📱

Get Our Mobile App

Take your business learning on the go!

Download on the App StoreGet it on Google Play

Bhopal Gas Leak – World’s Deadliest Industrial Accident

Zem TV15:04

Transcription

3 दिसंबर 1984 की सुबह सेंट्रल इंडिया में मौजूद भोपाल सिटी के शहरी खतरनाक खांसी, आंखों में जलन और सांस की कमी के साथ उड़ते हैं। इस सुबह लोगों के सामने कयामत का मंजर था। लोग सड़कों पर पैनिकिक में भाग रहे थे। कुछ खांसी और उल्टियां कर रहे थे। जबकि सड़क पर लादाद लाशों के अंबार लगे थे।

पिछले कुछ घंटों से इनके इर्दगिर्द एक ऐसी जहरीली गैस थी जो पास ही मौजूद एक अमेरिकन पेस्टिसाइड प्लांट यूनियन कार्बाइड से टॉक्सिक कार्बाइड प्लांट ऑन मंडेस्ट 1600 दुनिया की सबसे खतरनाक गैस जो किसी केमिकल अटैक के लिए इस्तेमाल होती है उसने भोपाल में करीब 25000 लोगों की जान ली और 5 लाख लोगों ने इसके साइड इफेक्ट्स के साथ बकाया जिंदगी गुजारी। यह इंसानी तारीख का ना सिर्फ सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल हादसा था बल्कि इंसानी लापरवाही, कॉस्ट कटिंग और अधूरे इंसाफ की दास्तान भी है।

पर सवाल यह है कि इतनी डेडली गैस एक अमेरिकन कंपनी के प्लांट से ऐसे कैसे लीक हो गई? प्लांट के सेफ्टी सिस्टम्स ने टाइम पर काम क्यों नहीं किया? कंट्रोल रूम में बैठा स्टाफ जिनको इस तबाही से 1 घंटा पहले लीक का पता चल चुका था, वह वक्त पर इसे रोकने में कामयाब क्यों नहीं हो सके? और आखिर जमीन से कई फुट नीचे कंटेनर्स में से यह गैस कैसे लीक होकर पूरे शहर में फैल गई?

ZM टीवी की वीडियोस में एक बार फिर से खुशामदीद। नाजरीन, भोपाल में यूनियन कार्बाइड नामी अमेरिकन कंपनी पेस्टिसाइड प्रोड्यूस करती थी। इनका प्रोडक्ट सेवन नाम से मार्केट में सेल होता था। जिसको किसान अपने खेतों में स्प्रे करके मुख्तलिफ कीड़ों से बचाकर अपनी प्रोडक्शन को बढ़ा सकते थे। यह प्रोडक्ट मुख्तलिफ केमिकल से मिलाकर बनाया जाता है। इसका सबसे अहम इंग्रेडिएंट मिथाइल आइसोसाइनाइड था जिसे शॉर्ट में एमआईसी भी कहा जाता है। 1969 में जब यह फैक्ट्री शुरू हुई थी, उस वक्त एमआईसी को अमेरिका से इंपोर्ट किया जाता था। लेकिन बाद में यूनियन कार्बाइड ने भोपाल में ही इसको प्रोड्यूस करना शुरू कर दिया। यानी पहले फैक्ट्री में एमआईसी को प्रोड्यूस किया जाता और फिर उसकी मदद से सेवन को।

मिथाइल आइसोसाइनाइड या फिर एमआईसी एक बहुत ही खतरनाक केमिकल है जो लिक्विड फॉर्म में स्टोर किया जाता है। इस काम के लिए यूनियन कार्बाइड ने तीन बड़े कंटेनर्स जमीन के अंदर इंस्टॉल किए हुए थे जिसमें एमआईसी लिक्विड फॉर्म में रखा जाता था।

