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Bharosa Sirf Allah Par Rakho | Allah Par Yakeen Jisne Badal Di Taqdeer | Islamic Moral Story |

Mr. MR Voice 46:27

Transcription

बहुत पुराने वक्तों की बात है। दूर एक रेतीले इलाके में छोटा सा खरिया था। मिट्टी की टेढ़ीमेढ़ी गलियां, कच्चे घर, हवा में गर्द का पर्दा और उन्हीं झोपड़ियों में से एक टूटे दरवाजे वाली झोपड़ी में करीम नाम का एक गरीब मजदूर अपनी बीवी जमीला के साथ गुजारा कर रहा था।

करीम दुबला पतला, चेहरा थका हुआ मगर आंखों में अजूबा सा यकीन। सिर पर पुरानी पगड़ी जैसा लिपटा कपड़ा, बदन पर जगह-जगह से फटा हुआ कुर्ता, पांव में घिसी हुई चप्पल जो हर कदम पर इम्तिहान की तरह चरमराती। जबकि जमीला अभी जवान, चेहरे पर खूबसूरती की हल्की सी बाकी रौनक मगर लहजे में सखा, निगाहों में नाशुक्री, दिल में हमेशा यह शिकायत कि जिंदगी ने हमें क्या दिया?

सुबह का वक्त होता, बाहर आसमान खुला हुआ, हल्की सी ठंडी हवा, मिट्टी की दीवारों के ऊपर से नीला आसमान झांकता, अंदर झोपड़ी में थोड़ा सा आटा, थोड़ी सी सूखी दाल, एक टूटा सा घड़ा। और चूल्हे के पास बैठा करीम अपनी बीवी की तरफ देखने की हिम्मत जुटाते हुए कहता, "जमीला सुनो, आज भी मैं मजदूरी के लिए वही पुराने बाजार के पास जाऊंगा। अगर किसी साहब ने बुला लिया तो शाम तक कुछ दहम हाथ आ जाएंगे। तुम फिक्रमंद मत हो, अल्लाह है ना, वो किसी का भी रिहान नहीं छोड़ता।"

जमीला तुनक कर जवाब देती, "बस करो करीम, हर रोज यही जुमला। अल्लाह है ना, अगर सिर्फ यह जुमला कहने से चूल्हे में आग जलती, बच्चों को रोटी मिलती तो आज हम भी आराम से बैठकर को काफा पी रहे होते। मैं थक गई हूं तेरे इस यकीन से। कुछ दिखता नहीं, बस बातें ही बातें हैं।" उसकी आवाज में ऐसा गिला होता कि झोपड़ी की दीवारें भी शर्मिंदगीगी से चुप हो जाती।

करीम हल्का सा मुस्कुराता। अंदर गहरा सा दर्द लेकर कहता, "जमीला, तू मेरे दिल का हाल नहीं जानती। मैं भी थक जाता हूं और मैं भी रोता हूं। मगर जब रात देर से मस्जिद के पास से गुजरता हूं ना, तो दिल से एक ही आवाज आती है। उम्मीद बस अल्लाह से। बंदे से उम्मीद रखोगी तो तू टूटेगी। अल्लाह से रखेगी तो संभली रहेगी। मैं मजबूर हूं, बेईमान नहीं।"

जमीला गुस्से से चूल्हे के पास रखा पुराना लकड़ी का चम्मच पटक कर कहती, "तू मजबूर भी है और नाकाम भी। देख मेरे कपड़े देख, यह झोपड़ी देख, तेरा चेहरा, सब में बस फटाश, कमी, जिल्लत। अगर सच में अल्लाह तेरे साथ होता तो क्या हमें इस हाल में रखता?" यह जुमला सुनते ही करीम का चेहरा सुन पड़ जाता मगर वह जवाब में ऊंची आवाज नहीं करता, बस हल्का सा कहता, "ऐ औरत, अल्लाह पर एतराज ना कर। यह जिंदगी इम्तिहान है, आराम का मकान जन्नत है, यहां तो बस सब्र का सफर है।"

जमीला झुंझुलाहट से हाथ झटकते हुए बोलती, "मुझे तेरी यह बातें नहीं सुननी। मुझे बस इतना पता है कि पड़ोस वाली सकीना के घर रोज दो वक्त गोश्त पकता है। उसके मियां के पास ऊंट है, बकरियां हैं। और तू, तू अभी तक एक ढंग का चक्की का काम भी नहीं पकड़ सका।" और यह कहकर वो रोज की तरह बर्तनों की खनखनाहट में अपना गुस्सा छुपा देती।

उसी झोपड़ी के कोने में फटी चटाई के पास एक दुबली सी सफेद काली धब्बों वाली छोटी सी बिल्ली भी रहती थी। कभी वह चूल्हे के पास जाकर रखी हुई हड्डियों के टुकड़े सूंघती। कभी करीम के पांव के पास आकर गरीब सी मऊ करती। उसे कोई खास खाना नहीं मिलता। लेकिन फिर भी वह उसी घर से जुदा नहीं होती जैसे उस गरीब घर की पुरानी वफादार मेहमान हो। हर रोज वह जमीला की शिकायतें सुनती। करीम के सब्र भरे जुमले सुनती और उसकी छोटी सी आंखों में जैसे कोई गहरी सोच तैरती।

करीम जब सुबह दरवाजे की टूटी चौखट से बाहर निकलता, बिल्ली हल्के से उसकी टांग से लिपट कर जैसे उसे रोकने की कोशिश करती। वो मुस्कुरा कर उसके सर पर हाथ फेर देता, "ओए बिल्ली, तू तो मेरी एक सरगर्म दोस्त निकली। बस तू ही है जो मेरे जाते वक्त कुछ नहीं कहती, ना उलाहना, ना शिकवा।" बिल्ली म्याऊं करके जवाब देती, मगर उसके अंदर कुछ और पल रहा होता जो अभी तक किसी को मालूम ना था।

बाहर करिया की गलियों में धूल उड़ती, दूर मस्जिद की मीनार से अजान की आवाज कभी-कभी हवाओं के साथ उनके कानों तक पहुंचती। करीम अजान सुनकर अक्सर ठहर जाता, सिर झुका कर दुआ करता, "या अल्लाह, आज की रोज ही तू ही आसान कर दे। मेरे घरवाली के दिल से नाशुक्री निकाल दे। उसे भी तेरा यकीन नसीब कर दे। मैं गरीब सही, मगर तेरा मोहताज हूं, बंदों का नहीं।"

एक दिन का वाकया ऐसा हुआ। सुबह से ही आसमान साफ था। मगर हवा में अजीबा सा सुकून था। करीम सो कर उठा। पेट में कचोट। चूल्हे के पास आकर देखा तो आज सच में खाने को कुछ ना था। आटा खत्म, दाल का डिब्बा लगभग खाली। जमीला का चेहरा पहले से ज्यादा सख। वो फर्श पर बैठी कपड़ा सिल रही थी। मगर हर टांगे में शिकायत थी। उसने बिना ऊपर देखे कहा, "आज अगर तू खाली हाथ आया ना करीम, तो सुन ले। मैं तेरे साथ नहीं रहूंगी। तुरंत मैं अपने भाई के घर चली जाऊंगी। कम से कम वहां मुझे भूखे पेट नहीं सोना पड़ेगा।" यह कहकर उसने सुई का नुकीला सिरा जोर से कपड़े में चुभाया जैसे करीम की उम्मीद को चीर रही हो।

