Transcription
बहुत पुराने जमाने की बात है। एक सल्तनत में अमीर नाम का एक शहजादा था। अमीर एक सरकश, बेरहम और अददी शहजादा था। जब उसके वालिद बादशाह की वफात हुई तो वह बादशाह बन गया।
वजीरों ने आपस में मशवरा करके तय किया कि अगर अमीर ने रैया के साथ जुल्म किया तो वह सब का ओहदा छोड़ देंगे। नौजवान वजीर आजम हारून बहुत जहीन, समझदार और दूरंदेश था। उसने बूढ़े और तजुर्बेकार वजीरों से कहा आप लोग ओहदा छोड़ने का ख्याल छोड़ दीजिए। अपनी बहादुरी से शहजादा अमीर जो अब बादशाह बन चुका है को सही है और सच्चे रास्ते पर ला दीजिए क्योंकि अगर आप लोग ओहदा छोड़ देंगे तो वह नए वजीर मुकर्रर करेगा और वह सब उसके इशारों पर चलेंगे। फिर हमारी रैया कभी खुश ना रह पाएगी। यह बात तमाम वजीरों को समझ आ गई और उन्होंने ओहदा छोड़ने का ख्याल छोड़ दिया।
अगले दिन बादशाह अमीर ने वजीरों से कहा, "हम अपना खजाना देखना चाहते हैं। इसलिए हमें अभी अपने साथ ले चलो।" वजीर भला कैसे मना करते? वह बादशाह अमीर को तहखाने में ले गए जहां सात कमरे थे और हर कमरे के दरवाजे पर ताला लगा हुआ था। पहला कमरा छोड़कर जब वजीर दूसरे दरवाजे की तरफ बढ़ने लगे, तो बादशाह अमीर ने कहा, "तुम लोगों ने यह पहला कमरा क्यों छोड़ दिया?"
वजीर आजम हारून ने कहा, "हजरत हमारा, इस कमरे को रहने दीजिए। इसमें कोई खास चीज नहीं है।" अमीर बोला, "अगर इसमें कोई खास चीज नहीं है तो इसे देखने में क्या हरज है?" हारून वजीर ने कहा, "हजरत हमारा, अगर इस कमरे में खजाना होता तो मैं आपको जरूर दिखाता।"
अमीर ने गुस्से में आकर कहा, "यह अजीब बात है कि इसमें कुछ है भी नहीं और तुम इसे खोलते भी नहीं। मेरा हुक्म है कि इसे खोलो। मैं इसे देखने के बाद ही आगे चलूंगा।" हारून वजीर ने हाथ जोड़कर इज्जत से कहा, "हजरत हमारा, आपके वालिद की ख्वाहिश थी कि इस कमरे को तब तक ना खोला जाए जब तक आपकी उम्र 40 साल की ना हो जाए। इसलिए आप इसे मत खुलवाइए।"
अमीर ने फर्श पर पांव पटकते हुए कहा, "हम इस ख्वाहिश की तमील ना करेंगे। इस कमरे को फौरन खोला जाए।" वजीर आजम ने इसकी अददी के आगे हार मान ली और कमरे का मजबूत ताला खुलवा दिया।
बादशाह अमीर कमरे में गया तो उसने देखा कि फर्श पर बहुत खूबसूरत और दिलकश कालीन बिछे हुए हैं। चारों तरफ हल्के नीले रंग के रेशमी कपड़े लटकाए हुए हैं और बीच में संगमरमर की एक मूर्ति खड़ी है। अमीर मूर्ति के सामने खड़ा होकर इसे देखता ही रह गया।
हारून वजीर बोला, "चलिए हजरत हमारा, यह तो एक मामूली मूर्ति है। इसे देखने से क्या मिलेगा?" अमीर ने कहा, "यह किस औरत की मूर्ति है?" हारून वजीर बोला, "यह जाहिर सल्तनत की शहजादी की मूर्ति है।" हजरत हमारा, अमीर ने कहा, "वह बहुत खूबसूरत है। क्या तुम्हें पता है कि वालिद ने यह मूर्ति क्यों बनवाई थी?" उसने कहा, "हजरत हमारा, माफ ही चाहता हूं। वह इस शहजादी को अपनी रानी बनाना चाहते थे। मगर यह शहजादी एक ताकतवर जादूगरनी भी है। इसलिए वह उनके वश में ना आ सकी। आखिरकार उन्होंने इसकी मूर्ति बनवाकर यहां रख ली थी और दिन में दो बार इसे देखा करते थे।"
अमीर कहने लगा, "क्या यह शहजादी हमें ना मिल सकती?" हारून बोला, "वहां पहुंचना बहुत मुश्किल है हजरत हमारा, क्योंकि अब तक सैकड़ों नौजवान जिनमें शहजादे और बादशाह भी शामिल थे उसके पास पहुंचे। मगर उनमें से एक भी वापस लौट कर ना आया।"
अमीर कहने लगा, "क्या तुम भी उसके पास ना जा सकते?" हारून ने जवाब दिया, "वहां जाना तो कोई मुश्किल काम नहीं है मगर वापस आना नामुमकिन है क्योंकि पता नहीं वह जाने वालों को मार डालती है या जादू से अपना गुलाम बना लेती है।"
अमीर ने कुछ सोचते हुए कहा, "तुम आज ही निकल जाओ। हम एक हफ्ता तक तुम्हारे लौटने का इंतजार करेंगे। अगर एक हफ्ता बीतने के बाद भी तुम वापस ना आए तो हम अपनी फौज लेकर जाहिर सल्तनत पर हमला कर देंगे और तुम्हें आजाद करवा लेंगे।" हारून ने कहा, "अगर इसने मुझ पर जादू कर दिया तो क्या होगा?" अमीर बोला, "हमारे खादिमों में से मिर्जा जुबैर को अपने साथ ले जाओ। उन्हें जादू का तोड़ आता है।"
