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हेलो फ्रेंड्स, मैं हूं गौरव और घर की आर्थिक स्थिति में खुद का भी हिस्सा शामिल हो इसीलिए 10 साल की उम्र में अखबार बेचने वाला एक बच्चा आगे जाकर इंडिया का सबसे पहला बैचलर प्रेसिडेंट बनता है। वेल, यस, परिचय देना जरूरी है क्या? हम सभी जानते हैं, मैं बात कर रहा हूं दुनिया के महान साइंटिस्ट डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जी की, जिनकी बोली हुई हर एक बात दुनिया के लिए एक सीख है।
लेकिन प्रेसिडेंट बनने का यह रास्ता इतना आसान उनके लिए नहीं था। एक मुस्लिम फैमिली से बिलोंग करने की वजह से उन्हें कई सारी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। लेकिन इन मुश्किलों में उन्होंने अपने पंख फैलाकर सक्सेस की उड़ान भर के दिखाई। सिर्फ सक्सेस की नहीं, तो इंडिया के कई मिसाइल्स और प्रोजेक्ट के उड़ान का भी वो कारण बन सके। तो कैसे उन्होंने इन सारे हालातों का डटकर सामना किया और कैसे लोग उन्हें इंडिया का मिसाइल मैन कहकर पुकारने लगे? इन्हीं सारे सवालों के जवाब और एपीजे अब्दुल कलाम की जिंदगी के कुछ माइंड ब्लोइंग किस्से मैं आज आपको सुनाऊंगा इन टुडेज वीडियो टाइटल्ड बायोग्राफी ऑफ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम।
"If you want to shine like sun, first burn like sun." दुनिया को यह सिखाने वाले इस सूरज का जन्म 15 अक्टूबर 1931 में रामेश्वरम के तमिल मुस्लिम फैमिली में हुआ था। पेश से उनके पिताजी जैनु लाब दिन एक नाव चलाने वाले थे, जो हिंदू तीर्थ यात्रियों को रामेश्वरम की सैर कराते थे और उनकी मां आशी अम्मा एक हाउसवाइफ थी। वैसे तो उनका घर छोटा था, लेकिन परिवार बड़ा था। घर में चार भाई और एक बहन थी थी, जिनमें अब्दुल कलाम जी सबसे छोटे थे।
अब जब परिवार बड़ा था, तो घर में पैसे की समस्या होती रहती थी। इसीलिए घर की जमा पूंजी में खुद का हाथ देने के लिए अब्दुल कलाम ने केवल 10 साल की उम्र में पेपर बेचना शुरू कर दिया। लेकिन क्या ये सिर्फ एक ही रीजन था इस काम को करने का? वेल, नहीं। उन्होंने इस काम को भी सोच समझ कर चुना था। बचपन से ही कलाम जी को नॉलेज गेन करने की बहुत भूख थी और इसीलिए कोई भी अखबार बेचने से पहले वो उस अखबार को पूरी तरह से पढ़ लेते थे।
पर ऑफकोर्स, नॉलेज ढूंढने का यह रास्ता हमेशा से आसान नहीं था। एक गरीब मुस्लिम होने की वजह से उन्हें हमेशा कई डिफिकल्टीज का सामना करना पड़ा। उनमें से एक डिफिकल्टी तो उनके बचपन की ही है कि जब वो पांचवीं कक्षा में थे, तब वो उनके बेस्ट फ्रेंड राम नधा शास्त्री, जो एक रड़वा हिंदू ब्राह्मण फैमिली से बिलोंग करते थे, अब्दुल कलाम जी उनके साथ पहली बेंच पर बैठा करते थे। और एक दिन उनके स्कूल में एक नए टीचर आए और एक मुस्लिम को एक ब्राह्मण के साथ देखकर वो चौक गए। उन्हें दोनों का एक साथ बैठना पसंद नहीं आया और उन्होंने कलाम जी को लास्ट बेंच पर बैठने के लिए कहा।