करीम ने दलदल में फंसी सांस की तरह जवाब दिया, "ए जमीला, तू ऐसा मत कह। तेरा मायका भी तो गरीब है। औरत का असल आसरा उसका शौहर होता है और शौहर का सहारा उसका रब। तू अगर मुझे छोड़कर चली गई तो मैं तो अंदर से टूट जाऊंगा और तू भी आराम नहीं पाएगी। याद रख, नाशुक्री दिल को कभी सुकून नहीं देती।"

जमीला ने तंज से मुस्कुरा कर कहा, "देखते हैं। पहले तू जा। अगर शाम तक कुछ ना लाया तो फिर मैं अपना रास्ता खुद तय करूंगी।"

बिल्ली एक कोने से यह सब सुन रही थी। उसकी आंखें गोलगोल हो रही थी जैसे वो इंसानों की जुबान समझती हो। जैसे उसे दोनों के दिलों की खबर हो।

करीम उस दिन ज्यादा भारी कौदमों के साथ झोपड़ी से निकला। दरवाजे पर ठिटका, आसमान की तरफ देखा। "या रब, आज मेरा इम्तिहान बहुत बड़ा है। आज अगर रोजी ना मिली तो सिर्फ पेट नहीं, मेरा घर टूट जाएगा। मेरी बीवी का यकीन हमेशा के लिए बिखर जाएगा। तू ही है जो नामुमकिन में भी रास्ता निकाल देता है। तेरी कौदत में किसी चीज की कमी नहीं।" यह कहकर वह आगे बढ़ गया। पीछे से बिली दरवाजे तक दौड़ कर आई। अपनी चमकीली आंखों से उसे जाते देखती रही। एक हल्की सी म्याऊं की आवाज निकाली जैसे उसकी दुआ में आमीन कह रही हो।

दिन भर करीम बाजार के चक्कर लगाता रहा। कभी किसी ताजिर के दरवाजे पर ठहरता, "भाई, आज कोई काम है? बोरियां उठवानी हो, लकड़ी ढोनी हो, मैं मजदूरी कर लूं।" जवाब में या तो ठंडी निगाहें या मजबूरी भरी मुस्कुराहट। "आज नहीं करीम। आज आदमी ज्यादा हो गए। काम कम है।" वह मायूस होकर आगे बढ़ जाता। मगर दिल में जुबान चलती रहती, "उम्मीद बस अल्लाह से रखो। वो आज नहीं तो कल कहीं ना कहीं से रास्ता निकालेगा।"

दूसरी तरफ झोपड़ी में दोपहर चढ़ती गई, भूख भी और गुस्सा भी। जमीला कहती, "एक यह हमारा नसीब है कि मुंह तक नहीं पड़ती हूं। ना घर में कुछ, ना बर्तन में कुछ। और एक वह सकीना है जिसके घर तू देख, आज भी धुआं उठ रहा होगा। घश्त पक रहा होगा।" यह कहकर उसने गुस्से में झोपड़ी की मिट्टी की दीवार को हाथ से ठोकर मारी। थोड़ी सी मिट्टी झड़कर नीचे गिरी। बिल्ली डर कर उछली। फिर चुपचाप उसके पांव के पास आकर बैठ गई। जैसे किसी रोते हुए बच्चे के पास दूसरी बच्ची बैठकर उसे छुप कर आती है। जमीला ने चिड़चिड़ाकर बिल्ली को लात हल्का सा धक्का दिया, "दूर हट, तेरे पास भी तो कुछ नहीं। बस म्याऊं करती रहती है।" मगर अगले ही लम्हे उसे अपनी हरकत पर थोड़ा सा अफसोस हुआ। "अरे बेचारी, तुझे भी तो भूख लगी होगी।" उसने धीमे से सोचा मगर जुबान फिर भी उतनी नरम ना हो सकी।

शाम होने लगी। सूरज के ढलने से पहले ही करिया के रास्ते पर वापसी करने वालों की भीड़ कम हो गई। मगर उस दिन आज तक कभी ना हुआ। कुछ ऐसा हुआ कि आसमान की तरफ से एक रहस्यमय फैसला उतरता महसूस हुआ। करीम थका मांदा, पसीने से तर, ऑलमोस्ट खाली हाथ। बस एक छोटे से थैले में थोड़ा सूखा आटा और कुछ खजूर के दाने लेकर वापस चल पड़ा। यह भी उसे एक बूढ़े दुकानदार ने तसल्ली में दे दिए थे। "ले भाई, मेरे पास काम नहीं था। मगर तेरी आंखों में भूख देखकर यह थोड़ी सी चीजें दे दी। इसे सदका समझ ले। अल्लाह तेरे हाल पर रहम करे।"

करीम के दिल में यह लड़ाई चल रही थी कि क्या मैं यह घर में बताऊं कि यह रोजी भी मेरी कमाई नहीं। यह किसी के सदके से मिली है। उसकी खुददारी उसके पैरों से बहस कर रही थी। "नहीं बताना चाहिए। बीवी फिर ताने देगी कि तू खुद कुछ नहीं कमा सकता। लोग तुझ पर रहम खाते हैं।" मगर दूसरी तरफ उसका सच्चा दिल कह रहा था, "झूठ से पेट भरना आसान है। मगर रूह पर बोझ पड़ जाता है। मैं चाहे जितना भी गरीब हूं। अपने घर वालों से सच नहीं छुपाऊंगा। अल्लाह सच्चाई वालों के साथ होता है।"

झोपड़ी के पास पहुंचा तो दिल की धड़कन तेज। उसने सोचा, "अगर अंदर फिर वही नाशुक्री की आवाज सुनी तो मैं क्या जवाब दूंगा।" तभी उसने देखा झोपड़ी के बाहर मिट्टी के चबूतरे पर बिल्ली अकेली बैठी थी। जैसे उसका इंतजार कर रही हो। उसकी आंखों में अजीब सी चमक थी। करीम ने थके हुए लहजे में कहा, "ओए बिल्ली, तू ही है जो हर हाल में मेरे लौटने का इंतजार करती है। चल आज तेरे लिए भी थोड़ा सा खजूर का टुकड़ा रखूंगा। तेरी भी नसीब में कुछ लिख दे मेरा रब।"

जैसे ही वह झुककर बिल्ली के सिर पर हाथ रखता है, हवाओं के रुख में हल्का सा बदलाव आता है। आसपास जैसे एक पल के लिए सन्नाटा गहरा हो जाता है। करीम को महसूस होता है कि दिल की धड़कन उसकी अपनी आवाज से ज्यादा तेज सुनाई दे रही है। अचानक बिल्ली अपनी जगह से जरा सी सीधी होकर बैठती है। सिर हल्का सा टेढ़ा करती है। और फिर वो बात जो आज तक कभी नहीं हुई। उसकी छोटी सी गुलाबी जुबान से साफ इंसानी जुबान में लफ्ज निकलते हैं।

"करीम, तू उदास क्यों है?"

यह सुनते ही उसकी रूह जैसे एक लम्हे को ठहर जाती है। उसकी आंखें फटी की फटी रह जाती हैं। थैला हाथ से फिसल कर नीचे गिर जाता है। खजूर के दाने रेत में बिखर जाते हैं। वो पीछे हटकर कांपती आवाज में कहता है, "या अल्लाह, यह क्या हुआ? मैंने तो भूख में कभी ऐसा ख्वाब भी नहीं सोचा था। क्या वाकई तूने मेरी तनहाई देखकर मुझे किसी से हमजुबान कर दिया है या मैं पागल हो रहा हूं?"

