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सदियों पुरानी बात है। एक ऐसे जमाने की जब इंसानों के दिलों में ईमान का चिराग रोशन था और मामलात में दियानतंतदारी एक बेहतरीन जेवर समझी जाती थी। उस दौर में शहर सिराज के करीब एक छोटे से कस्बे में एक नौजवान अली मर्द रहता था। अली मर्द की हस्ती उसके नाम की तरह ही हिम्मत और हौसले से लबरेज थी। मगर तकदीर के फैसले उसे बार-बार आजमा रहे थे। वह अपनी वालिद ज़ैनब के साथ एक पुराने टूटे फूटे मकान में बसर करता था। जिसकी छत अक्सर बारिशों में टपकती थी और जिसकी दीवारों पर गर्दिश ए अ्याम के नक्श नुमाया थे।
अली मर्द का शुमार उन अफराद में होता था जिनके लिए दुनियावी दौलत महज एक साया थी। लेकिन उसके ईमान और अपनी मां की खिदमत का जबा किसी बेशकीमती खजाने से कम ना था। उसकी वालिदा ज़ैनब बीवी एक नेक और पाक दामन खातून थी। उनके चेहरे पर तकवा और सब्र का नूर झलक मारता था। वह हमेशा अली मर्द को रिज़्के ए हलाल की बरकत और हराम माल की नूसत से आगाह करती रहती थी। बचपन से लेकर शबाब तक ज़ैनब बीवी की नसीहतें अली मर्द के लिए एक ऐसी ढाल थी जिसने उसे शैतानी वसवसों और दुनियावी लालचों से महफूज़ रखा। वह हमेशा फरमाती थी मेरे लखते जिगर याद रखियो भूखा रहकर मर जाना कुबूल कर लेना। मगर पेट में हराम का एक लुकमा भी ना जाने देना। रिज़्क हलाल में अल्लाह की बरकत होती है जो थोड़े को भी बहुत कर देती है और रिज़्क हराम दौलत के अंबार लगा दे तब भी दिल को इत्मीनान और सुकून मयस्सर नहीं होता। यह दुनिया एक आरजी सराए है। यहां की दौलत फानी है। असली दौलत तो आखिरत में मिलेगी जब अल्लाह ताला तुझसे तेरी कमाई का हिसाब लेगा। तू अपने दिल को हमेशा इस फिक्र से पाक रखना कि कहीं तेरी मेहनत और लगन तुझे किसी नाजायज राह पर ना डाल दे।
अली मर्द यह बातें बहुत संजीदगी और अदब से सुनता और अपनी रूह में उतार लेता था। उसका पेशा बाजार में छोटी-मोटी चीजों का सौदा करना था। जिसमें आमदनी इतनी कम थी कि कभी-कभी दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मयस्र होती थी। रोज की यही किल्लत उसे बेचैन किए रखती थी। एक रोज शाम के वक्त जब सूरज मगरिब की जानिब जा रहा था और आसमान पर सुर्ख शफ छाई हुई थी। अली मर्द मायूसी के आलम में अपनी मां के पास आकर बैठ गया। उसके चेहरे पर गहम और फिक्र की साफ झलक थी। उसने एक लंबी आह भरी और अपनी मां के कदमों में सर झुकाकर धीमी टूटी हुई आवाज में अर्ज किया। अम्मा जान मेरी तबीयत बड़ी उलझन में है। जब से मैं होश संभालने लायक हुआ हूं। तब से मेहनत और मशक्कत की राह पर चल रहा हूं। मैंने कभी किसी के हक पर नजर नहीं डाली। कभी किसी से झूठ नहीं बोला। लेकिन रिज़्क की तंगी है कि मेरा पीछा नहीं छोड़ती। मैं आपको देखता हूं कि आप अपने बुढ़ापे में भी सब्र और शुक्र की चादर ओढ़े बैठी हैं। मगर मुझसे यह मुफलिसी का बोझ उठाया नहीं जाता। मैं चाहता हूं कि मैं आपके लिए आराम और राहत का सामान मुहैया करूं। आपकी खिदमत में कोई कमी ना रहे। मगर मेरे छोटे से कारोबार में बरकत का नाम और निशान नहीं। इस शहर के दीगर सौदागरों को देखता हूं तो उनके पास बेशुमार दौलत है। उनकी ऐशोइशरत से गुजर रही हैं। हालांकि उनमें से अक्सर का तरीकाकार इतना शफाफ और पाक नहीं होता। क्या सिर्फ रिज़्क हलाल की तलाश में रहना ही मेरी किस्मत में लिख दिया गया है।
मां ज़ैनब ने बड़े प्यार से अपने बेटे के सर पर हाथ फेरा। उनका लहजा इतना गर्मजोशी से भरा था कि अली मर्द को अनगाह सुकून मिला। उन्होंने कहा मेरे नूर नजर तेरी यह फिक्र जायज है मगर इस फिक्र को अपने ईमान पर गालिब ना आने देना। तूने जो मिसालें दी हैं दौलतमंद लोगों की क्या तूने उनकी रातों की बेचैनी, उनके दिलों का खौफ और उनके आखिरी अंजाम के बारे में सोचा है? हराम की कमाई जाहिर में तो खुशहाली ला सकती है, मगर बाततिन को खोखला कर देती है। यह दौलत बस एक फरेब है। तू इस बात को अच्छी तरह से समझ ले कि रिज़्क देने वाला अल्लाह है। और वह अपने नेक बंदों को कभी तन्हा नहीं छोड़ता। तेरी आजमाइश सिर्फ तेरे सब्र और तेरे ईमान की मजबूती के लिए है। अगर आज तक रिज़्क तंग है तो इसका मतलब यह नहीं कि अल्लाह नाराज है बल्कि मुमकिन है कि वह तुझे किसी बड़ी नेमत के लिए तैयार कर रहा हो। हलाल की कमाई भले ही थोड़ी हो, लेकिन यह तेरे अंदर बरकत लाती है। तेरी नमाज में सुकून लाती है और तेरी दुनिया और आखिरत दोनों को बेहतर बनाती है। हां, मैं जानती हूं कि तेरी ख्वाहिश है कि तू मुझे अच्छी से अच्छी जिंदगी दे और मैं इस ख्वाहिश की कदर करती हूं। मगर मेरी असली ख्वाहिश यही है कि तू दुनिया की हर दौलत से ऊपर अपने रब की रजा हासिल करे। क्या तू चाहता है कि मैं तुझे एक ऐसी तजारत का मशवरा दूं जिससे रिज़्क भी बढ़े और तेरी अखलाकी बुनियाद भी मजबूत हो।
अली मर्द की आंखें चमक उठी। उसने बेकरारी से अपनी मां की तरफ देखा और कहा जी अम्मा जान मैं आपकी हर बात मानने को तैयार हूं। आप मुझे जिस राह पर भी चलना कहेंगी, मैं आंखें बंद करके उस पर चलूंगा। ज़ैनब बीवी ने एक गहरी सांस ली और मुख्तसर मगर बाम मकसद लहजे में अपनी तजवीज पेश की। उन्होंने फरमाया शहर सिराज यहां से बहुत दूर नहीं है। वहां का बाजार इस पूरे इलाके का सबसे बड़ा मरकज है। जहां दूरदराज के मुल्कों से सौदागराते हैं। तेरा यहां के छोटे-मोटी कारोबार में उलझे रहना अक्लमंदी नहीं। तू अपनी हिम्मत और जवान ताकत को छाया ना कर बल्कि अपने कारोबार को बढ़ा। मेरी यह एक पुरानी अंगूठी है। इसमें कुछ पुराने जवाहरात जड़े हुए हैं जो मेरे मायके वालों की निशानी है। यह कोई बहुत बड़ी दौलत नहीं है। मगर तेरी तिजारत की शुरुआत के लिए काफी है। तू इसे लेकर शहर शिराज जा और वहां बाजार में अपनी कसमत आजमा। मगर एक बात याद रखियो वहां कई तरह के लोग होंगे अच्छे भी और बुरे भी। दौलत का लालच तुझे कई बार अपने काबू में करने की कोशिश करेगा। मगर तू कभी भी अपना जमीर ना बेचना। अपना उसूल यही रखना कि तिजारत में हलाल तरीके से कमाना, सही दाम लगाना और माल का ऐब बता देना तेरी इबादत का हिस्सा है। अगर तूने इस नसीहत पर अमल किया तो मैं यकीन दिलाती हूं कि अल्लाह तुझे ऐसे दरवाजों से रिज़्क अता करेगा जहां से तुझे गुमान भी ना होगा।