लेकिन क्या उस लास्ट बेंच पर बैठना उन्हें जिंदगी में पीछे छोड़ने वाला था? नहीं। क्योंकि उन्होंने ये ठान ली कि लास्ट बेंच पर बैठकर वो दुनिया को बदल कर दिखाएंगे। और शायद इसीलिए वो हमेशा कहते थे कि "The best brains of the nation may actually be found on the last benches of the classrooms." और ऐसे ही कई लाइफ लेसन्स जीते जी सीखकर अब्दुल कलाम आने वाली पीढ़ के लिए छोड़ गए।
लेकिन उनके लाइफ के ये लेसन्स और 2020 तक इंडिया को एक डेवलप्ड कंट्री बनाने का जो सपना ना था, वो आने वाली पीढ़ी कहीं ना कहीं भूल रही है। एंड जस्ट इमेजिन, एक ऐसे इंसान जिनके पास इतना वेल्थ ऑफ नॉलेज था, उनके लाइफ लेसन्स को अगर आप भूलोगे, आप अपनी जिंदगी में कितने पीछे जा रहे हो। सो नॉट टू वरी, आप वो सभी लाइफ लेसन से सीख ग्रहण कर सकते हो कुकू एफएम ऐप के जरिए।
मैं बताऊंगा कैसे? यहां पर आपको डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम जैसे ही कई और इंस्पिरेशनल और सक्सेसफुल लोगों के बायोग्राफीज मिलेंगे, जिन्हें आप ऑडियो फॉर्मेट में सुन सकते हो। अपने लाइफ में, अपने बिजी लाइफ में मल्टीटास्क करते हो। इसके साथ ही इसमें और भी जनरा अवेलेबल है जैसे सेल्फ इंप्रूवमेंट, मोटिवेशन, नॉलेज, फाइनेंशियल एजुकेशन, हिस्ट्री, साइंस फिक्शन और भी बहुत-बहुत कुछ, जो सब आप हिंदी लैंग्वेज जैसी रीजनल लैंग्वेज में भी सुन सकते हो।
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अब फ्रेंड्स, स्पेशली लास्ट बेंच पर बैठने वाले लोग, मैं आपको बताना चाहता हूं। अब्दुल कलाम के लाइफ की एक बहुत ही इंटरेस्टिंग कहानी। क्लास के उसी लास्ट बेंच पर बैठकर उन्होंने अपना एक गोल बनाया था फाइटर पायलट बनाने का गोल। और ये गोल बना था उनके गुरु की वजह से। एक दिन उनके टीचर मिस्टर शिवा सुब्रह्मण्यम अयर उनकी कक्षा को चिड़िया कैसे उड़ती है, वो सिखा रहे थे। लेकिन 25 मिनट तक समझाने के बाद भी किसी के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। और इस पर अयर जी ने एक सिंपल सा सलूशन निकाला। अगर थियोरेटिकली किसी को ना समझे, तो उन्हें प्रैक्टिकली दिखाना पड़ेगा।
और बस यही था सलूशन। स्कूल खत्म होने के बाद वो सारे बच्चों को पासी के एक समुंद्र किनारे ले गए और वहां उड़ते हुए पंछियों के लाइफ डेमो दिखाकर उन्होंने बच्चों को चिड़ियों की टेल की पोजीशन से लेकर उनके पंखों के शेप तक सब कुछ समझाया। चिड़ियों की वो उड़ान कलाम जी के दिमाग में बैठ गई और उन्होंने तय कर लिया कि बड़े होकर वो फाइटर पायलट बनने जैसा बड़ा गोल हासिल करेंगे। क्योंकि उनका ये कहना था कि "Small aim is a crime. Have a great aim."