बिल्ली ने फिर बड़े इत्मीनान के साथ अपनी पूंछ हल्का सा हिलाई। उसकी आंखों में इंसानों से ज्यादा समझदारी की चमक थी। उसने दूसरी बार कहा, "डर मत करीम। मैं वही बिल्ली हूं जो तेरे घर में सालों से रहती हूं। बस आज मेरे लिए हुक्म आया है कि तुझसे बात करूं। तुझे बता दूं कि उम्मीद सिर्फ अल्लाह से रखनी होती है। लोगों के तानों से नहीं डरना। बीवी की नाशुक्री से दिल नहीं तोड़ना। तू अपने रब के इम्तिहान में कामयाब हो सकता है अगर अपने सब्र को छोड़ ना दे।"

करीम का बदन कांप रहा था। मगर दिल के किसी कोने में एक अनोखी ठंडक उतर रही थी। उसने घबराई हुई आवाज में कहा, "तू, तू कौन है असल में? और क्यों मुझ गरीब से बात कर रही है? क्या मेरे रब ने तुझे भेजा है?"

बिल्ली ने हल्की सी म्याऊं की। फिर जैसे मुस्कुरा कर बोली, "मैं बस एक बिल्ली हूं। मगर आज मेरे लफ्ज तेरे लिए रहमत का पैगाम है। अगर तू सुनना चाहे तो मैं तुझे वह राज बता सकती हूं जिससे तेरी जिंदगी बदल सकती है। मगर याद रख, यह राज सिर्फ उन लोगों पर खुलता है जो उम्मीद सिर्फ अपने रब से रखते हैं। बंदों के सामने झुक कर नहीं, उनके तानों से टूट कर नहीं।"

अंदर झोपड़ी में जमीला बेचैनी से इधर-उधर टहल रही थी। उसे अंदाजा नहीं था कि झोपड़ी के बाहर मिट्टी के उसी चबूतरे पर उसकी गरीब जिंदगी की सबसे अजीब बात हो चुकी है। वो बड़बड़ाती, "शाम हो गई। अभी तक आया भी नहीं। पक्का फिर खाली हाथ होगा। मैं भी देखूंगी कि कब तक यह अल्लाह अल्लाह करके घर चलाता रहेगा।"

वो यह कह ही रही थी कि अचानक उसके कानों में बाहर से किसी अजनबी सी आवाज की हल्की सी झलक आई। जैसे कोई औरत नहीं, ना बच्चा। मगर एक नाजुक सी जुबान किसी मर्द से बातें कर रही हो। वो ठिठक गई। "यह कैसी आवाज है?" उसका दिल घबराया। "कहीं करीम मेरे पीछे किसी औरत को तो नहीं ले आया या किसी से मदद मांग रहा होगा।" गुस्से और कुढन के साथ वो तेज कदमों से दरवाजे की तरफ बढ़ी। अंदर उसके दिल में यह ख्याल भी चल रहा था कि आज अगर वह फिर "उम्मीद बस अल्लाह से" वाला जुमला दोहराएगा तो मैं उसे ऐसा जवाब दूंगी कि याद रखेगा।

मगर उसे क्या पता, दरवाजे के ठीक बाहर मिट्टी के चबूतरे पर नीले खुले आसमान के नीचे उसकी अपनी झोपड़ी की बिली इंसानी जुबान में उसके शौहर से वह बातें कर रही थी जो शायद कोई इंसान भी उससे यूं सामने बैठकर ना कह पाता।

बिल्ली ने अपनी छोटी सी गर्दन सीधी की। आंखों में नूर जैसा इत्मीनान, पूंछ हल्की सी हिलती। उसने मुलायम मगर साफ लहजे में कहा, "करीम, तू समझता है ना मैं कौन हूं। मैं तेरे घर की वही बिल्ली हूं जो तेरी भुखमरी में तेरी हड्डियों के पास बैठी रही। तेरी रात के आंसुओं की गवाह रही। तेरी बीवी की शिकायतें भी सुनी। तेरी मस्जिद के पास से लौटते वक्त की आह भी। मगर आज मुझे हुक्म हुआ है कि तुझे याद दिलाऊं। उम्मीद बस अपने रब से रखो। लोगों से नहीं, हालात से नहीं।"

करीम का दिल ऐसे धड़क रहा था जैसे सीने से बाहर गिर पड़ेगा। उसने हकला कर पूछा, "मगर यह कैसे मुमकिन है? जानवर बोलते नहीं, तू मेरी जुबान कैसे समझती है? मेरे दिल का राज कैसे जानती है?"

बिल्ली ने बहुत सादगी से जवाब दिया, "जिस रब ने तुझे मिट्टी से बनाया, उसी ने मुझे भी बनाया। तेरी जुबान भी उसी की दी हुई है। मेरी म्याऊं भी उसी की। जब वो चाहे तो म्याऊं को भी इंसानी लफ्ज बना दे। तेरी चुप को भी पुकार बना दे। तू समझ क्यों नहीं लेता कि तेरी तन्हा रातों की दुआ सामने जवाब बनकर खड़ी है।"

करीम की आंखों से बेइख्तियार आंसू टपकने लगे। उसे लगा जैसे कोई अंदर से उसे थाम रहा हो। वो जमीन पर घुटनों के बल बैठ गया। हाथ कांप रहे थे। "या रब, मैं किस काबिल हूं कि तूने मुझ नाकारा मजदूर पर यह करिश्मा उतार दिया। मैं तो खुद को लायक भी नहीं समझता।"

बिल्ली ने हल्की सी म्याऊं के बाद जैसे मुस्कुराते हुए कहा, "यही तो बात है करीम। जो खुद को बड़ा समझते हैं उन पर ऐसे करिश्मे कम उतरते हैं। तू अपने आप को छोटा समझता है। रब तुझे अपने नजदीक कर रहा है। मगर एक बात समझ ले, तेरा इम्तिहान सिर्फ तेरी जेब से नहीं, तेरे घर वालों के लहजे से भी है। तेरी बीवी की नाशुक्री भी तेरा इम्तिहान है। देखना यह है कि तू उसका जवाब कैसे देता है, गाली से? गुस्से से या रहमत की बात से।"

करीम ने कांपती हुई सांस के साथ पूछा, "तो क्या मैं बस चुप रहूं? उसकी हर बात सहता रहूं। कभी-कभी दिल चाहता है मैं भी चिल्ला कर कहूं कि मैं भी इंसान हूं। मेरा भी जी चाहता है अच्छा पहनूं, अच्छा खाऊं। मगर जब जेब खाली होती है ना बिली, तो जुबान भी बेबस हो जाती है।"

बिल्ली ने उसकी ओर झुक कर जैसे किसी बड़े अकीम की तरह नरमी से कहा, "सुन करीम, सब्र का मतलब यह नहीं कि तू जुल्म बर्दाश्त करता रहे। सब्र का मतलब यह है कि तू अपने रब पर बदगुमान ना हो। तेरी बीवी अगर नाशुक्री में डूबी है तो तू उसके लिए भी दुआ कर। उसके सामने भी अच्छे लहजे से बात कर। उसे समझाने की कोशिश कर। मगर तेरा दिल अंधेरा ना हो। तेरी उम्मीद बंदों से हटकर सिर्फ अपने रब पर टिक जाए। जब दिल का आसरा सिर्फ अल्लाह हो जाता है, फिर चाहे दुनिया सारे दरवाजे बंद कर दे। तेरे लिए कहीं ना कहीं से एक दरवाजा खुल ही जाता है।"

करीम ने रेत पर आंखें गड़ा दी। होंठ कांपते हुए बोले, "मगर बिल्ली, घर में फाके हो, बच्चों के पेट खाली हो, बीवी के लहजे में आग हो। ऐसे में दिल का आसरा कैसे संभाले?"