3 दिसंबर 1984 की रात 12:05ों पर वर्कर्स को गैस लीकेज महसूस होती है और वह फौरन कंट्रोल रूम को इन्फॉर्म करते हैं। कंट्रोल रूम में मौजूद स्टाफ फौरन इस लीक को ढूंढने के लिए स्टोरेज टैंक्स की तरफ बढ़ता है। यह स्टोरेज टैंक्स जमीन के अंदर कंक्रीट की एक मोटी लेयर के नीचे मौजूद थे और उसमें से कुछ पाइप्स निकलकर फैक्ट्री में जा रहे थे। अगले चंद मिनटों में कंट्रोल रूम सुपरवाइजर को पाइप्स में लीक मिल गया। लेकिन वह काफी छोटा लीक था। इसीलिए सुपरवाइजर ने इसे टी ब्रेक के बाद ठीक करने का कहा और वहां से चले गए। यूनियन कार्बाइड में ऐसे छोटे-मोटे लीक्स बहुत कॉमन थे और वर्कर्स अक्सर गैस की लीकेज की वजह से सांस घुटने की शिकायत करते रहते थे।

थोड़ी देर बाद वर्कर्स ने दोबारा से कंट्रोल रूम में फोन किया क्योंकि अब गैस लीकेज काफी बढ़ चुकी थी। कंट्रोल रूम में मौजूद प्रेशर गेजेस अक्सर गलत रीडिंग्स देते थे। सुपरवाइजर ने प्रेशर गेज पर देखा तो स्टोरेज कंटेनर का प्रेशर एबनॉर्मल दिख रहा था। उन्होंने समझा कि शायद रीडिंग गलत शो हो रही है। लेकिन सिर्फ चंद मिनट्स में ही स्टोरेज टैंक का प्रेशर इतना बढ़ गया कि सुई अपना पूरा डायल क्रॉस करके फुल पर आ गई। सुपरवाइजर दोबारा से स्टोरेज टैंक्स की तरफ गया तो क्या देखता है कि कंक्रीट की मोटी लेयर में वाइबेशंस हो रही हैं और उसमें क्रैक्स पड़ चुके हैं। इन वाइबेशंस का मतलब साफ था कि स्टोरेज कंटेनर में प्रेशर हद से ज्यादा बढ़ चुका है। इस वक्त रात के 12:30 बज रहे थे।

सुपरवाइजर ने फौरन इमरजेंसी नाफिज कर दी और लीक होने वाली गैस जो फैक्ट्री के पाइप्स में दाखिल हो चुकी थी उसको न्यूट्रलाइज करना शुरू कर दिया। फैक्ट्री में इस किस्म के हालात से निपटने के लिए तीन अलग-अलग डिवाइसेस लगी हुई थी। पहली थी गैस स्क्रैपर जिसमें एक खास केमिकल लीक होने वाली एमआईसी को न्यूट्रलाइज करेगा। पर जब सुपरवाइजर ने चेक किया तो यह डिवाइस खराब पड़ी थी। अगर पहला सेफ्टी सिस्टम भी गैस को न्यूट्रलाइज ना कर सके तो इसके लिए फैक्ट्री में दूसरा सेफ्टी सिस्टम भी लगा था और वह था फ्लेयर टावर। इसका काम गैस को एटमॉस्फेयर में निकलने से पहले ही जलाने का होता है। पर मालूम पड़ा कि फ्लेयर टावर का एक इंपॉर्टेंट पाइप कुछ दिन पहले किसी ने निकाल दिया था और फिर वापस नहीं लगाया। लिहाजा फ्लेयर टावर ने भी अपना काम नहीं किया और अब यह जहरीली गैस चिमनी के जरिए एटमॉस्फेयर में दाखिल हो गई। इस पॉइंट पर सुपरवाइजर और वर्कर्स खुद को बेयाो मददगार महसूस कर रहे थे।

ठीक रात के 1:00 बजे फैक्ट्री में एवकुएशन की अनाउंसमेंट की गई और इमरजेंसी सायरन ऑन कर दिए गए। उस वक्त हवा नॉर्थ की तरफ से आ रही थी और उसने चिमनी से निकलने वाली जहरीली इनविज़िबल गैस को भोपाल के साउथ में फैलाना शुरू कर दिया। Google अर्थ पे देखा जाए तो यह एरिया भोपाल का सबसे घनी आबादी वाला इलाका है। एमआईसी क्योंकि एक भारी गैस होती है तभी वह फौरन जमीन के करीब आ गई। और अब आहिस्ता-आहिस्ता शहर में फैलना शुरू हो गई। जैसे ही गैस घरों में घुसी, लोगों को फौरन आंखों में जलन और शदीद खांसी शुरू हो गई। बिल्कुल इस बात से बेखबर कि यह लोग एक जहरीली गैस का सांस भर रहे हैं। लोगों ने घरों से निकलकर पैनिकिक में भागना शुरू कर दिया। भागने की वजह से सांस फूलने लगा और वह लोग और ज्यादा सांस भरने लगे। जबकि असल में वह एमआईसी गैस को इन्हेल कर रहे थे। लोग वोमिट करने लगे, खांसने लगे और एक-एक करके सड़क पर लाशें भरना शुरू हो गई।