हारून वजीर ने चौंक कर कहा, "मगर हजरत हमारा, मिर्जा साहब तो अफीम पीते हैं। उन्हें साथ ले जाने से क्या फायदा होगा?" अमीर बोला, "नहीं, वह तुम्हारी मदद करेंगे। उन्हें साथ जरूर ले जाओ।" आखिर में बादशाह खजाना देखने के बजाय वापस आ गया। और उसने वजीर आजम हारून और मिर्जा जुबैर को अपने खास हाथी पर बिठाकर जाहिर की तरफ रवाना कर दिया। हारून आगे बैठा और मिर्जा जुबैर हौदे में बैठ गए। दोनों हाथी को दौड़ाते हुए वीरान और जंगलों से गुजरते हुए चले जा रहे थे। मिर्जा जुबैर तो हौदे में सो गए थे।
तीन दिनों का सफर मुकम्मल करने के बाद वह जाहिर सल्तनत के दरवाजे पर पहुंच गए। पहरेदार ने उनसे सल्तनत में दाखिल होने का सबब पूछा तो उन्होंने कहा, "हम शहजादी साहिबा से मिलने के लिए आए हैं।" पहरेदार ने हारून से कहा, "नौजवान, अगर तुम शहजादी साहिबा से मिलोगे तो अपनी जान गमवा बैठोगे।" मिर्जा जुबैर बोले, "क्या कहा? हम और जान गमवा बैठेंगे। अहमका, तुम हमें जानते नहीं हो।"
पहरेदार ने कहा, "अगर यह बात है तो शौक से चले जाइए और शहजादी साहिबा के महल के दरवाजे पर रखे हुए नगाड़े को बजाओ।" दोनों अपने हाथी के साथ महल के दरवाजे पर पहुंचे। फिर हारून नीचे उतरा। उसने एक छड़ी उठाई और नगाड़े को जोर-जोर से बजाया। इसकी आवाज सुनकर सात दासियां दौड़ती हुई आई और इज्जत से प्रणाम करके कहने लगी, "चलिए हजरत हमारा। शहजादी साहिबा आपका इंतजार कर रही हैं।"
दासियों को देखकर मिर्जा जुबैर भी नीचे उतर आए और वजीर एआम हारून के साथ शहजादी लैला के पास गए। उन्होंने देखा कि वह संगमरमर की मूर्ति से कहीं ज्यादा खूबसूरत और दिलकश है। उसका चेहरा सफेद और गोरा, बड़ी-बड़ी स्याह नरगसी आंखें, सीधी नाक, पतले-पतले गुलाबी होंठ और लंबे-लंबे काले बाल थे।
शहजादी लैला ने अपनी प्यारी और मिठास भरी आवाज में कहा, "क्या आप लोग मुझे देखने आए हैं या मुझसे शादी करने का इरादा रखते हैं?" हारून ने कहा, "शादी करने के ख्याल से आया हूं।" शहजादी कहने लगी, "मेरे पांच सवाल हैं। अगर आपने इन पांचों सवालों के सही जवाब दे दिए तो मैं आपसे शादी कर लूंगी। मगर अगर आपने एक भी सवाल का जवाब ना दिया तो आपकी गर्दन कटवाकर दरख्त पर लटका दूंगी। वह देखो सामने दरख्त पर।" दोनों ने गर्दन उठाकर देखा तो एक ऊंचे दरख्त पर बहुत से सिर लटक रहे थे।
मिर्जा जुबैर बोले, "अरे हारून, क्या देख रहे हो? तुम्हारा सिर भी इन्हीं में से एक दिखेगा।" हारून ने कहा, "चुप रहो।" फिर शहजादी ने कहा, "और जो कोई दो-तीन सवालों के जवाब सही और बाकी के जवाब गलत देता है तो मैं इसे जादू से जानवर बना देती हूं। वह देखो सामने तोता, मीना, बुलबुल, हंस, घर, हॉल, हवा, ऊंट, गधा, कुत्ता, नीलगा, हिरण, गीदड़, भेड़िया, सारस, लोमड़ी और यह चीता। यह सब असल में इंसान है। मगर जवाब ना देने की वजह से जानवर बने हुए हैं। अब बताओ आपका क्या इरादा है?"
वजीर एआम हारून ने जवाब दिया, "मैं आपके पांचों सवालों के जवाब जरूर दूंगा।" शहजादी कहने लगी, "शाबा।" फिर बोली, "आइए पहले नाश्ता कर लीजिए।" मिर्जा जुबैर ने कहा, "नहीं शहजादी साहिबा, यह हरगिज ना होगा। हमारा तजुर्बा है कि ऐसे मौकों पर ऐसी चीज खिला दी जाती है कि इंसान अपनी अकल खो बैठता है। इसलिए पहले अपने सवालों का जवाब ले लीजिए।"
शहजादी मिर्जा जुबैर की बात पर जोर से हंस पड़ी। फिर कहने लगी, "बहुत अच्छा है। चलिए सामने बरहदरी में बैठकर मेरे सवालों के जवाब दीजिए।" यह कहकर उसने ताली बजाई। उसी वक्त बहुत सी दासियां आ गई। शहजादी ने उनसे कहा, "सामने बरहदरी में हमारे बैठने का इंतजाम करो।" दासियों ने फौरन फर्श पर कालीन बिछा दिए और एक सफेद मसनद पर तकिए रख दी। फिर शहजादी इस मसनद पर बैठ गई और हारून मिर्जा जुबैर के साथ नीचे कालीन पर बैठ गया। दासियाओं चारों तरफ खड़ी होकर पंखे से हवा करने लगी।
शहजादी लैला ने कहा, "मेरा पहला सवाल यह है कि एक दरख्त ऐसा है जो सारी दुनिया पर छाया हुआ है। उसके पत्ते एक तरफ के काले और दूसरी तरफ के सफेद हैं। वह दरख्त साल भर में एक बार मर जाता है मगर फौरन ही जिंदा हो जाता है। बताओ वह दरख्त कौन है?"