बिल्ली ने जवाब दिया, "यही तो तेरे और बाकी लोगों के दरमियान फर्क का मौका है। अगर तू भी वही करे जो सब करते हैं, गाली, लानत, ताने, तो फिर तेरा और उनका क्या फर्क रहा? तू कहता है तुझे अपने रब पर यकीन है, तो यकीन सिर्फ जबान पर नहीं होता। वह तो दिल के अंदर का यकीन होता है जो सब्र की शक्ल में नजर आता है, शुक्र की शक्ल में नजर आता है। रोजी कम हो, फिर भी तू रब की रहमत का इंकार ना करे। यह तेरी असली अमानत है।"

तभी अंदर झोपड़ी के अंधेरे से कदमों की सख्त आहट नजदीक आई। मिट्टी के फर्श पर जमीला के पांव की रगड़ साफ सुनाई दी। वो गुस्से और बेचैनी से भरी हुई दरवाजे की तरफ बढ़ रही थी। उसके दिल में शुभे और तंज का तूफान था। "देखना पड़ेगा यह बाहर कैसी आवाज है। कहीं यह कमीना किसी से मदद मांगने के बहाने मेरी बेइज्जती तो नहीं कर रहा।" उसने जैसे ही झोपड़ी का आधा टूटा दरवाजा एक झटके से खोला।

सामने जो मंजर था, वो उसके ताज्जुब की हद से बाहर था। नीले आसमान के नीचे मिट्टी के चबूतरे पर करीम घुटनों के बल बैठा था। चेहरे पर आंसू, आंखों में सकत हैरानी और उसके बिल्कुल सामने वह उनकी बिल्ली बैठी थी। मगर उसके मुंह से निकले लफ्ज जमीला के कानों में चाकू की तरह घुस गए। बिल्ली साफ जुबान में कह रही थी, "देख करीम, नाशुक्री की आग सबसे पहले आदमी के अपने दिल को जलाती है। फिर उसके घर को, फिर उसके रिश्तों को। अगर तू अपने घर में उस आग को फैलने देगा तो तेरी झोपड़ी का सिर्फ छप्पड़ नहीं, तेरी बीवी का भी दिल जल जाएगा।"

जमीला के पैर जैसे जमीन से चिपक गए। उसकी आंखें फैल गई। वो देर तक समझ ही ना सकी कि यह सब ख्वाब है या सच्चाई। उसके होठों से बस इतना निकला, "यह, यह क्या हो रहा है? मैं पागल तो नहीं हो गई? बिल्ली बोल रही है?"

करीम ने घबराकर पीछे मुड़कर देखा। जमीला की नजर जब उसकी आंखों से मिली तो उसमें पहली दफा सिर्फ गुस्सा नहीं, डर भी था। हैरत भी थी। वो बुदबुदाई, "तुम लोग क्या तमाशा लगा रखा है यहां? यह कैसी आवाजें हैं?"

बिल्ली ने जमीला की तरफ गर्दन घुमाई। उसकी आंखों में ना कोई दहशत थी, ना गुस्सा। बस एक अजीब सुकून। उसने बहुत सादा लहजे में कहा, "डर मत जमीला। मैं वही बिल्ली हूं जिसे तू कभी लात मार के दूर करती थी। कभी रहम खाकर रोटी का टुकड़ा फेंक देती थी। आज मुझे हुक्म हुआ है कि तुझसे भी कुछ बातें करूं। लेकिन पहले इतना सोच ले, अगर तू हर बात को सरासर झूठ समझेगी। हर करिश्मे को मजाक समझेगी, तो तेरे दिल के दरवाजे पर जो रहमत दस्तक दे रही है, वह लौट भी सकती है।"

जमीला ने हल्का सा लड़खड़ाते हुए पीछे कदम रखा। "मैं, मैं किसी बिल्ली की बातें सुनूं। यह कैसी पागलपना की बात है? जानवर बोलते कहां हैं?"

बिल्ली ने कहा, "अगर तेरा रब चट्टानों से पानी निकाल सकता है। मुनक्कर दिलों में रहमत भर सकता है, तो किसी जानवर को जुबान दे देना उसके लिए क्या मुश्किल है। मसला यह नहीं कि मैं बोल रही हूं। मसला यह है कि तेरा दिल सुनने के लिए तैयार है या नहीं।"

करीम ने जमीला की तरफ रुखा किया। उसकी आवाज में नरमियां थी। "जमीला, अल्लाह की कसम, मैं भी तेरी तरह हैरान हूं। यह सब मेरा कोई जादू नहीं। ना मैंने किसी झाड़फूंक वाले को बुलाया, ना किसी जिन्न वगैरह के चक्कर में पड़ा हूं। मैं तो खुद घबरा गया था जब इसने पहली बार इंसानी जुबान में मुझे पुकारा। मगर जो बात यह कह रही है, वो हमारे ही दिलों की बात है। तू खुद सुन ले। शायद तेरे दिल पर भी कोई असर हो जाए।"

जमीला की आंखों में अब भी जिद थी। मगर अंदर एक हल्का सा डर भी जाग चुका था। उसने आधा तंज, आधा डर में कहा, "अच्छा, तो अब तुम लोग मुझे यह समझाना चाहते हो कि मैं गलत हूं। मैं नाशुकरा हूं और यह बिल्ली तुम दोनों की तरफ से..."

वह मुझे सीख देने आई है। क्या मैं इतनी बुरी हूँ कि मेरे लिए भी आसमान से कोई बिल्ली उतर आए। बिल्ली ने बहुत प्यार से कहा। नहीं जमीला, तू बुरी नहीं। बस तेरे दिल पर किस्मत की धूल की परत जम गई है।

जब औरत गरीबी देखती है, तो सबसे पहले उसके लहजे से शुक्रिया निकल जाता है। फिर जुबान पर शिकायत आ जाती है। फिर आँखों से रहमत की पहचान चली जाती है।

तू शायद भूल गई कि कभी तू भी अपने पति के साथ बैठकर ईश्वर की दया की कहानियाँ सुनती थी। कभी तू भी उस पर विश्वास करती थी। मगर एक-एक करके हालात ने तेरा दिल कठोर कर दिया।

मैं आई हूँ तो इसलिए कि तुझे याद दिलाऊँ। उम्मीद सिर्फ ईश्वर से रख। न अपने पति से, न पड़ोस की सकीना के धन से, न बाज़ार के व्यापारियों से।

यह सुनकर जमीला के चेहरे पर एक अजीब सा रंग आया। उसने ज़रा नरम, ज़रा दर्द भरी आवाज़ में कहा, "तुम क्या जानो बिल्ली, जब बच्चा रात को भूख से रो रहा हो, जब चूल्हे पर उबालने के लिए पानी भी न हो, तो शब्द अपने आप शिकायत बन जाते हैं।"

"मैं भी औरत हूँ। मेरा भी दिल है। मुझे भी हक़ है कि मैं अच्छा चाहूँ। जब मैं देखती हूँ कि सकीना के घर के सामने हर दूसरे दिन नया बर्तन आता है। उसके पति के पास ऊँट है। उसके बच्चे साफ़ कपड़ों में खेलते हैं, तो मेरे अंदर का मन चुप नहीं रहता। मैं भी सोचती हूँ, क्यों नहीं हमारे हिस्से में यह सब आया।"