लेकिन अपना सपना पूरा करने की में वो हार गए। वेल, हुआ ये कि अपने सपने को पूरा करने के लिए 1955 में उन्होंने मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में एडमिशन लिया। और वहां पर उन्हें एक प्रोजेक्ट मिला। प्रोजेक्ट तो मिलेगा ही। सो उन्हें भी लो लेवल अटैक एयरक्राफ्ट बनाने का प्रोजेक्ट मिला। लेकिन सबमिशन के दिन जब उन्होंने अपना प्रोजेक्ट सबमिट किया, तो प्रोफेसर को उनका ये मॉडल पसंद नहीं आया। उन्होंने कलाम जी को नया मॉडल बनाने के लिए कहा।
अब अगर नया प्रोजेक्ट बनाना हो, तो कम से कम एक मंथ तो लगेगा ही। यह सोचकर कलाम जी ने प्रोफेसर से एक महीने का समय मांगा। लेकिन क्या आज तक किसी की टीचर ने एक महीने का समय दिया है? मुझे तो नहीं मिला कभी जिंदगी में। भाई, उनके प्रोफेसर ने इतने समय के लिए साफ मना कर दिया और कहा कि तीन दिन है तुम्हारे पास, सिर्फ तीन दिन। मुझे नया मॉडल बना कर दो, वरना अपनी स्कॉलरशिप भूल जाओ। यह सुनते ही कलाम जी के होश उड़ गए। एंड क्या कम समय में यह प्रोजेक्ट को कंप्लीट करना कलाम जी को रोकने वाला था? नहीं। स्कॉलरशिप छींच ने के डर से कलाम सर ने तीन दिन बिना सोए दिन रात इतनी मेहनत की कि जब तीन दिन बाद उन्होंने मॉडल पेश किया, तो उनके प्रोफेसर चकित रह गए।
उनके इस मेहनत पर प्रोफेसर ने उनसे एक बात कही, "मुझे पता था कि तीन दिन में नया एयरक्राफ्ट बनाना पॉसिबल नहीं है, लेकिन स्कॉलरशिप छीन जाने की जुनून की वजह से तुमने इसे पॉसिबल किया।" और इस इंसीडेंट से कलाम जी को एक बात समझ आ गई, "To succeed in your mission, you must have single-minded devotion to your goal."
आखिर उनकी इंजीनियरिंग खत्म होने के बाद अपना सपना पूरा करने का एक अवसर उन्हें इंटरव्यू के रूप में आया, जो था इंडियन एयरफोर्स ऑफ देहरादून। इसका इंटरव्यू। लेकिन जैसे मैंने पहले कहा, उनका यह सपना अधूरा रह गया। क्योंकि इस इंटरव्यू में 25 लोगों में से सिर्फ आठ लोगों को ही चुना गया। और पता है, कलाम जी कौन सी पोजीशन पर थे? नाइंथ। सिर्फ एक पोजीशन की वजह से उनका यह सपना सपना ही रह गया। यह इंसिडेंट उनके लिए एक बहुत बड़ी सीख थी। इसीलिए इस इंसिडेंट को कला लाम जी ने अपनी "My Journey: Transforming Dreams into Actions" इस ऑटोबायोग्राफी में लिखा है, जिसकी सीख में वो कहते हैं, "It is only when we are faced with failure do we realize that we were always there with us. We only need to find them and move on with our lives."
चाहे अपनी निजी उड़ान में वो पीछे रह गए हो, लेकिन उनके इस मंत्र की वजह से वो पूरे इंडिया को सक्सेस की उड़ान देने वाले थे। जब उनका इंडियन एयरफोर्स में सिलेक्शन नहीं हो पाया, तब उन्होंने 1958 में डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन को जॉइन कर लिया। डीआरडीओ जॉइन करने के कुछ साल बाद ही उन्हें विक्रम सारा भाई जी के इंडियन नेशनल कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च इनकोस्पार में प्रमोट कर दिया गया, जहां पर उनका पहला मिशन था इंडिया के पहले रॉकेट की उड़ान भरना। क्योंकि उनका मानना था, "The country doesn't deserve anything less than success from us."