मिर्जा जुबैर ने हारून के कान के पास मुंह ले जाकर कहा, "वह दरख्त गधा हो सकता है क्योंकि उसकी पीठ गहरे रंग की होती है और नीचे से पेट सफेद होता है।" हारून ने आंखें चढ़ाते हुए धीरे से कहा, "क्या नशे में हो?" मिर्जा जुबैर कहने लगे, "गधा एक साल के बाद मरता है और फिर फौरन ही जिंदा भी हो जाता है।" मिर्जा जुबैर कहने लगे, "जिस वक्त एक गधा मरता होगा उसी वक्त दुनिया के किसी ना किसी हिस्से में एक गड्ढा पैदा भी तो जरूर होता होगा।"
शहजादी लैला ने दोनों को बातें करते देखा तो उसने कहा, "मिर्जा जुबैर, आप उन्हें सलाह ना दें वरना आपको गीदड़ बनाकर किसी पिंजरे में बंद कर दूंगी।" मिर्जा जुबैर अपनी टोपी सीधी करते हुए बोले, "हम और गीदड़, तौबा तौबा जनाब, हम शेर से कम नहीं है। इसकी तरह हम दूसरे जानवरों पर बहादुरी से हमला करते हैं। इसलिए हमें गीदड़ बनाकर हमारी इज्जत को मिट्टी में ना मिलाइए।"
शहजादी इनका मजाहिया जवाब सुनकर मुस्कुराने लगी। फिर हारून ने कहा, "शहजादी साहिबा, अब अपने सवाल का जवाब सुनिए। इस दरख्त का नाम साल है जिसके एक तरफ के पत्ते सफेद हैं। वह दिन है और काले पत्ते रात हैं। दरख्त का मर जाना साल का खत्म होना है और मरकर फौरन जिंदा हो जाना नए साल का पहला दिन है।" शहजादी यह जवाब सुनकर बहुत खुश हुई।
फिर कहने लगी, "अब दूसरा सवाल सुनिए। एक समंदर है जो सारी दुनिया को यहां तक कि हिमालय पर्वत को भी डुबो देता है। मगर एक देव है जिसका ना मुंह है ना हाथ और ना पांव है। वह इसे पलभर में पी जाता है। बताओ तो वह समंदर क्या है और वह देव कौन है?"
मिर्जा जुबैर अपनी छोटी सी नुकीली दाढ़ी को उंगलियों से खोदते हुए कहने लगे, "अब खैर नहीं वजीर साहब। अब हमारी भलाई इसी में है कि पिंजरा तलाश कर लो।" शहजादी बोली, "आप चुप रहें मिर्जा साहब।"
हारून ने थोड़ी देर सोचा। फिर मुस्कुरा कर बोला, "वह समंदर ओस शबनम है। सुबह के वक्त सारी दुनिया इसमें डूबी हुई होती है और इसे पीने वाला देव वह सूरज है जिसका ना मुंह है ना हाथ और ना पांव है। मगर फिर भी वह शबनम पी जाता है।" शहजादी बोली, "शाबाश।"
"तीसरा सवाल यह है कि मेरी तीन बहनें हैं और 19 दासियां हैं। मैं चाहती हूं कि आधी दासियां बड़ी बहन शहनाज को मिल जाए। बाकी आधे हिस्से में से आधी दासियां दरमियानी बहन मुमताज को मिल जाए। मगर यह ख्याल रहे कि किसी दासी के टुकड़े भी ना हो और किसी बहन को कम या ज्यादा भी ना मिले।"
मिर्जा जुबैर बोले, "सवाल बिल्कुल गलत है। 19 का आधा 9.5 होता है। इसलिए एक दासी को तो जरूर काटना पड़ेगा। और अगर ना काटा गया, तो सवाल सही है ना हो सकता।" शहजादी ने कहा, "कटी हुई दासी को बड़ी बहन लेकर क्या करेगी? यह भी तो सोच लो।" मिर्जा जुबैर ने अफीम की एक गोली दांतों में दबाते हुए कहा, "हिसाब के मुताबिक जो होगा करना पड़ेगा।"
हारून बोला, "चुप रहो मिर्जा साहब। मैंने इस सवाल को हल कर लिया है। सुनिए शहजादी साहिबा, अपनी 19 दासियों में एक मेरी दासी शामिल कर लीजिए। अब आपके पास 20 दासियां हैं। इनकी आधी 10 दासियां तो बड़ी बहन शहनाज को दे दीजिए। बाकी आधे हिस्से में से आधी यानी पांच दरमियानी बहन मुमताज को दे दीजिए। अब कुल दासियों की तादाद का पांचवा हिस्सा यानी 20 का पांचवा हिस्सा चार छोटी बहन को दे दीजिए। ले लीजिए पूरा हो गया। अब देखिए 10 और पांच 15 और 15 और चार 19।"
इस जवाब को सुनकर शहजादी सोचने लगी कि यह नौजवान बहुत ही जहीन और समझदार है। अगर इसने बाकी दो सवालों के जवाब ही दे दिए तो क्या होगा? वह ऐसी ही बातें सोच रही थी कि हारून ने कहा, "चौथा सवाल बताइए।"
शहजादी ने चौंक कर कहा, "देखो हमने ऐसी रानी देखी जिसे आग लगे तो बरसते पानी और एक ऊंचा सा पहाड़ जिस पर कलियों के बाहर मही तोड़ ना सके माहिर गोंद ना सके।" मिर्जा जुबैर सवाल सुनते ही घुटनों में सिर रखकर बैठ गए। मगर वजीर आजम हारून जो बहुत ही जहीन और काबिल शख्स था। मुस्कुराते हुए बोला, "सुनिए शहजादी साहिबा, मोमबत्ती वह रानी है जिसे आग लगते ही पानी बरसने लगता है और ऊंचा सा पहाड़ आसमान है और कलियां तारे हैं। इन कलियों को मही तोड़ ना सके और माहिरा गूंद ना सके।"
शहजादी लैला अपने चौथे सवाल का सही जवाब सुनते ही पसीने से भीग गई और मन ही मन कहने लगी, "अब क्या होगा? सिर्फ एक ही सवाल बाकी रह गया है। अगर इसने इसका भी जवाब दे दिया तो मुझे इससे शादी करनी पड़ेगी। इसका मतलब है कि मेरी आजादी मुझसे छिन जाएगी। अब मुझे ऐसा सवाल करना चाहिए कि यह परले तक इसका जवाब ना दे सके।" यह सोचकर उसने कहा, "मेरा पांचवा और आखिरी सवाल यह है काहू खा ताली लंगड़ा बनाई बहारी। इससे पहले और बाद में क्या है और इसका किस्सा क्या है?"