अली मर्द ने अंगूठी को अजीम एहतराम के साथ ले लिया। वह अंगूठी महज एक जवाहरात का टुकड़ा नहीं थी बल्कि उसकी मां का भरोसा, उनकी दुआएं और उनके नेक उसूलों की अमानत थी। उस रात अली मर्द को एक नई उम्मीद का दामन थामे हुए नींद आई। अगले रोज सुबह होने से के भी उसने अपनी मां से इजाजत तलब की। वालिदा ने उसे गले लगाया, पेशानी चूमी और फिर अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर उसके लिए दुआ की। जा मेरे बेटे अल्लाह तुझे कामयाबी अता करे। तेरी राहों को रोशन करे। और तुझे हर बुरे शय से महफूज रखे। रिज़्के हलाल की तलाश में यह तेरा पहला कौदम है। याद रखना मेरी आंखें तेरे लौटने का इंतजार करेंगी और मेरी दुआएं हमेशा तेरे साथ होंगी। अली मर्द ने अपनी मां के हाथ चूमे उनका शुक्रिया अदा किया और एक पुराने कपड़े में कुछ जरूरी सामान और अंगूठी लपेट कर शहर सिराज की जानिब अपना सफर शुरू कर दिया। उसका दिल एक तरफ तो मां से जुदाई पर गमगीन था। मगर दूसरी तरफ एक बड़े और हलाल मकसद को ही हासिल करने के जोश से लबरेज था।
सिराज की तरफ का यह सफर कई दिनों का था। रास्ते में उसने कई मुसाफिरों से मुलाकात की। कई छोटी बस्तियों से गुजरा जहां उसे दुनिया की मुख्तलिफ हालतों को देखने का मौका मिला। उसने देखा कि कुछ लोग दौलत होते हुए भी खुश नहीं है। लोग तंगी में भी अल्लाह के शुक्रगुजार हैं। इस मुशाहदे ने उसकी मां की नसीहतों को और भी पक्का कर दिया। आखिरकार कई दिनों की मुसाफत के बाद वह दूर से शहर सिराज की बुलंद और उसके मीनारों को देखने के काबिल हुआ। शहर की रौनक बाजार की गहमागहमी और लोगों की भीड़भाड़ देखकर उसका दिल धड़क उठा। यह एक ऐसी दुनिया थी जो उसकी छोटी बस्ती से बिल्कुल मुख्तलिफ थी। यहां हर तरफ कारोबार आ बहक है। जार तजारत और लेनदेन का शोर था। उसके दिल में एक हल्का सा खौफ पैदा हुआ कि क्या वह इस बड़े और पेचीदा शहर में कामयाब हो पाएगा। लेकिन फौरन ही उसे अपनी मां के अल्फज़ याद आए। हिम्मत और ध्यान ददारी ही तेरी सबसे बड़ी दौलत है। इस अजीम शहर में दाखिल होते ही उसने सबसे पहले एक मुसाफिर खाने में ठिकाना किया। उसका इरादा था कि अगले रोज बाजार में जाकर अपनी अमानत यानी उस अंगूठी को बेचेगा और उस माल से छोटी-मोटी चीजों का कारोबार शुरू करेगा। उस रात मुसाफिर खाने की फर्श पर लेटे हुए अली मर्द बार-बार अपनी जेब में रखी हुई अंगूठी को महसूस कर रहा था। यह महज तिजारत का सरमाया नहीं था। बल्कि यह उसकी मां का एतबार और उसकी नेकी की निशानी थी।
सुबह की पहली किरण के साथ ही अली मर्द अपने सफर के असल मकसद की जानिब रवाना हुआ। वह सिराज के मशहूर और मारूफ बाजार में पहुंचा। जहां सोने चांदी, रेशम, हीरों और हर तरह की कीमती चीजों का लेनदेन होता था। बाजार में एक बड़ा जौहरी बैठा था जिसका नाम अब्बू फारिस था। अबू फारिस शहर का सबसे माहिर और अमीर जौहरी माना जाता था। लेकिन उसकी शोहरत अखलाकी तौर पर कुछ अच्छी नहीं थी। वह अपनी चालाकी और बेईमानी के लिए भी जाना जाता था। अली मर्द ने अल्लाह का नाम लेकर अबू फारिस की दुकान की जानिब कदम बढ़ाया। दिल में थोड़ी सी घबराहट थी मगर मां की नसीहतों का हौसला साथ था। अस्सलाम वालेकुम व रहमतुल्लाह व बरकातहू। अली मर्द ने अदब से सलाम किया। अबू फारिस ने अपनी गद्दी से ऊपर देखकर इस मामूली लिबास वाले नौजवान को एक सरसरी नजर से देखा। उसका लहजा बेरुखी से भरा था। वालेकुम अस्सलाम। क्या काम है? जल्दी कहो। मेरे पास फुर्सत नहीं। अली मर्द ने आहिस्ता से कपड़ा खोला और अंगूठी अबू फारिस के सामने रख दी। हुजूर, यह मेरी वालिदा की अमानत है और मेरी सारी जमा पूंजी है। मैं इसे बेचना चाहता हूं ताकि तजारत शुरू कर सकूं। मैं इसकी सही कीमत जानना चाहता हूं।
अबू फारिस ने अंगूठी उठाई। उसे हर तरफ से देखा। अपनी आंखें सिकोड़ी और फिर बिना किसी इजहार के अंगूठी को मेज पर फेंक दिया। उसका मुंह तिरछा हुआ और उसने जरा मुजाकिर के अंदाज में कहा, "अरे नौजवान, यह कोई कीमती जवाहर नहीं है। यह तो महज पुराने जमाने की घटिया कीमत वाली चीजें हैं। अगर तू इसे बेचना ही चाहता है, तो मैं तुझे इसके 10 दीनार दे सकता हूं। से ज्यादा इसकी कोई कीमत नहीं है। अली मर्द के दिल को बड़ा सदमा पहुंचा। उसे अपनी मां की बातें याद थी कि यह उनके मायके की निशानी है जो जरूर कीमती होगी। वह जानता था कि अब्बू फारिस झूठ बोल रहा है। मगर वह इतना बेचारा था कि किसी और के पास जाने से भी डर रहा था। उसे लगा कि वह इतनी बड़ी रकुम के लिए झूठ बोल रहा है। और अगर उसने किसी और के सामने भी सच कहा तो कहीं वह भी उसे धोखा ना दे दे। उसने फिर भी अल्लाह पर भरोसा रखा और जरा हिम्मत करके कहा हुजूर मैं आपके इल्म और तजुर्ब की कदर करता हूं। मगर क्या आप वाकई मानते हैं कि इसकी कीमत सिर्फ 10 दिनार है? अगर यह इतनी कम कीमत की चीज है तो मैं इसे वापस ले लेता हूं। मैं किसी और के पास जाकर इसकी कीमत मालूम करूंगा। अबू फारिस ने गस्से से उसे घूरा। उसे लगा कि यह मामूली नौजवान उसे चुनौती दे रहा है। उसने गुर्राते हुए कहा, जाओ जहां मर्जी जाकर मालूम कर लो। मगर याद रखना कोई भी जौहरी तुम्हें इससे ज्यादा दाम नहीं देगा। इस बाजार में मुझसे बड़ा माहिर कोई नहीं।