वैसे तो ये रॉकेट केरला के थुंबा गांव से लॉन्च होने वाला था, लेकिन शुरुआती स्टेज पर होने के कारण इनकोस्पार के पास ना कोई वर्कशॉप था, ना ही कोई रिसर्च फैसिलिटी। इस पर अब्दुल कलाम जी ने कहा, "We should not give up and we should not allow the problem to defeat us." और फिर क्या था, उन्होंने थुंबा गांव के एक पुराने चर्च को अपना वर्कशॉप बना लिया और उसी चर्च के बिशप के घर को अपना ऑफिस बना लिया। और आखिर में जैसे-तैसे करके उन्होंने रॉकेट को पूरी तरह से बना लिया।
लेकिन यहां पर उनकी मुश्किलें खत्म नहीं हुई। रॉकेट के पार्ट्स को लॉन्च पैड तक लेकर जाने के लिए उनके पास कोई साधन नहीं था। तो उन्होंने सारे पार्ट्स बेलगाड़ी और साइकिल के मदद से लॉन्च पैट तक पहुंचाया। इतने मुश्किलों के बाद 21 नवंबर 1963 में इस रॉकेट को लॉन्च करके इंडिया ने स्पेस की तरफ अपना पहला कदम रखा।
लेकिन जिस इंसीडेंट से एपीजे अब्दुल कलाम जी का नाम मिसाइल मैन पड़ा, वो एक सक्सेस नहीं, वो एक फेलियर था। साल 1969 में कलाम जी इसरो में इंडिया के पहले सैटेलाइट प्रोजेक्ट सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल एसएलवी के प्रोजेक्ट डायरेक्टर थे। 10 साल के खून पसीने की मेहनत के बाद उन्होंने इस रॉकेट को खड़ा किया। प्रोजेक्ट के समय 1979 में कलाम जी के पिता की मौत हो गई और फिर भी वह अपने लक्ष्य से भटके नहीं। उन्होंने इस प्रोजेक्ट को निजी जिंदगी से ऊपर रखकर कंप्लीट किया।
लेकिन जब अगस्त 1979 को इसे लॉन्च किया गया, तो सेकंड स्टेज में कुछ टेक्निकल इश्यूज की वजह से रॉकेट बंगाल की खाड़ी में गिर गया। अब जब प्रोजेक्ट फेल हो चुका था, तो सारे लोग उन पर सवाल उठाने लगे। तब प्रोफेसर सतीश धवन, जो उस समय इसरो के चेयरमैन थे, उन्होंने इस फेलियर का पूरा श्रेय खुद पर ले लिया। उनके इस लीडरशिप की तारीफ करते हुए कलाम जी हमेशा कहते हैं, "A leader must have a vision and passion and not be afraid of any problem. Instead, he should know how to defeat it. Most important, he must work with integrity."
लीडर के इसी सीट को हथेली पर रखकर फेलियर के सिर्फ एक साल बाद ही उन्होंने नए सैटेलाइट लॉन्चिंग व्हीकल एसएलवी-3 का निर्माण किया। आखिर 18 जुलाई 1980 में उन्होंने एसएलवी-3 से रोहिणी-1 सैटेलाइट को लॉन्च किया, जिससे इंडिया सुपर एक्सक्लूसिव क्लब ऑफ स्पेस फेयरिंग नेशन का सिक्स्थ मेंबर बन गया। इस प्रोजेक्ट के बाद तो उन्होंने इंडिया के पहले इंटरमीडिएट रेंज बैलिस्टिक मिसाइल अग्नि और पृथ्वी जैसे कई प्रोजेक्ट्स को सक्सेसफुली कंप्लीट किया, जिनकी वजह से उन्हें 1981 में पद्मभूषण और 1990 में पद्म विभूषण इन पुरस्कारों से नवाजा गया।
लेकिन जिस काम के लिए उन्हें 1997 में भारत रत्न से नवाजा गया था, वो था पोखरन-2। पोखरन-2 एक ऐसा न्यूक्लियर बॉम्ब टेस्टिंग प्रोग्राम था, जिसमें इंडिया ने सीआईए के सैटेलाइट को चकमा देकर हमारे न्यूक्लियर बॉम्ब को टेस्ट किया था। इस प्रोग्राम के प्रोजेक्ट चीफ कोऑर्डिनेटर थे डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, जिन्होंने जापान और यूएसए के वार्निंग्स के बाद भी इस मिशन को चालू रखा बड़ी चतुराई से।