वजीर आजम हारून इस अजीब सवाल को सुनकर हैरान रह गया और सोचने लगा, "यह तो ऐसी बात है कि इस पर सोचना समझना बिल्कुल बेकार है।" फिर इसकी नजर उन पिंजरों की तरफ उठ गई जिनमें सैकड़ों जानवर बंद थे और वह मन में कहने लगा, "कुछ देर के बाद मैं भी जानवर बना दिया जाऊंगा।" और उसे चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा नजर आने लगा। मिर्जा जुबैर भी किसी गहरी सोच में थे कि अचानक उन्हें कुछ याद आया और उन्होंने हारून के कान में एक बात कही जिसे सुनकर वह मुस्कुरा दिया और शहजादी लैला से कहने लगा, "आपके सवाल का जवाब यह है सुनिए। एक थी चूहा। उसे जो शौक हुआ तो उसने कान छेदने वाले को बुलाकर अपनी नाक छेदवाई ली। नाक में खून लगा तो वह भागती भागती नदी पर गई। नदी पर जो नाक धोने बैठी तो नाक में से इतना खून निकला कि नदी का पानी लाल हो गया। नदी पर एक बैल पानी पीने आया। वह नदी से कहने लगा, 'अरे बहन नदी, बहन नदी, मैं अभी यहां से पानी पीकर गया था। तब तो तुम्हारा पानी सफेद था। अब लाल हो गया।' नदी ने कहा, 'कुछ ना पूछ।' बैल ने कहा, 'नहीं, कुछ तो जरूर बता।' नदी कहने लगी, 'बहन चूहे की नाक छेदी।' बैल के सिंह झड़े। बैल बेचारे के सिंह जो थे सो झड़ गए। बैल एक बरगद के दरख्त के पास गया। दरख्त ने कहा, 'बैल, बैल, अभी तो तू मेरे पत्ते खाने आया था। तब तेरे सिंह मौजूद थे। इतनी जल्दी तेरे सिंह को क्या हो गया?' उसने कहा, 'कुछ ना पूछ।' उसने कहा, 'नहीं, कुछ तो बता।' बैल ने कहा, 'बहन चूहे की नाक छेदी। नदी का पानी लाल हुआ। बरगद के पत्ते झड़े।' इस पर आकर काहू बैठा। वह कहने लगा, 'बरगद, बरगद, अभी तो मैं तेरे ऊपर आकर बैठा था। तेरे सब पत्ते मौजूद थे। इतनी जल्दी तेरे पत्ते क्या हुए?' उसने कहा, 'कुछ ना पूछ।' उसने कहा, 'नहीं, कुछ तो जरूर बता।' कहा, 'बहन चूहे की नाक छेदी। नदी का पानी लाल हुआ। बैल के सिंह झड़े। काहू खा।' ताली के पास गया। ताली ने कहा, 'काहू, का अभी तो तू आया था। तेरी दोनों आंखें मौजूद थी। अब ऐसा क्या हुआ कि तेरी आंखें चली गई?' काहू ने कहा, 'कुछ ना पूछ।' उसने कहा, 'नहीं, कुछ तो जरूर बता।' कहा, 'बहन चूहे की नाक छेदी। नदी का पानी लाल हुआ। बैल के सिंह झड़े। बरगद के पत्ते झड़े। काहू खा ताली लंगड़ा।' ताली बेचारा लंगड़ा हो गया। ताली बनई के पास गया। बनई ने कहा, 'ताली, ताली, अभी तो तू मेरे पास तेल लेकर आया था। तेरी दोनों टांगे मौजूद थी। अब इतनी जल्दी तो लंगड़ा कैसे हो गया?' ताली ने कहा, 'कुछ ना पूछ।' उसने कहा, 'नहीं, कुछ तो जरूर बता।' उसने कहा, 'बहन चूहे की नाक छेदी। नदी का पानी लाल हुआ। बैल के सिंह झड़े। बरगद के पत्ते झड़े। काहू खा ताली लंगड़ा। बनई बहरी।' बनई बेचारा बहरी हो गया। उसके यहां एक अमीर की दासी सौदा लेने आई। वह कहने लगी, 'बनाई, बनाई, दाल दे।' बनई बोला, 'गवार दूं।' उसने कहा, 'नहीं, दाल दे।' कहने लगा, 'चावल दूं।' दासी चिल्लाकर बोली, 'बनई, बनई, अभी तो मैं तेरे यहां चीनी लेने आई थी। तब तो तू ठीक-ठाक सुनता था। अब इतनी जल्दी क्या हुआ कि तू बहरी कैसे हो गया?' बनई ने कहा, 'कुछ ना पूछ।' दासी बोली, 'कुछ तो जरूर बता।' कहा, 'बहन चूहे की नाक छेदी। नदी का पानी लाल हुआ। बैल के सिंह झड़े। बरगद के पत्ते झड़े। काहू खा ताली लंगड़ा बनाई बाहरी।' दासी हंसी। दासी जो थी वह हंसते-हंसते लोटपोट होने लगी। गई मालकिन के पास। उन्होंने पूछा, 'अरे कमबख्त, अभी तो तू ठीक-ठाक थी। अब तुझे हंसी क्यों लग गई?' कहने लगी, 'कुछ ना पूछ।' उसने कहा, 'कुछ तो बता।' उसने कहा, 'बहन चूहे की नाक छेदी। नदी का पानी लाल हुआ। बैल के सिंह झड़े, बरगद के पत्ते झड़े, काहू खा, ताली लंगड़ा बनाई बाहरी।' दासी हंसी। मालकिन कूद पड़ी। मालकिन कूदने लगी।"
शहजादी लैला अपने सवाल का लंबा चौड़ा मगर बिल्कुल सही जवाब सुनते ही वजीर आजम हारून को ऐसे देखने लगी जैसे वह चलती फिरती शहजादी ना हो बल्कि संगमरमर की बेजान मूर्ति हो। उसके साथ-साथ दासियाओं भी हैरान थी। हारून ने खड़े होते हुए कहा, "बताइए शहजादी साहिबा, अब क्या हुक्म है?"