अली मर्द ने अपना सामान समेटा और वहां से रुखसत हो गया। उसका दिल धड़क रहा था। मगर इस बात का इत्मीनान था कि उसने बेईमानी के आगे सर नहीं झुकाया। उसने सोचा कि यह अल्लाह की तरफ से पहली आजमाइश थी और उसकी मां की नसीहत ने उसे बचा लिया। अगर वह 10 दीनार में अपनी इकलौती जमा पूंजी बेच देता तो शायद वह खुद को कभी माफ ना कर पाता। अब वह बाजार में यूं ही घूम रहा था कि उसे एक छोटी सी दुकान नजर आई। जहां एक बूढ़ा आदमी जिसका नाम हाजी मुर्तजा था। बड़े इत्मीनान से अपनी दुकान पर बैठा हुआ था। हाजी मुर्तजा सादगी पसंद और अपने ईमान में पक्के माने जाते थे। हालांकि वह अब्बू फारिस की तरह अमीर नहीं थे। अली मर्द उनके पास गया और अजीम अदब के साथ वही कहानी दोहराई। मगर इस बार उसका लहजा पहले से ज्यादा संजीदा और अंदे से भरा हुआ था। वह जानता था कि यह उसकी आखिरी कोशिश हो सकती है और अगर यह कोशिश भी नाकाम रही तो सिराज में उसकी रिस्कर की तलाश अधूरी रह जाएगी और उसे खाली हाथ अपनी वालिदा के पास वापस लौटना पड़ेगा।
हाजी मुर्तजा जो अपनी दुकान पर बैठकर पुरानी किताबों के वर्क पलट रहे थे। उन्होंने बहुत इत्मीनान से अपना सर उठाया। उनके चेहरे पर लंबे तजुर्बे और अखलाक की शफ्त साफ छलक रही थी। उन्होंने अली मर्द को गौर से देखा। उसके लिबास की सादगी को महसूस किया और उसके चेहरे पर छाई मायूसी को भांप लिया। हाजी मुर्तजा ने एक गर्मजोशी भरी आवाज में जवाब दिया। मेरे नौजवान बेटे अल्लाह के फजलल से इस बाजार में हर तरह के लोग हैं। अपनी तकदीर पर मायूस मत हो। तू बेझिझक मुझे वह अमानत दिखा जिसका जिक्र तू कर रहा है। ताकि मैं अल्लाह की मेहरबानी से अपने कम इल्म के मुताबिक तेरी सही रहनुमाई कर सकूं। अली मर्द के दिल को सुकून मिला। उसने फिर से संजीदगी के साथ उस अंगूठी को बुजुर्ग हाजी मुर्तजा के सामने पेश किया। जब हाजी मुर्तजा ने उस अंगूठी को अपने हाथ में लिया और उसे रोशनी में उलट-पलट कर देखा तो उनकी आंखें हैरानगी से फैल गई। उन्होंने बड़ी बारीकी से उस पर जड़े हुए नगीनों को परखा और अंगूठी की कारीगरी को समझने की कोशिश की। उनके चेहरे पर पहले जो इत्मीनान था वह अब हैरत में बदल चुका था। उन्होंने अंगूठी वापस मेज पर नहीं रखी बल्कि उसे बड़े एहतराम से अपने रुमाल में लपेट लिया। फिर उन्होंने अली मर्द की तरफ मुखातिब होकर एक ऐसी रखोम का जिक्र किया जिसे सुनकर अली मर्द के दिल की धड़कन बढ़ गई और उसके पैरों तले से जमीन निकल गई।
हाजी मुर्तजा ने बड़े ही अफसोस के साथ अपना सर हिलाया और कहा मेरे अजीज बेटे तू खुशकिस्मत है कि तूने अपनी वालिदा की नसीहतों पर अमल किया और उस मक्कार जहरी अबू फारिस की बातों पर ऐतबार नहीं किया जिसने जरूर तुझे धोखा देने की साजिश की होगी। यह अंगूठी मामूली नहीं है। इसमें जो याकूद जड़ा है, वह ईरान के पुराने खानदानों में इस्तेमाल होने वाले खालिस और कीमती जवाहरात में से ही एक है। इसकी बनावट, इसका नक्श और इस पर की गई नक्काशी इशारा करती है कि यह अंगूठी सदियों पुरानी है और किसी बॉडी डीडी दे अमीर या बादशाह के खजाने का हिस्सा रही होगी। इसकी असली कीमत मेरे अंदाजे के मुताबिक कमोबेश 500 दीार होगी। यह एक ऐसी रकम है जिसे सुनकर आम सौदागर के होश फाख्ता हो जाते हैं। और मैं मैं इस पूरे बाजार में अकेला ऐसा नहीं हूं जो इस कीमत को जानता हो। मगर अबू फारिस ने 10 दीनार बोलकर तेरे ईमान और तेरी मजबूरी का मजाक उड़ाना चाहा।
अली मर्द को लगा जैसे आसमान से कोई हकीकी नेमत उस पर नाजिल हुई हो। 500 दीनार। यह वह रकम थी जिसका तसवुर भी उसने कभी अपनी जिंदगी में नहीं किया था। उसका पहला ख्याल अपनी वालिदा ज़ैनब बीवी की तरफ गया और उनके चेहरे की खुर्शी उसके ज़हन में उतर गई। उसकी आंखें नम हो गई। उसने अपने हाथ जोड़कर अल्लाह का शुक्र अदा किया जिसने उसे बेईमानी और धोखे से महफूज रखा। फिर उसने हाजी मुर्तजा की जानिब मुखातिब होते हुए कहा, हाजी साहब, मैं आपका बड़ा शुक्रगुजार हूं। अल्लाह आपको इसकी बेहतरीन जजा अता करे। आपने मुझ पर जो मेहरबानी की है, मैं उसे अपनी जिंदगी भर नहीं भूल पाऊंगा। यह मेरे लिए सिर्फ एक कीमत नहीं है बल्कि यह मेरी वालिदा की नसीहतों की सदाकत का सबूत है। मगर एक बात मुझे परेशान कर रही है। अगर इसकी कीमत वाकई इतनी ज्यादा है तो आप मुझे बताइए कि मैं इसे बेचूं कहां? क्योंकि मैं तो बस एक छोटा सा ताज़िर बनना चाहता हूं। और इतनी बड़ी ही रखवाम की देखरेख करना भी मेरे लिए एक मुश्किल इम्तिहान होगा।
हाजी मुर्तजा ने बड़े एहतराम से अंगूठी को अली मर्द की तरफ वापस बढ़ाया और एक गहरी बात कही। बेटे मैं भी एक बुजुर्ग आदमी हूं और मेरा भी एक जमीर है। अगर मैं इस अंगूठी को अपनी दुकान पर बेचता तो मुझे भी हलाल रिज़्क ही हासिल होता। लेकिन अगर मैं इसे खरीदूं तो शायद तेरी जरूरत पूरी ना कर सकूं क्योंकि मेरे पास इतनी बड़ी रकम फिलहाल मौजूद नहीं है। मगर मैं तुझे एक मशवरा देता हूं जिससे तेरी हलाल कमाई का दरवाजा खुल जाएगा। तू इस अंगूठी को बिल्कुल ना बेच बल्कि इसे अपने पास अमानत के तौर पर रख। इस शहर में कारवाओं का सरदार इब्राहिम बहुत मशहूर हैं। वह नेक सीरत, खुदा परस्त और बड़े ईमानदार ताजिर माने जाते हैं। वह सिर्फ बड़े सौदागरों के साथ ही लेनदेन करते हैं। मगर वह रिज़्क हलाल की तलाश करने वाले नौजवानों की बड़ी कदर करते हैं। तू अपनी यह कीमती अमानत उनके सामने पेश करना और उनसे कहना कि वह तुझे अपने कारवाह में एक छोटे ताजिर के तौर पर शामिल करें। तू उनसे अपनी यह ख्वाहिश जाहिर करना कि तू यह अंगूठी उनके पास बतौरे अमानत रखना चाहता है ताकि इसका मुआवजा तुझे धीरे-धीरे तिजारत के नफे से हासिल हो। इस तरह तेरी तिजारत भी शुरू हो जाएगी और इतनी बड़ी दौलत को एक साथ संभालने का बोझ भी तेरे सर पर नहीं पड़ेगा। अगर तू अपनी दीदारी और मेहनत से मीरे कारवा इब्राहिम का दिल जीत सका तो वह तुझे यकीनन बड़ी कामयाबी की तरफ ले जाएंगे।
