मैंने बहुत देर मौजों के थपड़े खाए। बदन दुख रहा था। साहिल पर पहुंचने के बाद सदियों सीढ़ियां चढ़ी थी। बुरी तरह थका होने की वजह से मुझे जल्दी नींद आ गई।

मैंने ख्वाब में किसी को कहते सुना, "ऐ यूसुफ के बेटे जैन, जब तुम्हारी आंख खुले तो जहां तुम्हारे पांव हों वहां जमीन खोदना। जमीन में से पीतल की कमान और शीशे के तीन तीर मिलेंगे। उन पर तिलिस्मी लफ्ज लिखे हुए होंगे। कमान और तीर उठाकर उस सवार को निशाना बनाना जो गुंबद के ऊपर खड़ा है। तुम्हारा तीर निशाने पर लगते ही सवार घोड़े समेत समंदर में जा गिरेगा। तिलिस्म टूटेगा तो मैग्नेटिज का पहाड़ समंदर में जा समाएगा और जहाजों को हमेशा के लिए इस अजाब से निजात मिल जाएगी। कमान को जमीन में वहीं गाड़ देना जहां से इसे निकाला था। जब यह काम हो चुका तो समंदर चढ़े और आखिरकार गुंबद तक आ पहुंचेगा। उस वक्त पीतल की एक कश्ती नुमाया हो जाएगी। जिसे पीतल का आदमी चला रहा होगा। यह वह सवार ना होगा जिसे तुम मार गिरा चुके होंगे। पीतल के आदमी से बात करने की जरूरत ना करो। कश्ती में बैठ जाना। पीतल का मल्लाह कश्ती चलाना शुरू कर देगा और 10 दिन बाद इसी जगह पहुंचा देगा जहां से तुम सलामत अपने वतन जा सकोगे। एक शर्त है। उन 10 दिनों में खुदा का नाम बिल्कुल ना लेना।"

ख्वाब में यह बातें सुनने के फौरन बाद मेरी आंख खुल गई। मेरी मायूसी खुशी में बदल चुकी थी। मैंने देखा कि कोने में बेलचा पड़ा है। मैंने बेलचा उठाकर जमीन खोदनी शुरू कर दी। कमान और तीर लेकर गुंबद के बाहर आया और सवार पर तीर चलाया। इत्तेफाक से पहला ही तीर निशाने पर जा बैठा। तीर का लगना था कि सवार और घोड़ा दोनों समंदर में जा गिरे। मैंने कमान जाकर जमीन में दबा दी। बाहर आया तो देखा कि समंदर की सतह बुलंद हो रही है। जब पानी की लहरें गुंबद के साथ से टकराने लगी तो मुझे कश्ती अपनी तरफ आती दिखाई दी। मैंने खुदा का शुक्र अदा किया। कश्ती पास आई तो मैंने देखा कि पीतल का आदमी इसे खींच रहा है। उसके सीने पर शीशे की एक तख्ता लटक रही थी जिस पर तिलिस्मी अल्फाज लिखे थे और अजीबोगरीब शक्ल बनी हुई थी। मैं चुपचाप कश्ती में जा बैठा और पीतल का आदमी मुझे ले चला।

दिन-ब-दिन रोज गुजरते रहे। मुझे भूख लगती ना प्यास। दसवें दिन सुबह को दूर चंद जजीरे नजर आए। मैंने दिल में कहा कि अब वतन वापस पहुंचने की कोई सूरत निकल आएगी। खुशी के मारे कुछ याद ना रहा कि ख्वाब में सुनाई देने वाली आवाज ने क्या ताकीद की थी। मेरे मुंह से निकला, "खुदा का लाख लाख शुक्र है कि मेरी जान बच गई।" यह कहने की देर थी कि कश्ती उलट कर गायब हो गई। मैं समंदर में गोते खाने लगा और मौजें मुझे जजीरे से दूर ले चली। मुझे तैरना आता था। मगर मौजों के आगे मेरा क्या बस चलता? मैं दिन भर तैरता रहा। जब अंधेरा छा गया तो मेरे बाजुओं में ताकत ना रही। मुझे यकीन हो गया कि मैं जल्द डूब कर मर जाऊंगा।