शहजादी दबी जुबान में बोली, "अब मैं आपकी दासी हूं क्योंकि आपने मेरे पांचों सवालों के जवाब दे दिए और मुझे जीत लिया है। आपको मुबारक हो कि हजारों आदमियों में सिर्फ आप ही ने मुझे हरा दिया है।"
हारून ने कहा, "मगर शहजादी साहिबा, मैंने आपको अपने लिए ना बल्कि अपने बादशाह अमीर के लिए जीता है। अब आप उनकी रानी बनकर रहेंगी।"
शहजादी बोली, "हरगिज नहीं। आपने मेरे सवालों के जवाब दिए हैं। इसलिए आप ही मुझसे शादी कर सकते हैं। अगर बादशाह मेरे सवालों के जवाब देता तो वह शादी करता। फिर किसी दूसरे को हक ना होता।"
हारून ने कहा, "शायद आपको मालूम ना हो कि हातिम ताई जो हातिम ताई के नाम से मशहूर है। उसने हसन बानो के साथ सात सवाल हल किए थे। मगर उससे शादी खारिज्म के शहजादा मुनैर शामी ने की थी। हातिम ने ना की।"
शहजादी बोली, "आप सही कहते हैं मगर आपको मालूम होना चाहिए। हातिम ताई ने हसन बानो से पहले इजाजत ले ली थी कि अगर मैं सातों सवाल हल कर दूं तो क्या आप मुनयर शामी से शादी कर लेंगी? हसन बानो ने वादा कर लिया तो हातिम ताई ने उसके सवाल हल किए थे। मगर आपने तो मुझसे इजाजत ना ली थी।"
हारून ने कहा, "मगर मैं बादशाह से वादा करके आया था कि आपके लिए शहजादी लैला को ले आऊंगा। इसलिए मैं शादी करके अपने वादे से ना हट सकता।" लैला बोली, "मुझे इन बातों से कोई मतलब नहीं।"
मिर्जा जुबैर जो खामोशी से दोनों की बातें सुन रहे थे कहने लगे, "शहजादी साहिबा, उन्हें तो वैसे भी आपसे दूर ही रहना चाहिए क्योंकि आपका दिल इंसान की हमदर्दी से खाली है। सैकड़ों को आपने मार दिया है और सैकड़ों को इंसान से जानवर बनाकर पिंजरे में बंद कर दिया है।"
लैला ने कहा, "अगर तुम्हारा यह ख्याल है तो मैं इन सबको दोबारा इंसान बनाकर आजाद कर देती हूं।" हारून बोला, "अगर आपने उन्हें आजाद कर दिया तो मैं आपका जिंदगी भर एहसान मानूंगा।"
शहजादी लैला उसी वक्त मुस्कुराती हुई उठी और जादू की छड़ी हवा में घुमाते हुए पिंजरों के पास गई। फिर मंत्र पढ़कर एक-एक करके हर जानवर को छड़ी लगाते हुए चली गई। जिस जानवर को छड़ी लगती, वह इंसान बन जाता। इस तरह सारे जानवर इंसान बन गए। फिर हारून ने शहजादी से कहकर सबको आजाद करवा दिया।
जब सब लोग चले गए तो शहजादी ने कहा, "अब आप शादी करने के लिए तैयार हो जाइए।" मिर्जा जुबैर बोले, "मैं चाहता हूं कि जादू की इस छड़ी को हमेशा के लिए खत्म कर दिया जाए।" शहजादी ने कहा, "मैं इसे जमीन में दबा दूंगी।"
हारून बोला, "जी नहीं, आप यह छड़ी मिर्जा जुबैर को दे दीजिए। यह इस छड़ी को पत्थर से बांधकर नदी में डुबो देंगे। फिर यह किसी के हाथ ना लग सकेगी।" शहजादी ने जादू की छड़ी मिर्जा जुबैर के हवाले कर दी और कहने लगी, "अब आपको क्या इंकार है?"
हारून ने कहा, "अगर मैंने आपसे शादी कर ली तो बादशाह को क्या मुंह दिखाऊंगा? नहीं, नहीं, मैं शादी ना करूंगा।"
दासी ने कहा, मैं क्षमा चाहती हूँ। परंतु मैं यह अनुरोध करती हूँ कि आप कुछ दिन यहाँ मेहमान रहकर सोच-विचार कर लें।
शहजादी ने गले से एक हार उतारकर दासी को इनाम दिया और दोनों से कहा, आप शाही मेहमानखाने में रहें।
हारून बोला, जी नहीं, हम आपको साथ लेकर तुरंत वापस जाना चाहते हैं क्योंकि बादशाह साहिब इंतजार कर रहे होंगे।
परंतु शहजादी ने उनकी एक न सुनी और उन्हें मजबूर होकर मेहमान बनना पड़ा।
उधर बादशाह अमीर ने जब देखा कि एक हफ्ता बीतने के बाद भी हारून और मिर्जा जुबैर वापस न आए तो वह अपनी फौज लेकर जाहिर सल्तनत की तरफ रवाना हुआ और तीसरे दिन सल्तनत के दरवाजे पर पहुँच गया।
शहजादी को जब मालूम हुआ कि उसकी रियासत पर हमला करने के लिए दुश्मन दरवाजे पर पहुँच गया है तो उसने अपनी फौज को मुकाबले के लिए रवाना कर दिया।
दोनों फौजों में जंग शुरू हो गई।
हारून को जैसे ही मालूम हुआ कि जंग हो रही है तो वह दौड़ता हुआ किले के मीनार में गया और देखा कि दुश्मन कौन है।
परंतु अमीर को देखते ही उसने शहजादी से कहा, इस जंग को रोक दो क्योंकि मैं बादशाह को समझाना चाहता हूँ।
शहजादी ने हारून को साथ लेकर सफेद झंडा उठाया।
इसे देखकर दोनों तरफ के सिपाहियों ने जंग रोक दी।
फिर हारून नीचे उतरकर बादशाह के पास गया और कहने लगा, हजरत! मैंने शहजादी के पाँचों सवाल हल कर दिए हैं।