उधर फैक्ट्री में सुपरवाइजर ने गैस को न्यूट्रलाइज करने के आखिरी सेफ्टी सिस्टम को इस्तेमाल करने का फैसला किया। उनको होस्ट पाइप से चिमनी से निकलने वाली गैस पर पानी स्प्रे करना था ताकि गैस न्यूट्रलाइज होकर शहर में ना फैल सके। पर जब होस पाइप निकाला गया तो वह इतना लंबा ही नहीं था कि चिमनी तक पहुंच सके। यानी गैस को न्यूट्रलाइज करने का तीसरा और आखिरी सेफ्टी सिस्टम भी किसी काम ना आ सका। कुछ ही मिनटों में गैस शहर में 8 कि.मी. तक फैल गई और भोपाल के हॉस्पिटल्स उन पेशेंट्स से भरना शुरू हो गए जिनको एक जैसे ही सिम्टम्स थे। हॉस्पिटल में हालत यह हो गई कि पेशेंट्स को देखने के लिए स्टाफ और बेड्स कम पड़ गए। ना सिर्फ पेशेंट्स बल्कि डॉक्टर्स खुद भी बुरी तरह खांस रहे थे। शहर में इमरजेंसी नाफिज हो चुकी थी। पुलिस ने डॉक्टर्स को बताया कि यह अमोनिया गैस है। लेकिन जो सिम्टम्स लोगों को हो रहे थे, वह अमोनिया एंड टॉक्सिनेशन से कहीं ज्यादा शदीद थे। डॉक्टर्स के लिए यह एक अननोन मेडिकल कंडीशन थी। यह सब इतना जल्दी हुआ कि अथॉरिटीज को सही से पता ही नहीं था कि यह अमोनिया गैस है फॉस्जीन या फिर एमआईसी। पर असल में मिथाइल आइसोसाइनाइड बॉडी में मौजूद पानी से रिएक्ट कर रही थी और लंग्स के सुराखों को बंद कर रही थी जिससे सांस लेना नामुमकिन हो रहा था।

रात के 3:00 बजे तक डेड बॉडीज इतनी ज्यादा हो चुकी थी कि उन्हें हैंडल करना मुश्किल हो रहा था। भोपाल गैस लीक के दौरान सिर्फ एक ही रात में 3000 लोग मर गए। जबकि लाखों लोग इस जहरीली गैस के सिम्टम्स से बुरी तरह असर-अंदाज हुए। फैक्ट्री वर्कर्स जो खुद एयर टाइट कंट्रोल रूम में बैठे थे इस जहरीली गैस के असरात से महफूज रहे। सुबह जब वह दिन की रोशनी में बाहर निकले तो उन्होंने बिल्कुल बदले हुए भोपाल को देखा। वो सड़कें जहां भीड़ की वजह से गुजरना मुश्किल होता था वहां जानवरों की लाशें बिखरी हुई थी। अभी तक पूरी दुनिया इस खौफनाक हादसे की खबर सुन चुकी थी। ना सिर्फ नेशनल बल्कि इंटरनेशनल मीडिया भी इसको रिपोर्ट कर रहा था। इस गैस से जहां पहली ही रात में 3000 लोग एक्सपायर हुए वहीं आने वाले कुछ दिनों में यह नंबर 20 से 25,000 तक बढ़ गया और गैस से मुतासिर होने वाले लोगों की तादाद 5 लाख तक पहुंच गई। इंसानी इतिहास में यह सबसे बड़ा इंडस्ट्रियल डिजास्टर माना जाता है।