मैं यह सोच ही रहा था कि एक बहुत बड़ी लहर आई और उसने उठाकर मुझे एक जजीरे के रेतले साहिल पर ला फेंका। क्योंकि मैं रेत पर गिरा था इसलिए चोट ना आई। दिन भर तैरते रहने से मेरे जिस्म में कुव्वत ना रही थी। सो 200 कदम चलकर मैं वहीं रेत पर गिर पड़ा और मुझे नींद आ गई। सुबह उठकर सोचा कि किधर जाऊं। मैंने चलना शुरू किया। पता चला कि मैं एक छोटे से जजीरे पर हूं। जहां ना कुछ खाने को मिल सकता है ना पीने को। मैंने दिल में कहा कि यह भी खूब है। एक मुसीबत से बचता हूं तो दूसरी में फंस जाता हूं। यहां रहा तो भूखा प्यासा मर जाऊंगा।

मैं यह सोच रहा था कि दूर एक कश्ती दिखाई दी जो जजीरे की तरफ आ रही थी। मैं एक दरख्त पर चढ़कर पत्तों में छिप कर बैठ गया। क्योंकि मुझे कुछ मालूम ना था कि कश्ती में कौन लोग सवार हैं और जजीरे पर किस लिए आना चाहते हैं। कश्ती किनारे पर आ लगी और उसमें से 10 गुलाम उतरे। उनके हाथ में बेलचे थे। वे बीच जजीरे में आकर जमीन खोदने लगे। खोदते-खोदते नीचे लकड़ी का बना हुआ गोल दरवाजा नुमाया हुआ। उन्होंने दरवाजा खोला और वापस जाकर कश्ती से सामान उतार के अंदर ले जाने लगे। वे आटा, मक्खन, शहद, दाल, चावल, अंडे और ऐसी तमाम चीजें ले आए जो घर में रहने, सहने के लिए जरूरी हैं। जब तमाम सामान पहुंचा चुके तो उम्दा पोशाक लेकर उतरे। एक बूढ़ा कश्ती से बाहर आया। जो कमजोरी की वजह से मुश्किल से चल सकता था, उसने नीले रंग का फकीरी लिबास पहन रखा था। उसके साथ एक लड़का था। इतना खूबसूरत लड़का मैंने कभी ना देखा था। मैं उसके हुस्न पर हैरान रह गया। वे सब दरवाजे के रास्ते अंदर चले गए और दो-तीन घंटे वहीं ठहरे रहे। बाद में गुलाम बाहर आए और बूढ़ा भी। वह लड़का उनके साथ ना था। उन्होंने दरवाजा बंद किया और इसे मिट्टी से ढक दिया और कश्ती पर सवार होकर आन की आन में नजर से गायब हो गए।

मैं दरख्त से उतरा और उधर गया जहां मैंने दरवाजा देखा था। मिट्टी हटाकर दरवाजा खोला जो चक्की के पाट की तरह गोल था। मुझे पत्थर का एक चक्रदार जीना नजर आया। मैंने तजुर्बा किया और सीढ़ियां उतरने लगा। सीढ़ियां खत्म हुई तो मैंने देखा कि साफ सुथरे मकान में जा पहुंचा हूं। जहां दरियां और कालीन बिछे हुए हैं और एक जानिब वही लड़का एक मसहरी पर गांव तकिए से।

लगा बैठा है। उसके हाथ में पंखा था। सामने फूल रखे थे और खुशबुएं चल रही थी। जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो उसका रंग पीला पड़ गया। मैंने सलाम किया और कहा, "ए भाई, मुझसे डरने की जरूरत नहीं। मुतमईन रहो। मैं भी इंसान हूं। एक सुल्तान का बेटा हूं। किस्मत ने मुझे इस रेत पर ला फेंका है। शायद मैं इसलिए यहां आया कि तुम तन्हाई में ना घबराओ। मैं साथ रहूंगा और तुम्हारा दिल बहलाऊंगा। मगर यह क्या चक्कर है कि जो लोग कश्ती पर सवार होकर आए थे, तुम्हें इस तारीख मकान में छोड़कर चले गए?"