परंतु वह कहती है कि जिसने मेरे सवाल हल किए हैं वही मुझसे शादी कर सकता है।
दूसरे किसी आदमी को हक नहीं है।
अमीर ने आँखें निकालते हुए कहा, वफादार गद्दार, धोखेबाज या मक्कार! शहजादी को देखकर नीयत बदल गई।
हारून बोला, नहीं हजरत! यहाँ की एक-एक दासी इस बात की गवाह है कि मैं शादी करने से इनकार कर चुका हूँ और आपके लिए शहजादी से लड़ रहा हूँ।
मिर्जा जुबैर भी भागते हुए वहाँ पहुँचे और हारून की तरफ से बोलने लगे।
परंतु अमीर ने इन दोनों में से किसी की बात पर यकीन न किया और कहने लगा, मेरे साथ वापस चलो।
मैं जंग करके इस सल्तनत को तबाह कर दूँगा और शहजादी का गुरूर मिट्टी में मिलाकर इसे अपनी गुलामी में ले लूँगा।
और यह कहकर उसने अपने सिपाहियों को इशारा किया और उन्होंने हारून को गिरफ्तार कर लिया।
फिर अमीर अपनी फौज के साथ वापस चला आया।
शहजादी लैला यह हाल देखकर उदास हो गई क्योंकि हारून से उसकी शादी न हो सकी और जादू की छड़ी भी हाथ से जाती रही।
वह बहुत देर तक बैठी कुछ सोचती रही।
आखिरकार उसने दो दासियों को बुलाकर हुक्म दिया, तुम वेश बदलकर अमीर के महल में जाओ और हारून का हाल जानकर बहुत जल्दी वापस चली आओ।
अगर हारून को यहाँ आने का इरादा न हो तो किसी तरह जादू की छड़ी हासिल कर लेना।
दासियाँ इज्जत से रवाना हो गईं और रास्ते की मुसीबतें सहन करती हुई अमीर के शहर में जा पहुँचीं।
दोनों ने ग्वालिन का वेश बदल लिया और मटकों में दही लेकर शाही महल की तरफ चल पड़ीं।
महल के मरकजी दरवाजे पर खड़े पहरेदार ने उन्हें न रोका और वे सीधे महल में चली गईं।
दासियों ने बातें करके यह पता लगा लिया कि बादशाह अमीर ने हारून को गुलामों के कपड़े पहनाकर जंगल में छोड़ दिया है और मिर्जा जुबैर को शहर से निकाल दिया है।
दासियाँ यह राज मालूम करने के बाद वापस जाहिर चली गईं और उन्होंने सारा हाल शहजादी लैला को कह सुनाया।
शहजादी बहुत परेशान हुई और वह सोचने लगी, हारून जैसा जहीन और समझदार नौजवान ही की मुझे तलाश थी।
ऐसे आदमी के साथ जिंदगी बहुत अच्छी तरह बीतती है।
परंतु बादशाह अमीर जैसे के साथ एक दिन भी काटना मुश्किल हो जाता है।
फिर उसे ख्याल आया कि जादू की छड़ी छिन जाने के बाद मेरी ताकत बहुत ज्यादा कम हो गई है।
काश यह छड़ी मेरे पास ही रहती।
अब अगर अमीर ने मेरी सल्तनत पर हमला कर दिया तो मैं इसका मुकाबला न कर सकूँगी और वह मुझे जबरदस्ती यहाँ से ले जाएगा और मेरी मर्जी के खिलाफ मुझसे शादी कर लेगा।
इस ख्याल के आने पर वह काँप उठी और मन ही मन कहने लगी, मैं ऐसा हरगिज न होने दूँगी।
मैं अभी रवाना होती हूँ और जंगलों, मैदानों और वीरान जगहों में इसे तलाश करती हूँ।
मिर्जा जुबैर को शहर से निकाल दिया गया था।
वह बेचारे दूसरे शहरी मारे-मारे फिर रहे थे।
जेब खाली थी।
अफीम के लिए पैसे की कौड़ी भी न थी।
कोई काम भी न जानते थे जो दो-चार पैसे कमा लें।
आखिरकार उन्होंने सोचा कि बाजारों में जादू की छड़ी से लोगों को इंसान से जानवर और जानवर से इंसान बनाने का कमाल दिखाया करूँगा।
इस तरह सुबह से शाम तक दस रुपये कमा लिया करूँगा।
यह सोचकर उन्होंने एक बड़े बाजार में खड़े होकर भीड़ इकट्ठी की और लोगों से कहा, भाइयों, मैं जादूगर नहीं हूँ।
परंतु फिर भी इंसान को जानवर बना सकता हूँ और उस जानवर को दोबारा इंसान के रूप में वापस ला सकता हूँ।
अगर यकीन न हो तो कोई सज्जन मेरे सामने आकर खड़े हो जाए।
भीड़ में से एक शख्स आगे आया और कहने लगा, अगर आपने मुझे ऊँट बना दिया तो मैं आपको पाँच रुपये इनाम दूँगा।
मिर्जा जी बहुत खुश हुए और उन्होंने छड़ी घुमाकर कहा, "अरे आदमी तो ऊँट बन जा।" वह आदमी ऊँट बन गया।
यह कमाल देखकर भीड़ ने जोर-जोर से तालियाँ बजाईं।
फिर एक बहुत मोटा आदमी आगे आया और कहने लगा, मुझे हाथी बनाकर दिखाओ।
मिर्जा जी ने छड़ी घुमाकर इसे हाथी बना दिया।
उसी वक्त उधर से बादशाह की सवारी गुजरी।
उसने पूछा, यह क्या तमाशा है?
लोगों ने कहा, एक शख्स इंसानों को जानवर बना रहा है।
यह सुनकर बादशाह को भी तमाशा देखने का शौक हुआ।
वह नीचे उतरकर बोला, "मुझे ऐसा लगता है कि अब तक इसने जिन लोगों को जानवर बनाया है, वे इसी के आदमी हैं।
इसलिए मेरे वजीर को शेर बनाकर दिखाओ, तो मुझे यकीन आए कि वाकई यह शख्स सच्चा है।"
मिर्जा जी के लिए क्या मुश्किल थी?