पर यहां पर सबसे बड़ा सवाल यह था कि आखिर फैक्ट्री से इतनी जहरीली गैस लीक हुई तो हुई कैसे? इनिशियल इन्वेस्टिगेशन में मालूम पड़ा कि यूनियन कार्बाइड ने तीन अंडर ग्राउंड स्टोरेज टैंकर्स बना रखे थे। जिनमें से एक का नाम था E610। कंपनी के मैनुअल्स के मुताबिक इसे सिर्फ आधा भरना होता है। लेकिन यह तकरीबन 75% तक खतरनाक MIC से भरा हुआ था। E610 में उस वक्त 30 टन गैस होनी चाहिए थी। लेकिन उसको 42 टन तक भरा गया था। पर इससे भी ज्यादा हैरानी और खतरे की खबर यह थी कि इतनी ही ज्यादा एमआईसी अभी भी दूसरे कंटेनर में मौजूद है। यूनियन कार्बाइड एडवांस में बहुत सारा एमआईसी बनाकर रखती थी। लेकिन असल में वो दिन में सिर्फ कुछ ही टन सेवन प्रोड्यूस करते थे।

अभी भोपाल इस तबाही का मुकाबला कर ही रहा था कि यूनियन कार्बाइड के सीईओ वारेन एंडरसन मामले की संगीनी को देखने के लिए इंडिया पहुंच गए और उन्हें एयरपोर्ट से ही अरेस्ट कर लिया गया। पर बजाय इसके कि उन्हें जेल भेजा जाता पुलिस उन्हें यूनियन कार्बाइड के ही एक गेस्ट हाउस में ले गई। कुछ ही घंटों में वह बेल पर रिहा हो गए। इसी दौरान वह इंडिया छोड़कर भाग गए और फिर दोबारा कभी लौट कर नहीं आए।

वहां फैक्ट्री में अथॉरिटीज इसी कशमकश में थी कि दूसरे कंटेनर्स में बचे हुए एमआईसी के साथ क्या करना है। उनको इसका कतरा कतरा जाया करना था ताकि भोपाल किसी और हादसे का शिकार ना हो सके। पर इसका सिर्फ एक ही हल था कि खराब फैक्ट्री को दोबारा चलाया जाए और इसमें से सेवन प्रोड्यूस किया जाए। पर यह काम काफी खतरनाक था। क्योंकि इस काम में वही फैक्ट्री के खराब पाइप्स और गलत रीडिंग्स देने वाले गेजेस इस्तेमाल होने थे। भोपाल के लोगों को जब मालूम पड़ा कि फैक्ट्री दोबारा स्टार्ट होने वाली है तो लाखों लोग शहर छोड़कर भागने लगे। फैक्ट्री स्टार्ट करने से पहले दीवारों पर गीले कपड़े लगाए गए और एक हेलीकॉप्टर पानी फेंकने के लिए भी घूम रहा था कि इन केस अगर गैस दोबारा लीक हो तो उसे वहीं न्यूट्रलाइज किया जा सके। सारी सेफ्टी करने के बाद फैक्ट्री को दोबारा चलाया गया। खुशकिस्मती से इस बार गैस लीक नहीं हुई और 7 दिनों के अंदर सारा स्टोर किया हुआ एमआईसी खत्म कर दिया गया। यूनियन कार्बाइड अब एमआईसी से पाक हो चुकी थी। लोग वापस लौटने लगे।

लेकिन सबके पास सिर्फ एक ही सवाल था कि आखिर इस हादसे की असल वजह क्या थी? उस रात आखिर ऐसा क्या हुआ था कि पूरा 42 टन एमआईसी कंटेनर से लीक हो गया। जब इन्वेस्टिगेशन टीम ने खाली कंटेनर की अच्छी तरह जांच की तो मालूम पड़ा कि उसमें कोई क्रैक नहीं है। पर उस कंटेनर का सेफ्टी वाल्व खराब पाया गया। कंटेनर में मौजूद जंग आलूद लोहे के पार्टिकल्स पाए गए जो निशानी थी पानी की। मिथाइल आइसोसाइनाइड पानी के साथ कांटेक्ट में आते ही गर्म हो जाता है और उबलने लगता है। यह चीज पहले ही लैब में चेक कर ली गई थी। यानी उस रात कंटेनर में किसी तरह पानी आया था। मालूम पड़ा कि हादसे से पहले शाम को वर्कर्स ने करीबी प्रोसेसिंग यूनिट की धुलाई की थी। यह प्रोसेसिंग यूनिट और कंटेनर एक ही पाइप के साथ कनेक्टेड थे। पर पानी कंटेनर में ना जाए इसके लिए पाइप में एक स्टॉपर लगा था और एक सेफ्टी वाल्व भी। पर ना तो स्टॉपर सही से काम कर रहा था और ना ही सेफ्टी वाल्व।