जब लड़के को यकीन हो गया कि मैं इंसान हूं, जिन या भूत नहीं, तो उसके चेहरे का खुल उठा और मुझे पास बिठाकर कहने लगा, "भाई, मेरा किस्सा बड़ा नौहा है। तुमने ऐसा किस्सा कभी ना सुना होगा। मेरा बाप हीरे और जवाहरात का लेनदेन करता है और बहुत अमीर है। दूरदराज के मालिक से उसके पास माल आता है और उसके गिर्द हर वक्त खरीदारों की भीड़ लगी रहती है। उसके कोई औलाद ना थी। एक दिन उसे ख्वाब में बताया गया कि तुम्हारे एक बेटा पैदा होगा। मगर लड़कपन में वह भूत हो जाएगा। जागने के बाद मेरा बाप बहुत रोया। मगर क्या कर सकता था? मैं पैदा हुआ तो बाप ने जश्न मनाया। सदियों गरीबों और फकीरों को खाना खिलाया। बड़े माहिर नजूमियों को बुलाकर कहा कि मेरे बेटे का जायजा बनाओ। उन्होंने हिसाब लगाकर कहा कि आपका बेटा 15 साल जिएगा। इसकी उम्र की लकीर कटी हुई है। अगर 15 साल का होकर भूत ना हुआ तो लंबी उम्र पाएगा। इसकी मौत का सबब यह होगा कि यहां से दूर एक समंदर है जो खूनी कहलाता है। वहां मैग्नेटज का पहाड़ है। इस जगह सदियों जहाज डूब चुके हैं। इस पहाड़ के पास एक गुंबद है जिस पर पीतल का बना हुआ सवार पीतल के घोड़े पर बैठा है। जब यह सवार और घोड़ा समंदर में जा गिरेंगे तो उसके 50 दिन बाद आपका बेटा मारा जाएगा। इसका कातिल वही होगा जो पीतल के सवार को मार गिराए। वह एक सुल्तान है। उसका नाम जैन बिन यूसुफ है।"

यह सुनकर मेरे बाप को बड़ा रंज हुआ। खैर, उसने मुझे अच्छी तरह पाला पोसा और पढ़ाया लिखाया। मैं 15 साल का हो गया। 10 दिन हुए। मेरे बाप को खबर मिली कि पीतल का सवार समंदर में गिर पड़ा है और जिसने इसे गिराया है, उसका नाम जैन है। मेरे बाप ने यही खतरे के बीच नजर जमीन के नीचे यह मकान बनवाया था। जैसे ही सवार के गिरने की खबर पहुंची, उसने मुझे यहां लेकर छुपा दिया। किसी को मेरे यहां होने की खबर नहीं। इसलिए शायद मैं कत्ल होने से बच जाऊं। यह है मेरी सारी कहानी।"

इसकी बात सुनकर मेरे होश उड़ गए। मैंने दिल में कहा, "मेरा नाम जैन है और घोड़ा मैंने ही गिराया है। मगर मैं इस लड़के को हरगिज़ कत्ल ना करूंगा। इसने मेरा क्या बिगाड़ा है जो मैं इसकी जान लूं। क्योंकि मैंने लड़के से कहा, "तुम परेशान ना हो। आइंदा तुम्हें कोई तकलीफ ना होगी और तुम लंबी उम्र पाओगे। मैं तुम्हारे पास रहूंगा। तुम्हारा दिल बहलाऊंगा और खानेपीने का बंदोबस्त करूंगा। जब 40 दिन पूरे हो जाएंगे तो चला जाऊंगा तुमसे। बस इतनी दरख्वास्त है कि मेरे साथ अपने चंद गोलाम कर देना ताकि वे मुझे मेरे वतन पहुंचाएं।"

हम बहुत देर तक बातें करते रहे। फिर मैंने दस्तरख्वान बिछाया और खाने की चीजें और फल लाकर रखे। गपशप करने के बाद लड़का सो गया और मैं भी एक तरफ जा लेटा। सुबह हुई तो मैंने पानी गर्म किया और लड़के को जगाया। उसने हाथ मुंह धोकर कहा, "ऐ जवान, खुदा तुम्हारा भला करे। खुदा की कसम मैं यहां से जिंदा सलामत घर पहुंच गया। और वह शख्स जिसका नाम जैन है मुझे कत्ल ना कर सका। तो मैं अपने बाप के सामने तुम्हारी तारीफ करूंगा और वह तुम्हें मालामाल कर देगा। अगर मैं मर गया तो भी मेरी यही दुआ है कि तुम सलामत रहो।"