उन्होंने छड़ी घुमाकर वजीर को शेर बना दिया।
बादशाह ने तुरंत ही गले से मोतियों का एक हार उतारकर उनके हाथ पर रख दिया और कहा, अब इन लोगों को दोबारा इंसान बनाओ।
मिर्जा जी ने छड़ी घुमाकर कहा, वापस इंसान बन जाओ, परंतु ऊँट ऊँट ही रहा।
हाथी हाथी ही रहा और शेर शेर ही रहा।
मिर्जा जी ने दोबारा छड़ी घुमाकर कहा, परंतु कोई असर न हुआ।
अब तो मिर्जा जी बहुत परेशान हुए और बार-बार छड़ी घुमा-घुमाकर चिल्लाने लगे।
वापस इंसान बन जाओ।
परंतु बेकार कुछ न हुआ।
बादशाह को यह हाल देखकर बहुत गुस्सा आया और उसने मिर्जा जी की गिरफ्तारी का हुक्म दे दिया।
सिपाहियों ने मिर्जा जुबैर को गिरफ्तार कर लिया और जानवरों को रस्सियों से बाँध लिया और किले की तरफ ले गए।
वहाँ जाकर बादशाह को मालूम हुआ कि जादू की छड़ी असल में जाहिर की शहजादी लैला की है और वही इसका राज जानती है।
बादशाह ने उसी वक्त वजीर-ए-आजम को जाहिर सल्तनत भेजा ताकि वह शहजादी से अनुरोध करे कि वह जानवरों को इंसान बना दे।
परंतु जब वजीर-ए-आजम सल्तनत में पहुँचा तो उसे मालूम हुआ कि शहजादी सल्तनत छोड़कर कहीं चली गई है और उसके बारे में किसी को मालूमात नहीं है।
वजीर-ए-आजम मायूस होकर वापस रवाना हुआ और जाकर बादशाह से कहा, हजरत! शहजादी लैला का पता है।
अब सबसे अच्छा यही है कि सारे मुल्क में ऐलान कर दिया जाए कि जादूगर यहाँ आकर इस छड़ी का राज मालूम करें और जानवरों को दोबारा इंसान बनाएँ।
बादशाह को यह मशवरा पसंद आया और उसने तुरंत ही ऐलान कर दिया।
गनीम जादूगर ऐलान सुनकर अपने तेज रफ्तार घोड़े पर सवार हुआ और बादशाह के शहर की तरफ रवाना हुआ क्योंकि यह छड़ी इसी की दी हुई थी और अब वह इस छड़ी को वापस हासिल करना चाहता था।
दूसरे दिन वह बादशाह के पास पहुँच गया और छड़ी हाथ में लेकर जानवरों के सामने खड़ा हुआ और उल्टा घुमाकर बोला।
वापस इंसान बन जाओ।
और वे तीनों इंसान बन गए।
मिर्जा जी भी यह तमाशा देख रहे थे।
अब वह समझ गए कि उल्टा घुमाने से जानवर इंसान बनता है।
बादशाह ने जादूगर से कहा, माँगो क्या माँगते हो?
जादूगर बोला, हजरत! मुझे छड़ी भेंट दीजिए।
छड़ी का नाम सुनते ही मिर्जा जी घबरा गए और बहुत तेजी से झपटकर जादूगर के हाथ से छड़ी छीन ली और सर पर पाँव रखकर दरवाजे की तरफ भागे।
सिपाहियों ने उनका पीछा किया।
परंतु वे किसी के हाथ न आए।
किले से बाहर निकले तो पहरेदार ने उनका पीछा किया।
यह हाल देखकर मिर्जा जी ने छड़ी घुमाई और चिल्लाकर कहा, जानवर बन जाओ।
सारे पहरेदार जानवर बन गए और मिर्जा जी भाग गए।
जादूगर गनीम भी उनके पीछे भागा।
आखिरकार वे दोनों एक जंगल में पहुँच गए।
वहाँ मिर्जा जी ने कहा, "अगर तू मेरा पीछा न छोड़ेगा, तो मैं तुझे गधा बना दूँगा।"
जादूगर बोला, "मुझ पर इसका असर न होगा।"
अगर यकीन न हो तो आजमाकर देख लो।"
मिर्जा जी ने छड़ी घुमाकर कहा, तू गधा बन जा, परंतु गनीम गनीम ही रहा और वह गधा न बन सका।
अब तो मिर्जा जी बहुत परेशान हुए और कहने लगे, देख भाई जादूगर, वैसे तो मैं तुझे छड़ी न दूँगा।
हाँ, अगर तू मुझे यह बता दे कि वजीर-ए-आजम हारून और शहजादी लैला इस वक्त कहाँ हैं और तू मुझे उनके पास पहुँचा दे तो मैं यह छड़ी तेरे हवाले कर दूँगा।
जादूगर गनीम ने जेब से एक आईना निकाला और कुछ पढ़कर उसमें देखा।
थोड़ी देर तक आईना देखने के बाद फिर कुछ पढ़ा।
और दोबारा आईने में देखा।
उसके बाद कहने लगा, सुनो मिर्जा जुबैर, हारून और शहजादी दोनों एक ही जंगल में भटक रहे हैं और वह जंगल यहाँ से 260 मील की दूरी पर है।
अगर वहाँ चलना है तो मेरे साथ घोड़े पर बैठ जाओ।
मिर्जा जुबैर ने छड़ी को अपने सीने से बाँधा और जादूगर के साथ घोड़े पर बैठ गए और मशरिक की तरफ निकल गए।
पाँच दिनों का सफर मुकम्मल करने के बाद छठे दिन वे दोनों जंगल में पहुँच गए और आईने की मदद से उन्होंने शहजादी को ढूँढ लिया।
शहजादी की भूख और प्यास के मारे बुरी हालत थी।
कपड़े फट गए थे और बाल खाक में सने थे।
मिर्जा जुबैर को पहचानकर शहजादी ने कहा, तुम्हारा वजीर कहाँ है?
मिर्जा जी बोले, घबराइए नहीं।
वह इसी जंगल में है।
उन्हें हम तीनों मिलकर ढूँढेंगे।
हम दोनों इसी काम के लिए यहाँ आए हैं।
जादूगर ने आईने की मदद से हारून को भी ढूँढ लिया।
उस वक्त उसकी भी बुरी हालत थी।
दाढ़ी के बाल बढ़े हुए थे और जिस्म पर जगह-जगह जख्मों के निशान थे।
उन्हें देखकर शहजादी की आँखों में आँसू भर आए।
मिर्जा जुबैर बोले, दोस्त, यह क्या है?
वह कहने लगा, कुछ न पूछो।
कई बार जंगली जानवरों से बचा हूँ।
अगर किस्मत साथ न होती तो उनके मुँह का निवाला बन गया होता।
मिर्जा जुबैर ने मुस्कुराते हुए कहा, तेरे पास थोड़ी सी अफीम होती और तू जानवरों को खिला देता।
बस वे तेरे गुलाम हो जाते।
हारून ने शहजादी से कहा, आप मुझ नालायक की तरह इस जंगल में कहाँ भटक रही हैं?