अली मर्द इस अक्लमंदी भरी तजवीज को सुनकर बहुत मुतासिर हुआ। उसने फौरन अपनी यह खुशी जाहिर की और दिल से हाजी मुर्तजा का शुक्रिया अदा किया। हाजी साहब आपने मुझ पर जो एतबार किया है, मैं उसे हमेशा याद रखूंगा। आपकी नेक नियती ने मेरे दिल में एक नई रोशनी भर दी है। मैं अब बिना देर किए मीरे कारवा इब्राहिम के पास जाता हूं। हाजी मुर्तजा ने दुआओं के साथ उसे रुखसत किया और अली मर्द ने अपने मुकाम की तरफ तेजी से कदम बढ़ाया। जहां से मीरे कारवा इब्राहिम के ठहरने की जगह ज्यादा दूर नहीं था।
सिराज के इस हिस्से में जहां बड़े और नामवर ताजीरों के मकानात थे, वहां मीर कारवा का आलीशान मकान एक छोटे से कले जैसा नजर आ रहा था। अली मर्द ने दिल ही दिल में अपनी मां को याद किया और इस मकसद से अंदर दाखिल हुआ कि वह अपनी मेहनत और दियादारी से यहां अपनी जगह बनाएगा। उसने अपनी वालिदा के दिए हुए नेक उसूलों को अपनी ढाल बना लिया था। मीरे कारवा इब्राहिम अपनी बैठक में बैठे हुए थे और कुछ दीगर अफराद के साथ तिजारत के मामलात पर मशवरा कर रहे थे। वह अपनी उम्र के आखिरी पड़ाव पर थे। मगर उनके जिस्म में जबरदस्त कुवत और दिमाग में बेमिसाल अकलत थी। उनकी दाढ़ी सफेद थी और उनका लहजा इल्म और तजुर्बे से भरपूर था। अली मर्द ने अदब के साथ वहां मौजूद लोगों से मुलाकात की इजाजत तलब की। उसे थोड़ी देर बाद मिल गई। अली मर्द ने अंदर जाकर मीरे कारवा को सलाम किया और बड़ी इज्जत के साथ उनसे कहा हुजूर मैं एक गरीब और मामूली ताजिर का बेटा हूं दराज के एक कस्बे से आया हूं। मेरी ख्वाहिश है कि मैं आपकी सरपरस्ती में तिजारत के हुनर सीखूं और रिचकर हलाल कमाकर अपनी वालिदा की खिदमत कर सकूं। मेरे पास एक बहुत ही कीमती अमानत है जिसे मैं अपनी वालिदा की नसीहतों के साथ लेकर आया हूं। मैं चाहता हूं कि आप इसे बतौरे सरमाया अपने पास रखें और मुझे अपने कारवाओं में एक छोटी सी जगह अता फरमाएं।
मीरे कारवाओं इब्राहिम ने एक लंबी निगाह उस पर डाली। वह अक्सर लोगों के चेहरे से उनके किरदार का अंदाजा लगा लेते थे। उन्हें अली मर्द की आंखों में एक खालिस दियादारी और मकसद की सच्चाई नजर आई। उन्होंने पूछा नौजवान अगर तुम्हारी वह अमानत वाकई इतनी कीमती है तो तुम उसे फौरन क्यों नहीं बेच देते और अपना कारोबार क्यों नहीं शुरू कर लेते इस तरह तुम्हें किसी की सरपरस्ती की जरूरत नहीं रहेगी अली मर्द ने अदब से अंगूठी पेश की और अबू फारिस के धोखे का किस्सा और फिर हाजी मुर्तजा की दरियादिली का मुआला पूरी सच्चाई के साथ मीरे कारवा के सामने पेश कर दिया। उसने कहा कि उसकी मां की नसीहतों के मुताबिक वह इतनी रखूम को एक साथ संभालने से डर रहा है और वह चाहता है कि उसकी कमाई धीरे-धीरे उसकी मेहनत से हासिल हो ना कि सिर्फ इस अमानत के बदले में। उसने कहा हुजूर, यह अंगूठी मेरी वालिदा का ऐतबार है। मैं चाहता हूं कि इसका मुआवजा मेरी मेहनत और हलाल तरीके से हो।
ना कि महज एक कीमती पत्थर के बदले में। मैं आपके तजुर्ब से फायदा उठाना चाहता हूं। मीरे कारवा इब्राहिम अली मर्द की यह खालिस और बेबाका बात सुनकर बहुत खुश हुए। उन्हें लगा कि इस नौजवान में वह नेक नियती है जो आजकल के ताजिरों में कम ही पाई जाती है।
उन्होंने अंगूठी को गौर से देखा और हाजी मुर्तजा की तरह ही उसकी कीमत का तकमीना लगाया। उन्होंने अंगूठी को बड़े एहतराम से अपने संदूक में रख लिया और अली मर्द से मुखातिब होकर एक ऐसी शर्त रखी जिसने अली मर्द की जिंदगी का रुख बदल देना था।
"शाबाश। नौजवान मैं तुम्हारी दीनतदारी और तुम्हारी वालिदा की दी हुई नसीहतों की कद्र करता हूं। मैं तुम्हें अपने कारवाओं में जरूर शामिल करूंगा। मगर तुम्हारी पहली तिजारत एक इम्तिहान होगी। मैं तुम्हें चीन और समरकंद जाने वाले एक कारवाओं का एक छोटा सा हिस्सा देता हूं। तुम इसमें अपने कारोबार का सरमाया लगाओ। यह सफर कई महीनों का होगा और तुम्हें कई मुश्किल रास्तों से गुजरना होगा। तुम्हारी कमाई उस वक्त तक इस अमानत के मुआवजे में नहीं गिनी जाएगी जब तक तुम एक खास मुकाम पर पहुंचकर उस मुल्क के हाकिम को एक खास किस्म का निशान ना दे दो और उनसे एक पैगाम वापस लेकर ना आओ। यह निशान और पैगाम मेरी एक खफिया अमानत है जो सिर्फ सबसे ईमानदार ताजिर को ही सौंपी जा सकती है। अगर तुम यह जिम्मेदारी पूरी कर सके और इस पूरे सफर में हलाल तरीके से तजारत करते रहे तो मैं तुम्हें अपनी सरपरस्ती में रखूंगा और तुम्हारी अंगूठी की कीमत हर मुमकिन तरीके से अदा करूंगा। तुम्हारी पहली जिम्मेदारी यह है कि तुम अपनी तिजारत के लिए अपने माल का इंतखाब करो और कल सुबह ही तुम कारवाह के साथ सफर के लिए तैयार हो जाओ।"
अली मर्द के लिए यह एक बहुत बड़ा मौका था जो उसने फौरन कबूल कर लिया। उसने अपनी हिम्मत और अपनी वालिदा की दुआओं पर भरोसा किया। उसने मीरे कारवाओं का शुक्रिया अदा किया और उस काम के लिए तैयार होने चला गया जो उसकी जिंदगी का सबसे मुश्किल इम्तिहान साबित होने वाला था।