मैं बोला, "खुदा ना करे कि तुम्हें कोई नुकसान पहुंचे, बल्कि मेरी दुआ यह है कि मैं मर जाऊं और तुम ना मर सको।" हमने नाश्ता किया। शतरंज की कई बाजियां खेली। अधर-अधर की बातें की। मैंने इसे दोपहर का खाना खिलाया। रात के वास्ते खाना तैयार किया। दिन गुजरते गए। मुझे लड़का बहुत अच्छा लगा। मैं रोज दिल में कहता था, "नजूमी सब परले दर्जे के झूठे हैं। मुझे क्या पड़ी है कि इस मासूम लड़के को मार डालूं।" 29 दिन और 29 रातें मैं इसके पास रहा और जितना ख्याल इसके आराम का रख सकता था मैंने रखा।

40वें दिन सुबह को लड़के ने कहा, "ऐ भाई, खुदा का शुक्र है कि मरने से बच गया। यह तुम्हारे यहां आने और मेरा ख्याल रखने की बरकत है। मेरी खुदा से दुआ है कि वह तुम्हें तुम्हारे वतन पहुंचा दे। भाई, मेरे लिए पानी गर्म करो ताकि अच्छी तरह नहा लूं और कोई उम्दा लिबास पहनूं।" मैं जाकर पानी गर्म किया। वह नहा धोकर अपनी मसेहरी पर जा लेटा और सो गया। दो-तीन घंटे बाद उसकी आंख खुली तो कहने लगा, "भाई, एक तरबूज तो काट कर लाओ। दोनों खाएंगे।" जहां खाने पीने का सामान रखा था। वहां से मैंने एक बड़ा तरबूज उठाया। देखा तो इसे काटने के लिए कोई चीरी मौजूद नहीं। मैंने पुकार कर कहा, "तरबूज तो मिल गया, मगर इसे काटूं कैसे? यहां कोई चीरी नजर ना आ रही।"

लड़का बोला, "धर आओ। मेरी मसहरी के पास जो ऊंचा ताक है, उसमें तेज चीरी रखी है।" मैं पलटा और मसहरी की पट्टी पर पांव रखकर ताक से चीरी उतारी। मसहरी से उतरने में जल्दी की, तो मेरा पांव फिसल गया और मैं चीरी समेत लड़के के ऊपर जा गिरा। चीरी उसके सीने में घुस गई और दिल के पार हो गई। मुझे पता चल गया कि वह मर गया है और मैं ही इसका कातिल हूं। मैं रोने पीटने लगा और अपने कपड़े फाड़ डाले। नजूमियों ने जो बात कही थी वह आखिर सच साबित हुई। यह सही है कि मैंने इसे जानबूझकर मारा ना था, मगर इसकी मौत वाकया तो मेरे हाथों ही थी। मेरे बस में कुछ ना था।

मैं बाहर आया और किवाड़ बंद करके ऊपर मिट्टी ढाल दी। इस काम से फारिग हुआ तो दूर समंदर में कश्ती जजीरे की तरफ आती दिखाई दी। मैं डर गया और सोचा कि थोड़ी देर में लड़के के बाप और उसके गुलाम यहां पहुंच जाएंगे और लड़के की लाश देखकर समझेंगे कि मैंने इसे कत्ल किया। जजीरे में और कोई तो है नहीं, इसलिए मुझे पकड़ कर मार डालेंगे। यह सोचकर एक दरख्त पर चढ़ गया जो बहुत घना था और पत्तों की छांव में जा छुपा। थोड़ी देर में कश्ती किनारे से आ लगी और बाप और गुलामों ने उतर कर जमीन के नीचे बने मकान का रुख किया। अंदर पहुंचकर उन्हें पता चल गया कि लड़के को कत्ल कर दिया गया है। आखिर वे लड़के की लाश लेकर रोते पीटते बाहर निकले और कातिल को बद्दुआ देने लगे। बूढ़ा बाप बेहोश होकर गिर पड़ा। गुलामों ने समझा कि वह मर गया। उन्होंने लड़के को रेशमी चादर में लपेटा और कश्ती में रखा। उनके वापस आने तक बाप उठ खड़ा हुआ और जमीन से मिट्टी उठाकर सर पर डालने और मुंह पर तमाचे मारने लगा। अपनी दाढ़ी नोच ली। उसके आंसू थमने ना आते थे। वह दोबारा बेहोश हो गया। गुलाम उसके आसपास बैठ गए। बड़ी देर बाद उसे होश आया और अपने बेटे का ख्याल आते ही उसने आह भरी और दम तोड़ दिया। गुलाम इसकी मौत पर बहुत रोए। शाम हो चुकी थी। कब तक बैठे मातम करते बाप की लाश को भी ले जाकर कश्ती में रखा और रवाना हो गए।