बिल्ली ने सिर झुकाकर जैसे उसकी बात को स्वीकार किया, फिर बोली, "तुझे हक़ है कि तू अच्छा चाहे, मगर तुझे यह हक़ नहीं कि तू अपने ईश्वर पर आपत्ति करे। ज़िंदगी की कमी को उसके खिलाफ दलील बना ले। कोशिश करने का हक़ तुझे है। दुआ माँगने का हक़ तुझे है। मगर नाशुक्री करने का हक़ किसी को नहीं।"

"तेरी ज़ुबान जब शिकायत में लग जाती है न, तो तेरे घर से बरकत उठने लगती है। तूने गौर किया कि जितना तू शिकायत बढ़ाती गई, तेरे घर की तंगी भी उतनी ही बढ़ती गई।"

जमीला ठिठक गई। उसे अचानक याद आया कि जब वह शादी के शुरुआती सालों में सब्र किया करती थी। थोड़ी सी रोटी पर भी 'अल्हम्दुलिल्लाह' कह देती थी। तब हालात इतने तंग नहीं थे। दिल में सुकून ज़्यादा था।

उसने धीमी आवाज़ में बुदबुदाया, "शायद यह बात सही है।" करीम ने इस मौके को गँवाए बिना आगे बढ़कर कहा, "देख जमीला, मैं कोई फ़रिश्ता नहीं। मैं भी कभी-कभी टूट जाता हूँ। मगर मैं तुझे हमेशा यही कहना चाहता था कि तू अपनी नज़र उन लोगों से हटा जो तुझसे ऊपर हैं।"

"कभी उन पर भी निगाह डाल जो तुझसे नीचे हैं। वे मज़दूर जो सड़कों पर सोते हैं। वे औरतें जो बिकती हैं, वे बच्चे जो कूड़े से रोटी ढूँढते हैं। हम गरीब हैं। मगर हमने अपने ईमान की कीमत नहीं लगाई। हमने अपना बदन नहीं बेचा। हमारा घर मिट्टी का है, मगर इज़्ज़त अब तक हमारी अपनी है। यह कम सौगात नहीं।"

जमीला ने पहली बार उसके लहजे में छुपा दर्द महसूस किया। उसका दिल थोड़ी देर के लिए पिघला। मगर फिर मन ने फ़ौरन उसे पकड़ा। "अच्छा। तो तुम दोनों मिलकर मुझे समझा रहे हो। मगर मेरे सवाल का जवाब अभी भी किसी के पास नहीं। कल अगर फिर मज़दूरी न मिली तो? आने वाली रात का खाना कहाँ से आएगा? सिर्फ उम्मीद ईश्वर से कह देने से बर्तन में दाल आ जाएगी?"

बिल्ली ने गहरी साँस जैसा एक हल्का सा म्याऊँ किया। फिर सख्त लहजे के साथ नरमी मिलाकर बोली, "यही तेरा इम्तिहान है जमीला। यह मत समझ कि उम्मीद ईश्वर से एक जुमला है। यह तो एक कर्म है। तू अपने ईश्वर की तरफ लौट। तौबा कर, शुक्रिया सीख। अपने पति के साथ बद्दुआ नहीं, दुआ पर बैठ। उसकी मज़दूरी के लिए दुआ कर। उसके कदमों के लिए आसानियाँ माँग। और देख कैसे तेरी किस्मत धीरे-धीरे करवट लेगी।"

"मगर एक शर्त है और वह शर्त तेरे घर के अंदर से शुरू होगी।" जमीला की भौंहें सिकुड़ गईं। "कौन सी शर्त?" बिल्ली की आँखों में अब जैसे एक हैसियत का जलाल भी उतर आया। उसने ठहर-ठहर कर कहा।

"शर्त यह है कि आज के बाद तेरी ज़ुबान अपने ईश्वर के खिलाफ न चले। तू जो भी कहे, उसमें या तो शुक्रिया हो या दुआ। अगर शिकायत भी हो तो ऐसे हो जैसे बच्चा शिकायत नहीं, गिड़गिड़ाहट के साथ कहता है। तेरा लहजा ताना न हो, इल्ज़ाम न हो। और दूसरी बात, तेरे घर में सेकंड हैंड भी हो तो मन को रोक कर। किसी एक के साथ भी रोज़ाना थोड़ा सा सदक़ा निकले। चाहे आधा सूखा निवाला ही सही, किसी और गरीब के साथ बाँट। जो खुद तुझसे ज़्यादा तंग हो। फिर देख तेरे ईश्वर की दया कैसे चलकर आती है।"

यह सुनकर करीम के दिल में अनोखा जोश आया। उसने तुरंत कहा, "मैं राज़ी हूँ। मैं तो पहले दिन से यही करने की कोशिश कर रहा हूँ। मैं तो चाहता हूँ मेरे घर से भी किसी को कुछ जाए। मगर हमने तो अपने घर को ही तंग कर रखा है। जमीला, चल मान जा। आज से हम कोशिश करेंगे कि जो थोड़ी सी रोज़ी आए, उसमें से एक हिस्सा किसी और के नाम भी कर दें। चाहे एक निवाला ही सही, मगर देंगे ज़रूर।"

जमीला की आँखों के सामने उस बूढ़ी अम्मा का चेहरा घूम गया जो अक्सर उनके गाँव के किनारे बैठी भीख माँगती थी। जिसके पास जाने को कोई घर न था। उसने न चाहते हुए भी धीमी आवाज़ में कहा, "अगर मैं मान जाऊँ, अगर मैं कोशिश करूँ कि अब नाशुक्री कम करूँ। ज़ुबान हल्की करूँ, सदक़ा भी दूँ, तो क्या सच में कुछ बदलेगा?"

बिल्ली ने बहुत विश्वास से कहा, "तू एक कदम अपने ईश्वर की तरफ चलकर देख, वह तेरी तरफ भागता हुआ आता है। तू एक निवाला बाँट कर देख, वह तेरे लिए कहीं और से दरवाज़ा खोल देता है। मगर याद रख, यह सब एक रात में नहीं होगा। यह इम्तिहान है और इम्तिहान में नतीजा आखिर में मिलता है। दरमियान में सब्र माँगा जाता है। तू तैयार है या नहीं? यह फैसला तुझे करना है। मैं तो सिर्फ पैगाम सुनाने आई हूँ।"

हवा में एक अजीब सा सुकून और हल्की सी हैबत घुल गई थी। झोपड़ी की मिट्टी की दीवारें भी जैसे यह बातें सुन रही थीं। दूर मस्जिद की तरफ से फिर अज़ान की हल्की सी गूँज उठी। जैसे आसमान भी इस बातचीत पर गवाह बन रहा हो। करीम की आँखें भीग चुकी थीं। उसके होठों पर थरथराती फुसफुसाहट थी, "हे ईश्वर, तू गवाह रह। मैं अपने बस के मुताबिक सब्र भी करूँगा। शुक्रिया भी सीखूँगा। सदक़ा भी दूँगा। बस तू मेरी बीवी के दिल को भी नरम कर दे। उसे भी नाशुक्री के अंधेरों से निकाल दे।" उसकी पलकों पर नींद उतर गई, मगर दिल में दुआ बाकी रही।

जमीला अज़ान की आवाज़, बिल्ली के लफ्ज़ और पति के आँसू भरे वादे के बीच खड़ी थी। उसके अंदर दो आवाज़ें लड़ रही थीं। एक कहती थी, "यह सब एक वहम है। कल सुबह फिर वही भूख, वही तंगी होगी। फिर देखना तेरा यह जज़्बाती पल कहाँ जाता है।" दूसरी नरम आवाज़ कह रही थी, "अगर आज भी तू नहीं बदली तो कब बदलेगी? जब सब कुछ हाथ से निकल जाएगा। जब तेरे पास शिकायत करने को भी कोई न रहेगा।"