अगर यह दोनों खराब भी हो तो एक और चीज भी थी जो इस हादसे को होने से रोक सकती थी। यूनियन कार्बाइड एक इंटरनेशनल कंपनी है जिसके प्लांट्स उस वक्त दुनिया भर में मौजूद थे। उनको अच्छी तरह इस केमिकल की खतरनाक नेचर के बारे में मालूम था। इस किस्म के हादसों से बचने के लिए आधे कंटेनर को लिक्विड एमआईसी से भरा जाता था। जबकि बाकी आधे में नाइट्रोजन गैस डाली जाती थी। ताकि अगर कभी वॉल्व या स्टॉपर खराब भी हो जाए तो नाइट्रोजन गैस का प्रेशर पानी को वापस बाहर धकेल सके। पर अफसोसनाक तौर पर उस शाम कंटेनर में नाइट्रोजन गैस भी नहीं थी। इन्वेस्टिगेशन टीम ने रिकॉर्ड्स चेक किए तो मालूम पड़ा कि पिछले 20 दिनों से किसी ने नाइट्रोजन गैस के लो प्रेशर को रिपोर्ट ही नहीं किया था।

यह एक क्लियर कट केस था लापरवाही और कॉस्ट कटिंग का। रिपोर्ट्स में बताया गया कि 1984 में ही यूनियन कार्बाइड ने भोपाल प्लांट को चलाने के लिए खर्चे में करीब $ लाख की कटौती की थी। जिसकी वजह से छोटे-मोटे गेजेस और वॉल्व्स को रिप्लेस ही नहीं किया जा रहा था। बाद में यह भी मालूम पड़ा कि इस हादसे से पहले कंपनी को कई वार्निंग्स भी मिल चुकी थी। 1981 से 1984 तक पांच मर्तबा यहां गैस लीक के केसेस हो चुके थे। जिसमें से एक मर्तबा यूनियन कार्बाइड के एक वर्कर की जान भी जा चुकी थी। E610 कंटेनर में नाइट्रोजन गैस के कम प्रेशर को पिछले 20 दिनों से किसी ने रिपोर्ट नहीं किया क्योंकि उसका गेज ही खराब था। कंटेनर का खराब वाल्व, पाइप का खराब स्टॉपर, गैस लीक होने के बाद गैस स्क्रबर जिसको गैस न्यूट्रलाइज करनी थी, वह भी खराब। फ्लेयर टावर जिसको गैस में आग लगाकर उसे माहौल में फैलने से रोकना था, वह भी खराब और आखिर में हो पाइप भी इतना छोटा कि वह चिमनी तक नहीं पहुंच सका। यह सब कंपनी की लापरवाही और कॉस्ट कटिंग का नतीजा था।

इस हादसे के बाद यूनियन कार्बाइड के खिलाफ केस चलता रहा। लेकिन 5 सालों के बाद आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट हुई और कंपनी ने इंडियन सरकार को 470 मिलियन देकर मामला सेटल कर लिया। 2010 में यूनियन कार्बाइड के आठ मैनेजर्स को लापरवाही के इल्जाम में मामूली जुर्माना लगाकर छोड़ दिया गया। पर यहां रहने वाले लोग 40 साल पहले हुए हादसे के असरात को आज तक भुगत रहे हैं। यह फैक्ट्री आज भी उसी हाल में खड़ी है। यहां जमीन और पानी में आज भी टॉक्सिक कंटमिनेशन पाई जाती है। और जो लोग इस हादसे में जिंदा बच गए, वह आज तक एमआईसी के लॉन्ग टर्म साइड इफेक्ट्स का मुकाबला कर रहे हैं।

उम्मीद है ZM टीवी की यह वीडियो भी आप लोग भरपूर लाइक और शेयर करेंगे। आप लोगों के प्यार भरे कमेंट्स का बेहद शुक्रिया। मिलते हैं अगली शानदार वीडियो में।