अब आपने थ्री इडियट्स का ये डायलॉग तो सुना ही होगा, "सक्सेस की पीछे मत भागो, एक्सीलेंस एक्सीलेंस का पीछा करो, सक्सेस झक मार के तुम्हारे पीछे आएगी।" इसका बेस्ट एग्जांपल है एपीजे अब्दुल कलाम। 41 इयर्स तक भारत की सेवा करने के बाद जब 1999 में कलाम जी डीआरडीओ से रिटायर हुए, तब रिटायर होने के 3 साल बाद ही उनको भारत का प्रेसिडेंट बनने का प्रपोजल आया।
अब यह हुआ कैसे? वेल, मैं आपको बताता हूं। रिटायर होने के बाद 2001 में कलाम सर अन्ना यूनिवर्सिटी में पढ़ने लगे। एक दिन लेक्चर लेने के लिए जब वह यूनिवर्सिटी पहुंचे, तो उन्हें एक कॉल आया, जिस पर उन्हें कहा गया कि प्राइम मिनिस्टर आपसे बात करना चाहते हैं। पर यह कॉल कोई मजाक नहीं था, क्योंकि कॉल पर उनसे बात करने वाले शख्स थे अटल बिहारी वाजपेयी, जिन्होंने कॉल उठाते ही कलाम जी से कहा, "आपके लिए हमारे पास एक इंपॉर्टेंट न्यूज़ है। हमें ऐसा लगता है कि भारत को आप जैसे राष्ट्रपति की सख्त जरूरत है।"
और यह बात कलाम सर के लिए एकदम अविश्वसनीय थी और इसीलिए उसका जवाब देने के लिए उन्होंने वाजपेयी जी से कहा कि मुझे बस दो घंटों की मोहलत दीजिए। और उन दो घंटों में उन्होंने विचार किया। इंडिया को 2020 तक डेवलप करने का वो यह सपना हमेशा से देख रहे थे। उस सपने को पूरा करने का यह सुनहरा अवसर था। और फिर दो घंटे बाद उन्होंने जो जवाब दिया, उससे 25 जुलाई 2002 में वो इंडिया के 11th राष्ट्रपति बन गए।
राष्ट्रपति होने के बाद भी उन्होंने अपने टीचिंग के ड्रीम को नहीं छोड़ा था। उन्हें जब भी समय मिल जाता, वो स्टूडेंट्स को पढ़ाने के लिए चले जाते थे। टीचर्स डे के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, "अगर लोग मुझे एक अच्छे शिक्षक के रूप में याद करते हैं, तो यह मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान होगा।" उन्हें टीचिंग के प्रोफेशन से इतना लगाव था कि आखिर तक उन्होंने अपने इस प्रोफेशन का हाथ नहीं छोड़ा। क्योंकि 27 जुलाई 2015 के दिन जब हार्ट अटैक की वजह से वो गिर गए, तभी भी वह शिलोंग के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट में पढ़ाने के लिए ही आए थे।
इतना ही नहीं, मरने के बाद उनके अंतिम संस्कार में भी 350000 से ज्यादा लोग शामिल थे, जिससे पता चलता है कि वो सिर्फ मिसाइल मैन ही नहीं, बल्कि पीपल्स प्रेसिडेंट, कलाम चाचा और इन जैसे कई रूपों में इंडियंस के दिल में बसे थे।
अब भाई लोग, आपकी भारी है। डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की ऐसी कौन सी सीख आपके मन को इतनी भा गई कि उसे आप अपनी डेली लाइफ में इनकॉरपोरेट करना चाहोगे? और इनके लाइफ के बारे में आपको सबसे ज्यादा इंस्पायरिंग कौन सी चीज लगी? इसका जवाब मुझे नीचे कमेंट सेक्शन में देना। और हां फ्रेंड्स, जाने से पहले कुक एफएम ऐप को डाउनलोड करना मत भूलना। फर्स्ट 250 लोगों के लिए गेटसेट50 कोड यूज करने पर उन्हें ₹1699 पर इस वेबसाइट की मेंबरशिप मिलेगी। गेटसेट50 कोड यूज करने पर ₹1699 में सालाना की मेंबरशिप मिलेगी इस ऐप की। सो गो हरी नाउ।
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