जब कश्ती नजर से गायब हो गई तो मैं दरख्त से उतरा। इस लड़के को याद करता रहा। जो दिन हम दोनों ने हंसीखुशी गुजारे थे। जब उनका ख्याल आता तो जी चाहता कि मैं वहीं कहीं सर फोड़कर मर जाऊं। कहीं जा तो सकता ना था। सुबह से शाम तक जजीरे में घूमता रहता। शाम होती तो जमीन के नीचे बने मकान में पनाह लेता और सो जाता। कई दिन गुजर गए।

एक सुबह उठा तो देखा कि जजीरे के मगरिब में समंदर का पानी कम होता जा रहा है और दूर कोई सर जमीन नजर आ रही है। मैं खुश हुआ। अगले दिन पानी और उतर गया और मैंने समंदर में चलना शुरू किया। पता चला कि पानी मेरे घुटनों तक है। दिन भर चलता रहता और नई सर जमीन तक जहां पहुंचा। जहां साहिल के आगे बहुत ऊंचे और बड़े-बड़े रेत के टीले थे। शाम हो चुकी थी। मजीद सफर करने का हौसला ना रहा। वहीं समंदर के किनारे सो गया। अगले दिन रेत के टीले पर चढ़ना शुरू किया। यह मुश्किल काम था। आखिर गिरता पड़ता एक बहुत ऊंचे टीले की चोटी पर पहुंचा। दूर एक तरफ चमक दिखाई दी जैसे आग जल रही हो। टीले से उतर कर मैंने इसी सिम में चलना शुरू किया। करीब पहुंचा तो देखा कि एक महल है जिसका दरवाजा चमकीले पीतल का है। धूप पड़ने से वह चमक उठता है और दूर से मालूम होता है कि आग रोशन है। मैं थक चुका था। इसलिए दरवाजे के सामने बैठकर सांस लेने लगा। मुझे वहां बैठे थोड़ी देर हुई थी कि दरवाजा खुला और 10 जवान उम्दा लिबास पहने बाहर आए। एक बूढ़ा उनके साथ था। मैं यह देखकर हैरान हुआ कि सब जवान भाई आंख से कान थे। जब उनकी नजर मुझ पर पड़ी तो उन्होंने मुझे सलाम किया और पूछा कि तुम यहां कैसे आए? मैंने जो मुसीबतें उठाई थी उनका अहवाल बयान किया और कोई बात ना छुपाई। मेरा किस्सा सुनकर वे हिरत ज्यादा रह गए। उन्होंने मुझे साथ लिया और हम महल में दाखिल हुए। देखा कि महल के सहन में 10 तख्त बिछे हैं। सबके गद्दे और गांव तकिए नीले रंग के थे। उन तख्तों के बीच में एक छोटा तख्त रखा था। उस पर भी नीली दरी थी और नीला ही तकिया। जवान अपने अपने तख्तों पर जा बैठे। छोटा तख्त बूढ़े के लिए था। तख्त पर बैठने के बाद बूढ़े ने कहा, "ए जवान, हम तुम्हें इस महल में ठहरने की इजाजत देते हैं। जब तक तुम्हारा दिल चाहे यहां रहो। मगर हमारा हाल और नौजवानों के काने होने की वजह हरगिज़ ना पूछना।" मैं भी एक तरफ फर्श पर बैठ गया। फिर बूढ़ा उठा और सबके लिए खाना लाया। हम खा पीकर सिर हुए। मुझे मुद्दत बाद अच्छा पका हुआ खाना मिला था। खूब डट कर खाया। बाद में हम गपशप करने लगे। यहां तक कि आधी रात हो गई। तब उन नौजवानों ने बूढ़े से कहा, "बड़े मियां, आधी रात हो गई। देर करनी मुंसिब नहीं जो हम हमेशा आधी रात को करते हैं। उसका सामान लाओ।" बूढ़े ने कहा, "जो आपका हुकुम।" वह महल में गया और वापस आया तो उसने सर पर 10 सीनियां उठा रखी थी और हर सीनी नीले कपड़े से ढकी हुई थी। उसने एक-एक सीनी हर नौजवान के सामने रख दी। नौजवानों ने नीला कपड़ा हटाया तो नजर आया कि सीनियों में राख, कोयला और अंडों की कड़क के सिवा कुछ नहीं। उन्होंने आस्तीन चढ़ा ली और रोने पीटने, गालों पर तमाचे मारने और मुंह काला करने लगे। बार-बार कहते, "हम लोग आराम से जिंदगी बसर कर रहे थे। मगर हमारी अकल फूटी और बुरे अंजाम को पहुंचे।" देर तक मातम करने के बाद उन्होंने हाथ मुंह धोया, कपड़े बदले और सोने के लिए महल में चले गए। बूढ़े ने मुझे भी एक कमरे में पहुंचा दिया। मुझे नींद क्या आती जो देखा था। उसकी वजह से हैरान परेशान था। यही सोचता रहता कि नौजवानों ने अपने मुंह क्यों काले किए और किस लिए इतना रोए? कुछ समझ में ना आता था।