उसने शाम होते ही बाजार में जाकर अपनी तिजारत के लिए जरूरी चीजों का इंतखाब किया। छोटे-छोटे नगीने, खुश्क मेवे और कुछ इत्र खरीदे। जो उसे लगा कि सफर के दौरान फायदेमंद होंगे। रात उसने मुसाफिर खाने में गुजारी मगर उसे नींद नहीं आई। वह बस अपनी मां के चेहरे को याद कर रहा था। जिनके दिए हुए हलाल रिज़्क के उसूलों ने आज उसे इस मुकाम तक पहुंचाया था।
अगले दिन सुबह जब सूरज की किरणें सिराज की मीनारों को रोशन कर रही थी। अली मर्द ने खुद को मीरे कारवा के दस्तरखान पर पाया। वहां कारवाओं के तमाम बड़े और नामीगिरामी ताजिर मौजूद थे। मीरे कारवा इब्राहिम ने अपने दस्तरखान पर अली मर्द को एक मुअजा जगह दी और खाने के बाद उन्होंने एक छोटा सा मखमली थैला अली मर्द के हाथ में थमाया और कहा, "इस थैले में वह निशान है जिसे तुम्हें अपने सफर के आखिरी मुकाम पर हाकिम को सौंपना है। इसे अपनी जान से ज्यादा महफूज़ रखना। याद रखना यह अमानत महज एक निशान नहीं बल्कि तुम्हारे ईमान का आईना है।"
अली मर्द ने बड़े अदब से उस थैले को लिया और अपनी कमर में मजबूती से बांध लिया। और फिर तमाम ताजिरों और खादिमों के साथ मीरे कारवा की दुआओं के साए में अली मर्द अपने कारवाओं के साथ समरकंद और चीन की अजीम मुसाफत पर रवाना हुआ। यह सफर उसे बड़े-बड़े पहाड़ों, डरावने रेगिस्तानों और लालच से भरे मुसाफिरों से गुजारने वाला था।
सबसे पहले कारवा ने सिराज की सरहद पार की और उस खतरनाक रेगिस्तानी इलाके की जानिब बढ़ चला जहां हर तरफ खामोशी और खौफ का राज था। रेगिस्तान की रेतीली जमीन जिस पर सूरज की तल्ख किरणें आग बरसा रही थी। मंजिल की तवील मुसाफत का पहला और सबसे कड़ा इम्तिहान थी। कारवाह में तकरीबन 100 ऊंट थे जो तरह-तरह के कीमती माल से लदे हुए थे। और उनके साथ 40 से ज्यादा मुहाफिज और ताजिर शामिल थे। अली मर्द इस बड़े कारवा में सबसे कम उम्र और सबसे कम तजुर्बेकार नौजवान था। मगर उसकी निगाहें दूर उफक पर टिकी थी और उसके दिल में अपनी मां की नसीहतों का नूर रोशन था। उसे याद था कि यह सफर सिर्फ तिजारत का नहीं बल्कि उसके जमीर का भी इम्तिहान है।
रेगिस्तान के सफर की मुश्किलात जल्द ही जाहिर होने लगी। कई रोज तक उन्हें पानी की किल्लत का सामना करना पड़ा। खारदार झाड़ियां और खामोश रेत के टीले ही उनके हमसफर थे। इस दौरान अली मर्द ने देखा कि बाकी ताजिर जो दौलत और तजुर्बे में उससे कहीं ज्यादा थे, छोटी-छोटी बातों पर कैसे झगत धते थे। कुछ ताजिर अपने सामान की हिफाजत में इस कदर मशरूफ थे कि उन्होंने बाकी मुसाफिरों से हमदर्दी दिखाना भी छोड़ दिया था।
एक रोज एक बूढ़ा खादिम जो तल्ख मौसम की वजह से बहुत कमजोर हो गया था। प्यास की शिद्दत से गिर पड़ा। कारवाओं के बड़े ताजिरों ने उसकी तरफ देखना भी गवारा नहीं किया क्योंकि वह उनका कोई करीबी ताजिर नहीं था। बल्कि महज एक मुलाजिम था। अली मर्द का दिल इस बेहिस्सी पर सख्त रंजीदा हुआ। उसने फौरन अपनी मशक खोली जिसमें उसने अपनी जरूरत से ज्यादा पानी जमा करके रखा हुआ था और उस कमजोर खादिम के करीब जाकर अपने हाथों से उसे पानी पिलाया।
कारवा के सरदार शेख कारवा अकरम जो एक जबरदस्त और सख्त मिजाज शख्सियत थे ने दूर से यह वाकया देखा। वह जानते थे कि लंबे सफर में हर मुसाफिर को अपनी हिफाजत और अपने माल की फिक्र होनी चाहिए। उन्होंने अली मर्द को बुलाया और जरा सख्त लहजे में कहा, "ऐ नौजवान तूने अपनी मशक का कीमती पानी एक मामूली खादिम पर झाया कर दिया। क्या तुझे अपनी तजारत और अपनी जान की कोई फिक्र नहीं है? अगर खुदा ना खास्ता अगले पड़ाव तक हमें पानी ना मिला तो तेरी इस बेवकूफी की सजा तुझे खुद भुगतनी पड़ेगी। तजारत में रहमद दिली की इतनी गुंजाइश नहीं होती।"
अली मर्द ने अदब से सर झुकाया और कहा, "शेख कारवा मैं जानता हूं कि सफर खतरनाक है। मगर मेरी वालिदा ने मुझे यही नसीहत दी थी कि माल और जान से ज्यादा अजीम चीज जमीर की पाकीजगी होती है। अगर कोई शख्स हमारे कारवाह में प्यास से मर जाता तो हम सब अल्लाह के सामने जवाबदेह होते। मैंने सिर्फ अल्लाह की रजा के लिए यह काम किया है और मुझे यकीन है कि अल्लाह हमें जाया नहीं होने देगा।"
शेख कारवा अकरम ने उसके जवाब पर कोई और बहस नहीं की। मगर उनके दिल में इस नौजवान के लिए एक मुख्तसर सा एहतराम पैदा हो गया था। उन्होंने अपनी जिंदगी में ऐसे ताजिर कम ही देखे थे जो नफा और खुदग्रजी से ज्यादा अखलाक और इंसानियत को तरजीह देते हो।
रेगिस्तान का सफर खत्म हुआ और कारवा एक ऐसे घने इलाके में दाखिल हुआ जहां दरख्तों और हरियाली की बहुतायत थी। यह इलाका मर्फ के करीब था जो तजारत का एक छोटा मगर अहम मरकज माना जाता था। यहां कारवाओं को एक हफ्ते के लिए कयाम करना था ताकि अगले सफर की तैयारी की जा सके और कुछ छोटा-मोटा लेनदेन हो सके। अली मर्द ने इसी मौके का फायदा उठाया और अपनी छोटी सी तजारत शुरू की। उसके पास जो छोटे-छोटे नगीने और इत्र थे, उसने उन्हें बेचना शुरू किया। वह हर ग्राहक से बेद ही दिया से पेश आता था। वह अपने माल की कीमत ना ज्यादा बताता था और ना कम। अगर किसी चीज में कोई मामूली सा ऐब होता तो वह उसे पहले ही बता देता था। इस नेक तरीके काब की वजह से उसने जल्द ही बाजार के दीगर ताजिरों के बीच एक नेक नाम कमा लिया।
वहां एक ताज़िर जाहिद था जो अपने मकर और धोखाधड़ी के लिए मशहूर था। उसने देखा कि अली मर्द का हलाल तरीकाकार उसके अपने मामलात पर असर डाल रहा है। जाहिद ने एक रोज अली मर्द को तन्हा पाकर उससे मुलाकात की। जाहिद ने बर्थडे दे ही खुशामदी लहजे में कहा, "नौजवान तुम बड़े खुशकिस्मत हो। मगर तुम तजारत के उसूलों से नावाकिफ लगते हो। बाजार में हमेशा अपनी चीजों का दाम दो गुना बताओ और ग्राहक को इस बात का एहसास कराओ कि वह एक खास सौदा हासिल कर रहा है। दयानतदारी अच्छी चीज है मगर यह तुम्हें दौलतमंद नहीं बना सकती। मैं तुम्हें एक आसान और फरी नफे का रास्ता बताता हूं।"