उसकी आँखें भर आईं, मगर ज़िद भी अभी मरने को तैयार न थी। उसने हल्का सा सिर झुकाकर बस इतना कहा, "मैं सोचूँगी।" बिल्ली ने आखिरी बार दोनों को बारी-बारी से देखा। उसकी आँखों में दुआ जैसा नूर था। उसने बहुत आहिस्ता लहजे में कहा, "ठीक है जमीला, सोचने का हक़ तुझे है। मगर याद रख, हर सोच के बाद फैसला आता है। और हर फैसले के बाद नतीजा। मैं फिर आऊँगी। देखूँगी कि तेरे घर में क्या बदला। तेरे लहजे में क्या बदला। तेरे पति की आँखों में उम्मीद ज़्यादा हुई या टूटन, और उसके हिसाब से अगला रास्ता दिखाऊँगी।"

यह कहकर वह एकदम से फिर वही आम सी बिल्ली लगने लगी। जैसे उसकी इंसानी ज़ुबान वापस म्याऊँ में बदल गई हो। करीम और जमीला दोनों उसे हैरत से देखते रह गए। जैसे उनकी आँखों के सामने कोई सपना घटा होता, या जैसे आसमान से कोई छुपा हुआ पैगाम उनके दरवाज़े पर उतर आया हो।

हवा में एक अजीब सा सुकून था। मगर दोनों के दिलों में बेचैनी की गर्द बैठी हुई थी। करीम ने काँपते हुए हाथों से गिरे हुए खजूर के दाने उठाए। थैले को फिर से बाँधा और गहरी साँस ली। उसकी आवाज़ में रूहानी सुकून और थोड़ी सी थकान थी। "जमीला, चल अंदर चलते हैं। रात होने लगी है।"

जमीला कुछ लम्हों तक वहीं दरवाज़े पर खड़ी रही। उसके दिमाग में सवाल, शक, डर सब एक साथ घूम रहे थे। आखिर वह धीमी चाल से अंदर चली गई। मगर उसके कदमों में वह ठसक नहीं थी जो पहले हर शाम उसके गुस्से में नज़र आती थी।

झोपड़ी के अंदर हल्का सा अंधेरा था। सिर्फ चूल्हे की मिटी हुई राख में कुछ हल्की गर्मी बाकी थी। करीम ने खजूर के दो दाने अपनी तरफ रखे और बाकी बिल्ली और जमीला की तरफ बढ़ा दिए। जमीला ने आधी हैरत और आधी शर्म के साथ खजूर का दाना उठाया, मगर उसने पहली बार बिना ताना मारे खाना स्वीकार किया।

उनकी छोटी सी रात की रोटी सिर्फ खजूर और थोड़ा पानी। मगर उस रात वह खामोशी नफरत वाली नहीं थी। वह सोच की, शर्म की और कहीं दिल के अंदर के बदलाव की खामोशी थी।

रात के आखिरी पहर चाँदनी झोपड़ी की दीवारों पर उतर रही थी। करीम सो चुकी बीवी और पास में सोई बिल्ली को देखता रहा। उसके दिल में अजीब किस्म की उम्मीद जाग रही थी। उसने धीमे सुर में दुआ की, "हे ईश्वर, आज जो हुआ वह तेरी तरफ से इशारा था। मैं भी इंसान हूँ। कभी कमज़ोर हो जाता हूँ। मगर आज तूने याद दिला दिया कि तू मेरे साथ है। मुझे मज़बूत कर दे। मेरे घर में सुकून डाल दे और मेरी बीवी के दिल से नाशुक्री को मिटा दे।" उसकी पलकों पर नींद उतर गई, मगर दिल में दुआ बाकी रही।

सुबह की हवा में हल्की ठंडक थी और दूर मस्जिद की अज़ान की पुकार जैसे उस झोपड़ी की नींव में उतर रही थी। करीम उठकर वुज़ू करने बाहर निकला। पानी ठंडा था, मगर उसके दिल में एक अजीब गर्माहट थी। उसने नमाज़ पढ़ी। सजदे में देर तक रहा। उस सुकून को पहली बार महसूस करते हुए जो पिछले कई महीनों से खो चुका था।

जब वह वापस झोपड़ी में आया, जमीला रोटी सेंक नहीं रही थी, बल्कि चुपचाप बैठी थी और पहली बार उसके चेहरे पर ज़िद से ज़्यादा झिझक थी। उसने धीरे से कहा, "करीम, आज तू काम पर जाएगा?" करीम मुस्कुरा दिया। वह मुस्कान छोटी थी, मगर उसे अंदर तक रोशन कर गई। "हाँ जमीला, जाएगा। रोज़ी तलाश करना बंदे का काम है। देना ईश्वर का।" यह पहली दफ़ा था जब जमीला ने उसके इस जुमले पर आँखें न घुमाईं, न ताना मारा, बस सुना।

करीम ने जाने से पहले आधा खजूर लिया। आधा बिल्ली के आगे रखा और आधा बाहर उस सूखी मिट्टी पर रख दिया जहाँ अक्सर कोई आवारा परिंदा, चींटी या बिल्ली आता था। जमीला ने हैरानी से पूछा, "यह क्यों रखा? घर में पहले ही कम है।" करीम शांत आवाज़ में बोला, "यह सदक़ा है। कल रात बिल्ली ने कहा था न, बरकत बाँटने से बढ़ती है।"

जमीला कुछ पल चुप रही। फिर धीमे से बोली, "अगर तेरे रखने से बरकत आती है तो रहने दे। मैं नहीं हटाऊँगी।" यह वह पल था जहाँ पहला दरवाज़ा बदलते हुए वक़्त ने हल्का सा खोला था। करीम बाज़ार की तरफ रवाना हुआ। आज उसकी चाल में वह थकान नहीं थी जो हर रोज़ होती थी, बल्कि उसके चेहरे पर एक विश्वास था और उस विश्वास में ईश्वर का साया महसूस होता था।

रास्ते में कुछ लोग उसे देखते हुए हँस पड़े। शायद उसकी फटी कमीज़ों और पुराने चप्पलों की वजह से, मगर आज पहली बार करीम को फ़र्क नहीं पड़ा। उसने दिल में कहा, "मुझे बंदों की नज़रों की नहीं, ईश्वर की नज़र चाहिए।" बाज़ार में आज वह पहली दफ़ा बेबस खड़ा नहीं था, बल्कि तलाश कर रहा था उम्मीद के साथ। थोड़ी देर बाद एक बूढ़ा व्यापारी उसकी तरफ बढ़ा और कहा, "अरे करीम, आज तेरा चेहरा पहले जैसा बुझा हुआ क्यों नहीं? कोई अच्छी खबर है?" करीम हल्का मुस्कुराया। "अच्छी खबर नहीं, मगर अच्छा विश्वास है।" व्यापारी ने हैरत से उसकी तरफ देखा। लेकिन उस चेहरे के विश्वास में कुछ था जिसने उसे सोचने पर मजबूर किया। उसने कहा, "मुझे आज दो बोरी अनाज दूसरे मोहल्ले पहुँचवाना है, करेगा?"