शहजादी ने धीरे से जवाब दिया, "आप मुझे छोड़कर चले गए और बादशाह अमीर मेरा दुश्मन हो गया। खुद को उसके हाथों से बचाने और आपको पाने के ख्याल से मैं सल्तनत छोड़कर यहाँ आई हूँ।"
हारून बोला, अमीर ने भले ही मेरे साथ जुल्म किया है परंतु फिर भी मैं अपने वादे से मुकरूँगा नहीं।
मैंने तेरे सवाल सिर्फ उसके लिए हल किए थे।
इसलिए मैं तुझे उसी के लिए पा सकता हूँ।
अपने लिए नहीं।
मिर्जा जुबैर बोले, यह क्या कह रहे हो हारून?
ऐसे ऊँचे बादशाह के लिए जिसने तेरी वफादारी का तुझे यह इनाम दिया कि गुलामों का कपड़ा पहनाकर जंगल में छोड़ दिया और हमें शहर से निकाल दिया।
अपनी वफादारी दिखा रहे हो।
बड़े दुख की बात है।
चलो शहजादी का हाथ पकड़ो और जाहिर के राजसिंहासन पर बैठकर बहुत शान से शासन करो।
गनीम जादूगर बोला, "यह गुलाम ही आपके साथ है।"
बादशाह अमीर आप लोगों को थोड़ी सी भी तकलीफ न पहुँचा सकेगा।
अगर वह मुकाबले पर आया तो सारी उम्र रोएगा।
हारून चुप था।
शहजादी ने जादूगर गनीम को पहचानते हुए कहा, "आप ही फैसला कीजिए।"
मेरा ऐलान यह था कि जो मेरे पाँच सवाल हल करेगा, मैं उससे शादी करूँगी।
उन्होंने सवाल हल कर दिए।
परंतु कहते हैं कि मैंने यह काम बादशाह के लिए किया है और तुझे बादशाह के साथ जिंदगी गुजारनी होगी।
जादूगर बोला, "यह बात बिल्कुल गलत है।"
तूने अपनी जान की बाजी लगाकर सवाल हल किए हैं।
इसलिए तू ही शहजादी से शादी कर सकता है।
बादशाह हरगिज न कर सकता।
आखिर में ऐसी ही बातें करने के बाद सबने हारून को मजबूर कर लिया।
और वह शहजादी लैला से शादी करने के लिए राजी हो गया।
फिर सब खुशी-खुशी जाहिर सल्तनत गए।
वहाँ रियाया और शाही कारिंदे अपनी शहजादी को देखकर बहुत खुश हुए।
उन्होंने घर-घर दिए जलाए और बच्चों में मिठाइयाँ बाँटीं।
शहजादी ने एक हफ्ता बाद हारून से शादी कर ली और दूसरे दिन उसे राजसिंहासन पर बिठा दिया।
बादशाह अमीर को यह खबर मिली तो वह गुस्से से आगबबूला हो गया और उसने वजीर-ए-आजम को बुलाकर सल्तनत पर चढ़ाई करने का हुक्म दे दिया।
परंतु उसने कहा, हजरत! दो बातें हैं।
एक तो यह कि शहजादी की शादी हो चुकी है।
दूसरे, एक छोटी सी सल्तनत पर हमला करना आप जैसे बड़े बादशाह को शोभा नहीं देता।
बादशाह ने कहा, परंतु हम इस बदमाश हारून को जिंदा न छोड़ेंगे।
तुम फौज की एक टुकड़ी तैयार करो।
हम इसे अपने साथ जाहिर सल्तनत ले जाएँगे।
वजीर-ए-आजम ने हुक्म की तामील की और फौज की एक मजबूत टुकड़ी को तैयार होने का हुक्म दिया।
दूसरे दिन बादशाह फौजी आदमियों के साथ रवाना हुआ और तीन दिनों का सफर मुकम्मल करने के बाद हारून के पास जा पहुँचा।
हारून उसे इज्जत के साथ बिठाना चाहता था।
परंतु उसने शहजादी की तरफ इशारा करते हुए कहा, "हम यहाँ बैठने के लिए नहीं आए।
हमें शहजादी चाहिए।
अगर यह न मिल सकती तो हम तेरा सिर काटकर ले जाएँगे।"
गनीम जादूगर ने कहा, शहजादी का हाथ आपके हाथ में देने से तो बेहतर यह है कि हम इसे जान से मार दें।
परंतु अगर आप अपनी आधी सल्तनत हारून के नाम कर दें तो आपको शहजादी आसानी से मिल जाएगी।
बादशाह अमीर ने अपनी आधी सल्तनत देने का वादा कर लिया और दूसरे ही दिन उसने आधी हुकूमत हारून के नाम कर दी।
आधी फौज और आधा खजाना भी उसके हवाले कर दिया।
फिर गनीम ने शहजादी को बुलाकर उसके साथ कर दिया।
अमीर ने विदाई होने से पहले गनीम को बहुत सा इनाम और इज्जत दी।
अमीर शहजादी को साथ लेकर खुशी-खुशी अपने महल में गया और कहने लगा, हमने तुझे एक बहुत बड़ी कीमत चुकाकर पाया है।
शहजादी बोली, आपने बहुत महंगा सौदा किया है।
अमीर ने कहा, वह कैसे?
शहजादी बोली, आपने शहजादी की मूर्ति को पसंद किया था।
इसलिए आधी सल्तनत के बदले में आपने पत्थर की शहजादी को ही पाया है।
अमीर घबराकर कहने लगा, क्या कह रही हो तुम?
फिर उसने देखा कि जिसे वह शहजादी लैला समझ रहा था।
असल में वह पत्थर की शहजादी थी जो जादू के बल से चल रही थी और बोल भी रही थी।
असल शहजादी तो हारून के साथ थी।
अमीर सिर पकड़कर रह गया क्योंकि वह अपनी आधी सल्तनत, आधी फौज और आधा खजाना देकर अपनी ताकत कम कर चुका था।
अब उसमें हारून की सल्तनत पर हमला करने की हिम्मत न थी।
वह अपनी अहमकाना और बेवजह की हठधर्मिता पर बहुत पछताया।
गनीम जादूगर की इस खिदमत से खुश होकर मिर्जा जुबैर ने जादू की छड़ी उसे तोहफे के तौर पर दे दी और हारून ने इसे एक जागीर दे दी।
फिर ये सब सुकून और आराम की जिंदगी बिताने लगे और बादशाह अमीर अपनी बदनसीबी पर आँसू बहाता रहा।
परंतु पत्थर की शहजादी को हमेशा महल में ही रखा।