जाहिद ने अली मर्द को एक ऐसा नुस्खा बताया जिससे वह अपने इत्रों में खालिस चीजों के बजाय सस्ती चीजों की मिलावट करके फरी तौर पर ज्यादा मुनाफा कमा सकता था। उसने कहा, "देखो अली मर्द कौन जानने वाला है? जब तक तुम अगले मुकाम पर पहुंचोगे, तुम्हारा नफा हजारों दीनार हो चुका होगा। यह मौका बार-बार नहीं आता।"
यह अली मर्द के लिए एक सख्त इम्तिहान था। दौलत और हलाल तरीके के बीच की जंग। उसे फौरन अपनी वालिदा की आवाज याद आई। "भूखा रहकर मर जाना कुबूल कर लेना। मगर पेट में हराम का एक लुकमा भी ना जाने देना।" उसने जाहिद को बर्थडे दे अदब से मगर मजबूती से जवाब दिया। "जनाब जाहिद मैं आपका मशवरा और आपकी फिक्र की कुदरत करता हूं। मगर मैं उस दौलत पर लानत भेजता हूं जो किसी की हक तल्फी से हासिल हो। मेरी मां की नसीहत मेरे लिए मेरी दौलत से कहीं ज्यादा कीमती है। मैंने तिजारत का सरमाया हलाल तरीके से हासिल किया है और मैं उसे उसी तरीके से आगे बढ़ाना चाहता हूं। अगर मेरी कमाई कम भी हो तब भी मेरे दिल में इत्मीनान और मेरे माल में बरकत होगी।"
जाहिद जो अली मर्द को बहकाने आया था उसका जवाब सुनकर शर्मिंदा हुआ और गुस्से से लाल हो गया। उसने अली मर्द को धमकी दी कि इस बाजार में उसकी मुश्किलें बढ़ जाएंगी। मगर अली मर्द ने इस धमकी पर कोई ध्यान नहीं दिया और अपनी तिजारत में मशरूफ रहा।
इस वाक्यात से अली मर्द की नेक नियती की खबर शेख ए कारवा अकरम तक भी पहुंची। शेख कारवाओं ने यह भी देखा कि अली मर्द ने जो छोटा सा माल खरीदा था, वह कम कीमत का होने के बावजूद अपनी दियादारी की वजह से बाकी ताजीरों के बड़े और कीमती माल से ज्यादा तेजी से बिक रहा था। अकरम को यह एहसास हुआ कि इस नौजवान में कुछ खास है।
एक रोज मर्फ से निकलने से पहले शेख कारवा अकरम ने अली मर्द को अपने खास खेमे में तलब किया। अकरम ने उसे इज्जत से बिठाया और कहा, "नौजवान मैं तुम्हारी तिजारत को गौर से देख रहा हूं। तुम इस काबिल हो कि तुम्हें मीरे कारवा इब्राहिम ने एक खास अमानत के साथ भेजा है। तुम इस खतरनाक सफर में अब तक अपनी इंसानियत और दयानतेदारी पर कायम रहे हो जो एक ताजिर के लिए बड़ी मुश्किल चीज है। मैं तुम्हें एक जिम्मेदारी देना चाहता हूं। अगले कुछ दिनों में हम एक ऐसे पहा रास्ते से गुजरने वाले हैं जहां लूटमार करने वाले गिरोहों का खतरा बहुत ज्यादा होता है। मेरा एक माल है जिसमें कुछ बेहद कीमती फारसी कालीन है जिन्हें चीन के हाकिम को तोहफे के तौर पर पेश करना है। मैं चाहता हूं कि तुम अपनी ईमानदारी की वजह से इस माल की हिफाजत की जिम्मेदारी लो। मैं इस माल को कारवाओं के सबसे आखिरी ऊंट पर लदवा दूंगा। क्योंकि लुटेरे हमेशा शुरुआती ऊंटों पर हमला करते हैं।"
यह एक बदी और खतरनाक जिम्मेदारी थी। अगर लुटेरों ने हमला किया तो अली मर्द को अपनी जान पर खेलकर इन कीमती कालीनों की हिफाजत करनी थी। अली मर्द ने बिना सोचे समझे इस जिम्मेदारी को कबूल कर लिया। उसने कहा, "शेख कारवा यह मेरे लिए एफकेकी है। हर आशरा की बात है कि आपने मुझे इस काबिल समझा। मैं अपनी जान की परवाह किए बिना इस अमानत की हिफाजत करूंगा।"
अगले दिन कारवाओं ने मर् को पीछे छोड़ा और उन ऊंचे ऊंचे पहाड़ों के बीच मौजूद खतरनाक दर्रे की जानिब सफर शुरू किया। जहां से आगे का रास्ता समरकंद की तरफ जाता था। दर्रे का रास्ता इतना तंग और पीहड़ था कि हर मोड़ पर खतरे का एहसास होता था। अली मर्द को उस खास ऊंट के करीब रखा गया था जिस पर कीमती कालीन लदे थे और वह अपनी कमर में बंधे हुए मीरे कारवा के निशान की भी हिफाजत कर रहा था।
सफर के तीसरे रोज जब सूरज पूरी तरह से पहाड़ की चोटी पर नहीं निकला था। अचानक पहाड़ियों की आड़ से घोड़ों की टापों की आवाजें सुनाई दी और हवा में तीर चलने की सनसनाहट भर गई। लुटेरों ने हमला कर दिया था। वह एक बड़ा गिरोह था जो पूरी तरह से हथियारों से लैस था। कारवाओं के मुहाफिजों और ताजीरों के बीच अफरातफरी मच गई। शेख कारवा अकरम ने बहादुरी से मुकाबला किया। मगर लुटेरे तादाद में ज्यादा थे और उन्होंने जल्द ही कारवाओं के अगले हिस्से को काबू कर लिया। लुटेरों का सरदार जिसका चेहरा नकाब से ढका था, उसने चीख कर हुक्म दिया कि सबसे कीमती माल को जल्दी से लूट लिया जाए।
अली मर्द ने देखा कि लुटेरे कारवाओं के अगले हिस्से से सामान लूट रहे थे और धीरे-धीरे पीछे की जानिब बढ़ रहे थे। उसके पास मौका था कि वह ऊंट को छोड़कर भाग जाए और अपनी जान बचा ले। मगर उसे अपनी मां की बातें याद आई और मीरे कारवाओं का ऐतबार याद आया। "यह अमानत तुम्हारे ईमान का आईना है।" उसने फौरन एक फैसला किया। उसने कीमती कालीन के बंडल से एक बदधा कालीन उतारा। उसे लपेटा और तेजी से ऊंट के पास मौजूद एक गहरी और तंग चट्टानी दरार की जानिब बढ़ा। लुटेरे अभी कारवाह के बीच के हिस्से में लूटपाट करने में मशरूफ थे और उन्होंने अली मर्द की इस हरकत पर कोई तवज्जो नहीं दी थी। अली मर्द ने जल्दी से वह कालीन दरार के अंदर मजबूती से फंसा दिया। इस तरह की बाहर से देखने पर वह एक मामूली चट्टान का हिस्सा लगे। उसने बाकी कालीनों को ऊंट से हटा दिया और अपने छोटे से तजारत के माल को भी दूर पत्थरों के पीछे छुपा दिया। उसके ज़हन में एक ही ख्याल था। इस अमानत को बचाना जिसका जिम्मा शेख कारवामा ने उसे सौंपा था। वह जानता था कि अगर लुटेरों को यह ऊंट खाली मिला तो वह ज्यादा गुस्सा करेंगे। मगर उसका ईमान उसे इस बात की इजाजत नहीं देता था कि वह अपनी जान बचाने की खातिर अमानत में खयानत करें।