दो-तीन दिन मैंने सब्र किया। आखिर मुंह से रहा ना गया। मैंने कहा, "दिन भर और आधी रात तक तो तुम हंसते बोलते रहते हो। समझदारी की बातें तुम्हारी जुबानी सुनने में आती है। मगर आधी रात को तुम पर पागलपन सवार हो जाता है। रोते हो, मुंह काला करते हो, बाएं आंख से गाने हो। बताओ तो सही यह माजरा क्या है?" वे बोले, "हमने पहले ही दिन तुमको मना ना किया था कि हम जैसे हैं और जो कुछ करते हैं उसके बारे में कोई पूछताछ ना करना। हम कुछ ना बताएंगे।" मेरी अकल बिल्कुल चकरा गई। कई दिन गुजरे। उनका हाल जानने की इसी फिक्र दिल में समा कि खाना पीना छूट गया। मैं उनके पीछे पड़ गया कि मुझे अपना राज बताओ। वरना मैं उसी तरह भूखा प्यासा मर जाऊंगा। उन्होंने कहा, "अगर हमने अपने राज से पर्दा उठाया तो तुम्हें तकलीफ पहुंचेगी और तुम भी हमारे जैसे हो जाओगे।" मैंने उनकी एक ना सुनी और जिद करता रहा। जब उन्होंने देखा कि मैं बाज ना आऊंगा तो वे एक मेढ़ा लाए। इसे जबा कर खाल उतारी और मुझसे कहने लगे, "इस खाल को लपेट कर बैठ जाओ। हम तुम्हें महल की छत पर छोड़ आएंगे। खाल देखकर रुख नाम का परिंदा आएगा और पंजों में खाल दबोच कर उड़ जाएगा। वह एक पहाड़ पर उतरेगा। पहाड़ पर पहुंचते ही तुम खाल में से निकल आना। रुक तुम्हें देखकर डरेगा और उड़ जाएगा। तुम पहाड़ से उतर कर रवाना हो जाना। दोपहर के वक्त तुम्हें एक आलीशान महल नजर आएगा। उसमें कदम रखना। तुम्हें पता चल जाएगा कि हमारी आंखें कैसे फूटी और हम क्यों मातम करते हैं। हम में इतनी हिम्मत ना है कि अलग-अलग अपनी कहानियां बयान करें। उन्हें सुनाने से हासिल भी कुछ ना होगा।"

मैं दिल में बहुत खुश हुआ कि अब उनका भेद खुल जाएगा। जो उन्होंने कहा था वही किया और रुख परिंदा मुझे ले उड़ा और एक पहाड़ पर जा उतरा। मैं खाल में से निकला तो वह डर कर उड़ गया। मैंने पहाड़ से उतर कर चलना शुरू किया और दोपहर के वक्त वह महल नजर आया जिसका कान नौजवानों ने जिक्र किया था। ऐसा अजीबोगरीब महल मैंने कभी ना देखा था। महल में दाखिल होते ही 40 खूबसूरत लड़कियों ने मुझे घेर लिया। उनके हुस्न को बयान करने के लिए मेरे पास अल्फाज़ नहीं। एक से बढ़कर एक हंसी थी। कहने लगी, "ऐ साहिब, हम तो बहुत दिन से आपकी राह देख रहे थे। आपको खुशामदीद कहती हैं। खुदा का शुक्र है कि आप तशरीफ लाए।" उन्होंने मुझे ले जाकर एक तख्त पर बिठा दिया जो सोने चांदी का बना हुआ था। हाथ बांधकर अदब से सामने खड़ी हो गई और बोली, "आज से आप हमारे मालिक और हम आपकी बंदी हैं। जो हुकुम देंगे। हम फौरन बल्कि फौरन से भी पहले बजा लाएंगी।" मुझे ऐसा लगा जैसे मैं कोई ख्वाब देख रहा हूं। इसके बाद दस्तरखान बिछा। तरह-तरह के खाने छंद दिए गए। बाका लड़कियां गाने लगी, बाका साझ बजाने लगी। मैं सुल्तान बनकर उनके दरमियान बैठा था। खाना खाने के बाद मैं महल में घुमा फिरा। वहां दुनिया का हर आराम मिस्र था। ऐसा ऐश तो मैंने उस वक्त भी ना किया था जब मैं अपने ममालक में सल्तनत करता था। मुझे किसी बात का होश ना रहा। हर दिन ईद थी। हर रात शब बारात थी। मजे से पूरा साल गुजर गया।