करीम ने दिल में 'अल्हम्दुलिल्लाह' कहा और बोला, "ज़रूर।" दूसरी तरफ झोपड़ी में जमीला अकेली बैठी थी। उसके सामने ठंडा चूल्हा था। खाली बर्तन थे। मगर आज पहली बार उसकी आँखों में सिर्फ शिकायत नहीं थी, बल्कि सवाल थे। और शायद थोड़ा सा डर। वह बिल्ली की तरफ मुड़ी जो चुपचाप दरवाज़े पर बैठी बाहर देख रही थी। जमीला हिचकिचाते हुए पूछ बैठी, "क्या तू अब भी बोल सकती है?"

बिल्ली ने बिना मुड़े कहा, "मैं बोल सकती हूँ, मगर हर वक़्त नहीं। मेरा काम हुक्म के मुताबिक है, न तुम्हारी ज़रूरत के मुताबिक।" जमीला की आवाज़ पहली बार मुलायम हुई। "क्या मेरे लिए भी कोई पैगाम है?" बिल्ली ने धीमे से उसकी तरफ देखा। उन छोटी आँखों में समझदारी हर पढ़े-लिखे इंसान से ज़्यादा थी। "हाँ जमीला, है।" उसने कहा, "असली भूख पेट की नहीं, दिल की होती है। पेट का इलाज रोटी है। दिल का इलाज शुक्रिया है।"

जमीला की आँखें भर आईं, मगर आज उसने उन्हें छुपाया नहीं। उसने काँपती आवाज़ में कहा, "अगर मैं बदलना चाहूँ तो क्या बहुत देर हो चुकी है?" बिल्ली उसकी तरफ चलते हुए बहुत धीरे बोली, "तौबा में कभी देर नहीं होती। बस अहंकार में देर हो जाती है। आज का दिन तेरे लिए फैसला है, या तू अपना दिल नम कर लेगी या मन जीत जाएगा।"

जमीला की साँस भारी हो गई। उसने अपनी चादर संभाली और जैसे पहली बार दिल की गहराई से फुसफुसाई, "हे ईश्वर, अगर मैंने गलती की है तो मुझे सीधा रास्ता दिखा दे।" यह लफ्ज़ जैसे ही जमीला की ज़ुबान से निकले, झोपड़ी के अंदर की हवा बदल गई। मानो एक नाज़ुक सी रूहानी ठंडक उसके सीने में उतर गई हो। वह कुछ लम्हों तक वहीं बैठी रही। सर झुकाए और पहली बार उसकी आँखों में बेचैनी नहीं, बल्कि शर्म और कोमलता थी।

बिल्ली चुपचाप उसकी तरफ देख रही थी, जैसे इंतज़ार कर रही हो कि उसके दिल का फैसला किस तरफ झुकेगा। बाहर से परिंदों की हल्की चहचहाट आ रही थी और झोपड़ी में वह खामोशी मौजूद थी जो सिर्फ दुआ के बाद उतरती है। जमीला ने धीरे से हाथ फैलाए और थोड़ा सा पानी जो घड़े में बचा था, उससे चूल्हे को साफ़ किया, जैसे किसी नई शुरुआत की तैयारी हो। उसकी उँगलियों की हर हरकत में वह ज़िद नहीं थी जो कल तक उसका अंदाज़ हुआ करती थी। बल्कि एक शर्मीला एहतराम था।

करीब 2 घंटे बाद करीम बाज़ार से थका, मगर खुश चेहरा लेकर लौटा। उसकी कमर पर रस्सी बंधी थी और हाथ में थैली जिसमें थोड़ा आटा, कुछ मसूर, कुछ खजूर और दो ताज़ा रोटियाँ थीं। उसके चेहरे पर वह थकान नहीं थी जो हर दिन बोझ की तरह चिपकी होती थी। आज उसकी आँखों में उम्मीद थी। झोपड़ी के पास पहुँचकर उसने दुआ की तरह फुसफुसाया, "अल्हम्दुलिल्लाह, आज रोज़ी हलाल मेहनत से मिली।" तभी दरवाज़ा खुला और जमीला सामने आई। मगर आज उसके चेहरे पर एक गुस्सा नहीं था, बल्कि एक संकोची सा सुकून था। उसने बर्तन पकड़ा और बिना ताना दिए धीमी आवाज़ में बोली, "अंदर आ जाओ। मैं खाना लगा देती हूँ।"

करीम चौंक गया। मगर उसने कुछ न कहा। बस मुस्कुराकर अंदर आ गया। खाने के दौरान दिल में एक हल्का सा बोझ था। वह बातचीत, वह करिश्मा, वह रात और फिर वह दुआ सब हवा में लटका हुआ था। कुछ पल की खामोशी के बाद जमीला ने काँपती आवाज़ में कहा, "करीम, अगर मैं, अगर मैंने तुझे तकलीफ़ दी है, तो आज से मैं कोशिश करूँगी बदलने की।"

करीम की पलकें भीग गईं, मगर उसने उसे बीच में ही रोका नहीं। वह बस सुन रहा था। जमीला आगे बोली, "मुझे डर लगता है कि कहीं मैं फिर उसी नाशुक्री में न पड़ जाऊँ। मुझे लगता है मैं बोलने से पहले सोच नहीं पाती। मैं बस चाहती हूँ कि हमारे घर में बरकत आए और दिलों में सुकून।"

उसकी बात पूरी भी न हुई थी कि बिल्ली चूल्हे के पास आकर बैठी और पहली बार वह खुद-ब-खुद बोली। उसकी आवाज़ पहले से ज़्यादा सख्त, मगर नफासत से भरी थी। "बरकत सिर्फ रोटी से नहीं आती। जमीला, बरकत दिल के रवैये से आती है। जब घर में शुक्रिया बसता है, तब ईश्वर आसमान से दया उतारता है। और जब ज़ुबान सिर्फ शिकायत बोलती है, तो फ़रिश्ते भी दूर हो जाते हैं। याद रखना, गरीब होना गुनाह नहीं, मगर नाशुकरा होना रूह का रोग है।"

जमीला की आँखें भर आईं और वह बिना शर्म छुपाए रो पड़ी। यह वे आँसू नहीं थे जो गुस्से से बहते हैं। यह वे आँसू थे जो टूटे हुए अहंकार से निकलते हैं। करीम ने धीरे से उसके कंधे पर हाथ रखा और कहा, "मैं तेरे साथ हूँ जमीला। हम दोनों सीखेंगे और दोनों बदलेंगे।"

उस रात पहली बार उस मिट्टी की झोपड़ी में अंधेरा तो था, मगर उदासी नहीं थी। करीम नमाज़ के बाद दुआ में देर तक बैठा रहा। जबकि जमीला उसके पास बैठकर सिर्फ चुपचाप सुनती रही। बिना ताना, बिना झुंझुलाहट, जैसे उसका दिल विश्वास की तरफ लौट रहा हो।

बिल्ली दरवाज़े पर बैठी आसमान की तरफ देख रही थी। उसकी आँखों में वह सुकून था जो किसी काम की पूर्ति के बाद आता है। मगर जाते-जाते उसने एक आखिरी बात कही। ऐसी बात जिसमें आने वाली कहानी का दरवाज़ा छुपा था। "अभी इम्तिहान खत्म नहीं हुआ। रहमत तब आती है जब दिल की नीयत इम्तिहान के बाद भी वही रह जाए। अभी अगले दिनों में तुम दोनों के लिए दो रास्ते आएँगे। एक सब्र का और एक शैतान के बहकावे का। देखते हैं तुम किसे चुनते हो।"