जब लुटेरे आखिरी ऊंट तक पहुंचे तो उन्होंने देखा कि वह ऊंट खाली है और उसके करीब सिर्फ अली मर्द खड़ा है जो पूरी तरह से निहत्ता था। लुटेरों के सरदार जिसका नाम घास था ने दहाड़ कर पूछा, "ओए नौजवान इस ऊंट पर कीमती कालीन थे। वह कहां गए? सच-सच बता वरना तेरी जान बख्शी नहीं होगी।"
अली मर्द का दिल धड़क रहा था। मगर उसने अपनी मां की हिम्मत और अल्लाह पर एतबार को याद किया। उसने ना डरते हुए जवाब दिया, "ऐ सरदार, इस ऊंट पर कोई कीमती माल नहीं था। जो भी कीमती सामान था, वह कारवाओं के आगे वाले ऊंटों पर लदा हुआ था जो शायद अब तक तुम्हारे साथियों के हाथों में होगा। यह ऊंट महज कुछ मामूली सामान ढो रहा था। जिसे मैंने तुम्हारी नजर से बचाकर कहीं और छुपा दिया है क्योंकि वहां मेरा रिज़्क है।"
कासिब को अली मर्द की बात पर यकीन नहीं आया। उसने अपने आदमियों को हुक्म दिया कि अली मर्द की तलाशी लें और आसपास के इलाके को देखें। तलाशी के दौरान लुटेरे उसके पास से कुछ भी कीमती बरामद ना कर सके। सिवाय उस मखमली थैले के जिसमें मीरे कारवा इब्राहिम का दिया हुआ खुफिया निशान था। घास ने थैला झटक कर अली मर्द की कमर से छीन लिया। गहासिब ने उस छोटे से थैले को खोला। अंदर एक खास तरह के चमकदार पत्थर पर बना हुआ एक पेचीदा निशान था। यह कोई आम पत्थर नहीं था बल्कि यह एक ऐसी अलामत थी जिसका ताल्लुक बरसों पुराने खानदानी राज से था। घासिब उस निशान को देखकर अचानक डर गया। उसका चेहरा नकाब के बावजूद पीला पड़ गया। उसने जल्दी से निशान को थैले में वापस रखा और अपने आदमियों को हुक्म दिया कि किसी भी माल को छूने से पहले फौरन इस जगह से रुखसत हो जाओ।
लुटेरे जो लूट के माल के लिए बेकरार थे अपने सरदार के इस अचानक फैसले से हैरान रह गए। मगर उन्होंने बिना सवाल किए उस दर्रे से फौरन कच कर दिया। शेख कारवा अकरम जो अली मर्द के करीब ही लुटेरों से लद्ध रहे थे। इस वाकया को देखकर हैरान थे। उन्होंने देखा कि लुटेरों का सरदार अली मर्द के पास आया। कुछ देर उससे बात की और फिर एक चीज देखकर घबरा गया और सारे माल को छोड़कर भाग गया। अकरम को इस बात की तसल्ली हुई कि वह कीमती कालीन बच गए क्योंकि लुटेरे उनके पास तक पहुंच ही नहीं पाए थे।
जब लुटेरे जा चुके तो कारवाओं के लोग जख्मियों को संभालने लगे। शेख कारवा अकरम फौरन अली मर्द के पास आए। उन्होंने अली मर्द को गले लगा लिया और कहा, "ए बहादुर नौजवान तूने आज हमारे कारवाओं को एक बद्दे नुकसान से बचा लिया। अल्लाह तुझे लंबी उम्र दे। वह कीमती कालीन कहां है और वह सरदार किस चीज को देखकर अचानक भाग गया?"
अली मर्द ने अदब के साथ जवाब दिया, "शेख कारवा अल्लाह ने हमारी मदद की। कालीन महफूज है और वह चीज जो लुटेरों के सरदार ने देखी, वह मीर कारवा इब्राहिम का दिया हुआ अमानत निशान था जो अब मेरे पास नहीं है। लुटेरा उसे छीन कर ले गया है।" अली मर्द ने फौरन उस जगह की जानिब इशारा किया जहां उसने कालीन छुपाए थे। जब सारे कालीन सही सलामत बरामद हुए तो शेख कारवा अकरम की खुशी की इंतहा ना रही। मगर अकरम को उस निशान के छीने जाने का बड़ा अफसोस हुआ। क्योंकि वह जानते थे कि वह महज कोई अमानत नहीं बल्कि मीरे कारवाओं का एक राजा था।
अली मर्द ने इल्तजा की, "हुजूर मैंने अपनी पूरी कोशिश की कि मैं उस निशान को महफूज़ रखूं। मगर मैं लुटेरों से लट डटा नहीं सका। मैंने अपनी जान और उस निशान में से निशान को बचाने की कोशिश की। मगर वह मेरे हाथ से निकल गया।"
शेख कारवाओं अकरम ने उसे तसल्ली दी, "नौजवान तुमने अपनी जान की परवाह किए बिना कीमती माल बचाया। यह तुम्हारी अमानतदारी का सबसे बड़ा सबूत है। निशान का नुकसान बड़ी डेढ़ा है। मगर मैं जानता हूं कि तुम्हारी नियत पाक थी।"
कारवा ने जल्द ही अपनी मुसाफत फिर से शुरू की और कई हफ्तों की मशक्कत के बाद वह आखिरकार अपनी मंजिल मरकंद और फिर चीन की सरहद पर स्थित एक अजीम शहर में पहुंचे। यह वही मुकाम था जहां उन्हें हाकिम को निशान सौंपना था। शहर में पहुंचकर शेख कारवा ने हाकिम के दरबार में पेश होने का इंतजाम किया। जब शेख कारवा अकरम ने हाकिम को अपने आने का मकसद बताया तो हाकिम ने फौरन मीरे कारवा इब्राहिम के अमानती निशान के बारे में पूछा। शेख कारवा अकरम ने बद अफसोस के साथ दर्रे में हुई लूटपाट और निशान के छीने जाने का वाकया सुनाया। मगर उन्होंने अली मर्द की बहादुरी और कालीन बचाने के किस्से का भी जिक्र किया।
हाकिम जो बड़े ही अकुल और संजीदगी के मालिक थे। उन्होंने बड़े घोड़ से यह सारा किस्सा सुना। फिर उन्होंने शेख कारवा अकरम से सवाल किया, "क्या वह नौजवान जिसके पास वह निशान था यहां मौजूद है?" अली मर्द को फौरन हाकिम के सामने पेश किया गया। अली मर्द ने अदब के साथ सलाम किया और अपने ईमान पर कायम रहते हुए सारी हकीकत बयान कर दी कि कैसे वह निशान उसके हाथ पुष्ट हाथ से निकल गया। उसने कहा, "हुजूर मैं जानता हूं कि मैंने अपनी अमानत खो दी है और मैं इसकी सजा के लिए तैयार हूं।"
हाकिम ने अली मर्द की आंखों में देखा और अचानक जोर से हंसने लगे। यह हंसी हैरान करने वाली थी। हाकिम ने अपने करीब बैठे एक वजीर को इशारा किया और वजीर ने अंदर से वही मखमली थैला निकाला। हाकिम ने अली मर्द को मुखातिब करते हुए कहा, "ए अली मर्द, तुम घासिब के हाथों मारे जाने वाले थे। मगर वह निशान देखकर वह वहां से भाग क्यों गया? क्या तुम्हें मालूम है?"