साल खत्म हुआ तो सब लड़कियां मेरे अर्दगिर्द जमा हो गई और बोली, "काश हम ना मिले होते। जुदाई की घड़ी आ पहुंच गई। मगर अगर आपने हमारे किए पर अमल किया तो उसमें आपकी भलाई है।" मैं हैरान हुआ और कहने लगा, "इन बातों का क्या मतलब है? क्या मैंने कोई ऐसी हरकत की जो तुम्हें नापसंद गुजरी? हम तुमसे जुदा क्यों होंगे?" लड़कियों ने जवाब दिया, "कि हम परियों की शहजादियां हैं। एक बरस इस महल में रहती हैं। साल पूरा होने के बाद हमें 40 दिन के लिए परस्तान जाना पड़ता है। यह हमारा उसूल है। हमारा कानून है। इसकी खिलाफवर्जी मुमकिन नहीं। आप हमारे बगैर यहां अकेले घबराएं इसलिए हम आपको 40 कुंजी दे जाती हैं। आपको मालूम होना चाहिए कि इस महल में 40 छोटे-छोटे महल भी हैं। आप हर रोज एक महल की सैर करके दिल बहलाया कीजिए। मगर खबरदार 40वें दरवाजे को हरगिज़ ना खोलिए। अगर इसे खोला तो फिर हमसे कभी मिलना ना होगा।" मैंने कहा, "अगर यह बात है तो मैं 40वें दरवाजे को खोलने का ख्याल भी दिल में ना लाऊंगा।" गरज कि वे लड़कियां रो धोकर रखस्त हुई और मैं वहां अकेला रह गया।