और उसके इन शब्दों के बाद जैसे फ़िज़ा गहरी हो गई। हवा रुककर सुनने लगी। रात का सन्नाटा किसी अनदेखे फैसले की दस्तक जैसा महसूस होने लगा। जमीला अब सिर्फ एक नाराज़ औरत नहीं रही थी, बल्कि ऐसी औरत बन रही थी जो अपने अंदर की लड़ाइयों से पहली बार ईमानदारी से रूबरू हो रही थी। करीम चूल्हे के पास बैठा। थके हुए हाथों को घुटनों पर टिकाए, मगर चेहरे पर अजीब सी रोशनी लिए खामोश था।

बिल्ली अभी भी दरवाज़े के पास बैठी थी। मगर अब वह एक साधारण जानवर नहीं लग रही थी। बल्कि मानो वह कोई रूहानी निगरानी पर बैठी हस्ती हो जो जान रही हो कि अगले लम्हे इस घर की किस्मत को किस रुख पर मोड़ेंगे।

रात आगे बढ़ी, अंततः दोनों सो गए। मगर नींद दोनों की एक जैसी नहीं थी। करीम ने पहली बार चैन की नींद ली। उसके सजदे और दुआ ने उसके दिल को हल्का कर दिया था। जबकि जमीला की रात दो हिस्सों में बंटी हुई थी। पहला हिस्सा रोने में गुज़रा और दूसरा सोचने में।

दूसरे रोज़ की सुबह जब पहली अज़ान की आवाज़ नीले आसमान में उठी, जमीला खुद-ब-खुद चौंककर जाग गई। वह कई लम्हों तक बिस्तर पर बैठी रही। फिर धीरे-धीरे उठी। आज उसने पहली बार चूल्हे के पास बैठकर बिना शिकायत के रोटी सेंकनी शुरू की। उसकी उँगलियों की हर हरकत में एक अजीब सा एहतराम था। जैसे वह मिट्टी की उस जगह को मुक़द्दस मान रही हो जहाँ बरकत उतरती है।

करीम नींद से उठा तो उसने देखा कि जमीला रोटी सेंक रही है और उसके चेहरे पर बेचैनी नहीं, बल्कि संकोच और सुकून का मिलाजुला रंग था। उसने अंदर ही अंदर दुआ की, "हे ईश्वर, इसे इस रास्ते पर कायम रख।" करीब दो हफ़्ते बीत गए और इन दो हफ़्तों में दोनों बहुत बदले। न बहुत बड़े चमत्कार हुए। न बहुत रोज़ी बरसी, न झोपड़ी सोने की हो गई, मगर घर की हवा बदल गई। जहाँ पहले तानों की आवाज़ गूँजती थी, वहाँ अब दुआ, सब्र और शुक्रिया की महक फैल गई थी।

करीम रोज़ मेहनत करता, कभी दिन में काम मिलता, कभी नहीं। मगर अब उसके चेहरे पर ग़म का साया नहीं होता था। जमीला अब ताना नहीं देती थी, बल्कि जब कम खाने को मिलता तो खुद पहले कहकर हिस्से को छोटा कर देती। "जो मिला है उसी में बरकत है।" हर रात सोने से पहले करीम और जमीला एक छोटा सा सदक़ा रखते। कभी आधा रोटी का टुकड़ा, कभी थोड़े खजूर, कभी थोड़ा अनाज और उस जगह रख देते जहाँ से कभी कोई परिंदा, कोई गरीब या कोई और भूखा उठा ले।

और बिल्ली, वह कभी बोलती, कभी नहीं, मगर उसकी मौजूदगी अब डर नहीं, तर नहीं, बल्कि याद दिलाने वाली रहमत बन गई थी। एक दिन बाज़ार में एक अमीर व्यापारी ने करीम को देखा और कहा, "मुझे अपनी दुकान के लिए किसी भरोसेमंद आदमी की तलाश थी। तू रोज़ मेहनत करता है। कभी शिकायत नहीं करता। क्या तू मेरे साथ काम करना चाहेगा? रोज़ाना के बजाय हर महीने की पक्की मज़दूरी मिलेगी।"

करीम की आँखों में नमी और रोशनी एक साथ उतर आईं। उसकी पहली फुसफुसाहट बस यही थी, "अल्हम्दुलिल्लाह!" उस शाम वह अपने घर में सिर्फ खाने का सामान नहीं, बल्कि एक बड़ी खुशखबरी लेकर लौटा। उसने जैसे ही दरवाज़ा खोला, जमीला ने उसकी आँखों से सब समझ लिया। उसके चेहरे पर ऐसी मुस्कान थी जो शायद उसने शादी के पहले सालों के बाद कभी महसूस नहीं की थी।

करीम ने हौले से कहा, "जमीला, आज ईश्वर ने हमें नई रोज़ी दी है। अब इस घर में भूख से डरने की ज़रूरत नहीं।" जमीला की आँखें भर आईं। वह चूल्हे के पास बैठ गई और बिना शर्म छुपाए रो पड़ी। उसने धीरे से कहा, "करीम, तूने कभी मेरा हाथ नहीं छोड़ा। जबकि मैं तेरी नाशुक्री से तुझे डुबो सकती थी।" करीम ने उसका हाथ थामा और कहा, "औरत जब अपने पति की मददगार बनती है न, तो उसका घर सिर्फ घर नहीं, जन्नत का पहला दरवाज़ा बन जाता है।" उसी वक़्त बिल्ली धीरे से दोनों के बीच आकर बैठी, जैसे यह मंज़र देखने के लिए भेजी गई हो।

जमीला ने पहली बार उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कहा, "तू हमारे लिए सिर्फ एक जानवर नहीं, तू रहमत है।" बिल्ली की आँखों में एक चमक आई और फिर वह इंसानी आवाज़ में बोली, "अब सुनो दोनों। मेरा काम यहाँ पूरा हो गया है। हालात से परेशान होना आसान था, मगर अपने रवैये को बदलना मुश्किल। तुम दोनों ने वह मुश्किल रास्ता चुना और अब रहमत का दरवाज़ा खुल चुका है। याद रखना, बरकत ज़्यादा होने का नाम नहीं, बरकत संभलकर रहने, शुक्रिया करने और बाँटने का नाम है।"

करीम और जमीला दोनों सिर झुकाए सुनते रहे। बिल्ली ने फिर कहा, "आज के बाद मैं उसी तरह रहूँगी जैसे पहले थी, एक आम बिल्ली। मैं बोलूँगी नहीं, मगर मैं रहूँगी। सिर्फ इस याद के साथ कि कभी न भूलना।" उसने रुककर वह जुमला कहा जिसे सुनकर दोनों के दिल काँप गए, "उम्मीद बस और बस ईश्वर से रखो।" उसके लफ्ज़ हवा में फैल गए जैसे कोई दुआ बनकर दीवारों पर लिख दिए गए हों।

करीम और जमीला एक दूसरे की तरफ देखे। और पहली दफ़ा बहुत अरसे बाद उनकी आँखों में डर नहीं, भूख नहीं, गुस्सा नहीं, बल्कि विश्वास था। उस रात उस झोपड़ी में दो खुराकें थीं। एक रोटी की और एक ईमान की। और यही थी उस मज़दूर, उसकी कभी नाशुक्री, मगर अब तौबा कर चुकी बीवी और बोलने वाली बिल्ली की दास्तान। एक दास्तान जो सिर्फ यह नहीं कहती कि सब्र करो। बल्कि यह कहती है, जब सब्र और शुक्रिया एक घर में बस जाए, तब वहाँ दरवाज़े खुला नहीं करते, बल्कि रहमत उड़कर आती है।