अली मर्द ने हैरत से कहा, "नहीं हुजूर, मुझे कुछ मालूम नहीं। मुझे तो लगा कि वह उस निशान की कीमत जानकर उसे लूटना चाहता था।"
हाकिम ने तब एक ऐसा राज जाहिर किया जिसने सबको हैरान कर दिया। "ए नौजवान मीर कारवा इब्राहिम और मैं बहुत पुराने दोस्त हैं। और यह निशान महज एक अलामत नहीं बल्कि एक खास किस्म का पैगाम था। इस निशान का ताल्लुक इस मुल्क के एक पुराने राज से है। असल में इब्राहिम ने तुम्हें परखने के लिए यह सफर करवाया था और लुटेरों का सरदार घासब कोई मामूली चोर नहीं था बल्कि वह मेरा ही आदमी था। मैंने उसे हुक्म दिया था कि वह कारवाओं पर हमला करें और खासतौर पर उस नौजवान से वह निशान छीन ले। घासब को यह पैगाम मिला था कि अगर वह नौजवान लूट के दौरान अपनी जान बचाने की खातिर इस निशान को खुद लुटेरे के हवाले कर दे या अपने हलाल के माल को बचाने के लिए इस निशान को छोड़ दे तो वह उसे इब्राहिम के पास वापस भेज देगा। लेकिन अगर वह अपनी जान पर खेलकर भी उस निशान को बचाने की कोशिश करें या उस निशान के छीने जाने के बाद भी अपनी दयानतदारी और ईमानदारी बरकरार रखे तो घासब को उसे छोड़कर फौरन वापस आ जाना है और वह निशान मुझे लौटा देना है। मीरे कारवाओं का असली पैगाम यही था कि वह जानना चाहते थे जिस नौजवान को वह अपना वारिस बनाना चाहते हैं वह सिर्फ दौलत के पीछे भागने वाला है या रिचके हलाल के उसूलों पर चलने वाला है।"
हाकिम ने आगे कहा, "लुटेरों के सरदार घासिब ने तुम्हारी अमानत को छुआ तक नहीं। और तुम्हारी जान बख्शी इसलिए की क्योंकि तुमने अपनी जान के खतरे के बावजूद अमानत में खयानत नहीं की। और तुमने अपने छोटे से तिजारत के माल को भी नहीं छोड़ा। सबसे अहम बात यह है कि तुमने उस जहरी अब्बू फारिस के धोखे को कबूल नहीं किया। तुम्हारी मां की नसीहतों ने तुम्हें हर इम्तिहान में बचा लिया। तुमने अपनी मेहनत के माल को छिपाने की कोशिश की। मगर तुमने कालीन की अमानत को छुपाया और निशान के लिए अपनी जान दांव पर लगा दी। इससे जाहिर हुआ कि तुम माल को नहीं बल्कि उसूलों को तरजीह देते हो। मीर कारवा इब्राहिम का पैगाम पूरा हुआ। उन्होंने यह सब तुम्हारी हलाल कमाई की नियत को परखने के लिए किया था।"
अली मर्द यह बात सुनकर हैरत और खुशी के जज्बात में डूब गया। उसकी आंखों से शुक्राने के आंसू बह निकले। हाकिम ने उसे बड़ा इनाम दिया और उसकी तजारत में हर मुमकिन मदद का वादा किया।
कुछ हफ्तों बाद अली मर्द एक बहुत बड्डा दधे और कामयाब ताजिर के तौर पर सिराज वापस लौटा। वह अपने साथ दौलत के अंबार नहीं बल्कि नेक नियती और मीरे कारवाह इब्राहिम का पूरा एतबार लेकर आया था। सबसे पहले वह अपनी मां ज़ैनब बीवी के पास गया जो सब्र और दुआओं के साथ उसका इंतजार कर रही थी। अली मर्द ने अपनी मां के कदमों में गिर कर रोना शुरू कर दिया। ज़ैनब बीवी ने उसे उठाकर सीने से लगाया और पूछा, "मेरे बेटे तू कामयाबी लेकर आया है। यह मेरे चेहरे से नजर आ रहा है। मगर बता सबसे कीमती चीज तूने क्या सीखी?"
अली मर्द ने जवाब दिया, "अम्माम जान मैंने सीखा कि रिजकर हलाल की तलाश एक सफर नहीं बल्कि एक जंग है जो हर लम्हा अपने जमीर से लड़नी पड़ती है। दौलत तो आती जाती रहेगी मगर आपका दिया हुआ ईमान और नसीहत यह मेरा सबसे बड़ा सरमाया है। अबू फारिस के 10 दीनार से लेकर लुटेरे के खौफ तक हर इम्तिहान में मुझे आपकी बातें याद आई और हर जगह अल्लाह ने मेरी मदद की। मीरे कारवा इब्राहिम ने मुझे अपनी तजारत का हिस्सा बना लिया है और मेरी अंगूठी की कीमत भी अदा कर दी है।"
ज़ैनब बीवी का चेहरा नूर से दम को उठा। उन्होंने कहा, "बस मेरे बेटे अब मुझे और कुछ नहीं चाहिए। अल्लाह तुझे हमेशा इसी तरह नेक नियत रखे।"
अली मर्द ने उस कमाई से अपनी मां के लिए एक आलीशान मकान बनवाया। और अपने शहर में एक यतीम खाना और एक छोटा सा मकतब कायम किया। वह हमेशा रिज़करे हलाल के उसूलों पर कायम रहा और सिराज का सबसे इज्जतदार ताजिर बन गया। उसने मीरे कारवा इब्राहिम से तजारत के बड़े हुनर सीखे और हमेशा हलाल तरीके से कमाया। उसकी दौलत में हमेशा बरकत रही क्योंकि वह सिर्फ दौलत नहीं बल्कि अल्लाह की रजा की तलाश में था। अल्लाह ताला का फरमान है कि रिज़्क हलाल में जो इत्मीनान है, वह हराम की दौलत के अंबार में कभी नहीं हो सकता। अली मर्द की यह कहानी सदियों तक शहर सिराज में अखलाक और दियादारी की मिसाल के तौर पर सुनाई जाती रही।
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