रात जोरू कटी। सुबह उठते ही मैंने पहला दरवाजा खोला। देखा कि एक सिहाने बाग में पहुंच गया हूं। हर तरफ हरेभरे दरख्त पके फलों से लदे हुए हैं। चिड़िया गा रही हैं। फव्वारे चल रहे हैं। टहरे जा रही हैं। मुझे वहां सैर करके बड़ा लुत्फ आया। दिन अच्छा गुजर गया। अगले रोज दूसरा दरवाजा खोला। देखा कि एक हराभरा मैदान है। बीच में नहर है। नहर के किनारे झाड़ियां हैं। जिनके रंग बिरंगे फूलों की खुशबू हर तरफ फैली हुई है। जगह-जगह खजूर के दरख्त हैं। हिरण के बच्चे चौकी भरते पनह रही हैं। तीसरे दिन तीसरा दरवाजा खोला। देखा कि संघ मरमर की बनी हुई बड़ी-बड़ी और बुलंद इमारतें हैं। उनमें कईमती पत्थर लगे हुए हैं। जा बजा रंगीन पंजरे लटके हैं। जिनमें चिड़िया सुरेली आवाजों में गा रही हैं। क्या कहूं, जो दरवाजा खोलता नया मंजर दिखाई देता था। उन महलों में इतने खजाने थे कि किसी ने कभी ना देखे हो। ना उनके बारे में कुछ सुना होगा। मैं खुशी से फूला ना समता था कि यह तमाम खजाने मेरे हैं। इतनी दौलत बड़े-बड़े सुल्तानों के पास भी नहीं हो सकती। उसी सैर तमाशे में 29 दिन गुजर गए। सिर्फ 40वां दरवाजा रह गया। जिसे खोलने से लड़कियों ने मने किया था। अगर मैं सब्र करता तो लड़कियां वापस आ जाती और मैं एक साल मजीद ऐशो आराम में गुजारता। मगर इंसान का मिजाज ऐसा है कि जिस बात से मने किया जाए वही को करना चाहता है। दिल ललचाया गया कि 40वां दरवाजा भी खोलना चाहिए। सोचा कि 40वें महल में जरूर कोई लाजवाब खजाना होगा या शायद कोई इसी अजीबोगरीब शेर हो जिसकी मिसाल दुनिया में ना मिल सके। मुझसे रहा ना गया। हौस के मारे सोचे समझे बगैर 40वां दरवाजा खोला। अंदर कदम रखते ही ऐसी तेज खुशबू आई कि मैंने कभी ना सूंघी थी। मैं मतवाला होकर गिर पड़ा और कई घंटे तक बेहोश पड़ा रहा। होश आया तो देखा कि हर तरफ कंदील रोशन है और कदम कदम पर खुशबुएं जल रही हैं। आगे बढ़ा तो बड़ा जबरदस्त घोड़ा नजर आया जो बिल्कुल काला था और उसके सामने बलूर की नांदी रखी थी जिसमें तेल और चने पड़े थे। एक और नांदी पानी से भरी थी जिससे गुलाब और मशक की खुशबू आ रही थी। घोड़े का साज सोने का था। मैंने सोचा कि घोड़े पर सवार होना चाहिए। इस पर सवार होने से कोई बड़ा राज मालूम हो जाएगा। मैं घोड़े पर चढ़ गया और इसे चलाना चाहा। वह जरा भी ना हिला। मुझे गुस्सा आ गया। मैंने इसे जोर से छाप मार दी। चाप लगते ही वह जोर से निहा जैसे बादल गरजता है। उसके पर निकल आए और मुझे ले उड़ा। बड़ी देर तक उड़ने के बाद एक महल की छत पर जा उतरा। मैं भी इस पर से उतर पड़ा। मेरे उतरते ही उसने अपनी दुम घुमाकर मेरे मुंह पर इस तरह मारी कि मेरी बाई आंख फूट गई। मेरी आंख फूट कर वह उड़ गया। अधर मैंने गौर किया कि मैं कहां हूं। पता चला कि यह वही महल है जहां से मैं रवाना हुआ था। छत से उतर कर नीचे आया तो दसों कानने नौजवानों को देखा। उन्होंने मुंह पलट कर कहा, "यहां से दफा हो जा।" मैंने मन्नत की कि देखो, "मैं भी तुम जैसा हो गया हूं। मुझे यहां ठहरने दो। ताकि तुम्हारी तरह रॉ पोटों और मुंह काला करूं।" उन्होंने एक ना सुनी और कहकर बोले, "चलता बन यहां से। हम तुझे अपने साथ नहीं रखना चाहते।"

जब उन्होंने मुझे महल से निकाल दिया तो मेरे दिल को सख्त सदमा पहुंचा। मैंने कहा, "पता नहीं मेरी किस्मत में और क्या लिखा है। मुझसे बेवकूफ कोई ना होगा। कहां मैं ऐसी जिंदगी गुजार रहा था जो सुल्तानों को भी नसीब ना होती। और कहां इस कदर जिल्लत उठानी पड़ी। कान्हा अलग हो गया। कहीं कान्हा रहा।" यह सोचता हुआ चलता गया। ना मालूम कितने शहर देखे, कितने मलिक से गुजरा हुआ। आखिरकार मैं बगदाद पहुंच गया। खलीफा हारून रशीद जिन्होंने भीस बदल रखा था। उन्होंने इन दोनों कलंदरों की कहानियां सुनी तो कहा, "तुम दोनों की कहानियां तो बड़ी अजीबोगरीब है।" यह सुनकर मुझे बहुत अच्छा लगा। फिर खलीफा हारून रशीद कहने लगे, "तुम दोनों सुबह खलीफा के दरबार में हाजिर होना।" जब वे दोनों कलंदर सुबह खलीफा के दरबार में हाजिर हुए तो उन्होंने सामने बैठे हुए खलीफा को देखा। खलीफा ने उन्हें बताया कि रात को मैंने तुम्हारी कहानियां सुनी थी। बेशक भी बदलकर मैं वही था जिसे तुम दोनों ने अपने अजीबोगरीब किस्से सुनाए। इसके बाद खलीफा हारून रशीद ने उन्हें इनाम व अकराम देकर रखस्त किया।